वाराहमूल (बारामूला), ऋषि कश्यप, कल्हण और कश्मीर...

Written by मंगलवार, 18 अप्रैल 2017 08:02

मान्यता है कि अति प्राचीन काल में कश्मीर घाटी एक विशाल सरोवर थी – सती सर यानी पार्वती का सर। चारों ओर से घिरी झील के पहाड़ी किनारों पर कुछ पशुपालक जातियां रहतीं थी, जिनका जीवनयापन भेड़-बकरी, गाय भैंस आदि को पालने से होता था।

संभवत: थेाडी बहुत खेती बाड़ी भी होती हो। पानी के स्रोतों से इनके लगाव से ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है। लेकिन सरोवर में रहने वाले एक दैत्य या राक्षस जलोद्भव के कारण उनका जीवन कष्टमय हो गया था। यह दैत्य प्राय: उनकी बस्तियों पर आक्रमण करके उनके पशु उठाकर ले जाता था। कभी कभी मनुष्यों को भी मारता था। इस प्रकार की यातना से तंग आकर वे लोग मध्यदेश (वर्तमान उत्तर प्रदेश और बिहार) में कहीं निवास करने वाले ऋषि कश्यप के पास गए और उनसे सहायता की याचना की। कश्यप ने अपने शिष्यों के साथ राक्षस से मुक्ति दिलाने की योजना बनाई। राक्षस जलोद्भव मारा गया और बारामूला जिसे वराहमूल कहा जाता था, पर्वतीय प्राचीर में सेंध लगा कर पानी का निकालने का मार्ग बनाया गया। पानी निकल गया और बहुत बड़ी घाटी प्रकट हो गई। यहीं पर कश्यप ने एक नगर बसाया। तबसे इसे कश्यपमर यानी कश्यप का डेरा कहा जाने लगा जो घिस कर कश्मीर बना।

सवाल है कि नीलमत पुराण की इस कथा में कितना इतिहास है और कितनी कल्पना? कश्मीर घाटी में जो पुरातात्विक सर्वेक्षण हुआ, आजादी से पहले ही हुआ। उसके अनुसार घाटी में कई स्थानों पर ऐसी चिकनी मिट्टी मिली हैै, जैसी पानी के भीतर हुआ करती है। यह किसी बाढ़ का परिणाम नहीं है क्योंकि इस मिट्टी में उन जीव जन्तुओं के अवशेष भी बहुतायत में पाए गए जो पानी के अंदर ही पाए जाते हेैं। ऐसेे शंखों और सीपों के खोलों का होना यह सिद्ध करता है कि यह जमीन कभी पानी के नीचे हुआ करती थी। दूसरा प्रश्न है कि क्या पानी इतना गहरा था कि पूरी घाटी उसके नीचे आ जाए? उक्त अवशेष घाटी के सबसे दक्षिणी छोर यानी काजी गुंड से ऊपर पहाड़ी ढलानों पर भी पाए गए। यानी अगर श्रीनगर को आधार माना जाए तो जल लगभग हजार फीट ऊंचाई तक था। इसका मतलब यह हुआ कि शंकराचार्य की पहाड़ी लगभग उसमें पूरी तरह डूब गई थी। तीसरा प्रश्न है कि क्या सरोवर से पानी का निकलना मानवीय काम था कि कोई प्राकृतिक क्रिया? पहाड़ों से घिरी किसी झील के किनारे कुछ आदिवासी बस्तियां हों, यह कोई अस्वाभाविक बात नहीं। कश्मीर के प्राचीन साहित्य और लोक परंपराओं में एक प्राचीन नाग जाति का उल्लेख है। नाग पानी के स्रोतों के पास ही रहते थे। इसलिए न केवल इन स्रोतों, छोटे चश्मों, जलाशयों, नदियों के उद्गमों से उनका लगाव था अपितु वे संभवत: उन्हें अपनी पारंपरिक सम्पत्ति भी मानते थे। पंजाब और मध्यदेश के नवागंतुक मैदानी लोगों ने नागों से टकराव लेने के बदले उनके इस अधिकार को स्वीकार कर लिया था। हर स्रोत को किसी न किसी नाग के नाम से चिन्हित किया जाने लगा। कालांतर में पानी के छोटे स्रोतों का नाम ही नाग पड़ा। आज भी इन्हें नाग ही कहते हैं। कुछ प्रसिद्ध स्थानों के नाम नाग नेताओं के नाम पर भी है। जैसे अनंत नाग, वेरी नाग, नाराण नाग आदि।

विशाल सरोवर में रहने वाले दैत्याकार राक्षस की कल्पना संभवत: काव्यात्मक अतिरंजना है। लेकिन यह स्वाभाविक होगा अगर सरोवर के टापुओं या दलदली भूमि में कोई आदिम जाति रहती रही हो जिसका जीवनयापन शिकार से ही होता हो। पानी में जल-जंतुओं, जल पक्षियों का और जब संभव हुआ तो अन्य जातियों के पशुओं का शिकार। ऐसी जाति के आक्रामक व्यवहार से तंग आकर ही लोग सहायता के लिए पहाडिय़ों को पार कर के कश्यप ऋषि के पास गए होंगे। कश्यप ने कैसे पहाडिय़ों के संधि स्थलों को खोज कर उनमें सेंध लगाई और पानी के निकलने का मार्ग बनाया, यह स्पष्ट नहीं, लेकिन यह तय है कि जलमार्ग बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी। पानी को थोड़ा भी मार्ग मिल जाए तो उसे चौड़ा वह अपने ही प्रवाह के वेग से कर लेता है। इसी सरोवर के तल में हजारों स्रोतों से लगातार पानी निकलता था। आज भी जो सरोवर हैं, डल, मानस्बल और आंचार का पानी भी ऐसे ही स्रोतों से मिलता है। केवल वुल्लर झील को ही अपने स्रोतों के अतिरिक्त वितस्ता नदी से पानी मिलता है क्योंकि वितस्ता एक किनारे से इसमें प्रवेश करती है और दूसरे किनारे से बाहर निकल जाती है।

अंतिम प्रश्न है कि इसे अगर पूरी तरह प्राकृतिक परिघटना मान लिया जाए तो ऐसी परिघटना कब हुई होगी? वितस्ता एक वैदिक नदी है। अगर यह नदी वैदिक युग में थी तो उस युग में कश्मीर घाटी पानी से बाहर आ चुकी होगी। वितस्ता का जन्म घाटी के बनने के पश्चात की घटना है। इसलिए यह मान लेना होगा कि सती सर से कश्मीर घाटी का जन्म ऐतिहासिक युग से बहुत पहले यानी हजारों साल पहले की भौगोलिक घटना थी।

भारत के इतिहास की मुश्किल है कि प्राचीन लेखकों में स्वविज्ञापन की प्रवृत्ति नहीं रही है। इसलिए कभी कभी लेखकों का भी काल निर्धारण कठिन हो जाता है। बहुत से प्राचीन ग्रंथों मेें बहुमूल्य जानकारियों के स्रोतो का उल्लेख नही होता और इसलिए क्रमबद्ध इतिहास लेखन कठिन कार्य रहा लेकिन इतिहास लेखन के मामले में कश्मीर काफी भाग्यशाली रहा है क्योंकि कल्हण पहला भारतीय इतिहासकार रहा है जिसने निष्ठा के साथ क्रमबद्ध इतिहास लिखने का प्रयास किया। जहां तक संभव था उन्होंने अपने स्रोतों को भी चिन्हित किया है औेर जहां वे ऐसा नही कर पाए, वहां उन्होंने इस बात को स्पष्ट तौर पर इंगित कर दिया है। उनकी राजतरंगिणी में 35 राजाओं का उल्लेख नहीं है क्योंकि उनके ही शब्दों में ‘इन राजाओं के बारे में लिखे ग्रंथ लुप्त हो गए हैं या फिर ये राजा इतने महत्वहीन रहे कि उनके बारे में किसी बड़े लेखक ने लिखना आवश्यक ही नहीं माना। संवत की बाधा तो उन्हें भी झेलनी पडी। लेकिन कुछ आधुनिक भारतीय विद्वानों ने सप्तऋषि संवत् के आधार पर यह गुत्थी सुलझा दी है।

बारहवीं शती के मध्य यानी 1148 और प्रचलित लौकिक संवत् 4224 में कल्हण ने राजतरंगिणी लिखी जिसमें महाभारत काल से कश्मीर के राजा हर्ष के शासन तक का वृतंात दिया है। कल्हण शब्द संस्कृत शब्द कल्यान का ही अपभ्रंश है। कुछ पूर्ववर्ती या समकालीन कवियों ने उन्हें कल्यान ही लिखा है। वे तत्कालीन राजा हर्ष के राजदरबारी चंपक के बेटेे थे। चंपक राज्य का द्वार पालक थे जिन पर राज्य की सीमाओं की रक्षा का भार था। इसलिए कल्हण को राजदरबार और उस के षड्यंत्रों तथा विभिन्न दरबारियों के चरित्र का प्रत्यक्ष ज्ञान था।

राजतरंगिणी कश्मीर का इतिहास महाभारत युद्ध से आरम्भ करती है। उस समय कश्मीर में कोई राजा नही था। रानी गर्भवती थी, इसलिए रानी को ही भावी नरेश की अभिभावक के रूप में गद्दी पर बिठाया गया था। स्वाभाविक था कि कश्मीर का महाभारत युद्ध में कोई प्रतिनिधित्व नहीं था। इस तरह रजतरंगिनी में महाभारत काल से बारहवीं शताब्दी के मध्य तक का निरंतर इतिहास दर्ज है। लेकिन राजतरंगिनी में वर्णित घटनाओं की ऐतिहासिकता के बारे में प्रश्न खड़े किए जाते हैं। जब तक महाभारत युद्ध का अंतिम रूप से काल निर्धारण नही होता तब तक रजतरंगिनी के आरम्भिक इतिहास के बारे में भी प्रश्न उठते ही रहेंगे। लेकिन बौद्धमत के विकास काल में राज अशोक और उनके पश्चात् कनिष्क जैसे राजाओं के साथ ही ललितादित्य और अवंतीवर्मन जैसे वैष्णव राजाओं का जो उल्लेख इस ग्रंथ में किया गया और उन कालखंडों में कश्मीर में सर्वधर्म समभाव के जो उदाहरण दिए गए हैें, उन्हें न केवल दूसरे साक्ष्यों के आधार पर सही पाया गया है अपितु वह कश्मीर की प्राचीन परंपरा अनुरूप भी है।

राजतरंगिणी में वर्णित कश्मीर संबंधी महत्त्वपूर्ण तथ्य

1. ईसा से कई सदी पहले से ही कश्मीर का शेष भारत के साथ सम्पर्क स्थापित हो गया था। दरअसल कश्मीर घाटी का जन्म ही सतीसर के किनारे पहाडिय़ों के आंचल में बसने वाली कुछ आदिवासी जातियों और भारत के मध्यदेश के बीच सहयोग के कारण हुआ। कश्मीर के इतिहास के आदिकाल से ही कश्मीर में वही भारतीय परंपराएं स्थापित हो गईं थीं जो मैेदानी क्षेत्रों में प्रचलित थीं।

2. कश्मीर का सम्बंध शेष भारत से केवल एकतरफा नहीं था। कुछ भारतीय सम्राट जैसे अशोक और कनिष्क कश्मीर के भी शासक थे तो कुछ कश्मीरी शासकों का प्रभाव भी कश्मीर से बहुत दूर तक भारत के अन्य प्रांतों में था। राजा ललितादित्य का वर्चस्व तो बंगाल तक पहुंच गया था।

3. कश्मीर भारतीय धर्म दर्शन का आरम्भ से ही केन्द्र रहा है। शैव और वैष्णव मान्यताओं के बावजूद बौद्ध और जैन धर्मों का काफी प्रसार कश्मीर में रहा है। कुछ कालखण्डों में तो बौद्ध धर्म ही प्रमुख धर्म रहा है। कल्हण ने स्वयं ब्राह्मण होने के बावजूद बौद्ध विद्वानों और जैन आचार्यों के प्रति अपना सम्मान दर्शाया है और उन राजाओं की प्रशंसा की है जिन्होंने दूसरे धर्मों के मठों और धर्म स्थलों के लिए दान दिया था। इस मामले में कश्मीर के राजाओं ने अशोक की परंपरा का ही निर्वाह किया था।

4. कश्मीर प्राचीन काल से ही दार्शनिक चिंतन मनन का केंद्र रहा है। इसे शारदापीठ का क्षेत्र माना गया है। शैव दर्शन के विशेष अध्ययन के लिए दूर दूर से जिज्ञासु कश्मीर आया करते थे। प्रसिद्ध विद्वान अभिनव गुप्त का योगदान पूरे भारत में मान्य रहा है। शंकराचार्य की अद्वैतवाद के पुनस्र्थापना यात्रा में भी कश्मीर का योगदान महत्त्वपूर्ण है। प्राचीन ब्राह्मी के आधार पर शारदा लिपि का विकास भी कश्मीर में ही हुआ है। शारदा के आधार पर ही कश्मीरी भाषा शास्त्रियों ने पंजाबी की गुरुमुखी और तिब्बती की लिपि का विकास किया।

5. प्राचीन काल से ही कश्मीर का न केवल पंजाब और पीर पंजाल की पर्वत श्रृंखलाओं के दक्षिण के राज्यों के साथ निकट का संपर्क था अपितु उत्तर पश्चिम में गिलगित, बॉल्टिस्तान और गांधार से भी नाता रहा है। कश्मीर से ही गिलगित में बौद्ध धर्म और दर्शन का विस्तार हुआ था। सातवीं शाही की गिलगित पांडुलिपियों में बौद्ध दर्शन के सूत्रों के सचित्र पाठ से यह बात स्वयं सिद्ध है।

कश्मीर जाने के मार्ग भौगोलिक रूप से कठिन अवश्य थे लेकिन प्राचीन समय से ही कश्मीर जाने के कई मार्ग बनाए गए थे जिन में अब जो दो मार्ग प्रचलित हैं वे भी शामिल हेैं। इनके अतिरिक्त भी पंजाब जम्मू और हिमाचल से लोग कई मार्गों से जाया करते थे। इसलिए कश्मीर किसी भी युग में भारत के अन्य मैदानी या पहाड़ी क्षेत्रों से अलग नहीं रहा।

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साभार : "भारतीय धरोहर"... 

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