"आक्रमण" के हथियार बदल गए हैं… (श्रृंखला भाग ३)

Written by रविवार, 05 फरवरी 2017 20:45

किसी भी राष्ट्र,समाज में संस्कृति की मूल संवाहक-संरक्षक "स्त्रियां और बालिकाएं, होती हैं, वह संस्कृति को अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करती हैं। स्त्रियाँ भ्रष्ट, संस्कृति नष्ट, फिर तो राष्ट्र स्वाहा. आंतरिक कमजोर दुश्मन इसलिए स्त्रियों-बच्चो पर मौन और गोपनीय आक्रमण करता है। सदैव सजग रहना ही बचाव है. उनका कोमल मन घुसपैठ कर विजय पाने का आसान रास्ता है… -- "कार्लाइल. 

क्या यह संयोग मात्र है कि मुम्बई फिल्म इंडस्ट्री में सभी जगह पुरुष मुस्लिमों का वर्चस्व है, और उन सभी की पत्नियाँ हिन्दू है? शाहरुख खान की पत्नी गौरी एक हिंदू है। आमिर खान की पत्नियां रीमा दत्ता /किरण राव और सैफ अली खान की पत्नियाँ अमृता सिंह / करीना कपूर दोनों हिंदू हैं। नवाब पटौदी ने भी हिंदू लड़की शर्मीला टैगोर से शादी की थी, फरहान अख्तर की पत्नी अधुना भवानी और फरहान आजमी की पत्नी आयशा टाकिया भी हिंदू हैं। अमृता अरोड़ा की शादी एक मुस्लिम से हुई है जिसका नाम शकील लदाक है। सलमान खान के भाई अरबाज खान की पत्नी मलाइका अरोड़ा हिंदू हैं और उसके छोटे भाई सुहैल खान की पत्नी सीमा सचदेव भी हिंदू हैं। आमिर खान के भतीजे इमरान की हिंदू पत्नी अवंतिका मलिक है। संजय खान के बेटे जायद खान की पत्नी मलिका पारेख है। फिरोज खान के बेटे फरदीन की पत्नी नताशा है। इरफान खान की बीवी का नाम सुतपा सिकदर है। नसरुद्दीन शाह की हिंदू पत्नी रत्ना पाठक हैं। एक समय था जब मुसलमान एक्टर हिंदू नाम रख लेते थे क्योंकि उन्हें डर था कि अगर दर्शकों को उनके मुसलमान होने का पता लग गया तो उनकी फिल्म देखने कोई नहीं आएगा।ऐसे लोगों में सबसे मशहूर नाम युसूफ खान का है जिन्हें दशकों तक हम दिलीप कुमार समझते रहे। महजबीन अलीबख्श मीना कुमारी बन गई, और मुमताज बेगम जहाँ देहलवी मधुबाला बनकर हिंदू ह्रदयों पर राज करतीं रहीं। बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी को हम जॉनी वाकर समझते रहे और हामिद अली खान, विलेन अजित बनकर काम करते रहे। मशहूर अभिनेत्री रीना राय का असली नाम सायरा खान था। जॉन अब्राहम भी दरअसल एक मुस्लिम है जिसका असली नाम फरहान इब्राहिम है। जरा सोचिए कि पिछले 50 साल में ऐसा क्या हुआ है, कि अब ये मुस्लिम कलाकार हिंदू नाम रखने की जरूरत नहीं समझते बल्कि उनका मुस्लिम नाम उनका ब्रांड बन गया है। यह उनकी मेहनत का परिणाम है या हम लोगों के अंदर से कुछ खत्म हो गया है? वे बड़े तरीके से एक्सेप्ट करवाते हैं।यह नार्मल है। सहिष्णुता है। परंतु अपनी स्त्रियों को सात पर्दे में छुपा कर रखते हैं, दू-तरफा तलवार है।

ये आधुनिकता के नाम पर बाजार के माध्यम से आक्रमण है। फ्रेन्डशिप बैन्ड, ग्रीटिंग, चाॅकलेट के गिफ्ट पैक सबने अपना बाजार सेट कर लिया है। फ्रेंडशिप बैड को बाजार में बिकवाने ने वाला जेंडर है करण जौहर..... जिसके बारे में न जाने क्या-क्या प्रसिद्ध है। "कुछ-कुछ होता है, जैसी फिल्म से एक ट्रेन्ड सेट कर दिया.... दोस्ती शब्द का दुरूपयोग। उसने भारत के युवा वर्ग को टारगेट किया ''आधुनिकता” के ड्रामे मे साफ्ट टारगेट खड़ा कर दिया। यह सब पूरी रचना-योजना से हुआ। लव-जेहाद का मैदान पचास साल से तैयार किया जा रहा था।जरा सोचिए!! एक मरियल से हकले को लेकर एक कॉमन जेंडर किस युद्द के मैदान को फतह करवा रहा था। इसका शिकार सबसे अधिक महिलाएँ हुई। आप पता करिये कितने पुराने मुस्लिम अभिनेताओं,कलाकारों कर्मियों की बेटियां फिल्म लाइन में जाने दी? कभी सोचा आपने महान शोमैन राजकपूर जी अपने जीते-जी कपूर खानदान की बेटियों को क्यों नही सिनेमा में काम करने देते थे। अमिताभ बच्चन अपनी बेटी को फिल्मो में क्यों नही ले गए??? बाद के सभी शिकार थे। वामी-सामी-कामी हथकंडा सफल होता गया। फिर जरा सोचिए, कि हम किस तरह की फिल्मों को, और लोगो को बढ़ावा दे रहे हैं? क्या वजह है कि बहुसंख्यक बॉलीवुड फिल्मों में हीरो मुस्लिम लड़का और हीरोइन हिन्दू लड़की होती है? समझ, तथ्य, प्रमाण और आंकड़े क्लियरकट जता रहे हैं कि सब कुछ असहज है, कोई बड़े तरीके से चीजें कंट्रोल कर रहा है। आपकी स्त्रियां-बच्चे निशाने पर हैं.

फिल्म उद्योग का सबसे बड़ा फाइनेंसर दाऊद इब्राहिम, उसके गुर्गो, और हवाला माफियाओं के कंट्रोल में रहा है। वही यह चाहता है। कभी टी-सीरीज के मालिक गुलशन कुमार ने उसकी बात नहीं मानी और नतीजा सबने देखा। राकेश रोशन पर चली गोलियां...और भी तमाम कुछ। वहां एक गड़बड़ झाला काबिज है। आज भी एक फिल्मकार को मुस्लिम हीरो साइन करते ही दुबई से आसान शर्तों पर कर्ज मिल जाता है। इकबाल मिर्ची और अनीस इब्राहिम जैसे आतंकी एजेंट सात सितारा होटलों में खुलेआम मीटिंग करते देखे जा सकते हैं। सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान, सैफ अली खान, नसीरुद्दीन शाह, फरहान अख्तर, नवाजुद्दीन सिद्दीकी,फवाद खान जैसे अनेक नाम हिंदी फिल्मों के सफलता की गारंटी इमेज में ढाल दिए गए हैं। अक्षय कुमार, अजय देवगन और ऋतिक रोशन जैसे फिल्मकार इन दरिंदों की आंख के कांटे हैं। उनकी फिल्मों के रिलीजिग के वक्त जरा मुस्लिम समुदाय के रिएक्शन पर गौर फरमाये बहुत कुछ समझ जाएंगे। तब्बू, हुमा कुरैशी, सोहा अली खान और जरीन खान जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों का कैरियर जबरन खत्म कर दिया गया। क्या एक साथ उनका कैरियर खत्म हो जाना संयोग है?? अगर आप यह समझ रहे तो फिर आप जरूरत से ज्यादा भोले हैं.....साफ़-साफ़ समझिये वे मुस्लिम हैं और इस्लामी जगत को उनका काम गैर मजहबी लगता है। फिल्मों की कहानियां लिखने का काम भी सलीम खान और जावेद अख्तर जैसे मुस्लिम लेखकों के इर्द-गिर्द ही रहा है। आप जानकर स्तब्ध रह जाएंगे की अधिकाँश स्क्रिप्ट राइटर या तो कम्युनिष्ट है या मुस्लिम। वे आतंकियों, माफियों, गुंडों, देशद्रोहियों को लॉजिकल बना कर आपके सामने लाते हैं। वे कम्पनी, माफिया, फिजा जैसी फिल्म बनाकर अपराधियो को नायक इम्पोज करते हैं। सूची बनाइये खुद साफ़ दिखने लगेगा।

आप "माई नेम इज खान,, बनाने के पीछे की मानसिकता समझिये। वे हॉलीवुड की मेगा-हिट 'मोमेंटो, जैसी फिल्मो की चोरी भी 'गजनी, बनाकर गजनवी की क्रूरता भुलवाते हैं। वे 'फिजा, फना, बनाते हैं आतंकियों को जस्टिफाई करने के लिए। औरँगेजेब बनाते हैं उसकी स्वीकार्यता बढाने के लिये। अपने नवजातों का नाम "तैमूर, रखते हैं आपकी जख्मो को कुरेदने के लिए। क्रूरता को एक्सेप्ट कराने के लिए। कला के नाम पर कोई 'फ़िदा हुसैन, माँ सरस्वती का अश्लील चित्र बनाता है। लिस्टिंग करिये एक लाख से ऊपर ऐसे आक्रमण दिखेंगे। अभिव्यक्ति के नाम पर कोई भी देवी-देवताओं का मजाक उडाता है। गौर से देखिये.. यह वही है जो कभी सेना लेकर बुतशिकन करने हिंदुस्तान आता था। हजारो टूटे मंदिर, लुटे घर द्वार, मारे गए लोग, उठाकर ले जाई जाती औरतें थीं... सिरों की मीनार अब बहरूपिया बनकर आये हैं। तर्ज बदल गया है। उन्हें पहचानना सीखिए... हथियार बदल गए हैं। देश के बंटवारे के बाद यह कोई सहज सी घट रही घटनाये नही है। न ही गंगा-जमुनी जैसा बहकावा, बल्कि हमले का ही दूसरा प्रकार है। जिनकी कहानियों में एक भला-ईमानदार मुसलमान, एक पाखंडी ब्राह्मण, एक अत्याचारी - बलात्कारी क्षत्रिय, एक कालाबाजारी वैश्य, एक राष्ट्रद्रोही नेता, एक भ्रष्ट पुलिस अफसर और एक गरीब दलित महिला होना अनिवार्य शर्त है। इस तरह की कुछ फिक्स सी चीजें भी हैं। इन फिल्मों के गीतकार और संगीतकार भी मुस्लिम हों तभी तो एक गाना मौला के नाम का बनेगा और जिसे गाने वाला पाकिस्तान से आना जरूरी है। अंडरवर्ड के इन हरामखोरों की असिलियत को पहचानो और हिन्दू समाज को संगठित करो, तब ही तुम तुम्हारे धर्म की रक्षा कर पाओगे।

चाणक्य का एक कथन याद है न? “सब कुछ छोड़कर, सबसे पहले कुल और स्त्रियों को बचाओ”... यदि इन्हें आप केवल अभिनेता (निर्माता-निदेशक, हीरो, कलाकार) समझ रहे है तो बुध्दि की बलिहारी है। आप सावधान हो जाये वरना वे आप के बची-खुची सभ्यता को निगल जायेगे। वह सब के सब अल-तकैया कर रहे हैं। अपनी बहन-बेटियां बचाओ। अब युद्द मैदानों में नही लड़े जाते, न ही अब सीधे मंदिर तोड़े जाते हैं। वे औरते छीनने और बच्चो को गुलाम बनाने का कोई न कोई तरीका निकाल ही लेते हैं। अब फिल्मे इस युद्द का नया बेजोड़ हथियार है। तुम्हारी बेटियाँ-बहन, बच्चो को बर्बाद करने का हथियार। नही सम्हले, तो आने वाली पीढियां आप को कायर डरपोक तो कहेंगी ही साथ में महा नासमझ-मूर्ख भी कहेंगी, कि सब कुछ जानते हूए भी आप ने उन को आपने घर में घुसने दिया। बचाने छोड़ने का रास्ता क्यों नही अपनाया। झूठ के हथकंडे खत्म करने होंगे...

अगला आक्रमण है... “सांस्कृतिक आक्रमण”

कभी आपने सोचा है, पेड़-पौधे अपने बाल-बच्चे कैसे पैदा करते हैं? उनका मिलन कैसे होता है? कीट तो जानते हैं न? अरे वही भिनभिनाते भौरे, गौबड़उरे, तितलिया, भाँती-भाँती की मक्खीया, मधुमखिया, चींटी... रेगने वाले कीड़े आदि-आदि। कीटो का काम है पौधो और पेड़ो के फूलो से पराग उठाकर दूसरे पौधो की फूलो पर पहुंचा देना। इसे पर-परागण कहते हैं। इसी तरह उनका निषेचन होता है। मतलब कि "मिलन, सेक्स प्रासेस और फिर बीज तैयार हो जाता है। उस बीज से अंकुरित होकर नया पौधा बनता है। फसलों का बीजीकरण इससे ही होता है। हमारा अन्न-दाना-भोजन उसी भी ऐसे ही तैयार होता है। कई पक्षी-जन्तु-पशु भी इसमे सहयोग करते है। लेकिन मुख्य भूमिका कीट-पतंगो की ही होती है। यही जैविक चक्र है। यही प्रक्रिया अरबों साल से चल रही है। हमे पता भी नही चलता, कि लाखो की संख्या और प्रकार वाले कीट-पतंगो के कारण हमारे जीवन चल रहा है। वे नष्ट हो गए, तो फसल खत्म, पेड़-पौधे समाप्त। यह तो पता ही होगा की पेड़-पौधे ही वर्षा बुलाते हैं। “नद्यो वर्षन्ति पर्जन्या:” .... कीट-पतंगे खत्म तो वर्षा का आकर्षण तबाह, पर्यावरण-चक्र भी खत्म हो जाएगा... जगह मरुस्थल मे बदल जाएगी... और हमे भागना पड़ेगा दूसरे जगह जहां पेड़-पौधे मौजूद हो. एक विशिष्ट प्रकार के कीट-पतंगे "टिड्डी दलो, के बारें सुना है न?.... वे बड़ी मात्रा मे एक साथ आती है.... खरबो की संख्या मे... जिधर जाती है... सारे पेड़ो-फसलों-पौधो की पत्तियों को खा जाती थी.. ठूंठ मे बदल देती है। स्थानीय कीटो को भी मार देती,है। जो छुपे होते है बिना खाये-पीए मर जाते हैं। कहते है हजारो साल पहले उनका आक्रमण दुनियां की सभी प्रजातियों के इतिहास में सबसे बड़ा हमला माना जाता था। कई हजार साल पहले दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान "सहारा,...उन्होने ही तैयार किया था। वैज्ञानिक लोग भारतीय रेगिस्तान "थार” के बारे मे भी यही कहते हैं। सरस्वती नदी को लुप्त करने मे उन छोटे-छोटे कीटो का योगदान माना जाता है। बाद मे उस प्रजाति के टिड्डे खुद भी काल-कवलित हो गए।

कुछ साल पहले दुनियाँ के सभी देश इन "टिड्डी दलो,,की बड़ी संख्या और हमलो से बहुत परेशान थी।फिर सभी सरकारो ने मिलकर अभियान चलाया हवाई-जहाजो से कीटनाशको का छिड़काव करके उन्हे लगभग समाप्त कर दिया...अब वे बड़ा खतरा नही है। यही उपाय है। इधर सरकार बहुत परेशान हैं। कृषि विभाग की एक वैज्ञानिक समिति की रिपोर्ट है की इधर इटैलियन मधुमखियों को शहद के लिए लोग बड़ी मात्रा मे पाल रहे हैं। यह मक्खीया ज्यादा शहद बनाती हैं। पर इनकी एक विशेषता है यह जिन इलाको मे जाती हैं बाकी के कीटो को मार देती है। समिति का कहना है उनकी प्रजनन क्षमता बाकी के कीटो और देशी मधुम्क्खियों से कई गुना ज्यादा है। यदि दस साल भी लगातार पल गई तो स्थानीय कीटो को पूरी तरह साफ कर देंगी। प्राकृतिक नियम है जब एक ही प्रजाति बचती है तो जलदी ही वह भी खत्म हो जाती है। कीट-पतंगे खत्म तो प्रकृति चक्र भी खत्म। पशु-पक्षी-मनुष्य सभी को भागना पड़ेगा.. एक बड़ा सा रेगिस्तान तैयार।,...करो लालच... खाओ ज्यादा शहद!

सबसे मजेदार बात सुनिए..इन्हे कुछ कीट वैज्ञानिको ने बताया है....बाहरी आक्रमणकारी कीट स्थानीय कीटो के रंग में कभी भी और बिलकुल ही नही रंगता बल्कि स्थानीय और देशी कीट जो की पर्यावरण चला रहे होते हैं.....जो “रीयल-ड्राइवर” के नाम से जाने जाते हैं... ''वे लपक कर नए कीटो का स्वागत करती हैं। वह उन्हे भी अपने जैसा ही समझने का भूल कर बैठती हैं, नए कीट पर्यावरण समझने के लिए शुरुआत मे उन्हे झांसे मे रखती हैं... फिर कुछ देर बाद अपने आर्गनाइज्ड ढांचे के साथ अटैक करके नष्ट कर देती हैं। स्थानीय कीट जान भी नही पाती कि, यह क्यो और कैसे हुआ? बचपन में हम प्रो.हक (नाम बदल दिया है) के यहां जाते थे। सातो बेटे, दोनों बेटियां “ए-क्लास” सर्विसेज में हैं। अति आधुनिक फैमिली थी/है। उनका सबसे छोटा बेटा मेरा दोस्त है। वे सब के सब अपनी-मम्मियों को अम्मी-जान और अपने पापा को अब्बा ही कहते हैं। पता करिये बड़े-बड़े मुस्लिम फ़िल्मी हीरोइन-हीरो क्या कहते हैं! जानेंगे तो आँख फटी रह जायेगी। लेकिन इस बंटे भारतवर्ष में आप बप्पा-माई कहकर "पिछड़ा, फील करने लगते हैं। वामी/सामी तुरन्त बोलेंगे। क्या फरक पड़ता है "उच्चारण/सम्बोधन में क्या रखा है, यह तुम्हारी संस्कृति तो बड़ी सहिष्णु रही है, लिबर्टी... लचीलापन... उदार है... अनेकत्व में एकत्व वाली.. और इन्हीं मुगालतो मे रखकर तुम्हे खा जाते हैं। ..धीरे-धीरे सारा बदलाव किसके लिए है सनातनियो के लिए?? उनके शिकार हम है जो माँ-माई से होकर अम्मा और मम्मी, पिताजी को बप्पा, बाऊ जी से होते हुए पापा/डैडी सम्बोधन पर आ जाते हैं.।...यदि इस मानव-जगत का सबसे नजदीकी- भावनातमक- संवेदनात्मक शब्द ''माँ” को बदला जा सकता है, किसी को भनक लगे बगैर तो सब कुछ संभव है। भाषा, नाम, खान-पान, वेश-भूषा, पहनावा, जीवन चर्या, रहन-सहन, उच्चारण, लहजे, रोना-सोना, हंसना, सोच! आपके अवचेतन के उस हिस्से को बदला जा रहा है...जो इस राष्ट्रात्मा से उपजे है। उसकी पारिस्थितकी से उपजे है। संगठित कीटो के हमले और हथियार देखिये। अब भैया “ब्रो” में बदल रहा है, दीदी 'सिस, पापा 'पा,.. मम्मी 'ममा,से होते हुए 'मी,की तरफ बढ़ रही है।.....खुद लिस्टिंग करो लकी, पिंकी, चुकी.. स्वीटी... डागी,.. बाक्सर.. जूली....टामी... कुत्ते-बिल्लियो पालतू जानवरो से आदमी मे बदल गए... और माडर्न होने की पहचान हो गए। परन्तु ध्यान देने लायक तथ्य है, इसाई ने अपने नजदीकी "सम्बोधन, नही बदले, मुस्लिम ने नही बदला... केवल तुम्ही अपने सम्बोधन, बदल कर माडर्न बन रहे हो. आप के बाप-दादो का सम्बोधन खुद "अटपटा, लगने लगा! आपने गौर किया होगा की इन सालो में आप किसी को भी नाम के साथ भाई संबोधन करने लगे हैं। पवन भाई, सुनील भाई, महेश भाई... अपने से 20 साल बड़े व्यक्ति को भी आनन्द भाई?? यह 'भाई, शब्द अपने जीवन में कहां से घुस आया। बजाय सम्मानजनक संबोधन, या श्रीमान जी अथवा सर कहने की जगह। पचास साल पहले यह किसी भी किताब में नही दिखता। बेसिकली यही एक प्रकार का आंतरिक आक्रमण है।उसमे एक अजीब सी 'बू,आती है घुसपैठ की।

उसने गुंडागर्दी, गंगबाजी, गिरोहबाजी वाले आचरण को, भाईगिरी को सामान्य-तौर से एक्सेप्ट करवाना शुरू कर दिया। इसने व्यवहार में भी आप के अंदर बदलाव ला दिया है। यह बदलाव सामाजिक भी है सांस्कृतिक बदलाव भी है। आपको दूसरे को "भाई, कहते-कहते उस अपराधी-प्रव्रत्ति का उदय होने लगता है। एक ऐसा शब्द लगता है जिसे भाई-भाई कहते हुए 'मर्डर, करना है,गला घोटना है, धोखा देना है, भले ही अन्य संस्कारो की वजह से वह भाव दबा देने में आप सफल हो जाते हैं...पर शब्द की मर्यादा तो खत्म ही हो गई। उसको बराबऱीवाद नही कहा जा सकता है, यह केवल युग-युगीन आपसी सामंजस्य बिगाड़ देने का हथियार है। अपमानवाद है, अपराध वाद। मैं अपने मित्रों से कहता हूं, भैया कहो, सर कहो, जी कहो, मित्र कहो, पवन कहो,..तू कहो... पर 'पवन भाई मत कहो। ऐसा लगता है मैं किसी गुंडे का शागिर्द हूँ। यह पवित्र शब्द मजहबी भेंट चढ़ गया। ये कैसे हुआ?? यह तो एक उदाहरण के लिए था। एक बानगी मात्र है। आप भी लिस्टिंग करिये हजारो चीजे मिलेंगी, हर फील्ड और व्यवहार में जो बड़ी चतुराई और शार्प निशाने से जड़-मूल सहित तबाह कर दी गईं और आप जान भी नही पाएं। मैं '"शब्द, के सही गलत पर नही जा रहा... ''शब्दो से केवल भावनाये और पवित्रता ही नही 'संस्कृति और सोच बदल जाती है, वह भी बिना बताये... बाहरी कीट-दुश्मन कीट छोटे-देशी कीट को खा रहा है रेगिस्तान बन जाने का खतरा.... सुमेरिया, असीरिया... बेबीलोनिया का समझे हथियार और कीट पहचानिए..। अब आक्रमण के हथियार तीर-धनुष, तलवार, तोप, बन्दूक, मिसाइल और बारूद नही कुछ और होते हैं उन्हें बड़े गौर से पहचानना होगा। नही तो बिना लड़े हार जाएंगे और आपके बाप दादो की थाती नष्ट कर दी जायेगी।

महज 12 सौ सालो मे आपसे 14 देशो की जमीन छिनते-छिनते अफगानिस्तान छिना, पाकिस्तान बना, बांग्लादेश बदला, काश्मीर, बंगाल, केरला, पूर्वी भारत के कुछ हिस्से भी अलगाववाद की स्थिति में हैं। कांटते-बांटते.... आप सम्पूर्ण धरती पर एक एक देश हिंदुस्तान मे ही बचे हैं। बहुत साफ़-साफ़ समझिये ""हिन्दू घटा देश बंटा,आप कटे.. किसने छीना? कौन छीन रहा है? भाग कर जाने के लिए आपके पास दुनिया की कोई धरती नही बची है। कोई माने या न माने कम से कम मैं तो यही मानता हूं मजहब के नाम पर देश बंटने के बाद यह बची भूमि 'हिंदूराष्ट्र,, ही है। हिन्दू जीवन पद्धति का राष्ट्र, प्राकृतिक लोकतंत्रवादियो का राष्ट्र,। समग्र स्वतंत्रतावादियो का राष्ट्र। हजारो पूजा पद्धतियों को मानने की स्वतंत्रता देने वाली हिंदुत्व का राष्ट्र । और विश्वास मानिये ऐसा राष्ट्र सम्पूर्ण ब्रम्हांड में दूसरा नही, फिर तत्कालीन संविधान, अंग्रेजी पार्लियामेंट, कानून और भारत भूमि से मजहबी आधार पर अलग होने वाली कौम और सभी बाँटने वाले नेताओं ने यह मानकर ही बंटवारा स्वीकारा था। कम से कम इस बची हुई हिन्दुभूमि के लोग अपनी हजारो साल पुरानी संस्कृति के साथ चैन से जी सकेंगे। सेकुलरिज्म केवल डिजाइन होती है। फैब्रिकेशन मात्र। वर्तमान शासन व्यवस्था के अलावा कुछ नही होता वह। शायद ही कोई एकाध उदाहरण हो कोई मुस्लिम या ईसाई बाहुल्य देश का संविधान किसी अन्य संप्रदाय को अलग से कानून मानने या बाहरी को राष्ट्राध्यक्ष बनने की अनुमति देता है।

संवैधानिक तौर पर तो पाकिस्तान और सभी इसाईं देश भी खुद को सेकुलर कहते है। लेकिन सुना है कि किसी अन्य कौम का मजहब का व्यक्ति उनका प्रधान बन सका?? लिबर्टीपना... लचीलापन... उदारपना.. अनेकता में एकता... विभिन्नता,.जातीयता सब ऊपर से थोपी हुई चीजे है। उनका शासन पर कब्जा होना, कार्पोरल जगत मे पैठ, कोर्ष, साहित्य, कला, मीडिया, फिल्म, और नौकरशाही द्वारा इंपोज कर दी गई है, प्रशासकीय हथकंडे केवल कमजोर बनाने के लिए है। वह एक रणनीतिक हिस्शा है। दिमाग के उस अवचेतन पर कब्जा जो आपको गुलाम मे बदल देता है।इसी साजिशन वे आपसे टुकड़ो में बात करते हैं। जाति में बात करते हैं। आक्रमण के समय वे 'हिन्दू,ही देखते हैं। का समझे?? "गंगा-जमुनी, नाम की कोई चीज नही होती। वह टिड्डी-दलो की बाढ़ है जो सब कुछ उड़ा ले जाती है... जो सरस्वती सुखा देती है और फिर गंगा की ताक मे है। वे खुद क्यों नही सोचते क्या फरक पड़ता है? इस रास्ट्र, जन, भूमि, संस्कृति, पारिस्थितिकी तंत्र के हिसाब बदलाव लाये न क्या फरक पड़ता है? गंगा-जमुना-सरस्वती को तबाह करने वाले हथियार पहचानिए

-- पवन त्रिपाठी...

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