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desiCNN - Items filtered by date: दिसम्बर 2007
Panchayati Raj Illiteracy and Society

भारत के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है झाबुआ, उसके ग्राम सारंगी की सरपंच हैं श्रीमती फ़ुन्दीबाई। पूर्णतः अशिक्षित, “श्रीमती” लगाने भर से असहज हो जाने वाली, एकदम भोली-भाली, सीधी-सादी आदिवासी महिला सरपंच। आप सोच रहे होंगे कि भला यह कैसे “बदलते भारत की महिला” हो सकती हैं... लेकिन वे हैं... आरक्षण के कारण अजजा महिला सीट घोषित हुई सारंगी ग्राम से फ़ुन्दीबाई सरपंच बनीं। आजादी के साठ साल बीत जाने के बावजूद रेल की पटरी न देख पाने वाले झाबुआ के अन्दरूनी ग्रामों की हालत आज भी कुछ खास बदली नहीं है। यहाँ के आदिवासियों ने आज तक अफ़सरों और नेताओं को बड़ी-बड़ी जीपों और “चीलगाड़ी” (हेलीकॉप्टर) मे सिर्फ़ दौरे करते देखा है, आदिवासी आज भी गरीब का गरीब है, जबकि झाबुआ और आदिवासियों के नाम पर पिछले पचास वर्षों में जितना पैसा आया, उतने में कम से कम चार मुम्बई और बसाई जा सकती हैं। ऐसे भ्रष्ट माहौल में जब कोई सरपंच बनता है, तो समझो उसकी “लॉटरी” लग जाती है।


फ़ुन्दीबाई एक प्रतिबद्ध महिला सरपंच, साहसी और दबंग, जो अपने इलाके में “स्कूल वाली बाई” के नाम से मशहूर हो गई हैं


लेकिन फ़ुन्दीबाई कोई साधारण महिला नहीं हैं, सरपंच बनते ही सबसे पहले उन्होंने अपनी पंचायत में लड़कियों की ऐसी सूची बनाई जो स्कूल नहीं जा रही, फ़िर खुद उनके घर जा-जाकर उनके माता-पिता को लड़कियों को स्कूल जाने को तैयार किया। समय जरूर लगा, लगता ही है, लेकिन आज ग्राम सारंगी में बालिकाओं ने हायरसेकंडरी में कदम रख दिया है और इस साल लगभग 22 लड़कियों को शासन की तरफ़ से स्कूल जाने के लिये साइकल दिलवा दी गई है। पंचायत के सभी स्कूलों में फ़ुन्दीबाई स्वयं सुबह से भ्रमण करती हैं, जहाँ भी गंदगी या कचरा दिखाई देता है, उसे अपने हाथों से साफ़ करती हैं। लड़कियों को पढ़ाने के बारे में उनका अलग ही “फ़लसफ़ा” है, वे कहती हैं “वगर भणेली सोरी, लाकड़ा नी लोगई बणी जावे” मतलब.. “बगैर पढ़ी-लिखी लड़की काठ की पुतली बनी रह जाती है”। उनका सोचना है कि एक लड़की के पढ़ने से तीन घर सुधर जाते हैं, एक तो उसका मायका, दूसरा उसका ससुराल और तीसरा उसकी होने वाली लड़की का घर..। उच्च जाति के दबदबे वाले समाज में वह साहस और दबंगता से अपनी बात रखती हैं और नतीजा यह कि आसपास के इलाके में वे “स्कूल वाली बाई” के नाम से मशहूर हैं। वे खुद अशिक्षित हैं इसलिये इसकी हानियों से वे अच्छी तरह परिचित थीं, इसलिये उनके एजेंडे में सबसे पहला काम था शिक्षा और खासकर बालिका शिक्षा। वे अपनी तीन लड़कियों को तो पढ़ा ही रही हैं खुद भी प्रारंभिक अक्षर-ज्ञान लेने में लगी हैं। उनका अगला लक्ष्य है ग्राम में स्थित सभी पेड़-पौधों और आसपास के वृक्षों की रक्षा करना और उनकी वृद्धि करना। उनके सरपंच कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे हो चुके हैं, अब यदि उन्हें अगला कार्यकाल मिला तो निश्चित ही वे यह भी कर दिखायेंगी।

भारत में पंचायती राज लागू हुए कई वर्ष हो गये। अखबारों, दृश्य-मीडिया आदि में अधिकतर पंचायतों के बारे में, पंचायती राज के बारे में नकारात्मक खबरें ही आती हैं। “फ़लाँ सरपंच अनपढ़ है, फ़लाँ सरपंच ने ऐसा किया, वैसा किया, यहाँ-वहाँ पैसा खा लिया, पैसे का दुरुपयोग किया, अपने रिश्तेदारों और अपने घर के पास निर्माण कार्य करवा लिये.... आदि-आदि। माना कि इनमें से अधिकतर सही भी होती हैं, क्योंकि वाकई में पंचायती राज ने भ्रष्टाचार को साहबों की टेबल से उठाकर गाँव-गाँव में पहुँचा दिया है। लेकिन सवाल उठता है कि मीडिया इस प्रकार की सकारात्मक खबरें क्यों नहीं देता? या सिर्फ़ नकारात्मक खबरों से ही टीआरपी बढ़ती है? या पैसा कमाने के लिये मीडिया ने अपना आत्मसम्मान गिरवी रख दिया है?

जीवन को जीना और जीवन को ढोना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आजकल का पढ़ा-लिखा युवा या मध्यमवर्गीय आदमी “जैसा है वैसा चलने दो” वाला भाव अपनाये रहता है, उसे कहते हैं जीवन को ढोना, जबकि फ़ुन्दीबाई की सृजनशीलता ही जीवन को जीना कहलाता है। कोई जरूरी नहीं कि उच्च शिक्षा, या भरपूर कमाई या कोई बड़ी महान कृति ही सब कुछ है। समाज में बड़े बदलाव लाने के लिये हमेशा छोटे बदलावों से ही शुरुआत होती है, जरूरत है सिर्फ़ समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के अहसास की, उच्च शिक्षा तो उसमें मददगार हो सकती है....नितांत जरूरत नहीं।

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Mother Teresa Crafted Saint

एग्नेस गोंक्झा बोज़ाझियू अर्थात मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को स्कोप्जे, मेसेडोनिया में हुआ था और बारह वर्ष की आयु में उन्हें अहसास हुआ कि “उन्हें ईश्वर बुला रहा है”। 24 मई 1931 को वे कलकत्ता आईं और फ़िर यहीं की होकर रह गईं। उनके बारे में इस प्रकार की सारी बातें लगभग सभी लोग जानते हैं, लेकिन कुछ ऐसे तथ्य, आँकड़े और लेख हैं जिनसे इस शख्सियत पर सन्देह के बादल गहरे होते जाते हैं। उन पर हमेशा वेटिकन की मदद और मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी की मदद से “धर्म परिवर्तन” का आरोप तो लगता ही रहा है, लेकिन बात कुछ और भी है, जो उन्हें “दया की मूर्ति”, “मानवता की सेविका”, “बेसहारा और गरीबों की मसीहा”... आदि वाली “लार्जर दैन लाईफ़” छवि पर ग्रहण लगाती हैं, और मजे की बात यह है कि इनमें से अधिकतर आरोप (या कहें कि खुलासे) पश्चिम की प्रेस या ईसाई पत्रकारों आदि ने ही किये हैं, ना कि किसी हिन्दू संगठन ने, जिससे संदेह और भी गहरा हो जाता है (क्योंकि हिन्दू संगठन जो भी बोलते या लिखते हैं उसे तत्काल सांप्रदायिक ठहरा दिये जाने का “रिवाज” है)। बहरहाल, आईये देखें कि क्यों इस प्रकार के “संत” या “चमत्कार” आदि की बातें बेमानी होती हैं (अब ये पढ़ते वक्त यदि आपको हिन्दुओं के बड़े-बड़े और नामी-गिरामी बाबाओं, संतों और प्रवचनकारों की याद आ जाये तो कोई आश्चर्यजनक बात नहीं होगी) –

यह बात तो सभी जानते हैं कि धर्म कोई सा भी हो, धार्मिक गुरु/गुरुआनियाँ/बाबा/सन्त आदि कोई भी हो बगैर “चन्दे” के वे अपना कामकाज(?) नहीं फ़ैला सकते हैं। उनकी मिशनरियाँ, उनके आश्रम, बड़े-बड़े पांडाल, भव्य मन्दिर, मस्जिद और चर्च आदि इसी विशालकाय चन्दे की रकम से बनते हैं। जाहिर है कि जहाँ से अकूत पैसा आता है वह कोई पवित्र या धर्मात्मा व्यक्ति नहीं होता, ठीक इसी प्रकार जिस जगह ये अकूत पैसा जाता है, वहाँ भी ऐसे ही लोग बसते हैं। आम आदमी को बरगलाने के लिये पाप-पुण्य, अच्छाई-बुराई, धर्म आदि की घुट्टी लगातार पिलाई जाती है, क्योंकि जिस अंतरात्मा के बल पर व्यक्ति का सारा व्यवहार चलता है, उसे दरकिनार कर दिया जाता है। पैसा (यानी चन्दा) कहीं से भी आये, किसी भी प्रकार के व्यक्ति से आये, उसका काम-धंधा कुछ भी हो, इससे लेने वाले “महान”(?) लोगों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। उन्हें इस बात की चिंता कभी नहीं होती कि उनके तथाकथित प्रवचन सुनकर क्या आज तक किसी भी भ्रष्टाचारी या अनैतिक व्यक्ति ने अपना गुनाह कबूल किया है? क्या किसी पापी ने आज तक यह कहा है कि “मेरी यह कमाई मेरे तमाम काले कारनामों की है, और मैं यह सारा पैसा त्यागकर आज से सन्यास लेता हूँ और मुझे मेरे पापों की सजा के तौर पर कड़े परिश्रम वाली जेल में रख दिया जाये..”। वह कभी ऐसा कहेगा भी नहीं, क्योंकि इन्हीं संतों और महात्माओं ने उसे कह रखा है कि जब तुम अपनी कमाई का कुछ प्रतिशत “नेक” कामों के लिये दान कर दोगे तो तुम्हारे पापों का खाता हल्का हो जायेगा। यानी, बेटा..तू आराम से कालाबाजारी कर, चैन से गरीबों का शोषण कर, जम कर भ्रष्टाचार कर, लेकिन उसमें से कुछ हिस्सा हमारे आश्रम को दान कर... है ना मजेदार धर्म...

बहरहाल बात हो रही थी मदर टेरेसा की, मदर टेरेसा की मृत्यु के समय सुसान शील्ड्स को न्यूयॉर्क बैंक में पचास मिलियन डालर की रकम जमा मिली, सुसान शील्ड्स वही हैं जिन्होंने मदर टेरेसा के साथ सहायक के रूप में नौ साल तक काम किया, सुसान ही चैरिटी में आये हुए दान और चेकों का हिसाब-किताब रखती थीं। जो लाखों रुपया गरीबों और दीन-हीनों की सेवा में लगाया जाना था, वह न्यूयॉर्क के बैंक में यूँ ही फ़ालतू पड़ा था? मदर टेरेसा को समूचे विश्व से, कई ज्ञात और अज्ञात स्रोतों से बड़ी-बड़ी धनराशियाँ दान के तौर पर मिलती थीं।

अमेरिका के एक बड़े प्रकाशक रॉबर्ट मैक्सवैल, जिन्होंने कर्मचारियों की भविष्यनिधि फ़ण्ड्स में 450 मिलियन पाउंड का घोटाला किया, ने मदर टेरेसा को 1.25 मिलियन डालर का चन्दा दिया। मदर टेरेसा मैक्सवैल के भूतकाल को जानती थीं। हैती के तानाशाह जीन क्लाऊड डुवालिये ने मदर टेरेसा को सम्मानित करने बुलाया। मदर टेरेसा कोलकाता से हैती सम्मान लेने गईं, और जिस व्यक्ति ने हैती का भविष्य बिगाड़ कर रख दिया, गरीबों पर जमकर अत्याचार किये और देश को लूटा, टेरेसा ने उसकी “गरीबों को प्यार करने वाला” कहकर तारीफ़ों के पुल बाँधे।

मदर टेरेसा को चार्ल्स कीटिंग से 1.25 मिलियन डालर का चन्दा मिला, ये कीटिंग महाशय वही हैं जिन्होंने “कीटिंग सेविंग्स एन्ड लोन्स” नामक कम्पनी 1980 में बनाई थी और आम जनता और मध्यमवर्ग को लाखों डालर का चूना लगाने के बाद उसे जेल हुई थी। अदालत में सुनवाई के दौरान मदर टेरेसा ने जज से कीटिंग को “माफ़”(?) करने की अपील की थी, उस वक्त जज ने उनसे कहा कि जो पैसा कीटिंग ने गबन किया है क्या वे उसे जनता को लौटा सकती हैं? ताकि निम्न-मध्यमवर्ग के हजारों लोगों को कुछ राहत मिल सके, लेकिन तब वे चुप्पी साध गईं।

ब्रिटेन की प्रसिद्ध मेडिकल पत्रिका Lancet के सम्पादक डॉ.रॉबिन फ़ॉक्स ने 1991 में एक बार मदर के कलकत्ता स्थित चैरिटी अस्पतालों का दौरा किया था। उन्होंने पाया कि बच्चों के लिये साधारण “अनल्जेसिक दवाईयाँ” तक वहाँ उपलब्ध नहीं थीं और न ही “स्टर्लाइज्ड सिरिंज” का उपयोग हो रहा था। जब इस बारे में मदर से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि “ये बच्चे सिर्फ़ मेरी प्रार्थना से ही ठीक हो जायेंगे...”(?)

बांग्लादेश युद्ध के दौरान लगभग साढ़े चार लाख महिलायें बेघरबार हुईं और भागकर कोलकाता आईं, उनमें से अधिकतर के साथ बलात्कार हुआ था। मदर टेरेसा ने उन महिलाओं के गर्भपात का विरोध किया था, और कहा था कि “गर्भपात कैथोलिक परम्पराओं के खिलाफ़ है और इन औरतों की प्रेग्नेन्सी एक “पवित्र आशीर्वाद” है...”। उन्होंने हमेशा गर्भपात और गर्भनिरोधकों का विरोध किया। जब उनसे सवाल किया जाता था कि “क्या ज्यादा बच्चे पैदा होना और गरीबी में कोई सम्बन्ध नहीं है?” तब उनका उत्तर हमेशा गोलमोल ही होता था कि “ईश्वर सभी के लिये कुछ न कुछ देता है, जब वह पशु-पक्षियों को भोजन उपलब्ध करवाता है तो आने वाले बच्चे का खयाल भी वह रखेगा इसलिये गर्भपात और गर्भनिरोधक एक अपराध है” (क्या अजीब थ्योरी है...बच्चे पैदा करते जाओं उन्हें “ईश्वर” पाल लेगा... शायद इसी थ्योरी का पालन करते हुए ज्यादा बच्चों का बाप कहता है कि “ये तो भगवान की देन हैं..”, लेकिन वह मूर्ख नहीं जानता कि यह “भगवान की देन” धरती पर बोझ है और सिकुड़ते संसाधनों में हक मारने वाला एक और मुँह...) यहाँ देखें

मदर टेरेसा ने इन्दिरा गाँधी की आपातकाल लगाने के लिये तारीफ़ की थी और कहा कि “आपातकाल लगाने से लोग खुश हो गये हैं और बेरोजगारी की समस्या हल हो गई है”। गाँधी परिवार ने उन्हें “भारत रत्न” का सम्मान देकर उनका “ऋण” उतारा। भोपाल गैस त्रासदी भारत की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना है, जिसमें सरकारी तौर पर 4000 से अधिक लोग मारे गये और लाखों लोग अन्य बीमारियों से प्रभावित हुए। उस वक्त मदर टेरेसा ताबड़तोड़ कलकत्ता से भोपाल आईं, किसलिये? क्या प्रभावितों की मदद करने? जी नहीं, बल्कि यह अनुरोध करने कि यूनियन कार्बाईड के मैनेजमेंट को माफ़ कर दिया जाना चाहिये। और अन्ततः वही हुआ भी, वारेन एंडरसन ने अपनी बाकी की जिन्दगी अमेरिका में आराम से बिताई, भारत सरकार हमेशा की तरह किसी को सजा दिलवा पाना तो दूर, ठीक से मुकदमा तक नहीं कायम कर पाई। प्रश्न उठता है कि आखिर मदर टेरेसा थीं क्या?

एक और जर्मन पत्रकार वाल्टर व्युलेन्वेबर ने अपनी पत्रिका “स्टर्न” में लिखा है कि अकेले जर्मनी से लगभग तीन मिलियन डालर का चन्दा मदर की मिशनरी को जाता है, और जिस देश में टैक्स चोरी के आरोप में स्टेफ़ी ग्राफ़ के पिता तक को जेल हो जाती है, वहाँ से आये हुए पैसे का आज तक कोई ऑडिट नहीं हुआ कि पैसा कहाँ से आता है, कहाँ जाता है, कैसे खर्च किया जाता है... आदि।

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रकार क्रिस्टोफ़र हिचेन्स ने 1994 में एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी, जिसमें मदर टेरेसा के सभी क्रियाकलापों पर विस्तार से रोशनी डाली गई थी, बाद में यह फ़िल्म ब्रिटेन के चैनल-फ़ोर पर प्रदर्शित हुई और इसने काफ़ी लोकप्रियता अर्जित की। बाद में अपने कोलकाता प्रवास के अनुभव पर उन्होंने एक किताब भी लिखी “हैल्स एन्जेल” (नर्क की परी)। इसमें उन्होंने कहा है कि “कैथोलिक समुदाय विश्व का सबसे ताकतवर समुदाय है, जिन्हें पोप नियंत्रित करते हैं, चैरिटी चलाना, मिशनरियाँ चलाना, धर्म परिवर्तन आदि इनके मुख्य काम हैं...” जाहिर है कि मदर टेरेसा को टेम्पलटन सम्मान, नोबल सम्मान, मानद अमेरिकी नागरिकता जैसे कई सम्मान मिले। (हिचेन्स का लेख) और हिचेन्स का इंटरव्यू




संतत्व गढ़ना –
मदर टेरेसा जब कभी बीमार हुईं, उन्हें बेहतरीन से बेहतरीन कार्पोरेट अस्पताल में भरती किया गया, उन्हें हमेशा महंगा से महंगा इलाज उपलब्ध करवाया गया, हालांकि ये अच्छी बात है, इसका स्वागत किया जाना चाहिये, लेकिन साथ ही यह नहीं भूलना चाहिये कि यही उपचार यदि वे अनाथ और गरीब बच्चों (जिनके नाम पर उन्हें लाखों डालर का चन्दा मिलता रहा) को भी दिलवातीं तो कोई बात होती, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ...एक बार कैंसर से कराहते एक मरीज से उन्होंने कहा कि “तुम्हारा दर्द ठीक वैसा ही है जैसा ईसा मसीह को सूली पर हुआ था, शायद महान मसीह तुम्हें चूम रहे हैं”,,, तब मरीज ने कहा कि “प्रार्थना कीजिये कि जल्दी से ईसा मुझे चूमना बन्द करें...”। टेरेसा की मृत्यु के पश्चात पोप जॉन पॉल को उन्हें “सन्त” घोषित करने की बेहद जल्दबाजी हो गई थी, संत घोषित करने के लिये जो पाँच वर्ष का समय (चमत्कार और पवित्र असर के लिये) दरकार होता है, पोप ने उसमें भी ढील दे दी, ऐसा क्यों हुआ पता नहीं।

मोनिका बेसरा की कहानी –
पश्चिम बंगाल की एक क्रिश्चियन आदिवासी महिला जिसका नाम मोनिका बेसरा है, उसे टीबी और पेट में ट्यूमर हो गया था। बेलूरघाट के सरकारी अस्पताल के डॉ. रंजन मुस्ताफ़ उसका इलाज कर रहे थे। उनके इलाज से मोनिका को काफ़ी फ़ायदा हो रहा था और एक बीमारी लगभग ठीक हो गई थी। मोनिका के पति मि. सीको ने इस बात को स्वीकार किया था। वे बेहद गरीब हैं और उनके पाँच बच्चे थे, कैथोलिक ननों ने उनसे सम्पर्क किया, बच्चों की उत्तम शिक्षा-दीक्षा का आश्वासन दिया, उस परिवार को थोड़ी सी जमीन भी दी और ताबड़तोड़ मोनिका का “ब्रेनवॉश” किया गया, जिससे मदर टेरेसा के “चमत्कार” की कहानी दुनिया को बताई जा सके और उन्हें संत घोषित करने में आसानी हो। अचानक एक दिन मोनिका बेसरा ने अपने लॉकेट में मदर टेरेसा की तस्वीर देखी और उसका ट्यूमर पूरी तरह से ठीक हो गया। जब एक चैरिटी संस्था ने उस अस्पताल का दौरा कर हकीकत जानना चाही, तो पाया गया कि मोनिका बेसरा से सम्बन्धित सारा रिकॉर्ड गायब हो चुका है (“टाईम” पत्रिका ने इस बात का उल्लेख किया है)।

“संत” घोषित करने की प्रक्रिया में पहली पायदान होती है जो कहलाती है “बीथिफ़िकेशन”, जो कि 19 अक्टूबर 2003 को हो चुका। “संत” घोषित करने की यह परम्परा कैथोलिकों में बहुत पुरानी है, लेकिन आखिर इसी के द्वारा तो वे लोगों का धर्म में विश्वास(?) बरकरार रखते हैं और सबसे बड़ी बात है कि वेटिकन को इतने बड़े खटराग के लिये सतत “धन” की उगाही भी तो जारी रखना होता है....

(मदर टेरेसा की जो “छवि” है, उसे धूमिल करने का मेरा कोई इरादा नहीं है, इसीलिये इसमें सन्दर्भ सिर्फ़ वही लिये गये हैं जो पश्चिमी लेखकों ने लिखे हैं, क्योंकि भारतीय लेखकों की आलोचना का उल्लेख करने भर से “सांप्रदायिक” घोषित किये जाने का “फ़ैशन” है... इस लेख का उद्देश्य किसी की भावनाओं को चोट पहुँचाना नहीं है, जो कुछ पहले बोला, लिखा जा चुका है उसे ही संकलित किया गया है, मदर टेरेसा द्वारा किया गया सेवाकार्य अपनी जगह है, लेकिन सच यही है कि कोई भी धर्म हो इस प्रकार की “हरकतें” होती रही हैं, होती रहेंगी, जब तक कि आम जनता अपने कर्मों पर विश्वास करने की बजाय बाबाओं, संतों, माताओं, देवियों आदि के चक्करों में पड़ी रहेगी, इसीलिये यह दूसरा पक्ष प्रस्तुत किया गया है)

सन्दर्भ – महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति साहित्य (डॉ. इन्नैय्या नरिसेत्ति)

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Double Standards of Congress

जरा इनके बयानों का विरोधाभास देखिये....

हजारों सिखों का कत्लेआम – एक गलती
कश्मीर में हिन्दुओं का नरसंहार – एक राजनैतिक समस्या

गुजरात में कुछ हजार लोगों द्वारा मुसलमानों की हत्या – एक विध्वंस
बंगाल में गरीब प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी – गलतफ़हमी

गुजरात में “परजानिया” पर प्रतिबन्ध – साम्प्रदायिक
“दा विंची कोड” और “जो बोले सो निहाल” पर प्रतिबन्ध – धर्मनिरपेक्षता

कारगिल हमला – भाजपा सरकार की भूल
चीन का 1962 का हमला – नेहरू को एक धोखा

जातिगत आधार पर स्कूल-कालेजों में आरक्षण – सेक्यूलर
अल्पसंख्यक संस्थाओं में भी आरक्षण की भाजपा की मांग – साम्प्रदायिक

सोहराबुद्दीन की फ़र्जी मुठभेड़ – भाजपा का सांप्रदायिक चेहरा
ख्वाजा यूनुस का महाराष्ट्र में फ़र्जी मुठभेड़ – पुलिसिया अत्याचार

गोधरा के बाद के गुजरात दंगे - मोदी का शर्मनाक कांड
मेरठ, मलियाना, मुम्बई, मालेगाँव आदि-आदि-आदि दंगे - एक प्रशासनिक विफ़लता

हिन्दुओं और हिन्दुत्व के बारे बातें करना – सांप्रदायिक
इस्लाम और मुसलमानों के बारे में बातें करना – सेक्यूलर

संसद पर हमला – भाजपा सरकार की कमजोरी
अफ़जल गुरु को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद फ़ाँसी न देना – मानवीयता

भाजपा के इस्लाम के बारे में सवाल – सांप्रदायिकता
कांग्रेस के “राम” के बारे में सवाल – नौकरशाही की गलती

यदि कांग्रेस लोकसभा चुनाव जीती – सोनिया को जनता ने स्वीकारा
मोदी गुजरात में चुनाव जीते – फ़ासिस्टों की जीत

सोनिया मोदी को कहती हैं “मौत का सौदागर” – सेक्यूलरिज्म को बढ़ावा
जब मोदी अफ़जल गुरु के बारे में बोले – मुस्लिम विरोधी

क्या इससे बड़ी दोमुँही, शर्मनाक, घटिया और जनविरोधी पार्टी कोई और हो सकती है?


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रविवार, 23 दिसम्बर 2007 11:05

सोनियाजी ऐसी भी क्या दुश्मनी!!!

Sonia Gandhi Amitabh Bachchan Rivalry

आमतौर पर एक सामाजिक मान्यता है कि भले ही आप किसी परिवार में मांगलिक अवसरों पर उपस्थित न हो सकें तो चलेगा, लेकिन उस परिवार की गमी में अवश्य शामिल होना चाहिये, चाहे उस परिवार से आपका कितना ही मनमुटाव क्यों ना हो... अमिताभ बच्चन की माँ अर्थात तेजी बच्चन के अन्तिम संस्कार में गाँधी परिवार का एक भी सदस्य मौजूद नहीं था, जबकि भैरोंसिंह शेखावत अपने खराब स्वास्थ्य के बावजूद इसमें शामिल हुए।

उल्लेखनीय है कि तेजी बच्चन एक संभ्रांत सिख परिवार की बेटी थीं, जिन्होंने अपने परिवार के भारी विरोध के बावजूद उस जमाने में एक कायस्थ से प्रेम विवाह किया। हालांकि उनके दबंग व्यक्तित्व को रेखांकित करने के लिये यही एक तथ्य काफ़ी है, लेकिन इसके भी परे उन्होंने अपने बच्चों अमिताभ और अजिताभ को बेहतर संस्कार दिये और उन्हें एक मृदुभाषी और संस्कारित व्यक्ति बनाया।

तेजी बच्चन के स्व.इन्दिरा गाँधी से व्यक्तिगत सम्बन्ध रहे और उन्होंने हमेशा राजीव गाँधी को अपने पुत्र के समान माना और स्नेह दिया। जब सोनिया माइनो से राजीव का विवाह तय हुआ उस समय सोनिया को भारतीय संस्कारों और परम्पराओं की जानकारी देने के लिये इंदिरा गाँधी ने तेजी से ही अनुरोध किया था, और एक तरह से तात्कालिक रूप से सोनिया का कन्या पक्ष बच्चन परिवार ही था, और चूँकि भारतीय पद्धति से विवाह (देखें लिंक दिखावे के लिये ही सही) हो रहा था इसलिये “कन्यादान” जैसी रस्म भी बच्चन परिवार ने ही निभाई थी। दो परिवारों के बीच इतने “प्रगाढ़” सम्बन्ध होने के बावजूद ऐसा क्या हो गया कि अब सोनिया एक महत्वपूर्ण शोक के अवसर पर नदारद रहीं। क्या राजनीति और अहं की परछाईयाँ इतनी लम्बी होती हैं कि व्यक्ति अपने सामान्य नैतिक व्यवहार तक भूल जाता है? क्या बच्चन परिवार ने गाँधी परिवार का इतना बुरा कर दिया है कि इस मौके पर भी कम से कम राहुल गाँधी को उपस्थित रहने का निर्देश भी सोनिया नहीं दे सकीं? अब तक तो बच्चन परिवार की ओर से शालीन बर्ताव के कारण यह पता नहीं चल सका है कि इन दोनों परिवारों में मनमुटाव की ऐसी स्थिति क्यों और कैसे बनी (अब तक तो यही देखने में आया है कि अमिताभ के खिलाफ़ आयकर विभाग को सतत काम पर लगाया गया, जया बच्चन की राज्यसभा सदस्यता “दोहरे लाभ पद” वाले मामले में कुर्बान करनी पड़ी) लेकिन एक बार बीच में राहुल के मुँह से निकल गया था कि “बच्चन परिवार ने हमारे साथ विश्वासघात किया है”... हो सकता है कि ऐसी कोई बात हो भी, लेकिन भारतीय संस्कृति में और इतने बड़े सार्वजनिक पद पर रहने के कारण सोनिया का यह फ़र्ज बनता था कि अपने “दुश्मन” के यहाँ इस अवसर पर उपस्थित रहतीं, या परिवार के किसी सदस्य को भेजतीं, और नहीं तो कम से कम एक बयान जारी करके अखबारों में ही संवेदना प्रकट कर देतीं, लेकिन शायद “इटली” के संस्कार भारतीय बहू(?) पर भारी पड़ गये.... ऐसी भी क्या दुश्मनी!!!!!


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Secularism BJP and Power Cut

शीर्षक पढ़कर पाठक चौंके होंगे कि लाईट जाने और धर्मनिरपेक्षता का क्या सम्बन्ध है? दरअसल हमारे उज्जैन में रोजाना सुबह 8.00 बजे से 10.00 बजे तक घोषित रूप से बिजली कटौती होती है (अघोषित तो अघोषित होती है भाई), तो आज मैंने घरवालों से शर्त लगाई थी कि आज बिजली कटौती नहीं होगी और मैं शर्त जीत गया। अब सोचिये कि लाईट क्यों नहीं गई? अरे भाई, आज “ईद” थी ना!!! अब आप सोच रहे होंगे कि भला इससे “धर्मनिरपेक्षता” का क्या सम्बन्ध है, तो सुनिये...हिन्दुओं के सबसे बड़े पर्व दीपावली के दिन भी सुबह नियमित समय पर कटौती हुई, सिखों के सबसे बड़े त्यौहार गुरुनानक जयन्ती के दिन भी लाईट गई थी, लेकिन चूँकि भाजपा को भी कांग्रेस की तरह धर्मनिरपेक्ष “दिखाई देने” का शौक चर्राया है, इसलिये आज सुबह ईद के उपलक्ष्य में लाईट नहीं गई (और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा)... अब मैं इन्तजार कर रहा हूँ कि क्रिसमस के दिन क्या होता है, यदि भाजपा को “थोड़ा कम” धर्मनिरपेक्ष होना होगा तो उस दिन लाईट जायेगी, और यदि “पूरा धर्मनिरपेक्ष” बनना होगा तो क्रिसमस के दिन भी लाईट नहीं जायेगी। भले ही पूरे प्रदेश में बिजली की कमी हो, लेकिन ईद और क्रिसमस के दिन दोगुना पैसा देकर भी बिजली खरीदी जायेगी (पैसा नेताओं की जेब से थोड़े ही जा रहा है)..... यहाँ तक कि आज तो नल भी दोनों टाईम आयेंगे ताकि कटे हुए लाखों बकरों के खून को आसानी से बहाया जा सके.... इसे कहते हैं असली धर्मनिरपेक्षता!!!

मप्र में हाल के दो उपचुनावों में भाजपा द्वारा जूते खा लेने के बाद उसे अगले वर्ष होने वाले चुनावों के लिये “धर्मनिरपेक्ष” दिखना जरूरी है, यह अन्तर है बाकी भाजपा में और गुजरात के मोदी में। मोदी “हिप्पोक्रेट” नहीं हैं, वे जो हैं वही दिखते भी हैं और इसीलिये उनका हिन्दू वोट बैंक(?) सुरक्षित है, जबकि भाजपा के बाकी नेता साफ़-साफ़ यह जान लेने के बावजूद कि मुसलमानों का वोट उन्हें कभी नहीं मिलेगा, इस तरह के करतबों से बाज नहीं आ रहे। “कन्धार विमान अपहरण” के शर्मनाक हादसे (जब पूरी दुनिया में हमने यह साबित कर दिया था कि हम नपुंसक हैं) के बाद स्वर्गीय कमलेश्वर जी को मैंने दो पत्र लिखे थे, (जिसका जवाब भी उन्होंने दिया था)। उन पत्रों में मैंने उनसे कहा था कि कन्धार मामले को भाजपा ने जैसे “सुलझाया”(?) है, उससे भाजपा के कट्टर समर्थक भी उससे दूर हो गये हैं, और अगले आम चुनावों में “इंडिया शाइनिंग” कितना भी कर ले, उन्हें हारना तय है और वही हुआ भी। कंधार प्रकरण ने भाजपा को देश-विदेश में अपनी छवि चमकाने का शानदार मौका दिया था और उसने वीपी सिंह (रूबिया सईद अपहरण कांड) और नरसिंहराव (हजरत बल दरगाह चिकन कांड) का रास्ता अपनाकर उसे गँवा दिया। भाजपा को अपने “कैडर” यानी संघ की विचारधारा के अनुसार काम करना चाहिये, लेकिन जब भी वह कहीं भी सत्ता में आती है, पार्टी और सरकार पर धनपतियों और नकली संघियों का कब्जा हो जाता है, दरी बिछाने से लेकर मतदाता पर्ची तैयार करने वाले आम कार्यकर्ता को भुला दिया जाता है। यही गलती पहले कांग्रेस करती थी, और इसीलिये अब वह नेताओं की पार्टी हो गई है, वहाँ कोई कार्यकर्ता नहीं बचा है। भाजपा अब भी इसी दुविधा में है कि उसे हिन्दूवादी होना चाहिये या धर्मनिरपेक्षता का कांग्रेसी ढोंग करना चाहिये.... और जब तक वह इस दुविधा में रहेगी जूते खाती रहेगी...यानी धर्मनिरपेक्ष(?) लोगों को खुश होना चाहिये। और बाकी लोगों को पैसा कमाने से थोड़ी फ़ुरसत मिल जाये तो अपने आसपास निगाह दौडा कर देख लीजिये, कितनी गुमटियाँ, कितनी झुग्गियाँ और अचानक "उग" आई हुई दरगाहें आपको दिखाई देती हैं.... जिन पर सिर्फ़ सरकार और प्रशासन की निगाह नहीं पड़ती...

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Higher Education in MP & Arjun Singh

प्रसिद्ध उपन्यास “राग दरबारी” में पंडित श्रीलाल शुक्ल लिख गये हैं कि “भारत में शिक्षा व्यवस्था, चौराहे पर पड़ी हुई उस कुतिया के समान है, जिसे हर आता-जाता और ऐरा-गैरा लतियाता रहता है”। भारत में उच्च शिक्षा के क्या हालात हैं यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। विश्वविद्यालयों में जिस प्रकार की अराजकता, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और बन्दरबाँट है, वह लगभग सरेआम जब-तब उजागर होती ही रहती है। लेकिन यह किस्सा है “ओबीसी के मसीहा”, “मध्यप्रदेश के वरिष्ठतम”, प्रशासनिक चुस्ती(?) के लिये पहचाने जाने वाले, मप्र में झुग्गीवासियों को पट्टे देने वाले, शिक्षा जगत में “जनरल प्रमोशन” नाम का नायाब “आइडिया” लाने वाले.... (अब क्या नाम भी बताना पड़ेगा...?) अर्थात कई बार प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गये अर्जुनसिंह के गृहराज्य यानी हमारे मध्यप्रदेश का।

यूँ तो मध्यप्रदेश का नाम उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कोई खास सम्मान के साथ नहीं लिया जाता, लेकिन कुछ संस्थान भोपाल, ग्वालियर और इन्दौर में हैं जो सतत अच्छे क्रियाकलाप और शानदार शैक्षणिक रिकॉर्ड के लिये जाने जाते हैं, वरना अधिकतर नामी-गिरामी शिक्षा संस्थान, आईआईटी और आईआईएम तो अन्य राज्यों में हैं। यहाँ तक कि कोचिंग को एक इंडस्ट्री का रूप देने वाला कोटा भी राजस्थान में है।

बहरहाल बात हो रही है मध्यप्रदेश की, यहाँ की राजधानी भोपाल में एक राष्ट्रीय स्तर का तकनीकी शिक्षा संस्थान है मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (MANIT)। इस संस्थान में देश के श्रेष्ठ छात्रों को प्रवेश AIEEE की परीक्षा देने के बाद ही मिलता है। इस संस्थान के बारे में पिछले दो-तीन वर्षों से कई शिकायतें मिल रही थीं, कुछ मीडिया में आती रहीं, कुछ पर छात्रों के पालकों ने कार्रवाई के लिये लिखा। आखिर दबाव के आगे झुकते हुए माननीय अर्जुन सिंह ने मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा एक जाँच करवाई, दुर्भाग्य से जिसके जाँचकर्ता थे मप्र के ही एक वरिष्ट रिटायर्ड आईए‍एस डॉ.एम.एन.बुच। “दुर्भाग्य” इसलिये कहा, क्योंकि इन ईमानदार अधिकारी ने संस्थान की जाँच के बाद जो रिपोर्ट पेश की उसमें उन्होंने सब कुछ सच-सच उजागर कर दिया, और अब श्री अर्जुन सिंह के समक्ष इस खलबली मचाने वाली रिपोर्ट पर कुछ कार्रवाई करने के अलावा कोई चारा ही नहीं है। जरा एक नजर डालिये रिपोर्ट के कुछ खास बिन्दुओं पर, जिससे आपको पता चलेगा कि “जब बागड़ ही खेत खाने लगे, तो खेत का क्या हाल होता है”, या फ़िर ऐसे कहूँ कि यदि “चोर को ही खजाने की चाबी सौंप दी जाये तो क्या होता है”....

(१) नियुक्तियाँ – इस सम्मानित(?) संस्था में मौजूदा डीन और प्रभारी निदेशक डॉ. आशुतोष शर्मा की पदोन्नति नियमों के विपरीत है, वे प्रोफ़ेसर के रूप में पदोन्नत होने की न्य़ूनतम योग्यता भी नहीं रखते और इसीलिये उनकी नियुक्ति अवैध है। आशुतोष शर्मा के भाई अभय शर्मा को १४ जुलाई २००५ को सिविल इंजीनियरिंग विभाग में असि.प्रोफ़ेसर बनाया गया, बताया गया कि उन्हें “उद्योग” का अनुभव है, जबकि प्रदेश के लोक निर्माण विभाग को उद्योग नहीं माना जा सकता, न ही यह पीएचडी के समकक्ष है। बुच साहब ने लिखा है कि पिछले दो साल में (अर्थात जब से यूपीए सरकार आई और अर्जुन सिंह HRD मंत्री बने) इस संस्थान में हुई नियुक्तियों में 49 फ़ैकल्टी सदस्य आपस में रिश्तेदार हैं। इनकी नियुक्ति के लिये जिम्मेदार निदेशक, फ़ैकल्टी मेम्बर और चेयरमैन पर कार्रवाई होना चाहिये और जिनकी मिलीभगत से यह सब हुआ उन्हें गिरफ़्तार किया जाना चाहिये। अब कम से कम भारत में तो यह सम्भव ही नहीं है कि किसी केन्द्रीय शिक्षा संस्थान में एक पत्ता भी मंत्रीजी की मर्जी के बिना हिल जाये।

(२) ठेके – वर्ष 2006 में संस्थान में कुल साढ़े सात करोड़ के काम हुए जिसमें से साढ़े छः करोड़ के काम एक ही कम्पनी एसएस कंस्ट्रक्शन को दिये गये, जिसकी जाँच(?) जारी है।

असल में “डीम्ड यूनिवर्सिटी” बनाकर इसका कबाड़ा कर दिया गया है। अब यहाँ कोई बाहरी नियंत्रण नहीं है, पढ़ाना, परीक्षा लेना, पास करना, नियुक्तियाँ करना, सब कुछ स्थानीय स्तर पर ही होता है। इन सबका लाभ एक खास “गिरोह” उठा रहा है, जिसके खास राजनैतिक संपर्क हैं। जो भी नया निदेशक नियुक्त होता है, उसके खिलाफ़ खबरें छपवाना, उसे दबाव में लाना और फ़िर अपना सिक्का चलाना इस गिरोह के काम हैं। संस्थान के अंदरूनी हालात बदतर हो चुके हैं। डायरेक्टर कोई भी आदेश निकाले, कोई भी उसे नहीं मानता। संस्थान से सम्बन्धित कानूनी मामलों की लगभग 70 फ़ाईलें गायब हो चुकी हैं। शिक्षा प्रेमियों, प्राध्यापकों, विद्यार्थियों और पालकों ने जब-जब भी कोई शिकायत की वे सीधे कचरे के डिब्बे में जा पहुँची। तीन साल पहले अर्जुनसिंह ने देश के सारे एन‍आईटी निदेशकों को बिना सोचे-समझे बदल दिया (उनका मानना था कि सभी निदेशक मुरलीमनोहर जोशी के करीबी हैं और भाजपा के हैं)। इस क्रम में देश के एक बड़े वैज्ञानिक डीडी भवालकर के स्थान पर एक पूर्व विधायक को संस्थान का अध्यक्ष बना दिया गया, इसी से पता चलता है कि मानव संसाधन मंत्रालय की क्या इच्छा(!) थी। इसी प्रकार डॉ.पी.के.चांदे भी कोई आरएसएस के सदस्य नहीं है, बल्कि मप्र के तकनीकी शिक्षा जगत का एक जाना-माना नाम है, लेकिन उन्हें भी हटा दिया गया। चांदे साहब एक पुस्तक लिखने वाले हैं जिसमें सन 2003 से 2005 के बीच जिस शिक्षा माफ़िया का उन्होंने “अनुभव” किया उसकी जानकारी देंगे। भवालकर कहते हैं कि इतने बड़े तकनीकी संस्थान के रहते मप्र में उच्च शिक्षा का स्तर बहुत आगे जाना चाहिये था, लेकिन यह राजनीति में कुछ ऐसा उलझा कि अपना स्तर ही खो बैठा है।

यह रिपोर्ट गत जून में मंत्रालय में भेजी गई थी, और शायद आज तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, कारण खोजने की जरूरत नहीं है। मैनिट मप्र की नाक है, पूरे देश में ऐसे मात्र 20 संस्थान हैं लेकिन उसमें भोपाल का यह संस्थान शायद अन्तिम क्रम पर है। मप्र वालों को उम्मीद थी कि कम से कम अर्जुन सिंह के रहते इसका नाम त्रिची या वारंगल जैसे नामी तकनीकी शिक्षण संस्थाओं के साथ लिया जायेगा, लेकिन किसी ने सही कहा है कि राजनेता आजीवन राजनेता ही रहता है, चाहे वह किसी भी उम्र का हो।

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Congrats Secularist Communists

१३ दिसम्बर को संसद पर हमले के छः बरस बीत गये। एक “परम्परा” की तरह हमारे प्रधानमंत्री (सचमुच?), लौहपुरुष (?) आडवाणी, एक गृहमंत्री नामक मोम के पुतले और “मम्मी के दुलारे” राहुल गाँधी ने शहीदों को याद करते हुए पुष्प अर्पित किये। उसी सभा के दौरान एक शहीद नानकचन्द की विधवा ने विलाप करते हुए कथित नेताओं को खरी-खरी सुनाते हुए बताया कि छः साल से उसे कोई सरकारी मदद नहीं मिली है। उसे एक पेट्रोल पंप आबंटित हुआ था, लेकिन उसे आज तक जमीन नहीं मिली (शायद सरकार “SEZ” के लिये जमीन हथियाने में व्यस्त होगी), और उस विधवा को शिकायत करने के कारण धकिया कर बाहर कर दिया गया।


(चित्र में नेताओं को आपबीती सुनाते हुए शहीद की विधवा)
दूसरी तरफ़ हमारे मानवाधिकार वाले भी खुश हो रहे होंगे कि चलो छः साल बीत गये आज तक हम अफ़जल को फ़ाँसी से बचाने में कामयाब रहे हैं। वामपंथियों और सेकुलरों का तो क्या कहना, उन्हें तो गुजरात में वोटों की फ़सल लहलहाती दिख रही होगी। क्या कहें ऐसे नेताओं को! जो अपनी ही जान बचाने वालों के परिजनों से ऐसा बर्ताव करते हों, इन नेताओं को तो रीढ़विहीन (Spineless) कहना भी इनका सम्मान ही होगा, इन्हें “हिजड़ा” कहना भी उचित नहीं है क्योंकि हिजड़ों को भी कभी-कभी गुस्सा आता है और वे भी अपना आत्मसम्मान बरकरार रखते ही हैं, लेकिन हमारे नेताओं ने तो अपना आत्मसम्मान पता नहीं किस रिश्वत के तले दबा कर रख दिया है।

सरकार को चिंता है कि हिन्दू देवियों की नग्न तस्वीरें बनाने वाला एमएफ़ हुसैन कैसे भारत लौटे, तसलीमा नसरीन के पेट में दर्द ना हो, दलाई लामा की तबियत ठीक रहे, या फ़िर तेलगी, सलेम, शहाबुद्दीन को कोई तकलीफ़ तो नहीं है, अफ़जल गुरु को चिकन बराबर मिल रहा है या नहीं... आदि-आदि... है ना परोपकारी सरकारें.. लेकिन खुद की जान की बाजी लगा कर इन घृणित लोगों की जान बचाने वालों का कोई खयाल नहीं... इसीलिये मेरा भारत महान है! क्या अभी भी यकीन नहीं हुआ? अच्छा चलो बताओ, कि ऐसा कौन सा देश है जिसके शांतिप्रिय नागरिक अपने ही देश में शरणार्थी हों... जी हाँ सही पहचाना... भारत ही है। कश्मीरी पंडितों को दिल्ली के बदबूदार तम्बुओं में बसाकर सरकारों ने एक पावन काम किया हुआ है और दुनिया को बता दिया है कि देखो हम कितने “सेकुलर” हैं। कांग्रेस की एक सफ़लता तो निश्चित है, कि उसने “सेकुलर” शब्द को लगभग एक गाली बनाकर रख दिया है। अभी भी विश्वास नहीं आया... लीजिये एक और सुनिये... समझौता एक्सप्रेस बम विस्फ़ोट में मारे गये प्रत्येक पाकिस्तानी नागरिक को दस-दस लाख रुपये दिये गये, मालेगाँव बम विस्फ़ोट में मारे गये प्रत्येक मुसलमान को पाँच-पाँच लाख रुपये दिये गये, और हाल ही में अमरावती में दंगों में लगभग 75 करोड़ के नुकसान के लिये 137 हिन्दुओं को दिये गये कुल 20 लाख। ऐसे बनता है महान राष्ट्र।

लेकिन एक बात तो तय है कि जो कौम अपने शहीदों का सम्मान नहीं करती वह मुर्दा कौम तो है ही, जल्द ही नेस्तनाबूद भी हो जाएगी, भले ही वह सॉफ़्टवेयर शक्ति हो या कथित “महान संस्कृति” का पुरातन देश....


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Negative Voting Indian Elections

क्या आप जानते हैं कि हमारे संविधान की एक धारा 49-O में एक प्रावधान है जिसके अनुसार किसी भी चुनाव में मतदाता पोलिंग बूथ पर जाये, अपनी पहचान और मतदाता क्रमांक साबित करे, अपनी उंगली पर स्याही लगवाये, और फ़िर चुनाव अधिकारी से यह कहे कि मैं किसी को वोट नहीं करना चाहता। सवाल उठता है कि हमें ऐसा क्यों करना चाहिये? मान लीजिये कि आपके वार्ड चुनावों में लगभग सारे प्रत्याशी या तो गुंडे-बदमाश हैं (90% तो होते ही हैं), या फ़िर कोई निकम्मा उम्मीदवार पुनः मैदान में है और आप चाहते हैं कि सभी तो नालायक हैं, मैं क्यों वोट दूँ? उस वक्त यह धारा काम आयेगी... मान लीजिये कि आपके वार्ड से कोई प्रत्याशी 123 वोटों से जीतता है, लेकिन यदि उसी वार्ड में 124 वोट “मुझे किसी को वोट नहीं देना” वाली धारा 49-O के निकलते हैं तो न सिर्फ़ उस प्रत्याशी का चुनाव रद्द हो जायेगा, बल्कि जब पुनः चुनाव होंगे उस वक्त पिछले सारे प्रत्याशियों को चुनाव में भाग लेने का मौका नहीं मिलेगा, इस प्रकार अपने-आप सभी उम्मीदवार खारिज हो जायेंगे। यह धारा “Conduct of Election Rules” सन्‌ १९६१ में उल्लिखित है। इस धारा को हमारे नेताओं ने जानबूझकर प्रचारित नहीं किया, लेकिन आश्चर्यजनक यह भी है कि चुनाव आयोग और शेषन जैसे अधिकारियों ने भी जनता को इस बारे में जागरूक करने का प्रयास नहीं किया। पड़ताल करने पर पता चला कि इस धारा के उपयोग और इलेक्ट्रानिक मशीनों में “निगेटिव” (इनमें से कोई नहीं) वाला बटन लगाने सम्बन्धी याचिका उच्चतम न्यायालय में लम्बित है, और उस पर निर्णय आना बाकी है। इस सम्बन्ध में पत्रकार एस.दोराईराज ने अप्रैल २००६ में एक लेख लिखा था|


“किसी भी प्रत्याशी को वोट नहीं” के प्रावधान वाली भारतीय संविधान की धारा 49-O के बारे में जब मैंने गत दिनों मित्रों को ई-मेल किया था, तो अधिकतर की सलाह थी कि इसे मैं ब्लॉग पर डालूँ, फ़िर मैंने इस सम्बन्ध में कुछ जाँच-पड़ताल की तो पाया कि वाकई इस प्रकार की धारा हमारे चुनाव संविधान में उपलब्ध है। गत वर्ष तमिलनाडु विधानसभा के दौरान वहाँ के मुख्य चुनाव अधिकारी नरेश गुप्ता ने स्वीकार किया था कि इस प्रकार के प्रावधान होने की जानकारी एक “एनजीओ” ने माँगी थी, कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में भी “नकारात्मक वोटिंग” नामक एक बटन होना चाहिये। “पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज” नामक संस्था ने यह याचिका उच्चतम न्यायालय में लगाई है। यदि मित्रों को इस याचिका की वर्तमान स्थिति के बारे में पता हो तो उसे अपने-अपने ब्लॉग पर डालें, और नहीं तो कम से कम इस धारा के बारे में जनता को अवगत कराते रहें, कभी-न-कभी तो लोग इस बारे में समझने लगेंगे, और कुछ नहीं तो पार्टियों और उम्मीदवारों में एक भय की लहर तो दौड़ेगी। और भले ही यह जानकारी कुछ लोगों को पहले से ही हो, लेकिन मेरी तरह कई लोग और भी होंगे जिन तक यह जानकारी पहुँचना आवश्यक है, इसलिये इसे ब्लॉग पर डाल रहा हूँ....


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Malaysia Crisis and Indians

वही पुरानी कहानी एक बार फ़िर दोहराई गई, एक “तथाकथित” सेकुलर देश ने, एक दूसरे तथाकथित “महाशक्ति” को दुरदुराये हुए कुत्ते की तरह हड़का दिया। करुणानिधि ने तो अपना “वोट-बैंक” पक्का कर लिया, लेकिन हमारी सेकुलर(?) सरकार की जैसी घिग्घी बँधना थी, ठीक वैसी ही बँधी, क्योंकि मलेशिया भले ही कहने को सेकुलर हो, उसकी रगों में खून तो “वही” दौड़ रहा है, और हम ठहरे “स्वघोषित महाशक्ति”, सो किसी को नाराज भी नहीं कर सकते। और मानो गलती से कभी दहाड़ लगा भी दी, तो सुनेगा कौन हमारी? एक अहसानफ़रामोश पड़ोसी तक तो हमें जब-तब गरियाता-लतियाता रहता है। अपने आदमी देश के कोने-कोने में भेज कर डकैतियाँ डलवा रहा है, हमारे यहाँ की चिल्लर गायब करवा रहा है, ये हैं कि “वार्ता” का ढोंग कर रहे हैं।

खैर, मलेशिया पर वापस लौटते हैं... इस समस्या से उत्पन्न तीन पहलू तुरन्त नजर आते हैं- पहला है, क्यों भारतवंशियों पर ही लगातार समूचे संसार में हमले बढ़ते जा रहे हैं? कारण (मेरी नजर से) – शायद वहाँ के स्थानीय लोग भारतीयों की तरक्की से जलते होंगे, या फ़िर खुद भारत से गये हुए लोग वहाँ के समाज में घुल-मिल नहीं पाते होंगे, जिससे संवादहीनता की स्थिति बनती है। इससे एक सवाल सहज ही उत्पन्न होता है कि किसी दूसरे देश में गये भारतीयों को जब वहाँ की नागरिकता मिल गई हो, तब उन लोगों का भारत की तरफ़ मदद को ताकना क्या उचित है? ब्रिटेन या कनाडा जहाँ कहीं भारतीयों को उस देश की नागरिकता मिल गई, तो फ़िर क्यों वे हर बार भारत-भारत भजते रहते हैं, क्या यह देशद्रोह नहीं है? ठीक वैसे ही जैसे विभाजन के समय पाकिस्तान बनने पर जो मुसलमान भारत में ही रह गये यदि वे पाकिस्तान का झंडा उठाये घूमते हैं तब उन्हें देशद्रोही ही करार दिया जाता है। भले ही उनके कई रिश्तेदार पाकिस्तान में हों, लेकिन जब वे स्वयं भारत के नागरिक हैं तो उन्हें पाकिस्तान की ओर क्यों ताकना चाहिये? क्यों हर बात में पाक का गुणगान करना चाहिये? और मुसलमानों का केस तो इस केस से अलग इसलिये है क्योंकि विभाजन तो एक मानवनिर्मित त्रासदी थी, लेकिन जब कोई भारतीय अपनी स्वेच्छा से देश छोड़कर जाता है और दूसरे देश की नागरिकता ले लेता है, तब उसे वहीं के समाज में घुल-मिल जाना चाहिये, उसी देश का गुणगान करना चाहिये, उसी देश के भले के बारे सोचना चाहिये, इसलिये यदि पीड़ित तमिल मलेशिया के नागरिक हैं, तो उन्हें वहाँ के कानून के हिसाब से चलना चाहिये (मलेशिया कोई भारत थोड़े ही है कि अबू सलेम को लाने में करोड़ों खर्चा कर दिया, अब उसे संभालने में कर रहे हैं, ताकि वह सांसद बनकर और करोड़ों चरता फ़िरे)। और जो भारतीय मलेशिया के नागरिक नहीं बने हैं, उन्हें तो शिकायत करनी ही नहीं चाहिये, सीधे वापस आ जाना चाहिये (वैसे भी वह एक मुस्लिम देश है, वहाँ कोई सुनवाई तो होगी नहीं, जैसे अभी कुछ समय पहले मलयालियों के साथ अरब देशों में हुआ था)। रही बात मार खाने की, पिटने की, तो भैया जब हिन्दुस्तान में ही हिन्दू पिटता रहता है, तो बाहर उसकी क्या औकात है? चाहे फ़िजी हो, चाहे जर्मनी, चाहे अरब हो या फ़्रांस, हिन्दू कुटने के लिये ही पैदा हुआ है (दूसरा गाल सतत आगे जो करता रहा है)।

दूसरा पक्ष है सरकार- चाहे वह कथित हिन्दू समर्थक भाजपा की ही सरकार क्यों ना हो, विदेशों में हमारी सरकारों की एक नहीं चलती, कोई इनकी “चिंताओं” पर कान नहीं देता, और दे भी क्यों? हमने किया क्या है आज तक ईमानदारी से जनसंख्या बढ़ाने, जन्म से लेकर मृत्यु तक भ्रष्टाचार करने और जाति-धर्म के नाम पर लड़ने के अलावा। हाँ एक बात हमने जरूर की है...जमाने भर से हथियार पूरे पैसे एडवांस देकर खरीदे हैं और उन्हें कभी उपयोग नहीं किया। “भारतवंशी-भारतवंशी” नाम की बंसी जरूर हम यदा-कदा बजाते रहते हैं, बेशर्मी से ये भी कभी नहीं सोचते कि ना तो सुनीता विलियम्स, न तो बॉबी जिन्दल, ना स्वराज पॉल, ना ही वीएस नायपॉल कोई भी भारत का नागरिक नहीं है, ना इन्हें भारत से कोई खास लगाव है।

तीसरा पक्ष है, भारतीयों की हीनभावना से ग्रस्त मानसिकता। हमारे दिमाग में यह भर दिया गया है कि हमारा कोई गौरवशाली इतिहास था ही नहीं, शिवाजी, पृथ्वीराज चौहान वगैरह भगौड़े थे, सिर्फ़ अकबर ने या फ़िर डलहौजी साहब ने ही कुछ किया है, वरना हम तो साँपों से ही खेल रहे होते अब तक! आत्मसम्मान नाम की चीज एक खास मानसिकता के लोगों ने षडयन्त्रपूर्वक समाप्त कर दी। जहाँ किसी ने “गर्व” की बात की, तड़ से उसे सांप्रदायिक ठहरा दो।

तो भाईयों और बहनों, चादर तानकर सो जाईये, जैसे रामभरोसे देश चल रहा है वैसे ही आगे भी चलता रहेगा, करना ही है तो पहले अपने देशवासियों की फ़िक्र करो, फ़िर उनके बारे में सोचना जो दूसरे देशों के नागरिक हैं।

प्राप्त सबक :
(१) किसी भी दूसरे देश में खासकर जब वह मुस्लिम बहुल हो, भारतीयों को किसी भी प्रकार की हमदर्दी की अपेक्षा नहीं रखना चाहिये। (लोकतंत्र और निरपेक्ष न्याय प्रणाली मुस्लिम देशों के लिये अभी भी अजूबा हैं)
(२) जिस देश के नागरिक बन चुके हो उसी देश का गुणगान करो (कहावत- जिसकी खाओ, उसकी बजाओ)
(३) यदि विपरीत परिस्थिति हो भी जाये तो “भारत सरकार” नाम की लुंजपुंज संस्था से किसी मदद की उम्मीद मत करो।
(४) इसराइलियों की तरह आत्मसम्मान से जीने की कोशिश करना चाहिये।


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