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विश्व में सर्वाधिक आतंकी पैदा करने वाली यूनिवर्सिटी

Written by शनिवार, 02 सितम्बर 2017 08:33

जब से पिछले कुछ वर्षों में इस्लामिक आतंक की विभीषिका बढ़ी है, तभी से अक्सर यह सवाल कई बौद्धिक क्षेत्रों में उठाया जाता रहा है कि आखिर वह कौन सी शिक्षा है अथवा वह कौन सा ग्रन्थ या किताब है, जिससे प्रभावित होकर अथवा जिसे पढ़कर आतंकी बन रहे हैं.

आखिर वह कौन सा शिक्षक या कौन सा कॉलेज है जहाँ से खूँखार आतंकी निकल रहे हैं. अंततः एक एजेंसी ने समूचे विश्व की विभिन्न इस्लामिक स्टडीज़ करवाने वाली यूनिवर्सिटी (जिसमें भारत का देवबन्द भी शामिल है), तमाम मदरसों, मस्जिदों एवं ज़ाकिर नाईक जैसे “इस्लामिक स्कॉलर” इत्यादि के बारे में एक व्यापक सर्वे किया. ताकि यह पता लगाया जा सके कि आखिर गला रेतने, बम विस्फोट करने, भीड़ पर ट्रक चढ़ा देने जैसे आईडिया कहाँ से निकल रहे हैं. 

इस सर्वे का नतीजा बड़ा ही चौंकाने वाला है. मिस्र की राजधानी काहिरा में चलने वाली विश्व की सबसे बड़ी सुन्नी इस्लामिक संस्था अर्थात “अल-अज़हर विश्वविद्यालय” ने इस सूची में टॉप का स्थान प्राप्त किया है. जब यहाँ पढने वाले छात्रों की सूची से मिलान किया गया तो पाया गया कि विश्व के सबसे घातक, खूँखार आतंकी इसी विश्वविद्यालय से “औपचारिक शिक्षा” प्राप्त करके निकले हुए हैं. कई इस्लामिक विशेषज्ञ इस बात पर विचार कर रहे हैं कि क्या कुरआन में से हिंसा फैलाने वाली कुछ आयतों को निकाला जा सकता है. वहीं दूसरी तरफ अल-अज़हर विवि के पाठ्यक्रम को देखने से साफ़ पता चलता है कि कुरआन की मनमर्जीपूर्ण व्याख्या करने में यहाँ के मौलाना बहुत घातक किस्म के हैं.

मिस्र के इस अल-अज़हर विश्वविद्यालय से दुनिया भर के कई संस्थान जुड़े हुए हैं. सर्वे के अनुसार विश्व की हजारों मस्जिदों, लाखों मदरसों में इस विश्वविद्यालय से जाने वाला पाठ्यक्रम पढ़ाया जा रहा है. मिशिगन स्थित अमेरिका की सबसे संदिग्ध मानी जाने वाली “इस्लामिक अमेरिकन यूनिवर्सिटी” का पाठ्यक्रम भी अल-अज़हर से ही आता है. उल्लेखनीय है कि अमेरिका की इस यूनिवर्सिटी से “इस्लामिक ब्रदरहुड” नामक आतंकी संगठन वर्षों से जुड़ा हुआ है. इजिप्ट सरकार द्वारा जारी “शासकीय” आँकड़ों के अनुसार 2013 में अल-अज़हर विश्वविद्यालय से जुड़े छात्रों की संख्या 2,97,000 (दो लाख सत्तानवे हजार) थी. 2015 के आँकड़ों के मुताबिक़ 39,000 विदेशी छात्र ऐसे हैं जो यहाँ इस्लामिक ज्ञान प्राप्त करने आ रहे हैं. इन विदेशी छात्रों में पाकिस्तान, सूडान, लीबिया, कतर जैसे देशों के दर्जनों छात्र शामिल हैं. यहाँ के पाठ्यक्रम में “कुरआन” का हवाला देते हुए गैर-मुस्लिमों को मौत देने के विभिन्न तरीकों के बारे में, गैर-मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्कार एवं अपमान करने की पद्धतियों के बारे में सिखाया जा रहा है. मिस्र के कई बुद्धिजीवियों ने सरकार से अनुरोध भी किया है कि अल-अज़हर यूनिवर्सिटी को आतंकवादी संस्थान घोषित किया जाए, परन्तु फिलहाल मिस्र सरकार की हिम्मत नहीं हो रही है.

 

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(कुरआन की आयतों के अनुसार हत्या और बलात्कार करने की शिक्षा ग्रहण करने के बाद अल-अज़हर विवि का दीक्षांत समारोह)

2015 में मिस्र के सबसे बड़े अखबार “अल-योम-अल-साबी” ने इस यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम के बारे में विस्तार से शोध करके एक खबर प्रकाशित की थी. अखबार के मुताबिक़ यहाँ पढ़ाई जाने वाली दर्जनों किताबों में से एक है “अबी-शोगा” की पुस्तक हल-अलफ़ाज़-इब्न-अबी-शोगा. इस पुस्तक में स्पष्ट लिखा गया है कि कुरआन के मुताबिक़ “कोई भी मुस्लिम, किसी भी गैर-मुस्लिम को किसी भी समय काफिर घोषित करके उसकी हत्या कर सकता है. यहाँ तक कि पुस्तक में गैर-मुस्लिम का माँस खाना भी कुरआन में जायज़ बताया गया है. अबी-शोगा की इस पुस्तक के अनुसार मुसलमानों पर किसी काफिर का बुरा प्रभाव न पड़े, इसलिए वह उस काफिर की आँखें निकालने अथवा एक हाथ और एक पैर काटने के लिए स्वतन्त्र है...”. यहाँ तक कि अल-अज़हर यूनिवर्सिटी में पढाए जाने वाले पाठ्यक्रम में मुस्लिम भी सुरक्षित नहीं हैं. इसी किताब में आगे लिखा गया है कि “इमाम की अनुमति के बिना, नमाज़ नहीं पढने वाले मुस्लिम को क़त्ल कर दिया जाना चाहिए...”. जब मिस्र सरकार ने जाँच की तो पाया कि मुस्लिम ब्रदरहुड नामक खतरनाक संगठन में भर्ती होने वाले ढेर सारे आतंकी इसी विश्वविद्यालय से पढ़कर निकले हुए हैं. 2006 में ही एक वीडियो लीक हो गया था, जिसमें अल-अज़हर यूनिवर्सिटी के अन्दर ही (वर्तमान ISIS की तरह) काले कपड़े पहने लगभग पचास नकाबपोश युद्ध और गला काटने की ट्रेनिंग लेते हुए दिखाए गए थे. इस वीडियो ने उसी समय कई सरकारों के होश उड़ा दिए थे, लेकिन इस तरफ गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया और अब ग्यारह वर्ष बाद पूरी दुनिया सुन्नी इस्लामिक शिक्षाओं से पीड़ित हो रही है.

अब विश्व में इस बात पर कभी कोई नहीं चौंकता यदि कोई आतंकवादी अल-अज़हर यूनिवर्सिटी से जुड़ा हुआ पाया जाता है. उदाहरण के लिए बोको हराम का नेता अबू-बक्र शेखू ने इसी अल-अज़हर विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट किया है. अल-कायदा का सबसे पहला आतंकी अब्दुल्ला आज़म (1941-1989) यहाँ से पढ़ा. इसके बाद ओसामा बिन लादेन का “आध्यात्मिक गुरु” माना जाने वाला “अँधा शेख” के नाम से प्रसिद्ध उमर अब्दुल रहमान (1938-2017) भी इसी विश्वविद्यालय से निकला हुआ है. येरूशलम का खतरनाक मुफ्ती हाजी अमीन अल हुसैनी (1897-1974) भी यहीं का छात्र रहा है, रूस के एक हवाई जहाज को बम विस्फोट में उड़ाने वाला अबू ओसामा अल मसिरी भी इसी यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट होकर निकला है.

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यह विश्वविद्यालय केवल सुन्नी वहाबी कुरआन की व्याख्या और उसके किताबी ज्ञान तक ही सीमित नहीं है. बल्कि अब यहाँ से फतवे भी जारी किए जाने लगे हैं. चूंकि विश्व भर में इस यूनिवर्सिटी के छात्र, मौलाना, इमाम और तालिबान निकले हुए हैं, इसलिए वे ऐसे फतवों को हाथोंहाथ लेते हैं और उसे अंजाम तक पहुँचाते हैं. हाल ही में इस विश्वविद्यालय के प्रमुख ने मुस्लिम विद्वान इस्लाम-अल-बाहिरी को ईशनिंदा के आरोप में मौत की सजा सुनाई है. यह मुस्लिम विद्वान फिलहाल मिस्र सरकार की जेल में कैद है. अल-अज़हर विवि ने ही मिस्र के सेक्यूलर माने जाने वाले बुद्धिजीवी फराग फ़ाउदा (1945-1992) के खिलाफ फ़तवा ज़ाहिर किया था. पिछले माह चीन सरकार ने मिस्र सरकार से आग्रह करके अल-अज़हर यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे चीनी मुस्लिम छात्रों की सूची मँगवाई, और अब चीन सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए उन सभी छात्रों को तत्काल चीन लौट आने का आदेश दिया है.

कुल मिलाकर बात यह है कि अल-अज़हर यूनिवर्सिटी समूचे विश्व के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है. मिस्र सरकार को हिम्मत जुटाकर इस विश्वविद्यालय पर अपना कब्ज़ा करना चाहिए, तथा यहाँ पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम में बदलाव करके उसे थोड़ा “मानवीय” बनाने का प्रयास करना चाहिए. यदि मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फ़तेह अल-सीसी वास्तव में इस्लाम की बिगड़ती छवि को लेकर चिंतित हैं तो उन्हें सबसे पहले इस सुन्नी वहाबी संस्थान पर नकेल कसनी होगी. यदि ऐसा नहीं किया गया तो भविष्य में भी तमाम रहमान, आज़म और शेखू यहाँ से “इस्लामिक शिक्षाएँ” प्राप्त करके निकलते रहेंगे और पूरे विश्व में आतंक फैलाते रहेंगे. दूसरी बात यह है कि केवल इस विश्वविद्यालय को बंद करके अथवा इसमें बदलाव करके कोई ख़ास फायदा नहीं होगा, क्योंकि इस यूनिवर्सिटी से जुड़े हुए विश्व के दूसरे हजारों मदरसों, इस्लामिक स्टडी संस्थानों पर निगाह रखना लगभग नामुमकिन है. कुरआन की आयतों और हदीसों की व्याख्या हर कोई अपनी मनमानी से कर रहा है, जबकि इसके लिए एक विश्वव्यापी सर्वानुमत ढाँचा होना चाहिए. जब तक अल-अज़हर जैसी दर्जनों यूनिवर्सिटी, मदरसों, मस्जिदों इत्यादि पर काबू नहीं पाया जाता, तब तक इस्लामिक आतंक से मुक्ति मिलना संभव नहीं है.

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