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मोदी सरकार के तीन वर्ष : अब भेड़-बकरी बनने से बचें

Written by बुधवार, 10 मई 2017 08:01

फिल्मी Cliché कभी कभी बहुत काम की बातें कर डालते हैं. कम से कम भूमिका बांधने के काम आते हैं. ऐसा ही एक Cliché है स्पाइडर मैन का संवाद - "With Great Power, comes great responsibility". अब यह अपने किस काम का?

हम तो कोई ग्रेट पावर वाले हैं नहीं, कि ग्रेट वाली रेस्पॉन्सिबिटी समझें. जिन्हें 125 कऱोड की जनता ने सुना है और चुना है, जिनके पीछे 125 कऱोड का पावर खड़ा है वे ही समझते हैं अपनी रिस्पांसिबिलिटी...कि भइया 125 कऱोड में एक दो छूट ना जायें...गिन गिन के सबकी रेस्पॉन्सिबिल्टी निभानी है उनको... पर इस बड़े सिद्धांत से प्रमेय निकालें तो यह गणित तो समझ में आता ही है कि अगर बड़े पावर से बड़ी जिम्मेदारी आती, है तो छोटे-मोटे पावर के साथ, यानी कुछ टुच्ची सी जिम्मेदारी तो आती होगी...

हम बड़े वाले राजनेता नहीं हैं, हमारे पास कोई रूपर्ट मर्डोक या बीबीसी जैसा मीडिया एम्पायर नहीं है, कि हमारी सोच समझ और ओपिनियन की कोई दो पैसे की कीमत होगी. फिर भी सोशल मीडिया ने कुछ तो ताक़त दिखाई है... तो कुछ जिम्मेदारी भी बनती है.
मेरी छोटी समझ के अनुसार हमारी पहली जिम्मेदारी है अपनी भावनाओं को काबू में रखने की. कोई खबर उड़ती उड़ती आये तो ताबड़तोड़ शेयर ना करने लगें. पहली जरूरत है उसकी सत्यता और प्रमाणिकता की जांच करें. दूसरी जरूरत है कि शेयर करते समय सोचें कि उसका परिणाम क्या होगा, वह किसका एजेंडा पूरा कर रहा है... सही गलत और नैतिक-अनैतिक के आधार पर या भावनात्मक आवेग में निर्णय लेने और परिणाम के उत्तरदायित्व से बचने की गांधीवादी कायरता से बचें.

इसी क्रम में अपने निर्णय और उसके परिणाम की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए, मैं आपसे यह कहना चाहूंगा कि आने वाले समय में मैं नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की तीखी आलोचना करता रहूंगा...जब तक वांछित परिणाम नहीं मिलते या कम से कम सरकार वांछित दिशा में सकारात्मक सोच और सक्रियता के स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाती. इसका कारण भी शुद्ध रूप से परिणाम-प्रेरित है. इसमें मेरा कोई भावनात्मक आवेग नहीं है, ना ही जो मुझसे असहमत हैं, उनके प्रति या मेरे निर्णय के संदर्भ में उनकी आलोचना के प्रति मेरा कोई व्यक्तिगत आग्रह या दुराग्रह रहेगा. मेरा गणित सरल है. मेरा आकलन है कि आज तक यह सरकार दबाव में काम करती आई है. कभी यह दबाव अंतरराष्ट्रीय आलोचना का रहा है, कभी देश के अंदर के "तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग" की आलोचना का, कभी मीडिया के प्रचार का तो कभी जनमत का. आज तक इस सरकार ने मीडिया और वाममार्गी बुद्धिजीवी माफिया को अपना घोषित शत्रु नहीं समझा है. सरकार के इस वर्ग के प्रति नरम रुख के पीछे सिर्फ मजबूरियाँ ही नहीं हैं, एक व्यवहारजन्य कमजोरी है...उन्हीं से थोड़ी सी प्रशंसा पाने का, उनकी नज़रों में अच्छा दिखने का थोड़ा सा लालच भी है. लेकिन विरोधियों की निगाह में "अच्छा बच्चा" बनने के प्रयास करते हुए तीन वर्ष बीत चुके, हाथ कुछ नहीं आया. राहुल द्रविड़ की तरह बल्लेबाजी का समय बीत चूका है... अब सिर्फ दो वर्ष बचे हैं जिसे 20-20 मैच की तरह खेलना जरूरी है. 

ऐसे में सरकार को सही रास्ते पर केंद्रित रखने की सोशल मीडिया की भूमिका ही नहीं बनती, जिम्मेदारी भी बनती है. अगर उनका दबाव बनता है तो हमारा दबाव भी बन सकता है. अगर विपक्षी दल सरकार को हिंदुत्व के मुद्दे पर झुका सकते हैं तो हम भी सरकार को वाजपेयी जी की राह पर जाने से रोक सकते हैं... अपने पिछले अनुभव का लाभ ले सकते हैं. पर शायद हिंदूवादी सोशल मीडिया को यह आत्मविश्वास ही नहीं है कि हम अपने नेतृत्व को सचमुच दिशा दे सकते हैं. हम सिर्फ पीछे पीछे चलने वाली भेड़ें ही बनेंगे? तो हम वह ताक़त नहीं रह जाएंगे जो हम पिछले पाँच वर्षों में बने हैं. हमारी भी क्रेडिबिलिटी वही हो जाएगी जो आज रबीश और बरखा की है. अगर यह आत्मविश्वास नहीं है तो याद कीजिये, 2012-13 में जब हमने मोदीजी को सामने लाने के लिए शोर मचाना शुरू किया था, तो सचमुच में राष्ट्रीय राजनीति की कितनी हस्तियाँ थीं जिन्हें यह संभव लगता था? कौन हमारे साथ खड़ा था? तब हमने यह समझने का काम क्यों नहीं मोहन भागवत जी या आडवाणी जी और जोशीजी के ऊपर छोड़ दिया था कि नेतृत्व किसे मिलना चाहिए? उनके पास भी तो पचास पचास साल का राजनीतिक अनुभव था...तो तब हम उनसे ज्यादा समझदार हो गए थे, और आज फिर से बेवकूफ हो गए?

हाँ, एक बेहद वैलिड कारण है इस आलोचना से बचने का... कि इसका फायदा हमारे विरोधी उठाएंगे... मोदीजी के आभामंडल पर इससे दाग पड़ेगा, जिसका हमें नुकसान होगा... यहाँ पर एक बात मेरे लिए स्पष्ट है, कि किसी का भी आभामंडल अखंड, अक्षुण्ण नहीं रहता. अपने समय में गांधी का आभामंडल मोदी से ज्यादा ही प्रभावी रहा होगा...आज उसकी कीमत दो कौड़ी की नहीं है. इतिहास हर किसी को परखता है सिर्फ और सिर्फ परिणाम के आधार पर. अगर हम सरकार पर दबाव दिला कर कुछ कड़े निर्णय दिलवा पाएंगे, तो वह इस आभामंडल से ज्यादा काम आएगा...बल्कि उन्ही के आभामंडल में चार चांद लगाएगा...कोई नहीं कहेगा कि राजीव मिश्रा ने मोदी की आलोचना की तो मोदीजी के काम का श्रेय राजीव मिश्रा को मिलेगा...अपने हिस्से दो चार गालियाँ ही आनी हैं...और जब परिणाम मिलने लगेंगे तो दे दीजिएगा श्रेय मोदीजी को...बहुत समय है श्रेय देने को, वाहवाही करने को... पब्लिक को 2019 में यह याद नहीं रहने वाला कि 2017 में किसने मोदी के बारे में क्या कहा था...2019 में 2018-19 का किया हुआ ही याद रहने वाला है...बल्कि यही सही समय है सरकार की आलोचना करने का...अगले दो साल कोई बड़े चुनाव नहीं हैं जिनकी सोचकर आप चुप रहें...जो होना था, हो लिया...अब अगली परीक्षा अगले लोकसभा चुनाव ही हैं. उसकी तैयारी करनी है तो सरकार पर अभी से कठिन निर्णय लेने का दबाव बनाए रखना पड़ेगा...

कहीं आपके मन में भी यही शंका तो नहीं है, कि सरकार सचमुच में ही कुछ करने धरने नहीं जा रही... बस सरकार का आभामंडल बना रहे...क्या पता कोरी लफ़्फ़ाज़ी के भरोसे ही 2019 भी निकल जाए... लेकिन डरिये मत... आलोचना की आँच तेज कीजिये... जिससे या तो चावल पूरे पक जाएं, या फिर यही पता चल जाये कि यह हांड़ी ही काठ की है... भेड़-बकरी बनने से बचें...

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