BC, AD का पश्चिमी फर्जीवाड़ा और हिन्दू कालगणना :- २

Written by सोमवार, 23 अप्रैल 2018 08:21

इस लेख के पहले भाग में आपने हिन्दू कालगणना की सटीकता एवं उसके वैज्ञानिक आधार के बारे में पढ़ा है... (उसे पढने के लिए यहाँ क्लिक करें). पेश है इसी लेख का दूसरा भाग, जिसमें और भी विस्तार से तथ्यों सहित पश्चिमी काल-विभाजन को खोखला सिद्ध किया गया है. 

पिछले विवरण से यह साफ हो जाता है कि मानव सभ्यता के विकास को आज जिन चार कालखंडों में बाँटा जाता है, वे न केवल मिथ्या हैं, बल्कि भ्रामक भी हैं। उन्हें ये चार कालखंड इसलिए बनाने पड़ें ताकि वे पूरी दुनिया के इतिहास को यूरोप के इतिहास के सांचे में ढाल सकें। वे यह बता सकें कि यूरोप शेष दुनिया से थोड़ा बहुत ही पीछे था, और उसने पिछले 3-4 सौ वर्षों में पूरी दुनिया को पीछे कर दिया है। सचाई यह है कि दुनिया का इतिहास इन चार कालखंडों में नहीं बाँटा जा सकता। प्रख्यात भूगर्भशास्त्री चाल्र्स हैपगुड अपनी पुस्तक मैप्स ऑफ एनशिएंट सीकिंग्स में लिखते हैं, ‘पाषाण युग की संस्कृति, नवपाषाण युग, कांस्य युग, और लौह युग के क्रमबद्ध स्तरों से होती हुई मानवी सभ्यता के सरल एकरैखिक विकास की संकल्पना को त्याग दिया जाना चाहिए। आज हम पाते हैं कि दुनिया के सभी महादेशों में आदिम संस्कृतियां विकसित आधुनिक समाज के साथ रहती हैं – आस्ट्रेलिया के बुशमेन, दक्षिण अफ्रीका के बुशमेन, दक्षिण अमेरिका और गुएना के सच्चे आदिम लोग संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ कबीलाई लोग आदि। हमें अब यह मान लेना चाहिए कि आज से 20 हजार वर्ष पहले जब यूरोप में पाषाण युगीन लोग रह रहे थे, पृथिवी के अन्य हिस्सों में उससे कहीं अधिक विकसित संस्कृतियां उपस्थित थीं और आज हमारे पास जो कुछ भी है, उसका एक हिस्सा उनकी ही विरासत है जोकि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी गईं।

प्रसिद्ध अंतरिक्षविज्ञानी डॉ. ओमप्रकाश पांडेय कहते हैं, ‘इस तरह का कालविभाजन वास्तव में समय के एकरैखिक विकास की यहूदी-ईसाई संकल्पना की उपज है। भारतीय संकल्पना में काल की गति चक्रीय है, एकरैखिक नहीं और इसलिए भारतीय संकल्पना समय की अधिक बड़ी दूरी को माप सकती है। इसलिए भारतीय युग गणना लाखों-करोड़ों वर्षों की बात करती है, जो बाइबिल के ईसा की कालगणना से बंधे यूरोपीयों को समझ में नहीं आ पाती।  चार्ल्स हैपगुड सरीखे जो यूरोपीय इस बाधा से मुक्त हो गए हैं, वे भी मानव सभ्यता का इतिहास लाखों वर्षों का मानने लगे हैं। यह देखना महत्वपूर्ण है कि भारत की जिस करोड़ों तथा अरबों वर्षों की गणना को यूरोपीय मिथक मान कर खारिज कर देते हैं, आज का भूगर्भशास्त्र भी लगभग उसी प्रकार की करोड़ों तथा अरबों वर्षों की गणना करने लगा है।

आज की भूगर्भशास्त्रीय कालगणना को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने भारतीय कालगणना के मापकों को ग्रीक नाम देकर अपना रखा है। अंतर केवल उनकी थोड़ी बहुत अज्ञानता और कालगणना के अशुद्ध तरीकों के कारण उनके काल का ही है। एक तुलनात्मक विवरण देखें। भूगर्भशास्त्र में काल की सबसे पुरानी माप हैडियन की है जो कि आज से 4.6 से लेकर 4.0 अरब वर्ष पहले का है। भूगर्भशास्त्रियों का मत है कि इतने समय पूर्व सृष्टि का आरंभ हुआ। अब इसकी तुलना करें हमारे एक कल्प या ब्राह्म दिन से। भारतीय मतानुसार ब्रह्मा का एक दिन-रात यानी कि चौबीस घंटे मानवीय गणना में 4.32 अरब वर्षों का होता है। इसे हम एक कल्प भी कहते हैं। कल्प के प्रारंभ में सृष्टि का आरंभ माना जाता है। भूगर्भशास्त्रियों ने इस पूरे कालखंड को दो भागों जिसे वे इयॉन कहते हैं, में तो बाँटा है, परंतु वे दो भाग समान नहीं हैं। पहला विभाजन है प्रिकैम्बियन इयॉन जो कि 4.6 अरब वर्ष से 54.2 करोड़ वर्ष पूर्व तक का है और दूसरा है फैनेरोजोइक इयॉन जोकि 54.2 करोड़ वर्ष से लेकर आज तक का काल है। दोनों इयॉन को एरा में बाँटा गया है। प्रिकैम्बियन इयॉन में दो एरा हैं। पहला आर्कियन एरा चार अरब वर्ष पूर्व से लेकर 2.5 अरब वर्ष पूर्व तक का है और दूसरा प्रोटेरोजोइक एरा 2.5 अरब वर्ष से लेकर 54.2 करोड़ वर्ष पूर्व तक का है। यह विभाजन भी समान नहीं है। एरा को आगे पीरियड में बाँटा गया है। आर्कियन एरा में चार पीरियड और प्रोटेरोजोइक एरा में तीन पीरियड हैं। फैनेरोजोइक इयॉन को तीन एरा में बाँटा गया है। पहला, पैलियोजोइक एरा 54.2 करोड़ वर्ष पूर्व से लेकर 25.1 करोड़ वर्ष पूर्व तक का, दूसरा, मेसोजोइक एरा 25.1 करोड़ वर्ष से लेकर 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व का और तीसरा, सेनोजोइक एरा 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व से लेकर आज तक का। इन तीनों एरा को भी आगे पीरियड में बाँटा गया है। पीरियड को इपोक में और फिर उन्हें एज में बाँटा गया है। ये सारे विभाजन बड़े ही असमान और अस्त-व्यस्त हैं। इनमें कोई क्रमबद्धता नहीं दिखती।

इस कालविभाजनों के लिए भूगर्भशास्त्रियों ने जो प्रमाण दिए हैं, उनका आड़ोलन करने से हमें इस कालविभाजन की प्रामाणिकता और सत्यता का पता चलता है। भूगर्भशास्त्री विभिन्न चट्टानों के अध्ययन और उनके काल के रासायनिक निर्धारण से यह कालविभाजन करते हैं। इस कालविभाजन में सबसे बड़ी खामी यही है। चट्टानों की आयु से सृष्टि के चक्र को समझना असंभव काम है। सृष्टि के चक्र में जल-प्लावन, बर्फयुग जैसी अनेक प्रकार की छोटी-मोटी घटनाएं ऐसी घटती रहती हैं जो चट्टानों के निर्माण और विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं जबकि भूगर्भशास्त्री यह मान कर कालनिर्णय करते हैं कि प्रकृति में भूगर्भशास्त्रीय प्रक्रियाएं प्रारंभ से लेकर आज तक गति और प्रमाण में समान दर से होती रही हैं। यह सिद्धांत वर्ष 1795 में जेम्स हट्टन ने दिया था जिसे थियोरी ऑफ यूनिफार्मिटी यानी समानता का सिद्धांत कहते हैं। यही सिद्धांत आज तक मान्य है और इसके आधार पर ही सारी भूगर्भशास्त्रीय कालगणना की जाती है।

चूंकि यह मानवीय गणना की क्षमता से परे एक लंबे कालखंड की बात है, इसलिए इसमें हमें कुछ चीजें मान कर ही चलनी होती हैं। परंतु यह कहना कहीं से भी ठीक नहीं है कि प्राकृतिक घटनाएं प्रारंभ से लेकर आज तक हमेशा एक ही गति और प्रमाण में होती रही हैं। यह संभव नहीं है। पृथ्वी पर ताप और दाब जब हमेशा एक समान नहीं रहा है तो फिर प्रक्रियाओं की गति एक समान कैसे हो सकती है? इसके अतिरिक्त पृथ्वी की अपनी स्थिति भी कभी एक समान नहीं रही है। कभी वह आग का गोला थी और कभी पूरी तरह जल में डूबी हुई। साथ ही विख्यात भूगर्भशास्त्री चार्ल्स हैपगुड ने ध्रुवीय प्रदेशों के विचलन का जो सिद्धांत दिया है, यदि उसे मान लिया जाए तो चुम्बकीय क्षेत्र भी बदलेगा। इसके कारण भी प्राकृतिक प्रक्रियाएँ कभी भी एक समान गति से नहीं चल सकतीं। इसलिए भूगर्भशास्त्र की ये सारी गणनाएं वस्तुत: एक मिथ्या सिद्धांत पर टिकी हैं।

अब यदि हम इसकी तुलना करें भारतीय कालगणना से तो हमें ध्यान में आता है कि भारतीय गणनाएं आकाशीय नक्षत्रों पर आधारित हैं। आकाशीय स्थिति में होने वाले परिवर्तन कभी भी पृथिवी की परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होते, बल्कि इसके उलट आकाशीय स्थितियों पर ही पृथिवी की परिस्थितियां निर्भर करती हैं। स्वाभाविक ही है कि पृथिवी की कालगणना करने के लिए आकाश एक अधिक स्थिर और प्रामाणिक आधार है। इसलिए भारतीय ज्योतिष ने आकाशीय नक्षत्रीय गणना को ही प्रमाण माना और उसके आधार पर गणनाएं कीं। जब आज का वैज्ञानिक यूरोपीय जगत सृष्टि की आयु केवल 4004 ईसा पूर्व में बता रहा था, हम उस समय भी पृथिवी की आयु एक अरब, 96 करोड़ वर्ष बता रहे थे। देखा जाए तो हमने एक कल्प को दो भागों में बाँटा – दिन और रात। फिर हमने उसे सात मन्वन्तरों में बाँटा। मन्वन्तरों को चतुर्युगियों में बाँटा गया। फिर युगों की गणना की गई। युगों की गणना में भी एक नियम बाँधा गया। एक युग चार लाख 32 हजार वर्षों का माना गया। शेष युग क्रम से उसके दुगुना, तिगुना और चौगुना हुए। इस प्रकार एक चतुर्युगी एक कल्प का हजारवाँ हिस्सा हुई। ज्योतिष की आकाश संबंधी सभी गणनाएं अक्षरश: सही होती हैं। ऐसे में इन गणनाओं को नकारने का कोई ठोस कारण सामने में नहीं है।
यदि हम भारतीय युग गणना की तुलना आज के भूगर्भशास्त्रीय काल गणना से करें तो कुछ ऐसा चित्र सामने आता है।

अहोरात्र = हैडियन

कल्प = इयॉन

परार्ध = एरा

मन्वन्तर = पीरियड

चतुर्युगी = इपोक

युग = एज

इसमें अंतर केवल इन विभिन्न ईकाइयों की कालावधि का है। भारतीय युग गणना जहाँ आकाशीय नक्षत्रों के अधिक स्थिर तथा प्रामाणिक आधार पर है और इसलिए क्रमबद्ध तथा सुव्यवस्थित है, वहीं भूगर्भशास्त्रीय गणना चट्टानों के विकास के अस्थिर तथा अप्रामाणिक आधार पर निर्भर है और इस कारण इसमें कोई सूत्रबद्धता नहीं है। विभिन्न इयॉन, एरा, पीरियड, इपोक और एज के काल भिन्न-भिन्न हैं और इस भिन्नता के कारण केवल कुछेक अनुमान हैं। इसके अलावे भूगर्भशास्त्रीय गणनाएं केवल चट्टानों का विकास क्रम बताती हैं, उसे ही पृथ्वी के विकास का भी आधार मान लिया जाता है।

उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखें तो हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि भारतीय कालगणना न केवल वैज्ञानिक है, बल्कि वह अधिक ऐतिहासिक, प्रामाणिक और सेकुलर भी है। भारतीय वैज्ञानिकों तथा इतिहासकारों को न केवल स्वयं इसे अपनाना चाहिए, बल्कि उन्हें विश्वपटल पर इसकी स्वीकार्यता के लिए संघर्ष भी करना चाहिए। 

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साभार :- भारतीय धरोहर

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