६ दिसंबर की घटना के बाद क्या-क्या हुआ था...

Written by गुरुवार, 05 जनवरी 2017 14:58

बाबरी ध्वंस के पश्चात अयोध्या में घटनाक्रम कुछ इस प्रकार हुआ...

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में जब तीन गुंबद वाला ढाँचा गिर गया तो उस दिन सायंकाल अयोध्या पुलिस थाने में दो रिपोर्ट लिखी गई।

1. ढाँचे के समीप ड्युटी पर तैनात पुलिस इंस्पेक्टर ने एक एफआईआर लिखवाई जिसमें पुलिस इंस्पेक्टर ने लिखवाया कि‘’लाखों कारसेवक ढाँचे पर चढ गये और उन्होने ढाँचे को गिरा दिया पर मैं किसी को पहचानता नही.’’।

 

2. साधु-महात्माओं व अन्य लोगों के लिए सम्बोधन करने हेतु बनाये गये मंच के समीप तैनात पुलिस अधिकारी ने दूसरी एफआईआर लिखवाई जिसमें उन्होने लिखवाया कि “लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विनय कटियार, विष्णुहरि डालमिया, अशोक सिंघल, आचार्य गिरिराज किशोर, साध्वी ऋतम्बरा, उमा भारती, इन आठ लोगो को मैं पहचानता हूँ जिनके भाषण को सुनकर कारसेवक ढाँचे पर चढ गये और ढाँचा गिरा दिया।”

रिपोर्ट में नामजद सभी लोगों को पकडकर माता टीला में बन्द कर दिया गया। सभी लोग जमानत अथवा मुचलकों पर छोड़ दिए गए। प्रारंभ मे नामजद रिपोर्ट के आधार पर माता टीला की कोर्ट में मुकदमा चला। कालांतर में वही मुकदमा उत्तरप्रदेश की रायबरेली जिले की कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया। आज भी वह मुकदमा रायबरेली जिले की उसी कोर्ट में चल रहा है। दोनो एफआईआर को क्रमशः 197 और 198 अलग-अलग नम्बर दिए गए। बाद में पत्रकारों, फोटो कैमरामैन द्वारा 47 एफआईआर और लिखवाई गई। इस प्रकार कुल 49 एफआईआर लिखवाई गई। उत्तरप्रदेश सरकार ने ये सभी 49 एफआईआर सीबीआई को जाँच हेतु सौंप दी। इसके अतिरिक्त 5 या7 एफआईआर अयोध्या के स्थानीय मुस्लिमों द्वारा और लिखवाई गई और उनका मुकदमा फैजाबाद जिले की कोर्ट मे ही चलने लगा।

प्रारंभ में सीबीआई ने 40 लोगों के खिलाफ अपना आरोप-पत्र सीबीआई की विशेष अदालत को दिया और अदालत से अनुमति मांगी कि “हमारी जाँच अभी अधूरी है, जाँच को जारी रखने हेतु अनुमति दी जाय और हम एक संपूरक प्रति (सप्लीमेंट्री कापी) और दायर करेंगे।’’ सीबीआई विशेष अदालत ने सीबीआई को अनुमति दी। कालांतर में सीबीआई द्वारा 9 अन्य लोगों के खिलाफ चार्जशीट और दायर की गई। सीबीआई द्वारा 49 लोगो के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। इस प्रकार 49 ही मुल्जिम और 49 ही एफआईआर हो गई।

इन सभी मुकदमों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात गौर करने की है कि ‘6 दिसबंर की इस घटना में सैंकड़ो लोगो को चोटें लगी, घायल हुए. उन्हे अयोध्या अथवा फैजाबाद के अस्पताल में भर्ती करवाया गया, बाद में कुछ घायलों को अयोध्या से फैजाबाद के जिला-अस्पताल और लखनऊ के अस्पताल में स्थानांतरित किया गया। पुलिस ने चोट खाए अस्पताल में भर्ती ऐसे किसी को भी मुल्जिम नही बनाया.’। अनेक लोगों के यहाँ छापे पडे. परंतु जिनके यहाँ छापे पडे, उनमें से भी कोई व्यक्ति सीबीआई आरोप पत्र में मुल्जिम नही है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि जो घायल हुए वे सभी गुंबद के समीप ही थे परंतु पुलिस ने उन्हे मुल्जिम न बनाकर मुल्जिम उन्हे बनाया जो मंच पर थे अथवा अपने घर पर लौटकर अपने मोहल्ले अथवा कस्बे मे अपना प्रभाव दिखाने के लिए अपनी बहादुरी का बखान कर कोई वक्तव्य दिए थे। वे वहाँ थे अथवा नही थे इसकी भी कोई पुष्टि नही की गई। अनेक संत-महात्माओं को ढाँचे के समीप दिखाकर मुल्जिम बनाया दिया गया जो मंच के नीचे कभी उतरे ही नही। सैंकड़ों रामभक्तों के घर छापेमारी हुई परन्तु कहीं कुछ नहीं मिला, जिनके यहाँ छापेमारी की, उन्हें भी न मुल्जिम बनाया और न ही मुल्जिमों के विरुद्ध गवाह बनाया। छापेमारी में कुछ भी नहीं मिला परन्तु डकैती की धारा सीबीआई ने अनेकों पर लगाई। यह एक ऐसा विचित्र मुकदमा है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि हिन्दुओं के खिलाफ अयोध्या के स्थानीय मुस्लिमों के जो मुकदमे फैजाबाद की जिला न्यायालय में चले थे, उन सभी मुकदमों का अंतिम निपटारा जिला अदालत द्वारा किया जा चुका है। उन सभी मुकदमों में कोई हिन्दु दोषी नही पाया गया है. मुसलमानों द्वारा लिखवाये गये सभी मुकदमें अब समाप्त हो गए है.

सीबीआई को मुकदमा चलाने हेतु प्रदेश सरकार से विशेष अनुमति लेनी पडती है। 1992 में ढाँचा गिरने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार केन्द्र के द्वारा बर्खास्त कर दी गई थी और राज्यपाल का शासन था। अतः सीबीआई का प्रार्थना पत्र राज्यपाल के पास पहुँचा। लाखों कारसेवकों के खिलाफ लिखाई गई रिपोर्ट नम्बर 197 की जाँच व मुकदमा चलाने की अनुमति सरकार से सीबीआई को मिल गई। परंतु जब मुकदमा चला तो सीबीआई ने मंच वाले पुलिस अधिकारी की एफआईआर 198 का मुकदमा भी चालू कर दिया। मुकदमे की प्रारम्भिक सुनवाई में ही बचाव पक्ष के वकीलों ने रिपोर्ट 198 की सुनवाई का विरोध किया परन्तु अनसुना कर दिया गया। 49 लोगो के विरुद्ध सीबीआई की विशेष अदालत में कार्यवाही शुरू हो गई। अदालत ने इन सभी 49 लोगों पर सीबीआई द्वारा लगाए गए आरोपों को स्वीकार कर लिया और सभी व्यक्तियों को इस सम्बन्ध में अदालत में उपस्थित होने के लिए नोटिस जारी कर दिए गए ताकि वे स्वयं अदालत में उपस्थित होकर अपने विरुद्ध लगाए गए आरोपों को स्वीकार अथवा अस्वीकार कर सकें। इसी आधार पर मुकदमा आगे प्रारम्भ होता।

बचाव पक्ष ने सीबीआई की विशेष अदालत के इस फैसले के विरुद्ध लखनऊ उच्च न्यायालय में अपील दायर कर दी और तर्क दिया कि सीबीआई को रिपोर्ट क्रमांक 198 की जाँच अथवा मुकदमा चलाने का कानूनी अधिकार नहीं था। लखनऊ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने सुनवाई करते हुए मौखिक टिप्पणी की कि “इस केस में बडे प्रभावी लोग शामिल हैं अतः मैं स्टे-आर्डर नही दूँगा अपितु मुकदमें का अन्तिम निपटारा करुंगा। एक बार अगर स्टे आर्डर जारी हो गया तो पता नही इस केस के निपटारे में कितने वर्ष लग जायेंगे। बचाव पक्ष के वकीलों ने तर्क रखा कि सीबीआई को एफआईआर 198 के सम्बन्ध में कोई कार्यवाही करने का अधिकार सरकार ने नहीं दिया अतः सीबीआई विशेष अदालत का निर्णय गलत है। सीबीआई को तो लाखो कारसेवको के खिलाफ ही जाँच करने का अधिकार-पत्र दिया गया था। सारे दस्तावेज अदालत के सम्मुख प्रस्तुत किए गए. अदालत ने बचाव पक्ष के वकीलों के तर्को व तथ्यों को मानते हुए कहा कि सीबीआई की विशेष अदालत को दोनो ही एफआईआर को सुनने का कोई अधिकार नही है। अतः विशेष अदालत यह निर्णय करे कि कुल 49 नामित मुल्जिमों में से कौन 197 के अन्तर्गत और कौन 198 के अन्तर्गत आते हैं तथा केवल 197 नम्बर रिपोर्ट के अन्तर्गत आने वाले मुल्जिमों के विरुद्ध अपनी कार्यवाही जारी रखे। लेकिन न्यायाधीश ने अपने निर्णय में यह भी लिखा कि अगर उत्तरप्रदेश सरकार चाहे तो एक दूसरा आदेश जारी कर अपनी पुरानी गलती को सुधार कर सकती है।

सीबीआई की विशेष अदालत में एफआईआर 197 तथा 198 के अंतर्गत कौन-कौन मुल्जिम आते है, को लेकर तर्क-वितर्क शुरू हो गए। सीबीआई की विशेष अदालत ने 28 लोगो की एक सूची जारी कर कहा कि ये सभी एफआईआर 197 के अंतर्गत आयेंगे और 21लोगो की दूसरी सूची जारी कर कहा कि ये सभी एफआईआर 198 के अंतर्गत आयेंगे। अर्थात 21 लोगो को नामजद रिपोर्ट की श्रेणी मे ही डाल दिया गया। एफआईआर 197 के अंतर्गत नामित 28 लोगो के खिलाफ सीबीआई की विशेष अदालत में मुकदमा आगे चलने लगा और एफआईआर 198 के अंतर्गत 21 लोगो के खिलाफ मुकदमों की सुनवाई सीबीआई की विशेष अदालत ने बंद कर दी। इस प्रकार इस मुकदमें के दो हिस्से हो गये।

माताटीला मे जो 8 लोग बन्द थे, उनकी सारी फाईलें रायबरेली-अदालत मे पहले से मौजूद थी अतः सीबीआई ने रायबरेली में उनके विरुद्ध कार्यवाही तत्काल शुरू करवा दी। अब इस मुकदमें में एक पेंच और आ गया कि एफआईआर 198 के 21 लोगों में 8 लोगों के खिलाफ ही रायबरेली अदालत में मुकदमा प्रारम्भ हुआ, बाकि बचे हुए 13 लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने को लेकर रायबरेली अदालत ने कहा कि हमारे पास इन 13 लोगों के खिलाफ कोई फाईल नही है और सीबीआई की विशेष अदालत ने कहा कि इन्हे सुनने का अधिकार हमारे पास भी नही है। उत्तरप्रदेश सरकार ने भी अपनी इस पुरानी भूल को सुधारने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में भी यह विषय आया था परंतु सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह उत्तरप्रदेश सरकार का मामला है. लेकिन उत्तरप्रदेश सरकार ने कहा था कि हम इस मामले में कोई हस्तक्षेप नही करेंगे। 28 लोगों का मुकदमा सीबीआई की विशेष अदालत में और 8 लोगों का मुकदमा रायबरेली अदालत में चल रहा है. परंतु रिपोर्ट 198 के अन्तर्गत शेष बचे 13 लोगों का मुकदमा कहाँ चले इस पर अभी तक कोई फैसला नही हुआ है। इस प्रकार ये मुकदमे 3 हिस्सों में बँट गया।

सीबीआई चाहती थी कि सभी 49 लोगों के खिलाफ विशेष अदालत में मुकदमा चले परन्तु सीबीआई की ही गलती से मुकदमा तीन हिस्सों में बंट गया। सीबीआई ने एक मुस्लिम नागरिक को सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने के लिए तैयार कर लिया। मुस्लिम नागरिक ने याचिका दायर कर मुकदमों की सुनवाई विशेष अदालत में सम्मिलित रूप में करवाने की मांग की। किसी दूसरे मुस्लिम वजाहत अन्सारी ने भी इसी प्रकार की याचिका सर्वोच्च न्यायालय में डाल दी। सर्वोच्च न्यायालय ने कालान्तर में दोनों याचिका रद्द कर दीं।

अब सीबीआई ने स्वयं लखनऊ-उच्च न्यायालय में सभी मुकदमों को एक साथ चलाए जाने की याचिका दायर कर दी। सुनवाई दस वर्ष तक हुई। अन्ततः लखनऊ उच्च न्यायालय ने भी सीबीआई की याचिका रद्द कर दी। उच्च न्यायालय के इसी आदेश के विरुद्ध अब सीबीआई सर्वोच्च न्यायालय में अपील लेकर आई है। अपील 90 दिन में दायर होनी चाहिए थी परन्तु सीबीआई 170 दिन बाद अपील लेकर आई। अब सर्वोच्च न्यायालय को फैसला करना है कि निर्धारित अवधि के बाद दायर की गई अपील पर ध्यान दे या न दे।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इसी अपील को सुनने के लिए दिसम्बर, 2013 की तारीख निर्धारित की थी, अभियोजन पक्ष ने सुनवाई जल्दी करने का निवेदन किया। बचाव पक्ष ने कोई विरोध नहीं किया, कोई आवश्यक भी नहीं है। परिणामस्वरूप अदालत ने अक्टूबर में सुनवाई करने का आदेश कर दिया। यह जानना आवश्यक है कि आखिर सीबीआई मुकदमों को इकट्ठा क्यों करना चाहती है?

- विश्व हिन्दू परिषद् के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री श्री चम्पत राय से राजीव गुप्ता की बातचीत पर आधारित ।

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