दार्जिलिंग-गोरखा मामले में केंद्र का तत्काल हस्तक्षेप जरूरी

Written by सोमवार, 10 जुलाई 2017 07:58

लगभग एक माह से अधिक होने को आया, बंगाल में इस्लामिक हिंसा और गोरखालैंड में अलग राज्य के माँग को लेकर समूचा उत्तर-पूर्व बेचैन और अशांत है. पिछले शुक्रवार और शनिवार की दरमियानी रात को बंगाल पुलिस द्वारा तीन गोरखा प्रदर्शनकारियों को बड़ी निर्दयता से गोली मार दी.

बंगाल पुलिस का यह कृत्य निश्चित रूप से अत्यधिक क्रूर और असंवेदनशील है. स्वाभाविक है कि ममता बनर्जी के इशारे के बिना ऐसी पुलिस हत्याएँ संभव नहीं हैं. यह प्रदर्शित करता है कि गोरखालैंड मामले को समझने और सुलझाने में ममता बनर्जी पूर्णतः असफल सिद्ध हुई है. अब मामला इतना बिगड़ चुका है कि केंद्र के तत्काल हस्तक्षेप करने की स्थिति बन चुकी है. अभी तक इस मामले में केंद्र सरकार ने बहुत ही संयमी रुख अपनाया हुआ है, और राज्यपाल के मार्फ़त ममता बनर्जी से केवल क़ानून-व्यवस्था की जानकारी भर मांगी है, वह भी ममता बनर्जी को नागवार गुज़रा और उन्होंने राज्यपाल पर अनर्गल आरोप मढ़ने शुरू कर दिए. दार्जिलिंग की परिस्थिति को संभाल नहीं पाने की चिढ़ और हताशा ममता बनर्जी के चेहरे पर स्पष्ट दिखाई दे रही है, इसलिए अब उन्होंने अपनी पुलिस को “खुला हाथ” दे दिया है. परन्तु इससे स्थिति और भी बिगड़ गई है.

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17 जून को पुलिस फायरिंग में छः गोरखा जवानों की मृत्यु के बाद यह दूसरी बड़ी घटना थी, जिसने समूचे गोरखा क्षेत्र में उबाल ला दिया है. जिस तरह ममता बनर्जी गोरखाओं की मांगों को अनदेखा करती रही हैं तथा दार्जिलिंग स्वायत्त परिषद् क्षेत्र में बंगाली राजनीति तथा बंगाली भाषा थोपने की जबरन कोशिश की है, उसके कारण उनकी नीयत पर शक होना स्वाभाविक है. ममता बनर्जी की काली नीयत का दूसरा पहलू यह भी है, कि जब बशीरहाट में मुस्लिम दंगाई सरेआम सरकारी और हिन्दुओं की संपत्ति जला रहे थे, उस समय बंगाल पुलिस को फायरिंग का आदेश नहीं दिया गया, जबकि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे गोरखा मुक्ति मोर्चा के नौजवानों को ताबड़तोड़ गोली से भूना जा रहा है. बशीरहाट और दार्जिलिंग के बीच पुलिस गोलीबारी का यह भेदभाव गोरखा युवाओं को बंगाल से और दूर ले गया है.

समस्या यह है कि पूरा दार्जिलिंग पहाडी क्षेत्र रक्षा एवं सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील है. इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अशांति, भारत को महंगी पड़ सकती है. चूँकि ममता बनर्जी को अपने मुस्लिम वोटरों और अपने TMC कैडर के आगे कुछ दिखाई नहीं देता, इसलिए वह राष्ट्रीय हित के इस गंभीर मसले को समझने में असमर्थ है. भाजपा इस मामले में अभी तक अत्यंत संयमी और “अति-सज्जनता” का रुख दिखा रही है, ताकि उस पर विपक्ष को दबाने के आरोप न लगें. परन्तु इन दोनों के बीच पिस रहा है मासूम गोरखा युवा, जिसके सपने, जिसकी आकांक्षाएं स्वायत्त परिषद् बनने के बावजूद पूरी नहीं हुई हैं, क्योंकि बंगाल सरकार तथा केंद्र सरकार दोनों ने ही इस क्षेत्र को पैसा देने और विकास करने में कोताही बरती है.

Darjeeling

दार्जिलिंग पहाड़ी क्षेत्र के लोग यहाँ से भाजपा सांसद एसएस अहलूवालिया से भी खासे नाराज हैं. अहलूवालिया यह सीट जीतने में इसीलिए कामयाब रहे थे, क्योंकि उन्हें गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का समर्थन हासिल था. चुनावों के समय अहलूवालिया ने वादा किया था कि वे संसद में अलग गोरखालैंड की माँग को गंभीरता से उठाएँगे. लेकिन कृषि राज्यमंत्री बन जाने के बावजूद अहलूवालिया न केवल अपने संसदीय क्षेत्र से गायब रहे, बल्कि अपने मंत्रालय के द्वारा उन्होंने इस क्षेत्र में विकास अथवा नई योजनाओं के लिए कोई विशेष प्रयास भी नहीं किए. इस तरह गोरखाओं ने खुद को छला हुआ पाया. इस क्षेत्र के बुज़ुर्ग कहते हैं कि हमने इस क्षेत्र से भाजपा को इसीलिए जितवाया था ताकि हम मुख्यधारा में बने रहेंगे, अन्यथा हमारी दिल्ली में सुनता कौन? परन्तु अहलूवालिया ने हमें निराश ही किया है. एक तरफ ममता बनर्जी इस इलाके के साथ पहले ही सौतेला व्यवहार करती हैं और उनका सारा ध्यान अपने मुस्लिम वोटर्स पर लगा रहता है, और दूसरी तरफ केंद्र भी हमें अनदेखा किए जा रहा है. यह ठीक नहीं हो रहा.
मामले की गंभीरता को समझना हो तो केवल इस बात पर ही ध्यान दे दिया जाए कि गोरखा युवाओं में बढ़ता असंतोष, बेरोजगारी और उपेक्षा दार्जिलिंग की राजनैतिक, सामाजिक स्थिति को एक “अशांत क्षेत्र” बनने की तरफ ले जा रही है. गोरखा युवा सामान्यतः सीधा और भोला होता है, परन्तु ऐसे अस्थिर माहौल में कोई भी देशद्रोही ताकत उन्हें बरगला सकती है. दूसरी बात यह है कि भारत की सेना में जो लाखों गोरखा सैनिक हैं, उनका कोई न कोई रिश्तेदार दार्जिलिंग पहाडी क्षेत्र अथवा सिक्किम में बसा हुआ है. यहाँ की अशांत स्थिति और इधर से उन तक पहुँचने वाली ख़बरें उन्हें परेशान कर रही हैं, उनमें डिप्रेशन पैदा कर रही हैं. यह स्थिति खतरनाक है. चीन की तरफ से पहले ही दुष्प्रचार शुरू हो चुका है कि सिक्किम को 1975 के अपने भारत विलय के बारे में पुनर्विचार करना चाहिए. दार्जीलिंग से सटे हुए डोकला क्षेत्र में चीन-भारत की सेनाएँ आमने-सामने मौजूद हैं ही. इस दशा में यहाँ शान्ति और स्थिरता की तत्काल माँग है. दार्जिलिंग पहाड़ी क्षेत्र की अस्थिरता के कारण सिक्किम में जरूरी वस्तुओं के दामों में भारी बढ़ोतरी हो गई है. ज़ाहिर है कि देश में छिपे बैठे गद्दारों के माध्यम से अन्दर ही अन्दर आग भड़काने का खेल भी शुरू हो चुका है.

ममता बनर्जी जैसी अनाड़ी, अड़ियल और दम्भी औरत पर यदि जल्दी ही काबू नहीं पाया गया, तो यह निश्चित जानिये कि बंगाल का एक बड़ा हिस्सा तथा दार्जिलिंग पहाड़ी क्षेत्र जल्दी ही एक बड़े अशांत इलाके में बदल जाएगा. यह स्थिति भारत की एकता-अखंडता के लिए बेहद चिंताजनक है. केंद्र सरकार को इस मामले में तत्काल दखल देकर (चाहे इसके लिए नाकारा एवं नकारात्मक विपक्ष का हमला ही क्यों न झेलना पड़े) बंगाल एवं गोरखा स्वायत्त परिषद् की बात पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए... और यह काम जल्दी ही होना चाहिए, क्योंकि पहले ही बहुत देर हो चुकी है.

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