राजस्थान का घुडला त्यौहार, अज्ञानता भरा विकृत इतिहास

Written by गुरुवार, 15 मार्च 2018 11:47

जब इतिहास को सतत विकृत (Distorted History) करके पेश किया जाता है, और पाठ्यक्रमों तथा लोक जनश्रुतियों से सच्चा इतिहास धीरे-धीरे गायब होने लगता है तब ऐसे-ऐसे सामाजिक विकार पैदा हो जाते हैं कि बयान नहीं किया जा सकता, और ऐसा अक्सर केवल हिन्दुओं के साथ ही होता है, क्योंकि अव्वल तो सही इतिहास जानने के बारे में हमारी रूचि कम है, और ऊपर से वामपंथ पोषित संस्थाओं (Fake Historians) तथा “सेकुलरिज्म नामक एड्स की बीमारी” ने हिन्दू मानस को इतना बोदा, बेवकूफ और सुस्त बना दिया है कि सामने वाला जो भी इतिहास कहता है उस पर हम सहज विश्वास कर लेते हैं.

जो लोग उत्तरप्रदेश में रहते हैं, वे जानते हैं कि बहराईच नामक जिले में एक मज़ार है, जहाँ बाँझ हिन्दू महिलाएँ अपना शीश नवाने जाती हैं ताकि “सालार गाजी बाबा” के आशीर्वाद से उन्हें बच्चा हो जाए... अब सालार गाजी कौन था और उसकी मजार कैसे पैदा हो गई इस बारे में जानने के लिए आपको मेरा एक पुराना लेख पढ़ना होगा (पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें). दूसरा उदाहरण है अजमेर में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह का. आए दिन बड़े-बड़े फिल्म स्टार, राजनेता से लेकर सामान्य हिन्दू भी सिर पर फूलों का टोकरा उठाए इस दरगाह पर अपना मत्था टेकने पहुँच जाते हैं... अजमेर वाले ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का पूरा काला इतिहास, सूफी के नाम पर हिंदुओं को बहकाने वाली कथाएँ बताने का इस लेख में समय नहीं है (सूफियों के काले इतिहास को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें). संक्षेप में कहने का तात्पर्य है कि पूरे भारत में (खासकर उत्तर भारत में.... दक्षिण भारत के लोग अपनी संस्कृति और जड़ों से गहरे जुड़े हुए हैं) ऐसी दर्जनों मजारें, कब्रें हैं जहाँ “भोला हिन्दू” (अज्ञानी और मूर्ख भी कह सकते हैं) अपनी परम्पराओं और सनातन धर्म को तिलांजलि देकर नाक रगड़ता है. इसी कड़ी में एक और ब्रेनवॉश है, जिसे “घुडला” प्रथा (Ghudla Festival of Rajasthan) कहते हैं.  

राजस्थान में एक प्रथा है “घुड़ला” की.... मारवाड़ में होली के बाद एक पर्व शुरू होता है, जिसे घुड़ला पर्व कहते है. घुडला पर्व के बारे में पुराने लोग तो थोड़ा इतिहास जानते हैं, लेकिन आजकल की पीढ़ी जानती ही नहीं है कि घुडला त्यौहार क्या है? क्यों मनाया जाता है? जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर आदि जिलों में चैत्र कृष्ण सप्तमी अर्थात शीतला सप्तमी से लेकर चैत्र शुक्ला तृतीया तक घुड़ला त्यौहार मनाया जाता है. इस त्यौहार के प्रति बालिकाओं में ज्यादा उत्साह रहता है. घुड़ला एक छिद्र किया हुआ मिट्टी का घड़ा होता है जिसमें दीपक जला कर रखा होता है. इसके तहत लड़कियाँ 10-15 के झुंड में चलती हैं. इसके लिए वे सबसे पहले कुम्हार के यहां जाकर घुड़ला और चिड़कली खरीद कर लाती हैं, फिर इसमें कील से छोटे-छोटे छेद करती हैं और इसमें दीपक जला कर रखती हैं. इस त्यौहार में गाँव या शहर की लड़कियाँ शाम के समय एकत्रित होकर सिर पर घुड़ला लेकर समूह में मोहल्ले में घूमती हैं. घुड़ले को मोहल्लें में घुमाने के बाद बालिकाएँ एवं महिलाएँ अपने परिचितों एवं रिश्तेदारों के यहाँ घुड़ला लेकर जाती हैं. घुड़ला लिए बालिकाएँ घुड़ला व गवर के मंगल लोकगीत गाती हुई सुख व समृद्धि की कामना करती हैं. जिस घर पर भी वे जाती है, उस घर की महिलाएँ घुड़ला लेकर आई बालिकाओं का अतिथि की तरह स्वागत सत्कार करती हैं. साथ ही माटी के घुड़ले के अंदर जल रहे दीपक के दर्शन करके सभी कष्टों को दूर करने तथा घर में सुख शांति बनाए रखने की मंगल कामना व प्रार्थना करते हुए घुड़ले पर चढ़ावा चढ़ाती हैं. घुड़ले के शहर व गाँवों में घूमने का सिलसिला शीतला सप्तमी से चैत्र नवरात्रि के तीज पर आने वाली गणगौर तक चलता है. पाठकों को ये लगा होगा कि घुडला कोई बहुत पवित्र वस्तु है, जिसका पूजन और मंगलगान किया जाता है... वास्तव में यह घुड़ला क्या है? कोई नहीं जानता, कि घुड़ला की पूजा कब और कैसे शुरू हो गयी. यह भी ऐसा ही घटिया ओर घातक षड्यंत्र है जैसा कि अकबर को इतिहास में महान बोल दिया गया है... अथवा सालार गाजी को बच्चा पैदा करने वाली मजार घोषित किया गया. असली कहानी कुछ इस प्रकार है.

दरअसल हुआ ये था कि घुड़ला खान नामक अकबर का एक मुग़ल सरदार था, और अत्याचार एवं पैशाचिकता मे अकबर जैसा ही गंदा पिशाच था। ज़िला नागौर राजस्थान के पीपाड़ गांव के पास एक गांव है कोसाणा, उस गांव में लगभग 200 कुंवारी कन्याएँ गणगौर पर्व की पूजा कर रही थीं, वे व्रत में थी. इन्हें मारवाड़ी भाषा में तीजणियां कहते हैं. गाँव के बाहर मौजूद तालाब पर पूजन करने के लिये सभी बच्चियाँ गयी हुई थी. उधर से ही घुडला खान मुसलमान सरदार अपनी फ़ौज के साथ निकल रहा था, उसकी गंदी नज़र उन बच्चियों पर पड़ी तो उसकी “वंशानुगत पैशाचिकता” जाग उठी. उसने सभी बच्चियों का बलात्कार के उद्देश्य से अपहरण कर लिया, जिस भी गाँव वाले ने विरोध किया उसको उसने मौत के घाट उतार दिया। इसकी सूचना गाँव के कुछ घुड़सवारों ने जोधपुर के राव सातल सिंह राठौड़ जी को दी।

राव सातल सिंह जी और उनके घुड़सवारों ने घुड़ला खान का पीछा किया, और कुछ समय मे ही घुडला खान को रोक लिया। घुडला खान का चेहरा पीला पड़ गया, उसने सातल सिंह जी की वीरता के बारे मे सुन रखा था। उसने अपने आपको संयत करते हुये कहा, राव साहब तुम मुझे नही दिल्ली के बादशाह अकबर को रोक रहे हो, इसका ख़ामियाज़ा तुम्हें और जोधपुर को भुगतना पड़ सकता है, सोच लो? राव सातल सिंह जी बोले... पापी, दुष्ट ये तो बाद की बात है पर अभी तो में तुझे तेरे इस गंदे काम का ख़ामियाज़ा यहीं भुगता देता हूँ. राजपुतो की तलवारों ने दुष्ट मुग़लों के ख़ून से प्यास बुझाना शुरू कर दिया था, संख्या मे अधिक मुग़ल सेना के पांव उखड़ गये, भागती मुग़ल सेना का पीछा कर ख़ात्मा कर दिया गया। राव सातल सिंह जी ने तलवार के भरपुर वार से एक ही झटके में दुष्ट घुडला खान का सिर धड़ से अलग कर दिया। राव सातल सिंह ने सभी बच्चियों को मुक्त करवाकर उनके सतीत्व की रक्षा की। इस युद्ध मे वीर सातल सिंह जी अत्यधिक घाव लगने से वीरगति को प्राप्त हुये। उसी गाँव कोसाणा के तालाब पर सातल सिंह जी का अंतिम संस्कार किया गया, वहाँ मौजूद सातल सिंह जी की समाधि उनकी वीरता ओर त्याग की गाथा सुना रही है। गांव वालों ने उस दुष्ट घुडला खान का कटा हुआ सिर बच्चियों को सोंप दिया. बच्चियो ने घुडला खान के सिर को घड़े पर रख कर उस घड़े मे जितने घाव घुडला खान के शरीर पर हुये, उतने छेद किये और फिर पुरे गाँव मे घुमाया एवं हर घर मे रोशनी की गयी.

यह है घुड़ले की वास्तविक कहानी, जिसके बारे में अधिकाँश लोग अनजान है. अब हो गया है उल्टा, हिन्दु लोग राव सातल सिंह जी को तो भूल गए, और प्रकारांतर से उस छेद किसे हुए मटके में पापी दुष्ट घुड़ला खान के स्थान पर दीपक रखकर उसी को पूजने लग गए. परंपरा तो ये होना चाहिए थी कि इस त्यौहार में बालिकाएँ उस छेद वाले घड़े में मिट्टी का बना हुआ घुडला खान का सिर लेकर गाँव में निकलतीं और घर-घर जाकर उस मटके पर जूतों की बरसात की जाती ताकि सभी बच्चियों को को स्मरण रहता कि घुडला खान कौन था? उसकी नीयत कैसी थी और राव सातल सिंह जी ने किस क्रूर और नरपिशाच का वध किया था... लेकिन हिन्दू इसे भी एक "उत्सवनुमा त्यौहार" की तरह मनाने लगे हैं... संभव है कि जल्दी ही वो समय भी आ जाए कि घुडला को देवता घोषित कर दिया जाए?? कहना यही है कि राव सातलसिंह जी को याद करो, नहीं तो हिन्दुस्तान के ये तथाकथित गद्दार इतिहासकार, उस घुड़ला खान को देवता बनाने का कुत्सित प्रयास करते रहेंगे. हिन्दुत्व को बचाने के लिये, हम सभी के द्वारा इस सत्य से हिन्दुओं को अवगत कराना आवश्यक है.. नहीं तो कालांतर मे अर्थ का अनर्थ हो सकता है... अनर्थ होता ही है, जैसा कि बहराईच के सालार गाजी मजार वाले उदाहरण में भी बताया जा चुका है. 

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