तीस्ता नदी मामला : ममता बनर्जी, मौलवियों के कब्जे में

Written by रविवार, 16 अप्रैल 2017 08:33

हाल ही में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद भारत यात्रा पर आई थीं, और इस यात्रा का उनका मुख्य उद्देश्य था तीस्ता नदी के जल बँटवारे को लेकर भारत और खासकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बातचीत करना एवं समझौते को अंतिम स्वरूप देना.

लेकिन जैसा कि पहले ही अपेक्षित था, ममता बनर्जी ने शेख हसीना वाजेद की मांग को न सिर्फ ठुकरा दिया, बल्कि यह भी कह दिया कि सिक्किम में बने हुए बाँधों की वजह से पश्चिम बंगाल में पहले ही पानी के कमी है, इसलिए तीस्ता नदी का जल बंटवारा बांग्लादेश को नहीं दिया जा सकता, अलबत्ता ममता बनर्जी इस बात को साफ़ छिपा गईं कि तीस्ता नदी का अतिरिक्त पानी गजबोदा बाँध से पश्चिम बंगाल की तरफ ही मोड़ा जाता है और यह पानी अंततः समुद्र में मिलकर बेकार ही हो जाता है.

जिस समय ममता बनर्जी के सम्बन्ध भाजपा से मधुर बने हुए थे और वे केंद्र में मंत्री भी थीं, उस समय उन्हें तीस्ता नदी के जल बँटवारे से कोई ख़ास आपत्ति नहीं थी, उस समय उनका मतभेद केवल इस बात को लेकर था कि बांग्लादेश और भारत के बीच पानी का संतुलन बना रहे और बांग्लादेश के साथ समझौता तो हो, लेकिन पानी की मात्रा किस मौसम में कितनी हो इस पर एक समिति बने. लेकिन जब से ममता बनर्जी अपने “इस्लामिक मित्रों” की सहायता से बंगाल में सत्ता पर काबिज हुई हैं (यानी पिछले छह साल से), तभी से उनके सुर बदल गए हैं. अब अचानक उन्हें बंगाल के किसानों की चिंता सताने लगी है और वे बांग्लादेश को पानी देने के खिलाफ लगातार आग उगल रही हैं. उन्होंने “मोदी सरकार को चेतावनी” देते हुए कहा है कि यदि राज्य के हितों के खिलाफ बांग्लादेश के साथ कोई समझौता किया गया तो बंगाल में अराजकता उत्पन्न हो जाएगी, खून की नदियाँ बहेंगी.

सुनने और पढने में तो यह बहुत ही अच्छा लगता है कि ममता बनर्जी को किसानों की इतनी चिंता है... लेकिन वास्तविक कारण कुछ और ही है. असल में पिछले छः वर्षों में ममता बनर्जी प्रशासन पर कट्टरवादी सलाफी मुस्लिमों का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ गया है. इन सलाफी मुस्लिम नेताओं ने एक तरह से ममता बनर्जी को “हाईजैक” कर लिया है. बंगाल सीमा पर घुसपैठ हो, तस्करी हो, आतंकियों का आवागमन हो, नकली नोटों की भारी आवाजाही हो... इन सभी मामलों में जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) के मुस्लिम नेताओं का हाथ पाया गया है. ये कट्टर जेहादी तत्व इन आपराधिक गतिविधियों के जरिये न सिर्फ करोड़ों रूपए कमा रहे हैं, बल्कि बंगाल में जनसँख्या संतुलन बिगाड़कर कई जिलों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक बना चुके हैं. हाल ही में मौलाना बरकती का नाम आपने कई बार अखबारों-चैनलों पर देखा और सुना होगा. इन जैसे कम से कम बीस कट्टर मौलाना लगातार ममता बनर्जी को घेरे रहते हैं. भारत में रहने वाले इन सभी मौलानाओं के मधुर सम्बन्ध बांग्लादेश के कट्टर संगठन “हूजी” (HUJI) हरकत-उल-जेहाद-इस्लामी के साथ हैं. तीस्ता नदी जल समझौते का असली पेंच यहीं पर फँसा हुआ है.

जैसा कि सभी जानते हैं, पिछले दस वर्षों में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद और इनकी पार्टी अवामी लीग ने 1971 के युद्ध अपराधियों (जिसमें अधिकाँश लम्बी दाढ़ी वाले मौलाना और मुल्ले हैं) को त्वरित न्यायालय में मुक़दमे चलाकर फटाफट फाँसी दी है. भारत में तो एक फाँसी पर “सेकुलर उल्टियाँ” शुरू हो जाती हैं, लेकिन बांग्लादेश जैसे 90% मुस्लिम देश में शेख हसीना ने बहादुरी दिखाते हुए बड़े-बड़े कट्टर जेहादियों को बिना किसी रहमोकरम के सीधे फाँसी पर चढाया है. बहुत से मौलवी और मदरसों में आग उगलने वाले मौलाना या तो बांग्लादेश में अंडरग्राउंड हो गए हैं, अथवा भागकर पश्चिम बंगाल चले आए हैं (क्योंकि यहाँ मुमताज़ बानोर्जी का दोस्ताना कायम है). इन सभी कट्टर सलाफी मुल्लों को यह चिंता सताए जा रही है कि यदि भारत-बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी का जल समझौता हो गया तो शेख हसीना वाजेद बांग्लादेश के किसानों में न सिर्फ लोकप्रिय हो जाएंगी, बल्कि वे इसे अपनी एक बड़ी उपलब्धि बताते हुए इसका प्रचार करेंगी और आराम से तीसरी बार भी चुनाव जीत जाएँगी. इसके बाद जमात-इ-इस्लामी और हरकत-उल-जेहाद के मौलानाओं का क्या हाल होगा, यह बताने की जरूरत नहीं है. 1971 के युद्ध में पाकिस्तान समर्थक मुल्लों ने बांग्लादेश में लगभग तीस लाख बंगालियों की हत्या-बलात्कार-लूट की थी, और बांग्लादेश को इन इस्लामिक अतिवादियों से मुक्ति दिलाने के लिए शेख हसीना वाजेद ने ताबड़तोड़ फांसियां दीं, जेल में ठूँसा. सबसे ताज़ा फाँसी मुफ्ती अब्दुल हन्नान को दी गई, जो कि HUJI का चीफ था.

बांग्लादेश से भागकर भारत के पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा में घुसपैठ किए हुए यह कट्टर इस्लामिक समूह इस बात की राह देख रहे हैं कि जैसे भी हो शेख हसीना को तीसरी बार सत्ता न मिलने पाए और 2019 के चुनावों में उनकी “प्यारी बहना” अर्थात बेगम खालिदा जिया सत्ता में आ जाएँ. सभी जानते हैं कि बेगम खालिदा जिया की BNP पार्टी पाकिस्तान समर्थक रही है और कठमुल्लों से उसके मधुर सम्बन्ध रहे हैं. इधर ममता बनर्जी खुद भी अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए जेहादियों और बरकती जैसे पागलों पर निर्भर है, इसलिए मौका साधकर ये सभी इस्लामिक समूह ममता बनर्जी पर दबाव बनाए हुए हैं कि चाहे जैसे भी हो, 2019 तक तीस्ता नदी का जल समझौता नहीं होने दिया जाए.

कुल मिलाकर मामला यह है कि बांग्लादेश की “हसीना” और “बेगम” के बीच होने वाले रोचक मुकाबले में एक तीसरा अवांछित खिलाड़ी भी शामिल हो गया है, और वे हैं भारत की मोहतरमा “मुमताज़ बानोर्जी”. विदेशी मामले और नदी जल का अंतर्राष्ट्रीय समझौता केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए नरेंद्र मोदी चाहें तो अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके तीस्ता नदी जल बँटवारे पर बाले-बाले ही कोई समझौता कर सकते हैं, लेकिन ऐसा करने से मुमताज़ बानोर्जी को बैठे-बिठाए एक मुद्दा मिल जाएगा और वे तत्काल “नागिन डांस” दिखाने लगेंगी. इसलिए फिलहाल केंद्र सरकार मुमताज़ बानोर्जी को समझाईश देकर अथवा CBI का डंडा दिखाकर मनाने की कोशिश में है, क्योंकि भारत सरकार भी चाहती है कि बांग्लादेश में कोई ऐसी सरकार बनी हुई रहे, जो इस्लामिक कठमुल्लों के दिलों में भय पैदा करती रहे.

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