विरासत-धरोहर संरक्षण क़ानून : विसंगतियाँ और कमज़ोरी

Written by शनिवार, 23 दिसम्बर 2017 07:44

भारतीय संस्कृति में मंदिरों, कलाकृतियों, मूर्तियों, पेंटिंग्स अथवा भित्तिचित्र (Ancient Indian Architecture) का बहुत महत्त्व है. एक से बढ़कर एक प्राचीन कलाकृतियां एवं मूर्तियाँ भारत में चारों तरफ बिखरी पड़ी हैं.

इन्हीं बेशकीमती मूर्तियों और कलाकृतियों को तस्कर अवैध रूप से बाहर ले जाकर मनचाहे दामों में बेचते हैं. बहुमूल्य धरोहरों (Indian Heritage) के शौकीनों एवं विदेशी संग्रहालयों को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि यह मूर्ति यहाँ तक पहुँची कैसे? इसीलिए विश्व के लगभग सभी देशों ने अपनी-अपनी संस्कृतियों एवं धरोहरों को बचने के लिए विशेष क़ानून बनाए हैं, ताकि तस्करों एवं मूर्तियों की तोड़फोड़ करने वालों को कठोर सजा दी जा सके. विश्व में प्राचीन कलाकृतियों एवं विरासतों की दुनिया में पिछले दिनों काफी बदलाव आया है.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् ने इस प्रकार से विरासत चोरी, मूर्तियाँ तस्करी के अपराधों को बेहद गंभीर किस्म का माना है और जाँच में यह पाया गया है कि इनकी तस्करी से प्राप्त पैसे का उपयोग आतंकवादी गतिविधियों की फंडिंग में हो रहा है. संयुक्त राष्ट्र की पहल पर ही सभी देशों ने अपने यहाँ विरासत को बचाने एवं अपराधियों को कठोर दण्ड दिलाने के लिए क़ानून बनाना शुरू किए हैं. भारत सरकार भी हाल ही में “Antiquities Bill 2017” लेकर आई है, इसी तरह पाकिस्तान सरकार ने भी वहाँ मौजूद धरोहरों को बचाने के लिए “KP Antiquities Bill 2017” लेकर आई है.

Indian antique

जैसा कि हम जानते हैं, भारत की संस्कृति हजारों वर्ष पुरानी है. यहाँ पर सैकड़ों वर्ष पुराने मंदिर तो हैं ही, कई स्मारक और बहुमूल्य इमारतें भी हैं फिर चाहे वे अयोध्या के घाट हों, जहाँ हाल ही में योगी आदित्यनाथ ने दीपावली को एक भव्य अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप दिया, अथवा दक्षिण भारत के मंदिर हों, जहाँ की वास्तुकला, मूर्तिकला स्तब्ध कर देने वाली हो. स्वयं प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया जाकर भारत की प्राचीन विरासतों एवं मूर्तियों को भारत को सौंपने का आग्रह कर चुके हैं. लेकिन इतना सब होने के बावजूद जब एक कठोर क़ानून बनाने की बात आई, तो हम जब दूसरे देशों से भारत के इस प्रस्तावित क़ानून की तुलना करते हैं तो इसे थोड़ा निराशाजनक ही पाते हैं. विश्व के अन्य देश भारतीय संस्कृति के भौगोलिक एवं सभ्यता मूलक दृष्टिकोण से काफी दूर हैं, इसलिए हम पाकिस्तान से भारत के क़ानून की तुलना करेंगे, क्योंकि पाकिस्तान और बांग्लादेश ही विरासत और संस्कृति के मामले में भारत के नजदीक माने जा सकते हैं.

भारत एवं पाकिस्तान के “धरोहर एवं विरासत संरक्षण क़ानून 2017” का आपसी तुलनात्मक चार्ट

 

  पाकिस्तान  भारत
इंटरनेशनल प्रोटोकॉल    
१) क्या इस क़ानून को अंतर्राष्ट्रीय / संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के नियम स्वीकार हैं? हाँ  नहीं
२) क्या यह क़ानून इसे आतंकी फंडिंग के साथ सम्बन्ध स्वीकार करता है?  हाँ  नहीं 
३) क्या यह क़ानून अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध सर्वोत्तम सुरक्षा उपलब्ध करवाता है? हाँ  नहीं 
संस्थाओं के बारे में...    
४) क्या यह क़ानून धार्मिक स्थलों (मंदिरों-मस्जिदों-स्मारकों) को एक विशेष दर्जा प्रदान करता है?  हाँ  नहीं 
५) क्या इस क़ानून में विरासत संरक्षण प्राधिकरण बनाने की योजना है?  हाँ  नहीं 
६) क्या इस क़ानून में किसी “बाध्यकारी एजेंसी” के गठन का प्रस्ताव है?  हाँ  नहीं 
७) क्या क़ानून में इस “कानूनी एजेंसी” को प्रशिक्षण देने की व्यवस्था है?  हाँ  नहीं 
प्रक्रिया की स्पष्टता कितनी है?    
८) क्या इस क़ानून में विरासत तस्करों की निगरानी एवं अपराधियों की गिरफ्तारी के प्रावधान हैं?  हाँ  नहीं 
९) क्या विरासत वस्तुओं, मूर्तियों के देशव्यापी पंजीकरण की सुविधा है?  हाँ  नहीं 
१०) क्या इस क़ानून में महत्त्वपूर्ण धरोहरों एवं विरासतों के अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी की सुविधा है? हाँ  नहीं 
११) क्या इस क़ानून में विदेशों से विरासतों को वापस लाने का प्रावधान है?  हाँ  हाँ 
दंड और परिणामों के बारे में    
१२) संरक्षित स्मारक या मंदिर का विध्वंस करने से सुरक्षा  हाँ  नहीं 
१३) विरासतों और धरोहरों को तोड़ने-नुक्सान पहुँचाने को गैर जमानती अपराध बनाना  हाँ  नहीं 
१४) धार्मिक स्थल के दुरुपयोग से सुरक्षा  हाँ  नहीं 
१५) किसी विरासत, धरोहर अथवा मूर्ति की प्रतिलिपि या नकल बनाना अपराध है  हाँ  नहीं 
अन्य धाराएँ    
१६) देश में जब्त धरोहरों अथवा मूर्तियों को सरकार द्वारा तत्काल अधिग्रहण किया जाना  हाँ  हाँ 
१७) यह सुनिश्चित करना कि धरोहर वस्तु को समाप्त अथवा बंद न किया जा सके  हाँ  नहीं 

१८) अपराधियों-तस्करों का स्वयमेव अभियोजन (पुलिस केस), कोई बंधन लागू नहीं

हाँ  नहीं 

 


सारणी देखकर स्पष्ट हो जाता है कि भारत की एजेंसियों ने एक महत्त्वपूर्ण मामले में एक कामचलाऊ टाईप का क़ानून बनाया है. सारे बिन्दुओं में से केवल दो ही बिन्दुओं पर भारत और पाकिस्तान का क़ानून साझा है, बाकी अधिकाँश मामलों में पाकिस्तान का क़ानून बेहद कठोर है. वास्तव में एक भारतीय होने के नाते हमें तो गर्व होना चाहिए कि हमारी विरासत इतनी समृद्ध है, लेकिन हकीकत यह है कि हमने पाकिस्तान के मुकाबले बेहद ढीला-ढाला और लचर क़ानून बना कर इस विरासत के प्रति अपनी उपेक्षा ही दिखाई है. विरासत और धरोहरों के तस्करों एवं लुटेरों को सख्त सजा दिलवाना हमारा कर्तव्य होना चाहिए, लेकिन केवल मूर्तियाँ, पेंटिंग्स और आभूषण इत्यादि विदेशों से वापस माँगने की याचना करने एवं यदि भारत में जब्त हों तो मामूली सजा दिलवाने जैसा क़ानून बनाकर क्या लाभ होगा? 

जैसा कि सारणी के बिंदुओं से स्पष्ट है कि एक तरफ तो हम “Incredible India” और “अतिथि देवो भव” के नारे लगा रहे हैं, परन्तु दूसरी तरफ हमने अपनी इन बहुमूल्य धरोहरों को बचाने के लिए कठोर क़ानून तक नहीं बनाया?? मूर्तियों को तस्करों से बचाने के लिए NGO’s और निजी संस्थाओं को अपनी तरफ से अभियान चलाने पड़ रहे हैं, जबकि यह तो सरकार का प्रमुख कर्तव्य होना चाहिए था. विश्व की प्राचीनतम संस्कृति होने के कारण यह भारत की जिम्मेदारी थी कि वह दुनिया के अन्य देशों को रास्ता दिखाए कि संस्कृति और विरासत बचाने के लिए कैसे कठोर क़ानून बनाया जाता है. लेकिन हुआ उल्टा ही... खुद को “विश्व-गुरू” साबित करने की बजाय हम पाकिस्तान जैसे देश से पिछड़ गए? इसे क्या कहेंगे? दुर्भाग्य अथवा निकम्मापन??

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स्रोत : स्वराज्य.Com 

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