दिमाग को गुलाम कैसे बनाएँ :- शिक्षा और इतिहास से

Written by मंगलवार, 07 फरवरी 2017 20:20

देश के पहले शिक्षा-मंत्री ''नुरुल-हसन, ने बड़ी चतुराई से भारतीय शिक्षा को सनातन चेतना के खिलाफ एक खतरनाक वेपन की तरह इस्तेमाल किया। शिक्षा जगत मे की गई यह हस्तक्षेप सबसे नया और खतरनाक हथियार के रूप मे सामने आई।

बड़े सजग तरीके से उन्होने जेहन का शिकार करने का मसौदा तैयार किया। इन सत्तर सालों में हजारो ‘कबाड़ गुरु’ ”राष्ट्र की चेतना नष्ट करने मे लग गए - प्रो इस्लामिक वाम तंत्र, पढाने में लगा दिए गये। भीष्म साहनी का 'तमस’ पढ़ाया जाता है। कभी 'ग’ से गणेश की जगह 'ग’से गधा हो जाता है। कभी समय हो तो सीबीएससी पाठ्यक्रम को ध्यान से चेक करें। सभी राज्यो ने कमोबेश यही किया है। क्लास-6-7-8 में चलने वाली किताब हमारे पूर्वज 25 साल पहले ही बन्द कर दी गई। घुसपैठिये वामियों का खेल चालू आहे।

आप प्राथमिक किताबों से लिस्टिंग करना शुरू करिए। आप खुद देखिये बच्चे के दिमाग मे क्या भरा जा रहा है। बाप-दादो के प्रति वितृष्णा। खुद के संस्कृति और राष्ट के प्रति हीन भावना और अपने पूर्वजो की आध्यात्मिक उपलब्धियों के प्रति घनघोर उपेक्षा और पिछड़ेपन का भाव वहाँ दिखेगा। जब आप दुनिया के अन्य-विकसित देशो के पाठ्यक्रमो से तुलना करने बैठते हैं तो मक्कारी और साफ-साफ दिखने लगती है। प्राइमरी से लेकर परास्नातक तक, भारतीयता, संस्कृति, चेतना, पूर्वज, संस्कारो से नफरत ही नफरत...जाने कहाँ से ऐसी उपन्यास, कहानियां, कवितायें, आलोचनाएँ उठा लाते हैं, जो केवल खुद के प्रति हीन भावना से भर दे। लेकिन एग्जाम पास करने की मजबूरी के चलते उसे पढ़ना जरूरी होता हैं। कार्यकर्ता टाइप या फिर परीक्षा के लिए कोर्स। हालांकि वह बू उन किताबों से आती रहती। उस समय भी अच्छी तरह पता होता था की यह क्या हो रहा है।….इस गन्दगी को हाथ नही लगाना। उसी बहाने उसमे “भाई लोग, जरुर घुस गये.. साहितकार... कोलाकार... चित्रोकार ... जब इगनोर हो गये,,...कोई उधर मुंह करके.....। मैंने उन सब को देखा है। मोहन राकेश, वात्सायन, अज्ञेय से लेकर राजेंद्र यादव, मन्नू-भंडारी तक को और बाद के कमलेश्वर, गिरिराज किशोर आदि-आदि । मैं यहां जान-बूझकर सभी-नाम और उनकी रचनाये नही लिख रहा। जब कभी समय हो तो बाहरी लेखकों स्पेशिली कोयलो-पाउलो के साथ उनको कम्पिरेटिव मूड में उनको देखे-पढ़े....तो उनकी अनुभवहीनता, मानसिकता, समझ, आध्यात्मिक उथलापन, और संस्कृति, सनातन के प्रति नफरत झलकने लगता है। उनकी हीन-भावना आपको भी उन्ही की दिमागी स्थिति में लाकर खड़ी कर देती है। आप में एक टेस्ट डेवलप होने लगता हैं। आप शिकार होने लगते हैं उनके 'लेखन के हथियार का’ जिसकी जड़ें, अरब, रूस, और चीन में गडी हुई हैं। छायावादी काल के बाद आधुनिकता के नाम पर यह 'लेखक-तंत्र’ भारत को कब्जे में लेता गया।

वे अपने आपको ‘इमेज’ देने मे बड़े निपुण हैं। उन्होने अपने-आपको एक नया नाम दे दिया - साहित्यिक लेखन,,..''इलीट” नाम, थोड़ा ऊंचा, थोड़ा डिफरेंट...श्रेष्ठ है। "'हम वह लिखते है-बोलते हैं जिसे हमीं समझ बोल सकते हैं। ऑटो बायोग्राफी आफ योगी, महात्मा गांधी, विवेकानंद, तुलसीदास, कालीदास, सूर, कबीर, मीरा, एरोस्मिथ, अल्वा एडिशन, ग्राहम बेल, पाउलो-कोयलो, अल्बैर कामू से ज्यादा बड़े रचनाकार बनने लगे। वे अपनी सड़ी-गली बोर किताबें कला-फिल्मो के नाम पर सिस्टम को दोषी-बुराइयों से भरा ‘जनवादी कूड़ा,,…दिमाग़ खाऊं…नीरस, उबाऊ, अप्राकृतिक विचार तीन घंटा झेलवाते है। सिवाय कुछ भड़ासियो के किसी को न जंचती किंतु उसे देखने कुछ दिमागी-बीमारी से पीड़ित पशु ही जाते थे.. अपनी जीविका के चक्कर में…. नौकरी-शौकरी-हौकरी… राष्ट्र से जुडी हर चीज को ये क्षति पहुंचाते हैं, धार्मिक प्रतीकों, परम्पराओ पर निशाना रखते हैं. साहित्य को इन्होंने अपनी मुर्गी बना दिया। आज हिंदी साहित्य में सिर्फ लेखक हैं पाठक नहीं। कविता , कहानी , उपन्यास सब शोषण और जनसरोकार में बदल कर नष्ट कर दिए। इस देश को इन लोगों ने बड़ा नुक्सान पहुँचाया है, .साथ ही पत्रकारिता को भी. मैं तो 60 से लेकर बनने वाली कूड़ा-करकट कभी न झेल पाया…जो इनके लेखको और फ़िल्मकारों ने ज़बरदस्ती समाज पर थोपी। मैं ही क्यों …रूस और चीन मे भी अगर ज़बरदस्ती न दिखवाया-पढ़वाया जाता….तो लोग भी उधर मुँह करके मू…. भी न!! किसी भी नये बच्चे जो स्वस्थ्य दिमाग का हो……एक बार दिखाने की कोशिश करके देख लीजिए…!!! वैसे भी, आज पुराने साहित्य कारों को छोड़ दिया जाए तो इनका कूड़ा कौन पढ़ता है? स्टाल पर कभी दिखा? कोई उसे खरीदता है??? पांचवे दशक के बाद कोई ऐसी खास रचना नही हुई की जन साधारण खरीद कर पढे। जबकि जेके रोलिंग की हैरी-पाटर (अनूदित किताबे)पढ़ने वाले घरो मे मिल जाएंगी। संस्कृत लेखको से बंगला, मराठी, तमिल, गुजराती, राजस्थानी, उड़िया आदि-आदि से मन भर जाय तो. से होते हुए टालस्टाय …दिदेरो. अपटन सिंक्लेयर… प्लेखानेव ….लुइस सिंक्लेयर… .स्तान्धाल…फेदव…फेदीन से लेकर बाल्जाक और गोर्की- दास्तेवोस्की… जैक लंडन तक.. अल्बेर कामू…पाउलो-कोयलों……उसी समय अमेरिकन ‘नावेल, लुडलूम, आर्थर सी क्लार्क, ….किम स्टेनले रॉबिंसन.. एन डिश… अर्लस्टेयर रेंनाल्डस, जाफ रीमैन, जूर्ल्स बर्न्स….रुइकर,…. होल्डस्टाक… होगन, वर्जीनिया वूफ से शुरू होकर वाल्टर स्काट… थॉमस मूर…चार्ल्स डिकेन्स. वाशन वाल्टन जेन आस्टिन, लॉरेंस स्टेन…. हेनरी जेम्स…… मोटे-मोटे उपन्यास अनूदित रूप मे आप चटखारे ले-लेकर पढ़ेंगे... विशेषकर साइंस फिक्शन… पुराने जमाने के प्रेमचंद, परसाई, सुदर्शन, शिवानी, से लेकर देवकीनन्दन खत्री तक….कुछ न मिलता तो सूर-कबीर तुलसी गा लेंगे पर पर इन 70 सालो मे लिखा कूड़ा कभी न पचा पाएंगे। दूर से देखते ही महकने लगता है कि ये रद्दी है, कि यह दिमाग बदलने के हथियार है। ७० साल पहले हिन्दी के उपन्यासकारो की रचनाए ८० भाषाओ मे ट्रांसलेशन होती थी। लोग-बाग अच्छा पढ़ने के लिए हिन्दी सीखते थे। विश्वविद्यालयो मे हुआ यह एकाधिकारपना ही भाषाओ के अध:पतन का मुख्य कारण और जिम्मेदार है कि मूल-सनातन प्रवाह से जु्डी प्रतिभाओ को आगे ही नही आने दिया जाता। हिन्दू-हतोत्साहन प्रोजेक्ट बतौर एक शस्त्र इस्तेमाल होता है। वे कोशिश करते है की उसे जातिवार विभाजित कर सकें। इसमें बांटो और राज करो की नीति छुपी है। दलित साहित्य, अमीर साहित्य, ब्राम्हण साहित्य, जन साहित्य, देशवादी साहित्य...इन्हे किसने जना है?? केवल एजेंडा समझिए। दुनियाँ के "बड़े पुरस्कारों” मे इनकी रचनाए देखी है?? उनकी रचनाओ पर फिलिम वगैरह?? देश भर कि यूनिवर्सीटियों के विभागो मे काबिज चर-खा रहे 30 हजार से अधिक लोग क्या करते है। जो तरह-तरह के पंडे-पंडाइन हैं वे क्या करते हैं?? कुछ स्वयंभू-स्वघोषित मिल जाएंगे...पर शर्त लगाता हूँ कि अगर बहुत ही जरूरी दबाव न हो तो इधर हिन्दी के किसी रचना-कार को आप खुशी-खुशी पचास पेज न झेल पाएंगे।

उन सबने पांचवे दशक से ही पूरे देश के साहित्य-जगत में घुसपैठ की और कब्ज़ेदारी कर ली। सभी शिक्षा-संस्थान पकड़ लिए। धीरे-धीरे कब्जा हो गया। समाज मे नकारात्मक चित्रण से गहन असफलतावादी निराशा साहित्य लिख-लिख गहरी उदासी भर दी। एक पूरी पीढ़ी बिना जीवन जाने ही निरुत्साह से भर कर बर्बाद हो गई। खोपड़े का जहर आपको कुछ करने नही देता, उन्होने शिक्षा में मठपति वाली भूमिका पकड़ ली, आने वाली पीढ़ियाँ नौकर और नौकरी की मानसिकता से भर दिए… इतिहास बदल कर…. पाठ्यक्रमों को अपने अनुसार कर दिया महज….. विष-रोपण के लिए… अपनी गलीज - अप्राकृतिक विचारधारा के लिए उन्होने… राष्ट्र का आधार हिला कर कमजोर करने का काम किया। स्वाभिमान के बिंदु हिला दिए। अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और ललक कम करने की भरपूर कोशिश की।

उन्होंने प्रेस-अख़बार-चैनल माध्यमों (मीडिया.) में कार्यकर्ताओ को लगाकर कब्जा कर लिया। यह कब्जा देश की सभी भाषाओ मे लगातार जारी है। पहचानना कठिन नही है। देश के हर हिस्से मे पहचाने जा जा सकते हैं। समस्या यह है कि यह स्थिति भाषाओं को कमजोर करती जा रही है। उन्होने एनजीओ बना कर अरबों-खरब के वारे न्यारे किये। दूसरी तरफ उनके चेले-चापडो ने सिनेमा-टेलीविज़न व अन्य संचार माध्यमों में घुस कर पूरे देश-समाज पर अपनी सड़ान्ध को “इंपोज” करना चाहा। वह उद्देश्य एक ही है, लेखन-कम्यूनिकेशन के सहारे भड़ास भरके,. वर्ग-संघर्ष करवाकर देश को कमजोर करना। यह हथियार बन चुका है, आपको इसे समझना होगा। उनका लेखन, संवाद, एजेंडा, सोच, और तरीका पकड़ने की कोशिश करिए दिखने लगेगा। वो तो कहो “न्यूज, एक उत्पाद हो गया… उसकी परिभाषा तय हो गयी… वह घटना जिसका सम्बन्ध और रूचि अधिकतम लोगो से हो, और बाजार-विज्ञापनों से नियंत्रित होने लगा, नही तो शायद भारत मे सदियो से बह रहा सकारात्मकता की सतत-धारा लगभग नष्ट हो चुकी थी। भाई लोगो की दाल यहाँ सीधी तौर से न गली। वे बन गये दलाल… विचार-धारा गई तेल लेने। खबरों ने ज़रूर समय-समय पर कनफयूज करने मे सफलता पाई। उन्होने गंदे, बिना नहाए, दाढ़ी बढ़ाए, गन्हाये देह पर जींस-कुर्ते को “बौद्धिक फैशन” बनाने में एकबारगी सफलता जरुर पाई। परन्तु नशे में डूबी गांजे-चरस-सिगरेट और चारित्र्य-पतन की बदबू इतनी तेज थी, कि वह कभी जन-फैशन नही बन पाया। बल्कि लोग-बाग़ अपने बाल-बच्चो-बहू-बेटियों को दूर रहने की ताकीद करने लगे – “बच के रहना बचवा पैर छुवाया, तो किरकिची बान्धे आकर हाथ जरुर धुलना, तभी किरकची खोलना!” नक्सलिययों(अपराधियों) को भी नायक बनाने का खेल खेला गया, परंतु लूट पर ग़रीबों की हाय लग गई ! न गाँव के रहे न शहर के, ’बनावटी क्रांति, केवल अपराधिक साजिशो के रूप मे पहचाना जानें लगा। हां, कुछ कांग्रेसियों के ड्राइंग रूम में ”सजावटी क्रान्ति” एनजीओ रूप, में जरुर सजने लगी!!

वो तो खैर कहो! ईश्वरीय कृपा की वजह से व्यावसायिक- मसाला सिनेमा का दौर आ गया नही तो ‘प्रोइस्लामी कम्युनिष्ट एप्रोच” के चलते मुम्बईया सिनेमा भी सोवियत सिनेमा की हश्र का शिकार हो जाता। उन निदेशकों ने भी सिस्टम को लेकर जो फ़िल्में बनाएँ वह केवल बुराई, बनकर रह गई कभी निराकरण लेकर न आई। अगर ब्ल्यू-प्रिंट दिया भी तो केवल बुराई-बुराई-बुराई और वही कूड़ा-'कम्युनिष्ट, सोच। व्यवस्था पर फिल्में बनाने के लिए कभी किसी ने कभी कोई प्रयास क्यों नही किया, यह विचारणीय प्रश्न है। बाकी फिल्मी मसाला डाले बगैर कौन देखने वाला मिलेगा…न कभी मिलता था?
आप ध्यान देंगे तो दिखेगा इधर के सत्तर सालों में पूरे देश की सभी भाषाओं में एक विशिष्ट बात पकड़ में आएगी। जितने भी बड़े-प्रकाशक हैं, वह या तो कम्युनिस्ट रहे हैं या तो कम्युनिस्ट हैं। पब्लिशर्स की लिस्ट खुद बनाइये, मजा आएगा। शुरुआती दौर में ही इस फील्ड पर उन्होंने कब्जा सा कर लिया। इस मामले में उनकी प्लानिंग बेजोड़ दिखती है। देश के सारे बड़े प्रकाशक जो किताबे छापते हैं उपन्यास, कविताये, गद्य-पद्य साहित्य छापते हैं, जिन्होंने विभिन्न भाषाओं से अनुवाद प्रकाशित किये हैं। वह अधिकतर कम्युनिस्ट या प्रो इस्लामिक, लिटरेचर है। जेहन का शिकार तो देखिये। वे किसी रास्ते वास्तविक प्रतिभा को न बढ़ने देने की प्रतिज्ञा के साथ खड़े हैं। वे छात्र को कोई विकल्प ही नही उपलब्ध होने देना चाहते। कहो तो दूसरी भाषाएँ विशेषकर अगर इंग्लिश नही रही होती तो.... चाइना या पाक या अरब! अंग्रेजी की वजह से भारतीय पाठक जार्ज ऑरवेल, हक्सले, ड्यून, हेलर, टाकिन जैसो को पढ़ सके। जब हमने मारगेट मिशेल की 'गान विथ द विंड’ पढ़ी... तो खोपड़ा घूम गया। उनके चेले 'हिंदी पत्रकारिता,को एक नए आयाम पर ले जा रहे। जिन लोगो की कब्जेदारी, मठाधीशी है वे वामी-'चेतना के अनुवाद को ही पत्रकारिता कहते है। यह सबके लिए नई चीज है। वे हिंदी को खत्म करके 'प्रो-उर्दू, में बदल रहे हैं। अंग्रेजी का बढ़ा प्रभाव अपनी जगह है। बोलचाल में भी वे उर्दू शब्दो को घुसाते हैं, एक्सेप्ट करवाते हैं और कहते हैं कि यही सहज यानी कम्युनिकेटिव लगता है। 5 साल के प्रयोग के बाद वह सरल लगने भी लगता है। हम जब आये थे तब की अखबारी-दुनियां हिंदी भाषा के कुल '6 हजार शब्द, इस्तेमाल कर रही थी। आज कुल 3600 'शब्द, ("शब्द,कह रहा हूं जिसे वह "लफ्ज, में बदलने को आतुर हैं) ही बचे हैं। उर्दू के 2 हजार नए घुसपैठिये हमारी भाषा में घुसा दिए गए। अब वही आसान लगती है। अंग्रेजी और अन्य भाषाओं से कुल 400 नए शब्द घुस पाए हैं। इन 20 सालो में यह बड़ी सुनियोजित हो रहा है। भाषा विज्ञान का मान्य थ्योरी-सिद्धांत आज भी वही है। जरा फैक्ट देखिये!

'''दो साल तक रोजमर्रा(यह शब्द आसान लगने लगा) लगातार इस्तेमाल वाली अप्राकृतिक(नैसर्गिक घुस गया) चीज भी धीरे-धीरे आसान और अपनी लगती है। जो चींजे उपयोग से बाहर होती हैं वे कठिन-क्लिष्ट-दुरूह लगने लगती है। वे धीरे-धीरे हमारी शब्दावलियों को चलन से बाहर करके क्लिष्ट और दुरूह में बदल रहे है।अपने शब्दों को घुसाकर सरल और सहज बना रहे है। ''अवचेतन थ्योरी, अनजाने में हमारे लोग भी नकल ही मारते है। तो नित्य उपयोग होने वाला अखबार,हर घण्टे यूज होने वाले चैनल,.हफ्ते में कई बार देखने वॉला सिनेमा....प्रतिक्षण बजने वाले गाने,सब सब वैपन में बदल गए हैं, सब चारो तरफ से घेर कर हमारी 'भाषा, को धीरे-धीरे मार रहे हैं। केवल हिंदी ही नही भारत की सभी भाषाओं में यह घुस-पैठ चालू है। हमें पता ही नही चलता। सूचना क्रांति के 'कम्युनकेशन, के यह माध्यम सबसे 'खतरनाक हथियार, बन चुके हैं। उनका सबसे क्रूर इस्तेमाल वामी-सामी-कमी कर रहे हैं। आपके दिमाग पर हर तरफ से अपनी बातें घुसेड़ देने को तत्पर हैं। आपके जीवन का एक महत्वपूर्ण बिंदु बनता चला जाता है यह भारतीय साहित्यकारों का हमला करने का एक तरीका है। त्याग, निर्माण, विकास गहरी सकारात्मकता से उपजता है। भक्ति उसका आधार है। केवल बुराई द्वंद-संघर्ष-निन्दा-रस के सहारे आप आप सनातन समाज की नींव नही हिला सकते। उसका आधार बहुत गहरा है। भारतीय समाज टनों वार्ता को एक-बूँद त्याग के आगे कुछ नही मानता।

लड़के-पाठक “एरोस्मिथ” खोज ही लेते है। रिचर्ड कवि की “सेवन हैबिटस’ …,,और श्वार्ट्ज की ''पावर आफ पाजीतिव थिंग्स, जिग-जिगलर की ''मीट तो हाइट, उनको स्तान्धाल और जैक-लंडन मिल ही जाता है। तुम्हारी नकारात्मकता और द्वन्द-संघर्ष व कूड़ा तुम्ही खाओ और बीमार होओ। धीरे-धीरे हमने छिपे हथियार पहचानने शुरू कर दिये है। इनकी समस्या ये थी की दूसरों के श्रम, मेहनत, सम्पत्ति को बांटने की बात करने वाले खुद की पाई भी बांटने को तैयार न दीखते। त्याग का उदाहरण ढूंढे न मिले किसी भी नकारात्मक विचार में त्याग कहाँ से आएगा। साहित्य लेखन के सहारे वे घुस तो गये। नौकरी-सौकरी टाइप की कोई चीज जरूर मिल गई। पर समष्टि जगत कि चिंतन-धारा से जुड़े बगैर, जाने-बगैर कुछ नही मिलने वाला था। इसलिए हथियार भोथरा हो गया। परंतु सबसे बड़ा खतरा यह है राष्ट्र के चार तत्त्वो जन, भूमि, संस्कृति, भाषा मे से एक भाषा पर उनका एकाधिकार हो गया है। यह ऐसा है जैसे कि हमारे ''परमाण्विक वैपन” पर शत्रु का कब्जा हो जाना। उस शस्त्र से वे लगातार राष्ट्रीय छवि को कमजोर करने का प्रयत्न करते है।


दूसरा हिस्सा है इतिहास...

1) 'इतिहास किसी राष्ट्र-समाज की जड़ को खाद-पानी और ऊर्जा देने का काम करता है - देकार्त,
2) "किसी समाज का सुख व् विकास उसके नागरिको के भविष्य के सुनहले सपनों,सक्रिय वर्तमान और शानदार इतिहास की गौरव गाथाओं,पर निर्भर करता है - पण्डित दीन दयाल उपाध्याय,

आपने रोलैंड एमरिक की 1996 में आई फिल्म 'इंडिपेंडेंस डे,देखी होगी?? विल-स्मिथ की फिल्में वैसे ही बहुत लोग नही छोड़ते। बिल पलमन, जेफ गोल्डब्लम,मैरी मैकनाल्ड की जबरदस्त हिट फिल्म थी। उस साल 950 मिलियन डॉलर कमाए थे।कई सरकारों की सालाना बजट से 3 गुना ज्यादा। उस समय तक इतनी भव्य फिल्म रिलीज नही हुई थी।अमेरिका के स्वातंत्र्य दिवस पर रिलीज हुई थी। आपको पता है मुझे उस फिल्म में सबसे ज्यादा क्या पसंद आया? वह एक एलियन शिप था। जो बहुत बड़ा था। जब वह दिखा तो उसने हरियाणा राज्य के बराबर जगह घेर रखी थी ऊपर छत की तरह। हम तो सनसनाहट से भर उठते। ऊपर जब वह दिखाई पड़ा तो जनता डर गई। लोग मारे जाने लगे। सेनाएं उधर की तरफ हथियार लेकर जब बढ़ी तो उससे निकली 'नीली रेज, ने मार दिया। एक से एक,विमान, हेलीकॉप्टर मिसाइल मिनट भर में नष्ट कर देते दुनिया की सारी सरकारे परेशान हो गयी। सब एक जुट हो गए। परमाणु हथियार तक बेअसर। सब बड़े-बड़े लोगो की मीटिंग हुई। मीटिंग में यह बात उभरकर के सामने आई कि वह बहुत एडवांस टेक्नोलॉजी के लोग है। किसी मजबूत ग्रह के एलियंस है हमले करके धरती पर रहने आये हैं। दुनिया भर में जितनी भी मौजूद टेक्नोलॉजी है उससे कई गुना ज्यादा एडवांस है वह। मीटिंग में गहन चिंतन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया, कि अगर हम उस स्पेस शिप की सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी को समझ लें तो हम उससे जीत सकते हैं।

बहरहाल वैज्ञानिकों ने यह बात पकड़ ली कि उस शिप में कंप्यूटर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल है। हम अगर किसी तरह उसमे एक 'वायरस, डाल दे तो पूरी शिप नष्ट हो सकती है। हममें से जिसने वह फिल्म देखी होगी। याद करे कि जब विल-स्मिथ और विल-पलमन क्लाइमेक्स सीन में वायरस डाल कर निकलते हैं।आप की सांस न रुक जाए तो कहना! वह पूरी की उतनी बड़ी स्पेश-शिप जो बहुत एडवांस टेक्नोलॉजी से सुरक्षित थी वह गजब चेन-रिएक्शन से तबाह हो जाती है।फ्रीज! दोनों हीरो आग के मंजर के आगे हेलमेट सम्भाले हेलीकाप्टर से बाहर उतरते हैं। मुझे इस फिल्म की यह बात बहुत सोचने को मजबूर कर देती है कि कैसा भी सॉफ्टवेयर क्यों न हो एक वायरस उसे बर्बाद ही कर देता है। वह पूरी शिप जो पूरी दुनियां को हराने की क्षमता से लैस थी, एक झटके से नष्ट हो जाती है।पता है उसे तबाह कौन करता है? हीरो या सेना नही। केवल एक वायरस! हां... न दिखने वाला बहुत छोटा सा वायरस इस जगत की तीस-गुना ज्यादा तगड़ी टेक्नोलॉजी और मारक-क्षमता वाले शिप को तबाह कर देता है। वे जिससे जीत नही पाते उसमे 'वायरस, डालते है। इतिहास को बदलना वही वायरस है जो उन्नत सभ्यता,संस्कृति,रचनाये,विज्ञानं,रिद्धि-सिद्धि चिंतन,त्याग-बलिदान,शौर्य से भरे अतीत के अलावा मौजूद दुनिया से तीन सौ गुना ज्यादा,आध्यात्मिक ऊर्जा से भरे सनातन भारतीय प्रवाह नष्ट करने के लिए डाला गया है। न दिखने वाला यह 'खतरनाक वायरस,धीरे-धीरे सब तबाह कर देता है। केवल एक उदाहरण के लिए देखिये! सारी दुनिया जानती है देश के बंटवारे से कौन परेशान हुआ। किसका घाटा हुआ। हिन्दुओ के पितरो की हजारो साल पुरानी जमीन छीन ली, उसके बाद भी..।

23 प्रतिशत मुस्लिमो में से 12 प्रतिशत ही गये। 30 प्रतिशत जमीन ले गए। 2 करोड़ लोग उजड़ गये। 30 लाख लोग मारे गए, जेवरात, धन-दौलत, घर-बार जवान लडकिया छीन ली। सालो सर पर आसमान नही... लेकिन आज के इतिहास की किताब से दृश्य गायब है। कारण जानते है न। सेखुलर। अब एक और तुरन्त बाद का तथ्य नाम सहित देखें... इतिहास बोध और उनकी सजगता/आक्रामकता को देश बंटने पर उनकी तुरत-फुरत लिखी पुस्तके देखिये जरा। जो बेचारा भुक्त-भोगी रहा उस्की तरफ से कोई बोलने सुनने वाला ही नही रह गया। भुक्तभोगियों को इतिहास बोध नही होता न। इस टॉपिक पर लिखी गई कुल 31 किताबो में 28 मुस्लिमो और वामपंथियो ने लिखी है। अधिकतर डाक्यूमेंटरी भी कम्युनिष्टों और मुसलमानों ने ही अपने दृष्टिकोण से बनाया है। देश बंटने पर यह किताबे पढियेगा। जब भी मौका मिले... इतिहास के अलावा।

फ्रीडम ऐट मिडनाइट-नहरू,मिडनाइट चिल्ड्रेन-सलमान रश्दी,लिबर्टी आर डेथ-पेट्रीक फेच,क्रैकिंग इण्डिया-बाप्सी इंडिया विन्स फ्रीडम- मौलाना आजाद, अ बैंड इन गंगाज, मनोहर मलगांवकर, ट्रेन टू पाकिस्तान, खुशवंत, व्हाट द बडी रिमेम्बर, सौना सिंह बालदवीं, झूठा सच,..यशपाल, इंडियन समर, अलेक्स सुलेमान क्लियर लाइट आफ द डे, अनीता देसाई। 'आजादी,, कोई मुस्लिम है नाम नही याद आ रहा 26 साल पहले पढ़ी थी, यह उपन्यास है एकाडमी प्राइज दी गई थी, टोबा टेक सिंह, मन्टो, अदर साइड आफ साइलेन्स, उर्वसी बूटा, पिंजर, अमृता प्रीतम। उन सभी किताबो में बड़े तरीके से बंटवारे के कारणों-और दोषियों को भटकाया गया है। भविष्य में हजार साल बाद जब शोध होगा 'शान्तिदूत,सेकुलर होंगे और 'खरगोश, बड़ा शिकारी कहा जाएगा। बाद एक एनलिस्टिक पुस्तक एचवी शेषाद्री जी ने लिखी थी ''... और देश बंट गया, पढियेगा। "दर्द-कष्ट हिन्दुओ ने भुगता और किताबे किसने ज्यादा लिखी। यह होता है इतिहास बनाना। वायरस। एक जबरदस्त हथियार। समझिये और आप भी रोज इतिहास बनाइये, लिखिए। कल को यही रिकार्ड होगा।  हमने हिस्ट्री सेन्स नही विकसित किया। न हमारे यहां उसकी जरूरत ही थी। विद्या को कभी 'साजिशी,चीज न मानकर पवित्रता-श्रध्दा की चीज समझा गया। आज आप दिमाग में बैठा लें कि वह भी एक जहरीला हथियार है, दिमागी वायरस जो सब कुछ नष्ट कर देता है। हजारो साल का 'क्रियेशन-श्रम, इससे चुरा लिया जाता है। शानदार अतीत का स्वाभिमान नष्ट करके, बाप-दादो की संस्कृति-निशानिया मिटा कर... कुंठा और आत्महीनता बोध में जकड़ दिया जाता है। सबसे खतरनाक बात किसी राष्ट्र की जड़ के खाद-पानी समाप्त कर दिए जाते हैं। इतिहास बिगाड़ दो समाज छिन्न-भिन्न हो जाएगा। बेसिकली इतिहास की एक परिभाषा दुनिया भर में मशहूर और मान्यता प्राप्त है' 'यह ऐसा ही है, यानी वैसे का वैसा रखने को इतिहास कहा गया था। हमारे यहां इतिहास को 'पुराण, यानी कि 'पुराना,,पुरानी बातें संग्रहित करने की अवधारणा थी... उसका बेस धर्म-अध्यात्म के संरक्षण से था.... यह धर्म पुनर्जन्म और नश्वरता-विज्ञान पर आधारित है। इन अवधारणाओं को अंग्रेजी और इस्लामी सेमेटिक विचारधारा ने एकदम से प्रयोग करके नष्ट कर दिया। हमारी अवधारणा इतिहास को लेकर काल, स्थान, प्रसिद्ध व्यक्ति, घटनाओं का संग्रह, संस्कृति,और क्रमबद्ध वर्णन न होकर केवल आध्यात्मिक चेतना के प्रति समग्र-चिंतन के इर्द गिर्द सिमटा था। उसने इतिहास बोध(History Sense) को बिगाड़ दिया। असल में दसवीं शताब्दी के हमारे विचारक यह जान ही नही पाये कि 'इतिहास की किताबें, भी आक्रमण करने का सबसे सटीक औजार है। इस औजार को इस्लाम ने अविष्कृत (बनाया) किया है और यूरोपियनस ने पुष्पित-पल्लवित किया। 'हेरोडोटस इतिहास पद्धति,, ने दुनियाभर में इतिहास की अवधारणा को कालानुक्रमानुपाती में बदल डाला था। इतिहास रचना एक शासकीय नीति होती है। एक हजार साल की गुलामी से भारत में उसका बड़ा दुष्परिणाम निकला। उन्होंने प्राचीन इतिहास से लेकर मध्य और वर्तमान इतिहास के सारे, तथ्यों, प्रमाणों, घटनाओं और प्रभावों को अपने स्वार्थ-लाभ-योजनाओ के लिहाज इसमें तोड़-मरोड़ कर डाला। उनकी रणनीतियां प्रस्तुति,और तरीका साजिशी था।

यहां से देखिए..। जिसे धर्म-निरपेक्ष भी माना गया है वह अलबरूनी एक मुस्लिम इतिहासकार था। गजनवी के साथ हिंदुस्तान आया था। उनकी आक्रामकता हिस्ट्री सेन्स पर लेकर उनकी आक्रामकता इससे समझिये। दशवी शताब्दी के समय लिखता है कि "हिंदू से जब उसके इतिहास के बारे में पूछा जाता है तो हिंदू 'कहानियां, गढ़ने लगता है, झूठ बोलता है और कल्पनाए सुनाने लगता है। अलबरूनी के अनुसार हिंदुओं में बहुत सारे दोष हैं, उनकी समझ कम है वे कट्टर है, संसार के बारे में कुछ नहीं जानते और उनके पास बड़ी अज्ञानता है। सोचिये जरा! उसकी सोच दर्शाती है कि रामायण, वेदों, महाभारत, पुराणों(दुनियां के सबसे पुराने लिखित ग्रन्थ) और अन्य बातों को झुठलाकर, काल्पनिक करार देना है। बाद के इतिहासकारो ने भी लगातार यही किया। अल्बुकर्क, अलबरूनी, इब्नबतूता इन सभी ने एक ही बाते, एक ही तर्क पर जोर दिया हैं, हिंदू काल्पनिक और झूठा लिखता है। इसे रटा-रटा कर आधार बना दिया गया। आप क्लास सिक्स्थ से इसे रटना शुरू करते हैं बल्कि आपको लगातार रटवाया जाता रहा है। आप वहीं लिखते हैं, उन्हें पढ़ते हैं, और उन्हीं से परीक्षाएं पास करते हैंl यह लगातार पीजी कोर्सेज (परास्नातक) तक चलता है। वे आपके खोपड़े के हर हिस्से में बैठा देना चाहते हैं। यही उनकी स्ट्रेटजी है। यह वर्तमान सेकुलेरिज्म का आधार बनाया गया है। इससे सजग रहने की जरूरत थी। लेकिन हमारे अंदर से इस तरह का नेतृत्व उभरने ही नहीं दिया गया। जो इसको खण्डन कर सकता, समझा सकता। विश्व के सभी देशो का पाठ्यक्रम चेक कर लीजिए, तुलनात्मक अध्ययन कर डालिये अपने ही पूर्वजो के प्रति इतनी बेईमान, धूर्त और गैर-जिम्मेदार सरकारें नही दिखेंगी-मिलेंगी। जबकी इतिहास के सारे तत्व और प्रमाण उनमे मौजूद है।घटना, व्यक्ति, स्थान, कालखंड-क्रम-उसके प्रमाण और पुरातात्विक साक्ष्य भी। अन्ग्रेज और विदेशी कांग्रेसी शासको का इस पर जोर रहा कि कहीं भारतीय इतिहास-दर्शन और अवधारणाओ का आधार 'वैदिक,पौराणिक,या सनातनी न बन जाए। यह खड़ा होते ही उनके वैश्विक कब्जेदारी व् कारोबार क़ी नींव हिलने का डर था। यदि उसको आधुनिक वैज्ञानिक पैरामीटर पर कसने/रखने का प्रयास किया गया गया होता तो शायद आज 'भारत वर्ष, विश्वगुरु ही नही सिरमौर भी होता। यही तो वामियो, ईसाइयो, और मुस्लिमो-कांग्रेसियो का वास्तविक डर था। अतः जम कर उसे नीचा दिखाने में लग गए। इतिहास को विकृत करने के पीछे एक-सोची-समझी पूर्वाग्रही मंशा काम कर रही थी। उनके लेखन के पीछे मुख्य छिपे उद्देश्य देखिये!

1- ब्रेनवाश
2- राष्ट्र-आधार पर हमला- आक्रांताओ की तरह ही 'आर्य, बाहर से आये।
3- स्थापित इतिहास झुठलाना-रामायण,महाभारत,वेद,पुराण,हजारो प्राप्त पुस्तके काल्पनिक है, अप्रमाणिक है पर जोर दिया।
4. जन को दिमागी रूप से विभाजन का बेस। वेद-बेदान्त और अन्य ग्रन्थ ब्राम्हण-ग्रन्थ है, बौध्द, जैन, सिक्ख, आदि सम्प्रदाय रूप उन्ही की देंन है। सनातन समाज में बंटवारे-विभाजन की कोशिश करते रहते हैं। जातीय व्यवस्था इस्लाम द्वारा उपजाई और अंग्रेजो-कांग्रेसियो ने पोषित की। इतिहासकारो ने विषय ही गायब कर दिया। इसको कोई भी एक बार में समझ सकता है।
5- राष्ट्र का आत्म-विश्वास हिलाना -- निरन्तर हारो का ही वर्णन किया गया। जहां जीते उसका सारा विवरण गायब है। इतिहास के कुल 5300 युद्दों में इस्लामिक केवल 156 युद्द ही जीत सके। क्या ये कही पढाया जाता है??
6- राष्ट्रीयता के फ्लो गायब करने की लगातार कोशिश करते रहे। हर चीज में अलगाव की कोशिष है।
7- नया वैश्विक इकनॉमिक ढांचा बनाना। स्थानीय राष्ट्र-राज्य खत्म होने के आर्थिक लाभ होते है। इसमें कुछ लोगो के कारोबारी उद्देश्य छुपे है। वह भी कारण।
8- बौद्धिक रूप से सनातन समाज पर हावी होने की कोशिश। कुंठा और आत्महीनता उत्प्न्न करना।
9- धर्मांतरण-मतांतरण मूल,वर्ग-संघर्ष कराना। ईसाई-मुस्लिम-वामियों द्वारा इतिहास बिगाड़ने के पीछे यही मुख्य उद्देश्य था।
10- सेकुलरिज्म एक आवरण: खुद को लॉजिकल प्रूव करना।
11- डराना :- खुद ढूंढिये उनकी मंशा दिखने लगेगी। इसाई, इस्लाम और कम्युनिष्ट तथा कांग्रेसियो की सोच समझने में आसानी होगी। उनके छिपे एजेंडे भी दिखेंगे। उनके इस हथियार की मारक-क्षमता भी पकड़ में आयेगी बस थोड़ा सा दिमाग लगाने की जरूरत है।

सबसे पहले कन्फ्यूजन फैलाया गया, फिर उसमें घुसपैठ कर के नए-नए फैक्ट पैदा किए गए, फिर मनगढ़ंत चीजो को उसमें इंपोर्ट किया गया। उसके लिए मुस्लिम-शासको-योजनाकारों के अलावा 1837 के बाद 1920 तक कई अंग्रेज इतिहासकार लगातार वैतनिक रूप से सक्रिय रहे। मैक्सवेबर, मूर, मैक्समिलियन, मैकाइवर (समाजशास्त्र), मैक्स-मूलर जैसे इतिहासकारो भारतीय इतिहास को रिफार्म कर दिया.. मैकाले इसके माई-बाप थे... बेंटिंग फंडर। बाद में कांग्रेसी शासक जो कि उन्ही के प्रतिनिधि तौर पर भारत में स्थापित किये गए उसी के बल पर देश को ही 'रि-कलचर्ड करने में लग गए। उसी का परिणाम है देश में एक बहुत बड़ा भ्रमित वर्ग खड़ा हो गया है। इस्लाम इस मामले में कहीं ज्यादा सजग-सक्रिय था। उससे 'सांस्कृतिक-आध्यात्मिक, मजबूत होने के कारण अन्य जमीनों की तरह भारत में उसे "पूर्ण इस्लामिक राज्य, बनाने में सफलता नही मिली। गुलामी के 8 सौ सालों में हर गली मौक़ा मिलते ही विद्रोह करता-जान दे देता-मारा जाता। 400 साल तक हिन्दू इंच-इंच लड़कर घुसने ही नही दिया ई. 600-1000 इस्लामिक कब्जेदारी के बावजूद हिन्दुओ ने धर्मांतरण के बजाय 50 प्रतिशत तक जजिया देना पसन्द किया, पर पूर्वजो की थाती न छोड़ी। यह सब देखकर उनके विचारको ने दूरगामी रणनीति बनाई। सोच की एक बानगी देखिये "पाकिस्तान में 6ठी,7वी,8वी में पढ़ाया जाता है। 1968 में भारत को पाकिस्तान की सेनाओं ने रौंद डाला,..। 1971 में भारत की बुरी तरह हारने के कारण लिखो... और भी बहुत कुछ.. जिसे पढ़कर हंसी रोके न रुकेगी। 5 हजार साल का पाकिस्तानी इतिहास! इससे आप मिनहाज, फिरदौजी, फरिश्ता, बर्नी से लेकर नुरुल-हसन तक के लिखे इतिहास की मानसिकता का अंदाजा लगा सकते हैं। सबसे मजेदार चीज वे हमारे सेकुलर-इतिहास-लेखन का आधार हैं। उनके लेखन को पढ़कर आप यकीन से कहेंगे कि उन्होने 11 वीं सदी में ही यह प्लान कर लिया कि भारतीय इतिहास में इस्लामिक इतिहास को इस ढंग से पिरोना है कि भविष्य में 'सनातन-राष्ट्र की अवधारणा ही डगमगा जाए। असल उद्देश्य पूर्ण धर्मांतरण था जैसा कि अन्य 82 मुस्लिम देशों में हुआ.

सभी मुस्लिम इतिहासकारो के साथ आप देखेंगे कि वह इतिहासकार नही बल्कि मुसलमान ज्यादा है।वह दृष्टिकोण का जेहादी है। वह बड़ी खूबसूरती से बातें करते हैं, लॉजिकल-या प्रमाणिक होने-दिखने की कोशिश करते हैं, दूसरे को नीचा दिखाते है, बड़े तरीके से आप में आपकी चीजों को नष्ट करते हैं और आपको बताते हैं कि आप के पास तो कुछ था ही नही, यह हमारा है, थोड़ा आप भी ले सकते हैं। आप तो पिछड़े है, दकियानूस, जातियां है, विभाजन है, विभाजित रहें, सब अलग-हो, वे लड़ाई का इतिहास बनाते रहे और हम मान लेते रहे। बड़ा खूबसूरत मामला है 1 हजार सालों के शासक वे थे। शोषक कोई दूसरा था?? बड़ी मजेदार बात, वह उपासना स्थान, बिल्डिंगे गिरा देते थे, पुस्तकालय जला देते. आप इस्लाम के साथ छठी शताब्दी से ही यह देखेंगे कि उन्होंने सबसे ज्यादा बार पूर्वजों और उनकी बातो पर हमले किया। उन्होंने इतिहास की किताब भी जला डाली, उन्होंने पुरानी सारी किताबें जला डाली, किताबे, आश्रम, मठ, मंदिर उनके रास्ते का रुकावट थे न!

उनको यह बात पक्की तौर पर मालूम था कि सनातनियो का इतिहास है, वह अतीत की यादें मजबूत रखती हैं। दारुल-ए-इस्लाम की रुकावट है। वह कांगड़ा के भव्य मंदिर गिराते हैं, पुस्तकालय नष्ट करते हैं, वह थानेश्वर गिराते हैं पुस्तकालय नष्ट करते हैं, वह दिल्ली जीते हैं पुस्तकालय नष्ट करते हैं, अयोध्या जीते हैं पुस्तकालय नष्ट करते हैं, वह नालंदा में घुसते हैं पुस्तकालय नष्ट कर देते हैं, छः माह तक किताबे जलती रह गईं। वह उज्जयनी में घुसते हैं पुस्तकालय नष्ट कर देते हैं, वह बंगाल जाते हैं वहां जितनी किताबें हैं सब जला देते हैं। हजारो उदाहरण हैं, देश के सभी हिस्सों में उन्होंने यही किया। सब जला कर राख कर देते है। हमारा इतिहास गिराने-मिटाने की मानसिकता समझ रहे न?? गिरा भी रहे और खुद की लिखी-बनाई भी जा रहीं। कहो तो स्मृतियां थी। आस्थावश रटी हुई थी। कुछ कन्दराओं में छुपा कर रखी गई। दूर-दराज के साधू-सन्यासी-सन्त-योगी-जोगड़े लेकर घूमते रहे। कुछ बची रह गई। आज के वही धार्मिक साहित्य आप देख पा रहे हैं हमारे उन बलिदानी पुरखो को शत-शत प्रणाम। मैं कंटेंट में नही जाऊँगा। क्योकि विषय बहुत लंबा हो जाएगा। पर कुछ नामो पर चर्चा करूँगा, जिससे समझ में आएगा की वे शुरुआत से ही 'इतिहास, के मामले में कितने एग्रेसिव है। 12वीं सेंचुरी में दो इतिहासकार हुए हेमचंद्र और कल्हण उन्हें बड़ी चतुराई से प्राचीन इतिहास का आधार लिया है। राजतरंगिणी एक गाँव से मिल गई थी। जलाई न जा सकी थी। अब आगे के पांच सौ साल को देखिये! आपके देश की ऐतिहासिक सभ्यता का कबाड़ कौन निकाल रहा है. तेरहवी में मिनहाज सिराज, 14वीं में जियाउद्दीन बर्नी, 15वी में अबुल फजल ममूरी, जोनरजा, निजामुद्दीन अहमद, दक्षिण में श्रीवरा को कही कही अपने अनुसार आधार ले लिया है। 16वीं अब्बास शरवनी, अबुल फजल इब्न मुबारक, गुलबदन बेगम, निजामुद्दीन अहमद, अब्दुल कादिर बदायूनी,प्रज्ञ भट्ट इनके ऊपर सन्देह है। 17वीं सदी, इब्न फरिश्ता (पुराना वाला नही, इनायत खान, शेख इनायत अल्लाह कंबो, मोहम्मद सालेह खंबो, मुनाट नैंसी... इतने बड़े देश में, जो लिखाई पढ़ाई में मुस्लिमो से किसी मायने में कम नही था, पुरे देश के सभी भाषाओं में 45 सौ से अधिक रचनाएं हुई किन्तु इतिहास गायब है?? का समझे???

कुल 137 मुस्लिम इतिहास लेखकों को आधार बनाकर मध्यकाल लिखा गया। प्राचीन काल तो जैसा चाहे लिखवा दिए... तत्कालीन साहित्य को काल्पनिक बताकर। वर्तमान जिसे आधुनिक कहते है उस पर नियंत्रण है हुजूर का। क्या कर लेंगे जो पढाएं पढिये। 18वी सदी में श्री कृष्णा भट्ट, मोहम्मद अजाम दिदामारी, शमशुद्दीन दौला शाहनवाज खान, गुलाम हुसैन सलीम। इतिहास में जमकर लगे रहे। परन्तु कुछ योद्धा खड़े हुए 19वी शती में हेमचन्द्र राय चौधरी, कृष्णा स्वामी आयंगर, केसु मंञ मयंक, बीएल प्राइस, डीआर भंडारकर, आरजी भंडारकर, रतन सिंह, दयाराम साहनी, बृजेंद्र नाथ डे, हरीनाथ डे,, सहजानन्द, रोमेश चंदेल, फ्रांसिस्को लुइस गोम्स, भगवानलाल इंद्रजी, श्रीनिवास आयंगर, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, एलडी स्वामी कन्नू पिल्ले, उन्होंने मोर्चा लेने की कोशिश की, पर देखते ही देखते सामी-वामी-कामियों ने कब्जा कर लिए। राजा शिवप्रसाद, विश्वनाथ काशीनाथ राजवाडे, राम गरीब चौबे, आरजू वेंकट-लक्ष्मण राव, गोविंद सखाराम सरदेसाई, जदुनाथ सरकार, कृष्ण शास्त्री बृजेंद्र नाथ सील जैसे योद्धाओ की पुस्तकें केवल लाइब्रेरियों में सड़ने के लिए थी। उनसे आप पास नही हो सकते थे न ही अच्छी नौकरी मिल पाती। फिर कोई क्यों उस शैली के लेखन की तरफ मुंह करेगा। आप क्या सोच रहे हैं यह उनके 'क्षणिक उन्माद, में हो रहा था? नहीं। ऐसा बिल्कुल नहीं है। वह एक सुनियोजित रचना के अनुसार नष्ट-भ्रष्ट कर रहे थे। इसका आधार मजहबी धारणाएं हैं। बापदादों से जुड़ने के लिए कोई आधार ही न बचे। एक तरफ तो आपकी किताबें वह जला रहे थे, नष्ट कर रहे थे। एक से एक विद्वानों की निशानी, एक से एक चिंतन, आध्यात्मिक अनुभूतियाँ, ज्ञान-विज्ञान, ज्योतिष, रसायन, मैटीरियल, टेक्नालाजी, फार्मूला मिटा रहे थे और दुसरी तरफ खुद का लिख रहे थे रहे थे। मिनहाजुद्दीन से लेकर नुरुल हसन, इरफ़ान हबीब। गजनवी के शासकीय इतिहासकार फिरदौजी से लेकर बाबरीनामा, आईन-ए-अकबरी से होते हुए इतुजुके-जहांगीरी से अबुल फजल से डीडी कोशाम्बी, रोमिला थापर, विपिन चंद्रा तक दूसरे का इतिहास खत्म/ध्वस्त करते हुए हमारी बुनियाद हिलाते हुए ही तो आगे जा रहे हैं। यह सोची-समझी स्ट्रेटजी थी।

''आजादी के बाद के इतिहास रचना में देश के स्थानीय इतिहास पर जान-बूझ कर काम नही होने दिया गया। अवध, काशी, असम, नेपाल, गढ़वाल, कुमायूं और राजस्थान, सौराष्ट्र, मिथिला, महाकौशल, वनांचल आदि भूभागों का गैप जान बूझकर रखा गया है...। ऐसा लगता है कि कई हिस्से के अतीत को छिपाकर रखा गया है जिससे उनके द्वारा रचा गया झूठ सामने न आने लगे। इसे बाद के कांग्रेसियो ने बुरी तरह मेनुपुलेट किया है। वामियों और मुस्लिम इतिहासकारों ने इसको एक निश्चित एजेंडे से तैयार किया था। बेसिकली उन्हें लगता था भविष्य में भारत को कई हिस्से में बंटवा लेंगे। भारत राष्ट्र की अवधारणा ही खत्म हो जायेगी। अन्ग्रेजो ने भी इसी दृष्टि पहले ही उसमे गहरी छेड़छाड़ की थी। उन्होंने सोचा था कि जल्द ही राज्य अलग-अलग देशो की मॉन्ग के साथ बगावत करेंगे और भारत खत्म हो जाएगा। उनको 'सनातन राष्ट्र, की समझ नही थी नही तो 1947 में ही कर देते, फिर राष्ट्रात्मा जग गई.... सनातन काल प्रवाह ने उछाल मारी, उनकी योजनाएं धराशाई हो रही हैं। यह 1977 में फिर तैयार हुआ.... इस रोड मैप को पाकिस्तान में आईएसआई के हामिद गुल ने पुनः तैयार किया है। गजवा-ए-हिन्द एक कोड है..! आपने अब्दुल फजल ममोरी, आजाद बिलग्रामी, मोहम्मद हबीब, इनायत खान, शेख मोहम्मद इकबाल, मीर अहमद नसरुल्लाह ठट्वी, समसुद्दीन-दाऊद-उल्ला-शाह नवाज खान आदि नाम सुने होंगे? अगर नहीं सुना, तो यहां सुन लीजिये। यह वह मशहूर मुस्लिम इतिहासकार हैं। जिन्होंने हिंदुस्तानी इतिहास अपने झूठे लेखन से बदल डाला। उन्होंने अपनी धारणाएं, इतिहास दर्शन, इस्लामिक इतिहास चेतना, आज भारतीय समाज पर मढ दिया। आज हम उनको धारण किए हुए लगातार घूम रहे हैं। नए बच्चे उनको सीखते हैं। उनकी गढ़ी काल्पनिक सूचनाओं से अपने एग्जाम पास करते हैं और अपने समाज के अपने इतिहास को भूल जाते हैं। धारणा ही खराब कर दी गयी है, अवचेतन पर वह कुछ छाप दिया जा रहा, जिसे 11 हवी शती से ही शासक पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे मन-मष्तिष्क में भर रहे। मैं अपने पुरखों पर घमंड से भर जाता हूं कि चारो तरफ के जानलेवा दबाव के बावजूद वह हिन्दू बने रह गये। आप आज वह कुछ सोच और कर रहे हैं, जो भी कुछ उपरोक्त इतिहासकार चाहते थे। उन्होंने कल्पना की, लिख दिया और भविष्य के वामी,कांग्रेसी चतुरो ने उसे लपक लिया।

भारतीय राजे साहित्य रचनाओ के भंडार थे.. पर जीवनियां और इतिहास लिखने नही बैठे। उन्हें इतिहास बोध, और उसकी साजिशो का जरा भी अहसास नही था। पर मुस्लिम सुल्तान तो छोड़िए गजनवी से लेकर तैमूर और आक्रांता बाबर भी "नामा” इतिहास को लेकर सजग है। सभी अपने शासकीय इतिहासकार रखते हैं। मिनहाजुद्दीन सिराज से लेकर इब्नबतूता तक,सब एक ही काम में जुटे हुए थे। बाद में अंग्रेजो और परवर्ती का काँग्रेसी वंशवादी शासक इसे लेकर और चौकन्ने थे। उन्होंने लगातार अपने पोषित पालतू इस काम के लिए रख छोड़े थे। जिनका काम एक निश्चित एजेंडे के तहत इतिहास लेखन था। जब भी समय हो तो आप पढिये। लेकिन मैन्युपुलेशन, आर्टिपुलेशन को ध्यान में रखिये तो दिखेगा। पूरे इंटेशन से कांग्रेसी शासकों ने कुत्सित मंशा के तहत शासकीय नीति बनाकर रोमिला थापर, विपिन चंद्रा, करण शर्मा, रामचंद्र गुहा, इरफान हबीब, बीजीएल स्वामी, वरुण डे, दीपेश चक्रवर्ती, विलियम डेलरिंपल, सुमित सरकार, द्विजेंद्र नारायण झा, सतीश चंद्र, एसटी जोशी, एस स्वामी, जॉर्ज मेकेनेरी, बरबरा मटकाफ, गोविंद चंद्रपाल, अब्दुल कादिर, जैसों को रखकर भारतीय इतिहास को गुमराह करवाया। उन सबने हमारे ही पैसे से भारतीय इतिहास के साथ केवल न केवल बालात्कार किया बल्कि घुटे अपराधियो की तरह तमाम बचे-खुचे प्रमाणों को गायब किया था। केवल मालिकांनो का हित जो साधना था। उनके अपने एजेंडे थे किसी भी तरह हर स्थापित ऐतिहासिक धारणाओं को विवादास्पद बनाओ। बर्बाद करो। न कर पाओ तो कन्फ्यूज कर दो। कम्युनिष्ट पार्टी के कार्यकर्ता तो बाकायदे इतिहासकार के तौर पर स्थापित हो गए। वर्ग-संघर्ष और क्रान्ति के मद्देनजर उन्होंने हर वह कुछ किया जो कैडर करते। हमेशा से वामपंथियों का प्रिय विषय इतिहास रहा है और उद्देश्य किसी भी भांति पूंजी केंद्रित दो ही वर्गों का निर्माण करके घनघोर खूनी-वर्ग संघर्ष करवाना है, पूंजीपति वर्ग और सर्वहारा वर्ग। वह सफल नही हो सके तो शिक्षण, सिनेमा, मीडिया, लेखन और कला को केंद्र बनाकर दिमागों का संस्कार करने लगे। यह बात शायद ही कभी समझ सके कि उनका चिन्तन निहायत ही एकांगी है। सनातन समाज की व्यवस्था और चिंतन का का केंद्र 'पूंजी, न होकर अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष चारो से ही निकला है। कर्म-सिद्धान्त और पुनर्जन्म पूरे देश को हरेक जाति और वर्ण के समस्त व्यक्तियों में यह अन्तर्रात्मा तक समाहित है। पिछले सत्तर सालों में रशियन सम्बन्धो के बल पर खडे हुए भारतीय कम्युनिष्ट शिक्षण, कला, साहित्य, लेखन, संचार माध्यमो (मीडिया) और पुरष्कारों द्वारा बहु-प्रचारित व्यक्तित्वो (मीडिया पर्सनैलिटीज) से हिंदुस्तानी समाज में एक 'कन्फयूज समाज, का निर्माण करने में सफल रहे हैं। वैसे यह कंफ्य्यूज समाज भी बीच-बीच में अपनी बुध्दि पर पड़ा वामी परदा हटाने में सफल हो जाता है। तब उनकी राजनीतिक इच्छाये बेमौत मरने लगती है। अमलेन्दु गुहा, मोहम्मद हबीब, सैयद नूरुल हसन, दामोदर धर्मानंद कौशांबी (डी.एन कौशाम्बी), मीरा कोशांबी, मृदुला मुखर्जी, हरबंस मुखिया, केएन पणिक्कर, उत्सा पटनायक, विजय प्रसाद, सुमित सरकार, शोभन सरकार, विपिन डे, सभी बाकायदे मार्क्सवादी पार्टी के कार्ड-धारक थे। उन्होंने इतिहास की किताबे लिखकर बाकायदे पांच पीढ़ियों में जहर घोला। पीढिया परीक्षाये-प्रतियोगिता निकालने के नाम पर उन्हें रटती और सच समझती गई। बाद में प्रशासन के दौरान भी वही सोच दिखती है।

ध्यान रखिए खतरनाक वायरस जड़ो में घुस गया है। उसे घातक अस्त्र की तरह आपकी जीवन पद्दति पर फेंक कर मारा गया है, तत्काल किसी अच्छी कम्पनी का एंटी-वायरस यूज करने की जरूरत है नही तो युग-युगीन 'शिप, तबाह हो जायेगी

-- पवन त्रिपाठी

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