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desiCNN - Items filtered by date: जनवरी 2011
मुम्बई हमले के बाद से लगातार पिछले 2 साल से राष्ट्रीय सहारा (उर्दू) के सम्पादक अज़ीज़ बर्नी ने 100 से अधिक लेख एवं एक पुस्तक “26/11, RSS Conspiracy” नाम की बेहूदा और देशद्रोही पुस्तक लिखकर न सिर्फ़ देश को अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति के स्तर पर शर्मिन्दा किया बल्कि RSS एवं हिन्दुओं के खिलाफ़ सतत जहर उगलते रहे। इनकी हाँ में हाँ मिलाने व पिछलग्गूपन को मात करते हुए दिग्विजय सिंह भी इसकी पुस्तकों के विमोचन समारोहों में जाते रहे, संघ को गरियाते रहे।


अब राष्ट्रीय सहारा ने अज़ीज़ बर्नी का खेद व माफ़ीनामा प्रकाशित किया है, जिसमें उसने कहा है कि “मेरा इरादा किसी को ठेस पहुँचाने का नहीं था, यदि मेरी बातों से किसी की भावनाओं को दुख पहुँचा हो तो मैं उसके लिये माफ़ी माँगता हूँ…”। देखा आपने, हद है मक्कारी की… यदि ठेस पहुँचाने का इरादा नहीं था तो इस पुस्तक को दो साल तक बाजा बजा-बजाकर क्यों बेच रहे थे? क्यों बार-बार हेमन्त करकरे की स्वर्गीय आत्मा को नोच रहे थे? संघ के बारे में जानते नहीं थे, तो क्यों अपना सड़ा हुआ मुँह फ़ाड़ रहे थे? और अब माफ़ी का ढोंग कर रहे हैं… जी हाँ ढोंग ही है, क्योंकि अभी भी अज़ीज़ बर्नी ने अपने बयान (माफ़ीनामे) में यह नहीं कहा कि 26/11 के लिये संघ पर आरोप लगाती हुई मेरी पुस्तक नम्बर एक की कूड़ा पुस्तक है…।



और ऐसा भी नहीं कि अज़ीज़ बर्नी की अक्ल अचानक ठिकाने आ गई हो, इसके पीछे नवी मुम्बई स्थित श्री विनय जोशी हैं जिन्होंने अपने वकील प्रशान्त मग्गू के जरिये, अज़ीज़ बर्नी और सहारा प्रकाशन, लखनऊ के खिलाफ़ दो साल पहले नवी मुम्बई की अदालत में देशद्रोह, भारत की सुरक्षा से खिलवाड़, मानहानि, भावनाएं भड़काने, भावनाओं को चोट पहुँचाने सम्बन्धी कोर्ट केस दायर किया था। इस कोर्ट केस की वजह से बर्नी को लगातार मुम्बई के चक्कर काटने पड़े, जिस वजह से उसे अपने अन्य अखबारी एवं व्यावसायिक काम करना मुश्किल हो गया था। अज़ीज़ बर्नी ने इस कथित माफ़ीनामे सम्बन्धी जो ई-मेल श्री विनय जोशी को भेजा है उसका मजमून इस प्रकार है–



---------- Forwarded message ----------
From: Aziz Burney
Date: 28 January 2011 21:45
Subject: Letter for apology
To: Vinay Joshi

Dear Mr.Vinay Joshi,

Since last two years I am writing various articles regarding 26/11 Mumbai terror attack.You had filed court suit against me and Sahara Publications in Navi Mumbai court for my articles regarding Mumbai attack.I never wrote anything to deliberately hurt the feelings of anyone.But if you are disturbed or hurt due to any article or anything I quoted in my article,then I am extremely sorry for this.Hope you would accept my apology.

Also I am requesting you for the immediate withdrawal of court case filed against me in Navi Mumbai court,as it is creating professional difficulties for me and I cannot afford to bear cost of litigation.I never intended to target India's security apparatus and any patriotic organisation working in India.but if there are any references made in my articles by mistake then I am really sorry for that.I assure you that I will not write anything in future that may hurt anyone and I will take utmost care for the same.Expecting quick withdrawal of court case once again.

Thanks & regards,

Aziz Burney,
Sahara India Complex,
C-2,3,4; Sector 11,Noida-201301
Phone:0120-2553921,2598419
Fax:0120-2545231,2537635

आपने ईमेल की भाषा का नमूना देखा? माफ़ी भी माँग रहा है और अकड़ भी दिखा रहा है…। यह बर्नी भी, दिग्विजय सिंह का ही भाई लगता है, जो सरेआम “26/11, संघ की साजिश” नामक इस पुस्तक के विमोचन में उपस्थित रहते थे लेकिन फ़िर भी कहते रहते थे कि मुम्बई हमलों में पाकिस्तान की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता, ऐसा दोमुँहापन कभीकभार ही देखने में आता है।

मैं सरकार से माँग करता हूँ कि इस पुस्तक को छापने और वितरित करने के पीछे क्या साजिश रही है इसकी विस्तार से जाँच होनी चाहिये, अज़ीज़ बर्नी को किसने यह पुस्तक लिखने के लिये पैसा दिया, बर्नी के खातों की भी जाँच होनी चाहिये, क्या इस पुस्तक के पीछे “कोई विदेशी हाथ” है, इस पुस्तक की कितनी प्रतियाँ अब तक बिकीं और कहाँ-कहाँ बिकीं? बिक्री की आय का क्या हुआ? इस प्रकार की जाँच शुरु किये जाने से भविष्य में देश की सुरक्षा एवं कूटनीति के खिलाफ़ किसी साजिश से बचा जा सकता है। भविष्य में ऐसी किसी पुस्तक के लेखक को सीधे जेल भेजने की व्यवस्था होनी चाहिये, सिर्फ़ फ़र्जी माफ़ीनामे से काम नहीं चलेगा।

श्री विनय जोशी को मेरी हार्दिक बधाईयाँ, आपके प्रयास स्तुत्य हैं। मैं आपसे अर्ज़ करता हूँ कि भले ही अज़ीज़ बर्नी ने “माफ़ी माँगने का नाटक” कर लिया हो, लेकिन इस केस को वापस नहीं लें, क्योंकि इसमें अभी कई रहस्य बरकरार हैं…। मकबूल हुसैन नामक फ़ूहड़ चित्रकार की तरह इसे भी तब तक जमकर रगड़ें, जब तक कि इसकी सारी हेकड़ी न निकल जाये…

और अज़ीज़ बर्नी में यदि ज़रा भी शर्म बची हो तो वे NDTV, तहलका और "टाइम्स नाऊ" के स्टूडियो (ये तीन सबसे बड़े हिन्दू विरोधी हैं) में अपने साथ दिग्विजय सिंह को ले जाएं और देश तथा संघ से खुलेआम माफ़ी माँगें, न कि इस तरह छिप-छिपाकर…। 

सन्दर्भ :- http://www.indianexpress.com/news/for-linking-rss-to-26-11-aziz-burney-says-sorry-on-front-page/743433/0
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श्रीनगर के लाल चौक में तिरंगा न फ़हराने देने के लिये मनमोहन सिंह, चिदम्बरम और उमर अब्दुल्ला एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, भाजपा नेताओं को असंवैधानिक रुप से जबरन रोके रखा गया, कर्नाटक से भाजपा कार्यकर्ताओं को लेकर आने वाली ट्रेन को ममता बैनर्जी ने अपहरण करवाकर वापस भिजवा दिया (यहाँ देखें…) (इस ट्रेन को भाजपा ने 57 लाख रुपये देकर बुक करवाया था), “पाकिस्तान के पक्के मित्र” दिग्विजय सिंह भाजपा को घुड़कियाँ दे रहे हैं, लालूप्रसाद लाल-पीले हो रहे हैं (क्योंकि खुद भी राष्ट्रगान के वक्त बैठे रहते हैं - यहाँ देखें), मनमोहन सिंह “हमेशा की तरह” गिड़गिड़ा रहे हैं, कि कैसे भी हो, चाहे जो भी हो… कश्मीर में लाल चौक पर तिरंगा मत फ़हराओ, क्योंकि -

1) इससे राज्य में “कानून-व्यवस्था”(?) की स्थिति खराब होगी… (मानो पिछले 60 साल से वहाँ रामराज्य ही हो)

2) लोगों की भावनाएं(?) आहत होंगी… (लोगों की, यानी गिलानी-मलिक और अरूंधती जैसे “भाड़े के टट्टुओं” की)

3) तिरंगे का राजनैतिक फ़ायदा न उठाएं… (क्योंकि तिरंगे का राजनैतिक फ़ायदा लेने का कॉपीराइट सिर्फ़ कांग्रेस ने ले रखा है)

यदि भाजपा की इस पहल को “खान-ग्रेस” (Congress) पार्टी “राजनैतिक” मानती है, तो मनमोहन, सोनिया, चिदम्बरम, और उमर अब्दुल्ला एक साथ, एक मंच पर खड़े होकर लाल चौक पर तिरंगा क्यों नहीं फ़हराते? जब दो कौड़ी के कश्मीरी नेता दिल्ली में ऐन सरकार की नाक के नीचे भारत को “भूखों-नंगों का देश” कहते हैं, कश्मीर को अलग करने की माँग कर डालते हैं…तब सभी मिमियाते रह जाते हैं, लेकिन भाजपा लाल चौक में तिरंगा नहीं फ़हरा सकती? अलबत्ता “कांग्रेस के दामाद लोग” पाकिस्तान का झण्डा अवश्य फ़हरा सकते हैं… (देखें लाल चौक का एक चित्र)।


कहने का तात्पर्य यह है कि –

1) कश्मीर में गरीबी की दर है सिर्फ़ 3.4 प्रतिशत है जबकि भारत की गरीबी दर है अधिकतम 26 प्रतिशत (बिहार और उड़ीसा जैसे राज्यों में)


– फ़िर भी बिहार, उड़ीसा में तिरंगा फ़हराया जा सकता है, लाल चौक पर नहीं…

2) 1991 में कश्मीर को 1,244 करोड़ रुपये का अनुदान दिया गया जो कि सन् 2002 तक आते-आते बढ़कर 4,578 करोड़ रुपये हो गया था (सन्दर्भ-इंडिया टुडे 14 अक्टूबर 2002)।

- फ़िर भी हम लाल चौक में तिरंगा नहीं फ़हराएंगे…

3) 1991 से 2002 के बीच केन्द्र सरकार द्वारा कश्मीर को दी गई मदद कुल जीडीपी का 5 प्रतिशत से भी अधिक बैठता है। इसका मतलब है कि कश्मीर को देश के बाकी राज्यों के मुकाबले ज्यादा हिस्सा दिया जाता है, किसी भी अनुपात से ज्यादा। यह कुछ ऐसा ही है जैसे किसी परिवार के “सबसे निकम्मे और उद्दण्ड लड़के” को पिता का सबसे अधिक पैसा मिले “मदद(?) के नाम पर”

– फ़िर भी हम अपना अलग संविधान, अलग झण्डा रखेंगे…

4) “वे” लोग हमारे पैसों पर पाले जा रहे हैं, और वे इसे कभी अपना “हक”(?) बताकर, कभी असंतोष बताकर, कभी “गुमराह युवकों”(?) के नाम पर… और-और-और ज्यादा हासिल करने की कोशिश में लगे रहते हैं। भारत के ईमानदार करदाताओं का पैसा इस तरह से नाली में बहाया जा रहा है…


– फ़िर भी बहादुर सिख कौम के प्रधानमंत्री कहते हैं, लाल चौक पर तिरंगा नहीं फ़हराना चाहिये…

5) जब नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि “गुजरात से कोई टैक्स न लो और न ही केन्द्र कोई मदद गुजरात को दे” तो कांग्रेस इसे तत्काल देशद्रोही बयान बताती है। अर्थात यदि देश का कोई पहला राज्य, जो हिम्मत करके कहता है कि “मैं अपने पैरों पर खड़ा हूँ…” तो उसे तारीफ़ की बजाय उलाहने और आलोचना दी जाती है, जबकि गत बीस वर्षों से भी अधिक समय से “जोंक” की तरह देश का खून चूसने वाला कश्मीर, “बेचारा है” और “धर्मनिरपेक्ष भी है”?


– फ़िर भी गाँधीनगर में तिरंगा फ़हरा सकते हैं, श्रीनगर में नहीं…

6) कश्मीर के प्रत्येक व्यक्ति पर केन्द्र सरकार 10,000 रुपये की सबसिडी देती है, जो कि अन्य राज्यों के मुकाबले लगभग 40% ज्यादा है (कोई भी सामान्य व्यक्ति आसानी से गणित लगा सकता है कि कश्मीरी नेताओं, हुर्रियत अल्गाववादियों, आतंकवादियों और अफ़सरों की जेब में कितना मोटा हिस्सा आता होगा, “ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल” की ताजा रिपोर्ट में कश्मीर को सबसे भ्रष्ट राज्य का दर्जा इसीलिये मिला हुआ है)

– फ़िर भी हम लाल चौक में तिरंगा नहीं फ़हरा सकते…

7) इसके अलावा रेल्वे की जम्मू-उधमपुर योजना 600 करोड़, उधमपुर-श्रीनगर-बारामुला योजना 5000 करोड़, विभिन्न पहाड़ी सड़कों पर 2000 करोड़, सलाई पावर प्रोजेक्ट 900 करोड़, दुलहस्ती हाइड्रो प्रोजेक्ट 6000 करोड़, डल झील सफ़ाई योजना 150 करोड़ आदि-आदि-आदि

– फ़िर भी लाल चौक पर तिरंगा फ़हराना “राजनीति” है…
(समस्त आँकड़े CAGR की रिपोर्ट के अनुसार)

8) कश्मीर घाटी से गैर-मुस्लिमों का पूरी तरह से सफ़ाया कर दिया गया है,
कश्मीरी सारे भारत में कहीं भी रह सकते हैं, कहीं भी जमीने खरीद सकते हैं, लेकिन कश्मीर में वे किसी को बर्दाश्त नहीं करते, अमरनाथ यात्रियों के लिये एक टेम्परेरी ज़मीन का टुकड़ा भी नहीं दे सकते…

- फ़िर भी भाजपा ही “शांति भंग”(?) करना चाहती है…

जम्मू में तिरंगा फ़हरा सकते हैं, लेह में फ़हरा सकते हैं, लद्दाख में शान से लहरा सकते हैं, द्रास-कारगिल में बर्फ़ की चोटियों पर गर्व से अड़ा सकते हैं… सिर्फ़ एक छोटे से टुकड़े कश्मीर” के लाल चौक में नहीं फ़हरा सकते… क्यों? इस क्यों का जवाब “कांग्रेस(I) – अर्थात कांग्रेस (Italy)” ही दे सकती है… लेकिन देगी नहीं, क्योंकि राष्ट्रीय स्वाभिमान, तिरंगे की आन-बान-शान, एकता-अखण्डता इत्यादि शब्द उसके लिये चिड़ियाघर में रखे ओरांग-उटांग की तरह हैं…

यदि कल को पश्चिम बंगाल के 16 जिलों में, अथवा असम के 5 जिलों में, या उत्तरी केरल के 3 जिलों में भी तिरंगा फ़हराने पर “किसी” की भावनाएं आहत होने लग जायें तो आश्चर्य न कीजियेगा… “सत्य-अहिंसा के पुजारियो” ने जो विरासत हमें सौंपी है, उसमें ऐसा बिलकुल हो सकता है…।

वाकई दुर्भाग्य है कि, “मैकाले की शिक्षा पद्धति” ने, खामख्वाह में “बच्चों के चाचा” बन बैठे एक व्यक्ति ने, और अलगाववादियों के सामने “सतत रेंगते रहने वाले” वाले गाँधी परिवार, नरसिंहराव, वीपी सिंह, अटलबिहारी वाजपेयी सभी ने मिलकर… देश को एक सड़े हुए टमाटर की तरह पिलपिला बनाकर रख दिया है…
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जैसा कि सभी को ज्ञात हो चुका है कि केरल के सुप्रसिद्ध सबरीमाला अय्यप्पा स्वामी मन्दिर की पहाड़ियों में भगदड़ से 100 से अधिक श्रद्धालुओं की मौत हुई है जबकि कई घायल हुए एवं अब भी कुछ लोग लापता हैं। इस दुर्घटना को प्रधानमंत्री ने “राष्ट्रीय शोक” घोषित किया, एवं कर्नाटक सरकार के दो मंत्रियों द्वारा अपने दल-बल के साथ घटनास्थल पर जाकर मदद-सहायता की। समूचे केरल सहित तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश व कर्नाटक में शोक की लहर है (मरने वालों में से अधिकतर तमिलनाडु व कर्नाटक के श्रद्धालु हैं)…


लेकिन इतना सब हो चुकने के बावजूद कांग्रेस के “युवा”(??) महासचिव एवं भारत के आगामी प्रधानमंत्री (जैसा कि चाटुकार कांग्रेसी उन्हें प्रचारित करते हैं), दुर्घटनास्थल से मात्र 70 किमी दूरी पर कुमाराकोम में केरल के बैकवाटर में एक बोट में पार्टी मना रहे थे। जिस समय “सेवा भारती” एवं “अय्यप्पा सेवा संगम” के कार्यकर्ता सारी राजनैतिक सीमाएं तोड़कर घायलों एवं मृतकों की सेवा में लगे थे, सेना के जवानों की मदद कर रहे थे, जंगल के अंधेरे को दूर करने के लिये अपने-अपने उपलब्ध साधन झोंक रहे थे… उस समय भोंदू युवराज कुमारकोम में मछली-परांठे व बाँसुरी की धुन का आनन्द उठा रहे थे।



यह भीषण भगदड़ शुक्रवार यानी मकर संक्रान्ति के दिन हुई, लेकिन राहुल बाबा ने शनिवार को इदुक्की जिले में न सिर्फ़ एक विवाह समारोह में भाग लिया, बल्कि रविवार तक वे कुमारकोम के रिसोर्ट में “रिलैक्स”(?) कर रहे थे। उल्लेखनीय है कि राहुल गाँधी अलप्पुझा में अपने पारिवारिक मित्र अमिताभ दुबे के विवाह समारोह में आये थे (अमिताभ दुबे, राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन के ट्रस्टी बोर्ड के सदस्य व नेहरु परिवार के खासुलखास श्री सुमन दुबे के सुपुत्र हैं)। अमिताभ दुबे का विवाह अमूल्या गोपीकृष्णन के साथ 15 जनवरी (शनिवार) को हुआ, राहुल गाँधी 14 जनवरी (शुक्रवार) को ही वहाँ पहुँच गये थे।

पाठकों को याद होगा कि किस तरह 26/11 के मुम्बई हमले के ठीक अगले दिन, जबकि मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की माँ की आँखों के आँसू सूखे भी नहीं थे… “राउल विंची”, दिल्ली के बाहरी इलाके में एक फ़ार्म हाउस में अपने दोस्तों के साथ पार्टी मनाने में मशगूल थे… उधर देश के जवान अपनी जान की बाजी लगा रहे थे और सैकड़ों जानें जा चुकी थीं। मुम्बई जाकर अस्पताल में घायलों का हालचाल जानना अथवा महाराष्ट्र की प्रिय कांग्रेस सरकार से जवाब-तलब करने की बजाय उन्होंने दिल्ली में पार्टी मनाना उचित समझा… (यहाँ देखें…

केरल के कांग्रेसजनों ने राहुल की इस हरकत पर गहरा क्रोध जताया है, स्थानीय कांग्रेसजनों का कहना है कि जब मुख्यमंत्री अच्युतानन्दन एवं नेता प्रतिपक्ष ओम्मन चाण्डी घटनास्थल पर थे, तो मात्र 70 किमी दूर होकर भी राहुल गाँधी वहाँ क्यों नहीं आये? (परन्तु नेहरु परिवार की गुलामी के संस्कार मन में गहरे पैठे हैं इसलिये कोई भी खुलकर राहुल का विरोध नहीं कर रहा है)।

यदि शनिवार की सुबह राहुल गाँधी उस विवाह समारोह को छोड़कर राहत कार्यों का मुआयना करने चले जाते तो कौन सी आफ़त आ जाती? शादी अटेण्ड करना जरूरी था या दुर्घटना स्थल पर जाना? न सिर्फ़ शनिवार, बल्कि रविवार को भी राहुल बाबा, बोट पर पार्टी मनाते रहे, गज़लें सुनते रहे… उधर बेचारे श्रद्धालु कराह रहे थे, मर रहे थे। यह हैं हमारे भावी प्रधानमंत्री…

अन्ततः शायद खुद ही शर्म आई होगी या किसी सेकुलर कांग्रेसी ने उन्हें सुझाव दिया होगा कि केरल में चुनाव होने वाले हैं इसलिये उन्हें वहाँ जाना चाहिये, तब रविवार शाम को राहुल गाँधी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रमेश चेन्निथला के साथ घटनास्थल के लिये उड़े… लेकिन शायद भगवान अय्यप्पा स्वामी भी, राहुल की “नापाक उपस्थिति” उस जगह नहीं चाहते होंगे इसलिये घने कोहरे की वजह से हेलीकॉप्टर वहाँ उतर न सका, और युवराज बेरंग वापस लौट गये (ये बात और है कि उनके काफ़िले में भारत के करदाताओं की गाढ़ी कमाई की मजबूत गाड़ियाँ व NSG के कमाण्डो की भीड़ थी, वे चाहते तो सड़क मार्ग से भी वहाँ पहुँच सकते थे, लेकिन ऐसा कुछ करने के लिये वैसी “नीयत” भी तो होनी चाहिये…)।

मीडिया के कुछ लोग एवं कांग्रेस के ही कुछ कार्यकर्ता दबी ज़बान में कहते हैं कि रविवार शाम को भी कोहरे, धुंध व बारिश का तो बहाना ही था, असल में राहुल बाबा इसलिये वहाँ नहीं उतरे कि घटनास्थल से लगभग सभी लाशें उठाई जा चुकी थी… ऐसे में राहुल गाँधी वहाँ जाकर क्या करते… न तो मीडिया का फ़ुटेज मिलता और न ही राष्ट्रीय स्तर पर छवि चमकाने का मौका मिलता… इसलिये कोहरे और बारिश का बहाना बनाकर हेलीकॉप्टर वापस ले जाया गया… लेकिन जैसा कि पहले कहा, यदि “नीयत” होती और “दिल से चाहते” तो, सड़क मार्ग से भी जा सकते थे। जब वे नौटंकी करने के लिये किसी दलित की झोंपड़ी में जा सकते हैं, अपना सुरक्षा घेरा तोड़कर उड़ीसा के जंगलों में रहस्यमयी तरीके से गायब हो सकते हैं (यहाँ पढ़ें…), तो क्या शादी-ब्याह-पार्टी में से एक घण्टा घायलों को अस्पताल जाने के लिये नहीं निकाल सकते थे? और कौन सा उन्हें अपने पैरों पर चलकर जाना था, हमारे टैक्स के पैसों पर ही तो मस्ती कर रहे हैं…

कांग्रेस द्वारा “भाड़े पर लिये गये मीडिया” ने तब भी राहुल का गुणगान करना नहीं छोड़ा और इन भाण्डों द्वारा “राहुल की सादगी” के कसीदे काढ़े गये (“सादगी” यानी, उन्होंने इस यात्रा को निजी रखा और केरल की पुलिस को सूचना नहीं दी, न ही हमेशा की तरह “वीआईपी ट्रीटमेंट” लेते हुए रास्ते और ट्रेफ़िक को रोका…। इस सादगी पर बलिहारी जाऊँ…), कुछ “टट्टू” किस्म के अखबारों ने राहुल और प्रियंका द्वारा मार्च 2010 में उनके निजी स्टाफ़ के एक सदस्य के. माधवन की बेटी की शादी में आने को भी “सादगी” मानकर बखान किया… लेकिन किसी भी अखबार या चैनल ने “राउल विंची” द्वारा हिन्दू श्रद्धालुओं के प्रति बरती गई इस क्रूर हरकत को “हाइलाईट” नहीं होने दिया… वरना “ऊपर” से आने वाला पैसा बन्द हो जाता और कई मीडियाकर्मी भूखों मर जाते…। जिन संगठनों को “आतंकवादी” साबित करने के लिये यह गिरा हुआ मीडिया और ये मासूम राहुल बाबा, जी-जान से जुटे हुए हैं, उन्हीं के साथी संगठनों के कार्यकर्ता, रात के अंधेरे में सबरीमाला की पहाड़ियों पर घायलों की मदद कर रहे थे।

जैसी संवेदनहीनता और लापरवाही मुम्बई हमले एवं सबरीमाला दुर्घटना के दौरान “राउल विंची” ने दिखाई है… क्या इसे मात्र उनका “बचपना”(?) या “लापरवाही” कहकर खारिज किया जा सकता है? गलती एक बार हो सकती है, दो-दो बार नहीं। आखिर इसके पीछे कौन सी “मानसिकता” है…
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चलते-चलते : अब कुछ तथ्यों पर नज़र डाल लीजिये…

1) केरल सरकार को प्रतिवर्ष सबरीमाला यात्रा से 3000 करोड़ रुपए की आय होती है।

2) ट्रावणकोर देवस्वम बोर्ड द्वारा राज्य के कुल 1208 मन्दिरों पर साल भर में खर्च किये जाते हैं 80 लाख रुपये। (जी हाँ, एक करोड़ से भी कम)

3) एक माह की सबरीमाला यात्रा के दौरान सिर्फ़ गरीब-मध्यम वर्ग के लोगों द्वारा दिये गये छोटे-छोटे चढ़ावे की दानपेटी रकम ही होती है 131 करोड़…

(लेकिन हिन्दू मन्दिरों के ट्रस्टों और समितियों तथा करोड़ों रुपये पर कब्जा जमाये बैठी “सेकुलर गैंग” सबरीमाला की पहाड़ियों पर श्रद्धालुओं के लिये मूलभूत सुविधाएं – पानी, चिकित्सा, छाँव, पहाड़ियों पर पक्का रास्ता, इत्यादि भी नहीं जुटाती…)

- अरे हाँ… एक बात और, केन्द्रीय सूचना आयुक्त ने RTI के एक जवाब में बताया है कि राहुल गाँधी की सुरक्षा, परिवहन, यात्रा एवं ठहरने-भोजन इत्यादि के खर्च का कोई हिसाब लोकसभा सचिवालय द्वारा नहीं रखा जाता है… इसलिये इस बारे में किसी को नहीं बताया जा सकता…

जय हो… जय हो…
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रूस में स्टालिन के ज़माने का एक किस्सा है, स्टालिन से मिलने चार ग्रामीणों का एक प्रतिनिधिमण्डल आया था। स्टालिन से उनकी चर्चा हुई और ग्रामीण उनके केबिन से बाहर निकल गये। स्टालिन को सिगार पीने की याद आई, उन्होंने जेबें टटोलीं… टेबल की दराज देखीं, कोट को हिला-डुलाकर देखा लेकिन उनका प्रिय सिगार उन्हें नहीं मिला। स्टालिन ने तत्काल अपनी सेक्रेटरी मारिया को बुलवाया और कहा कि अभी-अभी जो चार ग्रामीण बाहर निकले हैं उनसे मेरे सिगार के बारे में पूछताछ करो। मारिया के जाने के थोड़ी देर बाद स्टालिन को वह सिगार टेबल के नीचे पड़ा दिखाई दिया, स्टालिन ने मारिया को फ़ोन लगाया और कहा कि उन ग्रामीणों को छोड़ दो… तब मारिया बोली, “लेकिन सर, चार में से तीन लोगों ने तो स्वीकार कर लिया है कि आपका सिगार उन्होंने चुराया था और चौथा भी जल्दी ही मान जायेगा, मै “चारों” सिगार लेकर आ ही रही हूँ…”

भले ही यह किस्सा स्टालिन की तानाशाही कार्यप्रणाली के लिये हँसी-मजाक के तौर पर उपयोग होता है, लेकिन यह भारत की तथाकथित “सर्वश्रेष्ठ जाँच संस्था”(?) सीबीआई की कार्यप्रणाली से अक्षरशः मेल खाता है। जब से कांग्रेस सरकार महंगाई, स्पेक्ट्रम, कलमाडी और आदर्श जैसे मामलों के कीचड़ में धँसी है, तभी से कांग्रेस व उसके चमचों खासकर तहलका, टाइम्स और नेहरु डायनेस्टी टीवी (NDTV) में “हिन्दू आतंक”(?) को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने और हल्ला मचाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। स्वामी असीमानन्द द्वारा समझौता ब्लास्ट मामले में दिया गया “तथाकथित बयान” भी जानबूझकर लीक करवाया गया है, इसके कथित कागज़ात व सबूत “तहलका” पर प्लाण्ट करवाये गये हैं, जबकि समझौता एक्सप्रेस बम विस्फ़ोट मामले में सीबीआई पहले भी सिमी के प्रमुख कार्यकर्ता सफ़दर नागोरी से भी कबूलनामा ले चुकी है, जबकि अमेरिकी जाँच एजेंसी ने इसी मामले में डेविड हेडली की पत्नी के बयान को लेकर उसके खिलाफ़ पहले ही मामला खोल रखा है।


सीबीआई के अनुसार, सफ़दर नागोरी, कमरुद्दीन नागोरी व आमिल परवेज़ ने नार्को टेस्ट में कबूल किया था कि समझौता एक्सप्रेस में उन्होंने बम रखवाये थे और इस मामले से कर्नल पुरोहित व साध्वी प्रज्ञा का कोई लेना-देना नहीं है, जबकि सीबीआई अब कह रही है कि असीमानन्द ने रितेश्वर और सुनील जोशी के साथ मिलकर यह साजिश रची। उधर अमेरिका में डेविड हेडली की पूर्व-पत्नी फ़ैज़ा औतुल्ला ने हेडली द्वारा समझौता एक्सप्रेस में लश्कर के साथ मिलकर बम विस्फ़ोट करने की योजना का खुलासा किया है। नार्को टेस्ट में सफ़दर नागोरी ने कबूल किया है कि समझौता एक्सप्रेस में बम रखने के लिये सूटकेस कटारिया मार्केट इन्दौर से खरीदे गये थे, नागोरी ने यह भी कबूल किया है कि सिमी नेता अब्दुल रज्जाक ने समझौता एक्सप्रेस विस्फ़ोट के लिये पाकिस्तान से आर्थिक मदद प्राप्त की थी। (32 पेज की यह नार्को टेस्ट रिपोर्ट एवं फ़ोरेंसिक टीम के निष्कर्षों की पूरी कॉपी अखबार “द पायनियर” के पास उपलब्ध है) 

इसी प्रकार हेडली की मोरक्कन बीवी ने अमेरिकी जाँच एजेंसी को शिकायत की थी कि हेडली भारत की किसी एक्सप्रेस ट्रेन में बम रखवाने की योजना बना रहा है, समझौता एक्सप्रेस बम विस्फ़ोट के बाद उसका शक और गहरा गया। लश्कर से हेडली के सम्बन्ध जगज़ाहिर हैं।

अब ऐसे में सवाल उठता है कि भारत की “महान जाँच एजेंसी”(?) जिसने हाल ही में आरुषि हत्याकाण्ड में अपनी “स्टालिन-मारिया टाइप की योग्यता” दर्शाई है, क्या असीमानन्द के मामले में उस पर भरोसा किया जा सकता है? सफ़दर नागोरी, डेविड हेडली या असीमानन्द… किसकी बात सच मानी जाये, किसकी झूठ? सफ़दर नागोरी का नार्को टेस्ट बड़ा बयान माना जाये या असीमानन्द का मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया “कथित” बयान?

सीबीआई का न तो रिकॉर्ड साफ़-सुथरा है न ही उसकी इमेज इतनी दमदार है कि वह जनता में यह संदेश देने में कामयाब हो कि वह निष्पक्षता से जाँच करेगी ही। बोफ़ोर्स मामले में हम देख चुके हैं कि किस तरह “महारानी विक्टोरिया” ने सीबीआई की बाँहें मरोड़कर उनके चहेते क्वात्रोची को क्लीन चिट दिलवाई थी और गाहे-बगाहे केन्द्र में समर्थन लेने के लिये कभी मायावती, कभी मुलायम सिंह तो कभी जयललिता के पुराने मामलों को कब्र से निकालकर उनकी गर्दन पकड़ने का काम सीबीआई के जरिये किया जाता रहा है… इसलिये भारतीय पुलिस की स्टालिन-मारिया स्टाइल वाली पूछताछ और बयानों से किसी भी समय, किसी को भी दोषी सिद्ध किया जा सकता है…

ये बात और है कि कोर्ट में इनके लगाये-बनाये हुए केस की धज्जियाँ उड़ जाती हैं, लेकिन सुनियोजित तरीके से बयानों को अपने पालतू मीडिया में लीक करवाकर हिन्दू संगठनों को बदनाम करने का जो खेल खेला गया है, अभी तो वह कारगर दिखाई दे रहा है। अभी मामला कोर्ट में नहीं गया है, लेकिन यदि मान लो कि असीमानन्द दोषी साबित भी हो गये (जिसकी सम्भावना कम ही है) तब भी जाँच के तरीके और सफ़दर के बयानों के मद्देनज़र शक की गुंजाइश हमेशा बनी रहेगी…

जिस तरह काफ़ी समय से कांग्रेस की कोशिश रही है कि उसके “10 किलो के भ्रष्टाचार”  और भाजपा के 100 ग्राम भ्रष्टाचार को तराजू में रखकर बराबरी से तौला जाये, उसी प्रकार अब दिग्विजय सिंह जैसे लोगों के ज़रिये यह जी-तोड़ कोशिश की जा रही है कि किस प्रकार पाक प्रायोजित जेहादी आतंकवाद और हिन्दू आतंकवाद को एक पलड़े पर लाया जाये… चूंकि मीडिया में कांग्रेस के ज़रखरीद गुलाम भरे पड़े हैं और हिन्दुओं में भी “जयचन्द” इफ़रात में मिल जाते हैं इसलिये कांग्रेस की यह कोशिश रंग भी ला रही है। कांग्रेस ने पाकिस्तान को जानबूझकर यह कार्ड भी पकड़ा दिया है, और इसका बखूबी इस्तेमाल वह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर करेगा ही। 26/11 के बाद पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर चौतरफ़ा जिस प्रकार घेरा गया था, अब “हिन्दू आतंक” के नाम पर सेकुलरों द्वारा खुद एक डाकू को ही “चोर-चोर-चोर” चिल्लाने का मौका दिया गया है।



गुलामों द्वारा दिखाई जा रही स्वामीभक्ति के चन्द नमूने भी देख लीजिये – “26/11 - संघ की साजिश” नाम की कूड़ा पुस्तक लिखने वाले अज़ीज़ बर्नी से किसी भी मीडिया हाउस ने अभी तक कोई गम्भीर सवाल-जवाब नहीं किये हैं। एक तरफ़ तो दिग्विजय सिंह बार-बार इस घटिया पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में जाते हैं, उसका “प्रचार” करते हैं और दूसरी तरफ़ ये भी कहते हैं कि मैं हेमन्त करकरे की शहादत पर सवाल नहीं उठा रहा और पाकिस्तान का हाथ तो 26/11 में है ही…। कोई उनसे यह नहीं पूछता कि यदि आपको भरोसा है कि 26/11 में पाक और लश्कर का हाथ है तो अज़ीज़ बर्नी के प्रति आपका स्नेह इतना क्यों टपक रहा है? क्या इस पुस्तक की रॉयल्टी में उनका भी हिस्सा है? उधर “तहलका” भारत के सबसे सफ़ल मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को “पोस्टर बॉय” कहता है, तहलका को शायद “वायब्रेण्ट गुजरात” की सफ़लता से चिढ़ हो गई हो, तहलका की ही एक “ईसाई” रिपोर्टर निशा सूसन थीं जिन्होंने प्रमोद मुतालिक को पिंक चड्डी भेजने का छिछोरा अभियान चलाया था, ये बात और है कि तसलीमा नसरीन पर हमला करने वाले हैदराबाद के मुल्ले को “ग्रीन चड्डी” भेजने की उनकी हिम्मत नहीं है। नेहरु डायनेस्टी टीवी (NDTV) के बारे में तो कुछ कहना बेकार ही है यह तो अपने जन्म से ही “हिन्दू-विरोधी” है।

इन गुलामों में से कितनों ने NIA द्वारा केरल में की जा रही जाँच, अब्दुल मदनी से आतंकियों से सम्बन्ध और सिमी के ट्रेनिंग कैम्पों के बारे में अपने चैनलों पर दिखाया? क्या कभी सूफ़िया मदनी द्वारा दिये गये बयान अचानक प्रेस के माध्यम से सार्वजनिक हुए हैं? नहीं। लेकिन चूंकि “हिन्दू आतंक” शब्द को कांग्रेस द्वारा “ग्लोरिफ़ाय” किया जाना है और “भोंदू युवराज” हिन्दू आतंकवाद को ज्यादा खतरनाक बता चुके हैं तो सीबीआई और मीडियाई गुलामों का यह कर्त्तव्य बनता है कि वे इसे “साबित” भी कर दिखायें… चाहे स्टालिन-मारिया तकनीक ही क्यों न अपनानी पड़े…

तात्पर्य यह कि “जयचन्दों और खरीदे हुए भाण्डों” के सहारे “हिन्दुओं को बदनाम करो” अभियान सफ़लतापूर्वक चल रहा है।
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चलते-चलते : स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की उड़ीसा में हत्या हुई, नित्यानन्द को कर्नाटक में एक फ़र्जी वीडियो के जरिये बदनाम किया गया (वह वीडियो भी आश्रम के एक पूर्व कर्मचारी, जो ईसाई है, द्वारा ही बनाया गया है), हिन्दुओं की नाक पर बूट मलने की खातिर, कांची के शंकराचार्य को ऐन दीपावली की रात को हवालात में डाला गया और अब स्वामी असीमानन्द की बारी आई है…… क्या “गजब का संयोग”(?) है कि उक्त चारों महानुभाव मिशनरी द्वारा किये जा रहे धर्मान्तरण के खिलाफ़ कंधमाल(उड़ीसा), कर्नाटक, तमिलनाडु एवं डांग(गुजरात) में जबरदस्त अभियान चलाये हुए थे व हिन्दू जनजागरण कर रहे थे।

क्या अगला नम्बर योगी आदित्यनाथ (गोरखपुर) का होगा? इसका जवाब भोंदू युवराज या महारानी विक्टोरिया ही दे सकते हैं…
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भारत में इस्लामिक बैंक की स्थापना के प्रयासों में मुँह की खाने के बाद, एक अन्य “सेकुलर” कोशिश के तहत मुम्बई स्टॉक एक्सचेंज में एक नया इंडेक्स शुरु किया गया है जिसे “मुम्बई शरीया-इंडेक्स” नाम दिया गया है। बताया गया है कि इस इंडेक्स में सिर्फ़ उन्हीं टॉप 50 कम्पनियों को शामिल किया गया है जो “शरीयत” के अनुसार “हराम” की कमाई नहीं करती हैं, यह कम्पनियाँ शरीयत के दिशानिर्देशों के अनुसार पूरी तरह “हलाल” मानी गई हैं जिसमें भारत के मुस्लिम बिना किसी “धार्मिक खता”(?) के अपना पैसा निवेश कर सकते हैं।



एक इस्लामिक आर्थिक संस्था है “तसीस” (TASIS) (Taqwaa Advisory and Shariat Investment Solutions)। यह संस्था एवं इनका शरीयत बोर्ड यह तय करेगा कि कौन सी कम्पनी, शरीयत के अनुसार “हलाल” है और कौन सी “हराम”। इस संस्था के मुताबिक शराब, सिगरेट, अस्त्र-शस्त्र बनाने वाली तथा “ब्याजखोरी एवं जुआ-सट्टा” करने वाली कम्पनियाँ “हराम” मानी गई हैं।

भारत में इस्लामिक बैंक अथवा इस्लामिक फ़ाइनेंस (यानी शरीयत के अनुसार चलने वाले संस्थानों) की स्थापना के प्रयास 2005 से ही शुरु हो गये थे जब रिज़र्व बैंक ने “इस्लामिक बैंक” की उपयोगिता एवं मार्केट के बारे में पता करने के लिये, आनन्द सिन्हा की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था। इसके बाद राजिन्दर सच्चर की अध्यक्षता में आयोग बनाया गया, जिसने निष्कर्ष निकाला कि भारत के 50% से अधिक मुस्लिम विभिन्न फ़ायनेंस योजनाओं एवं शेयर निवेश के बाज़ार से बाहर हैं, क्योंकि उनकी कुछ धार्मिक मान्यताएं हैं। इस्लामिक बैंक की स्थापना को शुरु में केरल के मलप्पुरम से शुरु करने की योजना थी, लेकिन डॉ सुब्रहमण्यम स्वामी ने केरल हाईकोर्ट में याचिका दायर करके एवं विभिन्न अखबारों में लेख लिखकर बताया कि “इस्लामिक बैंक” की अवधारणा न तो भारतीय रिजर्व बैंक के मानदण्डों पर खरा उतरता है, और न ही एक “सेकुलर” देश होने के नाते संविधान में फ़िट बैठता है, तब “फ़िलहाल” (जी हाँ फ़िलहाल) इसे ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया है, परन्तु शरीया-50 इंडेक्स को मुम्बई स्टॉक एक्सचेंज (लिस्ट यहाँ देखें…) में लागू कर ही दिया गया है।

स्वाभाविक तौर पर कुछ सवाल तथाकथित शरीयत आधारित इंडेक्स को लेकर खड़े होते हैं – जैसे,

1) भारत एक घोषित धर्मनिरपेक्ष देश है (ऐसा संविधान में भी लिखा है), फ़िर “शरीयत” एवं धार्मिक आधार पर इंडेक्स शुरु करने का क्या औचित्य है? क्या ऐसा ही कोई “गीता इंडेक्स” या “बाइबल इंडेक्स” भी बनाया जा सकता है?

2) भारत या विश्व की कौन सी ऐसी प्रायवेट कम्पनी है, जो “ब्याजखोरी” पर नहीं चलती होगी?

3) पाकिस्तान व सऊदी अरब अपने-आप को इस्लाम का पैरोकार बताते फ़िरते हैं, मैं जानने को उत्सुक हूं (कोई मुझे जानकारी दे) कि क्या पाकिस्तान में सिगरेट बनाने-बेचने वाली कोई कम्पनी कराची स्टॉक एक्सचेंज में शामिल है या नहीं?

4) कृपया जानकारी जुटायें कि क्या सऊदी अरब में किसी अमेरिकी शस्त्र कम्पनी के शेयर लिस्टेड हैं या नहीं?

5) क्या शराब बनाने वाली कोई कम्पनी बांग्लादेश अथवा इंडोनेशिया के स्टॉक एक्सचेंज में शामिल है या नहीं? या वहाँ की किसी “इस्लामिक” व ईमानदारी से शरीयत पर चलने वाली किसी कम्पनी की पार्टनरशिप “ब्याजखोरी” करने वाले किसी संस्थान से तो नहीं है?


इन सवालों के जवाब इस्लामिक जगत के लिये बड़े असहज सिद्ध होंगे और शरीयत का नाम लेकर मुसलमानों को बेवकूफ़ बनाने की उनकी पोल खुल जायेगी। भारत में शरीयत आधारित इंडेक्स शुरु करने का एकमात्र मकसद सऊदी अरब, कतर, शारजाह जैसे खाड़ी देशों से पैसा खींचना है। अभी भारत में अंडरवर्ल्ड का पैसा हवाला के जरिये आता है, फ़िर दाउद इब्राहीम एवं अल-जवाहिरी का पैसा “व्हाइट मनी” बनकर भारत आयेगा। ज़ाहिर है कि इसमें भारतीय नेताओं के भी हित हैं, कुछ के “धार्मिक वोट” आधारित हित हैं, जबकि कुछ के “आर्थिक हित” हैं। भारत से भ्रष्ट तरीकों से जो पैसा कमाकर दुबई भेजा जाता है और सोने में तब्दील किया जाता है, वह अब “रुप और नाम” बदलकर वापस भारत में ही शरीयत आधारित इंडेक्स की कम्पनियों में लगाया जायेगा। बेचारा धार्मिक मुसलमान सोचेगा कि यह कम्पनियाँ और यह शेयर तो बड़े ही “पवित्र” और “शरीयत” आधारित हैं, जबकि असल में यह पैसा भारत में हवाला के पैसों के सुगम आवागमन के लिये होगा और इसमें जिन अपराधियों-नेताओं का पैसा लगेगा, उन्हें न तो इस्लाम से कोई मतलब है और न ही शरीयत से कोई प्रेम है।

कम्पनियाँ शरीयत आधारित मॉडल पर “धंधा” कर रही हैं या नहीं इसे तय करने का पूरा अधिकार सिर्फ़ और सिर्फ़ TASIS को दिया गया है, जिसमें कुरान व शरीयत के विशेषज्ञ(?) लोगों की एक कमेटी है, जो बतायेगी कि कम्पनी शरीयत पर चल रही है या नहीं। यानी इस बात की कोई गारण्टी नहीं है कि भविष्य में देवबन्द से कोई मौलवी अचानक किसी कम्पनी के खिलाफ़ कोई फ़तवा जारी कर दे तो किसकी बात मानी जायेगी, TASIS के पैनल की, या देबवन्द के मौलवी की? मान लीजिये किसी मौलवी ने फ़तवा दिया कि डाबर कम्पनी का शहद खाना शरीयत के अनुसार “हराम” है तो क्या डाबर कम्पनी को शरीया इंडेक्स से बाहर कर दिया जायेगा? क्योंकि देवबन्द का कोई भरोसा नहीं, पता नहीं किस बात पर कौन सा अजीबोगरीब फ़तवा जारी कर दे… (हाल ही में एक फ़तवे में कहा गया है कि यदि शौहर अपनी पत्नी को मोबाइल पर तीन बार तलाक कहे और यदि किसी वजह से, अर्थात नेटवर्क में खराबी या लो-बैटरी के कारण पत्नी “तलाक” न सुन सके, इसके बावजूद वह तलाक वैध माना जायेगा, अब बताईये भला… पश्चिम की आधुनिक तकनीक से बना मोबाइल तो शरीयत के अनुसार “हराम” नहीं है लेकिन उस पर दिया गया तलाक पाक और शुद्ध है, ऐसा कैसे?)

बहरहाल, बात हो रही थी इस्लामिक बैंकिंग व शरई इंडेक्स की – हमारे देश में एक तो वैसे ही बैंकिंग सिस्टम पर निगरानी बेहद घटिया है एवं बड़े आर्थिक अपराधों के मामले में सजा का प्रतिशत लगभग शून्य है। एक उदाहरण देखें – देश के सर्वोच्च पद पर आसीन प्रतिभादेवी सिंह पाटिल के खिलाफ़ उनके गृह जिले में आर्थिक अपराध के मामले पंजीबद्ध हैं। प्रतिभा पाटिल एवं उनके रिश्तेदारों ने एक समूह बनाकर “सहकारी बैंक” शुरु किया था, प्रतिभा पाटिल इस बैंक की अध्यक्षा थीं उस समय इनके रिश्तेदारों को बैंक ने फ़र्जी और NPA लोन जमकर बाँटे। ऑडिट रिपोर्ट में जब यह बात साबित हो गई, तो रिज़र्व बैंक ने इस बैंक की मान्यता समाप्प्त कर दी। रिपोर्ट के अनुसार बैंक के सबसे बड़े 10 NPA कर्ज़दारों में से 6 प्रतिभा पाटिल के नज़दीकी रिश्तेदार हैं, जिन्होंने बैंक को चूना लगाया… (सन्दर्भ- The Difficulty of Being Good : on the Subtle art of Dharma, Chapter Draupadi -- Page 59-60 – लेखक गुरुचरण दास)

ऐसी स्थिति में अरब देशों से शरीयत इंडेक्स के नाम पर आने वाला भारी पैसा कहाँ से आयेगा, कहाँ जायेगा, उसका क्या और कैसा उपयोग किया जायेगा, उसे कैसे व्हाइट में बदला जायेगा, इत्यादि की जाँच करने की कूवत भारतीय एजेंसियों में नहीं है। असल में यह सिर्फ़ भारत के मुसलमानों को भरमाने और बेवकूफ़ बनाने की चाल है, ज़रा सोचिये किंगफ़िशर एयरलाइन्स के नाम से माल्या की कम्पनी किसी इस्लामी देश के शेयर बाज़ार में लिस्टेड होती है या फ़िर ITC होटल्स नाम की कम्पनी शरीयत इंडेक्स में शामिल किसी कम्पनी की मुख्य भागीदार बनती है तो क्या यह शरीयत का उल्लंघन नहीं होगा? विजय माल्या भारत के सबसे बड़े शराब निर्माता हैं और ITC सबसे बड़ी सिगरेट निर्माता कम्पनी, तब इन दोनों कम्पनियों के शेयर, भागीदारी, संयुक्त उपक्रम इत्यादि जिस भी कम्पनी में हों उसे तो “हराम” माना जाना चाहिये, लेकिन ऐसा होता नहीं है, देश के कई मुस्लिम व्यक्ति इनसे जुड़ी कम्पनियों के शेयर भी लेते ही हैं, परन्तु शरीया इंडेक्स, अरब देशों से पैसा खींचने, यहाँ का काला पैसा सफ़ेद करने एवं भारत के मुस्लिमों को “बहलाने” का एक हथियार भर है। मुस्लिमों को शेयर मार्केट में पैसा लगाकर लाभ अवश्य कमाना चाहिये, भारतीय मुस्लिमों की आर्थिक स्थिति सुधरे, ऐसा कौन नहीं चाहता… लेकिन इसके लिए शरीयत की आड़ लेना, सिर्फ़ मन को बहलाने एवं धार्मिक भावनाओं से खेलना भर है। हर बात में “धर्म” को घुसेड़ने से अन्य धर्मों के लोगों के मन में इस्लाम के प्रति शंका आना स्वाभाविक है…

एक अन्य उदाहरण :- यदि तुम जिन्दा रहे तो हम तुम्हें इतना पैसा देंगे, और यदि तुम तय समय से पहले मर गये तो हम तुम्हारे परिवार को इतने गुना पैसा देंगे…। या फ़िर ऐसा करो कि कम किस्त भरो… जिन्दा रहे तो सारा पैसा हमारा, मर गये तो कई गुना हम तुम्हें देंगे… जीवन बीमा कम्पनियाँ जो पॉलिसी बेचती हैं, वह भी तो एक प्रकार से “मानव जीवन पर खेला गया सट्टा” ही है, तो क्या भारत के मुसलमान जीवन बीमा करवाते ही नहीं हैं? बिलकुल करवाते हैं, भारी संख्या में करवाते हैं, तो क्या वे सभी के सभी शरीयत के आधार पर “कुकर्मी” हो गये? नहीं। तो फ़िर इस शरीयत आधारित इंडेक्स की क्या जरुरत है?

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की शाखाएं चुन-चुनकर और जानबूझकर मुस्लिम बहुल इलाकों (बंगाल के मुर्शिदाबाद, बिहार के किशनगंज  एवं केरल के मलप्पुरम ) में खोलने की कवायद जारी है, कांग्रेस शासित राज्यों में से कुछ ने नौकरियों में 5% आरक्षण मुसलमानों को दे दिया है, केन्द्र सरकार भी राष्ट्रीय सिविल परीक्षाओं में मुसलमानों के लिये 5% आरक्षण पर विचार कर रही है, केरल-बंगाल-असम के अन्दरूनी इलाकों में अनधिकृत शरीयत अदालतें अपने फ़ैसले सुनाकर, कहीं प्रोफ़ेसर के हाथ काट रही हैं तो कहीं देगंगा में हिन्दुओं को बस्ती खाली  करने के निर्देश दे रही हैं…। ये क्या हो रहा है, समझने वाले सब समझ रहे हैं…

“एकजुट जनसंख्या” और “मजबूत वोट बैंक” की ताकत… मूर्ख हिन्दू इन दोनों बातों के बारे में क्या जानें… उन्हें तो यही नहीं पता कि OBC एवं SC-ST के आरक्षण कोटे में से ही कम करके, “दलित ईसाईयों”(?) (पता नहीं ये क्या चीज़ है) और मुसलमानों को आरक्षण दे दिया जायेगा… और वे मुँह तकते रह जायेंगे।

बहरहाल, सरकार तो कुछ करेगी नहीं और भाजपा सोती रहेगी… लेकिन अब कम से कम हिन्दुओं को यह तो पता है कि शरीयत इंडेक्स में शामिल उन 50 कम्पनियों के शेयर “नहीं” खरीदने हैं… शायद तंग आकर कम्पनियाँ खुद ही कह दें, कि भई हमें शरीयत इंडेक्स से बाहर करो… हम पहले ही खुश थे…। बड़ा सवाल यह है कि क्या मुनाफ़े के भूखे, “व्यापारी मानसिकता वाले, राजनैतिक रुप से बिखरे हुए हिन्दू” ऐसा कर पाएंगे?


चलते-चलते : मजे की बात तो यह है कि, हर काम शरीयत और फ़तवे के आधार पर करने को लालायित मुस्लिम संगठनों ने अभी तक यह माँग नहीं की है कि अबू सलेम को पत्थर मार-मार कर मौत की सजा दी जाये अथवा अब्दुल तेलगी को ज़मीन में जिन्दा गाड़ दिया जाये… या सूरत के MMS काण्ड के चारों मुस्लिम लड़कों के हाथ काट दिये जायें…। ज़ाहिर है कि शरीयत अथवा फ़तवे का उपयोग (अक्सर मर्दों द्वारा) सिर्फ़ “अपने फ़ायदे” के लिये ही किया जाता है, सजा पाने के लिये नहीं… उस समय तो भारतीय कानून ही बड़े “फ़्रेण्डली” लगते हैं…।
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जैसा कि सभी जानते हैं, सभी कम्पनियाँ अपने विज्ञापनों के लिये कुछ नामी-गिरामी व्यक्तियों को ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाती हैं ताकि उनके उत्पाद खूब बिकें और उनकी बाज़ार में एक विशिष्ट पहचान बने…। मार्केटिंग गुरुओं की मानें, तो एक होती है Positive ब्राण्डिंग और एक होती है Negative ब्राण्डिंग… पॉजिटिव ब्राण्डिंग में विज्ञापनकर्ता उस हस्ती को लेकर अपने उत्पाद की खूबियाँ पेश करता है, जबकि निगेटिव ब्राण्डिंग में कम्पनी सिर्फ़ उत्पाद की खूबियाँ गिनाती है लेकिन बैकग्राउण्ड में किसी नकारात्मक छवि को रखकर… जैसे कि “बिनानी सीमेण्ट भूकम्परोधी मकान बनाने के काम आयेगा”, इसमें बिनानी सीमेण्ट  उत्पाद है, लेकिन भूकम्प विलेन है जिसके जरिये डराकर ग्राहकों को बिनानी सीमेण्ट खरीदने को कहा गया है… दाँतों की सड़न “डराऊ विलेन” है तो नमक वाला कोलगेट उसका उत्पाद है… ऐसे कई विज्ञापन हैं जिनमें निगेटिव ब्राण्डिंग कैम्पेन किया जाता है…


जबसे पिछले कुछ दिनों से दिग्विजयसिंह ने हिन्दुओं एवं संघ के खिलाफ़ बयानबाजी  शुरु की है, तभी से कुछ कम्पनियों की बाँछें खिल गई हैं, उन्हें बैठे-बिठाये, फ़ोकट में एक निगेटिव ब्राण्ड मिल गया है…। हाल ही में सेंटर-फ़्रेश कम्पनी  के सीईओ चम्पकलाल शाह ने कहा कि जल्दी ही हम इस च्युइंगगम का नया ब्राण्ड बाज़ार में उतारेंगे जिसकी पंचलाइन होगी… “सेण्टर-फ़्रेश खाओ, मुँह की दुर्गन्ध भगाओ…” पत्रकारों द्वारा इसका कारण विस्तार से बताने की मांग पर शाह ने कहा कि “जब भी दिग्विजय सिंह मुँह खोलते हैं, हिन्दुओं को तीखी बदबू का सामना करना पड़ता है…” अतः हमारे हिन्दुस्तान के बड़े हिन्दू बाज़ार को देखते हुए इस च्युइंगगम के सफ़ल होने के बहुतेरे आसार हैं। सेण्टर फ़्रेश कम्पनी की विज्ञापन एजेंसी चोरगेट-खामोलिव कम्पनी का कहना है कि “इस पंचलाइन के जरिये ही हम मुँह से बदबू खत्म करने वाले प्रोडक्ट के मार्केट पर कब्जा कर लेंगे… चूंकि दिग्गी “राजा” भी रहे हैं इसलिये वे कोई पैसा तो लेंगे नहीं… हम उनका चित्र भी विज्ञापन में नहीं दिखाएंगे… हिन्दुओं के लिये सिर्फ़ उनका नाम ही काफ़ी है। मुँह की दुर्गन्ध रोकने वाले इस धांसू विज्ञापन पर दिग्विजयसिंह का कॉपीराइट नहीं करवाया जायेगा, ताकि भविष्य में यदि राहुल गाँधी भी चाहें तो इस विज्ञापन में लिये जा सकते हैं…”। वैसे विश्वस्त सूत्र यह भी बताते हैं कि राहुल गाँधी  को ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाने के लिये भी दो कम्पनियों में खींचतान हो रही है, पहली है “बोर्नविटा” (बच्चों के शारीरिक व मानसिक विकास हेतु प्रतिबद्ध) एवं मेन्टोस  (दिमाग की बत्ती जला दे…), इस मामले में बोर्नविटा कम्पनी का दावा अधिक मजबूत नज़र आता है, क्योंकि उन्होंने 40 वर्ष के ऐसे अधेड़ों के लिये नया प्रोडक्ट लांच किया है जिनका मानसिक विकास ठीक से नहीं हो पाया है।


बहरहाल, सेण्टर फ़्रेश कम्पनी की इन योजनाओं का खुलासा होने के बाद एक कार परफ़्यूम कम्पनी “एम्बीप्योर”  ने भी दिग्विजय सिंह को अपना ब्राण्ड एम्बेसेडर घोषित कर दिया है। कम्पनी के मैनेजिंग डायरेक्टर सुगन्धीलाल शर्मा ने कल एक पत्रकार वार्ता में बताया कि हम चोरगेट-खामोलिव के इस विज्ञापन से बहुत प्रभावित हैं और हमने आपस में टाई-अप करने का फ़ैसला किया है। चूंकि दोनों कम्पनियों के उत्पाद अलग-अलग हैं इसलिये हमारा कोई व्यावसायिक टकराव नहीं होगा, इस पर सेंटर फ़्रेश कम्पनी के चम्पकलाल शाह ने अपनी मुहर लगा दी है…। भविष्य में जब भी दिग्विजय सिंह कहीं भी पत्रकार वार्ता करेंगे, तो उनके माइक के पास ही सेंटर-फ़्रेश का पैकेट रखा जायेगा (वह एक बयान देंगे, दो गोली खायेंगे), तथा हॉल में मौजूद प्रत्येक पत्रकार को एक-एक “एम्बीप्योर स्प्रे” का पाउच दिया जायेगा। जैसे ही दिग्गी राजा प्रेस कान्फ़्रेन्स शुरु करेंगे, कम्पनी के प्रतिनिधि पूरे हॉल में एम्बीप्योर की 3 लीटर वाली बोतल से छिड़काव करेंगे…। हम चाहते हैं कि दिग्विजय सिंह कश्मीर से कन्याकुमारी तक कम से कम 300 पत्रकार वार्ताएं करें और हिन्दुओं के खिलाफ़ बदबू फ़ैलाएं, ताकि यह बदबू हॉल से बाहर निकलकर अखबारों के जरिये, लाखों कारों और बसों और ट्रेनों में फ़ैल जाये… फ़िर एम्बीप्योर को परफ़्यूम बाज़ार पर कब्जा जमाते देर नहीं लगेगी…

विशेष संवाददाता से यह भी ज्ञात हुआ है कि कई अन्य विज्ञापन कम्पनियाँ भी कांग्रेस के विभिन्न नेताओं से बहुत प्रभावित हैं। जिस प्रकार बिनानी सीमेण्ट वाले भूकम्प का डर दिखाकर धंधा कर रहे हैं, उसी प्रकार जेपी सीमेण्ट वालों ने अशोक चव्हाण को ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाने का फ़ैसला किया है। जेपी कम्पनी के विज्ञापन प्रमुख डॉ चट्टान सिंह हटेला ने कहा कि हम अपने सीमेण्ट की बोरियों पर एक तरफ़ अशोक चव्हाण का व दूसरी तरफ़ आदर्श सोसायटी  की विशाल इमारत का चित्र छापेंगे… चूंकि सभी लोग जानते हैं कि 5-7 मंजिला बिल्डिंग की अनुमति के बावजूद यह इमारत 23 मंजिल बन गई… तो ऐसे में सीमेण्ट की मजबूती तो अपने-आप स्थापित होती है… ऊपर से अशोक चव्हाण का चित्र भी रहेगा तो ग्राहक को सन्तुष्टि और विश्वास भी रहेगा…।


उधर चेन्नै में जूता कम्पनी अदिदास  के श्री चरणदास मारन ने भी माना कि हाल ही में सम्पन्न कम्पनी की बोर्ड मीटिंग में सुरेश कलमाडी को ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाने पर गम्भीरतापूर्वक विचार हुआ। चूंकि “कलमाडी और खेल सामान” की छवि आपस में खासी गुँथ चुकी है, ऐसी स्थिति में हम साइना नेहवाल जैसी नई लड़की को जूतों का ब्राण्ड एम्बेसेडर कैसे बना सकते हैं। चरणदास जी ने आगे बताया कि हम अपने ग्राहकों को यह विशेष छूट भी प्रदान करेंगे कि अदिदास कम्पनी का जूता पहनने वाले व्यक्ति, यदि कलमाडी पर अदिदास का ही नया-पुराना कोई भी जूता फ़ेंकते हैं तो उनके पूरे परिवार को एक-एक जोड़ी जूते मुफ़्त दिये जायेंगे, चाहे वह निशाने पर लगे या न लगे, यानी ग्राहकों का दोहरा फ़ायदा होगा, “आम के आम, गुठलियों के दाम”… हालांकि कलमाडी  को ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाने के लिये अदिदास के साथ फ़ेविकोल कम्पनी की भी खींचतान चल रही है, फ़ेविकोल कम्पनी के मार्केटिंग मैनेजर ने विज्ञप्ति जारी करके कहा है कि चूंकि कलमाडी इतने विवादों, छापों के बावजूद अपनी कुर्सी से चिपके हुए हैं, अतः फ़ेविकोल के लिये उनसे बेहतर ब्राण्ड एम्बेसेडर नहीं मिलेगा… अब यह देखना रोचक होगा कि अदिदास या फ़ेविकोल में से किस कम्पनी से कलमाडी की सेटिंग सही बैठती है।



फ़िलहाल पुख्ता सूचना सिर्फ़ दिग्विजय सिंह के बारे में ही प्राप्त हुई है, यूपीए सरकार के अन्य मंत्रियों की विभिन्न कम्पनियों से बातचीत चल रही है। शरद पवार को चूंकि अब पैसों का कोई मोह नहीं रह गया है इसलिये उन्होंने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के आग्रह पर समाजसेवा का निर्णय लिया है, शरद पवार जल्दी ही “आओ मिलकर डायबिटीज़ रोकें…”  वाले जनसेवी विज्ञापन में नज़र आयेंगे। एसोसियेशन ने कहा है कि शकर के भावों और शुगर लॉबी से पवार के “मीठे सम्बन्धों” को देखते हुए आम जनता को डायबिटीज़ के प्रति जागरुक करने में यह विज्ञापन अहम भूमिका निभायेगा। वहीं गले की खराश मिटाकर आवाज़ खोलने वाली गोली “विक्स हॉल्स” की ममता बैनर्जी को विज्ञापन में लेने की योजना है, ताकि वे अपनी सभाओं में चिल्लाते समय उन गोलियों का उपयोग करें। जबकि ए राजा भले ही मंत्रिमण्डल से बाहर कर दिये गये हों, विज्ञापन कम्पनियों के मार्केट में उनकी जबरदस्त माँग बनी हुई है, टाटा, वोडाफ़ोन एवं रिलायंस कम्युनिकेशन्स में उन्हें अपना ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाने की होड़ लगी है, खबर है कि टाटा व अम्बानी के बीच समझौता हो गया है, कि रतनलाल टाटा, ए राजा को जबकि अम्बानी, नीरा राडिया को अपना ब्राण्ड एम्बेसेडर बनायेंगे।

तात्पर्य यह है कि आने वाले समय में यदि आपको टीवी के परदे पर धोनी, तेण्डुलकर, शाहरुख, अमिताभ की बजाय “सच्चे जनसेवक” दिखाई दें तो चौंकियेगा नहीं… यह विज्ञापन कम्पनियों की नई मार्केटिंग रणनीति है… जो बहुत “मारक” सिद्ध होगी।


चलते-चलते – एक ब्रेकिंग न्यूज़ अभी-अभी प्राप्त हुई है कि भारतीय लोककला संस्कृति बोर्ड ने सोनिया गाँधी को अपना ब्राण्ड एम्बेसेडर नियुक्त कर दिया है… वे भारत के ग्रामीण इलाकों में “कठपुतली कला” को लुप्त होने से बचाने के लिये कैम्पेन करेंगी। चुनाव आयोग, सीवीसी, प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति जैसी चार-चार कठपुतलियों को एक साथ साधने की उनकी विशेष दक्षता को देखते हुए इस महान लोककला के पुनर्जीवित होने एवं इसका भविष्य उज्जवल होने की प्रचुर सम्भावनाएं हैं।

उन सभी गुलामों को अंग्रेजी नववर्ष की शुभकामनाएं… जो नये वर्ष में भी न “राजा” से मुक्ति चाहते हैं, न ही “रानी” से…

(समाप्त)
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फ़ुट-नोट :- वर्ष भर तो शर्मनिरपेक्षता, भोंदू युवराज, बौद्धिक खतनाग्रस्त जीवों तथा “हिन्दुओं द्वारा खाई गई लतखोरी की खबरें” आपको दूंगा ही, साल की पहली पोस्ट कुछ लाइट मूड में हो जाये…। यह पोस्ट इन्दौर के मेरे मित्र वाणी के धनी सुप्रसिद्ध एंकर भाई संजय पटेल के आग्रह पर लिखी है, और उन्हें ही समर्पित है…। आदरणीय कीर्तीश भट्ट, शिवकुमार मिश्र, आलोक पुराणिक, अनूप शुक्ल, सतीश पंचम  इत्यादि जैसे विद्वतजन इस पोस्ट में चाहें तो उचित सुधार करें… इस फ़ील्ड में यह मेरी “टेम्परेरी अतिक्रमण” करने की बेढंगी हिमाकत भर है, इनके सामने मैं कुछ भी नहीं हूं… ये पोस्ट तो बस ऐसे ही…
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