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वैज्ञानिकता और तर्कवाद? - डॉ.सुभाष मुखर्जी याद हैं कॉमरेड?

Written by मंगलवार, 29 अगस्त 2017 12:49

पिछले कुछ समय से कई “हिन्दू” बाबा, प्रवचनकार, संत इत्यादि विभिन्न आरोपों में पकड़े जा रहे हैं या जेल जा रहे हैं. जब भी ऐसा कोई मौका आता है, तब वामपंथियों की पौ-बारह हो जाती है. ऐसे बाबाओं को लेकर अर्थात प्रकारांतर से हिन्दू धर्म को लेकर “वामी मज़हब” वाले लोग (जी हाँ!!! वामपंथ भी एक मज़हब है, इस्लाम से भी खतरनाक) हिंदुओं को कोसने लगते हैं कि “हिंदुओं के धर्म में वैज्ञानिकता नहीं है”...

“हिन्दू धर्म में तार्किक विचारधारा की कमी है”... “नए विचार एवं आविष्कार लेकर आने वाले वैज्ञानिक सोच के व्यक्ति को हिन्दू धर्म उठने नहीं देता”... इत्यादि, इत्यादि, इत्यादि..

मुझे एक फिल्म याद आती है, शायद आपने भी देखी हो... “एक डॉक्टर की मौत”. अच्छी फिल्म थी. चूँकि यह फिल्म कलात्मक थी और आलोचकों के हिसाब से अच्छी थी, तो जाहिर है आम लोगों ने अधिक नहीं देखी होगी. अच्छे फिल्म निर्देशकों में से माने जाने वाले बंगाली निर्देशक तपन सिन्हा की सन १९९० में आई ये फिल्म हिट भी नहीं हुई थी. रमापाद चौधरी की कहानी “अभिमन्यु” पर आधारित ये फिल्म लालफीताशाही, साथ काम करने वालों की आपसी जलन और तारीफ के बदले अपमान-शोषण झेलने वाले एक वैज्ञानिक की कहानी है. ये फिल्म मोटे तौर पर डॉ सुभाष मुखर्जी के जीवन से प्रेरित है, खुद तपन सिन्हा ने ये फिल्म डॉ मुखर्जी को ही समर्पित की थी. फिल्म की कहानी में एक डॉ दीपांकर रॉय (पंकज कपूर) हैं जो बरसों की तलाश के बाद कोढ़ का इलाज ढूँढने में कामयाब हो जाते हैं. रातों रात खबर पेड-मीडिया में आती है और एक अज्ञात जूनियर डॉक्टर की प्रसिद्धि से कई लोग जल भुन जाते हैं. फिल्म में स्वास्थ्य विभाग के सेक्रेटरी उन्हें धमकाते दिखते हैं, और फिर उनके कुछ साथी उन्हें एक लेक्चर के लिए आमंत्रित करते हैं. लेक्चर उन्हें बेइज्जत करने का बहाना था, और ऐसे हमलों से निराश डॉ. रॉय को दिल का दौरा भी पड़ जाता है. उनकी पत्नी (शबाना आज़मी) और कुछ और लोग अमूल्य (इरफ़ान खान), डॉ कुंडू (अनिल चटर्जी) उनकी मदद करते हैं। उनका शोषण इतने पर ही बंद नहीं होता.

डॉ. दीपांकर रॉय (यानी पंकज कपूर) का ट्रान्सफर किसी दूर-दराज के गाँव में कर दिया जाता है. एक किसी ब्रिटिश संस्थान से उन्हें बुलाने के लिए चिट्ठी भी आती है, लेकिन वह चिट्ठी भी दबा दी जाती है. इधर भारत में जब ये सब चल रहा होता है, तो दो अमेरिकी डॉक्टर भी उसी वैक्सीन पर खोज कर रहे थे. कामयाबी का श्रेय उन दोनों को वैक्सीन खोजने पर मिल जाता है, डॉ. दीपांकर गाँव में पड़े रह जाते हैं. लेकिन ये एक फिल्म है, तो अंत में डॉ दीपांकर को एक विदेशी फाउंडेशन से चिट्ठी आती है, बाहर के लोगों ने उनका काम पहचान लिया था. डॉ. दीपांकर को भी समझ में आ जाता है, कि वे विदेशी आमंत्रण स्वीकार कर मानवता की बेहतर सेवा कर सकते हैं. फिल्म के अंत में डॉक्टर विदेश जाने का फैसला लेते हैं.

अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि हिन्दू बाबाओं के बहाने हिंदुओं पर हमला करने वाले वामियों, डॉक्टर सुभाष मुखर्जी का इस कहानी से क्या सम्बन्ध है? जब आप इस फिल्म और वामपंथियों की असली जिन्दगी का व्यवहार देखेंगे तो पाएँगे कि डॉ. सुभाष मुखर्जी के लिए चीज़ें इतनी आसान नहीं रही थीं. उनका जन्म हजारीबाग के एक ब्राह्मण परिवार में १६ जनवरी १९३१ को हुआ था (उस समय बिहार, और अब का झारखण्ड). उन्होंने सन १९५८ में कलकत्ता विश्वविद्यालय से और बाद में १९६७ में यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिनबर्ग से दो बार डॉक्टरेट की उपाधि ली थी. उन्होंने सुनीत मुखर्जी और डॉ. सरोज कान्ति भट्टाचार्या की मदद से तब इतिहास रच दिया, जब इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (in vitro fertilization) के जरिये पहली बच्ची “दुर्गा” का जन्म हुआ. कनुप्रिया अग्रवाल नाम से जानी जाने वाली ये बच्ची भारत की पहली टेस्ट-ट्यूब बेबी थी जिसका जन्म ३ अक्टूबर १९७८ को हुआ था. ब्रिटिश वैज्ञानिक पैट्रिक स्टेपटो और रोबर्ट एडवर्ड्स की कामयाबी के कुछ दिन बाद, यानि विश्व में दूसरा परखनली बच्चा.

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लेकिन दूसरा क्यों, पहला क्यों नहीं? वो इसलिए कि डॉक्टर सुभाष मुखर्जी को लगातार वामपंथियों की प्रताड़ना और विरोध झेलना पड़ा था. राज्य सरकार ने इन पर १९७८ में ही मुकदमा ठोक दिया. राजनैतिक ताकतों ने इनका सामाजिक बहिष्कार कर डाला, लालफीताशाही ने परेशान किया, उनके अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में जाने पर रोक लगा दी गई. नवम्बर १९७८ में उनके दावों की जांच के लिए एक “एक्सपर्ट कमिटी”(??) बनी, जिसे अजीब अजीब आरोप जांचने थे. उन पर सरकारी अफसरों से पहले मीडिया से बात करने, बिना करोड़ों के उपकरण लिए घर के फ्रिज से ये काम करने, पहले टेस्ट ट्यूब बेबी “दुर्गा” को जन्म देने, तथा सरकारी दबाव (यानी माकपाई गुंडों की बात) ना मानने के अभियोग थे. ये जांच राज्य सरकार करवा रही थी.

सन १९८६ में भारत का पहला “सरकारी”, या यूँ कहिये आधिकारिक टेस्ट ट्यूब बेबी (हर्षवर्धन रेड्डी १६ अगस्त, १९८६) के जन्म का श्रेय डॉक्टर टी.सी. आनंदकुमार (तब के आई.आर.आर. या आई.सी.एम.आर. के डायरेक्टर) को दिया गया। जब आनंद कुमार एक कांफ्रेंस में कलकत्ता गए, तो उन्होंने डॉ सुभाष मुखर्जी के मुक़दमे और रिसर्च के कागज़ ढूंढ निकाले. जांचने पर उन्हें दिख गया कि डॉ. सुभाष मुखर्जी की जांच करने वाले कमीशन के अध्यक्ष एक रेडिओ-फिजिसिस्ट थे, उनके अलावा समिति में एक स्त्री रोग विशेषज्ञ, एक साइकोलॉजी, एक फिजियोलॉजी और एक न्यूरोलॉजी का था. अर्थात इनमें से किसी को प्रजनन या भ्रूण, और उस से जुड़ी खोजों के बारे में एक अक्षर भी नहीं नहीं पता था. फिर भी इन्होंने वामपंथियों को खुश करने के लिए वैज्ञानिक सुभाष मुखर्जी को प्रताड़ित किया. टी.सी.आनन्द कुमार के प्रयासों से भारत के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी का श्रेय डॉ. सुभाष मुखर्जी को (मरणोपरांत) मिला. ज्योति बासु सरकार की जांच, प्रताड़ना, शोषण झेलते हुए डॉ. सुभाष मुखर्जी ने १९ जून १९८१ को आत्महत्या कर ली थी।

कहने का मतलब ये है कि अक्सर हिंदुओं को वैज्ञानिक सोच एवं तर्कशीलता का ज्ञान पिलाने वाले वामपंथी इतने क्रूर रहे हैं कि उन्होंने एक वैज्ञानिक को प्रताड़ित करके आत्महत्या पर मजबूर कर दिया था. इसके अलावा हिंदुओं की परम्पराओं, संस्कृति एवं पूजापाठ को दिन-रात कोसने तथा धर्म (यानी केवल हिन्दू धर्म) को अफीम कहने के बावजूद इन्हीं के कॉमरेड लोग मुँह छिपाकर कोलकाता के पूजा पण्डालों में जाते हैं. इन्हीं के एक कॉमरेड जब हज करके आए तो उनका सम्मान तक कर डाला... एक कोई मैनेजर पाण्डेय साहब भी हैं, जो जीवन भर एक आयातित विचारधारा पर पोषित हुए और बुढ़ापे में पूजा-पाठ करते धर लिए गए. एक अनंतमूर्ति नामक वामपंथी नास्तिक लेखक थे, जो हिंदुओं का विरोध करते-करते मर गए, लेकिन अंत में बाकायदा चार किलो घी के साथ उनका श्राद्ध किया गया. ऐसे माहौल में १९७८ के उस गन्दे वामपंथी दौर के बंगाल का एक वैज्ञानिक पर किया ये अमानुषिक अत्याचार तो याद आना ही था. आज जो वैज्ञानिक पद्धतियों में “आस्था” जताने तथा पूजा-पाठ, बाबाओं जैसे पाखंड से दूर रहने की दोमुंही बातें कर रहे हैं उन सब से सवाल ये है कि जनाब आप खुद वैज्ञानिक विचारों के पोषक कब थे? आपने कब, कहाँ, कौन से अविष्कारकों को प्रश्रय दे दिया? लाल झंडे का समुदाय और वाम मजहब की सरकारें तो वैज्ञानिकों को आत्महत्या के लिए धकेलने में याद आती हैं... हिन्दू धर्म तो “स्व-सुधारक” है, उसे किसी विदेशी विचारधारा से नकली ज्ञान लेने की जरूरत नहीं है...

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- साभार :- भारतीय धरोहर

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