ईसाईयत में जातिवाद, और दलितों से भेदभाव : भाग-२

Written by गुरुवार, 01 जून 2017 20:56

पिछले भाग में हमने देखा कि किस तरह “इस्लाम में जातिवाद नहीं है” का झूठ बोलकर कई मुस्लिम जातियाँ, हिन्दुओं के हिस्से का आरक्षण चट कर रही हैं. सरकारें भी वोट बैंक के चक्कर में हिन्दुओं को एक “अर्धसत्य” बोल-बोलकर बरगलाती रहती हैं कि “मुसलमानों को धार्मिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जाएगा”.

(पिछला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें http://desicnn.com/news/why-converted-dalits-and-muslims-getting-reservation-under-hindu-social-system). लेख के इस अगले भाग में आइये अब बात करते हैं ईसाईयों में फैले घोर जातिवाद और भेदभाव की. जब ईसाई मिशनरी सेंट थॉमस भारत आया, तो उसने मालाबार (केरल) के लोगों को धर्मांतरित करना शुरू किया। सेंट थॉमस द्वारा धर्मान्तरित किए गए लोग खुद को नम्बूदरी ब्राह्मण बताते हैं, और इसीलिए ये लोग खुद को “भारत के ईसाईयों” में सबसे उच्च मानते हैं। इनके ईसाईयत वर्ग को Syrian Christian कहा जाता है, ये अन्य जातियों के ईसाईयों के स्पर्श होने पर Holy Bath (पवित्र स्नान) लेते हैं, ये शादियां भी सिर्फ खुद की जाति में ही करते हैं।

इसी तरह से केरल में Latin Christian भी खुद को ऊँची जाति का मानते हैं। जब गोवा में पुर्तगालियों ने जबरन धर्मान्तरण किया, तो वहाँ के ब्राह्मण धर्मान्तरित होकर Bamonns बन गए, वहां के Vaishya Vanis धर्मान्तरित होकर Chardos बन गए। उनसे नीचा दर्जा Gauddos को दिया गया। शुद्र को धर्मान्तरित करने के बाद Sudir नाम दिया गया, और शेष बचे हुए धर्मान्तरण के बाद भी चमार और महार ही कहलाए। Pastor के पद पर Gaonkar ईसाई लोगों का ही दबदबा है। तमिलनाडु का तो हाल इससे भी बुरा है वहां के नाडर समुदाय के लोग, संख्याबल में तो तमिलनाडु के ईसाईयों का केवल 3 प्रतिशत हैं.. लेकिन चर्च पर पूरा नियंत्रण उनका ही रहता है। भारत के ईसाईयों में 80% दलित हैं, लेकिन 156 कैथोलिक Bishop में से अभी तक केवल 6 बिशप ही दलित बनाए गए हैं (क्या यह भेदभाव नहीं है?). अंतरजातीय विवाह तो दूर की बात है, इनमें तो दलितोँ को उच्च जातीय ईसाईयों के कब्रिस्तान में शव भी नहीं दफ़नाने दिया जाता। रोमन कैथोलिक चर्च में बैठने की सीट से लेकर, Chalice (प्याला) भी अलग होता है, जबकि कुछ स्थानों पर तो दलितों और कैथोलिकों के चर्च ही अलग-अलग होते हैं। दलित ईसाईयों के हजारों लोग वापिस हिन्दू धर्म में आ रहे हैं, उनका कहना है कि “इतना भेदभाव तो हिंदुओं में ही नहीं होता, और कम से कम वहां आरक्षण तो मिलता है।”

ईसाईयत में जातिवाद -: दलित क्रिश्चियन मूवमेंट से जुड़े श्री मेहरबान जेम्स द्वारा लिखा गया एक जबरदस्त सच्चा लेख नीचे शेयर कर रहा हूँ गौर कीजिए –

चर्च में दलित ईसाईयों से गैर-बराबरी का यह आलम है कि दलितों के लिए बैठने का अलग स्थान, पीने के लिए पानी का अलग गिलास दफन करने के लिए कब्रिस्तान भी अलग होता है. भारत में ईसाई धर्म की शुरूआत ही गैर-बराबरी की नींव पर हुई थी. यहां उसे साफ तौर पर दो वर्गों में बंटा हुआ देखा जा सकता है. एक तरफ संपन्न वर्ग हो जो उच्च जाति से आया है जिसने अधिकांश उच्च पदों और संसाधनों पर कब्जा कर रखा है. तो दूसरी ओर दलित वर्ग से धर्मांतरण कर ईसाई बने लोगों का तबका है जो इस उम्मीद में ईसाई बने थे कि ऐसा करके उन्हें हिन्दू जाति व्यवस्था के दुर्गुणों से मु्क्ति मिल जाएगी. उन्हें उम्मीद थी कि ईसाई बनने के बाद वे सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे. लेकिन ईसाई बनने के बाद भी वे गैर-बराबरी के शिकार बने रहे. जाति ने यहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा.

असल में दक्षिण में ईसाईयत में भी जाति व्यवस्था अपने उसी क्रूरतम रूप में है जैसा कि हिन्दू समाज में. चेन्नई से 60 किलोमीटर दूर चेंगलपट्टू जिले के केकेपुड्डुर गांव में ढाई हजार ईसाई रहते हैं. इसमें दलित ईसाईयों की तादात 1500 है. इस पूरी कैथोलिक आबादी पर नायडू व रेड्डी जाति से धर्म परिवर्तन करके आये लोगों का कब्जा है. वह चर्च से लेकर कब्रिस्तान तक भेदभाव को बनाये रखते हैं और हर ईसाई त्यौहार पर इन दलितों का दोयम दर्जा कायम रहता है. इस गैरबराबरी को तोड़ने के लिए सेंट जोजफ के जन्मदिन पर दलित ईसाईयों ने स्वयं कार्यक्रम आयोजित करने का फैसला किया. बस इतनी सी बात पर ऊंची जाति के ईसाईयों ने उनके ऊपर हमला बोल दिया. इस झगड़े में 84 लोगों को जेल जाना पड़ा और वे लोग छह महीने जेल में बंद रहे. कर्नाटक में दलित क्रिश्चियन फेडरनेशन के संयोजक मेरी सामा कहते हैं कि हमें गांवों के कुछ क्षेत्रों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता. सन 2000 में आंध्र प्रदेश में जब पहला आर्क विशप वेटिकन ने मनोनीत किया तो वहां काफी हंगामा हुआ और हटाये हुए आर्कविशप ने सार्वजनिक बयान दिया कि भारत की जमीनी सच्चाई के बारे में वेटिकन अनभिज्ञ है.

ईसाई धर्म के तीन स्तंभ हैं. प्रीचिंग, टीचिंग और हीलिंग. इसका मतलब है कि यीशु की इबादत करो, लोगों को शिक्षित करो और रोगियों की सेवा करो. इन तीन कामों के लिए ईसाईयों ने विश्वभर में अपनी संस्थाएं खोल रखी हैं. सालाना इन संस्थाओं के माध्यम से 145 अरब डालर खर्च किये जाते हैं. चर्च संगठनों के अधीन 50 लाख से अधिक पूर्णकालिक कार्यकर्ता हैं, जो कि दुनियाभर में शिक्षा के जरिए ईसाईयत के प्रसार का काम कर रहे हैं. भारत में भी लगभग सभी मिशनरियां इसी काम में लगी हुई हैं. देश के अधिकांश प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान ईसाईयों के ही हैं. तीसरा काम हीलिंग का आता है तो ईसाई मिशनरियों के अस्पताल शहरों से लेकर आदिवासी इलाकों तक फैले हुए हैं. ईसा मसीह ने कहा था कि “सूई की नोक से ऊंट का निकलना संभव है, लेकिन किसी धनवान का स्वर्ग में प्रवेश नामुमकिन है. लेकिन आज उन्ही ईसा मसीह के नाम पर काम करने वाली संस्थाओं में ही गरीबों का प्रवेश वर्जित है. चर्च, शिक्षण संस्थाओं और स्वास्थ्य सेवा प्रदान करनेवाली संस्थाओं के उच्च पदों पर उन्हीं लोगों का कब्जा है. गरीब ईसाई न तो अपने बच्चों को उन स्कूलों में शिक्षा दिलवा सकते हैं जो ईसाईयत के नाम पर बने हैं, न ही बीमार होने पर इन अस्पतालों में इलाज करवा सकते हैं. आज प्रीचिंग, टीचिंग व हीलिंग के सभी केन्द्र व्यापारिक संस्थानों में बदल दिये गये हैं. एक तरह से ईसा के मुख्य मिशन को ही इन मिशनरियों ने समाप्त कर दिया है.

Reserve 2

चर्च में दलित ईसाईयों से गैर-बराबरी का यह आलम है कि दलित बच्चों को इन चर्चों में अल्टर ब्वाय या लेक्टर बनने की इजाजत नहीं होती है. यहां दलित जाति से आयी ननों के साथ शोषण की घटनाओं का किस्सा तो अलग ही है. ऐसा नहीं है कि भारत में ईसाईयों के बीच इस भेदभाव से वेटिकन अवगत नहीं है, लेकिन उसका कोई भी प्रयास इस दिशा में अब तक सामने नहीं आया है. चर्च आज भी उसी पुराने रूप में कायम है जिस तरह से पहले संपन्न लोगों के पापमोचन के लिए वह स्वर्ग के दरवाजे खोलने का काम करता था. वेटिकन भारत के दलित ईसाईयों के बारे में कोई बात नहीं करता. उल्टे वेटिकन साम्राज्यवादी अमेरिका के साथ खड़ा रहता है. इसी का नतीजा है कि लैटिन अमेरिका के ईसाईयों ने लिब्रेशन थियोलाजी के नाम से पोप के खिलाफ आंदोलन चला रखा है. सवाल यह है कि भारत में जिस जाति उत्पीड़न से त्रस्त होकर शोषण मुक्ति की चाह में हमने ईसाई धर्म अपनाया था उसका फायदा क्या हुआ? न तो हमारा कोई आर्थिक उत्थान हुआ, और न ही हमें जातिवाद के कलंक से छुटकारा मिला. अब समय आ गया है कि अपने हितों की रक्षा के लिए हम स्वदेशी चर्च स्थापित करें, वेटिकन के साम्राज्यवाद से अपने आप को पूरी तरह मुक्त कर लें. (मेहरबान जेम्स दलित क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेन्ट के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष हैं.)

मूल लेख हेतु निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करें।
http://www.visfot.com/old12/index.php?news=240

अब यहाँ उपरोक्त दोनों लेखों का उदाहरण देते हुऐ तथाकथित दल-हित चिंतकों तथा सेकुलरों-वामी प्रगतिशीलों से मैं सिर्फ यही पूछना चाह रहा हूँ, कि जाति और वर्ग विहीन ईसा की ईसाईयत में यह जातिवाद वेटिकन से आया या बाईबिल से? या कहीं ऐसा तो नहीं कि ईसाई भी मनुवादी हैं, और भारतीय ईसाईयत में मनु महाराज व मनुसंहिता ही मान्य है बजाय बाईबिल के..?? इसी प्रकार, पिछले भाग के लेख में इस्लाम के शरियत में यानि कुरान–हदीस में, किसी शरई नियम कानून में जाति व्यवस्था / जातिप्रथा का उल्लेख है ही नहीं, फिर भारत के मुसलमानों में हिंदू–हिंदुत्व की नकल करके हिंदू जाति व्यवस्था किस तरह से कायम है..?? क्या भारत के मुसलमान, वेद– उपनिषद्– मनु संहिता के अनुसार चलते हैं, इस्लाम – शरिया की मूल व्यवस्था से नहीं..??

मित्रों, प्रमुख धार्मिक समुदाय इस्लाम – ईसाई , पारसी , यहूदी जो भारत से शुरू या भारत पर ही आधारित नहीं हैं ना ही उनके मुख्य आस्था – पूजनीय स्थल ही भारत में स्थित हैं, वे अभी भी अपने निजी कानूनों का ही पालन कर रहे हैं। जहां मुसलमानों, ईसाइयों, पारसियों और यहूदियों के उनके स्वयं के भारतीय संवैधानिक मान्यता प्राप्त निजी कानून हैं (उदाहरणार्थ शरिया–शरियत), जबकि दूसरी तरफ हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख लोग ‘हिंदू पर्सनल लॉ’ नामक “संसद रचित संवैधानिक कानूनों द्वारा शासित” होते हैं, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (बी) में कहा गया है कि हिंदुओं में “सिक्ख, जैन तथा बौद्ध धर्मं का पालन करने वाले व्यक्तियों” को भी शामिल किया जायेगा। इसके अलावा हिंदू विवाह अधिनियम 1955, जैनियों, बौद्ध, तथा सिक्खों की क़ानूनी स्थिति को इस प्रकार परिभाषित करता है – क़ानूनी रूप से हिंदू परन्तु “धर्म के आधार पर हिंदू नहीं” !! भारत के धर्मनिरपेक्ष (“नागरिक”) कानून के तहत आने वाला एकमात्र भारतीय धर्म ब्रह्मोइज्म / ‘बहाई’ धर्म है, जो 1872 के अधिनियम 3 से प्रारंभ होता है। भारत में मुसलमान “मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 द्वारा शासित हैं, जिसमें जाति-व्यवस्था का कोई उल्लेख नहीं है” यह मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ को निर्देशित करता है जिसमें शादी, महर (दहेज), तलाक, रखरखाव, उपहार, वक्फ, चाह और विरासत शामिल है।

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आम तौर पर अदालत सुन्नियों, के लिए हनाफ़ी सुन्नी कानून को लागू करती है, शिया मुसलमान के कुछ निजी कानून सुन्नी कानून से अलग है, अत: वर्ष 2005 में, भारतीय शिया ने सबसे महत्वपूर्ण मुस्लिम संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ से नाता तोड़ दिया और उन्होंने ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के रूप में स्वतंत्र लॉ बोर्ड का गठन किया। कई प्रमाणित सूत्रों से संकेत मिलता है कि “भारत के मुसलमानों के बीच जाति सिर्फ ‘काफ़ा’ (Kafa’a) की अवधारणा के परिणामस्वरूप हुआ” और इसका शरियत – कुरान–इस्लाम से कोई लेना देना ही नहीं है, बल्कि ये इस्लाम की मूल शिक्षाओं के विरुद्ध है, यानि इस्लाम विरूद्ध है. अर्थात मुसलमान समुदाय/Community के किसी भी फिरके (सुन्नी – शिया इत्यादि में) इस जाति/समुदाय/Communities को शरियत – इस्लाम के अनुसार बिदअत या Bid’ah कहा जा सकता है यानि कि संक्षिप्त में इस्लाम विरूद्ध – कुफ्र / शिर्क भी! यहाँ बिदअत और Bid’ah का मतलब बतला देना जरूरी समझता हूँ ‘बिदअत’ का मतलब है –  ‘बिदअत से मतलब ऐसी बात या प्रथा – व्यवस्था से हैं जो पहले मौजूद न हो’, शरीयत इस्लाम मे बिदअत के माने हर वो बात–रिवाज़–प्रथा–काम बिदअत कहलाता है जो नेकी समझ कर किया जाये लेकिन शरियत मे इसकी कोई बुनियाद व सबूत न हो... यानि न तो नबी सल्ललाहो-अलेहे-वसल्लम ने खुद उस अमल को किया हो, न तो किसी और को हुक्म दिया हो और न किसी को इसकी इजाज़त दी हो! साफ़ बात है कि मुसलमान समुदाय/Community में अवैध जाति प्रथा, जातियों / Communities को स्पष्टतः बिदअद / Bid’ah ही कहा जा सकता है. इस संदर्भ में मुसलमानों व संविधान कानूनों के जानकार हेतु सुन्नी मुसलमानों की शरियत का उल्लेख नीचे कर रहा हूं जो अकाट्य है।

“क़यामत के रोज़ जब नबी सल्ललाहो अलेहे व सल्लम हौज़े कौसर से अपनी उम्मत को पानी पिला रहे होगें तो कुछ लोग आयेगें जिन्हें नबी सल्ललाहो अलेहे व सल्लम अपनी उम्मत समझेगें लेकिन फ़रिश्ते बतायेगें के ये वो लोग है जिन्होने आप के बाद बिदअत शुरु कर दी तो नबी सल्ललाहो अलेहे व सल्लम फ़रमायेगें के दफ़ा और दूर हो वो लोग जिन्होने मेरे बाद दीन को बदल डाला!” (बुखारी व मुस्लिम)

Bid’ah – “In Islam, Bid’ah (Arabic: بدعة) refers to any innovations in religious matters. Linguistically the term means “innovation, novelty, heretical doctrine, heresy”. In contrast to the English term “innovation”, the word bid’ah in Arabic generally carries a negative connotation.”

भारत के मुसलमानों की जाति व्यवस्था/जातियों/Communities में जिन लोगों को अशराफ/सवर्ण/सामान्य वर्ग के रूप में सन्दर्भित किया जाता है, उन्हें ऊंचे स्तर का माना जाता है, और उन्हें यानि “अशराफ” को विदेशी अरब वंश का माना जाता है, जबकि अजलाफ को हिंदू धर्म से धर्मान्तरित होने वाला मुसलमान माना जाता है, और उन्हें निचली जाति का माना जाता है. भारत सहित, वास्तविक मुस्लिम सामाजिक व्यवहार, कठोर सामाजिक ढांचे के अस्तित्व की ओर इशारा करता है जिसे कई मुस्लिम विद्वानों ने काफ़ा की धारणा के साथ सम्बंधित फिकरे के विस्तृत नियम के माध्यम से उचित इस्लामी मंजूरी प्रदान करने की कोशिश की. प्रमुख मुस्लिम विद्वान मौलवी अहमद रजा खान बेरलवी और मौलवी अशरफ अली फारूकी थानवी जन्म पर आधारित श्रेष्ठ जाति की अवधारणा के ज्ञाता हैं, और इसके संदर्भ में उल्लेखनीय रूप से यह तर्क दिया जाता है कि अरब मूल (सैयद और शेख) के मुस्लिम गैर-अरब या अजामी मुस्लिम से श्रेष्ठ जाति के होते हैं और इसलिए जब कोई आदमी अरब मूल का होने का दावा करता है, तो वह अजामी महिला से निकाह कर सकता है जबकि इसके विपरीत संभव नहीं है। इसी तरह का एक प्रमुख “भारतीय इस्लामिक” तर्क है, एक पठान मुस्लिम आदमी एक जुलाहा (अंसारी), मंसूरी (धुनिया), रईन (कुंजरा) या कुरैशी (कसाई या बूचड़) महिलाओं से निकाह कर सकता है लेकिन अंसारी, रईन, मंसूरी और कुरैशी आदमी पठान महिला से निकाह नहीं कर सकता है, चूंकि ऐसा माना जाता है कि पठान के मुकाबले ये जातियां निचली हैं, इनमें से कई उलेमा यह भी मानते हैं कि अपनी जाति के भीतर ही निकाह सबसे अच्छा होता है सो इसी कारण भारतीय इस्लाम के मुसलमानों में घरेलू रिश्तों, रक्त संबंधियों में तथा हिंदुओं की ही तरह सजातीय विवाह का कठोरता से पालन किया जाता है।

दक्षिण एशिया के कुछ भागों में मुसलमान, अशराफ और अजलाफ तथा अरजाल के रूप में विभाजित हैं, अशराफ, विदेशी वंश से उत्पन्न अपनी “ऊंची जाति/नस्ल” का दावा करते हैं। जबकि हिंदू धर्म से धर्मान्तरित होने वाले को गैर-अशराफ/निचली जाति/नीची नस्ल/ अजलाफ माना जाता है, और ‘अरजाल’ को तो लगभग अछूत सरीखे मुसलमान माना जाता है, इसलिए वे भी अजलाफ की ही तरह ‘स्वदेशी आबादी’ होते हैं, और वे भी वैकल्पिक रूप से कई उपजातियों / समुदायों / Communities में विभाजित हो जाते हैं। उलेमा की धारा (इस्लामी न्यायशास्त्र के विद्वानों) काफ़ा की अवधारणा की मदद से धार्मिक जाति वैधता प्रदान करते हैं। मुस्लिम जाति व्यवस्था के विद्वानों की घोषणा का एक शास्त्रीय उदाहरण फतवा-ऐ- जहांदारी है, जिसे तुर्की विद्वान जियाउद्दीन बरानी द्वारा चौदहवीं शताब्दी में लिखा गया था, जो कि दिल्ली सल्तनत के तुगलक वंश के मुहम्मद बिन तुगलक दरबार के एक सदस्य थे, बरानी को उसके कठोरता पूर्वक जातिवादी विचारों के लिए जाना जाता था और अजलाफ़ मुसलमानों की तुलना में से अशरफ मुसलमानों को नस्ली रूप से ऊंचा मानते थे उन्होंने मुसलमानों को ग्रेड और उप श्रेणियों में विभाजित किया उनकी योजनाकार नजर सभी उच्च पद और विशेषाधिकार, भारतीय मुसलमानों की बजाए तुर्क/अरब मूल से जन्म लेने वाले का एकाधिकार हैं को ही परिभाषित करती है, यहां तक कि मुसलमानों की एकमात्र पवित्रतम पुस्तक ‘कुरान’ की अपनी बुनियादी बात कि “वास्तव में, आप लोगों के बीच सबसे पवित्र अल्लाह हैं” को भी महान जन्म के साथ धर्मनिष्ठता का जुड़े होने की मान्यता / प्रथा / विचार से ही जुडे होने को मानते हैं।

बरानी अपने सिफारिश पर सटीक थे अर्थात “मोहम्मद के बेटे/वंशज” {यानी अशराफ} ” को धर्मान्तरित मुसलमानों [यानी अजलाफ़ और अरजाल] की तुलना में एक बहुत ही उच्च सामाजिक स्थान दिया, फतवा में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान “इस्लाम के लिए सम्मान के साथ” भारत में इस्लामिक धर्मान्तरण के फलस्वरूप जातियों का उनका विश्लेषण था “, उनका दावा था कि जातियों को राज्य कानून या “ज़वाबी” के माध्यम से अनिवार्य किया जाएगा और जब कभी सहूलियत होगी तब शरीयत कानून पर पूर्ववर्तिता को लाया जाएगा !! फतवा-ऐ- जहांदारी (सलाह 21) में उन्होंने “उच्च जन्म के गुण” के बारे में “धार्मिक” और “न्यून जन्म” के रूप में “दोष के संरक्षक” लिखा था। यानि कि हर कार्य जो “दरिद्रता से दूषित और अपयश पर आधारित नज़ाकत से [अजलाफ़ से] आता है” !!  बरानी के पास अजलाफ़ के लिए एक स्पष्ट तिरस्कार था और दृढ़ता से उन्होंने उनके शिक्षा से वंचित करने की सिफारिश की है, क्योंकि ऐसा न हो कि वे अशरफ की स्वामित्व को हड़प लें, उन्होंने प्रभाव मंजूरी के लिए धार्मिक मांग को उचित माना है,, साथ ही बरानी ने जाति के आधार पर शाही अधिकारी (“वजीर”) की पदोन्नति और पदावनति की एक विस्तृत प्रणाली को विकसित किया। अशराफ/अजलाफ़ के रक्तानुसार जातिगत और जन्मानुसार जातिगत विभाजन के अलावा, मुसलमानों में एक अरज़ाल वर्ग भी होता है, जिसे बाबासाहेब अम्बेडकर की तरह जाति-विरोधी दलित – अछूत कार्यकर्ता के रूप में माना जाता है जो कि एक अछूत की तरह ही हैं,इनसे अजलाफ मुसलमान भी संबंध नहीं करते।

“अरज़ाल” शब्द का संबंध “अपमान” से होता है और अरज़ाल जाति को भनर, हलालखोर, हिजरा, कस्बी, ललबेगी, मौग्टा, मेहतर ,भंगी ,कसाई, कसाब, कुरैशी आदि में बांटा गया है जिसका उल्लेख भाग 1 में भी संपूर्ण श्रैणियों में किया है। मुसलमान जातिवाद के अरज़ाल समूह को 1901 की भारत की जनगणना में दर्ज किया गया था और ‘इन्हें पता नहीं कैसे अपरिवर्तनीय शरिया वाले इस्लाम के विरूद्ध जा कर दलित मुस्लिम भी कहा जाता है”. “इन अरज़ाल जातिगत मुसलमानों के साथ और मुसलमान नहीं जुड़ते और इन्हें मस्जिद में प्रवेश करने और सार्वजनिक कब्रिस्तान का इस्तेमाल करने से अप्रत्यक्ष तौर पर वर्जित किया जाता है।” इन अरज़ाल मुसलमानों को सफाई करना और मैला ले जाना जैसे “छोटे / घृणित व्यवसायों” के लिए दूर रख कर अपमानित ही किया जाता है और यह भी पूरी तरह इस्लाम – शरियत के विरूद्ध बिदअत / Bid’ah सरीखा कुकर्म ही है।

अतः इन दोनों लेखों के सन्दर्भ में अब कोई मुस्लिम या “हिंदू मोमिन” या जय मीम जय भीम करता बुद्धिपिशाच हमें बताए कि मुसलमानों का “भारतीय इस्लाम” कौन से ब्राह्मणवाद– मनुवादिता को मानता है? और इन काफिरों की बिदअत/Bid’ah से ही इस्लाम और भारत के संविधान समेत हिंदू और हिंदुत्व खतरे में क्यों नहीं है..??? क्या OBC और “दलित मुस्लिम”(???) बनकर सौ रूपए के स्टाम्प पेपर के शपथपत्र के आधार पर हिन्दू दलितों तथा हिन्दू OBC के आरक्षण की मलाई चुपके-चुपके चट करने वालों के इस कृत्य पर भी हिन्दू OBC और हिन्दू दलितों में जागरूकता नहीं आएगी?? संक्षेप में तात्पर्य यह है कि यह “झूठ” बोलना बंद होना चाहिए कि इस्लाम और ईसाईयत में कोई भेदभाव नहीं होता... इस्लाम-ईसाईयत में कोई जातिवाद नहीं होता... साथ ही केंद्र-राज्य सरकारें भी इस बात पर दृढ़ बनी रहें कि इस्लाम और ईसाईयत में धर्मान्तरित होने के बाद, हिन्दू धर्म में प्रचलित “आरक्षण” इन्हें नहीं दिया जाएगा. वेटिकन से पैसा खाकर ईसाई बनना, हिन्दू नाम रखकर झूठ बोलना और इसी के सहारे हिन्दू दलितों का हक़ मारते हुए आरक्षण वसूलने जैसा दोहरा फायदा अब बंद होना चाहिए. 

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