एयर इण्डिया विनिवेश के बाद BSNL-MTNL का नंबर?

Written by शुक्रवार, 11 अगस्त 2017 08:10

इस समय भारत की शासकीय एयरलाईन्स अर्थात एयर इण्डिया के विनिवेश की प्रक्रिया जारी है. जैसा कि अब सभी लोग जान गए हैं, पिछले साठ वर्षों में राजनैतिक दलों ने एयर इण्डिया को “दूध दुहने वाली गाय” की तरह इस्तेमाल किया है.

पिछले कई वर्षों से नागरिक उड्डयन मंत्रालय केवल उपकृत करने का साधन मात्र रह गया था. एयर इण्डिया की कर्मचारी यूनियनें “केवल अपने लाभ” की खातिर आन्दोलन करती थीं, इसी प्रकार एयर इण्डिया के पायलट भी अपनी दादागिरी और मक्कारी के लिए कुख्यात होने लगे थे.

कुल मिलाकर बात यह थी कि नेता-अफसर-यूनियन-कर्मचारी अर्थात सभी के सभी एयर इण्डिया को केवल बर्बाद करने में लगे रहे और उस पर हजारों करोड़ रूपए का कर्जा चढ़ गया. चूँकि कम्पनी सरकारी थी, इसलिए सरकार अपने बजट में से (यानी हमारी जेब में से) पैसा निकालकर बार-बार “बेल-आउट” पॅकेज जारी करती रही. परन्तु उपरोक्त खतरनाक चौकड़ी के रहते इस कवायद का कोई नतीजा नहीं निकलना था, और वैसा ही हुआ भी. अब स्थिति ये हो चुकी है कि सरकार ने जिस टाटा समूह से इस एयरलाईन्स को छीनकर सरकारी बना डाला था, खुद टाटा समूह भी इस बर्बाद हो चुकी कम्पनी को खरीदने के लिए तैयार नहीं हैं. एक स्वाभाविक सी बात है कि जब कोई उद्योगपति अपना पैसा कहीं लगाता है तो वह समाजसेवा के लिए कमाई के लिए लगाता है. एयर इण्डिया को खरीदने के इच्छुक उद्योगपतियों की पहली शर्त यही है कि वे “अपनी मर्जी के” और “अपनी शर्तों पर” कर्मचारी रखेंगे, और यह मांग जायज़ भी है. एयर इण्डिया सरलता से बिक भी नहीं रही है, क्योंकि इस को “उचित दाम” नहीं मिल रहे हैं. प्रफुल्ल पटेल जैसे कई मंत्रियों ने पिछले कई वर्षों से एयर इण्डिया को “अपने घर की टैक्सी” जैसा उपयोग किया, उसका नतीजा है कि अब इसका ढर्रा इतना बिगड़ चुका है कि जो भी निजी कंपनी इसे खरीदेगी वह एक तरह से “सफ़ेद हाथी” ही खरीद रही होगी. इसीलिए देरी हो रही है.

Air India

भयानक घाटे और अकर्मण्यता के सागर में गोते लगा रहे सरकारी उपक्रमों के “सफ़ेद हाथियों की श्रृंखला” में एक और नाम है BSNL और MTNL का. इनकी कहानी भी एयर इण्डिया से अधिक जुदा नहीं है. “सरकारी” शब्द जुड़ते ही किसी उपक्रम या कम्पनी का क्या हाल होता है, यह एयर इण्डिया और BSNL से सीखा जा सकता है. वही मक्कारी, वही कामचोरी, वही यूनियनबाजी, वही भ्रष्टाचार, वही नौकरशाही-नेता का गठजोड़... कहानी बिलकुल “सेम-टू-सेम” है. जिस समय तमिलनाडु में दयानिधि मारन अपने घर तक टेलीफोन की लाईनें बिछा रहे थे, अपना खुद का टेलीफोन एक्सचेंज खोले बैठे थे, भ्रष्टाचार की सभी सीमाएँ लांघ चुके थे, उस समय BSNL की किसी यूनियन ने उनके खिलाफ कोई आन्दोलन नहीं चलाया. क्योंकि कर्मचारी यूनियनें केवल “अपने हित”, “अपना वेतनमान”, “अपनी नेतागिरी” की तरफ ध्यान देती हैं. कभी ऐसा सुनने में नहीं आया कि टेलीफोन विभाग में चल रहे भीषण भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी यूनियन ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों का घेराव किया हो... कभी सुनने में नहीं आया कि किसी कर्मचारी संगठन ने अपने विभाग की बदहाली और दुरुपयोग के खिलाफ किसी मंत्री के खिलाफ धरना-प्रदर्शन किया हो.

जब वहाँ नौकरी करने वालों को ही अपने विभाग की परवाह नहीं है, जब सभी कर्मचारियों को केवल अधिकार चाहिए, कर्त्तव्य नहीं... तो ज़ाहिर है कि सरकार पोषित सार्वजनिक उपक्रम घाटे में जाएँगे ही. ऊपर से कई अनुपयोगी एवं अनुपादक कर्मचारियों का भीषण बोझ, उनकी सेलेरी, उनकी पेंशन, उनकी सुविधाएँ, उनके भत्ते.... आखिर सरकार की भी अपनी सीमा है, कब तक पोसेगी? और वे दिन भी लद गए जब “मियाँ जुम्मन फाख्ता उड़ाया करते थे”, अर्थात जब से टेलीकॉम क्षेत्र में निजी कंपनियों ने अपने पैर जमाए हैं, तब से BSNL की दादागिरी लगातार ख़त्म होती चली गयी है. वास्तव में होना तो यह चाहिए था कि सबसे बड़े “कस्टमर बेस” (यानी मार्केट में इकलौते) तथा गाँव-गाँव तक फैले हुए सबसे बड़े नेटवर्क के होते हुए BSNL को न तो घाटे में होना चाहिए था और ना ही निजी कंपनियों के सामने कमज़ोर पड़ना चाहिए था. लेकिन वैसा नहीं हुआ, आज की तारीख में जियो, एयरटेल, वोडाफोन और आईडिया के बाद पाँचवें नंबर पर खिसक गया है BSNL. ऐसा क्यों हुआ? BSNL का कस्टमर शेयर (जो एक समय 100% था) घटते-घटते 14% पर आ गया. आज भी BSNL के पास ऐसी कोई योजना नहीं है कि वह निजी कंपनियों से मुकाबला कैसे करेगा या अपना खोया हुआ ग्राहक आधार कैसे वापस हासिल करेगा? सब कुछ सरकार के भरोसे छोड़ दिया गया है. नेहरूवादी समाजवाद ने भारत के सार्वजनिक उपक्रमों में इतनी आत्म-मुग्धता भर रखी है कि वे आसन्न खतरे को भी नहीं देख पाते हैं, बाज़ार में प्रतिस्पर्धा करने की बात तो दूर है. ग्राहकों के साथ बदतमीजी, निजी कंपनियों के मुकाबले ऊँची दरें तथा आधुनिक तकनीक के साथ जल्दी समन्वय नहीं बैठा पाना BSNL की प्रमुख विफलता रही है, जिसकी तरफ किसी भी कर्मचारी यूनियन ने ध्यान नहीं दिया, तो अफसरों को क्या पड़ी है. जब उपरोक्त कर्मचारी संगठन हड़तालें और काम रोको करके अपने वेतनमान बढ़ा सकते हैं... जब निचले और मध्यम स्तरीय कर्मचारी सरकार को उनके हित में फैसला लेने पर मजबूर कर सकते हैं तो जनता (यानी ग्राहकों) से जुड़े मुद्दों पर भी उन्हें ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए?

एयर इण्डिया और BSNL में काफी समानताएँ भी हैं. 2015-16 में एयर इण्डिया का कुल राजस्व 32,000 करोड़ रूपए था, जबकि BSNL का 23,000 करोड़ रूपए. BSNL की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार इसने 2016 में 3000 करोड़ रूपए का घाटा खाया. जबकि उधर एयर इण्डिया 2014 में ही 5900 करोड़ के घाटे पर बैठी थी. जेट एयरवेज, इंडिगो और अन्य निजी कंपनियों के आने के बाद एयर इण्डिया का ग्राहक बेस केवल 13% रह गया, इधर BSNL का ग्राहक बेस 14% तक रह गया. 2015 में एयर इण्डिया पर कर्जा 55,000 करोड़ रूपए था (जिसमें से 35% नए विमान और कलपुर्जे खरीदने तथा बैंकों से लिया गया उधार शामिल है). इसी प्रकार मार्च 2016 तक BSNL के सिर पर कुल कर्जा 47,000 करोड़ तक पहुँच चुका था. BSNL अपने कर्मचारियों के वेतन और पेंशन पर 15,000 करोड़ रूपए प्रतिवर्ष खर्च करता है. जिस प्रकार एयर इण्डिया के ग्राहकों की संख्या तेजी से गिर रही है, इसी प्रकार BSNL के लैंडलाइन ग्राहकों की संख्या चार करोड़ से घटकर डेढ़ करोड़ तक आ गयी, क्योंकि अपने घाटे की पूर्ती के लिए निजी कम्पनियों से मुकाबला करने की बजाय BSNL वाले महँगी लैंडलाइन और ब्रॉडबैंड सेवाएँ देते रहे, और ग्राहक लैंडलाइन से खिसककर मोबाईल पर चले गए. रही-सही कसर रिलायंस जियो ने पूरी कर दी. जब देश में 4G नेटवर्क आ रहा था, उस समय देश के प्रमुख छः टेलीकॉम सर्कलों में BSNL ने अपने स्पेक्ट्रम 6725 करोड़ में दूसरों को या तो बेच डाले या लीज़ पर दे डाले.

अब सवाल उठने लगे हैं कि आखिर “सरकार” को टेलीकॉम के धंधे में क्यों रहना चाहिए?? भले ही सरकार BSNL को बेचने का निर्णय कर भी ले, परन्तु असल समस्या अब भी बाकी है कि आखिर कोई निजी कंपनी एयर इण्डिया और BSNL जैसे “सफ़ेद हाथी” क्यों खरीदे? इस सफ़ेद हाथी के साथ, उसके हजारों “सरकारी मानसिकता” वाले कर्मचारियों को भी पालना-पोसना होगा... स्वाभाविक है कि जैसे एयर इण्डिया को बेचने में समस्या आ रही है, वैसे ही BSNL भी इतनी आसानी से नहीं बिकेगा.... और इस काम में जितनी देरी होती जाएगी, उतनी ही हमारी (यानी टैक्सपेयर्स की) जेब कटती जाएगी. दोनों ही कम्पनियाँ अब “सुधरने” की सीमा से बाहर हो चुकी हैं, बेचने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है.

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