desiCNN - Items filtered by date: मई 2011
केरल विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं, और कांग्रेस मोर्चे की सरकार मामूली बहुमत से बन चुकी है। जीते हुए उम्मीदवारों एवं मतों के बँटवारे के आँकड़े भी मिलने शुरु हो चुके हैं… कुल मिलाकर एक भयावह स्थिति सामने आ रही है, जिस पर विचार करने के लिये ही कोई राजनैतिक पार्टी तैयार नहीं है तो इस समस्या पर कोई ठोस उपाय करने के बारे में सोचना तो बेकार ही है। आईये आँकड़े देखें…

कांग्रेस मोर्चे ने 68 हिन्दुओं, 36 मुस्लिमों और 36 ईसाईयों को विधानसभा का टिकिट दिया था, जिसमें से 26 हिन्दू 29 मुस्लिम और 17 ईसाई उम्मीदवार चुनाव जीते। राहुल बाबा भले ही दिल्ली में बैठकर कुछ भी मुँह फ़ाड़ें, हकीकत यही है कि तमिलनाडु में कांग्रेस पूरी तरह साफ़ हो गई है, जबकि केरल में जिस “कांग्रेस” सरकार के निर्माण के ढोल बजाये जा रहे हैं, असल में उम्मन चाण्डी की यह सरकार “मुस्लिम लीग” (ज़ाहिर है कि “सेकुलर”) और केरल कांग्रेस (ईसाई मणि गुट) (ये भी सेकुलर) नामक दो बैसाखियों पर टिकी है।

अब वर्तमान स्थिति क्या है यह भी देख लीजिये – केरल विधानसभा के कुल 140 विधायकों में से 73 हिन्दू हैं (शायद?), 37 मुस्लिम हैं और 30 ईसाई हैं, यह तो हुई कुल स्थिति… जबकि सत्ताधारी पार्टी (या मोर्चे) की स्थिति क्या है?

सामान्य तौर पर होता यह है कि किसी भी विधानसभा में विधायकों का प्रतिनिधित्व राज्य की जनसंख्या को प्रतिबिंबित करता है, सत्ताधारी मोर्चे यानी सरकार या मंत्रिमण्डल में राज्य की वास्तविक स्थिति दिखती है… लेकिन केरल के इतिहास में ऐसा पहली बार होने जा रहा है कि “सत्ताधारी मोर्चा” केरल की जनसंख्या का प्रतिनिधित्व नहीं करेगा… कैसे? 140 सीटों के सदन में कांग्रेस मोर्चे को 72 सीटें मिली हैं, इन 72 में से 47 विधायक या तो ईसाई हैं या मुस्लिम… यानी केरल मंत्रिमण्डल का 65% हिस्सा “अल्पसंख्यकों” का हुआ, जबकि केरल में 25% जनसंख्या मुस्लिमों की है और 20% ईसाईयों की। इसका मोटा अर्थ यह हुआ कि 45% जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने के लिये 65% विधायक हैं, जबकि 55% हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करने के लिये सिर्फ़ 35% विधायक (जिसमें से पता नहीं कितने मंत्री बन पाएंगे)… ऐसा कैसे जनता का प्रतिनिधित्व होगा?


आँकड़ों से साफ़ ज़ाहिर है कि विगत 10-15 वर्ष में मुस्लिमों और ईसाईयों का दबदबा केरल की राजनीति पर अत्यधिक बढ़ चुका है। इस बार भी सभी प्रमुख मंत्रालय या तो मुस्लिम लीग को मिलेंगे या केरल कांग्रेस (मणि) को… मुख्यमंत्री चांडी तो खैर ईसाई हैं ही। एक निजी अध्ययन के अनुसार पिछले एक दशक में मुस्लिम लीग और चर्च ने बड़ी मात्रा में जमीनें खरीदी हैं और बेचने वाले अधिकतर मध्यमवर्गीय हिन्दू परिवार थे, जो अपनी सम्पत्ति बेचकर कर्नाटक या तमिलनाडु “शिफ़्ट” हो गये…। एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि केरल के सर्वाधिक सघन मुस्लिम जिले मलप्पुरम की जन्मदर में पिछले और वर्तमान जनगणना के अनुसार 300% का भयानक उछाल आया है। केन्द्रीय मंत्री ई अहमद ने दबाव डालकर, मलप्पुरम में पासपोर्ट ऑफ़िस भी खुलवा दिया है। मदरसा बोर्ड के सर्टीफ़िकेट को CBSE के समकक्ष माने जाने की सिफ़ारिश भी की जा चुकी है, अलीगढ़ मुस्लिम विवि की एक शाखा भी मलाबार इलाके में आने ही वाली है, जबकि शरीयत आधारित इस्लामिक बैंकिंग को सुप्रीम कोर्ट द्वारा झटका दिये जाने के बावजूद उससे मिलती-जुलती “अण्डरग्राउण्ड बैंकिंग व्यवस्था” मुस्लिम बहुल इलाकों में पहले से चल ही रही हैं।

हालात ठीक वैसे ही करवट ले रहे हैं जैसे किसी समय कश्मीर में लिये थे। ज़ाहिर सी बात है कि जब सत्ताधारी गठजोड़, राज्य की जनसंख्या के प्रतिशत का वास्तविक प्रतिनिधित्व ही नहीं करता, तो अभी जो नीतियाँ दबे-छिपे तौर पर जेहादियों और एवेंजेलिस्टों के लिये बनती हैं, तब वही नीतियाँ खुल्लमखुल्ला बनेंगी…। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के विधायकों और कार्यकर्ताओं में इसे लेकर “बेचैनी” नहीं है, लेकिन वह भी सत्ता का लालच, वोट बैंक की मजबूरी और केंद्रीय नेतृत्व के चाबुक की वजह से वही कर रहे हैं जो वे नहीं चाहते…। नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA), अब्दुल नासेर मदनी और PFI के आतंकी नेटवर्क की सघन जाँच कर रही है, इसकी एक रिपोर्ट के अनुसार त्रिवेन्द्रम हवाई अड्डे के समीप बेमापल्ली नामक इलाका सघन मुस्लिम बस्ती के रूप में आकार ले चुका है। विभिन्न सुरक्षा एवं प्रशासनिक एजेंसियों की रिपोर्ट है कि एयरपोर्ट के नज़दीक होने की वजह से यहाँ विदेशी शराब, ड्रग्स एवं चोरी का सामान खुलेआम बेचा जाता है, परन्तु विभिन्न मुस्लिम विधायकों और मंत्रियों द्वारा जिला कलेक्टर पर उस इलाके में नहीं घुसने का दबाव बनाया जाता है। वाम मोर्चे के पूर्व गृहमंत्री कोडियरी बालाकृष्णन ने एक प्रेस कान्फ़्रेंस में स्वीकार किया था कि PFI और NDF के कार्यकर्ता राज्य में 22 से अधिक राजनैतिक हत्याओं में शामिल हैं। यह स्थिति उस समय और विकट होने वाली है जब केन्द्र सरकार द्वारा “खच्चर” (सॉरी सच्चर) कमेटी की सिफ़ारिशों के मुताबिक मुस्लिम बहुल इलाकों में मुसलमान पुलिसकर्मी ही नियुक्त किये जाएंगे।

2011 के चुनाव परिणामों के अनुसार, 55% हिन्दू जनसंख्या के होते हुए भी जिस प्रकार केरल का मुख्यमंत्री ईसाई है, सभी प्रमुख मंत्रालय या तो मुस्लिमों के कब्जे में हैं या ईसाईयों के… तो आप खुद ही सोच सकते हैं कि 2015 और 2019 के चुनाव आते-आते क्या स्थिति होगी। जिस प्रकार कश्मीर में सिर्फ़ मुसलमान व्यक्ति ही मुख्यमंत्री बन सकता है, उसी प्रकार अगले 10-15 साल में केरल में यह स्थिति बन जायेगी कि कोई ईसाई या कोई मुस्लिम ही केरल का मुख्यमंत्री बन सकता है। जब यह स्थिति बन जायेगी तब हमारे “आज के सेकुलर” बहुत खुश होंगे… ये बात और है कि केरल में सेकुलरिज़्म को सबसे पहली लात मुस्लिम लीग और PFI ही मारेगी…। क्योंकि यह एक स्थापित तथ्य है कि जिस शासन व्यवस्था अथवा क्षेत्र विशेष में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व 40 से 50% से अधिक हो जाता है, वहाँ “सेकुलरिज़्म” नाम की चिड़िया नहीं पाई जाती…

http://blog.sureshchiplunkar.com/2011/04/kerala-elections-assembly-elections-in.html

जबकि इधर, “सेकुलरिज़्म और गाँधीवाद का डोज़”, हिन्दुओं की नसों में कुछ ऐसा भर दिया गया है कि हिन्दू बहुल राज्य (महाराष्ट्र, बिहार) का मुख्यमंत्री तो ईसाई या मुस्लिम हो सकता है…… देश की 80% से अधिक हिन्दू जनसंख्या पर इटली से आई हुई एक ईसाई महिला भी राज कर सकती है, लेकिन कश्मीर का मुख्यमंत्री कोई हिन्दू नहीं… जल्दी ही यह स्थिति केरल में भी दोहराई जायेगी…।

फ़िलहाल इन “ताकतों” का पहला लक्ष्य केरल है। जातियों में बँटे हुए हिन्दुओं को रगड़ना, दबोचना आसान है, इसीलिये समय रहते “चर्च” पर दबदबा बनाने की गरज से ही ईसाई प्रोफ़ेसर के हाथ काटे (Professor hacked in Kerala by PFI) गये थे (और नतीजा भी PFI के मनमुताबिक ही मिला और “चर्च” पिछवाड़े में दुम दबाकर बैठ गया)। ज़ाहिर है कि केरल के “लक्ष्य” से निपटने के बाद, अगला नम्बर असम और पश्चिम बंगाल का होगा…जहाँ कई जिलों में मुस्लिम जनसंख्या 60% से ऊपर हो चुकी है… बाकी की कसर बांग्लादेशी भिखमंगे पूरी कर ही देंगे…

सेकुलरिज़्म की जय हो… वामपंथ की जय हो… “एक परिवार” के 60 साल के शासन की जय हो…। यदि केरल के इन आँकड़ों, कश्मीरी पंडितों के बुरे हश्र और सेकुलरों तथा वामपथियों द्वारा उनके प्रति किये गये “बदतर सलूक” से भी कुछ नहीं सीखा जा सकता, तब तो हिन्दुओं का भगवान ही मालिक है…
Published in ब्लॉग
चित्र में दिखाये गये पाँच रुपये के नोट को देखकर चौंकिये नहीं, इस प्रकार के (और इससे भी गये-गुज़रे) पाँच के नोट मध्यप्रदेश में धड़ल्ले से चलाए जा रहे हैं। मैं जानता हूं कि कई राज्यों के मित्र (और विदेशों में रहने वाले भी) इन नोटों की भौतिक दुरावस्था देखकर इन्हें हाथ लगाना भी पसन्द नहीं करेंगे, परन्तु यहाँ ऐसे नोट चल रहे हैं…। और यह नोट भी आसानी से नहीं मिल रहे, चिल्लर मिलना तो बहुत ही मुश्किल हो चला है, निश्चित रूप से इन घटिया नोटों के चलने और जानबूझकर चिल्लर का संकट पैदा करने के पीछे एक पूरा माफ़िया सिस्टम काम कर रहा है।


इस माफ़िया और इस समस्या का जन्म भी रातोंरात नहीं हुआ है, बल्कि भारत सरकार द्वारा छोटे नोट कम संख्या में छापने एवं बड़े नोटों को प्रोत्साहन देने तथा ATM मशीनों में सिर्फ़ 100 एवं 500 के नोटों की उपलब्धता की वजह से हुआ है। उल्लेखनीय है कि विभिन्न शोधों एवं अध्ययनों के मुताबिक अब यह बात सिद्ध हो चुकी है कि भारत की 70% से अधिक जनता 2 डॉलर (अर्थात 100 रुपये) रोज से कम पर अपना गुज़र-बसर करती है। इसमें से भी एक बड़ा हिस्सा 1 डॉलर रोज की कमाई पर ही आश्रित है। मेरा दावा है कि भारत की इसी 70% जनता में से 99% लोगों ने 1000 का नोट कभी नहीं देखा होगा, हाथ में लेना तो दूर की बात है। देश की जनता के इस बड़े हिस्से का रोज़मर्रा का काम, लेन-देन, बाजार-व्यवहार अमूमन 10, 20 और 50 के नोटों पर आधारित होता है। एकदम निम्न आय वर्ग के दिहाड़ी मजदूर एवं दूरदराज के ग्रामीण इलाके के गरीब आदिवासियों इत्यादि रोज़ शाम को किराने की दुकानों से अपना दैनिक राशन खरीदते हैं, उन्होंने तो शायद 500 का नोट भी एकाध बार ही हाथ में लिया होगा।


ऐसे में सवाल उठता है कि 122 करोड़ में से 100 करोड़ से भी अधिक लोग जिन नोटों का उपयोग ही नहीं करते हैं, 1000-500 के जो नोट वे लोग कभी भी चलन में लाने की क्षमता ही नहीं रखते, तब इन नोटों की क्या आवश्यकता है? यानी जिन नोटों को भारत की सिर्फ़ 10% जनता ही “मासिक उपयोग” में लाती हो, तथा सिर्फ़ 5% जनता ही “दैनिक उपयोग” में लाती हो, उन नोटों को बनाये रखने की क्या तुक है? विगत कुछ समय से बाबा रामदेव ने स्विस बैंकों से काले धन की वापसी की माँग के साथ ही पाँच सौ एवं एक हजार के नोट बन्द किये जाने का अभियान भी चलाया है। मैं बड़े नोट बन्द करने के पूर्ण समर्थन में हूँ। कारण को, मोटे आँकड़ों में इसे मैंने ऊपर ही समझा दिया है अब इस समस्या का व्यावहारिक पक्ष भी देख लीजिये…

हम वापस आते हैं, मध्यप्रदेश में चल रहे इन पुराने नोटों एवं खुल्ले पैसों की समस्या पर… जिन व्यक्तियों का रोज़मर्रा का काम क्रेडिट/डेबिट कार्ड अथवा इंटरनेट बैंकिंग/चेक इत्यादि से होता है, वे इस समस्या की गम्भीरता को नहीं समझ सकते। छोटे व्यवसायी, किराने-परचून वाले, पंचर पकाने वाले, सब्जी ठेले वाले, मजदूर इत्यादि जैसे लाखों लोग हैं जो दैनिक कार्यों में एक-दो-पाँच-दस-बीस और पचास रुपये में अधिकतम लेन-देन करते हैं, कभीकभार कोई ग्राहक होता है जो 100 या 500 रुपये का सामान एकमुश्त खरीदता है (ध्यान रहे, यहाँ मैं छोटे कस्बों, शहरों की बात कर रहा हूँ, महानगरों की नहीं)। सबसे पहले मैं स्वयं से ही शुरु करता हूँ, सभी जानते हैं कि मेरा झेरोक्स का छोटा सा व्यवसाय है। विगत दो वर्ष से जबसे महंगाई अत्यधिक बढ़ गई है तभी से झेरोक्स का रेट हमने 1 रुपया कर दिया है। अब यदि कोई ग्राहक 3 रुपये, 6 रुपये, 12 रुपये आदि की फ़ोटोकॉपी करवाता है तो वह अक्सर 10, 50 या 100 का नोट देता है, तब स्वाभाविक ही हमें उसे 4, 6, 38 या 88 रुपये लौटाने ही हैं, अब चूंकि बाज़ार में 5 और 2 रुपये के नोटों एवं सिक्कों की भारी “कृत्रिम कमी” बना दी गई है, सो मजबूरन या तो हम ग्राहक के ऊपर के दो रुपये छोड़ दें या फ़िर कहीं से पाँच और दो रुपये की जुगाड़ करें। (स्वयं मैने पिछले 2-3 माह से 1000 रुपये का नोट नहीं देखा)

यहाँ आकर माफ़िया अपना खेल कर रहा है, हम जैसे छोटे व्यापारियों को 1,2 और 5 के सिक्के 8% से 10% के कमीशन पर खरीदना पड़ते हैं (अर्थात 100 रुपये के सिक्के लेना हो, तो हमें 110 रुपये चुकाने होंगे)। इस माफ़िया का तोड़ निकालने के लिये कई व्यापारियों ने ग्राहक के सामने चॉकलेट, टॉफ़ी, लिफ़ाफ़े, इत्यादि रखना शुरु किया, परन्तु ग्राहक को इन वस्तुओं से कोई मतलब नहीं होता, वह पूरे पैसे वापस चाहता है…। आप स्वयं कल्पना करें कि दिन भर की मजदूरी से किसी गरीब व्यक्ति को 150 रुपये मिलें, शाम को वह एक दुकान से आटा-चावल-दाल, दूसरी दुकान से सब्जी, तीसरी दुकान से कुछ और खरीदने आये, और हर दुकानदार उसे “ऊपर के” दो-तीन रुपयों की चाकलेट-टॉफ़ी दे, तो उस गरीब का खामख्वाह ही 5-7 रुपये का नुकसान हो गया ना…। एक-दो रुपये छोड़े भी नहीं जा सकते, क्योंकि यदि दुकानदार ने दिन भर में दस ग्राहकों के 2-2 रुपये भी खुल्ले पैसे न होने की वजह से छोड़ दिये तो उसका 20 रुपये रोज का नुकसान तो वैसे ही हो गया। किराने अथवा जनरल स्टोर पर तो ग्राहक को 2-4 रुपयों की कई वस्तुएं दी जा सकती हैं, जैसे माचिस इत्यादि। परन्तु ऐसे कई व्यवसाय हैं जिन्हें अपने ग्राहकों को नकद पैसा ही वापस करना होता है… सायकल का पंचर बनाने वाला यह नहीं कह सकता कि चलो एक पंचर और कर देता हूँ “राउण्ड फ़िगर” हो जायेगा।

चूंकि उज्जैन मन्दिरों की नगरी है तो यहाँ विभिन्न मंदिरों में चढ़ाने के लिये भी भक्तों को खुल्ले पैसे चाहिये होते हैं। माफ़िया यहाँ भी अपना खेल करता है, मन्दिरों के बाहर बैठे भिखारियों से खुल्ले पैसे एकत्रित किये जाते हैं, उसी चिल्लर को भक्तों को ऊँची दरों पर दिया जाता है… फ़िर दान पेटी से निकलने वाले हजारों रुपये के चिल्लर को 4-6 “बड़े-बड़े” व्यापारी मिलकर खरीद लेते हैं (ज़ाहिर है कि कोई छोटा व्यापारी 10,000 रुपये की चिल्लर मन्दिर से खरीदने की औकात नहीं रखता)… दोबारा घूम-फ़िरकर यही चिल्लर हम जैसे लोग 8-10% पर खरीदने को मजबूर हैं। चूंकि सरकार ने छोटे नोट छापना बन्द कर दिया है और रिजर्व बैंक द्वारा सिक्के पर्याप्त मात्रा में भेजे नहीं जाते, इसलिये मजबूरी में छोटे व्यापारियों को गंदे, मुड़े-तुड़े, टेप चिपके हुए, कटे-फ़टे नोटों से काम चलाना पड़ रहा है…। दिक्कत तब होती है, जब अन्य राज्यों से आने वाले मित्र-रिश्तेदार इन नोटों को देखकर नाक-भौंह सिकोड़ते हैं, तब मध्यप्रदेश शासन के साथ-साथ हमारी भी इज्जत उतर जाती है। अन्य राज्यों में यह समस्या शायद कम है, और यह बात मैं इसलिये कह सकता हूँ कि फ़रवरी-मार्च-अप्रैल में मेरा दिल्ली, हैदराबाद एवं मुम्बई जाना हुआ, वहाँ मुझे चिल्लर (खुल्ले पैसे) की कोई समस्या कहीं दिखाई नहीं दी। मुम्बई में तो हैरानी इस बात पर भी हुई कि ऑटो वाले मीटर से चल रहे हैं तथा उनके मीटर के अनुसार 16 रुपये, 43 रुपये इत्यादि किराया उन्होंने ईमानदारी से लिया और बचे हुए चार-छः-आठ रुपये बाकायदा सिक्कों में लौटाए। ज़ाहिर है कि यह समस्या मध्यप्रदेश में ही अधिक है, ऐसा क्यों है इसका पता लगाना प्रशासन का काम है। फ़िलहाल हम जैसे छोटे व्यापारी इधर-उधर से जुगाड़ करके अपना काम चला रहे हैं (धंधा तो करना ही है, ग्राहक को एकदम मना भी तो नहीं कर सकते)। ऐसा भी नहीं है कि रिज़र्व बैंक स्थानीय बैंकों को चिल्लर नहीं भेजता, परन्तु वह संख्या में इतनी कम होती है कि “रहस्यमयी” तरीके से बैंक कर्मचारियों के मित्रों/रिश्तेदारों और बड़े व्यापारियों के यहाँ पहुँच जाती है, आम जनता के हाथ तो आती ही नहीं…

अमेरिका की प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत आय लगभग 40,000 (चालीस हजार) डॉलर है और वहाँ का सबसे बड़ा सामान्य नोट 100 डॉलर का है अर्थात 400 और 1 का अनुपात (400 : 1), दूसरी तरफ़ भारत में प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत आय लगभग 30,000 रुपये है और सबसे बड़ा नोट 1000 रुपये का है यानी कि 30 और 1 का अनुपात (30 : 1)… और भारत में काले धन तथा भ्रष्टाचार के मूल में स्थित कई कारणों में से यह एक बड़ा कारण है। बड़े नोटों की सुगमता के कारण भारत में अधिकतर लेन-देन नगद में होता है और यही व्यवहार काले धन का कारण बनता है। इस विषय पर अप्रैल 2009 में एक पोस्ट लिखी थी, उसे विस्तार से यहाँ क्लिक करके पढ़िये… http://blog.sureshchiplunkar.com/2009/04/black-money-big-currency-corruption-in.html

बाबा रामदेव ने बड़े नोटों को बन्द करने के समर्थन में कई तर्क, तथ्य एवं आँकड़े पेश किये हैं। इस समस्या के हल हेतु सुझाव निम्नानुसार हैं –

1) 100 रुपये से ऊपर के सभी नोट तत्काल प्रभाव से बन्द किये जाएं। (इससे काले धन के साथ-साथ नकली नोटों की समस्या से भी निजात मिलने की संभावना है)

2) ATM मशीनों से 100 और 50 के नोट निकालने की व्यवस्था हो।

3) सरकार छोटे नोट एवं सिक्के अधिकाधिक मात्रा में मुद्रित करे।

4) जिन व्यक्तियों को बड़ी मात्रा में ट्रांजेक्शन करना हो, उन्हें PAN कार्ड क्रमांक के साथ क्रेडिट/डेबिट कार्ड, नेट बैंकिंग अथवा चेक से भुगतान अनिवार्य किया जाए (काले धन पर रोक हेतु एक और कदम)

5) सिक्कों को गलाकर अन्यत्र उपयोग में लाने वालों तथा फ़टे-पुराने नोटों को कमीशन पर चलाने वालों के साथ सख्त कार्रवाई की जाए…

जब तक यह नहीं हो जाता… तब तक बाहर के राज्यों में रहने वाले मित्र और रिश्तेदार यदि उज्जैन आने वाले हों, तो हम पहले ही उन्हें फ़ोन करके कह देते हैं कि “भाई, इधर आते वक्त 500-700 रुपये की चिल्लर लेते आना…”। मैं यह भी जानना चाहूंगा कि क्या फ़टे-पुराने नोटों व चिल्लर सिक्कों की समस्या अन्य राज्यों में भी है, या यह सिर्फ़ मध्यप्रदेश में ही है? यदि यह समस्या कमोबेश पूरे देश में ही है तो सरकार पर दबाव बनाना होगा कि वह बड़े नोटों की संख्या कम करे (या बन्द करे) तथा छोटे नोटों व सिक्कों की संख्या बढ़ाए… पाठकगण कृपया अपने-अपने क्षेत्रों व अनुभव के बारे में टिप्पणी करें…
Published in ब्लॉग
पश्चिम बंगाल :- ममता बनर्जी की आँधी में वामपक्ष उड़ गया, धुल गया, साफ़ हो गया… यह देश के साथ-साथ हिन्दुत्व के लिये क्षीण सी खुशखबरी कही जा सकती है। "क्षीण सी" इसलिये कहा, क्योंकि ममता बैनर्जी भी पूरी तरह से माओवादियों एवं इस्लामिक ताकतों (बांग्लादेशी शरणार्थियों) के समर्थन से ही मुख्यमंत्री बनी हैं… अतः पश्चिम बंगाल में हिन्दुओं की दुर्दशा वैसी ही जारी रहेगी, जैसी अब तक होती आई है। (नतीजा : वामपंथ 5 साल के लिये बाहर = +1)
असम :- इस राज्य में कांग्रेस से अधिक निराश किया है भाजपा ने… दस साल के गोगोई शासन, मूल असमियों पर बांग्लादेशी गुण्डों द्वारा अत्याचार, कांग्रेसियों द्वारा खुलेआम बदरुद्दीन अजमल का समर्थन करने और अपना मुस्लिम वोट बैंक पक्का बनाये रखने का फ़ायदा कांग्रेस को मिला…। भाजपा यहाँ भी फ़िसड्डी साबित हुई। असम में धीरे-धीरे अल्पसंख्यक बनने की ओर अग्रसर हिन्दुओं के लिये अब उम्मीद कम ही बची है। (नतीजा : राजमाता के दरबार में दिग्गी राजा के कद में बढ़ोतरी और असम में हिन्दुओं की लतखोरी में बढ़ोतरी = (-) 1)

तमिलनाडु :- भाजपा तो कभी यहाँ थी ही नहीं, अब भी कोई प्रगति नहीं की। जयललिता की जीत से करुणानिधि कुनबा बाहर हुआ है, लेकिन अब जयललिता और शशिकला मिलकर तमिलनाडु को लूटेंगे…। चर्च की सत्ता वैसे ही बरकरार रहेगी, क्योंकि "सेकुलरिज़्म" के मामले में जयललिता का रिकॉर्ड भी उतना ही बदतर है, जितना करुणानिधि का। (नतीजा : कांग्रेस यहाँ एकदम गर्त में चली गई है… (+1)]

केरल :- नतीजे लगभग टाई ही रहे और जो भी सरकार बनेगी अस्थिर होने की सम्भावना है। कांग्रेस की सरकार बनी तो मुस्लिम लीग और PFI का आतंक मजबूत होगा। भाजपा को 2-3 सीटों की उम्मीद थी, लेकिन वह धूल में मिल गई…।

सकारात्मक पक्ष देखें तो - (अ) बंगाल से वामपंथी साफ़ हुए, जबकि केरल में भी झटका खाये हैं… (ब) तमिलनाडु से कांग्रेस पूरी तरह खत्म हो गई है…

समूचे परिदृश्य को समग्र रूप में देखें तो - (अ) दक्षिण और बंगाल में "हिन्दुत्व" की विचारधारा में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है, (ब) भाजपा का प्रदर्शन बेहद निराश करने वाला रहा है…, (स) इन राज्यों में हि्न्दुओं की दुर्दशा में और वृद्धि होगी…। कुल मिलाकर निराशाजनक चित्र उभरा है। भाजपा निराश करती है, और कोई विकल्प है नहीं, जात-पाँत में बँटे हुए लतखोर हिन्दुओं ने शायद "नियति" को स्वीकार कर लिया है…।

एक नमूना पेश है, गौर कीजियेगा –

1) केरल की 140 सीटों में से 36 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार जीते हैं। (मुस्लिम लीग-20, सीपीएम-8, कांग्रेस-7 और RSP-1)

2) केरल में 20% ईसाई हैं, 25% मुस्लिम हैं और 30% कमीनिस्ट (यानी अ-हिन्दू सेकुलर)… यह 75% लोग मिलकर भाजपा को इतनी आसानी से जगह बनाने नहीं देंगे।

3) केरल कांग्रेस (जैकब गुट) नाम की “ईसाई सेकुलर” पार्टी ने 10 सीटें जीतीं, “सुपर-सेकुलर मुस्लिम लीग” ने 20 सीटें जीतीं, “हिन्दू सेकुलरों” ने वामपंथियों और कांग्रेस को विभाजित होकर वोट दिये… नतीजा - दोनों ही प्रमुख दलों को बहुमत नहीं मिला। अब अगले पाँच साल तक केरल कांग्रेस (ईसाई) और मुस्लिम लीग दोनों मिलकर अपना “एजेण्डा” चलाएंगे और कांग्रेस को जमकर चूसेंगे (कांग्रेस को इसमें कोई आपत्ति भी नहीं है)। मंत्रिमण्डल बनने में अभी समय है, लेकिन मुस्लिम लीग और जैकब कांग्रेस ने शिक्षा, राजस्व, उद्योग और गृह मंत्रालय पर अपना दावा ठोंक दिया है… (आगे-आगे देखिये होता है क्या…)

4) मुस्लिम बहुल इलाकों से मुस्लिम जीता, ईसाई बहुल इलाकों से ईसाई उम्मीदवार जीता… हिन्दू बहुल इलाके से, या तो वामपंथी जीता या बाकी दोनों में से एक… (मूर्ख हिन्दुओं के लिये तथा धोबी का कुत्ता उर्फ़ “सेकुलर भाजपा” के लिये भी एक सबक)

सकारात्मक पक्ष :- पिछले 5 साल में संघ कार्यकर्ताओं की ज़मीनी मेहनत का नतीजा यह रहा है कि केरल में पहली बार भाजपा का वोट प्रतिशत 6% तक पहुँचा, 19 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपाईयों को 10,000 से 15,000 वोट मिले, और तीन विधानसभा सीटों पर भाजपा दूसरे नम्बर पर रही। लेकिन यहाँ भी एक पेंच है – ईसाई और मुस्लिम वोटरों ने योजनाबद्ध तरीके से वोटिंग करके यह सुनिश्चित किया कि भाजपा का उम्मीदवार न जीते… कांग्रेस या वामपंथी में से जो मजबूत दिखा उसे जिताया… (मूर्ख हिन्दुओं के लिये एक और सबक) (यदि सीखना चाहें तो…)

असम में भाजपा की सीटें 10 से घटकर 4 हो गईं, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कोई उपस्थिति दर्ज नहीं हुई…। हालांकि मेरी कोई औकात नहीं है फ़िर भी, भाजपा की इस वर्तमान दुर्दशा के बाद चन्द सुझाव इस प्रकार हैं -

1) भाजपा को सबसे पहला सबक ममता बनर्जी से सीखना चाहिये, विगत 20 साल में उस अकेली औरत ने वामपंथियों के खिलाफ़ लगातार सड़कों पर संघर्ष किया है, पुलिस से लड़ी, प्रशासन के नाकों चने चबवाए, हड़तालें की, बन्द आयोजित किये, हिंसाप्रेमी वामपंथियों को जरुरत पड़ने पर “उन्हीं की भाषा” में जवाब भी दिया। भाजपा “संकोच” छोड़े और कांग्रेसियों से “अन्दरूनी मधुर सम्बन्ध” खत्म करके संघर्ष का रास्ता अपनाये। हिन्दुओं, हिन्दू धर्म, मन्दिरों के अधिग्रहण, गौ-रक्षा, नकली सेकुलरिज़्म जैसे मुद्दों पर जब तक सीधी और आरपार की लड़ाई नहीं लड़ेंगे, तब तक भाजपा के ग्राफ़ में गिरावट आती ही जायेगी… वरना जल्दी ही एक समय आयेगा कि कोई “तीसरी पार्टी” इस “क्षुब्ध वोट बैंक” पर कब्जा कर लेगी। मायावती, ममता बनर्जी, जयललिता चाहे जैसी भी हों, लेकिन भाजपा नेताओं को इन तीनों का कम से कम एक गुण तो अवश्य अपनाना ही चाहिये… वह है “लगातार संघर्ष और हार न मानने की प्रवृत्ति”।

2) ज़मीनी और संघर्षवान नेताओं को पार्टी में प्रमुख पद देना होगा, चाहे इसके लिये उनका कितना भी तुष्टिकरण करना पड़े… कल्याण सिंह, उमा भारती, वरुण गांधी जैसे मैदानी नेताओं के बिना उत्तरप्रदेश के चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने की बात भूल ही जाएं…

3) तमिलनाडु और केरल में मिशनरी धर्मान्तरण और बंगाल व असम में जेहादी मनोवृत्ति और बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर गुवाहाटी-कोलकाता से लेकर दिल्ली तक “तीव्र जमीनी संघर्ष” होना चाहिये…

4) जो उम्मीदवार अभी चुनाव हार गये हैं, वे अगले पाँच साल लगातार अपने विधानसभा क्षेत्र में बने रहें, सड़कों पर, खबरों में दिखाई दें, जनता से जीवंत सम्पर्क रखें। जो उम्मीदवार बहुत ही कम अन्तर से हारे हैं, वे एक बार फ़िर से अपने पूरे विधानसभा क्षेत्र का “पैदल” दौरा करें और “हिन्दुओं” को समझाएं कि अब अगले पाँच साल में उनके साथ क्या होने वाला है।

5) सबसे महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि भाजपा को “सेकुलर” दिखने की “भौण्डी कोशिश” छोड़ देना चाहिये। मीडिया के दुष्प्रचार की रत्ती भर भी परवाह किये बिना पूरी तरह से “हिन्दू हित” के लिये समर्पण दर्शाना चाहिये, क्योंकि भड़ैती मीडिया के सामने चाहे भाजपा “शीर्षासन” भी कर ले, तब भी वे उसे “हिन्दू पार्टी” कहकर बदनाम करते ही रहेंगे। यह तो भाजपा को तय करना है कि “बद अच्छा, बदनाम बुरा” वाली कहावत सही है या नहीं। इसी प्रकार यही “शीर्षासन” मुस्लिमों एवं ईसाईयों के सामने नग्न होकर भी किया जाए, तब भी वे भाजपा को “थोक में” वोट देने वाले नहीं हैं, तब क्यों अपनी ऊर्जा उधर बरबाद करना? इसकी बजाय, इस ऊर्जा का उपयोग “सेकुलर हिन्दुओं” को समझाइश देने में किया जाये।

दिक्कत यह है कि सत्ता में आने के बाद जो “कीटाणु” अमूमन घुस जाते हैं वह भाजपा में कुछ ज्यादा ही बड़े पैमाने पर घुस गये हैं। राम जन्मभूमि आंदोलन के वक्त की भाजपा का जमीनी और सड़क का संघर्ष, उसके कार्यकर्ताओं की तड़प और आज देश की भीषण परिस्थितियों में भाजपाईयों का “अखबारी और ड्राइंगरूमी संघर्ष” देखकर लगता ही नहीं, कि क्या यह वही पार्टी है? क्या यह वही पार्टी और उसी पार्टी के नेता हैं जिन्हें 1989 में जब मीडिया “हिन्दूवादी नेता” कहता था, तो नेताओं और कार्यकर्ताओं सभी का सीना चौड़ा होता था, जबकि आज 20 साल बाद वही मीडिया भाजपा के किसी नेता को “हिन्दूवादी” कहता है, तो वह नेता इधर-उधर मुँह छिपाने लगता है, उल्टे-सीधे तर्क देकर खुद को “सेकुलर” साबित करने की कोशिश करने लगता है…। यह “संकोचग्रस्त गिरावट” ही भाजपा के “धोबी का कुत्ता” बनने का असली कारण है। समझना और अमल में लाना चाहते हों तो अभी भी समय है, वरना 2012 में महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश में, जहाँ अभी पार्टी “गर्त” में है, वहीं टिकी रहेगी… जरा भी ऊपर नहीं उठेगी।

रही हिन्दुओं की बात… तो पिछले 60 साल में वामपंथियों और सेकुलरों ने इन्हें ऐसा “इतिहास और पुस्तकें” पढ़ाई हैं कि “भारतीय संस्कृति पर गौरव” करना क्या होता है यह एकदम भूल चुके हैं। सेकुलरिज़्म(?) के गुणगान और “एक परिवार की गुलामी” में मूर्ख हिन्दू ऐसे “मस्त और पस्त” हुए पड़े हैं कि इन्हें यह भी नहीं पता कि उनके चारों ओर कैसे “खतरनाक जाल” बुना जा रहा है…
Published in ब्लॉग
पहला मामला :- 23 अप्रैल 2011 को केरल के सर्वाधिक देखे जाने वाले मलयालम चैनल पर लगातार दिन भर एक “ब्रेकिंग न्यूज़” चल रही थी… वह “ब्रेकिंग” और महत्वपूर्ण न्यूज़ क्या थी? एक आईपीएस अफ़सर शिबी मैथ्यूज़ ने समय पूर्व सेवानिवृत्ति लेकर केरल राज्य के मानवाधिकार आयोग (Kerala Human Rights Commission) का अध्यक्ष पदभार संभाला। क्या वाकई यह ब्रेकिंग न्यूज़ है? बिलकुल नहीं, परन्तु अगले दिन के अखबारों में जो चित्र प्रकाशित हुए उससे इस कथित महत्वपूर्ण खबर के पीछे का राज़ सामने आ गया। राज्य के एक “सरकारी समारोह” में श्री शिबी मैथ्यूज़ द्वारा मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद के शपथ ग्रहण समारोह में प्रमुख चर्चों के कम से कम 25 बिशप और आर्चबिशप परम्परागत परिधान में मौजूद थे। ऐसा लग रहा था मानो कार्यक्रम किसी चर्च में हो रहा हो एवं मानवाधिकार आयोग जैसा महत्वपूर्ण पद न होते हुए किसी ईसाई पादरी के नामांकन एवं पदग्रहण का समारोह हो। क्या यह उचित है? ऐसा प्रश्न पूछना भी बेवकूफ़ी है, क्योंकि “सेकुलरिज़्म” के लिये हर बात जायज़ होती है।



सवाल है कि सरकार द्वारा अपनी मनमर्जी से, बिना किसी अखबार में विज्ञापन दिये, “चमचागिरी” की एकमात्र क्वालिफ़िकेशन लिये हुए किसी ईसाई अधिकारी की मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति को “ब्रेकिंग न्यूज़” कहा जा सकता है? परन्तु विगत 8-10 वर्षों में इलेक्ट्रानिक एवं प्रिण्ट मीडिया में जितनी गिरावट आई है उसे देखते हुए इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वामपंथियों द्वारा केरल में ईसाई और मुस्लिम वोटों के लिये “कसी हुई तार पर कसरत” की जा रही है, सन्तुलन साधा जा रहा है। यह “तथाकथित ब्रेकिंग न्यूज़” भी एक तरह से “चर्च का शक्ति प्रदर्शन” ही था। राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद पर पहुँचने के लिये किसी “योग्यता” की दरकार नहीं होती, यह इससे भी सिद्ध होता है कि जिस पुलिस विभाग में मानवाधिकार का सबसे ज्यादा उल्लंघन होता है उसी विभाग के मुखिया को उससे वरिष्ठ अन्य अधिकारियों को नज़र-अंदाज़ करते हुए इस महत्वपूर्ण पद पर बैठाना ही अपने-आप में “कदाचरण” है। केरल सरकार के इस कदम से दो मकसद सधते हैं, पहला तो यह कि वह अफ़सर सदा “पार्टी कैडर” का ॠणी हो जाता है तथा उससे चाहे जैसा काम लिया जा सकता है, और दूसरा यह कि प्रोफ़ेसर के हाथ काटे जाने के बाद (Hand Chopping of Professor by Muslims) जो चर्च, विभिन्न कट्टर मुस्लिम संगठनों के सामने “दुम पिछवाड़े में दबाए” बैठा था, उसके ज़ख्मों पर मरहम भी लगता है।

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भी स्वीकार कर चुके हैं कि अधिकतर देशों में आतंकवाद एवं अस्थिरता के पीछे प्रमुख कारण “धर्मान्तरण” (Conversion in Tribal Areas of India) ही है। कंधमाल, डांग एवं कर्नाटक-तमिलनाडु के भीतरी इलाकों में मिशनरी द्वारा किये जा रहे आक्रामक धर्मान्तरण की वजह से फ़ैली अशांति इस बात का सबूत भी हैं, ऐसी स्थिति में एक पुलिस अफ़सर को रिटायरमेण्ट लेते ही मानवाधिकार आयोग जैसे पद पर नियुक्त करना, सरकारी कार्यक्रम में आर्चबिशपों की भीड़ एकत्रित करना वामपंथियों की बदनीयती सिद्ध करता है। मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद का शपथ ग्रहण हमेशा से एक सादे समारोह में किया जाता है, जहाँ चुनिंदा लोग ही मौजूद होते हैं, यह एक बहुत ही साधारण सी प्रक्रिया है, कोई प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का शपथ ग्रहण नहीं। इसलिये इस बार शपथ ग्रहण समारोह को इतना भव्य बनाने और हजारों रुपये फ़ूंकने की कोई तुक नहीं बनती थी, परन्तु यदि ऐसा नहीं किया जाता तो “चर्च” अपना “दबदबा” कैसे प्रदर्शित करता? वहीं दूसरी तरफ़ सरेआम बेनकाब होने के बावजूद, वामपंथ भी “धर्म एक अफ़ीम है” जैसा फ़ालतू एवं खोखला नारा पता नहीं कब तक छाती से चिपकाए रखेगा?

इस सम्बन्ध में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी माँगी गई है कि राज्यपाल के दफ़्तर से इस सरकारी कार्यक्रम में आमंत्रित किये जाने वाले अतिथियों की सूची सार्वजनिक की जाए, एवं आर्चबिशपों के अलावा किन-किन धर्मावलंबियों के प्रमुख धर्मगुरुओं को इस “वामपंथी सेकुलर पाखण्ड” में शामिल होने के लिए बुलाया गया था।
========

दूसरा मामला :- यह मामला भी “तथाकथित सेकुलरिज़्म” से ही जुड़ा है, वामपंथियों एवं सेकुलरों के “प्रिय टारगेट”, नरेन्द्र मोदी से सम्बन्धित। गुजरात दंगों के नौ साल बाद अचानक एक आईपीएस अफ़सर संजीव भट्ट को “आत्मज्ञान” की प्राप्ति होती है एवं वह सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा (Sanjeev Bhatt Affidavit) दायर करके यह उचरते हैं कि दंगों के वक्त हुई बैठक में नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि “मुसलमानों को सबक सिखाना बहुत जरूरी है…”। यानी रिटायरमेण्ट करीब आते ही उन्हें अचानक नौ साल पुरानी एक बैठक के “मिनट्स” याद आ गये और तड़ से सुप्रीम कोर्ट पहुँच गये। मीडिया भी इसी के इन्तज़ार में बैठा था, संजीव भट्ट से सम्बन्धित इस खबर को उसने 3 दिनों तक “चबाया”, मानो हलफ़नामा दायर करना यानी दोषी साबित हो जाना… यदि कोई फ़र्जी व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दायर करके कहे कि हसन अली ने उसके सामने सोनिया गाँधी को 10 अरब रुपये देने का वादा किया था, तो क्या उसे मान लिया जाएगा? लेकिन हमारा बिका हुआ “सेकुलर भाण्ड मीडिया” एकदम निकम्मे किस्म का है, यहाँ “बुरका दत्त” जैसे सैकड़ों दल्ले भरे पड़े हैं जो चन्द पैसों के लिये किसी के भी खिलाफ़, या पक्ष में खबर चला सकते हैं। ज़ाहिर सी बात है कि एक हलफ़नामा दायर करने के एवज़ में केन्द्र की कांग्रेस सरकार संजीव भट्ट पर अब आजीवन मेहरबान रहेगी…। संजीव भट्ट के इस झूठे एफ़िडेविट की कीमत, उनके किसी लगुए-भगुए के NGO को “आर्थिक मदद”, किसी बड़े केन्द्रीय प्रोजेक्ट में C EO की कुर्सी… या किसी राज्य के मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष पद से लेकर राज्यपाल की कुर्सी तक भी हो सकती है… यानी जैसा सौदा पट जाए

अब समय आ गया है कि भ्रष्टाचार विरोधी अपनी मुहिम में बाबा रामदेव इस बिन्दु को भी अपने आंदोलन में जोड़ें, कि संविधान में प्रावधान बनाया जाए कि कोई भी वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, सेवानिवृत्ति के बाद कम से कम दस वर्ष तक किसी भी निजी क्षेत्र की कम्पनी में कोई कार्यकारी अथवा सलाहकार का पद स्वीकार नहीं कर सके, साथ ही किसी भी सरकारी पद, NGO अथवा सार्वजनिक उपक्रम से लेकर किसी भी पद पर नहीं लाया जाए। 30 साल की नौकरी में जनता को चूना लगाने के बावजूद “भूखे” बैठे, IAS-IPS अधिकारियों को रिटायरमेंट के बाद सीधे घर बैठाया जाए, क्योंकि सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले मोटे-मोटे पदों (सतर्कता आयोग, चुनाव आयोग, सूचना अधिकार आयोग, प्रशासनिक आयोग, बैंकों के डायरेक्टर, संघ लोकसेवा आयोग इत्यादि) के लालच में ही ये अधिकारी नीतियों को तोड़ने-मरोड़ने, नेताओं की चमचागिरी और मक्खनबाजी करने, भ्रष्टाचार-कदाचार को बढ़ाने में लगे रहते हैं… इस "भ्रष्ट दुष्प्रवृत्ति" का सबसे अधिक फ़ायदा कांग्रेस ने उठाया है और अपने मनपसन्द “सेकुलर”(?) अधिकारी यहाँ-वहाँ भरकर रखे हैं।
========


संजीव भट्ट वाले मामले में एक पेंच और भी है… भारत के “हिन्दू विरोधी मीडिया” के किसी भी “तेज” और “सेकुलर” चैनल के मूर्ख संवाददाताओं ने यह नहीं बताया कि संजीव भट्ट के “पुराने कारनामे” क्या-क्या हैं, तथा संजीव भट्ट ने अपना हलफ़नामा उसी नोटरी से क्यों बनवाया, जिस नोटरी से तीस्ता सीतलवाड ढेरों फ़र्जी हलफ़नामे बनवाती रही है? (False Affidavits by Teesta Setalwad)  जी हाँ… “विशेष योग-संयोग” देखिये कि सादिक हुसैन शेख नामक जिस नोटरी से तीस्ता ने गुजरात दंगों के फ़र्जी हलफ़नामे बनवाए, उसी नोटरी से संजीव भट्ट साहब ने भी अपना हलफ़नामा बनवाया, है ना कमाल की बात? एक कमाल और भी है, कि नोटरियों की नियुक्ति सरकार की तरफ़ से होती है जिसमें वे एक निश्चित शुल्क लेकर किसी भी दस्तावेज का “नोटिफ़िकेशन” करते हैं, लेकिन सादिक हुसैन शेख साहब को सन 2006 से लगातार तीस्ता सीतलवाड के NGO की तरफ़ से 7500/- रुपये की “मासिक तनख्वाह” भी दी जाती थी…। सादिक शेख को हर महीने “सिटीजन फ़ॉर पीस एण्ड जस्टिस” (CJP) की तरफ़ से IDBI Bank खार (मुंबई) शाखा के अकाउण्ट नम्बर 01410000105705 से पैसा मिलता था, जो कि शायद फ़र्जी नोटरी करने का शुल्क होगा, क्योंकि तीस्ता ने तो गवाहों से कोरे कागजों पर दस्तखत करवा लिये थे। ऐसे “चतुर-सुजान, अनुभवी, लेकिन दागी” नोटरी से एफ़िडेविट बनवाने की सलाह संजीव भट्ट को ज़ाहिर है तीस्ता ने ही दी होगी और “वरदहस्त आशीर्वाद” का संकेत दिल्ली से मिला होगा…

लेकिन जैसा कि पहले ही कहा गया है, यदि वामपंथी सरकारें चर्च को खुश करें, पापुलर फ़्रण्ट को तेल लगाएं, ईसाई प्रोफ़ेसर के हाथ काटने वालों पर मेहरबान रहें… तो वह भी “सेकुलरिज़्म” है। इसी प्रकार सुप्रीम कोर्ट में झूठे हलफ़नामे पेश करके सतत न्यायिक लताड़ खाने वाले भी “सेकुलरिज़्म” का ही उदाहरण पेश कर रहे हैं…। परन्तु जब रिटायर होते ही “मलाईदार” पद सामने हाजिर हो, तो “सेकुलरिज़्म” को और मजबूत करने के लिये “कुछ भी” किया जा सकता है…। “साम्प्रदायिक” तो सिर्फ़ वही व्यक्ति या संस्था होती है, जो हिन्दू या हिन्दुत्व की बात करे… समझ गए ना!!!
Published in ब्लॉग
कुछ दिनों पहले मुम्बई की गलियों में पानी-पुरी का ठेला लगाने वाले द्वारा लोटे में पेशाब करने एवं उसी लोटे से ग्राहकों को पानी पिलाने सम्बन्धी पोस्ट लिखी थी, जिसमें मुम्बई की एक जागरूक एवं बहादुर लड़की अंकिता राणे द्वारा की गई “नागरिक पत्रकार” की भूमिका का उल्लेख किया गया था, अंकिता ने उस पानीपुरी वाले को लोटे में पेशाब करते हुए वीडियो में पकड़ा था… (Ankita Rane Mumbai Pani-puri Case)। अंकिता राणे की इस कार्रवाई ने जहाँ एक ओर मुम्बई महानगरपालिका के सफ़ाई एवं स्वास्थ्य अधिकारियों को जनता के कटघरे में खड़ा कर दिया था, वहीं दूसरी तरफ़ राज ठाकरे जैसे नेताओं को उनके “पसन्दीदा”(?) मुद्दे अर्थात “उत्तर भारतीयों को खदेड़ो” पर फ़िर से तलवार भांजने का मौका भी दे दिया था।

अब जबकि राज ठाकरे ने ठेले-गुमटियाँ लगाने वाले उत्तर भारतीयों को “साफ़-सफ़ाई” के नाम पर खदेड़ना शुरु किया तो भला मुम्बई के भाजपा अध्यक्ष राज पुरोहित इस “खेल” में कैसे पीछे रहते? राज ठाकरे को “मात” देने और उत्तर भारतीयों को खुश करने की गरज से एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता राज पुरोहित ने अपनी “राजनीति चमकाने” के लालच में एक ऐसा बयान दे डाला, जो उनके गले की फ़ाँस बन गया…


जिस लड़की अंकिता राणे की वजह से सड़कों पर लगने वाले ठेलों की साफ़सफ़ाई व्यवस्था की ओर जनता का ध्यान आकर्षित हुआ, लोगों ने उस लड़की की दाद दी, महानगरपालिका ने उसे ईनाम दिया… उस लड़की की तारीफ़ करना तो दूर रहा, राज पुरोहित साहब ने “वोट बैंक” की तरफ़दारी करने की भद्दी कोशिश करते हुए उस 17 वर्षीय कन्या के चरित्र पर ही छींटे उड़ाना शुरु कर दिया…। मुम्बई के आजाद मैदान में उत्तर भारतीय फ़ेरीवालों की एक आमसभा में “अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करते” हुए भाजपा नेता पुरोहित ने कहा – “कोई भी लड़की, किसी आदमी को पेशाब करते हुए देख नहीं सकती… रेडलाइट एरिया की “बाईयाँ” भी पुरुष को पेशाब करते हुए नहीं देख सकती… लेकिन इस लड़की ने न सिर्फ़ इस पानीपुरी वाले को पेशाब करते हुए लगातार देखा, बल्कि उसका वीडियो भी बना डाला, इससे पता चलता है कि लड़की कितने “गिरे हुए चरित्र” की है…यह लड़की पूरी तरह से बेशर्म है…, और यह घटना फ़ेरीवालों एवं उत्तर भारतीयों के खिलाफ़ षडयंत्र है…”


इस मूर्खतापूर्ण एवं बेहद घटिया बयान के बाद मुम्बई के महिला संगठनों ने राज पुरोहित के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया। विभिन्न रहवासी संघ के जागरुक नागरिकों ने भाजपा के इस नेता को गिरफ़्तार करने की माँग भी कर डाली। मौका हाथ आया था, सो लगे हाथों राज ठाकरे ने भी पुरोहित पर जोरदार शाब्दिक हमला कर डाला…। जब मामला बहुत बिगड़ गया और शायद भाजपा के वरिष्ठ नेताओं द्वारा राज पुरोहित को “शुद्ध हिन्दी में समझाइश” दी गई होगी, तब स्थानीय चैनल पर बोलते हुए पुरोहित ने वही कहा जो अक्सर जूते खाने के बाद नेता कहते आये हैं यानी, “मेरे बयान का मतलब किसी को ठेस पहुँचाना नहीं था, मेरे बयान को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया है, मैं अंकिता राणे से लिखित में माफ़ी माँगने को तैयार हूँ… आदि-आदि-आदि…"। फ़िलहाल तो अंकिता राणे ने राज पुरोहित के खिलाफ़ 1 करोड़ का मानहानि का दावा पेश कर दिया है एवं कई स्वतंत्र युवा संगठनों ने माँग की है कि राज पुरोहित को उसी पेशाब वाले लोटे से पानीपुरी खिलाई जाये…
(चित्र : विरोध प्रदर्शन के दौरान अंकिता राणे -बीच में)

मुम्बई में “अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने” में भाजपा हमेशा से अग्रणी रही है, पहले तो वह शिवसेना की पिछलग्गू बनी रही, कभी भी “राष्ट्रीय पार्टी” नहीं दिखाई दी, जब-तब बाल ठाकरे के धमकाने पर राजनैतिक समझौते किये। अब जबकि शिवसेना कमजोर पड़ती जा रही है और राज ठाकरे ज़मीनी स्तर पर मजबूत हो रहे हैं तो उन्हें “अपने पाले” में लाने और राज्य में पकड़ मजबूत बनाने की बजाय, उटपटांग बयानबाजी करके उससे मुकाबला करने के मंसूबे बना रहे हैं…। जबकि अन्त-पन्त होगा यही कि “खून, खून को पुकारेगा…” और भविष्य में शिवसेना-मनसे का विलय हो जाएगा, तब भाजपा न घर की रहेगी न घाट की। कुछ समय पहले राज ठाकरे को, मुम्बई भाजपा ने अपने दफ़्तर में आमंत्रित किया था और चाय पार्टी दी थी। इनके बीच कोई खिचड़ी पकती, इससे पहले ही बाल ठाकरे ने “सामना” में भाजपा को गठबंधन धर्म की याद दिलाते हुए शिवसेना स्टाइल में लिख मारा कि “एक के नाम का मंगलसूत्र गले में हो तो दूसरे से चूमाचाटी नहीं चलेगी…”, और भाजपा वापस दुम दबाकर चुप बैठ गई। फ़िर यह पानीपुरी वाला मामला सामने आया, तो भाजपा को लगा कि राज ठाकरे उत्तर भारतीय फ़ेरीवालों की ठुकाई कर रहे हैं… चलो इस वोट बैंक को लपक लिया जाए… परन्तु यहाँ भी राज पुरोहित के मुखारविंद से निकले बोलों ने उसका खेल बिगाड़ दिया।

खैर इस प्रकरण ने एक बात साफ़ कर दी है कि यदि कोई समूह अपना मजबूत “वोट बैंक” बनाता है तो उसे खुश करने और उनके वोट लेने के लिये नेता नामक प्रजाति “कुछ भी” करने, "किसी भी हद तक गिरने" को तैयार रहती है। मुम्बई में उत्तर भारतीयों का खासा बड़ा वोट बैंक है और उसे खुश करने के चक्कर में एक मासूम लड़की के चरित्र पर शंका तक ज़ाहिर कर दी गई, यदि मुम्बई के नागरिक और महिला संगठन जागरुक नहीं होते और वक्त पर आवाज़ न उठाते, तो उस बहादुर लड़की को बेहद मानसिक संताप झेलना पड़ता…।
Published in ब्लॉग
न्यूज़ लैटर के लिए साइन अप करें