तीन तलाक, हलाला मामले में संवैधानिक बेंच गठित होगी

Written by शुक्रवार, 17 फरवरी 2017 07:50

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं की सैकड़ों याचिकाओं को देखते हुए जल्दी ही तीन तलाक, हलाला, शरीयत कोर्ट और बहुविवाह जैसे मामलों के संवैधानिक पहलुओं को देखने और इन पर दिशानिर्देश जारी करने के लिए पाँच जजों की एक संवैधानिक पीठ गठित की जाएगी.

जस्टिस खेहर ने इन मामलों पर बढ़ती चिंताओं तथा मुस्लिम महिलाओं की मुखर होती आवाज़ के मद्देनज़र सभी प्रमुख बिन्दुओं की सूची बनाने एवं इन पर विचार करने के लिए तीस मार्च तक का समय दिया है. इस संवैधानिक पीठ में जस्टिस एनवी रामन्ना, डीवी चंद्रचूड भी रहेंगे. दोनों ही न्यायाधीशों ने कहा है कि ये सभी मामले बेहद गंभीर हैं और मुस्लिम महिलाओं की सैकड़ों याचिकाओं को यूँ ही खारिज नहीं किया जा सकता.

ज्ञातव्य है कि मोदी सरकार की इस पहल का मुस्लिम महिलाओं ने जोरदार ढंग से स्वागत किया है. यूपी के चुनावों में भी तीन तलाक़ और हलाला का मुद्दा छाया रहा है तथा कांग्रेस सहित अन्य सभी पार्टियों की स्थिति इस मुद्दे पर “साँप-छछूंदर” जैसी हो गई है, कि न उन्हें निगलते बन रहा है और ना ही उगलते. क्योंकि यदि कांग्रेस-वामपंथी जैसे दल इस मुद्दे का समर्थन करते हैं तो इसे नरेंद्र मोदी की जीत माना जाएगा, और यदि विरोध करते हैं तो इन पार्टियों को “मुल्लावाद” के हाथों में खेलने का आरोप चस्पा होता है.

कांग्रेस-वामपंथ-तृणमूल जैसी पार्टियों की मुश्किल बढाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी राजनैतिक दलों से इन मुद्दों पर उनकी लिखित राय माँगी है. तीन तलाक, हलाला जैसे मुद्दों पर पार्टियों की राय पंद्रह पृष्ठ से अधिक की नहीं होनी चाहिए. एक मुस्लिम महिला वकील ने कुख्यात शाहबानो मामले का उदाहरण देते हुए कहा है कि पिछले चालीस वर्षों से हम ऐसी याचिकाओं पर जूझ रहे हैं, लेकिन अभी तक मुस्लिम महिलाओं को न्याय नहीं मिल पा रहा. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि तीस मार्च के बाद यह बेंच तीन तलाक और हलाला सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण और लम्बे समय से लंबित मामलों की सुनवाई शनिवार-रविवार को भी करेगी, ताकि जल्दी न्याय हो. जैसा कि सभी जानते हैं, “हलाला” की प्रक्रिया तीन तलाक से भी ज्यादा अपमानजनक है, सर्वाधिक शिकायतें तीन तलाक और हलाला को लेकर ही हैं. सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा है कि सभी राजनैतिक पार्टियां इस पर अपना रुख स्पष्ट करें, उसके बाद इसे कानूनी अंतिम रूप दिया जाएगा. बड़े नामी वकीलों को भी उनके मुस्लिम महिला पक्षकारों सहित इन सभी मुद्दों पर उनका व्यक्तिगत पक्ष रखने की छूट दी गई है. खेहर ने कहा कि शरीयत कोर्ट की निगरानी आवश्यक है, जरूरी नहीं है कि उसके प्रत्येक फैसले से मुस्लिम महिला की सहमति हो, इसलिए अंतिम निर्णय भारत के संविधान के अनुसार होगा.

इधर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तथा जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द ने कहा है कि तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट का दखल उन्हें नामंजूर है. उन्होंने कहा कि इस्लाम में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी, जबकि मुस्लिम महिलाओं के संगठन का आरोप है कि इन इस्लामी कानूनों, उनकी मनमानी व्याख्या और शरीयत कोर्ट में अक्षम मौलवियों के कारण उनका जीवन तबाह हुआ जा रहा है.
देखना यह है कि “सेकुलरिज्म” का राग अलापने वाले राजनैतिक दल इस मुद्दे पर लिखित में क्या बयान देते हैं, क्योंकि यदि वे सुप्रीम कोर्ट को धोखा देने अथवा मुल्लावाद के पक्ष में खड़े होते हैं तो यह साफ़ तौर पर संविधान निर्माता बाबासाहब आंबेडकर का अपमान ही होगा. सभी राजनैतिक दलों को अपनी सेकुलर राजनीति से ऊपर उठकर मुस्लिम महिलाओं के हित में सोचना ही होगा, क्योंकि हिन्दुओं के भी कई क़ानून संविधान की मंशा के अनुरूप बदले जा चुके हैं, तो कुछ इस्लामी कानूनों को बदलने में क्या हर्ज है?

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