top left img

गौरी लंकेश हत्या प्रकरण : परदे के पीछे "गिरोह" का खेल

Written by गुरुवार, 07 सितम्बर 2017 13:28

मंगलवार को “गौरी लंकेश पत्रिका” नामक साप्ताहिक की संपादक, सरेआम वामपंथी विचारधारा का समर्थन करने वाली, फिर भी निष्पक्ष(?) कही जाने वाली तथा नक्सलवादियों की खुलेआम समर्थक रहीं गौरी लंकेश की बैंगलोर में उनके घर के बाहर गोलियाँ मारकर हत्या कर दी गई.

बंगलौर में उनका मकान एक उच्चवर्गीय कॉलोनी राजराजेश्वरी नगर में है, और उन्हें घर के दरवाजे पर ही मोटरसाइकिल से आए कुछ हमलावरों ने गोलियाँ मारीं.

वास्तव में देखा जाए तो एक सभ्य देश में इस प्रकार की घृणात्मक हत्या की एक स्वर में कड़ी निंदा होनी चाहिए और यह घटना समाज के लिए शर्म की बात है. इस हत्या की कड़ी निंदा की जानी चाहिए, लेकिन गौरी लंकेश की मृत्यु के मात्र आधे घंटे के भीतर सोशल मीडिया और मुख्यधारा के चैनलों पर जिस तरह बिना किसी जाँच अथवा बिना किसी FIR के सीधे हिंदूवादी संगठनों पर उँगली उठाने, बदनाम करने का घिनौना खेल शुरू हुआ, उससे यह ज़ाहिर हो गया कि इस हत्याकाण्ड के पीछे की परतें बहुत गहरी हैं.

पुलिस, CBI अथवा SIT तो इस हत्याकाण्ड की जाँच करेंगी ही, लेकिन एक सामान्य बुद्धि वाले आम नागरिक के मन में तत्काल जो सवाल उठ रहे हैं उन्हें यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है. उल्लेखनीय है कि गौरी लंकेश खुलेआम नक्सलवादियों की समर्थक रही हैं. गौरी लंकेश ने अपने ट्वीट में “भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसे नारे लगाने वाले कन्हैया और उमर खालिद को “मेरे प्यारे बच्चे” कहकर संबोधित किया है. ये तो हुई राजनैतिक बात, लेकिन आज से कुछ वर्ष पूर्व “गौरी लंकेश पत्रिका” के मालिकाना हक और संपत्ति के आपसी झगड़े को लेकर उनके भाई के बीच रिवाल्वर दिखाकर जान से मारने की धमकी वाला विवाद भी हुआ. दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ थाने में FIR की हुई है. गत नवंबर में गौरी लंकेश (जो कि हिन्दू धर्म की विरोधी थीं और खुद को नास्तिक कहती थी), ने अपने साप्ताहिक में हिन्दू देवताओं के खिलाफ अनर्गल बातें और अश्लील चित्र छापे थे. इस मामले को लेकर कुछ हिन्दू संगठनों तथा धारवाड़ के सांसद प्रहलाद जोशी ने कानूनी रास्ता अपनाया और गौरी लंकेश को हाईकोर्ट ने छह माह की जेल तथा 5000 रूपए का जुर्माना लगाया था. फिलहाल वे कोर्ट से जमानत पर चल रही थीं. स्वाभाविक है कि ऐसी महिला, जो कि विभिन्न विवादों में फँसी हुई हो उसके कई दुश्मन हो सकते हैं. ऐसे में हत्या होने के आधे घंटे के भीतर “केवल हिंदूवादी संगठनों को” निशाना बनाकर धड़ाधड़ ट्वीट और ख़बरें चलाना निश्चित रूप से एक गहरे षड्यंत्र की तरफ इशारा करता है.  गौरी लंकेश के अखबार को एक भी विज्ञापन नहीं मिलता था, फिर भी कम से कम पचास कर्मचारियों को नियमित वेतन मिलता था, यह भी आश्चर्यजनक ही है. 

जलती चिताओं पर दाल-बाटी सेंकना काँग्रेस को बखूबी आता है. इस मामले में भी काँग्रेस ने एक बेहद आपत्तिजनक चित्र अपने आधिकारिक ट्विटर से पोस्ट किया, जिसमें गौरी लंकेश की लाश के चारों तरफ भारत का नक्शा चित्रित करके कहा गया, “बगैर काँग्रेस के ऐसा है भारत”. जब केरल में संघियों पर वामपंथी हमले करके उन्हें मारते हैं तब काँग्रेस चुप्पी साध लेती है, लेकिन क़ानून-व्यवस्था राज्य का मामला होने के बावजूद एवं काँग्रेसी राज्य में ही दाभोलकर, कल्बुर्गी तथा अब गौरी लंकेश की हत्या होने के बावजूद इतनी बेशर्मी से केन्द्र सरकार पर आरोप मढ़ना वास्तव में शर्मनाक है.

Gauri 2


एक और बात है, जिसे लेकर कोई भी सामान्य समझ वाला व्यक्ति शंकित हो सकता है. मंगलवार रात को आठ बजे गौरी लंकेश को गोली मारी गई, और बंगलौर जैसे शहर में जहाँ आवागमन बहुत दूर-दूर एवं समय खाता है... ऐसे शहर में केवल एक घंटे के भीतर यानी रात नौ बजे “हिंदूवादी संगठनों” के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी आयोजित कर लिया गया? इसी प्रकार अगले ही दिन यानी बुधवार को दोपहर में विभिन्न वामपंथी संगठनों ने अपने-अपने हाथों में पोस्टर और तख्तियाँ लेकर विरोध प्रदर्शन किए. इनके हाथों में बेहद उम्दा और कलात्मक तरीके से डिजाइन किए हुए प्लेकार्ड एवं प्रोफेशनल बैनर थे. ऐसे शानदार पोलिस्टर बैनर और पोस्टर तैयार करने में काफी समय लगता है. फिर एक ही रात में इतने बढ़िया पोस्टर किसने छापे? इतनी बड़ी मात्रा में ये पोस्टर “अर्जेंट स्वरूप” में छापने के पैसे किसने दिए? उधर कर्नाटक में काँग्रेस सरकार ने गौरी लंकेश को “राजकीय सम्मान” के साथ दफनाया(?). यह राजकीय सम्मान किस प्रोटोकॉल के तहत दिया गया, कोई नहीं जानता. नक्सलवादियों की खुली समर्थक तथा छः माह की जेल सजायाफ्ता और जमानत पर चल रही अपराधी को राजकीय सम्मान किसके कहने पर दिया गया? किस नियम के तहत दिया? 

Gauri 3

 

हम वापस आते हैं उन विरोध प्रदर्शनों एवं कलात्मक प्रोफेशनल पोस्टरों पर. गौरी लंकेश की अंतिम क्रियाविधि एवं दिल्ली सहित कुछ शहरों में विरोध प्रदर्शन के दौरान जो पोस्टर उपयोग किए गए, उन सभी पर “कैरिटास” नामक ईसाई संस्था का नाम लिखा हुआ था. क्या इस ईसाई संस्था ने दफनाने की प्रक्रिया को “नाम कमाने का इवेंट” समझ लिया था? 2013 से लेकर अभी तक देश में कुल 22 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है. फिर केवल गौरी लंकेश की हत्या पर “लोकतंत्र की कथित दुहाई” देने वाले ईसाई संगठन कैरिटास को इसी समय इसकी याद क्यों आई? इतने सारे पत्रकारों के मारे जाने के बावजूद आज तक कभी भी “कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस ऑफ इंडिया” ने कोई आवाज़ नहीं उठाई... आज अचानक लंकेश के लिए इनका प्रेम क्यों उमड़ रहा है??

gauri 5

 

जब गौरी लंकेश का सगा भाई चैनलों पर खुलेआम कह रहा है, कि उसकी हत्या के पीछे नक्सलवादियों का हाथ हो सकता है, फिर दाभोलकर की ही तरह खामख्वाह हिंदूवादी संगठनों को बदनाम करने का अधिकार इन ईसाई संगठनों को किसने दिया? स्वाभाविक सी बात है कि NGOs, मीडिया चैनलों, चर्च एवं वामपंथी बुद्धिजीवियों का देशव्यापी “गिरोह” अभी भी इतना मजबूत है कि वह हत्या के बाद मात्र एक घंटे में बंगलौर जैसे शहर में विरोध प्रदर्शन भी कर सकता है और चैनलों पर हिंदुओं को बदनाम करने के लिए खेल भी रच सकता है... संघ और भाजपा को अभी इन षडयंत्रकारी तत्वों से बहुत कुछ सीखना बाकी है. पन्द्रह-सोलह राज्यों में सत्ता तथा केन्द्र में पूर्ण बहुमत की सरकार के होते हुए भी यदि चर्च पोषित तत्त्व सरेआम दुष्प्रचार चला रहे हैं, तो यह भाजपा-संघ का निकम्मापन ही उजागर करता है.

Read 3247 times Last modified on गुरुवार, 07 सितम्बर 2017 18:21
न्यूज़ लैटर के लिए साइन अप करें