शकुनि की चालें, विश्वास का संकट और संस्कृति क्षरण

Written by शनिवार, 18 फरवरी 2017 11:05

विश्वास का महत्व इतना अधिक है कि देखा जाए तो यह संसार विश्वास पर ही निर्भर है| यदि आप किसी पर भी विश्वास नहीं करेंगे तो जीवन न तो सहज होगा, और न ही सम्भव और विश्वास तो अँधा ही होता है| आज हम विज्ञान द्वारा सिद्ध बात को सर्वोपरि मानते हैं|

वह भी तो एक प्रकार का विश्वास ही है और वह भी इस सिद्धान्त पर आधारित है हम यह विश्वास करते हैं कि जो भी प्रयोगों के द्वारा सिद्ध हो वही सत्य है| परन्तु कई बार वह गलत भी सिद्ध होता है जैसे उदाहरण के लिए न्यूटन प्रकाश को 1704 ई. में कण (particle) का बना हुआ मानते थे तो वहीं लगभग सौ वर्ष बाद थॉमस यंग ने 1803 ई. में अपने प्रसिद्ध दो दरार प्रयोग (double slit experiment) द्वारा प्रकाश के व्यतिकरण (interference of light) के गुण की पुष्टि की जिससे यह सिद्धांत प्रतिपादित हुआ कि प्रकाश एक तरंग है या तरंग के गुणों को प्रदर्शित करता है और इसके लगभग सौ वर्ष के बाद एक नए सिद्धांत की खोज हुई जिसे हम आज प्रकाश की द्वैत प्रकृति (dual nature of light) के सिद्धान्त के नाम से जानते हैं जिसके अनुसार प्रकाश कण भी है और तरंग भी| यह एक उदहारण है जिसमें यह समझाने का प्रयास है कि न्यूटन पर अटल विश्वास के कारण ही सौ वर्षों तक लगभग समस्त पश्चिमी वैज्ञानिक समाज प्रकाश को कण के रूप में ही मानता रहा| फिर सौ वर्षों के बाद यंग के द्वारा स्थापित प्रकाश के तरंग सिद्धांत को मानने लगा| सही अर्थ में देखा जाये तो प्रकाश तो न्यूटन के समय भी वही गुण रखता था जो यंग के समय में और वही आज भी रखता है बदला है तो सिर्फ उसे देखने का दृष्टिकोण|
एक और उदाहरण यदि लें सत्येन्द्र नाथ बोस जिनका शोध पत्र अस्वीकृत हो गया था जो बाद में आइन्स्टाइन द्वारा जर्मन भाषा में अनुवाद किये जाने के बाद बोस के नाम से ही छपा और आज आधुनिक क्वांटम भौतिकी में एक विशेष स्थान लिए हुए है| बोस के नाम पर रखे गये बोसॉन कण आज कल वहुचर्चित और प्रसिद्ध ईश्वरीय कण या हिग्स बोसॉन का आधार है| किन्तु बोस पर विश्वास न होने के कारण वह शोधपत्र छपने से अस्वीकृत कर दिया गया था जबकि आइन्स्टाइन द्वारा पुनः भेजे जाने पर वही शोधपत्र अति प्रख्यात अंतर्राष्ट्रीय शोध प्रकाशन में प्रकाशित हुआ| इस पूरी घटना में केवल विश्वास ने ही अपनी भूमिका निभाई|

उपर्युक्त दो उदाहरणों को यदि हम देखें तो हम पाएंगे कि विश्वास केवल धार्मिक मान्यताओं में ही नहीं अपितु वैज्ञानिक मान्यताओं में भी अन्धा ही होता है और उस विश्वास के कारण ही संसार में मार्ग अवरुद्ध भी होता है और प्रशस्त भी| अतः केवल उन्हीं मान्यताओं को मानना और अपनी स्वीकृति देना जो आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से सिद्ध हैं और अन्य को या अन्य लोगों की मान्यताओं को जिनको आधुनिक विज्ञान अभी खोज नहीं पाया है या पूरी तरह जान नहीं पाया है को पूरी तरह नकार देना भी तो एक प्रकार का अन्ध विश्वास ही है| आधुनिक विज्ञान के सिद्धान्त और प्रणालियाँ अभी पूर्ण विकसित अवस्था में नहीं हैं| इसी कारण वे समय समय पर बदलते रहते हैं और जिस सिद्धान्त को लोग सौ वर्षों तक सही मानते हैं अचानक वही गलत प्रतीत होने लगता है| प्रमाणों को न खोज पाना विज्ञान और वैज्ञानिकों की समस्या है क्योंकि केवल किसी गुण कारणों के प्रमाण न मिलने से या उन गुणों को और उनके प्रभावों को न देख पाने से न तो वे गुण समाप्त होते हैं न ही उनके कारण और न ही उनके प्रभाव| परन्तु इतना होने पर भी हम आधुनिक विज्ञान और उसके मौलिक सिद्धांतों का पूर्ण रूप से न ही खण्डन करते हैं और न ही पूर्ण रूप से अविश्वास क्योंकि इसी में मानव समाज और हमारे संसार का कल्याण निहित है|

इसी प्रकार अन्य कई मार्ग हैं जिन पर चलने से मानव समाज और संसार का कल्याण होता है| इन मार्गों के चयन और इन पर चलने की सुविधा और शक्ति देता है व्यक्ति का उस मार्ग के प्रति विश्वास| केवल किसी विशेष प्रकार के विश्वास को हम अँधा विश्वास नहीं कह सकते क्योंकि प्रत्येक विश्वास प्रारम्भ में अँधा ही होता है और धीरे धीरे अनुभवों के आधार पर वह दृढ़ तो होता है परन्तु कई बार सकारात्मक अनुभवों के वावजूद दृढ़ विश्वास पर भी आघात होता है| अतः किसी के भी विश्वास या मान्यताओं पर तब तक कोई हास परिहास करके उसका अपमान नहीं करना चाहिए जब तक आप उसके बारे में, उसके कारणों के बारे में पूर्णतः सही सही ज्ञान प्राप्त न कर लें| हो सकता है कि आपके अज्ञान के कारण आप किसी के ऐसे विश्वास को चोट पहुँचा रहे हों जिससे उसकी शक्ति और ऊर्जा का स्रोत नष्ट हो और जिससे मानव समाज, संसार और स्वयं आप के लिए भी कोई गम्भीर समस्या का जन्म हो|
इस संसार में सबसे अधिक शक्ति यदि किसी में है तो वह है मनुष्य के विश्वास में क्योंकि यदि विश्वास सकारात्मक है तो आप मृत्यु के मुख से भी वापस आ सकते हैं जैसे उदाहरण के लिए परम वीर चक्र विजेता योगेन्द्र सिंह यादव को ही लें जिनका उनके ईश्वर की सत्ता और देश प्रेम में अटूट विश्वास था जिसके कारण वह टाइगर हिल्स की पहाड़ियों पर हुए विद्ध्वन्स्कारी कारगिल युद्ध से जीवित आ गये| यदि विश्वास किसी पर नहीं है तो व्यक्ति की स्थिति एवम् प्रवृत्ति एकदम शंकालु हो जाती है जो सब पर अविश्वास करता है जिससे उसका सुख चैन, शान्ति सब नष्ट हो जाती है और वह मनुष्य उन सब शक्तियों और ऊर्जाओं से खुद को दूर कर लेता है जिन पर उसे विश्वास नहीं होता|

Grow your faith

यदि विश्वास में शक्ति न होती तो आत्म विश्वास कभी बल प्रदान न कर पाता |

इस प्रकार यदि किसी को कमजोर और शक्तिहीन करना हो तो उसके मौलिक विश्वास पर आघात किया जाता है जैसा कि अंग्रेजों और अन्य लुटेरी कुसंस्कृतियों ने किया| भारतीयों से उनकी उनकी पहिचान छीनने के लिए उनकी सांस्कृतिक विरासत को हथियाने और उन्हें अशक्त बनाने के लिए उनके विश्वास पर आघात करने हेतु अनेक योजनाओं का पालन हुआ| एक विशेष प्रकार की शिक्षा पद्धति का विकास किया गया जिसके अनुसार औपचारिक रूप से शिक्षा के प्रमाणपत्र न प्राप्त कर सकने वाले लोग अशिक्षितों की श्रेणी में आ गये| इस शिक्षा पद्धति का सर्वोपरि उद्देश्य था भारतीयों का उनकी संस्कृति और सभ्यता पर जो विश्वास था उस पर चोट करना भारत की मौलिक भाषा और परम्पराओं को मानने वाले गँवार और अन्धविश्वासियों की श्रेणी में आ गये| भारतीय समाज का विश्व के प्रति योगदान शून्य या नगण्य हो गया| भारत का साहित्य केवल साम्प्रदायिक ग्रन्थों की श्रेणी तक ही सीमित रहने लगा| भारत जैसे कृषि प्रधान और सम्पूर्ण विश्व को खाद्यान्न देने वाले देश के कृषि के तौर तरीके पुराने और बेकार सिद्ध कर दिए गये| यहाँ की अधिकाँश सभी प्राचीन परम्पराओं जैसे योग आसन, सर्प पूजन, गौ पूजन, वृक्ष पूजन आदि को अन्धविश्वास और दकियानूसी सिद्ध करने का हर सम्भव प्रयास किया गया और इन का पालन करने वालों को अनेक प्रकार के उपहासों और अपमानों का सामना करना पड़ा| यहाँ धर्म का अर्थ केवल religion अर्थात् मत संप्रदाय तक ही सीमित रह गया| यहाँ की आयुर्वेद की चिकित्सा पद्धति को नष्ट करने के लिए उसके साथ पक्षपात किया गया| उन चिकत्सा पद्धतियों को बेकार बताया गया और एलोपैथी चिकित्सा को अधिक बढ़ाचढ़ा कर महत्व दिया गया जिसके पास 1799 ई. में अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन के बुखार का इलाज उनके हाथों की नसों को काटना मात्र ही था जिसके कारण उनकी मृत्यु भी हो गयी और 1861 ई. में ब्रिटेन की महारानी के पति की टाईफाइड से मृत्यु हो गयी| इन उदाहरणों से मैं यह बताना चाह रहा हूँ कि जिस चिकित्सा पद्धति के पास दो विश्व के उस समय के सबसे सशक्त देशों के सबसे सशक्त व्यक्तियों को बचाने का सामर्थ्य भी नहीं था उसे उस आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति से सदैव श्रेष्ठ बताया गया जिसके पास गिलोय आदि से बुखार आदि को ठीक कर पाने की बहुत प्राचीन विधि थी| ऐसी शिक्षा व्यवस्था और पक्षपात पूर्ण नीतियों के कारण विदेशी लुटेरे भारत के कुछ लोगों का विश्वास तोड़ पाने में सफल रहे|

इसी विश्वास तोड़ने की कड़ी में उनकी एक नीति थी जो अभी भी है गर्व एवं उपहास की नीति जिसके अनुसार वे अपनी सभी सांस्कृतिक, साम्प्रदायिक परम्पराओं को आधुनिकता का प्रतीक दिखा कर गर्व प्रदर्शित करते थे (अभी भी करते हैं) और भारतीय संस्कृति, सभ्यता को पुराना, अवैज्ञानिक, अन्धविश्वासपूर्ण सिद्ध करके उसका और उसे मानने वालों का उपहास और अपमान करते थे| इस कार्य को करने के लिए वे पूर्णतः नियोजित तरीकों का प्रयोग करते थे (अभी भी करते हैं)| उन लोगों को पुरुष्कृत और ख्याति प्रदान करते थे जो इस कार्य में उनका साथ देते थे| उन सभी लोगों को समाज में प्रतिष्ठा भी देते थे जो उनका हित साधने में उनकी मदद करते थे| इस विश्वास को तोड़ने के लिए बल प्रयोग द्वारा कुछ लुटेरों के द्वारा आस्था के प्रतीक मंदिरों को तोड़ा गया, जबरन तलवार की नोंक पर या लालच देकर धर्मांतरण कराया गया और कुछ विदेशियों द्वारा गाय की चर्बी को कारतूसों में भरकर मुख से स्पर्श कराया गया|

इस विश्वास को नष्ट करने के लिए इतिहास को जानबूझ कर गलत रूप में लिखवाया गया| भारत की सभ्यता को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया| परिणामस्वरूप भारतीय समाज कई भागों में बँट गया| लोगों को अपने गौरवशाली इतिहास का भान ही न रहा और वे योद्धाओं को छोड़ ऐसे लोगों के पीछे चलने लगे जो तुष्टिकरण और अपने स्वार्थसिद्धि की नीति अपनाते थे और इसे झूठे मानवतावादी चोले में डालकर न्याय संगत, तर्क संगत और नैतिक रूप में दिखाते थे| इससे भारतीय समाज अपनी संस्कृति के प्रति अगाध विश्वास, श्रद्धा और निष्ठा से दूर होने लगा| वह इन लुटेरी कुसंस्कृतियों द्वारा फैलाई भ्रान्तियों को, जो कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीविओं द्वारा स्वार्थ सिद्धि हेतु पुष्टित हुईं, सत्य समझने की भूल करने लगा| इसी के परिणाम आज भी भारतीय समाज भोग रहा है| इन नीतियों की सहायता से विदेशी लुटेरे भारत में सत्ता का हस्तांतरण ऐसे कुछ लोगों के हाथ में करने में सफल हो गये जिनकी निष्ठा पूर्णतः उन लुटेरों में ही थी| इस प्रकार सत्ता हस्तान्तरण के बाद लुटेरों का कार्य और भी आसान होने लगा क्योंकि अब बाकी लोगों के पास लड़ने के लिए कोई दृश्य शत्रु न था|

संस्कृत भाषा जो विश्व के लगभग सभी प्रमुख भाषा वैज्ञानिकों के द्वारा सबसे अधिक विकसित और समृद्ध भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है आज केवल धर्म और सम्प्रदाय विशेष की पुस्तकों और अनुष्ठानों की भाषा मात्र रह गयी है| इसका प्रमुख कारण है देश की तथाकथित आजादी के बाद संस्कृत भाषा को शिक्षा में कम महत्व देना| नयी युवा पीढियों को संस्कृत द्वारा प्रदत्त ज्ञान और दान पद्धति से वंचित रखना| संस्कृत को एक अत्यन्त क्लिष्ट भाषा के रूप में नए समाज से परिचित कराना जिससे लोग संस्कृत में समाहित ज्ञान की ओर जा ही न सकें| वे उन वेदों और उपनिषदों के संस्कृत ग्रन्थों को पढ़ने और समझने के विषय में कभी सोच ही न सकें और केवल उतना ही और उसी अर्थ में सीख सकें जो उन्हें किसी अन्य भाषा के अनुवादक ने अपनी टिप्पणियों के साथ लिखा है| वह अनुवादक जो कभी न भारत आया, न ही उसने भारतीय परम्पराओं को जिया और न ही उन्हें सही अर्थों में समझने की चेष्टा की| यदि वेद इतने ही तुच्छ होते तो सम्पूर्ण यूरोप उनके अनुवाद की दौड़ में न कूदता| यदि संस्कृत इतनी व्यर्थ होती तो पूरा यूरोप 18वीं शताब्दी तक संस्कृत, जो न वहाँ की भाषा थी और न ही किसी उपनिवेशवादी ने उन पर थोपी थी, सीखने की दौड़ में न कूदता |

संस्कृत से समाज को दूर रखकर हमारी पूर्ववर्ती सरकारों ने उन्हीं लुटेरी ब्रिटिश और अन्य उपनिवेशवादी शक्तियों के हितों को साधा है| प्रत्येक भाषा के शब्दों का अपना इतिहास और सामाजिक महत्व होता है| उदाहरण के लिए शब्द गंगा केवल नदी नहीं अपितु एक आस्था है, एक विश्वास है जिसके तट पर अनेक सभ्यताओं ने विकास के चरम को स्पर्श किया है लेकिन उसी गंगा को जब अंग्रेजी में गैन्जेस नाम से पुकारा जाता है तब वह केवल एक पानी की धारा की ही याद दिलाती है| व्याकरण के नियमों के अनुसार व्यक्तिवाचक संज्ञा को बदला नहीं जाता किन्तु यह सब जानबूझ कर पूरे सुनियोजित तरीकों से मीडिया के माध्यम से, कुछ पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से तथा धीरे धीरे कुछ तथाकथित बुद्धिजीविओं के माध्यम से होता है और धीरे धीरे गंगा नए रूप में प्राचीन परम्पराओं से विखण्डित गैन्जेस बन जाती है और उन्हीं विश्वासों को साथ लेती है जो उस पर थोपे जाते हैं| इसी प्रकार योग-योगा; वेद-वेदा; आत्मा- आत्मन; ब्रह्म- ब्रह्मन हो जाता है और नयी पीढ़ी संस्कृत से अलग रहने के कारण इन शब्दों को वैसे ही उच्चरित करती है और वैसे ही समझती है जैसे कि उसे सिखाया जाता है|

सभी लुटेरी ताकतों ने अपनी भाषा को ही थोपा| यदि अपनी भाषा का या उसमें शिक्षा प्राप्त करने का कोई विशेष महत्व नहीं तो विश्व के सभी विकसित देश अपनी नहीं अपितु अन्य देशों की भाषाओँ का प्रयोग करते किन्तु ऐसा नहीं है, जर्मनी- जर्मन, जापान- जापानी, ब्रिटेन- अंग्रेजी, फ़्रांस- फ्रेंच, चीन- चीनी, यूएसए- अंग्रेजी रूस- रूसी, अरब देश-अरबी, इजराइल-हिब्रू, भाषा का प्रयोग मुख्य रूप करते हैं| जब भारत की बात आती है तो हम आज भी अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं जिसके कारण भारत के लोगों को एक पूर्ण रूप से विदशी भाषा को अपनी मूल भाषा से अधिक वरीयता देनी होती है और अध्ययन के दौरान अधिकाँश हिन्दी और क्षेत्रीय भाषीय माध्यम में शिक्षा लेने वालों को काफी कठिनाई का सामना करना होता है जिससे उनके आत्मविश्वास का क्षय होता है| इस प्रक्रिया के कारण विद्यार्थी अपनी नैसर्गिक रचनात्मकता से अधिक वरीयता अंग्रेजी सीखने और बोलने में लगाते हैं और वहीँ यह समय विकसित देशों के विद्यार्थी इस समय को रचनात्मक कार्यों में लगा पाते हैं|

इस प्रकार उपर्युक्त अनेक उदाहरणों के माध्यम से मैंने यह बताने का प्रयत्न किया कि ‘विश्वास’ में बहुत अधिक शक्ति और सामर्थ्य होता है| इसी कारण विदेशी आक्रमणकारी और लुटेरी शक्तियाँ अपनी कुसंस्कृतियों को मानवता, आधुनिकता या वैज्ञानिकता का जामा पहिना कर उनकी ओर हमारा विश्वास पैदा करने में प्रयत्नशील हैं| यह तभी सम्भव होगा जब हम हमारे ‘विश्वास’ और आस्था के केन्द्रों को गलत, पुराना, दकियानूसी, अवैज्ञानिक और अनैतिक मानेंगे| इसी दिशा में अनेक प्रकार से आज भी हर सम्भव प्रयास हो रहे हैं| हमें हमारे ‘विश्वास’ को, अपनी प्राचीन संस्कृति को,अपने पूर्वजों को जान कर, समझ कर, उसके सही इतिहास का ज्ञान प्राप्त कर दृढ़ बनाना होगा और संकल्प लेना होगा कि इसके लिए जो प्रयास आवश्यक हों उन्हें हम करेंगे |

“समस्या दूसरों को अपनाने में नहीं, अपितु खुद को भूलने में है और शकुनियों के छद्मरूप न पहचानने में है|” 

-- Ankur Pathak

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