हरिलाल गाँधी का मुस्लिम बनना, कस्तूरबा और आर्य समाज (भाग-२)

Written by बुधवार, 11 अक्टूबर 2017 21:33

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि हरिलाल गाँधी द्वारा इस्लाम कबूलने के बाद महात्मा गाँधी किस तरह बिलबिला गए थे, और उन्होंने लंबा सा पत्र सार्वजनिक रूप से लिख मारा. (पिछला भाग पढने के लिए यहाँ क्लिक करें)

गाँधी एक तरफ तो इस्लाम के प्रति सहानुभूति और पक्षधरता दिखाते थे, लेकिन जब व्यक्तिगत बात आई तो उन्होंने हरिलाल के धर्म परिवर्तन को सहजता से स्वीकार नहीं किया... जिस आर्य समाज को गाँधी लगातार कोसते रहे, अंततः उसी की शरण में उन्हें जाना पड़ा. अब इस भाग में पढ़िए कि कस्तूरबा गाँधी ने अपने पुत्र के लिए और हरिलाल को मुसलमान बनाने वालों के लिए कैसा पत्र लिखा है. 


माता कस्तूरबा बा का अपने पुत्र के नाम मार्मिक पत्र –

“तुम्हारे आचरण से मेरे लिए जीवन भारी हो गया है, मेरे प्रिय पुत्र हरिलाल, मैंने सुना है कि तुमको मद्रास में आधी रात में पुलिस के सिपाही ने शराब के नशे में असभ्य आचरण करते देखा और गिरफ्तार कर लिया. दूसरे दिन तुमको अदालत में पेश किया गया. निस्संदेह वे भले आदमी थे, जिन्होंने तुम्हारे साथ बड़ी नरमाई का व्यवहार किया. तुमको बहुत साधारण सजा देते हुए मजिस्ट्रेट ने भी तुम्हारे पिता के प्रति आदर का भाव जाहिर किया. जबसे मैंने इस घटना का समाचार सुना हैं मेरा दिल बहुत दुखी है. मुझे नहीं मालूम की तुम उस रात्रि को अकेले थे या तुम्हारे कु-साथी भी तुम्हारे साथ थे? कुछ भी तुमने जो किया ठीक नहीं किया. मेरी समझ में नहीं आता कि मैं तुम्हारे इस कृत्य के बारे में क्या कहूँ? मैं वर्षों से तुमको समझाती आ रही हूँ कि तुमको अपने पर कुछ काबू रखना चाहिए. परन्तु तुम दिन पर दिन बिगड़ते ही जाते हो? अब तो मेरे लिए तुम्हारा आचरण इतना असह्य हो गया हैं कि मुझे अपना जीवन ही भारी मालूम होने लगा हैं. जरा सोचो तो तुम इस बुढ़ापे में अपने माता पिता को कितना कष्ट पहुँचा रहे हो? तुम्हारे पिता किसी को कुछ भी नहीं कहते, पर मैं जानती हूँ की तुम्हारे आचरण से उनके ह्रदय पर कैसी चोटें लग रही हैं? उनसे उनका ह्रदय टुकड़े टुकड़े हो रहा है. तुम हमारी भावनाओं को चोट पहुँचा कर बहुत बड़ा पाप कर रहे हो. हमारे पुत्र होकर भी तुम दुश्मन का सा व्यवहार कर रहे हो. तुमने तो शर्म-हया सबकी तिलांजलि दे दी है.

मैंने सुना हैं कि इधर अपनी आवारागर्दी से तुम अपने महान पिता का मजाक भी उड़ाने लग गये हो. तुम जैसे अकलमंद लड़के से यह उम्मीद नहीं थी. तुम महसूस नहीं करते कि अपने पिता की अपकीर्ति करते हुए तुम अपने आप ही जलील होते हो. उनके दिल में तुम्हारे लिए सिवा प्रेम के कुछ नहीं है. तुम्हें पता है कि वे चरित्र की शुद्धि पर कितना जोर देते हैं, लेकिन तुमने उनकी सलाह पर कभी ध्यान नहीं दिया. फिर भी उन्होंने तुम्हें अपने पास रखने, पालन पोषण करने और यहाँ तक कि तुम्हारी सेवा करने के लिए रजामंदी प्रगट की, लेकिन तुम हमेशा कृतघ्नी बने रहे. उन्हें दुनिया में और भी बहुत से काम हैं. इससे ज्यादा और तुम्हारे लिये वे क्या करे? वे अपने भाग्य को कोस लेते हैं. परमात्मा ने उन्हें असीम इच्छा शक्ति दी है और परमात्मा उन्हें यथेच्छ आयु दे की वे अपने मिशन को पूरा कर सकें. लेकिन मैं तो एक कमजोर बूढ़ी औरत हूँ और यह मानसिक व्यथा बर्दाश्त नहीं होती. तुम्हारे पिता के पास रोजाना तुम्हारे व्यवहार की शिकायतें आ रही हैं उन्हें वह सब कड़वे घूंट की तरह पीनी पड़ती हैं. तुमने मेरे मुँह छुपाने तक को कही भी जगह नहीं छोड़ी हैं. शर्म के मारे में परिचितों या अपरिचितों में उठने-बैठने लायक भी नहीं रही हूँ. तुम्हारे पिता तुम्हें हमेशा क्षमा कर देते हैं, लेकिन याद रखो, परमेश्वर तुम्हें कभी क्षमा नहीं करेगे.

मद्रास में तुम एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के मेहमान थे, परन्तु तुमने उसके आतिथ्य का नाजायज फायदा उठाया और बड़े बेहूदा व्यवहार किये. इससे तुम्हारे मेजबान को कितना कष्ट हुआ होगा? प्रतिदिन सुबह उठते ही मैं काँप जाती हूँ कि पता नहीं आज के अखबार में क्या नयी खबर आयेगी? कई बार मैं सोचती हूँ की तुम कहाँ रहते हो? कहाँ सोते हो और क्या खाते हो? शायद तुम निषिद्द भोजन भी करते हो. इन सबको सोचते हुए बैचैनी में पलकों पर रातें काट देती हूँ. कई बार मेरी इच्छा तुमको मिलने की होती हैं लेकिन मुझे नहीं सूझता कि मैं तुम्हे कहा मिलूँ? तुम मेरे सबसे बड़े लड़के हो और अब आयु के पचासवे पर पहुँच रहे हो. मुझे यह भी डर लगता रहता है कि कहीं तुम मिलने पर मेरी भी बेइज्जती न कर दो. मुझे मालूम नहीं कि तुमने अपने पूर्वजों के धर्म को क्यूँ छोड़ दिया है, लेकिन सुना हैं तुम दुसरे भोले भाले आदमियों को भी अपना अनुसरण करने के लिए बहकाते फिरते हो? क्या तुम्हें अपनी कमियाँ नहीं मालूम? तुम 'धर्म' के विषय में जानते ही क्या हो? तुम अपनी इस मानसिक अवस्था में विवेक बुद्धि नहीं रख सकते? लोगों को इस कारण धोखा हो जाता है क्यूंकि तुम एक महान पिता के पुत्र हो. तुम्हें धर्म उपदेश का अधिकार ही नहीं क्यूंकि तुम तो अर्थ के दास हो. जो तुम्हें पैसा देता रहे तुम उसी के रहते हो. तुम इस पैसे से शराब पीते हो और फिर प्लेटफार्म पर चढ़कर लेक्चर फटकारते हो. तुम अपने को और अपनी आत्मा को तबाह कर रहे हो.

भविष्य में यदि तुम्हारी यही करतूते रही तो तुम्हे कोई कोड़ियों के भाव भी नहीं पूछेगा. इससे मैं तुम्हें सलाह देती हूँ की जरा डरो, विचार करो और अपनी बेवकूफी से बाज आओ. मुझे तुम्हारा धर्म परिवर्तन परिवर्तन बिलकुल पसंद नहीं हैं. लेकिन जब मैंने पत्रों में पढ़ा कि तुम अपना सुधार करना चाहते हो तो मेरा अन्तःकरण इस बात से अलाहादित हो गया कि अब तुम ठीक जिंदगी बसर करोगे, लेकिन तुमने तो उन सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया. अभी बम्बई में तुम्हारे कुछ पुराने मित्रों और शुभ चाहने वालों ने तुम्हे पहले से भी बदतर हालत में देखा हैं. तुम्हें यह भी मालूम हैं की तुम्हारी इन कारस्तानियों से तुम्हारे पुत्र को कितना कष्ट पहुँच रहा हैं. तुम्हारी लड़किया और तुम्हारा दामाद सभी इस दुःख भार को सहने में असमर्थ हो रहे हैं, जो तुम्हारी करतूतों से उन्हें होता है.

जिन मुसलमानों ने हरिलाल के मुस्लमान बनने और उसकी बाद की हरकतों में खुश होकर रूचि दिखाई हैं, उनको संबोधन करते हुए कस्तूरबा गाँधी लिखती हैं-

"आप लोगों के व्यवहार को मैं समझ नहीं सकी. मुझे तो सिर्फ उन लोगों से कहना है, जो इन दिनों मेरे पुत्र की वर्तमान गतिविधियों में तत्परता दिखा रहे हैं. "मैं जानती हूँ कि मुझे इससे प्रसन्नता भी है की हमारे चिर परिचित मुस्लमान मित्रों और विचारशील मुसलमानों ने इस आकस्मिक घटना की निंदा की है. आज मुझे उच्चमना डॉ अंसारी की उपस्थिति का अभाव बहुत खल रहा है, वे यदि होते तो आप लोगों और मेरे पुत्र को सत्परामर्श देते, मगर उनके समान ही ओर प्रभावशाली तथा उदार मुस्लमान हैं, यद्यपि उनसे मैं सुपरिचित नहीं हूँ, जो कि मुझे आशा हैं, तुमको उचित सलाह देंगे. मेरे लड़के को सुधारने की अपेक्षा में, मैं देखती हूँ कि इस नाम मात्र के धर्म परिवर्तन से उसकी आदतें बद से बदतर हो गई है. आपको चाहिए कि आप उसको उसकी बुरी आदतों के लिए डांटे और उसको उलटे रास्ते से अलग करें. परन्तु मुझे यह बताया गया है कि आप उसे उसी उलटे मार्ग पर चलने के लिए बढ़ावा देते हैं.

कुछ लोगों ने मेरे लड़के को "मौलवी" तक कहना शुरू कर दिया है. क्या यह उचित है? क्या आपका धर्म एक शराबी को मौलवी कहने का समर्थन करता है? मद्रास में उसके असद आचरण के बाद भी स्टेशन पर कुछ मुस्लमान उसको विदाई देने आये. मुझे नहीं मालूम उसको इस प्रकार का बढ़ावा देने में आप क्या ख़ुशी महसूस करते हैं. यदि वास्तव में आप उसे अपना भाई मानते हैं, तो आप कभी भी ऐसा नहीं करेगे, जैसा कि कर रहे हैं, वह उसके लिए फायदेमंद नहीं हैं. परन्तु यदि आप केवल हमारी फजीहत करना चाहते हैं तो मुझे आप लोगो को कुछ भी नहीं कहना है. आप जितना भी बुरा करना चाहे कर सकते हैं. लेकिन एक दुखिया और बूढ़ी माता की कमजोर आवाज़ शायद आप में से कुछ एक की अन्तरात्मा को जगा दे. मेरा यह फर्ज है कि मैं वह बात आप से भी कह दूँ जो मैं अपने पुत्र से कहती रहती हूँ. वह यह है कि परमात्मा की नज़र में तुम कोई भला काम नहीं कर रहे हो.

(कस्तूरबा के हरिलाल गाँधी के नाम लिखे गये पत्र को पढ़कर कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है. उन्होंने स्पष्ट रूप से इस हरिलाल के मुस्लमान बनने की तीव्र आलोचना की है एवं समझदार मुसलमानों से हरिलाल को समझाने की सलाह दी है)

हरिलाल गाँधी को इस्लाम से धोखा और आर्यसमाज द्वारा उनकी शुद्धि

अब्दुल्लाह बनने के लिए हरिलाल गाँधी को बड़े बड़े सपने दिखाए गये थे. गाँधी जी ने तो लिखा ही था कि जो सबसे बड़ी बोली लगाएगा, हरिलाल उसी का धर्म ग्रहण कर लेगा. हरिलाल के अब्दुल्लाह बनने के समाचार को बड़े जोर शोर से मुस्लिम समाज द्वारा प्रचारित किया गया. ऐसा लगता था जैसे कोई बड़ा मोर्चा उनके हाथ आ गया हो. हरिलाल की आसानी से रुपया मिलने के कारण उसकी हालत बद से बदतर हो गई. उनको मुस्लमान बनाने के पीछे यह उद्देश्य कदापि नहीं था कि उनके जीवन में सुधार आये, उनकी गलत आदतों पर अंकुश लग सके... बल्कि मुसलमानों का उद्देश्य गाँधी जी को नीचा दिखाना था. हिन्दू समाज को नीचा दिखाना था. उन्हें इस्लाम ग्रहण करने के लिए प्रेरित करना था. अपने नये अवतार में हरिलाल ने अनेक स्थानों का दौरा किया एवं अपनी तकरीरों में इस्लाम और पाकिस्तान की वकालत की. उस समय हरिलाल कानपुर में थे। उन्होंने एक सभा में भाषण देते हुए कहा '' अब मैं हरिलाल नहीं बल्कि अब्दुल्ला हूँ। मैं शराब छोड़ सकता हूँ, लेकिन इसी शर्त पर कि बापू और बा दोनों इस्लाम कबूल कर लें. आर्यसमाज द्वारा कस्तूरबा गाँधी की अपील पर हरिलाल को समझाने के कुछ प्रयास आरम्भ में हुए, लेकिन नये नये अब्दुल्लाह बने हरिलाल ने किसी की नहीं सुनी. कहते हैं ना कि झूठ के पाँव नहीं होते, जो विचार सत्य पर आधारित न हो, जिस विचार के पीछे अनुचित उद्देश्य शामिल हो वह विचार सुद्रढ़ एवं प्रभावशाली नहीं होता. ऐसा ही कुछ हरिलाल के साथ हुआ. हरिलाल की रातें या तो नशे में व्यतीत होती अथवा नशा उतरने के बाद उनकी आँखों के सामने उनकी बुढ़ी माँ कस्तूरबा का पत्र उन्हें याद आने लगा जिससे उनका मन व्यथित रहने लगा. 

उस काल में हिन्दू-मुस्लिम दंगे सामान्य बात थी. एक बार कुछ मुस्लमान उन्हें एक हिन्दू मन्दिर तोड़ने के लिए ले गये और उनसे पहली चोट करने को कहा. उन्हें उकसाते हुए कहाँ गया कि या तो सोमनाथ के मंदिर पर मुहम्मद गोरी ने पहली चोट की थी अथवा आज इस मंदिर पर अब्दुल्लाह गाँधी की पहली चोट होगी. कुछ समय तक चुप रहकर, सोच विचार कर अब्दुल्लाह ने कहा कि जहाँ तक इस्लाम का मैनें अध्ययन किया है, मैंने तो इस्लाम की शिक्षाओं में ऐसा कहीं नहीं पढ़ा कि किसी धार्मिक स्थल को तोड़ना इस्लाम का पालन करना हैं और किसी भी मंदिर को तोड़ना देश की किसी जवलंत समस्या का समाधान भी नहीं हैं. हरिलाल के ऐसा कहने पर उनके मुस्लिम साथी उनसे नाराज होकर चले गये, और उनसे किनारा करना आरंभ कर दिया।

श्रीमान ज़कारिया साहिब जिन्होंने हरिलाल को अब्दुल्लाह बनने के लिए अनेक वायदे किये थे, कि तो बात करने की भाषा ही बदल गई थी. जो मुस्लमान हरिलाल को बहका कर अब्दुल्लाह बना लाये थे वे अपने मनसूबे पूरे न होते देख उन्हें ही लानते देने लगे. आखिर उन्हें गाँधी जी का वह कथन समझ में आ गया कि हरिलाल को अब्दुल्लाह बनाने से इस्लाम का कुछ भी फायदा होने वाला नहीं हैं. अब्दुल्लाह का मन अब वापिस हरिलाल बनने को कर रहा था, परन्तु अभी भी मन में कुछ संशय बचे थे. इतिहास की अनोखी करवट देखिये कि गाँधी जी ने आर्यसमाज के शुद्धि मिशन की जहाँ खुले आम आलोचना की थी उन्हीं गाँधी जी के पुत्र हरिलाल को आर्यसमाज की शरण में वापिस हिन्दू धर्म में प्रवेश के लिए, अपनी शुद्धि के लिए आना पड़ा था. आर्यसमाज बम्बई के श्री विजयशंकर भट्ट द्वारा वेदों की इस्लाम पर श्रेष्ठता विषय पर दो व्याख्यान सुनकर उनके मन में बचे हुए बाकि संशयों की भी निवृति हो गई. जिन हरिलाल को मुसलमानों ने तरह तरह ले लोभ और वायदे किये थे, उन्ही हरिलाल को बिना किसी लोभ अथवा प्रलोभन के, बिना किसी झूठे वायदे के वापस अब्दुल्लाह से हरिलाल बनाया गया.

बम्बई में खुले मैदान में हजारों की भीड़ के सामने, अपनी माँ कस्तूरबा और अपने भाइयों के समक्ष आर्य समाज द्वारा अब्दुल्लाह को शुद्ध कर वापिस हरिलाल गाँधी बनाया गया. अपने भाषण में हरिलाल ने उस दिन को अपने जीवन का सबसे स्वर्णिम दिन बताया. उन्होने कहा कि, धर्म का सत्य अर्थ केवल उसकी मान्यताएँ भर नहीं अपितु उसके मानने वालो की संस्कृति, शिष्टता और सामाजिक व्यवहार पर उसका प्रभाव भी है. इस्लाम के विषय में अपने अनुभवों से मैंने यह सीखा है कि, हिन्दुओं की वैदिक संस्कृति एवं उसको मानने वालो की शिष्टता और सामाजिक व्यवहार इस्लाम अथवा किसी भी अन्य धर्म से कही ज्यादा श्रेष्ठ हैं। हरिलाल ने आगे कहा, कि इतना ही नहीं इस्लाम में पाई जाने वाली सत्यता हिन्दू संस्कृति की ही देन हैं. जिन मुसलमानों के मैं संसर्ग में आया वे इस्लाम की मान्यताओं से ठीक विपरीत व्यवहार करते हैं. इसलिए अब में इस्लाम को इससे अधिक नहीं मान सकता और मैं अब वही आ गया हूँ जहाँ से मैंने शुरुआत की थी. अगर मेरे इस निश्चय से मेरे माता पिता, मेरे भाइयों,मेरे सम्बन्धियों को प्रसन्नता हुई हैं तो में उनका आशीर्वाद चाहूँगा. अंत में मैं उनसे क्षमा माँगता हूँ और उन्हें मेरा सहयोग करने की विनती करता हूँ. हरिलाल वैदिक धर्म का अभिन्न अंग बनकर भारतीय श्रद्धानन्द शुद्धि सभा के सदस्य बन ,गये और आर्यसमाज के शुद्धि कार्य में लग गये।

हरिलाल गांधी द्वारा अपनी शुद्धि के समय दिया गया व्यक्तव्य

माननीय भद्रपुरुषों भाइयों और बहनों

नमस्ते... कुछ लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि मैंने पुन: क्यूँ धर्म परिवर्तन किया. बहुत से हिन्दू और मुस्लमान बहुत से बातें सोच रहे होगे परन्तु मैं अपना दिल खोले बगैर नहीं रह सकता हूँ. वर्तमान में जो "धर्म" कहा गया है उसमें न केवल उसके सिद्धांत होते हैं वरन उसमें उसकी संस्कृति और और उसके अनुयायियों का नैतिक और सामाजिक जीवन भी सम्मिलित होता हैं. इन सबके तजुर्बे के लिए मैंने मुसलमानी धर्म ग्रहण किया था. जो कुछ मैंने देखा और अनुभव किया हैं उसके आधार पर मैं कह सकता हूँ कि प्राचीन वैदिक धर्म के सिद्धांत, उसकी संस्कृति, भाषा, साहित्य और उसके अनुयायियों का नैतिक और सामाजिक जीवन इस्लाम और देश के दूसरे प्रचलित मतों के सिद्धांत और अनुयायियों के मुकाबले में किसी प्रकार भी तुच्छ नहीं हैं और न केवल इतना ही वरन उच्च है.

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा प्रतिपादित वैदिक धर्म के वास्तविक रूप को यदि हम समझे तो हम बलपूर्वक कह सकते हैं कि इस्लाम और दूसरे मतों में जो सच्चाई और सार्वभौम सिद्धांत मिलते हैं वे सब वैदिक धर्म से आये हैं, इस प्रकार दार्शनिक दृष्टि से सत्य कि खोज के अलावा धर्म परिवर्तन और कोई चीज नहीं हैं. जिस भांति सार्वभौम सच्चाइयों अर्थात वैदिक धर्म का सांप्रदायिक असूलों के साथ मिश्रण हो जाने से रूप विकृत हो गया. इसी भांति भारत के कुछ मुसलमानों के साथ अपने संपर्क के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि वे लोग मुहम्मद साहिब कि आज्ञाओं और मजहबी उसूलों से अभी बहुत दूर हैं. जहां तक मुझे मालूम है हज़रात ख़लीफ़ा उमर ने दूसरे धर्म वालो के धर्म संस्थाओं और संस्थाओं को नष्ट करने का कभी हुकुम नहीं दिया था, जो वर्त्तमान में हमारे देश कि मुख्य समस्याएँ हैं. इस सब परिस्थितियों और बातों पर विचार करते हुए मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि "मैं" आगे इस्लाम की किसी प्रकार भी सेवा नहीं कर सकता हूँ.

जिस प्रकार गिरा हुआ आदमी चढ़कर अपनी असली जगह पर पहुँच जाता हैं इसी प्रकार महर्षि दयानंद द्वारा प्रतिपादित वैदिक धर्म कि सच्चाइयों को जानने और उन तक पहुँचने कि मैं कोशिश कर रहा हूँ. ये सच्चाइयाँ मौलिक, स्पष्ट स्वाभाविक और सार्वभौम हैं तथा सूरज कि किरणों कि तरह देश, जाति और समाज के भेदभाव से शुन्य तमाम मानव समाज के लिए उपयोगी हैं. इस सच्चाईयों और आदर्शों कि स्वामी दयानंद द्वारा उनकी पुस्तकों सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका और दूसरी किताबों में बिना किसी भय वा पक्ष के व्याख्या कि गई हैं. इस प्रकार मैं स्वामी दयानंद सरस्वती कि शिक्षाओं कि कृपा और आर्यसमाज के उद्योग से अपने धर्म रुपी पिता और संस्कृति रुपी माता के चरणों में बैठता हूँ. यदि मेरे माता-पिता, सम्बन्धी और दोस्त इस खबर से प्रसन्न हो तो मैं उनके आशीर्वाद कि याचना करता हूँ. अंत में प्रार्थना करता हूँ प्रभु , मेरी रक्षा करो,मुझ पर दया करो, और मुझे क्षमा करो. मैं बम्बई आर्यसमाज के कार्यकर्ताओं और उपस्थित ससज्जनों को सहृदय धन्यवाद देता हूँ। .... 'तमसो माँ ज्योतिर्मय'

हरिलाल गांधी (बंबई १४-११-३६) -- (सन्दर्भ- सार्वदेशिक मासिक दिसंबर १९३६)


दिसम्बर १९३६ के सार्वदेशिक अख़बार के सम्पादकीय में महात्मा नारायण स्वामी लिखते हैं-

अबुद्ल्लाह से हरिलाल

महात्मा गाँधी के ज्येष्ठ पुत्र हरिलाल गाँधी अब अब्दुल्लाह नहीं हैं. आर्य समाज मुंबई में वे शुद्ध करके प्राचीनतम आर्यधर्म में वापिस ले लिए गये हैं. हिन्दू धर्म का परित्याग करने में उन्होंने जो भूल की थी, उसे अनुभव करके और प्रकाश रूप में उसे स्वीकार करके उन्होंने अच्छा किया है. उनका उदाहरण भाषा वेश में परिवर्तन करने वालो के लिए एक अच्छा उदहारण है. हरिलाल जी को हिन्दू धर्म के प्रति जो उन्होंने अपराध किया हैं उसका प्रायश्चित करना बाकी रह जाता है. उन्हें चाहिए कि वे वैदिक धर्म के सुसंस्कृत रूप का अध्ययन करें, और अपने जीवन को उसके सांचे में ढाले. यही उस अपराध का उत्तम प्रयाश्चित है. जो मुस्लमान हरिलाल को इस्लाम के दायरे में बहुमूल्यवृद्धि समझे बैठे थे और जो उनमें सुधर की चेष्ठा के बजाय उन्हें इस्लाम के प्रोपेगंडा का साधन बनाए हुए थे, वे गलती पर थे और इस्लाम की अ-सेवा कर रहे थे, वह बात यह घटना स्पष्ट करती हैं और धर्म परिवर्तन करने वाली अन्य संस्थाओं को भी अच्छी शिक्षा प्रदान करती हैं. महात्मा गाँधी अपने पुत्र को वापिस पाकर अत्यंत प्रसन्न हुए थे और सार्वजनिक रूप से चाहे उन्होंने स्वामी दयानंद को शुद्धि की प्राचीन व्यवस्था को फिर से पुनर्जीवित करने का श्रेय भले ही न दिया हो, परन्तु उनकी मनोवृति से यह भली प्रकार से स्पष्ट हो जाता हैं कि आर्यसमाज के आलोचक होते हुए भी उन्हें सहारा तो स्वामी दयानंद के सिद्धांतों का ही लेना पड़ा था.

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सन्दर्भ ग्रन्थ

१.सत्य निर्णय- ज्ञानचंद आर्य (सत्यानन्द नैष्ठिक , गुरुकुल लाढोत द्वारा पुन प्रकाशित )
(ज्ञानचंद जी ने "धर्म और उसकी आवश्यकता" के नाम से एक अत्यंत रोचक पुस्तक लिखी हैं जिसका पुन:प्रकाशन अवश्य होना चाहिए)

२.आर्यसमाज और महात्मा गाँधी- पंडित धर्मदेव विद्या मार्तण्ड (श्री घुड़मल ट्रस्ट हिंडौन सिटी द्वारा पुन प्रकाशित )

३.सार्वदेशिक पत्रिका के अंक (गुरुकुल कांगड़ी पुस्तकालय से प्राप्ति)

4. Mahatma Vs Gandhi: Based on the Life of Harilal Gandhi, the Eldest Son of Mahatma Gandhi by Dinkar Joshi

5. Mahatma and Islam - Faith and Freedom: Gandhi in History by Mushirul Rehman

6. Autobiographical Writings of Mahatma Gandhi by Rashi Sharma

7. आर्यसमाज किशन पोल बाजार, जयपुर का इतिहास - १९९०

8. Gandhiji’s Lost Jewel: Harilal Gandhi by Nilam Parikh.

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