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गणेशोत्सव से लोकमान्य बाहर : जातिवाद और डरपोक भाजपा

Written by शनिवार, 12 अगस्त 2017 20:18

गणेशोत्सव जैसा ऊर्जावान और रंगीला त्यौहार बस कुछ ही दिनों दूर है. हम लोगों ने बचपन से अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़ा है कि अमर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अर्थात बाल गंगाधर लोकमान्य तिलक जी ने अंग्रजों से मुकाबला करने हेतु देश की जनता को एकत्रित करने के उद्देश्य से गणेशोत्सव को “सार्वजनिक” बनाने की पहल की और सबसे पहले 1893 में पुणे में तिलक ने दस दिवसीय गणेशोत्सव मनाने की शुरुआत की.

ज़ाहिर है कि गणेशोत्सव के धार्मिक स्वरूप का उपयोग करके इसका उद्देश्य अंग्रेजों के खिलाफ जनमत बनाना था. इस वर्ष उस गणेशोत्सव को 125 वर्ष पूरे हो रहे हैं. इस अवसर पर पुणे महानगरपालिका द्वारा इसकी 125वीं जयन्ती महाराष्ट्र में धूमधाम से मनाने की तैयारी चल रही है.

स्वाभाविक सी बात है कि जब इतने बड़े स्तर पर तैयारियाँ चल रही हैं, खुद मुख्यमंत्री इसमें रूचि दिखा रहे हैं, अवसर भी ऐतिहासिक है ही... तो इस महोत्सव की स्मारिकाएँ छपेंगी, एक आधिकारिक प्रतीक चिन्ह (लोगो) भी डिजाईन किया जाएगा और लोकमान्य तिलक जिन्हें पूरा देश नमन करता है, उनके सम्मान में कई कार्यक्रम आयोजित होंगे. परन्तु आप जितना सोच रहे हैं, यह उतना आसान भी नहीं है. इस महोत्सव के शुरू होने से पहले ही “खीर में नींबू” पड़ गया है और माहौल खराब किया जा चुका है. जिसके जिम्मेदार दोनों ही पक्ष हैं... यह कैसे और क्यों हुआ... इस बारे में आगे आप पढेंगे ही.

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पुणे के सार्वजनिक गणेशोत्सव मण्डल की भीड़ में कुछ गणेशोत्सव मण्डल ऐसे भी हैं जो अति-प्राचीन माने जाते हैं, उनका मान-सम्मान, रुतबा और उन्हें प्राथमिकता दिए जाने की पुरानी परंपरा रही है. ऐसे ही एक सबसे पुराने गणेशोत्सव मण्डल का नाम है “भाऊ रंगारी गणेशोत्सव मण्डल”. स्थापना से लेकर विसर्जन जुलूस तक के जो भी प्राथमिकता से दिए जाने वाले मान-सम्मान हैं, वे इस मण्डल को प्राप्त होते हैं. चूँकि यह वर्ष 125वीं जयन्ती मनाए जाने को लेकर है, तो इस भाऊ रंगारी मण्डल ने सबसे पहले यह आपत्ति दर्ज की, कि लोकमान्य तिलक ने पुणे का यह सार्वजनिक गणेशोत्सव “सबसे पहले” शुरू नहीं किया था, बल्कि हमने किया था. भाऊ रंगारी मण्डल का दावा है कि 1892 में उन्होंने सबसे पहले सार्वजनिक गणेशोत्सव मनाया था, तिलक ने तो बाद में अगले वर्ष 1893 में उसे लोकप्रिय बनाया. इसलिए इस 125 वें गणेशोत्सव का “क्रेडिट” तिलक जी को नहीं बल्कि भाऊ रंगारी मित्रमंडल को मिलना चाहिए. ज़ाहिर है कि जब बात क्रेडिट लेने की निकली, तो भाऊ रंगारी मण्डल वाले इस बात पर अड़ गए कि इस भव्य समारोह के लिए बनाए जाने वाले लोगो (प्रतीक चिन्ह) और झण्डे से लोकमान्य तिलक का चित्र हटाकर भाऊ रंगारी का चित्र लगाया जाए, क्योंकि उनके अनुसार गणेशोत्सव तो उन्होंने शुरू किया था... (ये बात और है कि इस मण्डल ने पिछले वर्ष, अर्थात उनके दावे के मुताबिक़ 125 वें वर्ष के समय ऐसा कोई दावा नहीं किया था).

पुणे महानगरपालिका में इस वर्ष भाजपा का कब्ज़ा हुआ है. वर्तमान में पुणे से भाजपा के सांसद हैं. भाजपा के आठ विधायक हैं... भाजपा के ही 98 पार्षद भी हैं... और तो और पुणे की महापौर अर्थात मुक्ता तिलक (लोकमान्य तिलक के प्रपौत्र शैलेष तिलक की पत्नी) भी हैं. भाजपा के पास इतनी सारी सत्ता, इतनी सारी शक्ति एवं इतना जबरदस्त जनसमर्थन होते हुए भी वह हुआ, जो कि कांग्रेस के शासनकाल में भी नहीं हुआ था... अर्थात बाल गंगाधर तिलक का अपमान. जी हाँ!!! भाऊ रंगारी मण्डल के “दबाव” में आते हुए पुणे महानगरपालिका ने यह निश्चय किया कि इस वर्ष होने वाले विराट गणेशोत्सव के इस सरकारी आयोजन हेतु बनाए जाने वाले प्रतीक चिन्ह से तिलक का चित्र निकाल दिया जाएगा. महापौर मुक्ता तिलक ने अपने बयान में कहा, “मुझे यह निर्णय लेते हुए बहुत दुःख हो रहा है, परन्तु हमें तिलक जी का फोटो प्रतीक चिन्ह एवं ध्वज से हटाना ही होगा, ताकि समाज में सहिष्णुता, सौजन्यता एवं समन्वय बरकरार रहे... हम चाहते हैं कि यह ऐतिहासिक समारोह बिना किसी विवाद एवं कटुता के साथ संपन्न हो...”. इस प्रकार अब इस समारोह के लिए जो ध्वज बनेगा उसमें केवल भगवान गणेशजी का चित्र होगा और यही ध्वज पुणे के प्रसिद्ध “शनिवार वाड़ा” पर फहराया जाएगा. मैं जानता हूँ, कि तिलक जी की प्रपौत्र बहू अर्थात महापौर के इस बयान को पढ़कर आप चौंके होंगे, चकराए भी होंगे... कि आखिर समाज की सहिष्णुता, सौजन्यता और समन्वय का, इस शानदार और ऐतिहासिक समारोह के प्रतीक चिन्ह और ध्वज से तिलक जी तस्वीर का क्या सम्बन्ध है?? जी... सम्बन्ध है... बिलकुल है... और गहरा सम्बन्ध है...

असल में पिछले कुछ वर्षों से महाराष्ट्र में जातीय राजनीति, जातिवाद एवं ब्राह्मणों के खिलाफ ज़हर उगलने और द्वेष फैलाने का काम जोरशोर से जारी है. ब्राह्मणों से जितनी घृणा तमिलनाडु और यूपी-बिहार में की जाती है, उससे भी अधिक घृणा का माहौल महाराष्ट्र में है. संभाजी ब्रिगेड नामक एक जहरीली संस्था है, जो इस दुष्प्रचार की सर्वेसर्वा है. बाकी दूसरे तमाम असली-नकली चर्च पोषित NGO, तथा मूलनिवासी आन्दोलन के नाम पर चल रहे ब्राह्मण विरोधी नफरत भरे घृणा अभियान भी साथ में हैं. इन सभी संगठनों को पीछे से “नैतिक समर्थन” देने वाली ओवैसी की AIMIM पार्टी भी है, जिसने अपने जबरदस्त घृणा अभियान के जरिये औरंगाबाद नगरपालिका में काफी सीटें हासिल कीं. कहने का मतलब ये है कि ऐसे तमाम ब्राह्मण विरोधी विषैले संगठन नीचता की किसी भी हद तक जा सकते हैं और उसी कड़ी में भाऊ रंगारी मण्डल में घुसे बैठे कुछ “विशिष्ट तत्वों” ने यह आग सुलगाई और सफलतापूर्वक भाजपा सरकार तथा भाजपा महानगरपालिका को अपने जूतों तले दबाकर, लोकमान्य तिलक का चित्र हटवाने में सफलता प्राप्त की... क्योंकि लोकमान्य तिलक एक चितपावन ब्राह्मण हैं.

महाराष्ट्र में कई वर्षों के बाद नरेंद्र मोदी की सहमति से एक ब्राह्मण, अर्थात देवेन्द्र फडनवीस को मुख्यमंत्री बनाया गया... फडनवीस के बाकी काम भले ही कोई ख़ास न हों, परन्तु सूखे से प्रभावित मराठवाड़ा और अन्य क्षेत्रों में उनके द्वारा चलाए गए “जलयुक्त शिवार” को जबरदस्त लोकप्रियता मिली. इसके बाद किसी ने सोचा भी न था, ऐसी सफलता पुणे महानगरपालिका में भाजपा को मिली और वहाँ भी एक “ब्राह्मण महापौर” पदस्थ हुईं. स्वाभाविक है कि समाज में ज़हर बो रहे ब्राह्मण विरोधी संगठनों को यह रास नहीं आ रहा. इन संगठनों के निशाने पर अर्थात इनके द्वारा बाँटे जा रहे “कूडात्मक साहित्य” में महाराष्ट्र की संत परंपरा के महान संत अर्थात ज्ञानेश्वर पर भी निशाना साधा जाता है... क्योंकि वे ब्राह्मण हैं. इन लोगों के द्वारा शिवाजी महाराज के गुरु अर्थात समर्थ स्वामी रामदास जी पर भी उँगलियाँ उठाई जाती हैं, क्योंकि वे भी ब्राह्मण थे... अब लोकमान्य तिलक का नंबर आया है... अभी तिलक जी को प्रतीक चिन्ह और झण्डे से निकाल बाहर करने की कवायद की गयी है, हो सकता है संभाजी ब्रिगेड द्वारा इनके खिलाफ कोई और ज़हर भरा अभियान भी छेड़ा जाए. बहरहाल... सच्चाई यही है.

tilak

भगवान के लिए मुझसे यह मत पूछिए कि “भाजपा” इस दबाव के आगे कैसे और क्यों झुकी?? क्या भाजपा में इतनी भी नैतिकता और हिम्मत नहीं बची कि वह एक गैर-वाजिब माँग के सामने तनकर खड़ी हो सके?? केंद्र-प्रदेश और महानगरपालिका में पूर्ण बहुमत से जो सत्ता मिली है, क्या वह “जातिवादी ताकतों” के आगे झुकने हेतु मिली है?? क्या भाजपा इतनी नीचे गिर गयी है कि गैर-ब्राह्मण वोटबैंक नाराज न हो जाए, अथवा गणेशोत्सव निर्विघ्न सम्पन्न हो जाए इसलिए लोकमान्य तिलक जैसी हस्ती का अपमान चुपचाप सह जाए?? पुणे की जनता हैरान, निराश और हताश है... अपने इतिहास एवं गौरवशाली अतीत को सिर-आँखों पर रखने वाले पुणे के सांस्कृतिक लोग भाजपा के इस “दब्बू रवैये” से हैरान हैं.

इस बीच भाऊ रंगारी गणेशोत्सव मण्डल ने तय किया है कि वे आगामी रविवार को इस निर्णय के खिलाफ काली पट्टी बांधकर शनिवार वाड़ा तक एक विरोध रैली निकालेंगे और सरकार से माँग करेंगे कि इस गणेशोत्सव को 126 वां गणेशोत्सव घोषित करके भाऊ रंगारी मण्डल को इसका पूर्ण “क्रेडिट” देने की कार्यवाही करें. भाऊ रंगारी मण्डल ने यह धमकी भी दी है कि वे अगले सप्ताह इस मामले को कोर्ट में ले जाएँगे, और अपना “अधिकार”(??) हासिल करके रहेंगे.... देखिये आगे-आगे क्या होता है... 

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