मीडिया “पीड़ित” महिलाओं की सुनता है, पुरुषों की नहीं

Written by बुधवार, 09 अगस्त 2017 18:54

हाल ही में एक मामला मीडिया में काफी चर्चा में रहा है, वह है चंडीगढ़ के दो हाई-प्रोफाईल परिवारों के बीच का मामला. मीडिया रिपोर्ट्स, पुलिस के बयानों और चंद स्वनामधन्य विश्लेषकों के मुताबिक़ इसमें भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के बेटे ने एक आईएएस अधिकारी की बेटी का पीछा किया, धमकाया, छेड़छाड़ की.

मीडिया ने हमेशा की तरह बिना सोचे-समझे, बिना कोई जाँच किए, बिना किसी न्यायालय ट्रायल के, खुद को सर्वेसर्वा बनाते हुए लड़की को निर्दोष और लड़के को अपराधी सिद्ध कर दिया. लेख शुरू करने से पहले इस मामले का उदाहरण देना इसलिए जरूरी लगा, क्योंकि यह लेख चंडीगढ़ केस में उस लड़के के बचाव हेतु नहीं लिखा जा रहा है, बल्कि यह लेख मीडिया की सनसनीखेज ख़बरों की भूख तथा स्वयंभू “जजों” द्वारा पुरुष को दोषी मान लेने की मानसिकता पर है. चंडीगढ़ के इस “हाई-सोसायटी”, “हाई-प्रोफाईल” मामले का कोई राजनैतिक एंगल भी हो सकता है, उस डीटेल्स में हम जाना नहीं चाहते. 

पहले हम आपको एक सत्य घटना की तरफ ले चलते हैं. कुछ माह पहले ये मामला भी मीडिया में “बहुचर्चित” और इस मामले में भी कथित पीड़िता के पक्ष में खासा माहौल बनाकर उत्तरप्रदेश पुलिस की बदनामी की गई थी. “दुखियारी महिला” उत्तरप्रदेश के रामपुर की थी, जो थाने में अपने ऊपर हुए गैंग-रेप की रिपोर्ट लिखाने आई थी. पुलिस ने उसका “बैकग्राउंड” देखते हुए, उस “सताई हुई” स्त्री से सीधे न्यायालय जाकर केस फाईल करने को कहा. उस महिला ने कोर्ट में एक निजी शिकायत दर्ज कर दी, लेकिन साथ ही एक पुलिसवाले के साथ हुई अपनी बातचीत की CD बनाकर पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को भेज दी, जिसमें उस पुलिस वाले को इस औरत से “सेक्स की माँग” करते हुए सुनाया गया था. सनद रहे कि उन दिनों उत्तरप्रदेश पुलिस “एंटी-रोमियो स्क्वाड” बनाकर छेड़छाड़ और पीछा करने वाले सड़क छाप मजनुओं के खिलाफ सख्त अभियान चलाए हुए थी. इस सीडी के सामने आते ही मीडिया को मानो मनचाही मुराद मिल गई. “बलात्कार पीड़िता के साथ असंवेदनशील बर्ताव...”, “रेप पीड़िता से जाँच के नाम पर पुलीस द्वारा शोषण” जैसी आकर्षक(?) हेडलाईन्स चलाई जाने लगीं. मीडिया ने उत्तरप्रदेश पुलिस को पूरी तरह घेर लिया था. “डेली मेल ऑनलाईन” ने तो रेप पीड़िता के इस मामले में ट्वीट्स की एक श्रृंखला ही शुरू कर दी थी, जिससे जनता के गुस्से को और भडकाया जा सके तथा अखबार और चैनल की TRP बढ़े. अगले लगभग चार-पाँच दिनों तक मीडिया इस मामले में किसी और धमाकेदार और मसालेदार खबर की प्रतीक्षा में थी, उसी समय अचानक पूरा मामला फुस्स हो गया. चूँकि मामला पुलिस की साख से जुड़ा था, इसलिए पुलिस नी फुर्ती से जाँच की और जाँच में यह निकला कि वह औरत इस प्रकार की फर्जी रिपोर्ट करने में माहिर है, तथा उसने जिस पुलिस वाले को उस सीडी के अंदर अपनी बातों में फँसाया था, वह इंस्पेक्टर उस महिला द्वारा इससे पहले की गई एक “फर्जी गैंगरेप मामले” की खात्मा रिपोर्ट (Closure Report) कोर्ट में पेश करने वाला था. उस पुराने मामले में फँसने से बचने के लिए इस महिला ने उस इंस्पेक्टर पर दबाव बनाने के लिए यह सारा खेल रचा था.

 

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बस... जैसे ही यह बात सार्वजनिक हुई, मीडिया की दिलचस्पी अचानक इस मामले में खत्म हो गई. उत्तरप्रदेश पुलिस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से उस महिला के खिलाफ सारे सबूत सार्वजनिक किए गए, कई अखबारों और चैनलों से भी आग्रह किया गया कि वे उस “वास्तविक पीड़ित पुलिस इंस्पेक्टर” का पक्ष भी अपने चैनलों पर दिखाएँ, परन्तु “दल्लात्मक” मीडिया ने कतई रूचि नहीं दिखाई. उस महिला के गलत आचरण, झूठ और ब्लैकमेल की नीयत पर कहीं कोई चर्चा अथवा वाद नहीं हुआ. उत्तरप्रदेश पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी राहुल श्रीवास्तव कहते हैं कि जैसे ही उस महिला की असलियत सामने आई, मीडिया तो मानो गायब ही हो गया, और पिछले कुछ वर्षों में दहेज प्रताड़ना, छेड़छाड़, पीछा करने, रेप करने, यौन हिंसा करने जैसे केस में यह “विशेष पैटर्न” मेरे देखने में आया है कि बहुत से मामले झूठे निकलते हैं. अक्सर ऐसे मामलों में आपसी झगड़े, संपत्ति के विवाद, राजनैतिक छवि गिराने, बिजनेस प्रतिद्वंद्वी द्वारा सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल करने जैसे कई उद्देश्य शामिल रहते हैं. इसीलिए आजकल ऐसे मामलों की जाँच में हमें अत्यधिक सावधानी बरतनी पड़ रही है. ऐसे में यदि कोई केस हाई-प्रोफाईल और हाई-सोसायटी से जुड़ा हुआ हो तो बहुत फूँक-फूँककर कदम उठाने पड़ते हैं.

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सवाल उठता है कि कथित रेप या छेड़छाड़ के मामलों में अक्सर मीडिया महिलाओं का पक्ष ही क्यों सुनता है? जवाब है, “सनसनी”... किसी पीड़ित “पुरुष” का पक्ष दिखाने में दर्शकों (पाठकों) की सहानुभूति उतनी नहीं मिलती जितनी एक महिला को “पीड़ित” दिखाने से मिलती है. जब ऐसे मामलों के तथ्य और समाचार जुटाए जाने लगे तो कई चौंकाने वाले सबूत सामने आए, जिसमें पाया गया कि वास्तविक पीड़ित तो पुरुष भी है, लेकिन उसका कवरेज कोई भी नहीं करता. एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं जिनका नाम है बरखा त्रेहन, जो कि सताए हुए पीड़ित पुरुषों की मदद के लिए काम करती हैं, उनका तर्क भी अपने-आप में दमदार है. वे कहती हैं कि चूंकि रामपुर वाले मामले में खुद पुलिस की छवि खराब हो रही थी, और उस पर दाग लगने की पूरी सम्भावना थी, इसलिए पुलिस ने बड़ी फुर्ती दिखाई और उस महिला को झूठा सिद्ध कर दिया, लेकिन भारत में ऐसे अनेक मामले चल रहे हैं जहाँ रेप, छेड़छाड़ अथवा अश्लील इशारे करने जैसे कई आरोपों के तहत कई पुरुष या तो जेल की सजा काट रहे हैं या फिर समाज में बदनाम किए जा चुके हैं, जबकि वास्तव में वे निर्दोष हैं और उन्हें फंसाने वाली महिला शातिर है. देश का क़ानून ही ऐसा है कि तत्काल पुरुष को दोषी मान लिया जाता है, और रही-सही कसर निर्भया काण्ड के बाद बने और भी सख्त क़ानून ने पूरी कर दी है. इस क़ानून की आड़ लेकर देश में कई लोगों ने आपसी झगड़ों और भूमि विवादों को निपटाया है. रोहतक की दो “कथित वीरांगना बहनों” का चलती बस में पिटाई का मामला तो प्रसिद्ध है ही, जिसमें उस बेचारे निर्दोष युवक की लगती हुई नौकरी चली गयी, लेकिन उन बदमाश लड़कियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. रोहतक वाले मामले में टाईम्स के अर्नब गोस्वामी नमक “मीडियाई जज” ने खलनायक की भूमिका निभाई थी और सेना को मजबूर कर दिया था कि वह उस युवक को परीक्षा में बैठने से रोक दे. ऐसे “कथित मीडियाई जज” हमारे चारों तरफ भरे पड़े हैं, कहीं अखबारों में तो कहीं चौराहों पर पान की जुगाली करते हुए. परन्तु जब कोई पुरुष निर्दोष सिद्ध हो जाता है, तब भी उसकी बदनामी चलती ही रहती है, फिर उसका पक्ष कोई नहीं छापता, नहीं दिखाता.

नेशनल क्राईम रिकॉर्ड ब्यूरो (अर्थात NCRB) जो कि देश में घटित अपराधों और कोर्ट केसेस का पूरा रिकॉर्ड रखता है, उसके रिकॉर्ड के अनुसार 2015 में भारत में कुल 32,443 बलात्कार के मामले दर्ज हुए, इसमें गैंगरेप और पुलिस अभिरक्षा में हुए रेप के मामले शामिल नहीं हैं. इनमें से बलात्कार के 2303 केस तथा गैंगरेप के 318 केस पुलिस की जाँच में नकली पाए गए. इसके अलावा 524 ऐसे मामले भी कोर्ट के संज्ञान में सामने आए हैं, जिनमें गलती की संभावना पाई गयी. 2015 के इन 32443 बलात्कार मामलों में 7655 मामले ऐसे निकले जिसमें बलात्कार करने वाला पुरुष महिला को अच्छे से जानता था और उसे विवाह करने का झाँसा देकर महीनों तक सेक्स करता रहा. 705 मामले ऐसे हैं, जिनमें महिला के साथ बलात्कार करने वाला उसका “लिव-इन पार्टनर” था. यानी कह सकते हैं कि लगभग 25% बलात्कार के मामलों में पुरुष-महिला के सेक्स सम्बन्ध आपसी मर्जी से बनाए गए थे, फिर दोनों में कोई विवाद हुआ और महिला ने “रेप”(??) का आरोप मढ़ दिया. विशेषज्ञ सवाल उठाने लगे हैं कि क्या इसे रेप माना जा सकता है?

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एक रिटायर्ड जज ने अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि नए कानूनों के के कारण किसी भी महिला को महीनों या वर्षों पूर्व हुए किसी कथित बलात्कार की पुलिस में FIR दर्ज करने का अधिकार है, लेकिन ऐसे मामलों में 95% फर्जी ही निकलते हैं. जब एक बार FIR दर्ज हो जाती है और केस कोर्ट में चला जाता है, उसके बाद ही ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू होता है. न्यायाधीश के अनुसार उनके सामने कई ऐसे मामले आए हैं जिनमें उन्होंने पाया कि रेप और छेड़छाड़ को लेकर बाकायदा कुछ गिरोह बन गए हैं, जो नामी-गिरामी और पैसे वालों को अपनी ट्रिक से फाँसते हैं, फिर उन्हें डरा-धमकाकर मोटी रकम वसूल करते हैं. मैंने ऐसे भी मामले देखे जिसमें महिलाएँ अपना नाम पता बदलकर रेप का आरोप लगा रही थीं, और जिस पर उन्होंने बलात्कार का आरोप लगाया हुआ था उसका नाम-पता-मोबाईल भी वे जानती थीं, लेकिन जब आरोपी को उनके सामने लाया गया तो वे उसे पहचान नहीं सकीं. महिलाओं के ऐसे गिरोहों पर निगाह रखने के लिए अब हम न्यायाधीशों ने रेप पीड़ित महिलाओं के आधार कार्ड जमा करवाने शुरू कर दिए हैं. ऐसे झूठे बलात्कार के मामले में कई वकील भी शामिल होते हैं जो अपने क्लाईंट को भूमि विवाद अथवा किसी पारिवारिक संपत्ति के मामले को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए इस “रेप-विरोधी” क़ानून की आड़ लेकर महिलाओं को भड़काते हैं और नकली केस बनाते हैं. इन सबके बीच बेचारा निर्दोष पुरुष फँस जाता है, जिसका साथ कोई भी नहीं देता.

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समस्या की जड़ मीडिया की सनसनी बटोरने की प्रवृत्ति तो है ही, इसके अलावा महिला के आरोपों को सही मानकर बिना किसी रिसर्च या खोजबीन के केवल FIR के आधार पर सामने वाले पुरुष की तस्वीर अखबारों में छापना जैसी “आपराधिक मूर्खता” भी इसमें शामिल है. महिला को केवल आरोप लगाकर मीडिया को बुलाना है, बस बाकी का सारा काम मूर्ख मीडिया कर देता है. फरवरी 2016 में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश निवेदिता अनिल शर्मा ने एक विश्लेषण में पाया कि, “...अब वह समय आ गया है कि हमें झूठे पाए गए बलात्कार के मामलों में पुरुषों को बचाने के लिए कोई सख्त क़ानून बनाना होगा...”. किसी महिला के सम्मान एवं सामाजिक प्रतिष्ठा की जितनी चिंता हम करते हैं, उतनी ही पुरुषों की भी करनी चाहिए, क्योंकि मात्र एक आरोप भर से उस पुरुष का अच्छा-खासा सामाजिक-आर्थिक नुक्सान हो चुका होता है. इण्डिया टुडे की एक महिला पत्रकार जो ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग करती हैं, उनका कहना है कि मीडिया वाले केवल FIR को ही “अंतिम निर्णय” मान लेते हैं, और यदि जाँच में उस महिला के विरोध में कोई सबूत मिलता भी है तो उसे दबा दिया जाता है और सारी तोपें-बंदूकें उस पुरुष की तरफ तान दी जाती हैं, जो शायद आगे चलकर कोर्ट में निर्दोष छूटेगा.

वरिष्ठ वकील आनंद अग्रवाल ने रामपुर मामले के “कथित आरोपी” सब-इंस्पेक्टर जयप्रकाश से भेंट की और उससे उस झूठी महिला वाले केस की जानकारी हासिल की. सब-इन्स्पेक्टर जयप्रकाश के अनुसार, “...मैं पिछले 19 वर्ष से पुलिस सेवा में हूँ और मुझ पर एक भी आरोप या दाग नहीं था, उस महिला के पिछले नकली गैंगरेप मामले की जाँच रिपोर्ट मैं कोर्ट में पेश करने वाला था, तभी यह “मीडिया-ट्रायल” मुझ पर थोप दिया गया. इसने मुझे अन्दर तक तोड़ दिया था. मैं अपनी पत्नी और बच्चों से निगाह नहीं मिलता था, रिश्तेदार लगातार फोन करके पूछते रहते थे, मुझे रातों को नींद नहीं आती थी. मैं बेचैन इसलिए था, कि कहीं मीडिया के दबाव में आकर पुलिस के आला अधिकारी मेरे खिलाफ कोई एक्शन न ले लें. मैं अपने परिवार का इकलौता कमाऊ व्यक्ति हूँ यदि उस महिला के झूठे आरोपों के कारण मेरी नौकरी चली जाती तो मुझे ज़हर ही खाना पड़ता...”.

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फिर आखिर इस समस्या का समाधान क्या हो? लखनऊ के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार सबसे पहला काम तो ऐसे मामलों में मीडिया की समझदारी और जिम्मेदारी बढ़ाना है. रेप के आरोपों को सनसनीखेज बनाने तथा अपनी तरफ से अति-उत्साह में आकर “स्वयंभू न्यायाधीश” नहीं बनें. दूसरा काम यह किया जा सकता है कि पुलिस मीडिया के दबाव में न आए... तीसरा काम यह हो सकता है कि ऐसे कानूनों को “परिशोधित” किया जाए अथवा गलत आरोप पाए जाने पर लगाने वाली महिलाओं को आजीवन कारावास जैसी सख्त सजा का भी प्रावधान किया जाए. दहेज़ पीड़ित महिलाओं के लिए बने हुए 498A नामक खतरनाक क़ानून का दुरुपयोग अब हम पिछले कई वर्षों में काफी देख चुके हैं और सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद उसमें कई संशोधन करके उसे थोड़ा बैलेंस बनाने की कोशिश की गयी है. कुछ ऐसा ही “रेप विरोधी” तथा “निर्भया क़ानून” में भी करना पड़ेगा, अन्यथा देश में हजारों पुरुष या तो अकारण ही जेल में सड़ेंगे, अथवा आजीवन अपने माथे पर अपमान और तिरस्कार का बिल्ला लगाकर घुमते रहेंगे... जो अत्यधिक भावुक होंगे, वे आत्महत्या भी कर सकते हैं... इसलिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी मीडिया और सोशल मीडिया की है. बिना किसी जाँच के, बिना किसी कोर्ट केस के सीधे किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित करने की नीच प्रवृत्ति थमनी चाहिए

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