दलित-मुस्लिम एकता असंभव : कबीर-आंबेडकर (भाग-२)

Written by बुधवार, 05 अप्रैल 2017 19:28

दलित-मुस्लिम एकता कितना खोखला नारा है, इस बारे में हम पिछले भाग में संत रविदास और संत कबीर के कुछ उद्धरणों द्वारा जान चुके हैं... पहले भाग को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें...

इसी लेख का दूसरा भाग आगे पेश किया जा रहा है, जिसमें संत कबीर और डॉक्टर भीमराव आंबेडकर के तर्कों और सन्दर्भों के जरिये यह सिद्ध किया जाएगा कि "दलित-मुस्लिम एकता" असंभव है... 

3. बांग का खंडन

कबीर मुलां मुनारे किआ चढहि सांई न बहरा होइ ॥
जा कारनि तूं बांग देहि दिल ही भीतरि जोइ ॥१८४॥

सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 1374

अर्थात कबीर जी कहते हैं की ओ मुल्ला। खुदा बहरा नहीं है जो तू ऊपर चढ़ कर बांग दे रहा है। जिसके लिए तू बांग दे रहा है, उसको अपने दिल ही में तलाश कर।

4. हिंसा (क़ुरबानी) का खंडन

जउ सभ महि एकु खुदाइ कहत हउ तउ किउ मुरगी मारै ॥१॥
मुलां कहहु निआउ खुदाई ॥ तेरे मन का भरमु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥
पकरि जीउ आनिआ देह बिनासी माटी कउ बिसमिलि कीआ ॥
जोति सरूप अनाहत लागी कहु हलालु किआ कीआ ॥२॥
किआ उजू पाकु कीआ मुहु धोइआ किआ मसीति सिरु लाइआ ॥
जउ दिल महि कपटु निवाज गुजारहु किआ हज काबै जाइआ ॥३॥

सन्दर्भ विलास प्रभाती कबीर पृष्ठ 1350

अर्थात कबीर जी कहते है ओ मुसलमानों। जब तुम सब में एक ही खुद बताते हो तो तुम मुर्गी को क्यों मारते हो। ओ मुल्ला! खुदा का न्याय विचार कर कह। तेरे मन का भ्रम नहीं गया है। पकड़ करके जीव ले आया, उसकी देह को नाश कर दिया, कहो मिटटी को ही तो बिस्मिल किया। तेरे ऐसा करने से तेरा पाक उजू क्या, मुह धोना क्या, मस्जिद में सिजदा करने से क्या, अर्थात हिंसा करने से तेरे सभी काम बेकार हैं।

कबीर भांग माछुली सुरा पानि जो जो प्रानी खांहि ॥
तीरथ बरत नेम कीए ते सभै रसातलि जांहि ॥२३३॥

सन्दर्भ विलास प्रभाती कबीर पृष्ठ 1377

अर्थात कबीर जी कहते हैं जो प्राणी भांग, मछली और शराब पीते हैं, उनके तीर्थ व्रत नेम करने पर भी सभी रसातल को जायेंगे।

रोजा धरै मनावै अलहु सुआदति जीअ संघारै ॥
आपा देखि अवर नही देखै काहे कउ झख मारै ॥१॥
काजी साहिबु एकु तोही महि तेरा सोचि बिचारि न देखै ॥
खबरि न करहि दीन के बउरे ता ते जनमु अलेखै ॥१॥ रहाउ ॥

सन्दर्भ रास आगा कबीर पृष्ठ 483

अर्थात ओ काजी साहिब तू रोजा रखता हैं अल्लाह को याद करता है, स्वाद के कारण जीवों को मारता है। अपना देखता हैं दूसरों को नहीं देखता हैं। क्यों समय बर्बाद कर रहा हैं। तेरे ही अंदर तेरा एक खुदा हैं। सोच विचार के नहीं देखता हैं। ओ दिन के पागल खबर नहीं करता हैं इसलिए तेरा यह जन्म व्यर्थ है।

इसके ठीक विपरीत कबीर साहिब श्री राम के गुणगान करते और गौसेवा के लिए प्रेरणा देते मिलते है। प्रमाण देखिये-

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कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाऊँ।गले राम की जेवडी ज़ित खैंचे तित जाऊँ।।”
कबीर निरभै राम जपि, जब लग दीवै बाती।तेल घटया बाती बुझी, सोवेगा दिन राति।।”
” जाति पांति पूछै नहिं कोई। हरि को भजै सो हरि का होई।।”
साधो देखो जग बौराना,सांची कहौं तो मारन धावै,झूठे जग पतियाना।

अब मोहि राम भरोसा तेरा,
जाके राम सरीखा साहिब भाई, सों क्यूँ अनत पुकारन जाई॥
जा सिरि तीनि लोक कौ भारा, सो क्यूँ न करै जन को प्रतिपारा॥
कहै कबीर सेवौ बनवारी, सींची पेड़ पीवै सब डारी॥114॥

कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढत बन माहि !!
!! ज्यो घट घट राम है, दुनिया देखे नाही !!

श्री राम जी के गुणगान के अनेक प्रमाण कबीर रचनावली में मिलते है। बहुत कम लोग जानते है कि कबीर दास ने गौरक्षा के लिए अपना विवाह करवाने से मना कर दिया था। उनके वधुपक्ष वाले उनके विवाह में गोमांस परोसने की योजना बना रहे थे। कबीर दास गौप्रेमी थे। उन्होंने स्पष्ट कह दिया। अगर गौमाता कटी तो वह विवाह नहीं करेंगे। अंत में कबीर दास ने वह गौ एक ब्राह्मण को दे दी। तब जाकर उनका विवाह संपन्न हुआ।

इन सभी प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि सभी दलित संत वेद, तीर्थ, जप, राम-कृष्ण,यज्ञपवीत, गौरक्षा आदि वैदिक परम्पराओं में अटूट विश्वास रखते थे एवं इस्लाम की मान्यताओं के कटु आलोचक थे। अब हम आते हैं बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के विचारों की तरफ....

6. डॉ अम्बेडकर का इस्लाम सम्बंधित चिंतन

डॉ अम्बेडकर को इस्लाम स्वीकार करने के अनेक प्रलोभन दिए गए। स्वयं उस काल में विश्व का सबसे धनी व्यक्ति हैदराबाद का निज़ाम इस्लाम स्वीकार करने के लिए बड़ी धनराशि का प्रलोभन देने आया। मगर जातिवाद का कटु विष पीने का अनुभव कर चुके डॉ अम्बेडकर ने न ईसाई मत को स्वीकार किया और न इस्लाम मत को स्वीकार किया। क्योंकि वह जानते थे कि इस्लाम मत स्वीकार करने से दलितों का किसी भी प्रकार से हित नहीं हो सकता। अपनी पुस्तक भारत और पाकिस्तान के विभाजन में उन्होंने इस्लाम मत पर अपने विचार खुल कर प्रकट किये है ,इसीलिए उन्होंने 1947 में पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले सभी हिन्दू दलितों को भारत आने का निमंत्रण दिया था।

डॉ अम्बेडकर के इस्लाम के विषय में विचार

१. हिन्दू काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं-”मुसलमानों के लिए हिन्दू काफ़िर हैं, और एक काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं है। वह निम्न कुल में जन्मा होता है, और उसकी कोई सामाजिक स्थिति नहीं होती। इसलिए जिस देश में क़ाफिरों का शासन हो, वह मुसलमानों के लिए दार-उल-हर्ब है ऐसी स्थिति में यह साबित करने के लिए और सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि मुसलमान हिन्दू सरकार के शासन को स्वीकार नहीं करेंगे।” (पृ. ३०४)

२. आंबेडकर आगे लिखते हैं कि... मुस्लिम भ्रातृभाव केवल मुसलमानों के लिए-”इस्लाम एक बंद निकाय की तरह है, जो मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच जो भेद यह करता है, वह बिल्कुल मूर्त और स्पष्ट है। इस्लाम का भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृत्व है। यह बंधुत्व है, परन्तु इसका लाभ अपने ही निकाय के लोगों तक सीमित है और जो इस निकाय से बाहर हैं, उनके लिए इसमें सिर्फ घृणा ओर शत्रुता ही है। इस्लाम का दूसरा अवगुण यह है कि यह सामाजिक स्वशासन की एक पद्धति है और स्थानीय स्वशासन से मेल नहीं खाता, क्योंकि मुसलमानों की निष्ठा, जिस देश में वे रहते हैं, उसके प्रति नहीं होती, बल्कि वह उस धार्मिक विश्वास पर निर्भर करती है, जिसका कि वे एक हिस्सा है। एक मुसलमान के लिए इसके विपरीत या उल्टे सोचना अत्यन्त दुष्कर है। जहाँ कहीं इस्लाम का शासन हैं, वहीं उसका अपना विश्वास है। दूसरे शब्दों में, इस्लाम सच्चे मुसलमानों को भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट सम्बन्धी मानने की इज़ाजत नहीं देता। सम्भवतः यही वजह थी कि मौलाना मुहम्मद अली जैसे एक महान भारतीय, परन्तु सच्चे मुसलमान ने, अपने, शरीर को हिन्दुस्तान की बजाए येरूसलम में दफनाया जाना अधिक पसंद किया।”

३. एक साम्प्रदायिक और राष्ट्रीय मुसलमान में अन्तर देख पाना मुश्किल-”लीग को बनाने वाले साम्प्रदायिक मुसलमानों और राष्ट्रवादी मुसलमानों के अन्तर को समझना कठिन है। यह अत्यन्त संदिग्ध है कि राष्ट्रवादी मुसलमान किसी वास्तविक जातीय भावना, लक्ष्य तथा नीति से कांग्रेस के साथ रहते हैं, जिसके फलस्वरूप वे मुस्लिम लीग् से पृथक पहचाने जाते हैं। यह कहा जाता है कि वास्तव में अधिकांश कांग्रेसजनों की धारण है कि इन दोनों में कोई अन्तर नहीं है, और कांग्रेस के अन्दर राष्ट्रवादी मुसलमानों की स्थिति साम्प्रदायिक मुसलमानों की सेना की एक चौकी की तरह है। यह धारणा असत्य प्रतीत नहीं होती। जब कोई व्यक्ति इस बात को याद करता है कि राष्ट्रवादी मुसलमानों के नेता स्वर्गीय डॉ. अंसारी ने साम्प्रदायिक निर्णय का विरोध करने से इंकार किया था, यद्यपि कांग्रेस और राष्ट्रवादी मुसलमानों द्वारा पारित प्रस्ताव का घोर विरोध होने पर भी मुसलमानों को पृथक निर्वाचन उपलब्ध हुआ।” (पृ. ४१४-४१५)

४. भारत में इस्लाम के बीज मुस्लिम आक्रांताओं ने बोए-”मुस्लिम आक्रांता निस्संदेह हिन्दुओं के विरुद्ध घृणा के गीत गाते हुए आए थे। परन्तु वे घृणा का वह गीत गाकर और मार्ग में कुछ मंदिरों को आग लगा कर ही वापस नहीं लौटे। ऐसा होता तो यह वरदान माना जाता। वे ऐसे नकारात्मक परिणाम मात्र से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने इस्लाम का पौधा लगाते हुए एक सकारात्मक कार्य भी किया। इस पौधे का विकास भी उल्लेखनीय है। यह ग्रीष्म में रोपा गया कोई पौधा नहीं है। यह तो ओक (बांज) वृक्ष की तरह विशाल और सुदृढ़ है। उत्तरी भारत में इसका सर्वाधिक सघन विकास हुआ है। एक के बाद हुए दूसरे हमले ने इसे अन्यत्र कहीं को भी अपेक्षा अपनी ‘गाद’ से अधिक भरा है और उन्होंने निष्ठावान मालियों के तुल्य इसमें पानी देने का कार्य किया है। उत्तरी भारत में इसका विकास इतना सघन है कि हिन्दू और बौद्ध अवशेष झाड़ियों के समान होकर रह गए हैं; यहाँ तक कि सिखों की कुल्हाड़ी भी इस ओक (बांज) वृक्ष को काट कर नहीं गिरा सकी।” (पृ. ४९)

५. मुसलमानों की राजनीतिक दाँव-पेंच में गुंडागर्दी-”तीसरी बात, मुसलमानों द्वारा राजनीति में अपराधियों के तौर-तरीके अपनाया जाना है। दंगे इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि गुंडागिर्दी उनकी राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है।” (पृ. २६७)

६. हत्यारे धार्मिक शहीद -”महत्व की बात यह है कि धर्मांध मुसलमानों द्वारा कितने प्रमुख हिन्दुओं की हत्या की गई। मूल प्रश्न है उन लोगों के दृष्टिकोण का, जिन्होंने यह कत्ल किये। जहाँ कानून लागू किया जा सका, वहाँ हत्यारों को कानून के अनुसार सज़ा मिली; तथापि प्रमुख मुसलमानों ने इन अपराधियों की कभी निंदा नहीं की। इसके विपरीत उन्हें ‘गाजी’ बताकर उनका स्वागत किया गया और उनके क्षमादान के लिए आन्दोलन शुरू कर दिए गए। इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण है, लाहौर के बैरिस्टर मि. बरकत अली का, जिसने अब्दुल कयूम की ओर से अपील दायर की। वह तो यहाँ तक कह गया कि कयूम नाथूराम की हत्या का दोषी नहीं है, क्योंकि कुरान के कानून के अनुसार यह न्यायोचित है। मुसलमानों का यह दृष्टिकोण तो समझ में आता है, परन्तु जो बात समझ में नहीं आती, वह है श्री गांधी का दृष्टिकोण।”(पृ. १४७-१४८)

७. हिन्दू और मुसलमान दो विभिन्न प्रजातियां-”आध्याम्कि दृष्टि से हिन्दू और मुसलमान केवल ऐसे दो वर्ग या सम्प्रदाय नहीं हैं जैसे प्रोटेस्टेंट्‌स और कैथोलिक या शैव और वैष्णव, बल्कि वे तो दो अलग-अलग प्रजातियां हैं।” (पृ. १८५)

८. हिन्दू-मुस्लिम एकता असफल क्यों रही ?-”हिन्दू-मुस्लिम एकता की विफलता का मुखय कारण इस अहसास का न होना है कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जो भिन्नताएं हैं, वे मात्र भिन्नताएं ही नहीं हैं, और उनके बीच मनमुटाव की भावना सिर्फ भौतिक कारणों से ही नहीं हैं इस विभिन्नता का स्रोत ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक दुर्भावना है, और राजनीतिक दुर्भावना तो मात्र प्रतिबिंब है। ये सारी बातें असंतोष का दरिया बना लेती हैं जिसका पोषण उन तमाम बातों से होता है जो बढ़ते-बढ़ते सामान्य धाराओं को आप्लावित करता चला जाता हैं दूसरे स्रोत से पानी की कोई भी धारा, चाहे वह कितनी भी पवित्र क्यों न हो, जब स्वयं उसमें आ मिलती है तो उसका रंग बदलने के बजाय वह स्वयं उस जैसी हो जाती हैं दुर्भावना का यह अवसाद, जो धारा में जमा हो गया हैं, अब बहुत पक्का और गहरा बन गया है। जब तक ये दुर्भावनाएं विद्यमान रहती हैं, तब तक हिन्दू और मुसलमानों के बीच एकता की अपेक्षा करना अस्वाभाविक है।” (पृ. ३३६)

९. हिन्दू-मुस्लिम एकता असम्भव कार्य-”हिन्दू-मुस्लिम एकता की निरर्थकता को प्रगट करने के लिए मैं इन शब्दों से और कोई शबदावली नहीं रख सकता। अब तक हिन्दू-मुस्लिम एकता कम-से-कम दिखती तो थी, भले ही वह मृग मरीचिका ही क्यों न हो। आज तो न वह दिखती हे, और न ही मन में है। यहाँ तक कि अब तो गाँधी जी ने भी इसकी आशा छोड़ दी है और शायद अब वह समझने लगे हैं कि यह एक असम्भव कार्य है।” (पृ. १७८)

(सभी उद्धरण बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्‌मय, खंड १५-‘पाकिस्तान और भारत के विभाजन, २००० से लिए गए हैं)

इतिहास साक्षी है दलित मुस्लिम एकता का झुनझुना बजाने वाले दलित नेता जोगेंद्र नाथ मंडल को क्यों पाकिस्तान से भाग कर भारत आना पड़ा था। मंडल ने दलितों को बांग्लादेश में रुकने का आवाहन किया था। 1947 के बाद में वह पूर्वी पाकिस्तान में मंत्री भी बने थे। पूर्वी पाकिस्तान मे मण्डल की अहमियत धीरे-धीरे खत्म हो गई। दलित हिंदुओं पर अत्याचार शुरू हो चुके थे। 30% दलित हिन्दू आबादी किजान-माल-इज्जत अब खतरे मे थी। मंडल को अपनी भूल पर पछतावा हुआ। मण्डल ने दुखी होकर जिन्ना को कई पत्र लिखे, उनके कुछ अंश पढ़िये :- मंडल ने हिंदुओं के संग होने वाले बरताव के बारे में लिखा, "मुस्लिम, हिंदू वकीलों, डॉक्टरों, दुकानदारों और कारोबारियों का बहिष्कार करने लगे, जिसकी वजह से इन लोगों को जीविका की तलाश में पश्चिम बंगाल जाने के लिए मजबूर होना पड़ा."। गैर-मुस्लिमों के संग नौकरियों में अक्सर भेदभाव होता है. लोग हिंदुओं के साथ खान-पान भी पसंद नहीं करते. पूर्वी बंगाल के हिंदुओं (दलित-सवर्ण सभी) के घरों को आधिकारिक प्रक्रिया पूरा किए बगैर कब्जा कर लिया गया और हिंदू मकान मालिकों को मुस्लिम किरायेदारों ने किराया देना काफी पहले बंद कर दिया था।

इससे अधिक कुछ कहने की आवश्यकता अब नहीं है। वर्तमान में भी व्यावहारिक रूप से अपने शासन में मुसलमान दलितों के साथ क्या करते है। इसका उदाहरण आगे पढ़ेंगे। अगर दलित-मुस्लिम एकता संभव होती तो क्या दलित संत और डॉ अम्बेडकर अपरिपक्व और गलत थे? यह यक्ष प्रश्न इस लेख को पढ़ने वाले सभी दलित भाइयों के लिए हैं।

7. पाकिस्तान में दलितों के हालात

1947 के पश्चात पाकिस्तान में बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू दलित अपनी मज़बूरी के चलते रुक गए। इन दलितों का सम्बन्ध कॉल, भील और वाल्मीकि जातियों से हैं। पंजाब प्रान्त में रहने वाले वाल्मीकि ईसाई मत स्वीकार कर बड़ी संख्या में उस समय ईसाई बन गए क्योंकि उनके लिए मुस्लिम देश में हिन्दू बने रहना मौत को दावत देने के समान था। जबकि सिंध प्रान्त में रहने वाले कॉल, भील आदि दलित हिन्दू ही बने रहे। पिछले कुछ वर्षों में कट्टर इस्लाम का प्रभाव बढ़ने से गैर-मुस्लिम होने के नाते ईसाई बन चुके दलितों पर पाकिस्तान में अनेक अत्याचार हुआ हैं। उन पर इस्लाम की बेज्जती का, क़ुरान के पन्ने फाड़ने का और मुहम्मद साहिब की शान में गुस्ताखी करने का आरोप लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया जाता है और उनकी संपति लूट ली जाती हैं। यह सब पाकिस्तान के Anti Blasphemy कानून के अन्तर्गत किया जाता हैं। इस पर भी पाकिस्तान के मुसलमानों का मन नहीं भरा तो उन्होंने ईसाई गिरिजाघरों में बम विस्फोट करने आरम्भ कर दिए। बम धमाकों में कई सौ ईसाई दलित मारे जा चुके हैं।

पूर्वकाल में दलितों हिंदुओं की बेटियों को उठाना, उन्हें जबरदस्ती अपने हरम में बंधक बना लेना। मुस्लिम शासकों के लिए शौक पूरा करने जैसा था। मुसलमानों का यह शौक आज भी सिंध के मुस्लिम जमींदारों और रईसों को हैं। अपने खेतों में बंधवा मजदुर के रूप में दलित हिंदुओं से कार्य लेने वाले मुस्लिम जमींदार उन्हें विप्पति काल में थोड़ा से ऋण दे देते है। जो अनेक बार चुकाने के बाद में भी कभी पूरा नहीं होता। उसके बदले उनसे वे न केवल जीवन भर पीढ़ी दर पीढ़ी मजदूरी करवाते है अपितु उनकी बेटियों पर भी गन्दी नज़र रखते है। अभी हाल ही में अनेक अंग्रेजी समाचार पत्रों में छपा हैं कि सुन्दर दिखने वाली दलित हिन्दू लड़कियों को अमीर मुस्लिम जमींदार कर्जमाफी के बदले उठा लेता है। उसे प्रताड़ित कर इस्लाम स्वीकार करा निकाह कर अपने घर में नौकरानी बना कर रखता है। पाकिस्तान में हिन्दू दलितों की सुनवाई करने वाला कोई नहीं होता। इस्लाम की समानता और सहिष्णुता के जमीनी दर्शन अगर दलित चिंतकों को करने हो तो पाकिस्तान के इस्लामिक शासन में जाकर देखे। अक्ल ठिकाने आ जाएगी। भारत में जितना दलित-मुस्लिम एकता का झुनझुना बजाते हैं। सब भूल जायेंगे।

कुल मिलाकर बात यह है कि दलित मुस्लिम एकता असंभव हैं। हमारे देश का इतिहास, इस्लाम की मान्यताएं, दलित संतों और सबसे बढ़कर डॉ अम्बेडकर के चिंतन, वर्तमान में पाकिस्तान जैसे देश में दलितों की स्थिति देखकर यह स्पष्ट हो जाता हैं। अब भी दलित हिन्दू नहीं सुधरे तो उनका भविष्य घोर अंधकार का शिकार हो जायेगा। हिंदुओं में पिछली एक शताब्दी में जातिवाद में बहुत कमी आयी हैं। जातिवाद को जड़ से मिटाने के लिए एक सवर्ण और दलित हिंदुओं के संयुक्त प्रयास की आवश्यकता हैं। इसलिए वोटबैंक और जातिवाद की राजनीती करने वाले नेताओं के जूठे वायदों का शिकार मन बने। अपनी बुद्धि का प्रयोग करे। 

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