CIA के दबदबे को चुनौती देता हुआ निर्मम चीन

Written by बुधवार, 24 मई 2017 21:48

CIA की एक रिपोर्ट में स्वीकार किया गया है कि चीन ने 2010 से लेकर अभी तक अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के दर्जनों जासूसों को या तो मार दिया है, अथवा बंदी बना लिया है.

रिटायर्ड अमेरिकी अधिकारी मानते हैं कि संभवतः CIA के वर्तमान जासूसों में से कोई एक-दो जासूस चीन से जा मिले हैं और उसे अमेरिका की सूचनाएँ दे रहे हैं साथ ही इस बात की आशंका जताई जा रही है कि शायद चीन ने अमेरिकी ख़ुफ़िया विभाग की जानकारियों को “हैक” कर लिया है, जिसके कारण कई जासूसों की पहचान हो गई और वे मारे गए. चीन ने अमेरिकी जासूसों में आतंक फैलाने के लिए उनके खबरियों को उन्हीं की आँखों के सामने गोली मारी. ये स्थानीय चीनी नागरिक चंद रुपयों की लालच में अमेरिकी अधिकारियों को सूचनाएँ पहुंचाते थे, लेकिन जैसी ही चीन की ख़ुफ़िया एजेंसी को इनके बारे में पता चला, उसने ताबड़तोड़ सभी मुखबिरों को गोली से उड़ा दिया, जबकि कुछ को जेल में डाल दिया. CIA ने स्वीकार किया है कि उत्तर कोरिया के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए उसने पिछले कई वर्षों की मेहनत और पैसा खर्च करके जो “अपने आदमी” तैयार किए थे, वे गायब हो चुके हैं और सूचनाओं की प्राप्ति के मामले में अब वे बहुत पीछे हो चुके हैं.

दो माह पहले ही सीआईए ने इस बात की जाँच शुरू की है, कि उसके कई गोपनीय दस्तावेज विकीलीक्स के पास कैसे पहुँचे? क्या इसमें चीन का कोई हाथ है या स्नोडन के साथ कोई अमरीकी मिला हुआ है? इस जाँच में अब सीआईए के साथ एफ्बीअई भी जुड गई है, ताकि मामले को पूरी गंभीरता के साथ सुलझाया जा सके. सारी गडबड़ी 2010 के बाद से ही शुरू हुई है, क्योंकि तब तक CIA का एक भी जासूस चीन में अपने ऑपरेशन के दौरान मारा नहीं गया था, लेकिन पिछले सात वर्षों में ही दर्जन से अधिक जासूस मारे गए हैं, जिस कारण संदेह की सुईयाँ कई लोगों पर घूम रही हैं. एक संदिग्ध नामधारी “हनी बाजर” नामक अधिकारी को इस गुत्थी सुलझाने का जिम्मा सौंपा गया है. इस अधिकारी ने बीजिंग स्थित अमेरिकी दूतावास के प्रत्येक कर्मचारी से अलग-अलग पूछताछ की है और कुछ बाहरी कर्मचारियों पर निगाह भी रखी जा रही है ताकि गद्दार का पता लगाया जा सके.

ओबामा प्रशासन भी इन ख़ुफ़िया अधिकारियों के मारे जाने से बहुत परेशान था और अब ट्रंप के आनी के बाद स्थिति और भी खराब हुई है. चीन उत्तर कोरिया की पीठ पर हाथ रखे हुए है और अमेरिका उससे चिढ़ा बैठा है. ऐसे में सूचनाओं का स्रोत सूख जाने के कारण अमेरिका केवल अपने हाथ मसल रहा है. CIA के उच्च अधिकारी मार्क केल्टन को पूरा भरोसा है कि हैकिंग का मसला इतना बड़ा नहीं है, बल्कि कोई न कोई अंदरूनी गद्दार है जो चीन से जा मिला है. लापरवाही वाले एंगल पर भी विचार किया जा रहा है, क्योंकि दो बार ऐसा हो चुका है कि जिस रेस्टोरेंट में दो या तीन अमेरिकी अधिकारी कोई मीटिंग करते थे, उस टेबल के नीचे से माईक्रोफोन बरामद हुए हैं, वेटर के रूप में चीनी जासूस भी CIA वालों पर लगातार निगाहें रखते थे. मार्क के अनुसार FBI ने अपनी जाँच में पाया है कि कुछ अमेरिकी एजेंट्स लापरवाही के चलते बारम्बार एक ही रास्ते से यात्रा करते रहे और कई बार एक ही रेस्टोरेंट में मिलते रहे, जिसके कारण चीन का काम आसान हो गया.

संक्षेप में बात यह है कि चीन बड़ी निर्ममता के साथ विदेशी जासूसों को खत्म कर रहा है, विशेषकर CIA वालों को. इसके अलावा सरकारी छत्रछाया और धन की ताकत से लैस उसके सॉफ्टवेयर हैकर्स पूरी दुनिया के कम्पयूटर सिस्टम्स में छेद करने में सफल हो रहे हैं. चीन से निर्यात किए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक और कम्प्युटर हार्डवेयर सामानों में माईक्रो और नैनो जासूसी उपकरण लगाकर भेजे जा रहे हैं ताकि चीन का वर्चस्व बना रहे. भारत जैसे देश में जहाँ लगभग हर चीज़ “खुली पड़ी है”, और गद्दारों की भरमार है, वहाँ चीन को अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती. कहा जा सकता है कि चीन के इस रवैये और “कार्यकुशलता” का सबसे अधिक खतरा भारत पर ही मंडरा रहा है.

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