अब बद्रीनाथ-केदारनाथ पर पड़ी मुल्लों की काली निगाह...

Written by मंगलवार, 21 नवम्बर 2017 18:57

बद्रीनाथ (Badrinath Dham) और केदारनाथ (Kedarnath Dham) भारतवर्ष के सुदूर उत्तर हिमालय की उपत्यकाओं में अवस्थित प्रसिद्ध श्रद्धा स्थल हैं बद्रीनाथ चार धामों (जगन्नाथपुरी, द्वारका, श्रृंगेरी तथा ज्योतिर्मठ) में से एक ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) के रूप में जाना जाता है।

भगवान नर तथा नारायण जो विष्णु भगवान के अवतार के रूप में जाने जाते हैं, स्वयं बद्रीनाथ में नर नारायण पर्वत के रूप में विराजमान हैं। बद्रीनाथ एक प्रसिद्ध धाम होने के साथ-साथ वैष्णव भक्तों के लिए अत्यन्त आस्था का केन्द्र है

अभी कुछ दिन पूर्व सहारनपुर के एक जेहादी मौलाना ने अपने समाज को बरगलाने और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने हेतु, बद्रीनाथ धाम को मौलाना बदरूद्दीन और केदारनाथ धाम को कदरूद्दीन नामक “काल्पनिक मुल्लाओं” की मजार (Sufi Dargah) बताया और मुस्लिमों से कहा कि यह आपके पवित्र तीर्थ स्थल हैं इन पर इन काफिरों ने जबरन कब्जा कर लिया है। अब आपको शीघ्र इन पर अपना स्वामित्व लेना चाहिए। हालाँकि अधिकाँश मुस्लिमों और मीडिया ने इस मुल्ले के मूर्खतापूर्ण दावों को हँसी में उड़ा दिया, लेकिन ज़ाहिर है कि एक नवीन घटनाक्रम के तहत इन प्रमुख हिंदू आस्था स्थलों को मुगलिया स्थल घोषित करने का षड्यंत्र चल रहा है और इस बेसिर पैर की बात को अनपढ अल्पसंख्यकों के मध्य स्वीकार्यता प्रदान करने हेतु इस प्रकार के जेहादी अपना पूरा प्रयास कर रहे हैं।

प्रत्यक्षदर्शी लोगों के अनुसार बद्रीनाथ पर दावे की शुरुआत 1997 से ही शुरू कर दी गई थी. प्राप्त जानकारी के अनुसार, 1997 में श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मन्दिर समिति की जोशीमठ बैठक में यह निवेदन किया था कि मुस्लिम बद्रीनाथ को बदरुद्दीन की मजार और केदारनाथ को केदारूदीन की मजार में निरूपित कर फिदाईन तैयार कर रहे हैं. उस वक्त इतिहास लेखन की एक बैठक थी और उसमें वेदपाठी, धर्माधिकारी के अलावा तत्कालीन मुख्यकार्यकारी अधिकारी बी के मिश्रा भी थे. उस समय जनपद चमोली में देवबन्द से प्रशिक्षित जेहादियों के छोटे बच्चों को कुरान और उर्दू पढ़ाने के लिए भेजा गया था. ये घरों में जाकर पढ़ाते थे. तब तक गोपेश्वर में केवल पोस्ट आफिस के पास ही इनका अड्डा जाना जाता था.

देवबन्द के लोगों के आने के बाद परिस्थितियों में परिवर्तन आया. जो रणनीति कश्मीर में अपनायी थी उसे ही उत्तराखण्ड में भी लागू किया जाने लगा. दिन में अंडे मुर्गी, फल, शब्जी, बिसात खाने, मैकेनिक, की दुकान और रात को जिहाद की शिक्षा.. परिणाम यह हुआ कि हिंदुओं की लड़कियों का मुसलमानों के साथ निकाह की खबरें आने लगी. गोपेश्वर में मस्जिद बनाने के प्रयास तेज हुए. अलकापुरी में कब्रिस्तान को SDM अबरार अहमद ने डन्डे के बल पर मंजूरी दी. गोपेश्वर नगर क्षेत्र में ही नहीं पूरे जिले में इस्लाम के अनुयायियों की बाढ़ आ गयी. उन्होंने ठेकेदार बन कर मकान खरीद लिए. सवर्ण तो मुसलमानों को किरायेदार रखते नहीं. बस्ती वालों के यहां रहे, और वहीं दामाद भी बन गये. पहले माँ से रिश्ते बनाये और बाद में शादी बेटी से की और फिर घर जमाई बन कर जमीन भी हड़प दी. पुलिस लाइन से लेकर पठालीधार पोखरी बैंड तक यही हाल है...

1965 के उत्तराखण्ड ज़मीदारी विनाश कानून ने मन्दिर को ज़मीदारी मान लिया और मन्दिरों के नाम जिस जमीन से मन्दिरों की दिया बत्ती और भोग पूजा होती थी... मन्दिर के भंडारी, बाजीगिरी, कमदी, आदि खैकर थे, जमीन उन खैकरों के नाम दर्ज हो गयी. मन्दिर कंगाल, और अवैध कब्ज़े धारी मालामाल हो गये. आज उस जमीन पर इस्लामिक जेहादियों की हवेलियां उग आयी है. मन्दिर की जमीन पर उगी इन हवेलियों में पुजारियों को कत्ल करने के लिए हथियारों का जखीरा होने की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है. यही स्थिति नन्दप्रयाग और जोशीमठ में है. लेकिन इन जेहादियों को प्रतिष्ठित करने में दोगले पत्रकारों की भी बड़ी भूमिका रही है. दारू के पैक में बिकने वाले पत्रकार हमेशा सेक्युलर आवरण में इनके काले कारनामों को छुपाने के लिए अग्रणी रहे हैं. हर बार साम्प्रदायिक सौहार्द की दुहाई मंचों से माइक पर देने वालों की ही चलती है. अब जब पिछले 20 सालों में इस्लामिक जेहादियों ने अपनी जमीनी पकड़ यहां मजबूत कर ली, तो बद्रीनाथ पर अपने कब्जे के पत्ते खोल दिए हैं. यही कश्मीर में होता रहा है. यह जेहाद की रणनीति का हिस्सा है. अब देवभूमि के अस्तित्व बचाने का एक ही रास्ता है कि म्यामांर सरकार से सीख लेते हुए उनकी नीतियों का अनुपालन किया जाय.  

इसी प्रकार केदारनाथ भी आद्यगुरू शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित भगवान शिव के बारह स्वयंभू ज्योतिर्लिंगों में से एक है। केदारनाथ शंकराचार्य जी की साधनास्थली रही है। यही स्थान उनकी कठिन तपश्चर्या का गवाह है। केदारनाथ में ही आद्यगुरू शंकराचार्य ने इस नश्वर देह को त्याग कर उस परब्रह्म में स्वयं को लीन कर लिया था। शंकराचार्य जी की समाधि ठीक केदारनाथ मंदिर के पीछे थी, और सन् 2013 में आई भीषण अनावृष्टि में बहकर नष्ट हो गयी। ताज्जुब की बात है कि इतना भीषण जल प्लावन आने के बाद भी केदारनाथ मंदिर का बाल बाँका भी नही हुआ। जबकि वहाँ का सारा प्राचीन और नवीन निर्माण नष्ट हो गया था। अतः यह सत्य ही है कि यह स्थल उस रहस्यमय परमसत्ता का एक प्रमुख केन्द्र है। बड़ी बड़ी हस्तियाँ प्रतिवर्ष बद्रीनाथ और केदारनाथ जाकर भगवान विष्णु के चरणों में सिर झुकाना अपना सौभाग्य समझती हैं। इनमें स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुकेश अंबानी, अमिताभ बच्चन, प्रणव मुखर्जी जैसी शख्सियतें भी प्रत्येक वर्ष यहाँ जाती हैं।

इन कठमुल्लों द्वारा यह घृणित प्रयास कोई पहली बार नहीं किया जा रहा है। पिछले बारह तेरह सौ वर्ष से यह प्रक्रिया निरंतर चल रही है। असल में हिंदुओं से बड़ा “जड़मति समाज” इस दुनिया में कोई नहीं है, जो अपने मानबिंदुओं के प्रति तनिक भी सजग नहीं है। हजारों तीर्थ स्थान पिछले करीब हजार बारह सौ वर्षों में नष्ट किए गए। इन तीर्थ स्थानों में सोमनाथ का प्रसिद्ध शिव मंदिर भी था। महमूद गजनबी के इस पर किए गए आक्रमण को कौन नहीं जानता। बताया जाता है कि सोमनाथ से गजनबी हजारों ऊँटों में धन-संपदा, सोना, बहुमूल्य रत्नादि गजनी ले गया था। वह सोमनाथ से प्रसिद्ध स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भी खंडित कर गजनी ले गया और उसे गजनी की जामा मस्जिद की सीढियों में लगवा दिया गया, ताकि हमारी आस्था कमजोर हो, हमारा विश्वास अपने तीर्थों के प्रति खंडित हो जाए।

महमूद गजनबी की महत्वपूर्ण सफलता से प्रेरित होकर उसका भांजा सैयद सालार मसूद भी भारत में दाखिल हुआ. विभिन्न राजाओं को हराकर अपने “पवित्रता वाले” दल में शामिल करता हुआ और विभिन्न तीर्थों ,मंदिरों को अपवित्र करता हुआ वह दिल्ली, मेरठ, बदाँयू,कन्नौज के बाद बहराइच में दाखिल हुआ। बहराइच प्राचीन काल में ब्रह्मा जी तथा अनेक ब्रह्मनिष्ठ संतों की तपस्थली रहा था जिसका मूल नाम ब्रह्माइच था। सैयद सालार मसूद ने यहाँ के पवित्र सूर्य मंदिर जो अत्यंत वैज्ञानिक और चिकित्सकीय महत्व रखता था, उसे खंडित कर डाला। इस सूर्य मंदिर में आकर , यहाँ पवित्र कुंड में स्नान करके, यहाँ साधना करने, सूर्य को अर्घ्य देने से चर्म रोग जैसे लैप्रोसी, विटिलिगो (श्वेत कुष्ठ) और अन्य त्वचा संबंधित रोगों का निवारण होता था। संभवतः ऐसा सूर्य भगवान की किरणों में सोरालेन अल्ट्रावायलेट ए या सोरालेन अल्ट्रावायलेट बी किरणों के प्रभाव से होता होगा, और यह विशेष किरणें उस स्थान पर कुछ ज्यादा ही प्रभावी रही होंगी. इसीलिए इस स्थान का विशेष महत्व था।

यहाँ आकर उसे मांडलिक राजाओं की संयुक्त गठबंधन सेनाओं का प्रतिरोध झेलना पड़ा, जिसका नेतृत्व वीर राजा सुहेलदेव राजभर कर रहे थे। दुर्भाग्य है कि वामपंथियों द्वारा लिखित इतिहास में ऐसी कोई घटना वर्णित ही नही है। जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजभर जाति का बच्चा-बच्चा तक हजार साल से अपनी पारिवारिक परंपरा द्वारा यानि श्रुति- स्मृति परंपराओं से इस घटना के विषय में पूरी जानकारी रखता है। जिसने पुरानी सभी विगलित मान्यताओं और आदर्शवादी बातों को नकारकर बड़ी चतुराई से सैन्य योजना बनाई।

इस्लामिक सेनाएं सनातन-धर्मियों के विरूद्ध युद्ध में गौमाता के विशाल झुण्ड को आगे कर देती थी, इसके काउन्टर अटैक के रूप में राजा सुहेलदेव ने वराह देवता के झुण्ड अपनी फौज के आगे रखकर युद्ध किया, पूरे डेढ लाख की विधर्मी फौज के साथ साथ सैयद सालार का समूलोच्छेदन कर दिया। किंतु दुर्भाग्य से उसी खंडित सूर्य मंदिर की हिंदुओं को कोई चिंता नहीं थी जिससे उस स्थान पर सैय्यद सालार साहू की मजार बना दी गई। बेवकूफ हिंदुओं में यह झूठी बातें प्रचारित कर दी गई, कि इस गाजी मियाँ की मजार पर चिराग जलाने, चद्दर चढ़ाने और सिर झुकाने से प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होती है, कष्ट निवारण होता है। इन बेवकूफी भरी बातों में आकर हिंदुओं ने ही उसे एक बड़े तीर्थ स्थान में बदल डाला, और वहाँ पक्की मजार बना दी गई। उस स्थान पर वर्ष में एक बार उर्स लगता है और इतना पैसा चढावा चढता है कि पूरे महीने तक गिनती ही होती रहती है। रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी हिंदुओं को इस बेवकूफी से बचने की सलाह दी थी। लेकिन बेवकूफ हिंदु अपनी ऊपरी मंजिल की खराबी के कारण वहाँ सबसे ज्यादा जाता है, और सबसे ज्यादा चढावा चढाता है। देखिये तुलसीदास जी ने आज से पाँच छैः सौ वर्ष पहले क्या समझाया था --

"लही आँख कब आँधरे
बाँझ पूत कब जाय
कब कोढी काया लही
जग बहराइच जाय।"

वास्तव में भारत में यत्र-तत्र सर्वत्र पाई जाने वाली झूठी सच्ची-कब्रें, दरगाह, पीर मियाँ, गाजी मियाँ, कहीं कहीं ये बड़े विचित्र नाम जैसे “कुत्ते मियाँ” आदि के नाम से भी है, इन सभी के बारे में झूठी अलौकिक चमत्कारिक बातें भ्रामक ढंग से फैलाई गयीं हैं। कहीं कहीं ये रेलवे पटरी के मध्य भी देखने में आती हैं। जिन-जिन मतों में देह के मृत होने के पश्चात दफन करने की परम्परा है, वह मत नहीं बल्कि भू-माफिया वाले संगठित गिरोह हैं। जमीन को लेकर ही दुनियाभर की लड़ाईयाँ हैं, वास्तव में यह जमीन कब्जाने के धंधे हैं। भारतवर्ष में सड़क के किनारे-किनारे करोड़ो मजारें हैं. कुछ नयी-नयी प्रकट होती रहती हैं। इन मजारों में से बहुत सी उन मुस्लिम योद्धाओं की हैं जो इस पुण्यभूमि भारत की धरा पर आकर अपने पवित्र दीन के नाम पर हुए युद्ध में मारे गए। आज बहुत से पूजित हो रहे हैं। कुल मिलाकर यह निष्कर्ष है कि हिंदू तीर्थों का इस्लामीकरण कोई आज से नहीं अपितु पिछले हजार बारह सौ वर्षों से हो रहा है। अगर तीर्थ का इस्लामीकरण न हो पाया, तो उसके आस-पास समानान्तर नये इस्लामिक तीर्थ पैदा हो जाते हैं।

हमारे समाज की स्मृति कमजोर है इसलिए केवल मथुरा, काशी-ज्ञानवापी और अयोध्या-बाबरी को ही देख लें। वैसे प्रयागराज को अल्लाह द्वारा आबाद किया गया तब वह अल्लाहाबाद हुआ, अवधनगरी-साकेत को फैज मोहम्मद ने बसाया नया फैजाबाद नाम देकर, कर्णावती को अहमदशाह अब्दाली ने अहमदाबाद नाम दिया, अहमदनगर, हैदराबाद, नालंदा, बख्तियारपुर हुआ। लाखों जगहें हैं, किस किस का नाम लें।

कुल मिलाकर बात को समग्र रूप में न कहकर अगर संक्षिप्त ढंग से कहें तो भाव यह है कि यह नाम, पता, लिंग, जाति, विचार-मान्यतायें, परंपरायें सभी कुछ बदलने की सुनियोजित प्रक्रिया है। कितना बदल पाए सब जानते हैं और कितना बदल पाएंगे यह भविष्य के गर्भ में है। दुर्भाग्यजनक है कि राष्ट्रवादी विचार वालों की सरकारें होते हुए उनकी नाक के नीचे यह सब हो रहा है, और सब कान में तेल डालकर बैठे हैं, कब जागेंगे यह पता नहीं.

इसी लेख से सम्बन्धित दो-तीन और ज्ञानवर्धक लेख पढ़ने के लिए निम्नलिखित लिंक्स पर क्लिक करें और दरगाह-मजार माफिया तथा हिंदुओं की मूर्खता की हकीकत समझने का प्रयास कीजिए...

१) हिंदुओं द्वारा कब्र पूजा :- मूर्खता या अंधविश्वास
http://www.desicnn.com/news/muslim-grave-worship-by-hindus-stupidity-or-blind-faith

२) सूफियों द्वारा भारत का इस्लामीकरण : सन्दर्भों सहित
http://www.desicnn.com/news/islam-spreading-by-sufism-and-secularism-in-india

३) सूफीवाद, दरगाह-मजार और इस्लाम का प्रचार
http://www.desicnn.com/news/sufism-dargah-and-islam-in-india

४) बहराईच : एक क्रूर मुग़ल आक्रांता की कब्र पर मेला
http://www.desicnn.com/blog/mughal-invader-defeated-by-hindu-kings-in-behraich

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