BC और AD का फर्जीवाड़ा :- मीलों आगे हिन्दू कालगणना

Written by शनिवार, 21 अप्रैल 2018 19:37

हाल ही में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, विक्रम संवत् 2086 अर्थात सनातन हिन्दू नववर्ष मनाया गया. जहाँ तक उत्सव मनाने की बात है, उत्सवधर्मी भारतीय दोनों ही अवसरों पर मौज-मस्ती कर लेते हैं.

परंतु जब इतिहास और व्यवहार की बात आती है तो भारत की सरकार और बुद्धिजीवी दोनों ही केवल और केवल ईस्वी संवत् का प्रयोग करते हैं। इन्होंने पूरे देश पर एक मिथ्या, अवैज्ञानिक और तर्करहित कालगणना केवल इसलिए थोप रखी है कि यूरोपीय और अमेरिका, आस्ट्रेलिया सरीखे नवयूरोप के लोग इसे मानते हैं। अतः अब भारतीय नववर्ष के अनुसार कालगणना पर विचार करना उचित होगा।

विज्ञान की बात करें तो इसके लिए भी एक सुनिश्चित सीमा बांध दी गई है... आज विज्ञान का अर्थ यह बना दिया गया है कि, यूरोपीय तथा नवयूरोपीय देशों द्वारा विकसित और स्वीकृत विज्ञान ही विज्ञान है. यह एक प्रकार का अंधविश्वास ही है, और इसके कारण ही भारतीय ज्योतिष को अंधविश्वास मान लिया जाता है. ज्योतिष को नितांत काल्पनिक, जबकि अशुद्ध पश्चिमी कालगणना को वैज्ञानिक कह दिया जाता है, यही वैचारिक दरिद्रता है। आधुनिक यूरोपीय विज्ञान के अंधविश्वास में फंसे लोगों को बुद्धिजीवी कहना भी हालांकि एक प्रकार का बौद्धिक व्यभिचार ही होगा, फिर भी आवश्यक है उनके द्वारा फैलाए जा रहे इस अंधविश्वास का खंडन उनके ही तर्कों तथा तथ्यों से किया जाए। इसलिए भारतीय कालगणना की वैज्ञानिकता को स्थापित करने से पहले हम यह देखते हैं कि वर्तमान में प्रचलित कालगणना के आधार क्या हैं और वे आधार कितने वैज्ञानिक हैं.

सबसे पहली बात ईस्वी संवत् की है. आज इसे कॉमन एरा (Common Era) यानी कि सामान्य युग कहा जाने लगा है, परंतु इससे पहले इसे ईसा पूर्व तथा ईस्वी संवत् के रूप में ही लिखा-पढ़ा जाता था। ईसा पूर्व और ईस्वी संवत् का सीधा अर्थ है कि ईसा के पहले, और ईसा के बाद का काल। प्रश्न उठता है कि क्या ईसाई मजहब के प्रवर्तक हजरत ईसा एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं? यदि विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले इतिहास को देखें, तो उनमें कहीं भी हजरत ईसा ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं दिखाए जाते। ऐसे में वैज्ञानिक इतिहास लेखन के नाम पर भारत के समस्त ग्रंथों और परंपराओं को मिथकीय मानने वाली बौद्धिक जमात एक मिथकीय व्यक्तित्व के आधार पर कालगणना क्यों पढ़ और पढ़ा रही है? क्या देश की जनता को इन महान विद्वान कहे और माने जाने वाले प्रोफेसरों, रीडरों तथा लेक्चररों से यह पूछने का हक नहीं है कि भारत के कण-कण में बसे श्रीराम को मिथकीय चरित्र मानने वाले ये लोग, ईसा के आधार पर कालगणना भारत के बच्चों को पढ़ाये जाने का विरोध क्यों नहीं कर पाए?

वास्तव में ईस्वी संवत् एक सांप्रदायिक कालगणना है। यह ईसाइयों द्वारा स्वीकृत कालगणना है, जैसे कि मुसलमान हिजरी संवत् मानते हैं और कुछ अन्य संप्रदाय उनके प्रवर्तकों के अनुसार संवत् स्वीकार करते हैं। यह देखना निश्चय ही आश्चर्यजनक ही है कि सत्य की आराधना करने वाले वैज्ञानिकों को कोई भी वैज्ञानिक घटना आधारित कालगणना नहीं मिली, और वे भी इसी सांप्रदायिक कालगणना को अपनाए हुए हैं। इस पर भी यह अपराधबोध उन सभी के मन में अवश्य रहा होगा कि वे पूरे विश्व को एक प्रकार का धोखा दे रहे हैं और इसलिए अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में ही इसका नाम बदलने की प्रक्रिया का प्रारंभ कर दिया गया। सबसे पहले अंग्रेजों ने इसे कॉमन एरा कहना प्रारंभ कर दिया। इससे ईसा पूर्व की अंग्रेजी बिफोर क्राइस्ट (Before Christ) के छोटे रूप को बदलने की आवश्यकता नहीं पड़ी, केवल उसमें एक E अक्षर जोड़ दिया गया, और इस प्रकार BC बन गया BCE यानी सामान्य युग से पूर्व। A.D. यानी एनस डोमिनी अर्थात इयर ऑफ लार्ड यानी ईस्वी सन् को कॉमन एरा यानी सामान्य युग कहा गया और इस तरह यह बन गया CE…. वर्ष 2002 में इंग्लैंड और उसके पड़ोसी द्वीप वेल्श ने इसे आधिकारिक रूप से शिक्षा प्रणाली में शामिल कर दिया। इसके बाद भी नौ वर्षों तक विश्व इसे अपना नहीं पाया। वर्ष 2011 में अमेरिका और आस्ट्रेलिया ने भी इसे अधिकृत रूप से लागू कर दिया

चूंकि यूरोपीय और नवयूरोपीय सभी देश ईसाईमत प्रधान देश हैं, अतः उनके लिए स्वाभाविक ही था कि वे अपने सांप्रदायिक दिखने वाली गणना को एक सेकुलर छवि प्रदान करने की कोशिश करते। परंतु दुर्भाग्यवश भारत के किसी भी बुद्धिजीवी ने इस पर प्रश्न खड़़ा नहीं किया, बल्कि वे इसकी अंधी नकल में जुट गए। भारतीय इतिहास लेखक भी BC और AD के स्थान पर BCE तथा CE का प्रयोग करने लगे। इतना ही नहीं, बल्कि बीसी और एडी लिखने वालों को इतिहासज्ञान में पिछड़ा और अल्पज्ञ भी माना और बताया जाने लगा। भारतीय इतिहासकारों को यह पूछना चाहिए था, कि CE यानी कि कॉमन एरा में कॉमन प्वाइंट अर्थात वह कथित साझा बिंदु क्या है? यदि यह साझा बिंदु ईसा का जन्म ही है तो फिर बीसी और एडी में क्या बुराई है? यदि यह कोई अन्य ऐतिहासिक या खगोलीय घटना है तो फिर वे बताएं कि वह घटना क्या है?

ईसा पूर्व तथा ईस्वी संवत् तथा Common Era तथा Before Common Era की सांप्रदायिकता, अनैतिहासिकत्व तथा अवैज्ञानिकता को समझने के बाद, अब हम यह देखते हैं कि मानव इतिहास का जो काल विभाजन आज देश के कोमल मन-मस्तिष्क वाले बच्चों को पढ़ाया जा रहा है, वह कथित रूप से कितना वैज्ञानिक और तथ्यपूर्ण है। वर्तमान में मानव के इतिहास को चार भागों में विभाजित किया जाता है – पुरा पाषाणयुग, पाषाणयुग, कांस्ययुग और लौहयुग। इसका कालखंड भी कुछ-कुछ निर्धारित है। कुछ-कुछ इसलिए कि ये कालखंड हैं और इसलिए इनकी सीमा ही आंकी जा सकती है, निश्चित काल नहीं... उदाहरण के लिए लौह युग का काल 1000 वर्ष ईसा पूर्व का माना जाता है। इस युगगणना को कुछ इस प्रकार निर्धारित कर दिया गया है कि, इसमें का विज्ञान गायब हो गया है और इसमें केवल अंधविश्वास शेष बच गया है। यानी आप इस पर प्रश्न खड़े नहीं करते, बस इसे मान लेते हैं और इसके आधार पर ही नए मिलने वाले तथ्यों की व्याख्या करते हैं।

इस अंधविश्वास को समझना हो तो एक उदाहरण देख सकते हैं। लौह युग को 1000 वर्ष ईसा पूर्व माना जाता है यानी ईसा के 1000 वर्ष से पहले मानव को लोहे का प्रयोग ज्ञात नहीं था। अब इतिहास का एक तथ्य देखें। कालीबंगा, राजस्थान में 3000 वर्ष ईसा पूर्व का एक जुता हुआ खेत खुदाई में मिला है। यह खेत बिल्कुल आधुनिक तरीके से दो फसलों की मिश्रित खेती के लिए जुता हुआ है। अब खेत की जुताई बिना हल के नहीं की जा सकती और हल बिना लोहे के नहीं बन सकता। वस्तुत: लकड़ी का कोई भी सामान बिना लोहे के औजारों की सहायता के नहीं बन सकता। परंतु चूंकि आज के विज्ञान के अंधविश्वास में 1000 वर्ष ईसा पूर्व से पहले लोहे के औजार के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया जाता, इसलिए इतने महत्वपूर्ण प्रमाण की उपेक्षा कर दी जाती है और कहा जाता है कि कांसे से ही यह सब कुछ किया गया होगा।

बहरहाल, भले ही भारत में आज इन युगों के विभाजन को आज अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया हो, फिर भी इन युगों के विभाजन का प्रतिपादन करने वाले विद्वान भी इसकी व्यर्थता को नकार नहीं पाए हैं। उदाहरण के लिए हिस्ट्री ऑफ एनशिएंट सिविलीजेशन में चार्ल्स साइनोवोस लिखते हैं, ‘किसी एक तथा समान देश के लोगों ने क्रमश: अनगढ़ पत्थरों, तराशे हुए पत्थरों, कांसे तथा लोहे का प्रयोग करना सीखा। परंतु सभी देश एक ही समय में एक साथ एक ही युग में नहीं रहे। मिस्र ने तभी लोहे का प्रयोग प्रारंभ कर दिया, जब ग्रीक वाले कांस्ययुग में ही जी रहे थे और उधर डेनमार्क के बर्बर लोग पत्थरों का ही प्रयोग कर रहे थे। अमेरिका में तराशे गए पत्थरों का युग (नूतन पाषाण युग) यूरोपियों के वहाँ जाने के बाद समाप्त हुआ। हमारे अपने काल में अभी भी आस्ट्रेलिया के असभ्य कबीले अनगढ़ पत्थरों के काल में ही रह रहे हैं। इस प्रकार ये चार युग मानवता की यात्रा के कालखंडों को प्रदर्शित नहीं करते, बल्कि हरेक देश में ये सभ्यता के विकास की कहानी कहते हैं।’

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प्रश्न उठता है कि यदि यह बात सच है तो किस आधार पर अपने देश में बच्चों को यह पढ़ाया जाता है कि लौह युग केवल हजार वर्ष ईसापूर्व में प्रारंभ हुआ? फिर हम पूरी दुनिया के इतिहास को नियोलिथिक, पैलियोलिथिक आदि युगों में क्यों बांट देते हैं? यह कालखंड तो हरेक देश का अलग-अलग होना था। इसके लिए हरेक देश के इतिहास की अलग-अलग पड़ताल करनी थी। उदाहरण के लिए भारत की बात करें तो यहाँ वेदों में लोहे का स्पष्ट उल्लेख है। आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार भी वेद तो कम से कम 4-5 हजार वर्ष पुराने हैं। स्पष्ट है कि भारत का लौहयुग कम से कम 4-5 हजार वर्ष पुराना होना ही चाहिए। ऐसे में शेष युग तो और भी पीछे चले जाएंगे। इसमें अभी एक और समस्या है।

समस्या यह है कि विश्व के सभी देशों में नूतन पाषाण युग के बाद कांस्य युग नहीं आया। प्राचीन भारत के इतिहासकारों में एक प्रमुख नाम स्व. राधाकुमुद मुखर्जी अपनी पुस्तक “हिंदू सभ्यता” में लिखते हैं, ‘भारतवर्ष में अन्य देशों की भांति विकास-क्रम की ये सारी अवस्थाएं होती हैं। केवल कांस्य-युग के स्थान पर (कुछ प्रदेशों को छोड़ कर) ताम्र-युग से मिलती संस्कृति यहाँ हुई।’ वे यह भी लिखते हैं कि ‘पूर्व-प्रस्तर काल के अवशेष यहाँ कम ही हैं... इसका अर्थ यह है कि भारत में पत्थरों के औजारों का प्रयोग नहीं के बराबर हुआ। एक और मजेदार बात यह है कि पाषाण युग में भी भारत में लोहे के औजार मिल रहे हैं। राधाकुमुद मुखर्जी लिखते हैं, ‘दक्षिण भारत में कई स्थानों पर नवप्रस्तर युग की बस्तियां तथा उनके औजारों को गढऩे की कर्मशालाओं के स्थान पाए गए हैं। ज्ञात होता है कि वे लोग अपने औजारों को कड़ी चट्टानों पर बनाई हुई घाइयों में घिसते और माडते थे। 10 से 14 इंच तक लम्बी और दो इंच गहरी घाइयां पाई गई हैं। इन बस्तियों में चाक के बढिय़ा बर्तन बहुतायत में मिले हैं, लम्बे ताबूत मिले हैं, जिनके साथ कभी-कभी लोहे के औजार भी पाए गए हैं। पत्थर की शिलाओं से निर्मित समाधियां या स्थाणु-संज्ञक निखात स्थान (मैगेलिथिक टोम्ब) मद्रास, बम्बई, मैसूर और हैदराबाद (दक्षिण) राज्य में बहुतायत में मिले हैं, परंतु उनमें प्राप्त लोहे के औजारों से वे नवप्रस्तर युग की ज्ञात होती हैं। पाषाण-युग के बाद दक्षिण भारत में लौह-युग और उत्तर भारत में ताम्र-युग आया।

उपरोक्त विवरण साफ कर देता है कि मानव सभ्यता का पाषाण युग, नवपाषाण युग, कांस्य युग और लौह युग का विभाजन भारत पर लागू नहीं होता। जिसे यूरोपीय पाषाण युग कह रहे हैं, भारत में उस काल में भी लोहे के औजार मिल रहे हैं, और भारत में तो कांस्य युग आ ही नहीं रहा है। यहाँ पहले लौह तथा ताम्र युग आ रहा है। हालांकि यदि भारतीय शास्त्रों के मत को देखें तो यह सारा युग विभाजन मूर्खतापूर्ण ही जान पड़ता है। महाभारत जो कि आज से पाँच हजार वर्ष पहले की घटना है और जिसकी ऐतिहासिकता को नकारने का कोई कारण नहीं है, में लोहे का पर्याप्त से अधिक प्रयोग पाया जाता है। पाँच हजार वर्ष पूर्व यूरोप का इतिहास प्रारंभ ही हो रहा था। वहाँ तो इस समय मनुष्य पूर्वपाषाण युग में जी रहा था।

फिर आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार रामायण की घटना आज से 8-9 हजार वर्ष पहले हुई। रामायण में भी लोहे के प्रयोग के भरपूर वर्णन हैं। ऐसे में भारत में लौह युग तो और पहले का मानना पड़ेगा। इस काल में यूरोप में मानव के इतिहास का प्रारंभ भी नहीं होता। वहाँ डार्विन के मतानुसार अभी बंदर ही उछल-कूद कर रहे थे। यदि भारतीय मतों को मानें तो रामायण का काल और पीछे जाएगा और रामायण तो हमारे इतिहास में काफी बाद की घटना है, उससे पहले लाखों वर्षों का इतिहास घटा है जिसमें लोहे के प्रयोग के पर्याप्त उल्लेख हैं।    (क्रमशः -- जारी है.....)

(इस लेख के दूसरे भाग में भी पश्चिमी कालगणना के इन थोपे हुए खोखले सिद्धांतों की धज्जियाँ तथ्यों और तर्कों के साथ बिखेरना जारी रहेगा)... बने रहिये desicnn.com के साथ... 

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लेखक :- रवि शंकर

साभार :- भारतीय धरोहर 

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