desiCNN - Items filtered by date: मई 2010
मुझे पता है कि शीर्षक पढ़कर आप चौंकेंगे, लेकिन यह सच है। गुजरात से बाहर रहने वाले मुस्लिम सोचते होंगे, कि पता नहीं गुजरात में नरेन्द्र मोदी नाम का आदमी उनकी कौम पर कितने ज़ुल्म ढाता होगा और तीस्ता “जावेद” सीतलवाड जैसी समाजसुधारिका(?) तथा राजदीप और “बुरका” दत्त जैसे स्वनामधन्य(?) पत्रकार दिन-रात जिस खलनायक(?) को गरियाते हुए नहीं थकते, पता नहीं संघ-भाजपा यह व्यक्ति गुजरात में मुस्लिमों पर कितने अत्याचार करता होगा।

लेकिन अब समूचे भारत के नकली सेकुलरों और फ़र्जी लाल झण्डे वालों को यह सुनकर बड़ा दुख होगा कि योजना आयोग ने गुजरात के मुख्यमंत्री के कार्यों से खुश होकर गुजरात के योजना व्यय को बढ़ाकर 30,000 करोड़ रुपये कर दिया है, जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 6,500 करोड़ रुपये ज्यादा है… अर्थात गुजरात की 50वीं वर्षगाँठ पर उसे लगभग 25% का अतिरिक्त पैकेज दिया गया है। ऐसा नहीं कि यह सब इतनी आसानी से मिल गया, इसके लिये नरेन्द्र मोदी ने गुहार लगाई और प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ा, वरना योजना आयोग की सदस्या मैडम सईदा हमीद ने "गुजरात में मुस्लिमों से भेदभाव" का बहाना बनाकर इसमें अड़ंगे लगाने की भरपूर कोशिशें कर ली थीं, यह मैडम पूर्व में जब राष्ट्रीय महिला आयोग में थीं तब भी इन्होंने गुजरात की योजनाओं में काफ़ी टंगड़ी मारी थी।

http://www.narendramodi.in/news/news_detail/733

गत दिनों योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया और नरेन्द्र मोदी की बैठक के बाद पत्रकारों से मुखातिब होते हुए अहलूवालिया ने कहा कि “गुजरात योजना व्यय में हुई इस बढ़ोतरी का हकदार भी है और वह इस विशाल व्यय को झेलने की क्षमता भी रखता है…”। मोंटेक ने आगे बताया कि गुजरात का राजस्व गत वर्ष के 74% से बढ़कर 81% हो गया है तथा VAT कलेक्शन में 42% की जबरदस्त उछाल आई है। हाल ही में राज्य विधानसभा ने “स्वर्णिम गुजरात” योजना के तहत उत्तरी गुजरात में 500 मेगावाट बिजली उत्पादन करने वाला एक सौर ऊर्जा प्लाण्ट लगाने, 82 तहसीलों में अंडरग्राउण्ड सीवेज लाइन बिछाने की बड़ी योजना पर काम शुरु करने को हरी झण्डी दे दी है।

(जब देश में चारों तरफ़ एक से बढ़कर एक निकम्मे मुख्यमंत्री और लुटेरे IAS अफ़सरों की गैंग, भारत के विकास में अड़ंगे लगाती दिखाई देती है ऐसे में पिछले 10 साल से गुजरात की भलाई हेतु अनथक काम करता नरेन्द्र मोदी नामक यह राष्ट्रवाद का योद्धा सहज ही ध्यान आकर्षित कर लेता है…)


इसी के साथ केन्द्र सरकार ने सरदार सरोवर से सम्बन्धित 39240 करोड़ रुपये के संशोधित योजना व्यय को भी मंजूरी दे दी। अब कांग्रेस का अदभुत विकास और गरीबों का साथ देखिये - कच्छ और सौराष्ट्र के ढाई करोड़ लोगों के पेयजल के लिये इस योजना को 1986-87 में बनाया गया था, तब अनुमान था कि इसकी लागत 6406 करोड़ रुपये होगी, लेकिन राजनीति, श्रेय लेने की होड़ (योजना का नाम किसी गाँधी के नाम पर करने) तथा लालफ़ीताशाही ने 23 साल में भी इसे पूरा होने नहीं दिया और अब इसकी लागत बढ़कर 39240 करोड़ रुपये हो गई है। (अंग्रेजी में "PRO" का विपरीत शब्द होता है "CON", इसलिये कोई आश्चर्य नहीं कि "PROGRESS" का उलटा होता है "CONGRESS"...…)

http://www.livemint.com/2010/05/27231219/Gujarat-to-get-more-funds-afte.html?d=1

चलिये आईये अब देखते हैं कि आखिर गुजरात में मोदी ने मुसलमानों पर कौन-कौन से अत्याचार किये हैं, जिसका ईनाम उन्हें मिला है –

पेश किये जा रहे आँकड़े और तथ्य मनगढ़न्त नहीं हैं, बल्कि केन्द्र सरकार द्वारा गठित सच्चर कमीशन की रिपोर्ट में से लिये गये हैं। जी हाँ, “गुजरात में मुस्लिमों पर इतने ज़ुल्म ढाये गये हैं कि गुजरात के मुसलमान देश के बाकी सभी हिस्सों के मुसलमानों के मुकाबले शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के मामले में आगे निकल गये हैं…”।

1) गुजरात में मुस्लिमों का साक्षरता प्रतिशत 73%, जबकि बाकी देश में 59%।

2) ग्रामीण गुजरात में मुस्लिम लड़कियों की साक्षरता दर 57%, बाकी देश में 43%।

3) गुजरात में प्राथमिक शाला पास किये हुए मुस्लिम 74%, जबकि देश में 60%।

4) गुजरात में हायर सेकण्डरी पास किये मुस्लिमों का प्रतिशत 45%, देश में 40%।

शिक्षा सम्बन्धी सारे के सारे आँकड़े मुस्लिम हितों की कथित पैरवी करने वाले, मुस्लिम हितैषी(?) पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश और बिहार से कोसों आगे हैं।

1) गुजरात के जिन गाँवों में मुस्लिम आबादी 2000 से अधिक है वहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र की उपलब्धता है 89%, जबकि बाकी देश में 70%।

2) जिन गाँवों में मुस्लिम आबादी 1000 से 2000 के बीच है वहाँ स्वास्थ्य केन्द्र का प्रतिशत 66% है, जबकि देश का औसत है 43%।

3) जिन गाँवों में मुस्लिम आबादी 1000 से कम है वहाँ 53%, राष्ट्रीय औसत है सिर्फ़ 20%।

शायद राहुल गाँधी आपको बतायेंगे, कि उनके पुरखों ने बीते 60 साल में, भारत के ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने के लिये कितने महान कार्य किये हैं।

1) गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में मुस्लिमों की प्रति व्यक्ति आय 668 रुपये हैं, पश्चिम बंगाल में 501, आंध्रप्रदेश में 610, उत्तरप्रदेश में 509, मध्यप्रदेश में 475 और मीडिया के दुलारे जोकर यानी लालू द्वारा बर्बाद किये गये बिहार में 400 रुपये से भी कम।

2) गुजरात के शहरों में भी मुस्लिमों की बढ़ती आर्थिक सम्पन्नता इसी से प्रदर्शित होती है कि गुजराती मुस्लिमों के बैंक अकाउंट में औसत 32,932 रुपये की राशि है, जबकि यही औसत पश्चिम बंगाल में 13824/- तथा आसाम में 26,319/- है।

“लाल झण्डे वाले बन्दर” हों या “पंजा छाप लुटेरे’, इनकी राजनीति, रोजी-रोटी-कुर्सी इसी बात से चलती है कि किस तरह से भारत की जनता को अधिक से अधिक समय तक गरीब और अशिक्षित बनाये रखा जाये। क्योंकि उन्हें पता है कि जिस दिन जनता शिक्षित, समझदार और आत्मनिर्भर हो जायेगी, उसी दिन “लाल झण्डा” और “परिवार की चमचागिरी” दोनों को ज़मीन में दफ़ना दिया जायेगा। इसीलिये ये दोनों शक्तियाँ मीडिया को पैसा खिलाकर या उनके हित साधकर अपने पक्ष में बनाये रखती है, और नरेन्द्र मोदी जैसों के खिलाफ़ “एक बिन्दु आलोचना अभियान” सतत चलाये रखती हैं, हिन्दू आराध्य देवताओं, हिन्दू धर्मरक्षकों, संतों और शंकराचार्यों के विरुद्ध एक योजनाबद्ध घृणा अभियान चलाया जाता है, लेकिन जब गुजरात सम्बन्धी (उन्हीं की सरकार द्वारा गठित टीमों द्वारा पाये गये) आँकड़े और तथ्य उन्हें बताये जाते हैं तो वे बगलें झाँकने लगते हैं। ढीठता और बेशर्मी से बात तो ऐसे करते हैं मानो भारत के इतिहास में सिर्फ़ गुजरात में ही दंगे हुए, न पहले कभी कहीं हुए, न अब कभी होंगे

गुजरात के विकास के लिये नरेन्द्र मोदी को क्रेडिट देते समय मीडिया वालों का मुँह ऐसा हो जाता है, मानो उन्हें किसी ने उन्हें अरंडी के बीज का तेल पिला दिया हो। तीन-तीन चुनाव जीते हुए, दस साल से एक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे किसी व्यक्ति के खिलाफ़ इतिहास में आज तक कभी ऐसी उपेक्षा-अपमान-आलोचना नहीं आई होगी, न तो 15 साल में बिहार को चरने वाले लालू के… न ही दस साल राज करके मध्यप्रदेश को अंधेरे में धकेलने वाले दिग्गी राजा के…, परन्तु नरेन्द्र मोदी की गलती सिर्फ़ एक ही है (और आजकल यही सबसे बड़ी गलती भी मानी जाती है) कि वे हिन्दुत्ववादी-राष्ट्रवादी शक्तियों के साथ हैं। मजे की बात तो यह है कि गुजरात के इन नतीजों के बावजूद सच्चर कमेटी ने मुसलमानों को पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण की सिफ़ारिश कर दी है, जबकि सच्चर साहब को केन्द्र सरकार से सिफ़ारिश करना चाहिये थी कि नरेन्द्र मोदी के “थोड़े से गुण” देश के बाकी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और केन्द्रीय मंत्रियों के दिमागों में भरे जायें…

बहरहाल, मुझे डर है कि योजना आयोग द्वारा गुजरात की तारीफ़ तथा इस शानदार बोनस और प्रमोशन के कारण कहीं मनमोहन सिंह अपनी “नौकरी” न खो बैठें। जी हाँ नौकरी… क्योंकि वैसे भी वे आजीवन “यस-मैन” ही रहे हैं, कभी रिजर्व बैंक के, कभी वित्त मंत्रालय के, कभी IMF के, कभी विश्व बैंक के… और अब “भरत” की तरह खड़ाऊं लिये तैयार बैठे हैं कि कब “राहुल बाबा” आयें और उन्हें रिटायर करें…

सन्दर्भ : http://www.indianexpress.com/news/hard-facts-to-face/622193/1

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1) कुछ माह पहले ही अमेरिका में एक मेजर निदाल मलिक हसन ने अपने एयरबेस पर अंधाधुंध गोलियाँ बरसाकर 36 अमेरिकियों को हताहत किया था। निदाल मलिक हसन अमेरिकी सेना में एक मनोचिकित्सक था, और गिरफ़्तारी के बाद उसका कथन था कि वह अमेरिका द्वारा ईराक और अफ़गानिस्तान में की गई कार्रवाईयों की वजह से निराशा की अवस्था में था और उसे अमेरिका का यह हमला “इस्लाम” पर हमले के समान लगा।  पिछले कुछ समय से मेजर निदाल मलिक, इस्लामिक बुद्धिजीवी(?) अनवर-अल-अवलाकी के सम्पर्क में था, उससे निर्देश लेता था और उसकी इस्लामिक शिक्षाओं(?) से बेहद प्रभावित था…(खुद मनोचिकित्सक है, और शिक्षा ले रहा है अनवर अवलाकी से? है ना मजेदार बात…)


पूरा विवरण यहाँ देखें… http://f8ba48be.linkbucks.com

2) इसी तरह उच्च दर्जे की शिक्षा प्राप्त और पाकिस्तान के एयरफ़ोर्स अफ़सर बहरुल-हक के लड़के फ़ैज़ल शहजाद को अमेरिका से दुबई भागते वक्त हवाई जहाज में से गिरफ़्तार कर लिया गया (यहाँ देखें http://1d866b57.linkbucks.com)। फ़ैज़ल ने स्वीकार किया है कि उसी ने टाइम्स स्क्वेयर पर कार बम का विस्फ़ोट करने की योजना बनाई थी, क्योंकि अमेरिका उसे इस्लाम का दुश्मन लगता है। (http://4cfa0c9a.linkbucks.com)

इन दोनों मामलों में कुछ बातें समान है, और वह यह कि दोनों आतंकवादी अमेरिकी नागरिक बन चुके थे (अर्थात अमेरिका “उनका” देश था), दोनों अच्छे प्रतिष्ठित परिवारों से हैं, दोनों उच्च शिक्षित हैं, अमेरिका में स्थाई नौकरी कर रहे थे… लेकिन, लेकिन, लेकिन, लेकिन… दोनों ने प्रकारान्तर से यह स्वीकार किया कि उन्होंने यह हमले करके “इस्लाम” की सेवा की है। पिछले कुछ समय से अमेरिका में हुए आत्मघाती और हमले के षडयन्त्र की कुछ और घटनाएं देखिये –

1) गत दिसम्बर में फ़ोर्ट जैक्सन के मिलेट्री बेस में पाँच व्यक्तियों (यानी मुस्लिमों) को गिरफ़्तार किया गया, जब वे साउथ केरोलिना मिलेट्री बेस के लिये आये हुए खाने में जहर मिलाने की कोशिश कर रहे थे।

http://www.nypost.com/p/news/national/five_muslim_soldiers_arrested_over_zYTtFXIBnCecWcbGNobUEJ#ixzz0gEmjO5C8

2) 1 जून 2009 को अब्दुल हकीम मोहम्मद ने अरकंसास प्रान्त में दो अमेरिकी सैनिकों को गोली से उड़ा दिया।

3) अप्रैल 2009 में साउथ जर्सी में फ़ोर्ट डिक्स पर हमला करने का षडयन्त्र करते हुए चार मुस्लिम युवक धराये।

तात्पर्य यह कि अमेरिका में ऐसी घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, इसीलिये इनकी इस हरकत से यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि –

1) इस्लाम बड़ा या राष्ट्र बड़ा?

2) कोई व्यक्ति जिस देश का नागरिक है उसे अपने देश के प्रति वफ़ादार रहना चाहिये या अपने धर्म के प्रति?

3) यदि इतनी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी किसी व्यक्ति के दिल में अपने देश के प्रति (जहाँ से वह रोजी-रोटी कमा रहा है) प्रेम का भाव नहीं जागता, बल्कि उसके धर्म के प्रति ऐसा “अनुराग” जाग जाता है कि उसके लिये वह मरने-मारने पर उतारू हो जाता है, तो क्या फ़ायदा है ऐसी उच्च शिक्षा का?

4) “अपने” देश से गद्दारी करने के संस्कार, उन्हें कहाँ से मिले?

5) अच्छे खासे कमाते-खाते-पीते अचानक उसी देश के प्रति गद्दारी का भाव कहाँ से जागा, जहाँ की वे रोटी खा रहे हैं?

यह ब्रेन-वॉश किसने किया?

अब आते हैं, माधुरी गुप्ता मामले पर, जैसा कि सभी जानते हैं “गद्दार” माधुरी गुप्ता को जासूसी के आरोप में पुलिस ने गिरफ़्तार किया हुआ है और उससे पूछताछ जारी है। पूछताछ में पता चला है कि माधुरी के बैंक खातों में किसी भी प्रकार की “असामान्य एंट्रियाँ” नहीं पाई गई हैं, अतः यह गद्दारी, धन के लिये होने की सम्भावना कम लगती है। वहीं दूसरी ओर जाँच में यह सामने आया है कि माधुरी गुप्ता, इस्लामाबाद में एक पाकिस्तानी सेना के अफ़सर मुदस्सर राणा के प्रेम(?) में फ़ँसी हुई थी, और माधुरी ने लगभग 6 साल पहले ही इस्लाम कबूल कर लिया था। फ़रवरी 2010 में अफ़गानिस्तान में भारतीयों पर हुए हमले के सम्बन्ध में माधुरी ने तालिबान को मदद पहुँचाने वाली जानकारी दी थी।

माधुरी गुप्ता ने कुछ समय पहले भी खुलेआम एक इंटरव्यू में कहा था कि उसे पाकिस्तान और पाकिस्तानियों से “सहानुभूति” है। यह कैसी मानसिकता है? क्या धर्म बदलते ही राष्ट्र के प्रति निष्ठा भी बदल गई? इससे पहले भी अमेरिका के एडम गैडहॉन ने इस्लाम अपनाया था और बाकायदा टीवी पर एक टेप जारी करके अमेरिकी मुसलमानों से मेजर निदाल मलिक के उदाहरण से "कुछ सीखने"(?) की अपील की थी, अर्थात जिस देश में जन्म लिया, जो मातृभूमि है, जहाँ के नागरिक हैं… उसी पर हमला करने की साजिश रच रहे हैं और वह भी "इस्लाम" के नाम पर… ये सब क्या है? 

माधुरी गुप्ता के मामले में पाखण्ड और डबल-क्रास का उदाहरण भी देखिये, कि पाकिस्तान के मीडिया ने कहा कि “माधुरी गुप्ता एक शिया मुस्लिम है और उसने यह काम करके इस्लाम को नीचा दिखाया है”। यानी यहाँ भी शिया-सुन्नी वाला एंगल फ़िट करने की कोशिश की जा रही है…। सवाल उठता है कि सानिया मिर्ज़ा भी तो शिया मुस्लिम है, उसे अपनाने में तो भाभी-भाभी कहते हुए पाकिस्तानी मीडिया, बैंड-बाजे बजाकर आगे-आगे हो रहा है, तो माधुरी गुप्ता पर यह इल्ज़ाम क्यों लगाया जा रहा है कि “वह एक शिया है…”। इससे तो ऐसा लगता है, कि मौका पड़ने पर और सानिया मिर्जा का बुरा वक्त (जो कि शोएब जैसे रंगीले रतन और सटोरिये की वजह से जल्द ही आयेगा) आने पर, पाकिस्तान का मीडिया फ़िर से शोएब के पीछे ही खड़ा होगा और सानिया मिर्ज़ा को दुत्कार देगा, क्योंकि वह शिया है? मौलाना कल्बे जव्वाद ने पाकिस्तानी मीडिया की “शिया-सुन्नी” वाली थ्योरी की जमकर आलोचना की है, लेकिन उससे उन लोगों को कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला, क्योंकि विभाजन के वक्त भारत से गये हुए मुसलमानों को वे लोग आज भी "मुहाजिर" कहते हुए लताड़ते हैं। 

अन्त में इतना ही कहना चाहूंगा कि, भारत पर हमला करने वाला अजमल कसाब तो युवा है और लगभग अनपढ़ है अतः उसे बहकाना और भड़काना आसान है, लेकिन यदि मोहम्मद अत्ता जैसा पढ़ा-लिखा पायलट सिर्फ़ “धर्म” की खातिर पागलों की तरह हवाई जहाज ट्विन टावर से टकराता फ़िरे… या लन्दन स्कूल ऑफ़ ईकोनोमिक्स का छात्र उमर शेख, डेनियल पर्ल का गला रेतने लगे… तब निश्चित ही कहीं न कहीं कोई गम्भीर गड़बड़ी है। गड़बड़ी कहाँ है और इसका “मूल” कहाँ है, यह सभी जानते हैं, लेकिन स्वीकार करने से कतराते, मुँह छिपाते हैं, शतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर गड़ा लेते हैं… और ऐसे लोग ही या तो “सेकुलर” कहलाते हैं या “बुद्धिजीवी”। सॉरी, सॉरी… एक और विषधर जमात भी है, जिसे “पोलिटिकली करेक्ट” कहा जाता है…।

खैर… यदि कसाब जैसे अनपढ़ों की बात छोड़ भी दें (क्योंकि वह पाकिस्तान का नागरिक है और भारत के विरुद्ध काम कर रहा था) लेकिन यह सवाल बार-बार उठेगा कि, उच्च शिक्षा प्राप्त युवा, 5 अंकों में डालरों की तनख्वाह पाने वाले, जब किसी दूसरे देश के "स्थायी नागरिक" बन जाते हैं तब उनके लिये “धर्म बड़ा होना चाहिये या वह देश?”


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बहुप्रतीक्षित 3G स्पेक्ट्रम की नीलामी की निविदाएं कल (19 मई को) खोली गईं। UPA की महान दिलदार, उदार सरकार ने उम्मीद की थी कि उसे लगभग 35,000 करोड़ का राजस्व मिलेगा, जबकि 22 सर्कलों की लाइसेंस बिक्री के जरिये सरकार को अभी तक 70,000 करोड़ रुपये मिल चुके हैं, तथा BSNL और MTNL की “रेवेन्यू शेयरिंग” तथा “सर्कल डिस्ट्रीब्युशन” के कारण अभी यह आँकड़ा 85,000 करोड़ रुपये को पार कर जायेगा। कुछ ही दिनों में BWA (ब्रॉडबैण्ड वायरलेस एक्सेस) की भी नीलामी होने वाली है, जिससे सरकार को और 30,000 करोड़ की आय होने की उम्मीद है और निश्चित ही उसमें भी ज्यादा ही मिलेगा।

2G के महाघोटाले के बाद सतत राजा बाबू और नीरा राडिया के कारनामों को उजागर करने वाले “एकमात्र अखबार” द पायोनियर को इस बात का श्रेय जाता है कि उसने सरकार को मजबूर कर दिया कि 3G लाइसेंस बिक्री के सूत्र राजा बाबू के हाथ न आने पायें। पायनियर द्वारा लगातार बनाये गये दबाव के कारण सरकार को मजबूरन थ्री-जी की नीलामी के लिये –

1) मंत्रियों का एक समूह बनाना पड़ा

2) जिसकी अध्यक्षता प्रणब मुखर्जी ने की,

3) इसमें प्रधानमंत्री की तरफ़ से विशेषज्ञ के रूप में सैम पित्रोदा को भी शामिल किया गया

4) भारी चिल्लाचोट और कम्पनियों द्वारा छातीकूट अभियान के बावजूद नीलामी की प्रक्रिया जनवरी 2009 से शुरु की गई, जब वैश्विक मंदी कम होने के आसार दिखने लगे (वरना कम्पनियाँ मंदी का बहाना बनाकर कम पैसों में अधिक माल कूटने की फ़िराक में थीं…)

5) नीलामी रोज सुबह 9.30 से शाम 7.00 तक होती, और इसके बाद प्रत्येक कम्पनी को उस दिन शाम को अपने रेट्स केन्द्रीय सर्वर को सौंपना होते थे, जिस वजह से सरकार को अधिक से अधिक आय हुई।

6) इस सारी प्रक्रिया से बाबुओं-अफ़सरों-नौकरशाही-लॉबिंग फ़र्मों और फ़र्जी नेताओं को दूर रखा गया।

सोचिये, कि यदि अखबार ने राजा बाबू-नीरा राडिया के कारनामों को उजागर नहीं किया होता तो इसमें भी राजा बाबू कितना पैसा खाते? अर्थात यदि प्रमुख मीडिया अपनी भूमिका सही तरीके निभाये, फ़िर उसे अंग्रेजी-हिन्दी के ब्लॉगर एवं स्वतन्त्र पत्रकार आम जनता तक जल्दी-जल्दी पहुँचायें तो सरकारों पर दबाव बनाया जा सकता है। यदि सरकार द्वारा यही सारे उपाय 2G के नीलामी में ही अपना लिये जाते तो सरकार के खाते में और 60,000 करोड़ रुपये जमा हो जाते।

(दिक्कत यह है कि यदि ऐसी प्रक्रिया सभी बड़े-छोटे ठेकों में अपनाई जाने लगे, तो कांग्रेसियों को चुनाव लड़ने का पैसा निकालना मुश्किल हो जाये… दूसरी दिक्कत यह है कि सभी को मोटी मलाई चाहिये, जबकि इतने बड़े सौदों में “तपेले की तलछट” में ही इतनी मलाई होती है कि “बिना कुछ किये” अच्छा खासा पेट भर सकता है, लेकिन फ़िर भी पता नहीं क्यों इतना सारा पैसा स्विट्ज़रलैण्ड की बैंकों में सड़ाते रहते हैं ये नेता लोग…?)

बहरहाल, ऐसा भी नहीं है कि इतनी सारी प्रक्रियाएं अपनाने के बावजूद सारा मामला एकदम पाक-साफ़ ही हुआ हो, लेकिन फ़िर भी जिस तरह से राजा बाबू खुलेआम डाका डाले हुए थे उसके मुकाबले कम से कम प्रक्रिया पारदर्शी दिखाई तो दे रही है। 3G की नीलामी में राजा बाबू को पैसा खाने नहीं मिला और उनके मोटी चमड़ीदार पेट पर लात तो पड़ ही गई है, लेकिन फ़िर भी “जिस उचित जगह” पर उन्हें लात पड़नी चाहिये थी, वह अब तक नहीं पड़ी है… देखते हैं “ईमानदार बाबू” का धर्म-ईमान कब जागता है।
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भाग-1 में हमने देखा कि 2G स्पेक्ट्रम घोटाला क्या है, तथा भाग-2 में हमने देखा कि इस महाघोटाले को कैसे अंजाम दिया गया तथा पैसा किस प्रकार ठिकाने लगाया गया, इस वजह से अब उन पत्रों और दस्तावेजों के मजमून में से कुछ खास-खास बातें पेश करने पर किसी को भी इसे समझने में आसानी होगी, कि किस तरह से उद्योगपति-नेता-अफ़सर का बदकार त्रिकोण हमारे देश को लूट-खसोट रहा है… पेश है तीसरा और अन्तिम भाग…

चूंकि पत्रों-दस्तावेजों की स्कैन प्रति यहाँ अटैच कर ही रहा हूं, इसलिये उसमें उल्लेखित सिर्फ़ कुछ खास-खास बातें ही लिखूंगा… ऐसा करने पर भी लेख लम्बा हो गया है… अतः अधिक विस्तार से पढ़ने के लिये उस पर चटका लगाकर अक्षर बड़े करके पढ़ा जा सकता है –

राजा बाबू को मंत्री बनवाने के समय राजा-राडिया और कनिमोझी के किये गये फ़ोन टेप का चित्र यह है,
जिसमें नीरा, कनिमोझी से कहती हैं – “DMK के कोटे से कौन मंत्री बनेगा कौन नहीं बनेगा इससे प्रधानमंत्री को कोई मतलब नहीं है…प्रधानमंत्री ने कहा है कि उन्हें टीआर बालू अथवा ए राजा से कोई तकलीफ़ नहीं है, दयानिधि मारन ने गुलाम नबी आज़ाद से बात की है, लेकिन अन्तिम निर्णय तो करुणानिधि का ही होगा…, प्रधानमंत्री के सामने पाँच मंत्रालयों की माँग रख दी है और कह दिया है कि यदि नहीं मिले तो हम सरकार में शामिल नहीं होंगे…”
दूसरे फ़ोन में नीरा, राजा बाबू से कहती हैं, “अझागिरी या मारन में से कोई एक मंत्रिमण्डल में आ सकता है, लेकिन एक ही परिवार के तीन लोग होंगे तो करुणानिधि को इसकी सफ़ाई देना मुश्किल होगा… कपड़ा मंत्रालय या उर्वरक मंत्रालय? राजा बाबू कहते हैं कि “हाँ… एक ही परिवार के तीन लोग मंत्री, मुश्किल तो होगी… लेकिन राजनीति में यह तो चलता है…” (हँसते हैं…) खैर देखते हैं आगे क्या होता है…। अन्ततः टाटा और राडिया मिलकर मारन को मंत्रिमण्डल से बाहर रखने में सफ़ल होते हैं… और जमकर सौदेबाजी के बाद DMK के लिये 5 मंत्रालय दिये जाते हैं।


अगले पत्र में सीबीआई के आईपीएस अधिकारी श्री विनीत अग्रवाल ने श्री मिलाप जैन को पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने केस क्रमांक और दिनांक के उल्लेख सहित इस बात को रेखांकित किया है कि नीरा राडिया की कम्पनी नोएसिस कंसल्टेंसी इस पूरे षडयंत्र में पूरी तरह से शामिल है, और इन लोगों पर कड़ी नज़र रखने की जरूरत है, चाहे फ़ोन टेपिंग ही क्यों न करनी पड़े…और इससे जाँच के काम में मदद मिलेगी…


पत्र क्रमांक 2, श्री आशीष अबरोल (आयकर संयुक्त आयुक्त) द्वारा श्री विनीत अग्रवाल को लिखा गया, जिसमें अबरोल ने कहा है कि CBDT से मिली सूचना के आधार पर (गृह सचिव की अनुमति से) नीरा राडिया की फ़ोन लाइनें निगरानी पर ली गई हैं। नीरा राडिया की कम्पनियाँ नोएसिस, वैष्णवी कंसल्टेंसी, विटकॉम और न्यूकॉम, सरकार के विभिन्न विभागों जैसे, टेलीकॉम, पावर, एवियेशन, और इन्फ़्रास्ट्रक्चर में खामख्वाह दखल और सलाह देती हैं। पत्र में दो प्रमुख बातें हैं -
1) यह स्पष्ट है कि नीरा राडिया का टेलीकॉम लाइसेंस के मामले में कुछ भूमिका है।
2) नीरा राडिया और संचार मंत्री के बीच अक्सर सीधी बातचीत होती रहती है।

(अर्थात आयकर, सीबीआई, CBDT तीनों विभागों की निगरानी राडिया और राजा पर थी और इसमें सरकार की सहमति, अनुमति और जानकारी थी…) जबकि सरकार लगातार (आज भी) कहती रही है कि किसी की भी फ़ोन टैपिंग नहीं की गई है…





अगला दस्तावेज़, CBDT के श्री सुधीर चन्द्रा को सम्बोधित किया गया है, और इसमें सौदे में Unitech कम्पनी की संदिग्ध भूमिका, उसकी अनियमितताएं आदि के बारे में बाकायदा टेबल बनाकर बताया गया है, कि किस तरह यूनिटेक ने फ़र्जी लोन एंट्रियाँ दर्शाईं, और केपिटल गेन के 240 करोड़ रुपयों को भी हेराफ़ेरी करके दिखाया।


अगला चित्र इसी का दूसरा पेज है, जिसमें बताया गया है कि अमेरिका के लेहमैन ब्रदर्स के धराशाई हो जाने पर यूनिटेक घबरा गई तब नीरा राडिया ने ही टाटा रियलिटी से कहकर यूनिटेक के लिये 650 करोड़ का एडवांस जुगाड़ करवाया (इसे कहते हैं हाईटेक हाईफ़ाई दल्लेबाजी)। यूनिटेक ने टाटा को जो चेक दिये वह बाउंस हो गये जबकि राडिया ने प्रेस कान्फ़्रेंस में कहा था कि उस एडवांस का हिसाब-किताब हो चुका है। नीरा राडिया ने ही यूनीटेक को लाइसेंस दिलवाने में मुख्य भूमिका निभाई।


अगला पत्र आयकर विभाग की अन्तरिम जाँच रिपोर्ट (जून 2009) का है, जिसमें विभाग द्वारा सरकार को रिपोर्ट पेश की गई है कि नीरा राडिया की कम्पनियों की 9 लाइनों को 180 दिनों तक लगातार निगरानी और टेप किया गया, और इस बातचीत से पता चलता है कि टेलीकॉम, पावर और एवियेशन (उड्डयन) मंत्रालय में इन चारों फ़र्मों की गहरी पैठ है तथा इनके द्वारा कई काम करवाये गये हैं (अर्थात जून 2009 में ही सरकार को पता चल गया था कि राडिया-राजा के बीच जमकर घी-खिचड़ी है, तब भी राजा बाबू को दूरसंचार मंत्रालय सौंपने में “ईमानदार” बाबू को कोई अड़चन नहीं आई?)


अगले पत्र में विभाग की जुलाई 2009 की अन्तरिम जाँच रिपोर्ट है, जिसमें सरकार को बताया गया है कि फ़ोन पर सुनी गई बातों के मुताबिक, सरकार के गोपनीय दस्तावेज और सरकार की नीतियों सम्बन्धी जानकारी राडिया की कम्पनियों को कहीं से लीक हो रही है। टेपिंग के अनुसार अफ़्रीका के गिनी अथवा सेनेगल देशों से भी भारी मात्रा में पैसों के लेनदेन की बात सामने आई है। यह बात भी सामने आई है कि बड़ी मात्रा में निवेश करके भारत के किसी चैनल को खरीदने और अपने पक्ष में तथा विरोधी को परेशान करने के लिये अदालतों में NGOs द्वारा जनहित याचिका लगाने के लिये पैसा दिया जा रहा है। (तात्पर्य यह कि यह सब काले धंधे सरकार को जुलाई 2009 में ही पता चल चुके थे, तब भी “भलेमानुष” हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे? और आज भी कह रहे हैं कि “जाँच जारी है…)


अगला दस्तावेज़ कहता है कि “भारतीय टेलीकॉम के बेताज बादशाह” (अर्थात सुनील भारती मित्तल), नीरा राडिया की मदद से ए राजा से मधुर सम्बन्ध बनाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि दक्षिण अफ़्रीका की कम्पनी के अधिग्रहण करने में आसानी हो (हालांकि राजा के मंत्री बनने से पहले भारती मित्तल पूरी कोशिश कर चुके थे कि राजा मंत्री न बनने पायें)। इसी पत्र में बताया गया है कि राडिया की “विटकॉम” कम्पनी NDTV इमेजिन का भी काफ़ी कामधाम संभालती है (शायद इसीलिये बरखा दत्त, राडिया की लॉबिंग में लगी थीं), “वैष्णवी” कम्पनी टाटा समूह के “पर्यावरण सम्बन्धी” मामलों का “निपटारा” करती है, जबकि “न्यूकॉम” कम्पनी मुकेश अम्बानी की कुछ कम्पनियों की देखरेख करती है। (अब बताईये भला, टाटा-अम्बानी जैसों से मधुर सम्बन्ध रखने वाली राडिया का बाल भी बाँका हो सकता है क्या?) टेलीफ़ोन टेपिंग से पता चला कि जिन चार कम्पनियों को राडिया ने प्रमुख स्पेक्ट्रम और लाइसेंस दिलवाये उसमें से DataComm कम्पनी को वीडियोकॉन के धूत साहब ने मुकेश अम्बानी समूह के एक खास रसूखदार मनोज मोदी से साँठगाँठ कर खड़ा किया, मनोज मोदी भी लगातार नीरा राडिया के सम्पर्क में बने रहे हैं।


इसी दस्तावेज के अगले पेज पर भी टेलीफ़ोन टेपिंग से सम्बन्धित सीबीआई के कुछ नोट्स हैं – जैसे कि रतन टाटा और नीरा राडिया के बीच लम्बी बातचीत हुई जिसमें टाटा ने दयानिधि मारन को किसी भी कीमत पर मंत्री बनने से रोकने सम्बन्धी पेशकश की है। अप्रत्यक्ष रूप से रतन टाटा Aircell (एयरसेल) कम्पनी के मालिक हैं, और उन्होंने कह दिया था कि यदि मारन संचार मंत्री बने तो वे टेलीकॉम का धंधा ही छोड़ देंगे। नीरा राडिया और कनिमोझी (करुणानिधि की पुत्री) की तरफ़ से बरखा दत्त और वीर संघवी, राजा को मंत्री बनवाने के लिये कांग्रेस में बातचीत कर रहे थे। जबकि दूसरी तरफ़ एयरटेल (मित्तल) चाहते थे कि राजा को मंत्री नहीं बनने दिया जाये और उसे अपना मनपसन्द स्पेक्ट्रम मिल जाये, क्योंकि अनिल अम्बानी की रिलायंस कम्युनिकेशंस को वह अपना प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मानते हैं। बरखा दत्त और नीरा राडिया की इस काम में मदद के लिये तरुण दास, वीर संघवी तथा सुनील अरोरा (राजस्थान कैडर के एक IAS) तैनात थे। इसी प्रकार भारती एयरटेल चाहती थी कि मारन संचार मंत्री बन जायें ताकि CDMA लॉबी की बजाय GSM लॉबी में प्रभुत्व जमाया जा सके। सुनील मित्तल ने राडिया के समक्ष उनके लिये काम करने की पेशकश भी की, लेकिन राडिया ने कहा कि जब तक वे उधर हैं “टाटा” के हितों पर आँच आने जैसा कोई काम नहीं करेंगी। फ़ोन टेप से यह भी पता चला कि सुहैल सेठ के निवास पर सुनील मित्तल से मिलने एक तीसरा व्यक्ति आया था जो कि राडिया और मित्तल के बीच की कड़ी की तरह काम कर रहा था, यही व्यक्ति बाद में मुकेश अम्बानी से भी मिला और उन्होंने नीरा राडिया और सुनील मित्तल के बीच चल रही संदेहास्पद चालों पर अप्रसन्नता व्यक्त की।



अर्थात नीरा राडिया की घुसपैठ लगभग प्रत्येक बड़े उद्योग घराने, मीडिया के प्रमुख लोगों तथा स्वाभाविक रुप से राजनीतिकों तक भी थी… अगले पत्र में यह बताया गया है कि किस तरह से नीरा राडिया के दो सहयोगियों अमित बंसल और आरएस बंसल ने यूनीटेक के लिये पैसों की जुगाड़ की, यूनिटेक को रीयल एस्टेट के धंध मे हुए नुकसान की भरपाई किस तरह करवाई, किस तरह से सरकार को चूना लगाने हेतु काम किया, आदि-आदि। नीरा राडिया और जहाँगीर पोचा, “नईदुनिया” के छजलानी के भी निरन्तर सम्पर्क में थे, ताकि भारत में एक न्यूज़ चैनल शुरु किया जा सके (सम्भवतः न्यूज़ 9X) जिसे बाद में पीटर और इन्द्राणी मुखर्जी अधिग्रहण कर सकें। लगभग सभी मामलों में काम करने का तरीका एक ही था, मीडिया वालों और बड़े पत्रकारों को महंगे उपहार जैसे कार, विदेश यात्रा (और शायद पद्मश्री भी?) आदि का लालच देकर अपने पक्ष में करना


झारखण्ड में टाटा एक खदान की लीज़ बढ़वाना चाहते थे, मधु कौड़ा उनसे 180 करोड़ मांग रहे थे, लेकिन राडिया ने झारखण्ड के राज्यपाल की मदद से टाटा को खदान की लीज़ आगे बढ़वा दी, उसकी उन्हें फ़ीस (आँकड़ा मालूम नहीं) मिली। नीरा राडिया का वित्तीय कारोबार अफ़्रीकी देशों में भी फ़ैला हुआ है, इसीलिये उनकी फ़र्म “ग्लोबल मिनरल्स” के जरिये अफ़्रीकी देशों में पैसा निवेश करने के लिये करुणानिधि के CA मुथुरामन और IAS अधिकारी प्रदीप बैजल उनसे एक ई-मेल में अनुरोध करते हैं।


ADAG और रिलायंस के झगड़ों, हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स में मुकेश अम्बानी की दिलचस्पी, राडिया और मनोज मोदी द्वारा रिलायंस कम्युनिकेशंस को घेरने के षडयन्त्र, मनोज मोदी के मार्फ़त दिल्ली के एक NGO को पैसा देकर न्यायालय में फ़र्जी जनहित याचिकाएं दायर करने… इत्यादि बातों के बार