खाद्यान्न सुरक्षा योजना को ठेंगा दिखाता एक आदिवासी गाँव

Written by गुरुवार, 16 नवम्बर 2017 11:58

खाद्य सुरक्षा बिल और गरीबों के लिए चलने वाली सस्ते अनाज की तमाम योजनाओं (Food Security Scheme) के बारे में अक्सर विमर्श होता रहता है. अधिकाँश बार यही निकलकर आया है, कि ऐसी योजनाएँ भ्रष्टाचारी लोगों का अड्डा बनी हुई हैं.

क्या वास्तव में इतनी सस्ती दरों पर अनाज दिया जाना चाहिए? क्या यह सस्ता अनाज वास्तविक गरीबों तक पहुँच पाता है? सस्ते अनाज को लेने वाले गरीबों की वास्तविक संख्या क्या है? गरीबी रेखा से नीचे (Below Poverty Line) किसे कहा जाए? क्या इसका पता कभी चल पाएगा? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो खाद्यान्न सुरक्षा की योजनाओं (MNREGA) पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं. परन्तु यह लेख इस समस्या के बारे में नहीं है, बल्कि यह लेख सुदूर गाँवों में रहने वाले आदिवासियों के स्वाभिमान का एक सकारात्मक चित्र प्रस्तुत करता है. पढ़िए एक ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर के अनुभवों को कलमबद्ध करता हुआ लेख.

धूलिया जिले का एक छोटा सा गाँव है बारीपाड़ा. महाराष्ट्र-गुजरात की सीमा से लगा हुआ. इसी गाँव से थोड़ी दूरी पर पहाड़ों के पीछे गुजरात का आदिवासी जिला डांग शुरू होता है. पिछले माह, जब हम लोग खाद्यान्न सुरक्षा जैसे “सदैव भिखारी बनाए रखने वाली” योजना के विधेयक की कागजी तैयारी कर रहे थे, उस समय इस सुदूर गाँव में कुछ अलग ही माहौल चल रहा था. बारीपाड़ा गाँव में पिछले दस वर्षों से “वनोपज” वाली सब्जियों की पाककला की स्पर्धा आयोजित की जाती है. इस वर्ष इस प्रतिस्पर्धा में 180 आदिवासी महिलाओं ने इसमें भाग लिया. इस गाँव की जनसँख्या लगभग 700 है, और कच्चे-पक्के मकानों की संख्या लगभग 150. जंगल में उगने वाली सब्जियों की इस स्पर्धा में आसपास के गाँवों की स्त्रियाँ भी बड़े उत्साह से भाग लेती हैं. शहरी लोगों ने कभी अपने जीवन में जिन सब्जियों का नाम भी नहीं सुना होगा, ऐसी लगभग 27 सब्जियाँ इन ग्रामीणों ने आसपास से खोज निकाली, उगाईं और उन्हें पकाकर इस स्पर्धा में सजावट के साथ पेश किया.

गाँव में पहुँचने पर गरीब सी “दिखाई देने वाली” एक वृद्धा से मैंने खाद्यान्न सुरक्षा योजना के बारे में पूछा, तो वह मेरी तरफ देखती ही रह गयी. मैंने दोबारा पूछा, तो उसने मुझ से ही सीधा प्रश्न कर लिया, “साहब, उस योजना में क्या-क्या दे रहे हैं?”, मैंने रटारटाया सरकारी जवाब दिया कि, एक रुपया किलो ज्वार, दो रूपए किलो गेहूँ और तीन रूपए किलो चावल मिल रहा है उसमें”. वह वृद्धा हँसी और मुझसे बोली, देखो साहब, ज्वार तो हम खाते नहीं हैं, गेहूँ भी अच्छा नहीं लगता”. मुझे लगा कि शायद अब वह चावल के बारे में हाँ कहेगी. तत्काल मैंने पूछा, “चावल तो खाते होगे न आप?”, उसने हाँ कहते हुए अपनी मुंडी हिलाई. मैंने बात आगे बढ़ाई, “तो फिर यह सस्ता चावल आपको इस योजना में मिल सकेगा ना”. वह वृद्धा फिर से मेरा मुँह देखने लगी. फिर हँसकर बोली, “वैसा चावल हम नहीं खाते”. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि सरकार की इस योजना का इतना सस्ता चावल लेने से वह क्यों मना कर रही है. पास खड़े एक युवक ने मुझे बताया, “साहब, इनके यहाँ जो चावल पैदा होता है, वह बेहद खुशबूदार होता है, उस चावल का नाम “इंद्रायणी” है”... ये लोग केवल अपने उपयोग लायक ही उगाते हैं, बाहर बेचने नहीं जाते”. मैं हैरान रह गया.

फिर भी एक शासकीय अधिकारी होने के नाते मुझे अपना काम तो करना ही था. मुझे लगा कि शायद यह वृद्धा जितनी गरीब दिखाई दे रही है, उतनी है नहीं. तब मैंने उस युवक से पूछा कि चलो यह वृद्धा न सही, लेकिन गाँव में और भी कोई गरीब होंगे न, उन्हें शासन का यह सस्ता अन्न काफी लाभकारी होगा”. वह युवक मुझे अपने साथ पास ही स्थित ग्रामपंचायत के एक सभागृह में ले गया. एक अच्छे भवन में बना हुआ पंचायत भवन था, जिसमें दीवारों पर चारों तरफ विभिन्न फ्लेक्स बोर्ड लगे थे, जिसमें गाँव के बारे में जानकारी, गाँव की जनसँख्या, शाला की स्थिति, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की जानकारी इत्यादि लिखे हुए थे. परन्तु एक फ्लेक्स ने मेरी आँखें चौंधिया दीं. उस फ्लेक्स पर लिखा था “गाँव में गरीबी रेखा से नीचे की जनसँख्या = शून्य”. मैं सोच में पड़ गया कि जिस गाँव में पंचायत भवन, स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र छोड़कर इक्का-दुक्का ही पक्के मकान हों, दो मंजिला मकान एक भी न हो... फिर भी उस गाँव के लोग स्वाभिमान से बता रहे हैं कि हमारे गाँव में कोई भी “गरीब” नहीं है? कमाल है. यानी हम यहाँ मुम्बई और दिल्ली में बैठकर, भारत कितना गरीब है और भुखमरी किस तरह फ़ैल रही है, आदिवासियों को जीना कैसे सिखाएँ... जैसी योजनाओं के बारे में चर्चा करते रहते हैं और इधर महाराष्ट्र-गुजरात की सीमा पर स्थित यह छोटा सा गाँव बोल रहा है कि हमारे यहाँ गरीबी रेखा से नीचे एक भी परिवार नहीं है?

इस गाँव में चौथी कक्षा तक का स्कूल है. पंचायत ने सभी घरों के बच्चों को स्कूल जाना अनिवार्य कर रखा है. साथ ही शहर से आने वाले शिक्षक यदि अनुपस्थित रहते हैं तो 5000 रूपए का दण्ड थोपने का निर्णय भी ले रखा है. इसीलिए इस गाँव में आने वाले शिक्षक बेहद जरूरी काम होने पर ही छुट्टी लेते हैं, और समय पर आते हैं. इस गाँव में काफी सड़कें सीमेंट की हैं और नालियाँ व्यवस्थित बनी हुई हैं. आंगनवाड़ी और गग्रामपंचायत सदस्यों के मोबाईल नंबर एक बड़े बोर्ड पर लिखे हुए हैं. सरकार की सभी योजनाओं की जानकारी देने वाला बोर्ड भी लगा हुआ है.

महाराष्ट्र सरकार ने एक योजना चलाई है, जिसके अनुसार यह पता किया जाता है कि किसी गाँव में जैव-विविधता का स्तर क्या है, अर्थात कितने पेड़-पौधे, सजीव पशु-पक्षी इत्यादि कितने हैं इसकी गणना की जाती है. इस हेतु महाराष्ट्र राज्य जैव विविधता बोर्ड की स्थापना की गयी है. इस बोर्ड के सदस्य रमेश मुंगीकर इस बारीपाड़ा गाँव में लगातार आते रहते हैं. उन्हीं ने बताया कि मैं पिछले नौ वर्षों से इस गाँव में सर्वे के लिए आ रहा हूँ, बारीपाडा महाराष्ट्र का एकमात्र गाँव है जिसने लगातार अपने गाँव की जैव विविधता के बारे में सटीक जानकारी सूचीबद्ध करवाई है. इस गाँव के निवासियों ने आसपास लगभग 1100 एकड़ का जंगल संभालकर रखा है. जब सुबह मुझे एक ग्रामवासी के यहाँ चाय पीने के लिए बुलाया गया तो मुझे लगा कि शायद चूल्हे पर चाय बन रही होगी, लेकिन रसोईघर में तो गैस जल रही है. चूंकि इस गाँव वालों ने 1100 एकड़ का जंगल बचाकर रखा है, इसलिए महाराष्ट्र शासन की एक विशेष योजना के तहत यहाँ ग्रामवासियों को गैस सिलेंडर मिलते हैं. इस गाँव की अनोखी कहानी के नायक यानी श्री चैतराम पवार हैं, जो बहुत ही कम बोलते हैं.

हाँ!!!! तो मैं बात कर रहा था... वनोपज से निकलने वाली सब्जियों की स्पर्धा के बारे में. तो आसपास के गाँवों के लगभग एक हजार नागरिक वहाँ जमा थे. सभी के भोजन की व्यवस्था सुचारू रूप से की जा सके, इसलिए इस स्पर्धा में आने वाले एवं सभी उपस्थित लोगों से बेहद मामूली सा “30 रूपए का शुल्क” लेना निश्चित किया गया. चैतराम पवार जी के पीछे लाइन में लगकर हमने भी एक कूपन खरीदा. इस अनोखे कार्यक्रम एवं महिलाओं की इस स्पर्धा की शूटिंग करने के लिए मुम्बई से ABP माझा चैनल के कैमरामैन और संवाददाता मिलिंद भागवत और उनकी टीम ने भी अपने-अपने तीस रूपए के कूपन खरीदे. नागली की सब्जी, तुअर दाल, तेर नामक सब्जी एवं उस इलाके का प्रसिद्ध “इंद्रायणी” चावल इस प्रकार की दर्जनों स्वादिष्ट ग्राम्य डिश वहाँ की महिलाओं ने सारे गाँव के लिए पकाया था. कार्यक्रम समाप्त हुआ, पुरस्कार वितरण किए गए. सभी उपस्थितों का भोजन हुआ... थकान उतारने के लिए हम आम के पेड़ के नीचे बैठे थे और वापस जाने की योजना बना रहे थे. वहीं पास में सभी ग्रामीण अपने दिनभर के कार्यक्रम का हिसाब-किताब देख रहे थे. पता चला कि कुल 407 लोगों ने तीस रूपए वाले कूपन खरीदे थे, लेकिन पंगत में तो 500 से अधिक लोगों ने भोजन किया था. तत्काल मैंने पूछा, कि बिना कूपन लिए किसने खाना खाया? मेरे पूछने पर गाँव वाले शर्मा गए, कुछ बोले ही नहीं. मुझे लगा कि शायद गाँव के ही कुछ युवक और कार्यकर्ता होंगे जो मुफ्त में भोजन कर गए. सुबह जो युवक मेरे साथ था, मैंने उसे कोने में बुलाया और धीरे से पूछा, “क्या हुआ बेटा, कोई गाँव वाला कुछ बता क्यों नहीं रहा? ये फ़ोकट में खाने वाले लोग कौन हैं?” उसका उत्तर सुनकर मैं जमीन में गड़ गया, उसने बताया कि गाँव के कुछ लोगों को छोड़कर किसी भी व्यक्ति ने भोजन नहीं किया. लेकिन बाहर से जो वन विभाग, पुलिस, जिलाधिकारी कार्यालय के लोग आए थे, उन्हीं में से अधिकाँश लोगों ने तीस रूपए का कूपन लिए बिना मुफ्त में भोजन किया.

हम जिन्हें गरीब समझकर उन पर दया दिखाने चले थे, वह सामान्य गरीब आदिवासी इतना स्वाभिमानी निकलेगा, यह मैं कभी सोच भी नहीं सकता था. मुझे खाद्यान्न सुरक्षा जैसी योजनाएँ फालतू लगने लगीं. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि “फोकटिया” किस्म की मुफ्तखोरी वाली सरकारी योजनाओं की वास्तविक जरूरत इन स्वाभिमानी एवं अपने पैरों पर खड़े ग्रामीण आदिवासियों के लिए है, या फिर मंत्रालयों एवं एसी दफ्तरों में बैठने वाले अफसरों-बाबुओं के लिए, जो तीस रूपए का कूपन भी नहीं खरीद सके?? ABP माझा चैनल की टीम और शासकीय अधिकारी के रूप में मैं, हम दोनों ही उस दिन बेहद शर्मिंदा होकर उस गाँव से निकले...

Prasad Kumbhojkar 

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मनरेगा के भ्रष्टाचार से सम्बन्धित एक और लेख इस लिंक पर पढ़िए... :- http://www.desicnn.com/news/mnrega-corruption-fake-job-cards-payment-and-nexus 

महाराष्ट्र का सिंचाई घोटाला.. :- http://www.desicnn.com/news/farmer-agitation-in-maharashtra-and-irrigation-scam-of-ajit-pawar 

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