BHU की घटना, ABVP की नाराज़गी और रायता फैला

Written by शनिवार, 30 सितम्बर 2017 21:23

कुछ दिनों पूर्व बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय काफी सुर्ख़ियों में रहा था. वहाँ की एक छात्रा के साथ छेड़छाड़ की घटना ने इतना भीषण रूप लिया कि मामला आग की तरह फैला, मीडिया भी इसमें घुस आया, राजनीति भी इसमें खेली गयी और प्रशासन असहाय जैसा दिखाई दिया.

इस घटना के बाद जो बातें पिछले काफी समय से दबाकर रखी गयी थीं, वह सतह पर आ गईं और कुलपति त्रिपाठी जी ने NDTV के पत्रकार रवीश कुमार को जैसा इंटरव्यू दिया, उसके बाद तो उनकी और भी खिल्ली उड़ाई गयी. लेकिन इस सारे झमेले के ठण्डा होने के बाद सवाल उठता है कि क्या यह सब किसी तात्कालिक घटना (छेड़छाड़) की वजह से हुआ, या इसके पीछे पहले से चली आ रही पृष्ठभूमि भी है. यदि बनारस विश्वविद्यालय के छात्रों की मानें, और खासकर ABVP के छात्र नेताओं की मानें तो कुलपति त्रिपाठी जी के खिलाफ असंतोष काफी लम्बे समय से खदबदा रहा था, जो अचानक एक चिंगारी मिलते ही फूट पड़ा. देश के कई नामी और बेनामी पत्रकारों तथा सोशल मीडिया पर सक्रिय कई ब्लॉगर्स ने अपने-अपने तरीके से BHU की घटना की रिपोर्टिंग की है. आईये देखते हैं कि बनारस हिन्दू विवि की इस घटना में परदे के पीछे कुछ और महत्वपूर्ण कारण भी थे, जो अभी तक सामने नहीं आए थे, वही आपके सामने पेश किया जा रहे हैं.

BHU की पिछले दिनों घटी घटना को अगर सरसरी नजर से देखा जाए, तो उभर कर यही आता है कि विश्वविद्यालय में लड़की को छेड़ा गया और उचित कार्यवाही न होने पर छात्राएं अनशन पर बैठी, उसके बाद लाठी चार्ज और अब जाँच और आरोप तय करने का सिलसिला और राजनीति. परन्तु यह घटना एक दिन का तात्कालिक परिणाम नही है, न ही यह कोई प्रायोजित योजना के तहत किया गया. यह सत्य हैं कि BHU के वर्तमान कुलपति प्रो गिरीश चन्द्र त्रिपाठी को एक तनावपूर्ण वातावरण में कुलपति बनाया गया. उस समय के कार्यवाहक कुलपति को उनके कार्यालय में घुसकर लोगों ने पीटा था. कैम्पस में पुलिस, RAF, PAC का कब्जा था. ऐसी स्थिति में गिरीशचंद्र त्रिपाठी जी जब कुलपति बने तो उन्होंने पूर्व कुलपति के दुर्व्यवहार की घटना में ABVP के कार्यकर्ताओं को दोषी मानते हुए एक दर्जन ABVP के कार्यकर्ताओं का निष्कासन कर दिया था. इसके बाद विभिन्न दबाव और तथ्यों के बाद भी इन्होंने यह कह कर निलम्बन वापस नही लिया, कि मैं स्वयंसेवक हूँ लेकिन यह विश्वविद्यालय आरएसएस का कायार्लय नही है. तनाव शुरू होने की यह पहली स्थिति थी.

इसके बाद कुलपति जी ने विश्वविद्यालय चलाने के लिए जो अपनी प्रशासनिक टीम बनाई, उसमें भी उन्होंने RSS और आरएसएस विचार परिवार को दरकिनार करते हुए वामपन्थी, कांग्रेसी और सपाई शिक्षकों को अपनी प्रशासनिक टीम में रखा. यही लोग मंचों पर वक्ता के रूप में, और यहाँ तक कि राष्ट्रीय स्तर के विचार-परिवार के पदाधिकारी से कार्यकर्ताओं को मिलने का और न मिलने का निर्णय लेने लगे. स्वाभाविक रूप से इस कारण स्थानीय आरएसएस-विचार परिवार के लोगों का नाराज होना स्वाभविक था. अर्थात कुलपति जी ने अपने कार्यकाल के आरंभ के दिनों में ही स्थानीय RSS पदाधिकारी और ABVP के लोगों से दूरी बना ली थी. इसके अतिरिक्त कुलपति जी ने कुछ छात्रों का अपना एक दल भी बना लिया था, जो कुलपति का विरोध करने वालों से मारपीट और उनके आंदोलन को अराजक बनाने का काम करता था. सूत्रों के अनुसार इन लोगों ने कई बार कैम्पस में मारपीट की, लेकिन इन पर कोई कार्यवाही नहीं हुई.

इसके बाद ट्रामा सेंटर में जाँच मशीन के घोटाले को लेकर ABVP ने मुखर होकर आंदोलन भी किया, जिसमें एक बार पुनः ABVP के कार्यकर्ताओं का निष्कासन किया गया. इसके बाद विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसरों की भर्ती में भ्रष्टाचार की चर्चा के बीच, कुलपति जी ने अधिकांश नियुक्तियां/भर्तियाँ, कांग्रेसी/वामपंथी व सपाई लोगो की ही की. बताया जाता है कि, 'मेजर' (वास्तविक नाम नही पता, क्योंकि कैम्पस में इसी नाम से जाना जाता था) जो एक आपराधिक छात्र और समाजवादी पार्टी का कार्यकर्ता था, इसकी नियुक्ति कुलपति जी ने तात्कालिक सपा सरकार के मंत्री ओमप्रकाश सिंह के कहने पर की. जो छात्र लंबे समय से कैम्पस में अपराध का कारण रहा हो, उसे यदि असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त करेंगे तो आम छात्रों पर कुलपति के प्रति नकारात्मक सोच का आना स्वाभाविक है. लेकिन कुलपति जी ने किसी की (खासकर ABVP की) नहीं सुनने की ठान रखी थी. इसके अतिरिक्त 24×7 घण्टे लाइब्रेरी जो BHU में खुली रहती थी, उसे रात में बंद करने के आदेश के खिलाफ भी आम छात्रों में आक्रोश था.

 

BHU 2

इसी BHU के हास्पिटल में गैस सप्लाई बाधित होने पर हुई दस से अधिक मौत का भी कारण कुलपति जी थे. क्योंकि इससे पहले जिस गैस सप्लाई एजेंसी को टेंडर था उसके टेंडर को रद्द कर कुलपति जी ने अपने निकट सम्बन्धी इलाहाबाद के पूर्व कांग्रेसी नेता जो मार्च 2017 में UP विधानसभा चुनाव में बीजेपी से चुनाव जीतकर विधायक बने अर्थात हर्षवर्धन वाजपेयी को दे दिया, जिनके पास विशेषज्ञों का अभाव था जिससे यह घटना घटी. इसके अतिरिक्त फिजी देश मे बलात्कार और बलात्कार में सात साल की सजा पाने वाले ओपी उपाध्याय का बलात्कारी होने की वजह से विरोध करने के बावजूद, लगातार उसे अस्पताल का मेडिकल ऑफिसर बनाये हुए थे, लिंक यह रहा... (https://m.patrika.com/varanasi-news/bhu-vc-girish-chand-tripathi-a-new-controversy-for-appointment-issue-1852708/). इसके अलावा यह भी सत्य है कि पिछले दो वर्षों में छात्रावासों में अव्यवस्था, कैम्पस में मारपीट की घटना और लड़कियों से छेड़छाड़ लगातार बढ़ी है, जिन पर कुलपति या प्रॉक्टर ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया.

BHU में देश भर के छात्र पढ़ते हैं और सामान्तया उनमें किसी भी विचारधारा के पक्ष में खड़े दिखाई नही देते. जो भी हैं वह ABVP है, वामपन्थी विचारधारा के बहुत ही कम है. हाँ, लेकिन लगातार प्रयास से यहाँ NSUI ने अपना एक गुट अवश्य तैयार कर लिया है. यहाँ के छात्रों को 2014-15 में मोदी जी पर आस दिखी और उन्होंने उनका समर्थन किया. वही छात्र आज इस कुलपति की वजह से मोदी विरोधी भी बनता जा रहा है. यही सब आधार कैम्पस में इस तात्कालिक घटना का कारण बना.

एक छात्रा के साथ शाम छः बजे कुछ लड़के उसके कपड़ों में हाथ डालने का प्रयास करते हैं, वह भी उन प्रॉक्टर दल के आगे, जिन्होंने बाद में कमिश्नर के अनुसार पहले लाठीचार्ज की थी बाद में पुलिस आयी. पीड़ित छात्रा ने जब यह शिकायत चीफ प्रॉक्टर प्रो. केएन सिंह से की तो उन्होंने कहा कि उतनी समय क्यों कैम्पस में घूमती हो? इस घटना का पूरा दोष प्रॉक्टर ने छात्रा पर ही मढ़ दिया. (गौरतलब है कि चीफ प्रॉक्टर केएन सिंह खिलाफ CBI जांच चल रही है). नतीजन छात्राओं ने विरोध प्रदर्शन का निर्णय लिया. यह बात कुलपति द्वारा कही जा रही है, कि यह विरोध प्रदर्शन विश्वविधालय परिसर के बाहर था, यह एक अधूरा सत्य है. क्योंकि सत्य यह है कि BHU में किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन की अनुमति न होने से पिछले 25 वर्षों से कैम्पस का धरना स्थल विश्वविद्यालय का सिंहद्वार ही है. छात्राएं जब धरने पर थीं, तो धरना स्थल पर ही छात्राओं की सभी मांग मान ली गयी थी. केवल एक मांग को छोड़कर, वह थी कुलपति जी स्वयं धरना स्थल पर आएं. उसी दिन मोदीजी को बनारस आना था. देशभर की मीडिया बनारस में ही थी, और आंदोलन के पहले दिन आंदोलन स्थल पर 400-500 केवल छात्राएं थी. इस पूरी घटना से निपटने का सरल तरीका यही था कि कुलपति जी स्वयं यह कह कर केवल छात्राओं से मिल सकते थे, कि यह विषय छात्राओं का है वह सीधे उनसे मिलेंगे. दस मिनट में सब समाप्त हो जाता, और लाठीचार्ज जैसी स्थिती नही आती. परंतु ऐसा नही हुआ, इसका कारण था कुलपति जी के कार्यकाल का अंतिम समय और उनका अहंकार.

यह सत्य है कि BHU की व्यवस्था बहुत विकेंद्रीयकृत है सभी घटना कुलपति तक नही जाती है. ऐसी स्थिति में जैसा कि ऊपर लिखा है, कुलपति जी ने अपना पूरा कार्यकाल वामपन्थी/कांग्रेसी और सपाई शिक्षकों के माध्यम से चलाया, उनमें से कोई भी राष्ट्र्वादी नही थे. नतीजतन उन लोगों (कुलपति की टीम) ने पूरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार और अन्य सुविधाओं का भोग तो किया, लेकिन जाते-जाते अंतिम समय में ये लोग अपने असली रंग में आ गए और अब वह कुलपति की बेइज्जती कराना चाहते है. इस घटना का प्रमुख और प्रथम दोषी चीफ प्रॉक्टर था, जिसने पीड़ित से गलत बात कही और जिसने रात में आंदोलन के दूसरे दिन लाठी चार्ज करवाई. दूसरी गलती उन वामपन्थी सलाहकारों की है, जो कुलपति को धरना स्थल पर न जाने की सलाह दे रहे थे, और ऐसा करके वास्तव में कुलपति का ही नुक्सान कर रहे थे.

गलतियों का बड़ा पहाड़ तो खुद भ्रष्टाचारी कुलपति हैं, जिनके विश्वविद्यालय के प्रथम आगमन पर प्रत्येक ABVP कार्यकर्ता गर्व से कहता था यह “अपने” कुलपति हैं, उन्हीं ने अधिकाँश वामपंथियों को अपना सलाहकार बनाया, और उन्हीं ने आज कुलपति को यहाँ तक पहुँचाया है. ऊपर से कुलपति जी न्यूज चैनल पर लगातार ऐसे ही झूठ के ऊपर झूठ बोले जा रहे हैं. संक्षेप में बात इतनी सी है कि संघ विचार परिवार की जगह वामपन्थी/कांग्रेस गिरोह की गोद मे बैठने का परिणाम है, कि आज BHU बदनाम हो रहा है. पूरी घटना में नरभक्षी वामपंथी दोनों पक्षों से खेल रहें हैं. राष्ट्र्वादी और BHU का सामान्य छात्र यही कह रहा है, कि मोदीजी ने महामना के साथ गलत किया, और भगवान् करे यह कुलपति जल्दी यहाँ से टलें.

अब जरा एक निगाह कुलपति त्रिपाठी जी के शानदार “टीम” पर भी डाल लेते हैं.

श्री नीरज त्रिपाठी ... रजिस्ट्रार
श्री ओंकार नाथ सिंह .... चीफ प्रॉक्टर
श्री ओ पी उपाध्याय ..... मेडिकल सुप्रिटेंडेंट
श्री एच एन प्रसाद ......लाइब्रेरियन
श्री प्रियंकर उपाध्याय ....कई समितियों में सदस्य
श्री कुमार पंकज .... डीन, कला संकाय, मुख्य सलाहकार.

इन सभी महानुभावों में से ऐसा एक भी नही है, जिस पर बदनुमा दाग नही हो, लेकिन इनके प्रशंसक "दाग अच्छे हैं” कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं. इसमें से सभी लोग विश्वविद्यालय के महान शुभचिंतको की श्रेणी में है, लेकिन किसी पर CBI जांच चल रही है, किसी पर कई बार न्यायिक जांच बैठ चुकी है, कोई 1000 की पुस्तक 12000 में खरीदने का आरोपी है, किसी पर देशद्रोह का आरोप है, किसी पर विदेशी इंटेलिजेंस एजेंसी का एजेंट होने का आरोप है, कोई विश्वविद्यालय में फर्जी नियुक्तियों का सरगना रह चुका है और कोई बलात्कार का सजायाफ्ता है. ABVP ने लगातार ऐसे लोगों के खिलाफ आवाज़ उठाई, लेकिन कुलपति द्वारा सदैव अनसुनी कर दी गईं. अंत में नतीजा यह रहा कि कुलपति साहब “बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले, बहुत निकले अरमान, मगर फिर भी कम निकले” की तर्ज पर इसी माह रिटायर होंगे और छात्र-छात्राएँ चैन की साँस लेंगे, मगर तभी तक... जब तक कि नए कुलपति की नियुक्ति नहीं हो जाती. नए कुलपति कौन होते हैं, किस स्तर के होते हैं, आने के बाद वे अपनी टीम में RSS के लोगों को रखते हैं या वामपंथियों को यह देखने के काबिल होगा.... लेकिन जैसा कि अभी तक पिछले तीन वर्ष में देश के अन्य विश्वविद्यालय में देखने में आया है, ABVP वाले छात्रों को अधिक उम्मीद नहीं है कि स्थिति में सुधार आएगा. क्योंकि पास ही में लगभग यही स्थिति इलाहाबाद विवि की है. वहाँ भी हमारे संघ विचार-परिवार के लोगों ने एक कटु दलित चिंतक(??) बद्रीनारायन को “राष्ट्रवादी” मान लिया है. यह निश्चित है कि आने वाले समय में ये सज्जन भी BHU के वामपन्थी जहरीले सांपों की तरह नुकसानदेह साबित होंगे. सुना है कि कुलपति जी के खिलाफ वित्तीय अनियमितता के लिए राष्ट्रपति ने दस दिन पूर्व ही जाँच के आदेश दे दिए हैं... लेकिन उनका बाल भी बाँका न होगा.

लब्बेलुआब यह है कि पिछले तीन वर्षों में चाहे स्मृति ईरानी हों, अथवा प्रकाश जावड़ेकर... शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करने में भाजपा पूरी तरह असफल सिद्ध हुई है. इन संस्थानों में जमे बैठे वामी-कांगी-सपाई लोगों को प्रशासन और निर्णयों से दूर रखने की बजाय इन्हीं के साथ गलबहियाँ जारी हैं. भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है, सुधार की गति एकदम धीमी है. बनारस हो या चेन्नई अथवा जादवपुर... ABVP एवं विचारधारा के लोग यही कहते हैं “जब अपना सिक्का ही खोटा निकल जाए, तो क्या कीजिएगा?”, जिससे उम्मीद करते हैं, वही या तो निकम्मा निकल जाता है... या फिर वामपंथियों की गोद में ही खेलने लगता है.

======================
(नोट :- लेख के लेखक श्री अम्बाशंकर वाजपेयी JNU में रिसर्च स्कॉलर हैं और उनके कई मित्र बनारस एवं इलाहाबाद में ABVP के पदाधिकारी भी रहे हैं, यह उनका निजी आकलन और अवलोकन है).

Read 2268 times Last modified on शनिवार, 30 सितम्बर 2017 22:02
न्यूज़ लैटर के लिए साइन अप करें