महाराष्ट्र का सिंचाई घोटाला : किसान आंदोलन कनेक्शन

Written by शुक्रवार, 09 जून 2017 20:49

जैसा कि सर्वविदित है, महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडनवीस के सत्ता में आने से पहले पंद्रह वर्षों तक कांग्रेस और शरद पवार की पार्टी गठबंधन करके सत्ता में थी. इसी दौरान महाराष्ट्र में एक भीषण घोटाला हुआ था, जो कि शरद पवार के भतीजे अजीत पवार के नेतृत्व में हुआ था, यानी सिंचाई घोटाला.

जिन लोगों को इसके बारे में पता नहीं है, वे संक्षेप में इन दस बिन्दुओं को पढ़ लें तो समझ जाएँगे कि यह महा-घोटाला कैसे हुआ... 

१) महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र में सामान्यतः कम वर्षा होती है, अक्सर सूखा पड़ता है और बहुत गरीबी है. पहले विदर्भ की 38 सिंचाई परियोजनाओं की कीमत 6672 करोड़ रूपए आँकी गई, लेकिन काम में जानबूझकर देरी की जाती रही और यह लागत बढ़ाते –बढ़ाते 26722 करोड़ तक पहुँचा दी गई... स्वाभाविक है कि इसमें ठेकेदार-अफ़सर और नेताओं का त्रिकोण शामिल था.

२) अर्थात मूल कीमत को लगभग 300% बढ़ा दिया गया. इस बढ़ी हुई कीमत/लागत की धनराशि में से 20,000 करोड़ का बढ़ा हुआ खर्च केवल तीन महीने में पारित कर दिया गया. जून-जुलाई-अगस्त 2009 में बिना किसी आपत्ति, बिना किसी जाँच के यह मंजूरी दी गई.

३) VIDC अर्थात विदर्भ सिंचाई विकास मण्डल ने इस बढे हुए खर्च के लिए जो कारण दिए, उनमें निर्माण सामग्री महंगी होंगे, मजदूरी महंगी होने, इंजीनियर महंगे होने, भूमि अधिग्रहण महंगे होने जैसे तमाम लचर तर्क दिए. लेकिन इस बढे हुए खर्च को जिस तेज़ गति से मंजूरी मिली और इसकी कोई जाँच नहीं हुई, यही सबसे ज्यादा हैरान करने वाला था.

४) सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि वर्धा सिंचाई परियोजना की अतिरिक्त राशि की मंजूरी 15 अगस्त को दी गई है... यानी तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार के कर्मचारी इतने “कर्मठ”(??) थे कि स्वतंत्रता दिवस के दिन भी काम करते थे.

५) वर्धा परियोजना की कीमत 950 करोड़ से बढ़कर 2356 करोड़, अपर-अमरावती परियोजना की कीमत 661 करोड़ से बढ़कर 1376 करोड़ हो गई. इसी प्रकार यवतमाल जिले की बेम्बला नदी परियोजना की कीमत 1278 करोड़ रूपए से बढ़कर 2176 करोड़ रूपए हो गई.... लेकिन कहीं भी काम पूरा नहीं हुआ. इन परियोजनाओं को 14 अगस्त के दिन मंजूरी दी गई थी... अगले दिन बाकी परियोजनाओं को.

६) 24 जून 2009... इस ऐतिहासिक तारीख को महाराष्ट्र के सरकारी कर्मचारियों की कर्मठता के रूप में जाना जाएगा... विदर्भ सिंचाई मण्डल ने एक ही दिन में दस सिंचाई परियोजनाओं की जाँच भी पूरी कर ली और इसके बढे हुए खर्च को मंजूरी भी दे डाली. जरा रुकिए... कर्मठता अभी और बाकी है... इन दस परियोजनाओं को मंजूरी मिलने के बाद VIDC ने तत्काल सभी 38 परियोजनाओं के लिए निविदा भी जारी कर दी. VIDC के कार्यकारी संचालक देवेन्द्र शिर्के साहब ने उपरोक्त सभी मंजूरियाँ स्वीकृत की. गजब के अधिकारी...(??)

७) जब सरकारी कर्मचारी इतने तत्पर थे, तो भला उपमुख्यमंत्री अजीत पवार कैसे पीछे रहते, उन्होंने भी एक सप्ताह के भीतर सभी परियोजनाओं को मंजूरी दे दी.. (ये बात और है कि ये परियोजनाएँ आज तक पूरी नहीं हुईं).

८) जब CAG ने इस मामले की जाँच शुरू की, तो पाया कि कई ठेकेदार और माल सप्लाई करने वाली फर्में फर्जी हैं. कई नाम-पते गलत और नकली पाए गए.

९) जून-जुलाई-अगस्त 2009, इन तीन महीनों में अजीत पवार ने कुल बत्तीस सिंचाई परियोजनाओं को मंजूरी दी. इस कार्य के लिए गठित तीन-तीन उच्चाधिकार प्राप्त समितियों की सहमति लेना तो दूर उन्हें सीधे दरकिनार कर दिया गया.

१०) राज्य के तत्कालीन मुख्य अभियंता (चीफ इंजीनियर) पांढरे ने रहस्योद्घाटन किया कि, सिंचाई परियोजनाओं में कम से कम 35,000 करोड़ रूपए का सीधा नुकसान हुआ है, जबकि काँग्रेस-NCP शासनकाल के आख़िरी दस वर्षों में कुल खर्च 70,000 करोड़ रूपए किया गया... जबकि इसका लाभ केवल दो प्रतिशत सिंचाई क्षेत्र को ही हुआ.

भारत की न्याय-प्रक्रिया इतनी धीमी और ढीली है कि इस महा-घोटाले के सम्बन्ध में अभी तक अजीत पवार से सिर्फ दो बार पूछताछ हो पाई है… वसूली की बात तो भूल ही जाएँ. अब आप ये सोच रहे होंगे कि किसान आंदोलन से इस घोटाले का क्या सम्बन्ध है. सबसे पहला सम्बन्ध तो “बेशर्मी” का ही है, क्योंकि पन्द्रह साल शासन के दौरान किसानों के हिस्से का और सिंचाई के लिए जारी किया जाने वाला पैसा खाकर भी NCP और काँग्रेस के लोग बड़ी बेशर्मी से महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के किसान आंदोलन को समर्थन देने पहुँच गए. सनद रहे कि अजीत पवार ने एक बार किसानों को झिडकते हुए सार्वजनिक रूप से कहा था कि, “अगर बाँधों में पानी नहीं आ रहा तो क्या मैं पेशाब करके भर दूँ?”. देवेन्द्र फडनवीस द्वारा शुरू किए गए “जल-शिवार” योजना की सफलता से घबराए और चिढ़े हुए पवार चाचा-भतीजे ने महाराष्ट्र के किसान आंदोलन को जमकर हवा दी और घटिया राजनीति खेली, लेकिन इसमें आश्चर्य कैसा? काँग्रेसी आचरण ऐसा ही होता है... यानी उल्टा चोर, कोतवाल को डांटे...

महाराष्ट्र और मप्र में अचानक उठे किसान आन्दोलनों से जुडी एक बात और भी है, जो कम ही लोगों की जानकारी में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जब नोटबंदी लागू की थी, उस समय महाराष्ट्र के इन बड़ेबड़े नेताओं के पास अकूत मात्रा में काला धन और नकदी मौजूद थी. उस कालेधन को ठिकाने लगाने के लिए इन नेताओं ने कई तरह के प्रयास किए, लेकिन मोदी ने चारों तरफ निगाह बनाए रखी थी. पाठकों को याद होगा कि शुरुआत में सहकारी बैंकों को नोटबंदी में काफी ढील दी गई थी, क्योंकि उससे किसान सीधे तौर पर जुड़े हुए थे. काफी बाद में इन बैंकों पर लगाम कसी गई. महाराष्ट्र के सभी बड़े काँग्रेसी नेताओं का सहकारी क्षेत्र में वर्चस्व सभी जानते हैं. पवार चचा-भतीजे सहित अधिकाँश बड़े नेताओं ने अपना काला धन ठिकाने लगाने के लिए सहकारी बैंकों का सहारा लेना शुरू किया. गरीब और भोले किसानों को रातोंरात कर्ज बाँटे गए, ताकि पुराने नोट खपाए जा सकें. सातारा जिले में तो कुछ किसान(??) ऐसे भी हैं, जिन पर 50 से 70 लाख रूपए का कर्ज बाकी है... (सोच सकते हैं कि ये किसान कौन लोग होंगे और इन्हें इतना बड़ा कर्ज कैसे मिला होगा). नोटबंदी की इस भगदड़ में इन सहकारी बैंकों ने लाखों किसानों को असली-नकली कर्ज बाँट दिए, ताकि बाद में कर्ज माफी करवा कर धीरे-धीरे या तो इनसे नकद वापस लिया जाए या उनकी जमीन हथिया ली जाए. लेकिन जब फडनवीस सरकार ने किसानों की कर्ज माफी करने से इनकार कर दिया और किसानों के फायदे के लिए “जलयुक्त शिवार” तथा मनरेगा लागू कर दी, तो जमीन पानी से लबालब होने लगी... इनकी योजना खटाई में पड़ गई... और नेताओं का कालाधन बड़ी मात्रा में फँस गया.

इसीलिए किसान आंदोलन का कुचक्र रचा गया, और अंततः फडनवीस सरकार दबाव में आ ही गई और उसने लाखों किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा कर दी. अब चूँकि कर्ज वापस करना ही नहीं है, तो जिन नेताओं ने इन किसानों को रूपए देकर अँगूठा लगवाया था या जमीन के कागज़ात रख लिए थे... धीरे-धीरे उनसे नकद वापस ले लेंगे और पूरा न सही परन्तु 80% कालाधन वापस उनकी जेब में पहुँच जाएगा. कर्ज माफी का एक गणित यह भी है. मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन की वजहें और राजनीति कुछ दूसरी हैं, उन पर भी जल्दी ही एक लेख आएगा.

Read 4154 times Last modified on शनिवार, 10 जून 2017 07:30