भीमा-कोरेगाँव :- अनिल गोटे ने खोली शरद पवार की पोल

Written by शनिवार, 06 जनवरी 2018 21:33

भीमा-कोरेगाँव घटना को लेकर कई बातें हो चुकी हैं और कई चेहरे बेनकाब हो चुके हैं.

प्रधानमंत्री मोदी से नफरत के चलते किस तरह हताश विपक्ष उमर खालिद जैसे लोगों को साथ लेकर दलितों के नाम पर अपनी गंदी चालें चल रहा है यह भी सामने आता जा रहा है. इसी कड़ी में महाराष्ट्र के धूलिया नगर के भाजपा विधायक ने शरद पवार का नाम लिए बिना सोशल मीडिया पर एक पत्र लिखा है, जो जबरदस्त वायरल हो रहा है. इसमें उन्होंने भीमा-कोरेगाँव की घटना को लेकर शरद पवार की गुप्त भूमिका और उनके पिछले रिकॉर्ड की धज्जियाँ उड़ा दी हैं.

 

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विधायक अनिल गोटे लिखते हैं...

महाराष्ट्र की जनता को मेरा नम्र निवेदन और नमस्कार.... भीमा-कोरेगाँव की घटना अत्यधिक दुखदायी और दुर्भाग्यपूर्ण है. अनेक वर्षों से लगातार प्रतिवर्ष दलित बन्धु यहाँ एकत्रित होकर श्रद्धांजलि अर्पित करते थे, परन्तु ऐसी घटना कभी नहीं हुई. फिर इस वर्ष ऐसा क्या हुआ कि यह हंगामा और दंगा हो गया? इसके पीछे कौन लोग हैं? ये कौन लोग हैं जो दलितों का नाम लेकर आन्दोलन में घुस आए हैं? क्या वास्तव में मेवानी या खालिद जैसे बाहरी लोगों को दलितों से प्रेम है? नहीं... इस घटना के पीछे जो षड्यंत्र और चालबाजी है उसका खुलासा करने से पहले आईये संक्षिप्त इतिहास देख लें...

1995 में शिवसेना-भाजपा के संयुक्त सरकार पहली बार महाराष्ट्र में सत्ता में आई और माननीय मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने. उस समय कांग्रेस की पीठ में छुरा घोंपने वाले “कथित” राष्ट्रवादी कांग्रेस के लोग अलग नहीं हुए थे, कांग्रेस एकजुट थी. सेना-भाजपा की सरकार फ़टाफ़ट एक से बढ़कर उत्तम निर्णय लेने लगी थी. नितिन गड़करी के नेतृत्व में मुम्बई में फ्लायओवर्स का काम तेजी से चल निकला था. कृष्णा नदी, गोदावरी, तापी इत्यादि नदियों पर बाँधों और स्टॉप डैम के कार्य शुरू हो गए थे. सामान्य जनता में कांग्रेस से मुक्ति प्राप्त करने के बाद धीरे-धीरे सेना-भाजपा सरकार के पक्ष में सकारात्मक माहौल बनने लगा था. लेकिन फिर अचानक ही जैसे आज भीमा कोरेगाँव हुआ, वैसे ही उस समय महाराष्ट्र के शांत वातावरण में रमाबाई आम्बेडकर नगर की घटना उभर आई, दलितों को भड़काकर वाहनों में आगज़नी करवाई, तोड़फोड़ हुई और मुम्बई का जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया गया. जातिवादी आन्दोलन की आग में महाराष्ट्र के विकास को भून दिया गया. अनेक लोग पुलिस की गोलीबारी में मारे गए और राजनीति उफान पर आ गयी.... उस समय भी महाराष्ट्र की जनता समझ गयी थी कि इन घटनाओं के पीछे, सत्ता और कुर्सी के बिना छटपटा रहा यह “नारद” कौन है. जनता समझ रही थी कि रमाबाई आम्बेडकर नगर की घटना के पीछे वही आदमी है जिसके पेट में कुछ और होता है, दिल में कुछ और, दिमाग में कुछ और... लेकिन मुँह से कुछ और ही निकलता है.

आज से बीस साल पहले उस समय भी महाराष्ट्र में खुद को “जाणता राजा” कहलाने वाले ही विपक्ष में थे और आज भी वही लोग विपक्ष में हैं... उस समय भी मनोहर जोशी जैसे सरल राजनैतिक व्यक्ति को “पेशवा” कहकर पुकारा गया था, और आज भी फडनवीस सरकार को पेशवाई कहा जा रहा है... ज़ाहिर है कि सम्बन्ध स्पष्ट हैं. बीस साल पहले जिन्होंने दलितों को भड़काया था, आज भी वही लोग विपक्ष में बैठकर दलितों को बेवकूफ बना रहे हैं और उनका “दुरुपयोग” कर रहे हैं. ये वो लोग हैं जिनके मुँह में शाहू-फुले-आंबेडकर होते हैं, लेकिन दिल में दाऊद इब्राहीम कासकर. विपक्ष में बैठे इन लोगों की खून की एक-एक बूँद में राजनीति और जातीय अहंकार है. किसानों, आदिवासियों, दलितों और अल्पसंख्यकों के प्रति इनका प्रेम तभी दिखाई देता है, जब इनके पिछवाड़े के नीचे से कुर्सी निकल जाती है.

जब ये “कथित जाणता राजा” सत्ता में होता है, उस समय भोतमांगे परिवार पर हुआ अत्याचार इन्हें दिखाई नहीं देता... जब ये पन्द्रह साल सत्ता की मलाई चाटते हुए महाराष्ट्र को खोखला करते हैं उस समय आदिवासियों का गोवारी हत्याकाण्ड इन्हें मामूली घटना लगती है. सनद रहे कि सैकड़ों मील दूर से अपनी जायज़ माँगों को लेकर आए आदिवासियों पर हुई गोलीबारी में 114 आदिवासी मारे गए थे. भीषण घटना थी, सैकड़ों परिवार नागपुर के मेयो अस्पताल में चारों तरफ अपने मृत परिजनों को खोज रहे थे... लेकिन उस समय सत्ता सुख भोग रहे ये “नारद”, इचलकरंजी में आबासाहेब कुलकर्णी की फैक्ट्री का उदघाटन करने में व्यस्त थे. दलितों-आदिवासियों के प्रति ऐसी संवेदना है इनकी. 1985 में कांग्रेस के शासनकाल से ही महाराष्ट्र के विदर्भ में किसानों की आत्महत्याएँ शुरू हुई हैं.... आज तक महाराष्ट्र में किसी को याद नहीं कि शरद पवार कभी किसी मृत दलित किसान के परिवार से मिलने गए हों. आंबेडकर के प्रति ऐसी श्रद्धा है इन्हें.

उपरोक्त सभी घटनाओं और सेना-भाजपा की सरकारों के समय ही दलितों को भड़काने के षड्यंत्र का इतिहास देखते हुए आज भीमा कोरेगाँव की घटना में इन महाशय की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता. पिछले कुछ माह में सेना-भाजपा सरकार के खिलाफ इन्होने यात्राएँ निकाली, जिसे किसी ने पूछा तक नहीं... आन्दोलन और प्रदर्शन किए लेकिन कोई फायदा नहीं दिखा... तब अंतिम हथियार के रूप में “नारद” को मुख्यमंत्री की जाति दिखाई दी और इन्होने फिर से पेशवाई का उच्चार कर दिया.... दलितों को फुसलाते हुए अपनी कुर्सी मजबूत करने का गेम खेल डाला. असल में पिछले तीन साढ़े तीन वर्षों में ये सारे विपक्षी दल चाहकर भी कोई धार्मिक दंगा या जातीय विध्वंस पैदा नहीं कर पाए थे. इन लोगों ने चुन-चुन कर भाजपा शासित हरियाणा में जाट, राजस्थान में गुर्जर, गुजरात में पटेल और मध्यप्रदेश में पाटीदार सभी कुछ करके देख लिया... वेमुला का उपयोग करके भी देख लिया, लेकिन भाजपा लगातार जीत ही रही है... तो अब इन्होने महाराष्ट्र में अपना यह नया हथियार निकाला है.

असल में हुआ ये है कि जब से केंद्र सरकार और राज्य की फडनवीस सरकार ने आंबेडकर से सम्बंधित अंतर्राष्ट्रीय स्तर के स्मारक का कार्य युद्ध स्तर पर शुरू कर दिया है, तभी से दलित संगठनों के फर्जी नेताओं में बेचैनी है. दलितों से नकली सहानुभूति दिखाने वाले इन दलों ने पिछले पन्द्रह साल के शासनकाल में कभी भी बाबासाहेब आम्बेडकर के स्मृति चिन्हों पर ध्यान नहीं दिया था, लेकिन अब केंद्र सरकार ने भारत और ब्रिटेन में स्थित अम्बेडकर की स्मृतियों एवं उनके निवास वाले पुराने मकानों को खरीदकर वहाँ भव्य और सुन्दर स्मारक निर्माण करने का कार्य हाथ में लिया है, इस कारण इन नेताओं में बेचैनी है. इसके अलावा भाजपा के टिकट पर ही सबसे अधिक दलित सांसद चुनकर आए हैं. महाराष्ट्र में इससे पहले भी जातीय तनाव पैदा करके माहौल बिगाड़ने की कोशिश हुई, लेकिन विघ्नसंतोषी “नारद” कभी सफल नहीं हुए. सत्ता हाथ से निकल जाने का दुःख मैं समझ सकता हूँ, परन्तु इसके लिए वामपंथियों सहित मेवानी-खालिद जैसे महाराष्ट्र से बाहर के लोगों को यहाँ बुलाकर रक्तपात करवाना तो वास्तव में सत्तापिपासा की हद है.

शरद पवार का बड़ा दुःख ये भी है कि ममता बनर्जी, मायावती, मुलायम सिंह, स्व.जयललिता, यहाँ तक कि कल ही राजनीति में उतरे केजरीवाल तक खुद के दम पर चुने गए और राज्यों में अपनी सत्ता स्थापित कर ली है, जबकि खुद को राष्ट्रीय नेता कहलाने का ढोंग करने वाले कभी भी महाराष्ट्र में अपने अकेले बलबूते पर सत्ता नहीं पा सके हैं. इस बार के विधानसभा चुनावों में तो स्थिति और भी गिर गयी है. अब ये दुःख वे बताएँ भी तो किसे? इसलिए अब जाते-जाते महाराष्ट्र में अंतिम दाँव के रूप में परदे के पीछे रहते हुए, अपने कार्यकर्ताओं और नक्सलियों की मदद से जातीयता का भेदभाव पैदा करके चाल चलकर देखें... शायद तुक्का लग ही जाए.

मैं महाराष्ट्र की जनता से अपील करता हूँ कि वे ऐसी चालबाजियों में ना फँसें, नकली दलित नेताओं और आपके हमदर्द बनने का ढोंग करने वाले नक्सलियों की असलियत पहचानें. इन कथित दलित नेताओं ने कांग्रेस-NCP की सरकार के दौरान पंद्रह वर्षों में कभी ऐसा हंगामा नहीं किया था, क्योंकि इनकी आपस में दोस्ती शुरू से है. जब से मुख्यमंत्री फडनवीस के “जल-शिवार” जैसे जमीनी कार्य लोकप्रिय होने लगे हैं, तभी से इन्हें अपनी कुर्सी और दूर जाती दिखाई दे रही है... तो आप सभी सावधान रहें... चुनाव के आने से पहले “नारद” सक्रिय हो चुके हैं.

आपका
अनिल (अन्ना) गोटे 

शरद पवार से सम्बंधित कुछ लेख यह भी हैं... 

१) शरद पवार और SGFX Finance का रहस्य... :- http://desicnn.com/blog/sgfx-finance-sharad-pawar-mystery 

२) महाराष्ट्र का किसान आन्दोलन और सिंचाई घोटाला.. :- http://desicnn.com/news/farmer-agitation-in-maharashtra-and-irrigation-scam-of-ajit-pawar 

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