JNU में दुर्गा पूजा के आरम्भ का रोमांचक इतिहास...

Written by बुधवार, 03 अक्टूबर 2018 10:58

अभी कुछ दिन पहले मेरा रांची जाना हुआ था. रांची में 4 दिन तक रुका. देश भर से आये हुए विभिन्न मूर्धन्य विद्वानों/चिन्तकों से मिलना हुआ. कुछ सही में विद्वान थे/है (उनको सुनने से अच्छा लगा लगा कि हाँ, इनको देश-काल-स्थिति का भान है और वे चिंतित भी हैं व देश में आये हुए बड़े संकट से भारत देश के निवासियों को आगाह कर रहे हैं… विशेष रूप से धिम्मियों को आगाह कर रहे हैं). कुछ स्वघोषित स्वयंभू विद्वान भी थे…. तो कुछ “भगवा-मुल्ले” भी थे...

लेकिन इन तीन दिनों में एक बात मुझे बार बार कुछ लोगो से सुनने को मिल रही थी कि “JNU में दुर्गा पूजा” की शुरुआत एस एन मालाकार ने की थी (शायद एस एन मालाकार जी वही हैं, जो अपने जवानी के शबाब वाले दिनों में AISF के बड़े एक्टिविस्ट थे, और उन्होंने JNUSU का चुनाव भी लड़ा. वर्तमान में वे JNU/SIS/CAS में प्रोफ़ेसर हैं और साथ ही साथ कन्हैया कुमार के पीएचडी गाइड भी हैं). यह चर्चाएं सुनकर JNU में दुर्गा-पूजा की बात को लेकंर मेरे मन में जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी, कि इसके इतिहास को जानना आवश्यक है. क्योंकि मैं खुद भी JNU का एक अभिन्न हिस्सा रहा हूँ और अपने जीवन के डेढ़ दशक से भी ज्यादा मैंने JNU में बिताए हैं. हम लोगों द्वारा किये गए कार्य को भगवा-मुल्लों ने अपने द्वारा किये हुए कार्य के रूप में प्रदर्शित किया है (यानी अंधी पीसे, कुत्ता खाए) तो मुझे दुर्गा-पूजा के बारे में जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि आखिर जेएनयू के इतिहास में कौन वे महान लोग थे, जिन्होंने उन दिनों जब JNU वामपंथ का सबसे बड़ा अड्डा था, दुर्गापूजा जैसा बड़ा कदम उठाया... इन लोगों ने सनातन धर्म की लिए कैसे-कैसे कष्ट उठाए, संघर्ष किए.... उन लोगों को पर्याप्त सम्मान और क्रेडिट मिलना आज की तारीख में बेहद जरूरी है.

मैं 2001 में जेएनयू पहुंचा था, जब संदीप महापात्र जेएनयूएसयू के अध्यक्ष थे और हवन-कांड की चर्चा चहुंओर थी. लोग बारंबार “व्यालोक पाठक” नाम का जिक्र कर रहे थे कि ये लड़का वही है/था जिसने JNU में दुर्गा पूजा की नींव रखी... बाकी लोग (रवि भूषण, अनिल सिंह, राजू, विजय, प्रणव, अशोक शर्मा, शितांशु, आलोक दास, पियूष प्रकाश, अमित आदि अनेकानेक लोग) उसके सहयोगी थे. व्यालोक पाठक के पुनीत व पुण्य कार्य में ये लोग उसके साथ में रहे. यही हमारा सहयोग था लेकिन यह सब कार्य व्यालोक पाठक के नेतृत्व में ही संपन्न हुआ....यह है प्रस्तावना..... अब आगे देखिए कि JNU में इफ्तार/ईद की मुफ्तखोरी जारी रखने तथा दुर्गापूजा के लिए अड़ंगे लगाने का खेल कैसे हुआ और हिन्दू छात्रों ने इस पर कैसे विजय प्राप्त की.

1997 में JNU के जर्मन सेंटर (भाषा साहित्य एवं सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र) में B.A में एडमिशन होता है और उनको JNU में हॉस्टल (पेरियार में) सुविधा जनवरी 1998 से मिलना आरंभ होती है. अप्रैल-मई महीने में JNU में इफ्तार पार्टी होती है. JNU में इफ्तार पार्टी तो आज भी होती है और अब लगता है कि JNU एक मिनी पाकिस्तान बन गया है, क्योंकि उस समय JNU में एडमिशन के लिए “कथित शांतिदूतों” के लिए सिर्फ आठ मदरसा सर्टिफिकेट मान्य थे, जो अब बढ़कर 34 (या 42) हो गए है. ऊपर से इन सभी “कथित शांतिदूतों को) मौलाना आजाद फेलोशिप तो मिलती ही है, क्योंकि देश के संसाधनों पर पहला हक़ (आज भी) शांतिदूतों का है. अब संख्या उस समय से बहुत ज्यादा हो गयी है. 2009 के बाद से JNU में कश्मीरी अलगावादी ग्रुप का एक बहुत बड़ा गिरोह मजूद है. ये कश्मीरी गिरोह अब JNU के अलावा DU और जामिया में भी आ गया है, वे भी इफ्तार के समय अपना हक़ भकोसने JNU ही आते हैं) तो बात हो रही थी 1998 में JNU की इफ्तार पार्टी की.... कथित शांतिदूतों (जो JNU के HUPA सेंटर में जिहाद करने आये और दूसरे कुछ अन्य सेंटरों में भी आते हैं) ने पूरे एक महीने तक इफ्तार के समय ठूंस-ठूंस कर (हलक तक) खाया... इनके ठूंस-ठूंस कर खाने की व्यवस्था सम्बंधित हॉस्टल का मेस करता है (मेस सेक्रेट्री / मेस मेनेजर / मेस वार्डन–डीन ऑफ स्टूडेंट से लेकर सभी JNU प्रशासनिक अधिकारियों को यह मालूम होता है). जब इस मुर्गा भकोस पार्टी यानी हॉस्टल में इफ्तार मेस का बिल आता है तो सभी को, जी हाँ “सभी छात्रों को जबरन वसूली के तहत”... (क्योंकि हॉस्टल के सभी स्टूडेंट्स को, भारत एक सेक्यूलर देश है कहकर अपनी जेब कटवाने में बहुत मज़ा आता है) बराबर-बराबर हिस्सा देना होता है.

1998 की इस घटना में मेस का बिल में 35-40 रूपये ज्यादा (उस समय 35-40 रुपया किसी भी छात्र के लिए एक बड़ी रकम होती थी) आता है, तो व्यालोक पाठक यह प्रश्न उठाते है कि मेस बिल ज्यादा क्यों आया है?? तो मेस मैनेजर व सेक्रेटरी बोलते है कि इफ्तार व ईद वजह से (यानी शांतिदूतों के ठूँस-ठूँसकर खाने की वजह से) मेस बिल ज्यादा आया है. अब 1998 में नवरात्र शुरू होने से पहले व्यालोक पाठक रविभूषण से बात करते है, कि यार घर में होते तो माँ दुर्गा की पूजा करते, व्रत रखते क्या अब इसे हॉस्टल में करना संभव नहीं है?? चूँकि रवि भूषण, अनिल सिंह, राजू व व्यालोक पाठक सभी इसी बातचीत में मग्न थे तो रवि भूषण ने एक आइडिया दिया कि घर तो नहीं जा सकते... तो क्यों न हम लोग अपने हॉस्टल रूम में ही दुर्गा-पूजा करें और नवरात्र का व्रत रखें. सभी लोग रवि भूषण की बात से सहमत हो जाते है, और दुर्गा-पूजा के लिए तैयारियों में जुट जाते हैं.

चूँकि दुर्गा-पूजा (नवरात्र) के समय शांतिदूतों की तरह ठूंस-ठूंस कर खाया नहीं जाता है, तो जो लोग दुर्गा-पूजा का व्रत रखेगें उनकी खाने आदि की व्यवस्था कौन करेगा?? इसके लिए वे लोग मेस मैनेजर से मिलते हैं, और बोलते हैं की हम लोग नौ दिनों तक व्रत रखेंगे (नवरात्र का व्रत) इसलिए हमारे व्रत में खाने की व्यस्था मेस के माध्यम से की जाये, यह सुनते ही मेस मैनेजर के माथे पर बल पड़ जाता है और वह बोलता है कि इसकी व्यवस्था नहीं हो सकती है... ये हमारे लिए संभव नहीं. व्यालोक पाठक बोलते हैं कि हमे हमारे हिन्दू त्योहारों को मनाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं, लेकिन कैंपस व मेस में इफ्तार/ईद मानाने की पूरी व्यवस्था है?? और जब इसका मेस बिल आता है वह तो सभी लोग भुगतान करते हैं ऐसा क्यों?. इसी बीच अशोक शर्मा बीच में हनुमान जी तरह कूद जाते हैं, और वह इन लोगो के प्रवक्ता बन जाते हैं. इन सभी लोगो द्वारा तय किया जाता है कि चाहे जो भी हो जाए, इस बार हॉस्टल के अपने रूम में दुर्गा-पूजा और हवन अवश्य करेंगे.

व्यालोक पाठक अपने रूम (पेरियार हॉस्टल का रूम नंबर 50) में दुर्गा-पूजा/नवरात्र का व्रत रखते है, और मुकेश कश्यप, रवि भूषण, अनिल सिंह और राजू ये भी व्रत रखते है... और यही से शुरूआत होती है JNU में दुर्गा-पूजा मनाने के इस एक ऐतिहासिक और भव्य यात्रा की. हॉस्टल में रहने के कारण इन लोगो के पास पूजा में उपयोग आने वाली सामग्री का आभाव होता है, जैसे कि बहुत सारे बर्तनो की महती आवश्यकता होती है. ये लोग अपने ब्रेक-फ़ास्ट में उपयोग आने वाली प्लेट को मेस से लाते हैं, उसको मांजते है, रगड़ कर उसको साफ़ करते है. कही से गंगाजल मिल जाता है तो उस प्लेट को गंगाजल से पवित्र करते हैं और उस प्लेट का उपयोग पूजा के दौरान आरती में करते हैं. प्रथम दिन से शुरू हुई आरती में पहले दिन चढावे के रूप में इन लोगों को 35-40 रूपये मिलते हैं और उसी धन से ये लोग व्रत के लिए फल-पूजा की अन्य सामग्री को क्रय करते हैं. शुरू में 9 लोग व्रत रखते हैं, और 9 से 15 लोग इनके व्रत या दुर्गा-पूजा का भाग बनते हैं. लेकिन यह बात कैंपस में आग की तरह फ़ैल जाती है क्योंकि वामियों-इस्लामियों के गढ़ JNU के लिए यह एक दुर्लभ घटना है. खैर धीरे-धीरे इनके हॉस्टल रूम की गैलरी में माँ दुर्गा के भक्त आने शुरू हो जाते हैं, और भीड़ इतनी हो जाती है कि पंचमी के दिन आरती के लिए उस लिखित पेज का जीरोक्स करवाना पड़ता है, ताकि सभी भक्त आरती का उच्चारण ठीक से कर सकें. व्यालोक पाठक के अनुसार इसमें सबसे बड़ा योगदान JNU की मातृशक्ति का होता है. अर्थात JNU में अध्ययन करने वाली लड़कियाँ भी इस पूजा में आने लगती हैं, और पूजा के दौरान होने वाले विभिन्न कामों को वे खुद ही करने लगती हैं. भक्तों की आस्था, व्यालोक पाठक का रूम व पेरियार की वह गैलरी अब JNU में चर्चा का विषय बन जाती है.. इसी बीच पेरियार हॉस्टल के चारो वार्डन डॉ कांति पी बाजपेयी व डॉ चौबे, डॉ पटनायक (सभी वामी वार्डन) व एक अन्य वार्डन इन लोगो को तंग/परेशान करना शुरू कर देते हैं. विभिन्न प्रकार से इन लोगो पर दबाव डाला जाता है कि उनके ऊपर दंडात्मक कार्यवाही होगी यदि वे ऐसा जारी रखेगें. “नीच सेकुलरिज्म की पराकाष्ठा” यहाँ तक आई कि व्यालोक पाठक के लोकल गार्जियन श्री श्यामा नन्द झा नाम का प्राणी, व्यालोक पाठक से कहता है कि तुम यहाँ पढाई करने के लिए आये थे कि ये सब करने?? तुमने हमारा सर नीचा कर दिया, तुमने हमारी नाक कटवा दी... तुम्हे यही सब करना था यहाँ.

अब इनका इरादा और भी दृढ़ हो जाता है. नवरात्री के दौरान ये लोग धोती-कुर्ता धारण करना शुरू कर देते हैं, और वही धोती कुर्ता धारण किये ये लोग गंगा ढाबा भी जाते हैं... और क्लास में भी... ऊपर से तिलक लगाकर. इसी बीच यह होता है कि “कथित शांतिदूतों” द्वारा हॉस्टल वार्डन तक लिखित शिकायत होती है कि हॉस्टल के अन्दर दुर्गा-पूजा से उनके मज़हबी भावनाएं आहत हो रही हैं, और ठीक उसी समय सप्तमी के दिन से व्यालोक पाठक मौन व्रत ले लेते हैं. अब इन सभी लोगो को अष्ठमी के दिन वार्डन डॉ कांति बाजपेयी का बुलावा आता है. ये लोग जाते हैं, वार्डन के ऑफिस में इन लोगो की बहस होती है कि हम लोग हवन करेगें. वार्डन बोलते हैं कि हॉस्टल के अन्दर हवन की अनुमति नहीं देगें, यह नियम के विरुद्ध है. परम्पराओं/रीति-रिवाजों को लेकर बहस होती रहती है तो ये व्रतधारी भक्त लोग ये बोलते हैं कि जब शांतिदूतों को मेस के माध्यम से एक महीने ठूंस-ठूंस खिलाया जाता है और उसका भार हम सभी लोगो पर पड़ता है, क्या वह हॉस्टल मैन्युअल में है? क्या हॉस्टल मैन्युअल में ऐसा कहीं लिखा है कि वे लोग जहाँ चाहे वहाँ पांच बार नमाज़ अदा कर सकते हैं? हॉस्टल की गैलरी में? स्कूल की गैलरी में? सेंट्रल लाइब्रेरी की लॉबी में? गैलरी में यहाँ तक बाथरूम की गैलरी में? क्या कहीं भी नमाज पढ़ी जा सकती है?? उसके बाद वार्डन कुछ नही तर्क नहीं दे पाते हैं. इसी बीच व्यालोक पाठक को उसके ही संगठन के लोग उसको परित्यक्त तक करने की सोच लेते हैं, कि यह हमारा आदमी नहीं है. JNU का School of Language Literature and Cultural Studies शुरू से वामपंथियों का गढ़ रहा है (स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के बाद) और उसमे भी जर्मन भाषा का सेंटर. चूँकि व्यालोक पाठक उसी भाषा का छात्र था, तो उसको क्लास में भी ताने सुनने पड़ते थे उसका कैरिएर ख़राब करने की पूरी कोशिश की जाती है, लेकिन उसी सेंटर में एक असिस्टेंट प्रोफेसर थे डॉ बादल घना चक्रवर्ती. वे व्यालोक पाठक को संबल प्रदान करते हैं कि मैं तुन्हें जर्मन सिखाऊंगा, चिंता नहीं करो. तुम बस इन दुष्ट-पापी कम्युनिस्टों का नाश करो. व्यालोक पाठक का यह भी कहना था कि दुर्गा-पूजा के दौरान मातृशक्ति का असीम सहयोग (उन लोगो की संख्या ज्यादा थी, और धीरे धीरे उन लोगो काफी काम खुद ही संभाल लिया था) ने भी मुझे बहुत बड़ा संबल प्रदान किया. इस प्रकार नवरात्रि की नवमी को धूमधाम से हवन हुआ (ठीक पेरियार गेट के सामने) और ये हवन सुबह 10 बजे से दिन में 3 बजे तक चला.

1999 में दुर्गा-पूजा/नवरात्री का हवन नर्मदा हॉस्टल के सामने हैं होता है (नौ दिन तक पूजा व्यालोक पाठक के रूम में ही होती है) क्योंकि नर्मदा हॉस्टल में स्कूल ऑफ लैंग्वेज के लड़के ज्यादा होते है, और अशोक चूँकि उधर के हॉस्टल प्रेसिडेंट रहे चुके होते हैं तो उनको उधर हवन के स्थान के लिए आसानी होती है. सबसे बड़ी बात कि उधर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ता भी ज्यादा तादात में होते हैं. सन 1999 तक दुर्गा-पूजा या नवरात्रि ये लोग हॉस्टल के एक अपने रूम में पूजा करते थे या हॉस्टल के गैलरी तक ही यह सीमित था... लेकिन आस्था के सैलाब को देखते हुए इसमें एक बड़ा टर्निंग पॉइंट आया सन 2000 में... जब रवि भूषण, मुकेश कश्यप जैसे भक्तों ने पेरियार व कावेरी हॉस्टल के मध्य स्थित बैडमिंटन कोर्ट में JNU के इतिहास में पहली बार मूर्ति-स्थापना करके दुर्गा-पूजा की विधिवत शुरुआत की.

लेकिन वामी-इस्लामी भला इतनी जल्दी हार कहाँ से मानते?? 2001 में इस दुर्गा-पूजा को लेकर पुनः JNU प्रशासन द्वारा अडंगा डाला जाता है, और उस समय डीन ऑफ स्टूडेंट वेलफेयर होते हैं एमएम कुरैशी. दुर्गा-पूजा के प्रथम दिन (प्रथमि) जब कलश स्थापना की गयी, तो प्रो कुरैशी (घोर सेक्युलर व शांतिदूत) को यह रास नहीं आया, और उन्होंने JNU की सुरक्षा में लगे कर्मियों को आदेश दिया की उस कलश को फेंक दिया जाये. JNU के सिक्यूरिटी गार्ड ने कलश फेकने के ;इए सिर्फ मना ही नहीं किया, बल्कि कलश को यह कहकर हाथ भी लगाने से मना कर दिया, कि साहेब मुझे आप चाहे तो नौकरी से निकाल दीजिये लेकिन मैं ये पाप नहीं करूँगा. जब कुरैशी की “गार्डन-गार्डन” हो गयी तो वे वापस तिलमिलाते हुए अपने ऑफिस आ गए, कि JNU कैंपस में यह कैसे संभव हो सकता है?. सन 2000 से... यानी जबसे मूर्ति स्थापित करके JNU में दुर्गा-पूजा शुरू हुई, वह आज अठारह वर्ष से लगातार जारी है.

अब JNU में दुर्गा-पूजा बड़ी धूमधाम से होती है, बैनर लगाये जाते हैं... सभी होस्टलों में दुर्गा पूजा का पूरा कार्यक्रम लगाया जाता है, पेरियार के पास एक बड़ा द्वारा बनाया जाता है. पूजा के समय शाम से रात तक हजारों भक्त सम्मिलित होते हैं. लेकिन पंचमी के दिन से भीड़ बढ़ने लगती है, क्योंकि उसी दिन माँ दुर्गा की मूर्ति स्थापित की जाती है. पंचमी के दिन से दुर्गा-पूजा पंडाल प्रकाश से जगमगा जाता है बहुत सारे छोटे बच्चे एवं बच्चियां पंडाल के पास देर रात तक खेलते रहते हैं... कुल मिलकर वह स्थान मंगलमय एवं भव्य हो जाता है.
लेकिन 1998 से शुरू हुई यह दुर्गा-पूजा जिसके लिए व्यालोक पाठक ने अपना कैरियर दांव पर लगा दिया (आखिरकार वह अपना एमए पूरा नहीं कर सका और IIMC चला गया). (रवि भूषण सहित बाकी लोग अपनी मेहनत और मेधा से अच्छा काम कर रहे हैं) को उन सभी लोगो ने नकार दिया है. विडम्बना यह है कि इस आंदोलन के मुख्य पुजारी या संस्थापक को सिर्फ भुला ही नहीं दिया गया, बल्कि अब उसका श्रेय लेने के लिए मालाकार जैसे तमाम लोग सामने आ रहे हैं, जो कभी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सबसे बड़े शत्रु थे..... हालांकि, ध्यान रहे “प्राकृतिक न्याय” भी एक अवधारणा होती है... और यह कार्य भी करती है.

आज की तारीख में “कथित शांतिदूतों” को लेकर जितनी छूट, सब्सिडी, छात्रवृत्ति और सड़कों पर नमाज पढ़ने को लेकर “सभी” राजनैतिक दल तलवा चाटने की प्रतिस्पर्धा में शामिल हैं, ऐसे समय पर JNU के यह संघर्षमयी और हिम्मती युवाओं का स्मरण रखना हमारा परम कर्तव्य है.

लेखक :- अम्बा शंकर बाजपेयी 

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