प्राचीन भारतीय गणित : तथ्यों सहित सच्चाई (अंतिम भाग)

Written by बुधवार, 28 मार्च 2018 08:41

प्राचीन भारतीय गणित (Ancient Indian Mathematics) संबंधी इस श्रृंखला के पहले भाग में आपने "ज्यामिती (Geometry) और श्रीयंत्र के बारे में पढ़ा था (पहले भाग को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें). दूसरे भाग में आपने त्रिकोणमिति (Trigonometry), अंकगणित (Arithmetic) एवं बीजगणित (Algebra) के बारे में तथ्यात्मक विश्लेषण पढ़ा है (दूसरा भाग पढने के लिए यहाँ क्लिक करें). इससे सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में भारतीय गणित बहुत उन्नत था, परन्तु स्वतंत्रता से पहले अंग्रेजों ने तथा बाद में "कथित बुद्धिजीवियों" ने जानबूझकर इसे हिकारत की निगाह से देखा और इसका लोप होने दिया.... इस तीसरे और अंतिम भाग में आगे पढ़िए कि आधुनिक काल में भी भारतीय गणितज्ञों ने अपना लोहा कैसे मनवाया है...

अन्य महत्वपूर्ण योगदान

प्रसिद्ध जैन गणितज्ञ महावीराचार्य ने क्रमांतरण और संयोजन की विधियों पर भी कार्य किया । श्रेणियों पर भी महावीर ने काम किया। लघुत्तम समापवत्र्य की अवधारणा भी महावीर के गणित सार संग्रह में मिलती है। पूर्ववर्ती गणितज्ञों की अपेक्षा में आर्यभट ने पाई का मान दशमलव के बाद चार अंको तक ज्ञात किया। केरल के गणित विद्यालयों ने भारतीय गणित को और भी उंचाई तक पहुँचाया। इन गणित विद्यालयों ने माधव जैसे गणितज्ञ के कार्य को उजागर किया। माधव यानी माधवाचार्य (1340 ई. 1425 ई.) ने कलन (कैलकुलस), त्रिकोणमिति और अनंत श्रेणी के विस्तार में अतुलनीय योगदान दिये। ज्येष्ठदेव की युक्तिभाषा, नीलकंठ सोमयाजी के तंत्र समग्रह, पुटूमन सोमयाजी के कर्ण पद्धति में माधव के कार्य का उल्लेख मिलता है। माधव ने गणित को त्रिकोणमिति से सम्बंधित कई विस्तार दिए। उनकी कई श्रेणियों का प्रयोग विभिन्न कोणों के ज्या (साइन) और कोज्या (कोसाइन) का मान ज्ञात करने के लिए किया जाता था, जो कि बिल्कुल सटीक परिणाम देतीं। इस तरह का पैनापन यूरोप में नहीं आया था। समीकरण ख को आज ग्रेगरी श्रेणी से जाना जाता है, जबकी माधव ने ग्रेगरी से 300 वर्ष पहले ही ऐसे समीकरणों को दुनिया के सामने लाया था।

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माधव ने इस सुंदर सूत्र की भी खोज की – यह सूत्र प्रसिद्ध गणितज्ञ लेबनीज ने भी बाद में खोजा। युक्तिभासा में माधव के कार्य को लेकर पता चलता है कि समाकलन की अवधारणा योग या संकलन-फल की सीमा (लिमिट) से सम्बंधित थी, जो आज के आधुनिक अवकलन विधि (विस्तार और पदों का एक एक कर अवकलन करना) से मेल खाती है। माधव के गणितीय कार्य यह दर्शाते हैं कि न्यूटन और लेबनिज से तीन शताब्दी पहले ही भारत कलन और गणितीय विश्लेषण में गहराई और परिपक्वत्ता हासिल कर चुका था।

आधुनिक भारतीय गणितज्ञ

उन्नीसवीं सदी के अंत में भारत के महान गणित सितारे का जन्म हुआ – श्रीनिवास रामानुजन (1887-1920 ई.)। रामानुजन का जीवन और उनका संघर्ष किसी से छुपा हुआ नहीं है। रामानुजन का महान गणितज्ञ हार्डी के नाम पत्र जिसमें उनके 120 प्रमेयों का भी उल्लेख था, ने हार्डी को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने रामानुजन को तुरंत ही इंग्लैंड बुलवा लिया। रामानुजन ने हार्डी के साथ अपनी गणितीय प्रतिभा को और भी निखारा। नंबर थ्योरी में अतुलनीय योगदान के लिए रामानुजन को रॉयल सोसाइटी ऑफ लन्दन का फेलो (अध्येता) चुना गया। पहली बार कोई भारतीय रॉयल सोसाइटी ऑफ लन्दन का सदस्य चुना गया था। रामानुजन के खास परिणामो में रामानुजन- रोजर्स फंक्शन हैं।

रामानुजन की एक श्रेणी है जिसका अभिसरण (कन्वर्जेंस) बहुत ही तेज गति से होता है। इसका उपयोग मशीन कंप्यूटिंग द्वारा कई अरब अंको तक पाई का मान निकालने के लिए किया गया। रामानुजन का टाउ फलन भी काफी चर्चित रहा। रामानुजन ने नंबर थ्योरी, गणितीय विश्लेष्ण, हाईपर जियोमेट्रिक श्रेणी, गामा फलन/फंक्शन, माड्यूलर फॉर्म आदि पे काफी काम किया। उनके खोये हुए महत्वपूर्ण पत्रों में उल्लिखित प्रमेयों की संख्या 4000 बतायी गई है। नंबर थ्योरी में ‘पार्टीसंस (किसी घनात्मक पूर्णांक को अन्य घनात्मक पूर्णांक के योग की तरह दर्शाना) पर उनके कार्य ने भी काफी गणितज्ञों को आकर्षित किया।

रामानुजन की उपलब्धियों को आगे बढ़ाते हुए हरीश चंद्र 1973 में रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लन्दन के अध्येता चुने गए। इनके बाद एम. एस. नरसिम्हा (1988), सी. सेशाद्री (1988), श्रीनिवास वर्धन (1998) और एम. एस. रघुनाथन (2000) को भी गणित में योगदान के लिए रॉयल सोसाइटी का अध्येता चुना गया। प्रख्यात सांख्यिकीविद सी. आर. राव को भी सांख्यिकी में योगदान के लिए रॉयल सोसाइटी का अध्येता चुना गया। आधुनिक काल में इनके अलावा और भी गणितज्ञ हुए हैं, जिन्होंने गणित में अपने योगदान का लोहा मनवाया और कई प्रसिद्ध सोसाइटी के अध्येता बने और पुरस्कृत भी हुए। गणित के क्षेत्र में भारत की धमक और चमक भी बढ़ी है। वर्ष 2010 में भारत में आयोजित हुई आई. सी. एम. गणितज्ञों का अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन इस बात का प्रमाण है। 100 वर्षों के इतिहास में पहली बार इस तरह के सम्मलेन का आयोजन भारत में हुआ था। आई. सी. एम. में एक वक्ता के लिए चयन होना बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती है और 1970 से हर बार किसी न किसी भारतीय गणितज्ञ (जो भारत में ही रह कर शोध कर रहे हैं) को एक वक्ता के तौर पर हमेशा आमंत्रित किया गया है। यह सौभाग्य बहुत सारे यूरोपीय और चीन जैसे देशों को भी प्राप्त नहीं हो पाया है।

गणित का नोबेल पुरस्कार माने जाने वाला फील्ड्स मेडल पुरस्कार वर्ष 2014 में भारतीय मूल के अमरीकी गणितज्ञ मंजूल भार्गव को प्रदान किया गया। मंजूल भार्गव का भारतीय शास्त्रीय संगीत से बचपन से काफी लगाव रहा है। वे अपने व्याख्यानों के दौरान गणित और संगीत के संबंधो को भी दर्शाते हैं। वे महान तबला वादक उस्ताद जाकिर खान के शिष्य हैं। भार्गव बताते हैं कि जब वह बचपन में छुट्टियों में भारत आते तो उन्हें किस्से-कहानियाँ, संस्कृत श्लोक, संगीत सुनने का काफी अवसर मिलता था। इनसे वे काफी प्रभावित हुए और उनके अध्ययन में भी इन सांस्कृतिक जड़ों का प्रभाव पड़ा। उनका भाषा विज्ञान में भी शोध पत्र है। अपने व्याख्यानों में मंजूल भार्गव भी प्राचीन भारतीय गणितज्ञों के योगदान पर अक्सर प्रकाश डाला करते हैं।

इस प्रकार भारतीय गणितज्ञों का योगदान अतुलनीय है और सचमुच उनके कार्य हमारे समाज,देश और पूरे विश्व के लिए एक धरोहर की तरह हैं जिन पर हम गर्व कर सकते हैं

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