शायद तेलंगाना का इस्लाम, भेदभाव में यकीन रखता है...

Written by सोमवार, 17 अप्रैल 2017 08:32

तेलंगाना सरकार के दोनों सदनों ने ध्वनिमत से यह प्रस्ताव पारित कर दिया है कि सरकारी नौकरियों तथा शैक्षणिक संस्थाओं में अनुसूचित जनजाति के लोगों का आरक्षण छह प्रतिशत से बढाकर दस प्रतिशत तथा मुस्लिमों के पिछड़े वर्ग का आरक्षण चार प्रतिशत से बढ़ाकर बारह प्रतिशत कर दिया जाएगा.

जल्द ही इस प्रस्ताव को राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएगा, जहां उसके खारिज होने की पूरी संभावना है, क्योंकि यह संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है. संविधान के अनुसार केवल हिन्दू धर्म की दलित, पिछड़ी और अनुसूचित जाति-जनजातियों को ही आरक्षण दिया जा सकता है, धार्मिक आधार पर नहीं. लेकिन मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, सदन में आरक्षण का यह झुनझुना बजाने से उनका वोटबैंक तो पक्का हो गया. अब चाहे इसके लिए उन्हें संसद में नौटंकी करनी पड़े, या सुप्रीम कोर्ट के सामने फालतू की बहस करनी पड़े. 

अक्सर आपने “अल-तकैया” करने वाले कथित इस्लामिक बुद्धिजीवियों से यह वाक्य जरूर सुना होगा, कि “इस्लाम बराबरी का मज़हब है, इसमें कोई भेदभाव नहीं होता... वगैरा-वगैरा-वगैरा”. लेकिन जब भी मुस्लिमों को आरक्षण देने की बात आती है तो ये बुद्धिजीवी तत्काल “कटोरा” लेकर खड़े हो जाते हैं. वे यह भूल जाते हैं कि जब इस्लाम में “तथाकथित” बराबरी है, तो फिर आरक्षण किस बात का? और यदि यह आरक्षण इस बात के लिए है कि मुस्लिम तबके में कुछ वर्ग ‘आर्थिक” रूप से पिछड़े हुए हैं, तो फिर यह नियम ब्राह्मणों सहित भारत की अनेक सवर्ण जातियों-पंथों पर भी लागू होता है. लेकिन इस्लामी बुद्धिजीवी (और उनके सुर में सुर मिलाने वाले हिन्दू बौद्धिक भाण्ड) इस बात का कोई जवाब नहीं देते. यही दोगला व्यवहार तथा ढोंग भरा रवैया चर्च का भी है. जॉन दयाल समेत ढेरों “धर्म परिवर्तक” टीवी पर और अपने विज्ञापनों में चीखते रहेंगे कि ईसाई धर्म बराबरी का धर्म है, इसमें ऊंचनीच नहीं मानी जाती.. ब्ला ब्ला ब्ला..”. लेकिन आए दिन दलित ईसाई नामक भ्रामक अवधारणा को लेकर “आरक्षण की भीख का कटोरा” इनके हाथ में देखा जा सकता है. हिन्दुओं में नाम के हिन्दू यानी प्रगतिशील बुद्धिजीवी कभी इस बात का जवाब नहीं देते कि “दलित ईसाई” क्या चीज़ होती है? या तो वह दलित होगा (यानी हिन्दू धर्म के अनुसार अजा-जजा) या फिर वह ईसाई होगा (जिसका धर्म परिवर्तन हो चुका है)... फिर ये “दलित ईसाई” नामक वर्णसंकर प्राणी कौन है? और क्यों है? जब वह ईसाई बन ही चुका है तो उसके साथ भेदभाव और ऊंचनीच ख़त्म हो गई होगी, फिर उसे आरक्षण क्यों चाहिए?? और यदि वह दलित ही है, तो उसे संविधान के अनुसार आरक्षण मिलेगा ही, इसमें चर्च को दखल देने की जरूरत क्या है?

लेकिन जैसा कि ऊपर कहा, हमारे देश के दोगले किस्म के बुद्धिजीवी और राजनेता ऐसे असुविधाजनक प्रश्नों का जवाब नहीं देते हैं. उन्हें सिर्फ हिन्दू धर्मावलम्बियों और खासकर सवर्णों को सताने में मजा आता है. तेलंगाना के इस “असंवैधानिक” क़ानून का वहां पर केवल भाजपा ने विरोध किया, लेकिन चूंकि भाजपा के केवल पाँच ही विधायक हैं, इसलिए उन्हें धक्के देकर बाहर कर दिया गया. तेलंगाना विधानसभा के इस प्रस्ताव के बाद इस राज्य में आरक्षण पचास प्रतिशत से बढ़कर बासठ प्रतिशत हो जाएगा. इस प्रस्ताव के सुप्रीम कोर्ट में खारिज होने की भी पूरी संभावना है, शायद अनुसूचित जनजाति वाला आरक्षण प्रतिशत मान्य हो जाए, लेकिन धार्मिक आधार पर मुस्लिमों या ईसाईयों को आरक्षण तो बिलकुल भी नहीं दिया जा सकता, क्योंकि खुद इस्लाम में कहा गया है अथवा जीसस की वाणी है कि “हमारे यहाँ सब बराबर हैं, कोई ऊंचा-नीचा नहीं है... किसी के साथ भेदभाव नहीं होता...”. अब ये बात और है कि सैयद-शेख-पठान जैसी उच्च जातियों के लोग कुरैशियों के यहाँ का पानी भी नहीं पीते... और शिया तथा सुन्नी एक दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते... अथवा देवबंदी-बरेलवी-सूफी आपस में एक दुसरे के खून के प्यासे होते हैं... कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट का इतिहास भी खून-आलूदा रहा है... और धर्म परिवर्तन कर चुके दलितों का कब्रिस्तान अलग होता है... खैर क्या फर्क पड़ता है, मूर्ख “हिन्दू प्रगतिशीलों” को केवल और केवल हिन्दू धर्म ही मिलता है, जिसे आराम से गाली दी जा सकती है.

नोट :- मुस्लिम बुद्धिजीवियों और हिन्दू प्रगतिशीलों का दोगलापन इस बात से भी ज़ाहिर होता है कि आरक्षण लेते समय जब “कटोरा” आगे किया जा रहा है, तब संविधान और पिछड़ेपन की दुहाई दी जा रही है, लेकिन मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के मामले में “शरीयत” के आधार पर फैसला होगा. स्वाभाविक है कि JNU छाप नकली लोग अपने मुंह में दही जमाए बैठे रहेंगे... क्योंकि तर्क और तथ्यों से इन्हें कोई लेना-देना नहीं होता, ये लोग केवल अपने विदेशी आकाओं के इशारे और सऊदी अरब या वेटिकन से मिलने वाले मोटे चन्दे के आधार पर बात करते हैं...

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