दलित युवक सायबन्ना, और बानू बेगम की दुखद प्रेमकथा

Written by मंगलवार, 06 जून 2017 07:57

पिछले कुछ वर्षों से उत्तरी भारत में राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा और देश तोड़ने की योजना के तहत दलित-मुस्लिम गठजोड़ और इनके बीच तथाकथित सामाजिक समरसता निर्माण करने के खोखले प्रयास चल रहे हैं.

इस प्रक्रिया में अनपढ़ और गरीब दलित अक्सर मुस्लिम नेताओं का चारा बन गए हैं, जबकि दलितों की चिंता करने का ढोंग करने वाले दलित चिन्तक-विचारक और लेखक अपने हिस्से का पैसा कमाने में लगे हुए हैं. जमीनी वास्तविकता यह है कि ग्रामीण भागों में दलितों को सताने वाले, उन पर अत्याचार करने वाले अधिकाँश मुस्लिम हैं. हाल ही में हमने आज़म खान के रामपुर में बारह मुस्लिम लड़कों को दो दलित लड़कियों से बेहद अश्लील और हिंसक पद्धति से छेड़छाड़ करते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर देखा था. उसके बाद आगरा के ताजगंज में भी लगभग यही किस्सा दोहराया गया, जहां दलित लड़कियों को बचाने आए दलित युवाओं को मुस्लिमों ने जमकर पीटा और दलित बस्ती पर पथराव भी किया. ऐसी घटनाएँ आज की नहीं हैं, ये तो यूपी-बिहार में सामान्य तौर पर होता आया है, परन्तु वेटिकन से पैसा खाने वाले दल-हित चिन्तक तथा सऊदी अरब से फंडिंग प्राप्त करने वाले मुस्लिम नेता इन घटनाओं पर एकदम चुप्पी साध लेते हैं. पीड़ित दलित परिवार या लड़कियों को बचाने कोई भीम आर्मी नहीं आती.

ये तो हुई उत्तर भारत की बात, हाल ही में दक्षिण भारत का मामला सामने आया है, जिसने यह सिद्ध कर दिया है कि दलित मुस्लिम भाईचारा निपट खोखला और पाखण्ड है. इस भाईचारे में केवल दलित ही “चारा” बनता है. कर्नाटक के बीजापुर जिले की मुद्देबिहल तहसील के गुन्दाकनाला गाँव में 21 वर्षीय बानू बेगम रहती थी. उसी गाँव में एक 24 वर्षीय दलित युवक जिसका नाम सायबन्ना है, रहता था. इन दोनों में प्रेम हो गया. 22 जनवरी 2017 को बानू बेगम के परिवार वालों को यह पता चला कि उनकी लडकी एक दलित युवक से प्रेम करती है, तब उन्होंने पहले तो बानू बेगम की जमकर पिटाई की और फिर थाने जाकर जबरदस्त हंगामा किया. बानू के परिवार वालों की माँग थी कि सायबन्ना कोन्नुर पर POSCO क़ानून के तहत कार्यवाही करके गिरफ्तार किया जाए, क्योंकि परिवार के अनुसार बानू बेगम नाबालिग़ है. उप-पुलिस अधीक्षक डीवाय पाटिल कहते हैं कि जब हमने जाँच की तो पाया कि बानू बेगम बीस वर्ष से ऊपर की है और कतई नाबालिग़ नहीं है. उस समय परिवार वालों को समझाबुझाकर वापस भेज दिया गया. दलित सायबन्ना का परिवार भी इस नाजायज़ सम्बन्ध से खुश नहीं था और उन्होंने भी बानू बेगम को सख्त हिदायत दी कि वह सायबन्ना से न मिले. लेकिन ऐसा हुआ नहीं, 24 जनवरी को बानू और सायबन्ना गाँव से भाग निकले और गोवा पहुँच गए. फरवरी में दोनों ने शादी कर ली और बाकायदा गोवा में विवाह का रजिस्ट्रेशन भी करवा लिया. अगले माह जब सायबन्ना को पता चला कि बानू बेगम गर्भवती है तो दोनों ने आपस में सलाह-मशविरा किया और सोचा कि अब अपने गाँव गुन्दाकनाला लौट चलते हैं. उन्होंने सोचा था कि अब चूँकि विवाह भी रजिस्टर्ड हो चुका है तथा बानू बेगम गर्भवती भी है, तो शायद परिवार वाले उन्हें माफ़ कर देंगे और अपना लेंगे. परन्तु उनका ऐसा सोचना एकदम गलत निकला.

मई के अंतिम सप्ताह का अंतिम शनिवार... बानू और सायबन्ना अपने-अपने परिवारों से मिलने पहुँचे और उन्हें बताया कि अब उनकी शादी हो चुकी है और बानू गर्भवती है. फिर भी दोनों परिवारों ने इन दोनों को पुनः अलग होने की सलाह दी और मामला बिगड़ता चला गया. शनिवार की रात को सायबन्ना के पिता, बानू की माँ-भाई और बहनों ने घर में बंद करके दोनों को पीटना शुरू किया. सायबन्ना के शरीर पर नुकीली वस्तुओं से हमला करके उसे बेहद घायल कर दिया और पत्थरों से कुचलने की कोशिश की. इस छीनाझपटी में सायबन्ना जो कि थोडा मजबूत था, भाग निकला और सीधे डीवाय पाटिल के पास थाणे में पहुँचा. लेकिन जब तक वह पुलिस की मदद लेकर वापस अपने गाँव पहुँचता, तब तक वहां सब ख़त्म हो गया था. जी हाँ!!! बानू बेगम को उसकी माँ-भाई और बहनों ने जिन्दा जला दिया था. पुलिस दस मिनट की देरी से पहुँची, तब तक बानू बेगम अपने गर्भ के साथ पूरी जल चुकी थी. सायबन्ना ने अपने कुछ दलित मित्रों और कुछ मुस्लिम पड़ोसियों से मदद की अपील की, परन्तु सभी ने दरवाजे बंद कर लिए.

अगले दिन यानी रविवार को पुलिस ने सायबन्ना के पिता और बानू बेगम की माँ-भाई को गिरफ्तार कर लिया. पोस्टमार्टम में पता चला कि बानू बेगम को जलाने से पहले उस पर धारदार हथियारों से भी हमला किया गया था. 4 जून तक की स्थिति ये है कि दलित युवक सायबन्ना का इलाज चल रहा है और बानू बेगम के चार हत्यारे अभी भी पुलिस के पकड़ से दूर हैं.... कर्नाटक का कोई भी दलित नेता, सायबन्ना की तबियत का हालचाल जानने नहीं पहुँचा. जबकि अभी भी कुछ मुस्लिम परिवार सायबन्ना को जान से मारने की धमकी दे रहे हैं.

ये है “जय भीम, जय मीम” की जमीनी वास्तविकता... परन्तु देश तोड़ने के लिए सवर्णों को, ब्राह्मणों को सतत गाली देने वाले दलित चिन्तक-विचारक और गरीब दलितों की लाशों पर रोटियाँ सेंकने वाले दलित नेता पूरे घटनाक्रम पर चुप्पी साधे हुए हैं... मुस्लिमों और दबंग OBC द्वारा दलितों पर अत्याचार की ऐसी घटनाएँ उत्तर भारत में आए दिन होती रहती हैं, दक्षिण भारत में अभी कम हैं.

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