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अरुण शौरी लिखित सात किताबें, जो सभी को पढनी चाहिए

Written by शुक्रवार, 16 जून 2017 20:09

आजकल अरुण शौरी चर्चा में हैं. जब से उन्होंने NDTV पर पड़े छापों के खिलाफ मोदी सरकार की आलोचना की है और वामपंथियों के साथ एक मंच पर दिखाई दिए हैं, तभी से मोदी समर्थकों द्वारा उनके खिलाफ गालीगलौज और निम्न स्तर की टिप्पणियाँ की जा रही हैं.

अरुण शौरी को चुका हुआ कारतूस बताया जा रहा है. असल में 2010 के बाद सोशल मीडिया पर पैदा हुई "जमात" ने अरुण शौरी का नाम ठीक से सुना ही नहीं है तो वे उनके काम के बारे में कैसे जानते. बहरहाल, अगर आप अरुण शौरी के नए प्रशंसक (या आलोचक) हैं, तो आपको वर्ष 2014 से पहले उनकी सात किताबों को पढ़ना चाहिए, जिससे महत्वपूर्ण विषयों पर उनके विचार मिल सकें. भारत के सबसे धुर दक्षिण पंथी विचारक और बुद्धिजीवी अरुण शौरी आजकल देश के वाम दलों की आँख के तारे बने हुए हैं. केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से ही नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना ने उन्हें इस कदर वाम पत्रकारों के लिए प्रासंगिक बना दिया है, कि वे सबके बीच चर्चा के मुख्य बिंदु बने हुए हैं. मगर हम उम्मीद कर सकते हैं कि इन्हीं वाम समर्थकों ने उनके वर्ष 2014 से पहले की किताबों को देखा होगा, उन्हें पढ़ा होगा, जिसमें उन्होंने देश के फर्जी इतिहासकारों, मिशनरियों, और अन्य सभी पर जम कर निशाना साधा है तथा उनके एकदम विपरीत विचार व्यक्त किए हैं. ये मुख्य रूप से सात पुस्तकें हैं, जिन्हें सभी को पढ़ना चाहिए... तभी वे जान सकेंगे कि अरुण शौरी क्या चीज़ हैं. 

1. Eminent Historians: Their Technology, Their Line, Their Fraud / एमिनेंट हिस्टोरियन: देयर टेक्नोलोजी, देयर लाइन, देयर फ्रौड़

इस पुस्तक में, शौरी ने भारत के अपने प्रसिद्ध वाम समर्थक इतिहासकारों की उनके झूठ और धोखे के लिए जमकर धज्जियां उड़ाई हैं. इन इतिहासकारों ने न केवल वित्तीय धोखे किए (जैसे उन्होंने अनुदान तो कई ले लिए मगर, उन्हें जो कार्य करना था, वह किया नहीं), बल्कि उन्होंने नैतिक धोखे और छल भी किये हैं. स्थानीय हिन्दू नागरिकों पर इस्लामिक हमलावरों के अत्याचारों को कम बताकर उन्होंने आर्य आक्रमण की झूठी कहानी रच दी, जिसकी काट के लिए कई प्रमाण भी हैं. अरुण शौरी ने इरफान हबीब, रोमिला थापर, बिपिन चन्द्र और सतीश चंद्रा जैसे इतिहासकारों के झूठ की बखिया उधेड़ी और साथ ही उन्होंने नए युग के इतिहासकारों जैसे ऑड्रे त्रुशे की भी आलोचना की है, जो यह कहते हैं कि औरंगजेब ने अपने कुकृत्यों के लिए माफी माँगी थी. जबकि कई इतिहासकारों और दरबार के इतिहासकारों के प्रमाणों के सौजन्य से अरुण शौरी उस राजा की इस्लामिक हवस को यह कहते हुए साबित करते हैं कि कैसे हज़ारों हिन्दू मंदिरों को नष्ट किया गया, और काफिरों के साथ यह करते हुए उसका कैसे सम्मान किया गया. इतिहास में रूचि रखने वाले छात्रों को इस पुस्तक को जरूर पढ़ना चाहिए. (किताब खरीदने की लिंक यह है...)

2. Harvesting Our Souls: Missionaries, Their Designs, Their Claims / हार्वेस्टिंग आवर सोल्स: मिशनरीज़, देयर डिजाइन, देयर क्लेम्स

अपने इस उल्लेखनीय कार्य में, शौरी ने यह दिखाया कि कैसे ईसाई मिशनरी केवल अपने ही हितों में लगी हुई है, और समानता एवं निष्पक्षता का दावा केवल उनके इसी लक्ष्य को हासिल करने का एक प्रयास है, खोखला वादा है. मजेदार बात तो यह है कि वे एक ऐसे धर्म का वादा करती हैं जहां जाति की दीवार नहीं होगी, मगर विडंबना देखिये कि परिवर्तित हुए हिन्दुओं के जातिगत आरक्षण के लिए वे लड़ाई लड़ रही हैं. यह मिशनरी का सच जानने वाले लोगों के लिए अवश्य ही पढ़े जाने वाली पुस्तक है, जो मिशनरी की डिजाइन और वे कैसे काम करती हैं, यह समझना चाहता है और जो यह समझना चाहता है कि वे कैसे इस देश में काम करती हैं – गैर कानूनी, चुपचाप और प्रभावी तरीके से.

3. द वर्ल्ड ऑफ फतवाज़: द शरिया इन एक्शन

आँखें खोल देने वाली यह किताब यह बताती है, कि कैसे शरिया हर मुसलमान की ज़िन्दगी के हर पहलू पर शासन करता है. फतवा अकेले में कभी जारी नहीं किए जाते हैं. भारतीय मुस्लिमों का वह द्रष्टिकोण जिसने 1947 में देश में विभाजन के बीज बोए थे, वह आज तक जिंदा है. वर्ष 1995 में लिखी गई यह किताब, अपने समय से बहुत आगे की किताब थी. आज जब दुनिया इस्लामिक माइंडसेट को समझने की कोशिश में है, तो यह किताब पढ़ना बहुत ही जरूरी हो जाती है.

4. ओनली फादरलैंड : कम्युनिस्ट, क्विट इंडिया एंड द सोवियत युनियन

जैसा कि आशीष चंद्राकर लिखते हैं, कि ओनली फादरलैंड यह बताती है कि कैसे भारत में कम्युनिस्ट ने वैचारिक पदों पर कब्ज़ा जमा लिया और राष्ट्रीय हितों को कम किया तथा किसी भी विरोध से बचने के लिए वे वैचारिक ढाल के पीछे छिप गए. वामपंथी हर उस व्यक्ति को गाली देते हैं जो उनका विरोध करता है और उसे खुद पर होने वाला मौखिक आतंकवाद कहते हैं, जो आज की वाम विचारधारा का काम करने का तरीका है. अपनी इस किताब के माध्यम से शौरी बताते हैं कि कैसे उनका विरोध किया जा सकता है, और उनके निष्कर्ष से किसी को भी एक बेहतर, मुखर और हमलेवार दक्षिणपंथी विचारधारा की आवश्यकता महसूस हो सकती है.

 

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5. अ सेक्युलर एजेंडा: फॉर सेविंग आवर कंट्री, फॉर वेल्डिंग इट 

अपनी इस पुस्तक में, शौरी देश के एकीकरण की बात करते हैं, कि कैसे संविधान में आधी अधूरी परिभाषा के चलते अल्पसंख्यकों को ऐसे अधिकार मिले, जो संविधान निर्माताओं ने भी कभी सोचे नहीं होंगे. यह पुस्तक एक समान नागरिक संहिता की बात करती है और यह बताती है कि कैसे धारा 370 कश्मीर घाटी के नागरिकों के लिए एक वादा नहीं है. शौरी हम सभी को उत्तरपूर्व में बांग्लादेशियों के द्वारा किए जा रहे अतिक्रमण और जनसँख्या में बदलाव के प्रति आगाह करते हैं, और वे तत्कालीन सरकार के ढुलमुल रवैये के प्रति भे निराशा प्रकट करते हैं. शौरी मीडिया में अपनी किताबों के प्रति पसरी चुप्पी पर भी प्रश्न उठाते है कि न केवल उन्होंने गलत इतिहास लिखा है, बल्कि वे आज के मसलों को भी अपने हिसाब से तोड़ने मोड़ने से बाज़ नहीं आते.

6. फालिंग ओवर बैकवर्ड: एन एसे ऑन रिज़र्वेशन, एंड ऑन ज्युडिशियल पोप्युलिस्म

जैसा शीर्षक से स्पष्ट है कि यह किताब आरक्षण और इतने वर्षों तक न्यायालय के निर्णय के बारे में बात करती है. शौरी आज के प्रचलन वाले आरक्षण की जड़ों को खोजते हैं, मगर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जो एक सक्षम प्रणाली के रूप में होनी चाहिए थी, वह आवश्यक प्रथा के रूप में समाप्त हुई है. शौरी इस समस्या के कई पहलुओं पर चर्चा करते हैं, जिसमें उच्चतम न्यायालय द्वारा नियत 50 प्रतिशत सीमा निर्धारण का पालन न किया जाना आदि सम्मिलित हैं कि जो टॉप पर हैं वे तो फायदा उठा रहे है, वे पदोन्नति में आरक्षण ले रहे हैं आदि अदि. वे एक और महत्वपूर्ण बिंदु उठाते हैं कि जातिगत जनगणना के अभाव में, हमने कैसे यह तय कर लिया कि कौन कौन सी सीटें अनुसूचित जाति/जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के पास जानी हैं? यह किताब उन सभी के लिए जरूर पढी जाने योग्य हैं जो कोटा की महत्ता और उपयोगिता में भरोसा करते हैं, मगर व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं.

7. वार्शिपिंग फाल्स गॉड: अम्बेडकर एंड द फैक्ट विच हैव बीन इरेज्ड

शौरी ने इस किताब में भीम राव अम्बेडकर की स्वतंत्रता आन्दोलनकारी, सामाजिक सुधारक, और देश के संविधान के जनक के रूप में उनकी भूमिका के बारे में लिखा है. उनके गहन शोध में अम्बेडकर को इन तीनों भूमिकाओं में ही निम्न स्तरीय बताया है. हालांकि कई कहते हैं कि शौरी इस किताब में ईमानदार नहीं रहे हैं और उन्होंने बिना किसी संदर्भ के ये सब लिखा है. मगर कुछ भी हो शौरी द्वारा लिखित यह किताब इतिहास के विद्यार्थियों के लिए पढने के लिए सबसे आवश्यक किताब है

संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि एक तो पहले से ही अरुण शौरी जैसे दिग्गज विचारक दक्षिणपंथियों के पास नहीं हैं, ऐसे में यदि उनकी एकाध गलतियों को नजरअंदाज कर दिया जाए और उन्हें अपने पाले में बनाए रखा जाए तो क्या बिगड़ जाएगा? अरुण शौरी जैसे व्यक्ति का वामपंथियों तथा सेकुलरों की बौद्धिक गिरोहबाजी से लड़ने में भरपूर उपयोग किया जा सकता था, परन्तु उपेक्षा और अपमान ने उन्हें दूसरे पक्ष की तरफ धकेल दिया. यह उनके लिए नहीं, बल्कि दक्षिणपंथी बौद्धिक वर्ग का नुकसान है. 

(सौजन्य से :- desicnn.com)

Read 2938 times Last modified on शनिवार, 17 जून 2017 08:40
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