एक सैनिक पुत्र का गुरमेहर कौर के नाम खुला पत्र

Written by मंगलवार, 28 फरवरी 2017 08:21

प्रिय गुरमेंहर,

नमस्कार...

पिछले कुछ ही दिनों में तुम्हारी वीडियो पोस्ट और कुछ “मीडिया हाउस”(?) द्वारा तुम्हारा इन्टरव्यू लेने के कारण तुम घर-घर में चर्चा का विषय बन गई हो, मैंने देखा कि तुम “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झंडा बुलंद कर रही हो और तुमने लिखा है कि तुम्हारे पिता को पाकिस्तान ने नहीं मारा, बल्कि “युद्ध” ने मारा”.

 सामान्यतः मैं इस प्रकार भावनाओं की सार्वजनिक अभिव्यक्ति से बचता हूँ, लेकिन इस बार तुमने सारी सीमाएँ तोड़ दी हैं इसलिए मुझे मजबूरन जवाब देने उतरना पड़ा है. मुझे जानकारी नहीं है कि तुमने यह बयान, यह इंटरव्यू, यह प्लेकार्ड अपनी मर्जी से दिया अथवा किसी और कारण से परन्तु इतना तो निश्चित है कि तुमने देश के लाखों सैन्य परिवारों के दिल को ठेस पहुंचाई है, जिन्होंने अपने बेटे, भाई देश पर कुर्बान कर दिए हैं.

प्रिय गुरमेंहर, चलो शुरू से शुरू करते हैं... मैं एक आईटी प्रोफेशनल हूँ और एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हूँ. मेरे पिता भारतीय सेना में अफसर थे जिन्होंने श्रीनगर में “ऑपरेशन रक्षक” के दौरान आतंकवादियों से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी. मुझे नहीं पता कि मैं इसके लिए किसे दोषी ठहराऊँ, पाकिस्तान को, राजनेताओं को या युद्ध को? मेरे पिता उन अनजान लोगों के बीच, अनजान भूमि पर अपने देश के सम्मान के लिए लड़ रहे थे, जहां लोग “इण्डिया गो बैक” के नारे लगाते हैं. तो मुझे लगता है कि हम दोनों एक ही उच्च नैतिक स्थान पर साथ-साथ खड़े हैं. तुम एक हुतात्मा की बेटी हो, और मैं भी एक बेटा.

चलो अब कदम-दर-कदम आगे बढ़ते हैं... तुमने कहा कि तुम्हारे पिता को पाकिस्तान ने नहीं मारा, युद्ध ने मारा. मैं तुमसे एक सरल सा प्रश्न पूछता हूँ, तुम्हारे पिता किससे युद्ध लड़ रहे थे? क्या यह उनकी निजी लड़ाई थी या किसी देश के खिलाफ थी? क्या तुम्हारे पिता के पास उस युद्ध में जाने अथवा नहीं जाने, लड़ने अथवा नहीं लड़ने का कोई विकल्प था, क्या वह युद्ध जिसमें तुम्हारे पिता लड़कर हुतात्मा हुए, वह तुम्हारे परिवार पर, मेरे परिवार पर, हमारे देश पर जबरदस्ती थोपा नहीं गया था? किसने थोपा था वह युद्ध?? स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान ने... जिसके कारण तुम्हारे पिता सहित सैकड़ों जवानों और नागरिकों को अपने प्राण गँवाने पड़े. यदि तर्क की दृष्टि से देखें तो तुम्हारे पिता को “युद्ध” ने मारा, लेकिन यह युद्ध आया कहाँ से? तुम्हारे पिता की मृत्यु के जो कारण सामने दिखाई दे रहे हैं, वे निम्नानुसार हैं...

१) पाकिस्तान की नापाक और गलीज़ हरकतें.
२) भारत के तत्कालीन राजनेताओं की नाकामी
३) भारत के नेतृत्व के लगातार की गई गंभीर भूलें
४) भारत में काम कर रहे पाकिस्तान के स्लीपर सेल, जो भारत में रहकर पाकिस्तान को समर्थन देते हैं, उसकी भाषा बोलते हैं (आज भी ऐसे लोग तुम्हारे आसपास दिखाई देंगे).
५) पाकिस्तान का धार्मिक उन्माद और अंधापन

और सबसे अंत में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि तुम्हारे पिता में देश के प्रति एक जोश था, जूनून था, जज्बा था जिसके कारण उन्हें अपना बलिदान देना पड़ा. तुम्हारे पिता निश्चित रूप से महान थे, लेकिन युद्ध उनकी पसंद नहीं था, न ही कभी भारत की पसंद रहा.

तुमने बताया कि जब तुम केवल दो वर्ष की थीं उस समय तुम्हारे पिता शहीद हुए, निश्चित रूप से यह सिद्ध करता है कि उनका एकमात्र लक्ष्य भारत के तिरंगे की रक्षा करना और अपने उस प्रिय रेजिमेंट का नाम रौशन करना था, जिसने उनके दिल में देश के प्रति परम बलिदान की भावना भरी. अन्यथा हम आजकल देख ही रहे हैं कि तुम्हारे पिता की आयु के बराबर लोग अभी भी JNU में छात्र(?) बने घूम रहे हैं और भारत की जनता के टैक्स के पैसों को चूस रहे हैं, फिर भी भारत के खिलाफ साजिशें रच रहे हैं और घृणा फैला रहे हैं, क्योंकि उनके सामने “बलिदान” का न कोई लक्ष्य है और ना ही उनकी शिक्षा वैसी है. तुम तो जानती ही हो कि तुम्हारे पिता ने कश्मीर की रक्षा में अपने प्राण गँवाए हैं, जिसकी आज़ादी की मांग JNU के झोलाछाप क्रांतिकारी कर रहे हैं. इस तरह तो वास्तव में ये लोग तुम्हारे पिता का अपमान ही कर रहे हैं ना?

इन नकली क्रांतिकारियों की निगाह में “आज़ादी” का मतलब क्या है? कश्मीर को पाकिस्तान में मिला देना, यही न!!! यानी जिस मूल विचार के लिए तुम्हारे पिता ने बलिदान दिया, आज उसी के नारे लगाए जा रहे हैं, इंटरव्यू लिए जा रहे हैं और पोस्टर बाँटे जा रहे हैं. तुम तो एक समझदार और पढी-लिखी लडकी हो, फिर भी तुम इन लोगों से घिरी हुई हो, जो तुम्हें एक “चारे” के रूप में उपयोग कर रहे हैं ताकि उनका दुष्प्रचार चलता रहे और कश्मीर में आग भड़के. मैंने तुम्हारा इंटरव्यू देखा, जिसमें तुमने कहा कि मैं किसी राजनैतिक दल के विरुद्ध नहीं हूँ, मैं केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की पक्षधर हूँ. मैं तुम्हीं से पूछता हूँ कि तुम्हारे लिए “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” का अर्थ क्या है?

- क्या तुम “भारत तेरे टुकड़े होंगे” को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानती हो?
- क्या “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” मेरे या तुम्हारे सैनिक पिता का अपमान के लिए उपयोग की जा सकती है. आज भी सीमा पर लाखों सैनिक जान की बाजी लगाए हुए तैनात हैं... क्या JNU में ज़ाहिर की गई कथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उनके सम्मान के लिए है?

प्रिय गुरमेहर यदि आज तुम्हारे पिता जीवित होते तो वे निश्चित ही तुम्हें “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” का सही अर्थ बेहतर पद्धति से समझाते. मेरी तुमसे विनम्र विनती है कि, अपने पिता से कुछ सीखो... उनसे अपने देश के प्रति सम्मान, जूनून, जोश, जज़्बा और बलिदान देना सीखो, क्योंकि “राष्ट्र हमेशा सर्वोपरि होता है”. मैं राष्ट्र के लिए दिए गए बलिदान हेतु अपने पिता पर गर्व करता हूँ, तुम्हें भी करना चाहिए. मैं उम्मीद करता हूँ कि मैं तुम्हें थोडा बहुत समझाने में कामयाब रहा हूँ...

एक बार फिर विचार करना, कि तुम्हारे पिता को किसने मारा? वे क्यों बलिदान हुए? उनका बलिदान होना, किसका दिया हुआ विकल्प था, भारत का या पाकिस्तान का?

जय हिन्द... भारत माता की जय... वंदेमातरम्

मनीष शर्मा

Read 3365 times Last modified on मंगलवार, 28 फरवरी 2017 17:24