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Want to Know About Islam?

Written by सोमवार, 15 दिसम्बर 2014 12:50
इस्लाम को समझना चाहते हैं?? 

- "क्या आप इस्लाम को समझना चाहते हैं?", उसने मेरी आँखों के सामने कुरआन लहराते हुए पूछा...

- जी... अभी थोड़ा-थोड़ा ही समझ पाया हूँ, ठीक से समझना चाहता हूँ... मैंने जवाब दिया.

- "इस्लाम एक बेहद शांतिपूर्ण धर्म है", आप कुरआन पढ़िए सब जान जाएँगे...

- "जी, वैसे तो अल-कायदा, बोको-हरम, सिमी, ISIS और हिजबुल ने मुझे इस्लाम के बारे में थोड़ा-बहुत समझा दिया है, फिर भी यदि आप आग्रह कर रहे हैं तो मैं कुरआन ले लेता हूँ...

- "लिल्लाह!! उन्हें छोडिए, वे लोग सही इस्लाम का प्रतिनिधित्व नहीं करते...

- अच्छा!! यानी उन्होंने कुरआन नहीं पढ़ी?? या कोई गलती से कोई दूसरी कुरआन पढ़ ली है?, मैंने पूछा.

- नहीं, उन लोगों ने भी कुरआन तो यही पढ़ी है... लेकिन उन्होंने इसका गलत अर्थ निकाल लिया है... वे लोग इस्लाम की राह से भटक गए हैं... कम पढ़े-लिखे और गरीब होंगे. इस्लाम तो भाईचारा सिखाता है..

- जी, हो सकता है... लेकिन मैंने तो सुना है कि ट्विन टावर पर हवाई जहाज चढ़ाने वाला मोहम्मद अत्ता एयरोनाटिक्स इंजीनियर था, और बंगलौर से पकड़ाया ISIS का ट्विटर मेहदी बिस्वास भी ख़ासा पढ़ा-लिखा है...

- आपसे वही तो कह रहा हूँ कि इन लोगों ने इस्लाम को ठीक से समझा नहीं है... आप कुरआन सही ढंग से पढ़िए, हदीसों को समझिए... आप समय दें तो मौलाना जी से आपकी काउंसिलिंग करवा दूँ??

- ".. लेकिन सर, मेरे जैसे नए लोगों की इस्लाम में भर्ती करने की बजाय, आप इराक-अफगानिस्तान-लीबिया-पाकिस्तान जाकर आपकी इस "असली कुरआन" और "सही इस्लाम" का प्रचार करके, उन भटके हुए लोगों को क्यों नहीं सुधारते?? जब मौलाना जी आपके साथ ही रहेंगे तो आप बड़े आराम से सीरिया में अमन-चैन ला सकते हैं... ताकि आपके शांतिपूर्ण धर्म की बदनामी ना हो... तो आप सीरिया कब जा रहे हैं सर??

- "मैं अभी चलता हूँ... मेरी नमाज़ का वक्त हो गया है.."

- सर... सीरिया तो बहुत दूर पड़ेगा, आप मेरे साथ भोपाल चलिए, वहाँ भी ऐसे ही कुछ "भटके" हुए, "कुरआन का गलत अर्थ लगाए हुए" लोगों ने, ईरानी शियाओं के मकान जला दिए हैं, मारपीट और हिंसा की है... वहाँ आप जैसे शान्ति प्रचारक की सख्त ज़रूरत है...

- "मैं बाद में आता हूँ... नमाज़ का वक्त हो चला है..."
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जी, ठीक है, नमस्कार...
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What Urdu Newspaper Say

Written by सोमवार, 15 दिसम्बर 2014 10:13
जानिए उर्दू अखबारों में क्या चल रहा है...


उर्दू अखबार “सियासत” (६ नवंबर के अंक) के अनुसार तेलंगाना सरकार ने अपने ताज़ा बजट में मुस्लिमों के लिए योजनाओं की झड़ी लगा दी है. मुस्लिम लड़कियों को निकाह के अवसर पर 51000 रूपए दिए जाएँगे, इसके अलावा वक्फ बोर्ड को उन्नत बनाने के लिए ५३ करोड़, पुस्तकों का अनुवाद उर्दू में करने के लिए दो करोड़ रूपए तथा मुस्लिम छात्रों को ऋण एवं फीस वापसी में सहायता के लिए ४०० करोड़ रूपए की व्यवस्था की गई है. इसके अलावा अल्पसंख्यकों को स्वरोजगार शुरू करने के लिए सौ करोड़ रूपए की धनराशी ब्याज मुक्त कर्जे के रूप में दी जाएगी.

उर्दू हिन्दुस्तान एक्सप्रेस (१२ नवंबर अंक) की खबर के अनुसार अलग-अलग दलों के टिकट पर चुनाव जीते हुए मुस्लिम विधायकों ने एक संयुक्त मोर्चा बनाने का फैसला किया है. जमीयत उलेमा द्वारा आयोजित एक समारोह में गुलज़ार आज़मी ने कहा कि वे भले ही भिन्न-भिन्न पार्टियों के टिकटों से चुनाव जीते हों, लेकिन “मिल्लत” की समस्याओं को लेकर उनका रुख एक ही रहेगा. आज़मी ने कहा कि महाराष्ट्र पुलिस जानबूझकर मुस्लिम युवकों को फँसाती है, उनकी आवाज़ संयुक्त रूप से उठाने तथा उन्हें कानूनी मदद पहुँचाने की दृष्टि से इस मोर्चे का गठन किया जा रहा है.

अजीजुल-हिंद (२८ अक्टूबर का अंक) लिखता है कि ऑल इण्डिया मजलिस मुशावरात के अध्यक्ष ज़फरुल इस्लाम ने आरोप लगाया है कि केन्द्रीय जाँच एजेंसियां कतई विश्वसनीय नहीं हैं और वे बंगाल के बर्दवान धमाके को जानबूझकर बढाचढा कर पेश कर रही हैं ताकि ममता बनर्जी सरकार एवं मदरसों को बदनाम करके बंगाल में भी हिन्दू-मुस्लिम एकता में दरार पैदा की जा सके. बंगाल के जमाते इस्लामी अध्यक्ष मौलाना नूरुद्दीन ने बनर्जी से शिकायत की है कि केन्द्र की मोदी सरकार धार्मिक ग्रंथों को संदेह के घेरे में लाकर और मदरसों पर जाँच बैठाकर दबाव बढ़ाना चाहते हैं. उन्होंने दावा किया कि बांग्ला के ख्यात पत्रकार तृणमूल सांसद अहमद हसन इमरान को झूठे मामलों में फँसाया गया है. भाजपा सरकार ने उन पर सिमी का एजेंट होने तथा सारधा घोटाले का पैसा बांग्लादेश भेजने का आरोप लगाया है वह गलत है.

अखबार मुंसिफ (३ नवंबर अंक) के अनुसार सऊदी अरब में तलाक के मामलों में भारी वृद्धि हुई है. पिछले दस  साल में चौंतीस हजार तलाक हुए, जबकि विवाह सिर्फ ग्यारह हजार ही हुए. सऊदी पत्रिका “अल-सबक” के अनुसार स्मार्टफोन एवं कंप्यूटर के बढ़ते प्रयोग के कारण तलाक बढ़ रहे हैं. अनजान नंबरों से बुर्कानशीं महिलाओं के स्मार्टफोन पर आने वाले नंबर देखकर पतियों को उन पर शक होता है और वे तलाक दे देते हैं. पिछले सप्ताह एक महिला को सऊदी युवक ने सिर्फ इसलिए तलाक दिया क्योंकि वह उसके कहने पर कार का दरवाजा बंद नहीं कर रही थी. तलाक के अधिकाँश मामले वही हैं जहाँ विवाह को सिर्फ दो या तीन वर्ष ही हुए हैं.

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इन सभी रिपोर्ट्स का अर्थ निकालने के लिए आप स्वतन्त्र हैं... मैं अपना कोई मत नहीं थोपता... :) 

Saradha Scam and Burdwan Blasts Connection

Written by शुक्रवार, 05 दिसम्बर 2014 12:52
पश्चिम बंगाल का सारधा चिटफंड घोटाला :- लूट, राजनीति, और आतंक का तालमेल

कभी-कभी ऐसा संयोग होता है कि एक साथ दो घटनाएँ अथवा दुर्घटनाएँ होती हैं और उनका आपस में सम्बन्ध भी निकल आता है, जो उस समय से पहले कभी उजागर नहीं हुआ होता. पश्चिम बंगाल में सारधा चिटफंड घोटाला तथा बर्दवान बम विस्फोट ऐसी ही दो घटनाएँ हैं. ऊपर से देखने पर किसी अल्प-जागरूक व्यक्ति को इन दोनों मामलों में कोई सम्बन्ध नहीं दिखाई देगा, परन्तु जिस तरह से नित नए खुलासे हो रहे हैं तथा ममता बनर्जी जिस प्रकार बेचैन दिखाई देने लगी हैं उससे साफ़ ज़ाहिर हो रहा है कि वामपंथियों के कालखंड से चली आ रही बांग्लादेशी वोट बैंक की घातक नीति, पश्चिम बंगाल के गरीबों को गरीब बनाए रखने की नीति ने राज्य की जनता और देश की सुरक्षा को एक गहरे संकट में डाल दिया है.

जब तृणमूल काँग्रेस के गिरफ्तार सांसद कुणाल घोष ने जेल में नींद की गोलियाँ खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की तथा उधर उड़ीसा में बीजू जनता दल के सांसद हंसदा को सीबीआई ने गिरफ्तार किया, तब जाकर आम जनता को पता चला कि सारधा चिटफंड घोटाला ऊपर से जितना छोटा या सरल दिखाई देता है उतना है नहीं. इस घोटाले की जड़ें पश्चिम बंगाल से शुरू होकर पड़ोसी उड़ीसा, असम और ठेठ बांग्लादेश तक गई हैं. आरंभिक जांच में पता चला है कि सारधा समूह ने अपने फर्जी नेटवर्क से 279 कम्पनियाँ खोल रखी थीं, ताकि पूरे प्रदेश से गरीबों के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को चूसकर उन्हें लूटा जा सके. सीबीआई का प्रारम्भिक अनुमान 2500 करोड़ के घोटाले का है, लेकिन जब जाँच बांग्लादेश तक पहुँचेगी तब पता चलेगा कि वास्तव में बांग्लादेश के इस्लामिक बैंकों में कितना पैसा जमा हुआ है और कितना हेराफेरी कर दिया गया है. इस कंपनी की विशालता का अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि गरीबों से पैसा एकत्रित करने के लिए इनके तीन लाख एजेंट नियुक्त थे. जिस तेजी से इसमें तृणमूल काँग्रेस के छोटे-बड़े नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं, उसे देखते हुए इसके राजनैतिक परिणाम-दुष्परिणाम भी कई लोगों को भोगने पड़ेंगे.

सारधा चिटफंड स्कीम को अंगरेजी में “पोंजी” स्कीम कहा जाता है. यह नाम अमेरिका के धोखेबाज व्यापारी चार्ल्स पोंजी के नाम पर पड़ा, क्योंकि सन 1920 में उसी ने इस प्रकार की चिटफंड योजना का आरम्भ किया था, जिसमें वह निवेशकों से वादा करता था कि पैंतालीस दिनों में उनके पैसों पर 50% रिटर्न मिलेगा और नब्बे दिनों में उन्हें 100% रिटर्न मिलेगा. भोलेभाले और बेवकूफ किस्म के लोग इस चाल में अक्सर फँस जाते थे क्योंकि शुरुआत में वह उन्हें नियत समय पर पैसा लौटाता भी था. ठीक यही स्कीम भारत में चल रही सैकड़ों चिटफंड कम्पनियाँ भी अपना रही हैं. बंगाल का सारधा समूह भी इन्हीं में से एक है. ये कम्पनियाँ पुराने निवेशकों को योजनानुसार ही पैसा देती हैं, जबकि नए निवेशकों को बौंड अथवा पॉलिसी बेचकर उन्हें लंबे समय तक बेवकूफ बनाए रखती हैं. जाँच एजेंसियों ने पाया है कि सारधा समूह ने प्राप्त पैसों को लाभ वाले क्षेत्रों अथवा शेयर मार्केट अथवा फिक्स डिपॉजिट में न रखते हुए, जानबूझकर ऐसी फर्जी अथवा घाटे वाली मीडिया कंपनियों में लगाया जहाँ से उसके डूबने का खतरा हो. फिर इन्हीं कंपनियों को घाटे में दिखाकर सारा पैसा धीरे-धीरे बांग्लादेश की बैंकों में विस्थापित कर दिया गया. NIA तथा गंभीर आर्थिक मामलों की जाँच एजेंसी SFIO ने केन्द्र सरकार से कहा है कि चूंकि पश्चिम बंगाल पुलिस उनका समुचित सहयोग नहीं कर रही है, इसलिए कम से कम तीन प्रमुख मीडिया कंपनियों सारधा प्रिंटिंग एंड पब्लिकेशंस प्रा.लि., बंगाल मीडिया प्रा.लि. तथा ग्लोबल ऑटोमोबाइल प्रा.लि. के सभी खातों, लेन-देन तथा गतिविधियों की जाँच सीबीआई द्वारा गहराई से की जाए. SFIO ने अपनी जाँच में पाया कि सारधा समूह का अध्यक्ष सुदीप्तो सेन (जो फिलहाल जेल में है) 160 कंपनियों में निदेशक था, जबकि उसका बेटा सुभोजित सेन 64 कंपनियों में निदेशक के पद पर था.

सीबीआई को अपनी जाँच में पता चला है कि भद्र पुरुष जैसा दिखाई देने वाला और ख़ासा भाषण देने वाला सुदीप्तो सेन वास्तव में एक पुराना नक्सली है. सुदीप्तो सेन का असली नाम शंकरादित्य सेन था. नक्सली गतिविधियों में संलिप्त होने तथा पुलिस से बचने के चक्कर में 1990 में इसने अपनी प्लास्टिक सर्जरी करवाई और नया नाम सुदीप्तो सेन रख लिया. बांग्ला भाषा पर अच्छी पकड़ रखने तथा नक्सली रहने के दौरान अपने संबंधों व संपर्कों तथा गरीबों की मानसिकता समझने के गुर की वजह से इसने दक्षिण कोलकाता में 2000 लोगों को जोड़ते हुए इस पोंजी स्कीम की शुरुआत की. सुदीप्तो सेन की ही तरह सारधा समूह की विशेष निदेशक देबजानी मुखर्जी भी बेहद चतुर लेकिन संदिग्ध महिला है. इस औरत को सारधा समूह के चेक पर हस्ताक्षर करने की शक्ति हासिल थी. देबजानी मुखर्जी पहले एक एयर होस्टेस थी, लेकिन 2010 में नौकरी छोड़कर उसने सारधा समूह में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी आरम्भ की, और सभी को आश्चर्य में डालते हुए, देखते ही देखते पूरे समूह की एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर बन बैठी. सारधा समूह की तरफ से कई राजनैतिक पार्टियों को नियमित रूप से चन्दा दिया जाता था. कहने की जरूरत नहीं कि सर्वाधिक चन्दा प्राप्त करने वालों में तृणमूल काँग्रेस के सांसद ही थे. खुद कुणाल घोष प्रतिमाह 26,000 डॉलर की तनख्वाह प्रतिमाह पाते थे. इसी प्रकार सृंजय बोस नामक सांसद महोदय सारधा समूह की मीडिया कंपनियों में सीधा दखल रखते थे. इनके अलावा मदन मित्रा नामक सांसद इसी समूह में युनियन लीडर बने रहे और इसी समूह में गरीब मजदूरों का पैसा लगाने के लिए उकसाते और प्रेरित करते रहे. ममता बनर्जी की “अदभुत एवं अवर्णनीय” कही जाने वाली पेंटिंग्स को भी सुदीप्तो सेन ने ही अठारह करोड़ में खरीदा था. बदले में ममता ने आदेश जारी करके राज्य की सभी सरकारी लायब्रेरीयों में सारधा समूह से निकलने वाले सभी अखबारों एवं पत्रिकाओं को खरीदना अनिवार्य कर दिया था. सूची अभी खत्म नहीं हुई है, सारधा समूह ने वफादारी दिखाते हुए राज्य के कपड़ा मंत्री श्यामपद मुखर्जी की बीमारू सीमेंट कंपनी को खरीदकर उसे फायदे में ला दिया. ऐसा नहीं कि वामपंथी दूध के धुले हों, उनके कार्यकाल में भी सारधा समूह ने वित्त मंत्री के विशेष सहायक गणेश डे को आर्थिक “मदद”(?) दी थी. सारधा समूह ने पश्चिम बंगाल से बाहर अपने पैर कैसे पसारे?? असम स्वास्थ्य एवं शिक्षा मंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को सारधा की पोंजी स्कीम से लगभग पच्चीस करोड़ रूपए का भुगतान हुआ. असम से पूर्व काँग्रेसी मंत्री मातंग सिंह की पत्नी श्रीमती मनोरंजना सिंह को बीस करोड़ के शेयर मिले, जबकि उनके पिता केएन गुप्ता को तीस करोड़ रूपए के शेयर मिले जिसे बेचकर उन्होंने सारधा के ही एक टीवी चैनल को खरीदा. जाँच अधिकारियों के अनुसार जब जाँच पूरी होगी, तो संभवतः धन के लेन-देन का यह आँकड़ा दोगुना भी हो सकता है. सभी विश्लेषक मानते हैं कि गरीबों के पैसों पर यह लूट बिना राजनैतिक संरक्षण के संभव ही नहीं थी, इसलिए काँग्रेस-वामपंथी और खासकर तृणमूल काँग्रेस के सभी राजनेता इस बात को जानते थे, लेकिन चूँकि सभी की जेब भरी जा रही थी, इसलिए कोई कुछ नहीं बोल रहा था.

ये तो हुई घोटाले, उसकी कड़ियाँ एवं विधि के बारे में जानकारी, पाठकगण सोच रहे होंगे कि इस लूट और भ्रष्टाचार का इस्लामी आतंक और बम विस्फोटों से क्या सम्बन्ध?? असल में हुआ यूँ कि इस घोटाले की जाँच काफी पहले शुरू हुई जिसे SFIO नामक एजेंसी चला रही थी. लेकिन बंगाल में बर्दवान जिले के खाग्रागढ़ नामक स्थान पर एक मोहल्ले में अब्दुल करीम और उसकी साथी जेहादी महिलाओं के हाथ से कोई गलती हुई और बम का निर्माण करते हुए जबरदस्त धमाका हो गया. हालाँकि पश्चिम बंगाल की वफादार पुलिस ने इसे “मामूली” धमाका बताते हुए छिपाने की पूरी कोशिश की, अपनी तरफ से जितनी देर हो सकती थी वह भी की. लेकिन विस्फोट के आसपास के रहवासियों ने समझ लिया था कि यह विस्फोट कोई सामान्य गैस टंकी का विस्फोट नहीं है. ज़ाहिर है कि इसकी जाँच पहले सीबीआई ने और फिर जल्दी ही NIA ने अपने हाथ में ले ली. अब SFIO घोटाले की तथा NIA विस्फोट की जाँच के रास्ते पर चल निकले. उन्हें क्या पता था कि दोनों के रास्ते जल्दी ही आपस में मिलने वाले हैं.

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल, जो कि भूतपूर्व जासूस और कमांडो रह चुके हैं, खुद उन्होंने विस्फोट के घटनास्थल का दौरा किया और एजेंसी तुरंत ही ताड़ गई कि मामला बहुत गंभीर है. इस बीच सितम्बर 2014 में आनंदबाजार पत्रिका ने लगातार अपनी रिपोर्टों में तृणमूल सांसद अहमद हसन इमरान के बारे में लेख छापे. सांसद इमरान पहले ही स्वीकार कर चुका है कि वह प्रतिबंधित संगठन “सिमी” का संस्थापक सदस्य है और बांग्लादेश में प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी से उसके सम्बन्ध हैं. सारधा घोटाले तथा बर्दवान विस्फोटों के बारे में जाँच की भनक लगते ही बांग्लादेश की सरकार भी सक्रिय हो गई और उन्होंने पाया कि ढाका स्थिति इस्लामिक बैंक के तार भी इस समूह से जुड़े हुए हैं. यहाँ भी ममता बनर्जी ने अपनी टांग अडाने का मौका नहीं छोड़ा, और उन्होंने बांग्लादेश के डिप्टी हाई कमिश्नर को विरोध प्रकट करने तथा प्रोटोकॉल तोड़ने के आरोप में हाजिर होने का फरमान सुना दिया. बांग्लादेश के विदेश मंत्री अब्दुल हसन महमूद और डोवाल के बीच हुई चर्चा के बाद उन्होंने अपनी जाँच को और मजबूत किया तब पता चला कि सारधा समूह का सारा  पैसा ढाका की इस्लामिक बैंक में ट्रांसफर किया जा रहा था. जाँच में इस बैंक के तार अल-कायदा से भी जुड़े हुए पाए गए हैं. बांग्लादेश सरकार पहले ही भारत सरकार से भी ज्यादा कठोर होकर कथित जेहादियों पर टूट पड़ी है, पिछले दो साल में बांग्लादेश में इनकी कमर टूट चुकी है, इसलिए इन संगठनों के कई मोहरे सीमा पार कर कोलकाता, मुर्शिदाबाद, बर्दवान, नदिया आदि जिलों में घुसपैठ कर चुके हैं. यह सूचनाएँ पाने के बाद भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी RAW भी इसमें कूद पड़ी है. प्रवर्तन निदेशालय और बांग्ला जाँच एजेंसियों के तालमेल से पता चला है कि इस इस्लामिक बैंक के कई “विशिष्ट कारपोरेट ग्राहक” बेहद संदिग्ध हैं, जिन्हें यह बैंक “कारपोरेट ज़कात” के रूप में मोटी रकम चुकाता रहा है. भारतीय जाँच एजेंसियों ने धन के इस प्रवाह पर निगाह रखने के लिए अब दुबई और सऊदी अरब तक अपना जाल फैला दिया है. “RAW” के अधिकारियों के मुताबिक़ इस इस्लामिक बैंक के डायरेक्टरों में से कम से कम दो लोग ऐसे हैं, जिनकी पृष्ठभूमि आतंकी संगठन “अल-बद्र” से जुड़ती है. जबकि इधर कोलकाता सहित पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और असम के बेचारे लाखों गरीब और निम्न वर्ग के लोग, अपनी बीस-पच्चीस-पचास हजार रूपए की गाढ़ी कमाई की रकम के लिए धक्के खा रहे हैं.


अब हम वापस आते हैं, सारधा पर. ममता बनर्जी के खास आदमी माने जाने वाले पूर्व सिमी कार्यकर्ता और तृणमूल से राज्यसभा सांसद हसन इमरान ने “कलाम” नामक उर्दू अखबार शुरू किया, जिसे “अचानक” सारधा समूह ने खरीद लिया. प्रवर्तन निदेशालय की जाँच से स्पष्ट हुआ कि बांग्लादेश की जमाते-इस्लामी के जरिये इमरान सारधा समूह का पैसा खाड़ी देशों में हवाला के जरिये पहुंचाता था, इसके बदले में बैंक और इमरान को मोटी राशि कमीशन के रूप में मिलती थी, जिससे वे बम विस्फोट के आरोपियों को मकान दिलवाने एवं उनकी मदद करने आदि में खर्च करते थे. चूँकि इमरान खुद सिमी का संस्थापक सदस्य रहा और 1974 से 1984 तक लगातार जुड़ा भी रहा, इसलिए उसके संपर्क काफी थे और कार्यशैली से वह वाकिफ था. ख़ुफ़िया जाँच एजेंसियों को कोलकाता में एक रहस्यमयी मकान 19, दरगाह रोड भी मिला. इस मकान में ही “सिमी” का दफ्तर भी खोला गया, फिर इसी पते पर सारधा घोटाले की चिटफंड कंपनी का दफ्तर भी खोला गया, फिर इसी पते पर सारधा समूह के दो-दो अखबारों का रजिस्ट्रेशन भी करवाया गया, जिन्हें बाद में सुदीप्तो सेन ने इमरान से खरीद लिया. अखबार बेचने के बावजूद हसन इमरान ही कागजों पर दोनों उर्दू अखबारों का मालिक बना रहा. इन्हीं अखबारों के सम्पादकीय और संपर्कों के जरिये इमरान ने अबूधाबी में इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक के अधिकारियों से मधुर सम्बन्ध बनाए थे. बांग्लादेश के जमात नेता मामुल आज़म से भी इमरान के मधुर सम्बन्ध रहे, और वह बांग्लादेश में एक-दो बार उनके यहाँ भी आया था. अब SFIO तथा NIA मिलजुलकर सारधा घोटाले तथा बर्दवान बम विस्फोटों की गहन जाँच में जुटी हुई है और उन्हें विश्वास है कि इन दोनों की लिंक्स और कड़ियाँ जो फिलहाल बिखरी हुई हैं, बांग्लादेश और असम तक फ़ैली हुई हैं सब आपस में जुड़ेंगी और जल्दी ही वे इसका पर्दाफ़ाश कर देंगे, कि किस तरह तृणमूल के कुछ सांसद, सुदीप्तो सेन, अब्दुल करीम तथा हसन इमरान सब आपस में गुंथे हुए हैं और इनका सम्बन्ध बांग्लादेश की प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी और आतंक के नेटवर्क से जुड़ा हुआ है.

बहरहाल, ये तो हुई एक “ईमानदार दीदी” की कथा, अब आते हैं एक और “ईमानदार सभ्य बाबू” उर्फ नवीन पटनायक के राज्य उड़ीसा में. अप्रैल-मई में इस मामले के सामने आने के बाद से लगातार सीबीआई सारधा घोटाले की जाँच में जुटी हुई है और हाल ही में एजेंसी ने बीजद के सांसद रामचंद्र हंसदा और दो विधायकों को इस सिलसिले में गिरफ्तार कर लिया है. उड़ीसा में ये सांसद महोदय “अर्थ-तत्त्व” नामक समूह चलाते थे, जिसकी कार्यशैली बिलकुल सारधा के पोंजी स्कीम की तरह है. जहाँ सारधा वालों ने रियलिटी, मीडिया जैसे कई क्षेत्रों में 200 से अधिक कम्पनियाँ बनाईं, उसी प्रकार “अर्थ-तत्त्व” ने 44 कम्पनियाँ खड़ी कर रखी हैं. जिसमें जाँच एजेंसियों को भूलभुलैया की तरह घुमाए जाने की योजना थी, लेकिन पश्चिम बंगाल से सबक लेते हुए सांसद महोदय को गिरफ्तार कर लिया. जाँच एजेंसियों के हाथ में आई अब तक की सबसे बड़ी मछली है उड़ीसा के एडवोकेट जनरल अशोक मोहंती साहब, जिन्होंने अर्थ-तत्त्व के मुखिया प्रदीप सेठी के साठ मिलकर एक बेहद रहस्यमयी जमीन सौदा किया और ताक में लगी एजेंसियों की पकड़ में आ गए. सीबीआई का मानना है कि सारधा और अर्थ-तत्त्व दोनों आपस में अंदर ही अंदर कहीं मिले हुए हैं और दोनों का सम्मिलित घोटाला दस हजार करोड़ से भी अधिक हो सकता है. उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल और उड़ीसा दोनों ही राज्यों में गरीबों की संख्या बहुत अधिक है. इसलिए वे बेचारे अनपढ़ लोग जब किसी संस्था के साथ सांसद और अपने नेताओं को जुड़ा हुआ देखते हैं तो विश्वास कर लेते हैं, यही हुआ भी और लाखों लोगों को अभी तक करोड़ों रूपए की चपत लग चुकी है. वे अपनी मैली-कुचैली पास बुक लेकर दस-बीस हजार रूपए के लिए दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन न तो ममता बनर्जी और ना ही नवीन पटनायक उनकी बात सुनने को तैयार हैं. सिर्फ जाँच का आश्वासन दिया जा रहा है, जो कि केन्द्रीय एजेंसियाँ कर रही हैं.

एडवोकेट जनरल मोहंती साहब फरमाते हैं कि कटक के मिलेनियम सिटी इलाके में उन्होंने एक करोड़ एक लाख का जो मकान खरीदा है वह उनकी कमाई है. जबकि जाँच में पता चला है कि यह मकान प्रदीप सेठी ने “कानूनी मदद” के रूप में मोहंती साहब को “गिफ्ट” किया हुआ है. विशेष सीबीआई कोर्ट भी मोहंती साहब से सहमत नहीं हुई और उन्हें दो बार न्यायिक हिरासत में भेज चुकी है. इसी से पता चलता है कि तीनों ही राज्यों (बंगाल, असम, उड़ीसा) में कितने ऊँचे स्तर पर यह खेल चल रहा था, और यह सभी को पता था. सारधा के विशाल फ्राड नेटवर्क की ही एक और कंपनी है उड़ीसा की ग्रीन रे इंटरनेशनल लिमिटेड. इसका मुख्यालय बालासोर में है और यह कम्पनी उड़ीसा के गरीबों से दस-दस, पचास-पचास रूपए रोज़ाना वसूल कर नाईजेरिया में खनन का कारोबार खड़ा कर रही थी. इस कम्पनी के कर्ताधर्ता मीर सहीरुद्दीन ने दुबई में दफ्तर भी खोल लिया था, लेकिन वहाँ भी अपनी कलाकारी दिखाने के चक्कर में फिलहाल नाईजीरिया सरकार ने इनका पासपोर्ट जब्त कर रखा है और ये साहब वहाँ पर सरकारी मेहमान हैं.

नवीन पटनायक साहब, जो अपने चेहरे-मोहरे से बड़े भोले और सभ्य दिखाई देते हैं, वे वास्तव में इतने सीधे नहीं हैं. ममता बनर्जी की ही तरह पटनायक साहब ने भी NIA तथा SFIO की जाँच में अड़ंगे लगाने के भरपूर प्रयास किए और जाँच को धीमा अथवा बाधित किया. सीबीआई द्वारा तमाम सबूत दिए जाने के बावजूद उड़ीसा विधानसभा के स्पीकर महीनों तक दोनों बीजद विधायकों और मंत्रियों से पूछताछ का आदेश देने में टालमटोल करते रहे. इसीलिए सीबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि इस घोटाले की व्यापकता तथा इसमें आतंकवाद और अंडरवर्ल्ड तथा तीन-तीन राज्यों के बड़े-बड़े नेताओं के फँसे होने के कारण सीबीआई एवं दूसरी जाँच एजेंसियों पर भारी दबाव है कि जाँच की गति धीमी करें. राज्य पुलिस एवं स्थानीय CID से कोई विशेष मदद नहीं मिल रही है, इसलिए जाँच में मुश्किल भी आ रही है, जबकि इधर दिल्ली में नरेंद्र मोदी और अमित शाह लगातार जाँच अधिकारियों पर जल्दी जाँच करने का दबाव बनाए हुए हैं. अप्रैल में यह मामला उजागर हुआ, 9 मई 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जाँच सीबीआई को सौंपने तथा इस पर निगरानी हेतु सरकार से कहा (इस दिनाँक तक बाजी UPA के हाथ से निकल चुकी थी) और तत्परता दिखाते हुए 4 जून  2014 को ही सीबीआई ने 47 एफआईआर रजिस्टर कर दी थीं. ताज़ा खबर यह है कि तृणमूल काँग्रेस के एक और सांसद को सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया है और शिकंजा कसता जा रहा है.

बंगाल-उड़ीसा और असम के लाखों गरीब लोगों का पैसा वापस मिलने की उम्मीद तो अब बहुत ही कम बची है, लेकिन कम से कम लुटेरों और ठगों को उचित सजा और लंबी कैद वगैरह मिल जाए तो उतना ही बहुत है. देखते हैं कि केन्द्र सरकार आगे इस मामले को कितनी गहराई से खोदती है. लेकिन फिलहाल ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और तरुण गोगोई को ठीक से नींद नहीं आ रही होगी, यह निश्चित है.

-      सुरेश चिपलूनकर, उज्जैन

Hinduism Or Nationalistic is not a Right Winger...

Written by रविवार, 26 अक्टूबर 2014 13:48
हिन्दू धर्म का समर्थक, “दक्षिणपंथी” नहीं कहा जा सकता...

(आदरणीय विद्वान डॉक्टर राजीव मल्होत्रा जी के लेख से साभार, एवं अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवादित)
अनुवादकर्ता : सुरेश चिपलूनकर, उज्जैन (मप्र)

मित्रों...

अक्सर आपने “कथित” बुद्धिजीवियों (“कथित” इसलिए लिखा, क्योंकि वास्तव में ये बुद्धिजीवी नहीं, बल्कि बुद्धि बेचकर जीविका खाने वाले व्यक्ति हैं) को “राईट विंग” अथवा “दक्षिणपंथी” शब्द का इस्तेमाल करते सुना होगा. इस शब्द का उपयोग वे खुद को वामपंथी अथवा बुद्धिजीवी साबित करने के लिए करते हैं, अर्थात 2+2=4 सिद्ध करने के लिए “वामपंथी का उल्टा दक्षिणपंथी”. ये लोग अक्सर इस शब्द का उपयोग, “हिन्दूवादियों” एवं “राष्ट्रवादियों” को संबोधित करने के लिए करते हैं.

अब सवाल उठता है कि ये दोनों शब्द (अर्थात वामपंथ एवं दक्षिणपंथ) आए कहाँ से?? क्या ये शब्द भारतीय बुद्धिजीवियों की देन हैं? क्या इन शब्दों का इतिहास तमाम विश्वविद्यालयों में वर्षों से जमे बैठे “लाल कूड़े” ने कभी आपको बताया?? नहीं बताया!. असल में पश्चिम और पूर्व से आने वाले ऐसे ढेर सारे शब्दों को, जिनमें पश्चिमी वर्चस्व अथवा पूर्वी तानाशाही झलकती हो, उसे भारतीय सन्दर्भों से जबरदस्ती जोड़कर एक “स्थानीय पायजामा” पहनाने की बौद्धिक कोशिश सतत जारी रहती है. इन बुद्धिजीवियों के अकादमिक बहकावे में आकर कुछ हिंदूवादी नेता भी खुद को “राईट विंग या दक्षिणपंथी” कहने लग जाते हैं. जबकि असल में ऐसा है नहीं. आईये देखें कि क्यों ये दोनों ही शब्द वास्तव में भारत के लिए हैं ही नहीं...

फ्रांस की क्रान्ति के पश्चात, जब नई संसद का गठन हुआ तब किसानों और गरीबों को भी संसद का सदस्य होने का मौका मिला, वर्ना उसके पहले सिर्फ सामंती और जमींदार टाईप के लोग ही सांसद बनते थे. हालाँकि चुनाव में जीतकर आने के बावजूद, रईस जमींदार लोग संसद में गरीबों के साथ बैठना पसंद नहीं करते थे. ऐसा इसलिए कि उन दिनों फ्रांस में रोज़ाना नहाने की परंपरा नहीं थी. जिसके कारण गरीब और किसान सांसद बेहद बदबूदार होते थे. जबकि धनी और जमींदार किस्म के सांसद कई दिनों तक नहीं नहाने के बावजूद परफ्यूम लगा लेते थे और उनके शरीर से बदबू नहीं आती थी. परफ्यूम बेहद महँगा शौक था और सिर्फ रईस लोग ही इसे लगा पाते थे और परफ्यूम लगा होना सामंती की विशेष पहचान था. तब यह तय किया गया कि संसद में परफ्यूम लगाए हुए अमीर सांसद अध्यक्ष की कुर्सी के एक तरफ बैठें और जिन्होंने परफ्यूम नहीं लगाया हुआ है, ऐसे बदबूदार गरीब और किसान सांसद दूसरी तरफ बैठें.



चूँकि ये दोनों ही वर्ग एक-दूसरे को नाम से नहीं जानते थे और ना ही पसंद करते थे, इसलिए संसद में आने वाले लोगों तथा रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों ने “अध्यक्ष के दाँयी तरफ बैठे लोग” और अध्यक्ष के बाँई तरफ बैठे लोग” कहकर संबोधित करना और रिपोर्ट करना शुरू कर दिया. आगे चलकर स्वाभाविक रूप से “अनजाने में ही” यह मान लिया गया, कि बाँई तरफ बैठे बदबूदार सांसद गरीबों और किसानों की आवाज़ उठाते हैं अतः उन्हें “लेफ्ट विंग” (अध्यक्ष के बाँई तरफ) कहा जाने लगा. इसी विचार के व्युत्क्रम में दाँयी तरफ बैठे सांसदों को “राईट विंग” (अध्यक्ष के सीधे हाथ की तरफ बैठे हुए) कहा जाने लगा. यह मान लिया गया कि “खुशबूदार लोग” सिर्फ अमीरों और जमींदारों के हितों की बात करते हैं.

एक व्याख्यान के पश्चात JNU के एक छात्र ने गर्व भरी मुस्कान के साथ मुझसे पूछा कि, “मैं तो वामपंथी हूँ, लेकिन आपका लेखन देखकर समझ नहीं आता कि आप राईट विंग के हैं या लेफ्ट विंग के”? तब मैंने जवाब दिया कि, चूँकि भारतीय संस्कृति में रोज़ाना प्रातःकाल नहाने की परंपरा है, इसलिए मुझे परफ्यूम लगाकर खुद की बदबू छिपाने की कोई जरूरत नहीं है. इसलिए ना तो आप मुझे “खुशबूदार” की श्रेणी में रख सकते हैं और ना ही “बदबूदार” की श्रेणी में. भारत के लोग सर्वथा भिन्न हैं, उन्हें पश्चिम अथवा पूर्व की किसी भी शब्दावली में नहीं बाँधा जा सकता.

पश्चिमी बुद्धिजीवियों और लेखकों द्वारा “बना दी गई अथवा थोप दी गई सामान्य समझ” के अनुसार दक्षिणपंथी अर्थात धार्मिक व्यक्ति जो पूँजीवादी व्यवस्था और कुलीन सामाजिक कार्यक्रमों का समर्थक है. जबकि उन्हीं बुद्धिजीवियों द्वारा यह छवि बनाई गई है कि “वामपंथी” का अर्थ ऐसा व्यक्ति है जो अमीरों के खिलाफ, धर्म के खिलाफ है.

ऐसे में सवाल उठता है कि पश्चिम द्वारा बनाए गए इस “खाँचे और ढाँचे” के अनुसार मोहनदास करमचंद गाँधी को ये बुद्धिजीवी किस श्रेणी में रखेंगे? लेफ्ट या राईट? क्योंकि गाँधी तो गरीबों और दलितों के लिए भी काम करते थे साथ ही हिन्दू धर्म में भी उनकी गहरी आस्था थी. एक तरफ वे गरीबों से भी संवाद करते थे, वहीं दूसरी तरफ जमनादास बजाज जैसे उद्योगपतियों को भी अपने साथ रखते थे, उनसे चंदा लेते थे. इसी प्रकार सैकड़ों-हजारों की संख्या में “हिन्दू संगठन” हैं, जो गरीबों के लिए उल्लेखनीय काम करते हैं साथ ही धर्म का प्रचार भी करते हैं. दूसरी तरफ भारत में हमने कई तथाकथित सेकुलर एवं लेफ्ट विंग के ऐसे लोग भी देख रखे हैं, जो अरबपति हैं, कुलीन वर्ग से आते हैं. अतः “वाम” और “दक्षिण” दोनों ही पंथों को किसी एक निश्चित भारतीय खाँचे में फिट नहीं किया जा सकता, लेकिन अंधानुकरण तथा बौद्धिक कंगाली के इस दौर में, पश्चिम से आए हुए शब्दों को भारतीय बुद्धिजीवियों द्वारा न सिर्फ हाथोंहाथ लपक लिया जाता है, बल्कि इन शब्दों को बिना सोचे-समझे अधिकाधिक प्रचार भी दिया जाता है... स्वाभाविकतः हिंदुत्व समर्थकों अथवा राष्ट्रवादी नेताओं-लेखकों को “राईट विंग” (या दक्षिणपंथी) कहे जाने की परंपरा शुरू हुई.

हिन्दू ग्रंथों में इतिहास, धर्म, अर्थशास्त्र, वास्तु इत्यादि सभी हैं, जिन्हें सिर्फ संभ्रांतवादी नहीं कहा जा सकता. यह सभी शास्त्र इस पश्चिमी वर्गीकरण में कतई फिट नहीं बैठते. प्राचीन समय में जिस तरह से एक ब्राह्मण की जीवनशैली को वर्णित किया गया है, वह इस “अमेरिकी दक्षिणपंथी” श्रेणी से कतई मेल नहीं खाता. अतः हिंदुओं को स्वयं के लिए उपयोग किए जाने वाले “दक्षिणपंथी” शब्द को सीधे अस्वीकार करना चाहिए. एक हिन्दू होने के नाते मुझमें तथाकथित “अमेरिकी दक्षिणपंथ” के भी गुण मौजूद हैं और “अमेरिकी वामपंथ” के भी. मैं स्वयं को किसी सीमा में नहीं बाँधता, मैं दोनों ही तरफ की कई विसंगतियों से असहमत हूँ और रहूँगा. हाँ!!! अलबत्ता यदि कोई वामपंथी मित्र स्वयं को गर्व से वामपंथी कहता है तो उसे खुशी से वैसा करने दीजिए, क्योंकि वह वास्तव में वैसा ही है अर्थात पूँजी विरोधी, धर्म विरोधी और “बदबूदार”.

पुनश्च :- (आदरणीय विद्वान डॉक्टर राजीव मल्होत्रा जी के लेख से साभार एवं अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवादित)

अनुवादकर्ता : सुरेश चिपलूनकर, उज्जैन (मप्र) 

Water Management of Gambhir Dam Ujjain is Must

Written by बुधवार, 15 अक्टूबर 2014 11:31
सिर्फ जल संरक्षण नहीं, जल संचय, प्रबंधन  और बचत भी आवश्यक...

- Suresh Chiplunkar, Ujjain 

आधुनिक युग में जैसा कि हम देख रहे हैं, प्रकृति हमारे साथ भयानक खेल कर रही है, क्योंकि मानव ने अपनी गलतियों से इस प्रकृति में इतनी विकृतियाँ उत्पन्न कर दी हैं, कि अब वह मनुष्य से बदला लेने पर उतारू हो गई है. केदारनाथ की भूस्खलन त्रासदी हो, या कश्मीर की भीषण बाढ़ हो, अधिकांशतः गलती सिर्फ और सिर्फ मनुष्य के लालच और कुप्रबंधन की रही है. 

बारिश के पानी को सही समय पर रोकना, उचित पद्धति से रोकना ताकि वह भूजल के रूप में अधिकाधिक समय तक सुरक्षित रह सके तथा छोटे-छोटे स्टॉप डैम, तालाब इत्यादि संरचनाओं के द्वारा ग्रामीण इलाकों में किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की विभिन्न प्रक्रियाओं पर लगातार विचार किया जाता रहा है और आगे भी इस दिशा में कार्य किया ही जाता रहेगा, क्योंकि जल हमारी अर्थव्यवस्था, हमारे जीवन, हमारे सामाजिक ताने-बाने, हमारी सांस्कृतिक गतिविधियों का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है. ज़ाहिर है कि समय-समय पर इस विषय को लेकर कई जल विशेषज्ञ, इंजीनियर एवं समाजशास्त्रियों द्वारा उल्लेखनीय कार्य किया गया है. परन्तु मेरा मानना है कि हमें जल संरक्षण के साथ-साथ जल बचत पर भी उतनी ही गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है. चूँकि मैं मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले से हूँ, अतः इस सम्बन्ध में मैं आपके समक्ष इसी क्षेत्र को उदाहरण के रूप में पेश करता हूँ, ताकि इस उदाहरण को देश के अन्य जिलों की सभी जल संरचनाओं पर समान रूप से लागू किया जा सके.

जैसा कि सभी जानते हैं, उज्जैन एक प्राचीन नगरी है जहाँ ज्योतिर्लिंग भगवान महाकालेश्वर स्थित हैं, तथा प्रति बारह वर्ष के पश्चात यहाँ कुम्भ मेला आयोजित होता है, जिसे “सिंहस्थ” कहा जाता है. उज्जैन में आगामी कुम्भ मेला अप्रैल-मई २०१६ में लगने जा रहा है, अर्थात अब सिर्फ डेढ़ वर्ष बाकी है. उज्जैन नगर को जलप्रदाय करने अर्थात इसकी प्यास बुझाने का एकमात्र स्रोत है यहाँ से कुछ दूरी पर बना हुआ बाँध जो 1992 वाले कुम्भ के दौरान गंभीर नदी पर बनाया गया था. उल्लेखनीय है कि गंभीर नदी, चम्बल नदी की सहायक नदी है, जो कि नर्मदा नदी की तरह वर्ष भर “सदानीरा” नहीं रहती, अर्थात सिर्फ वर्षाकाल में ही इसमें पानी बहता है और इसी पानी को वर्ष भर संभालना होता है. कहने को तो यहाँ शिप्रा नदी भी है, परन्तु वह भी सदानीरा नहीं है और उसे भी स्थान-स्थान पर स्टॉप डैम बनाकर पानी रोका गया है जो सिंचाई वगैरह के कामों में लिया जाता है, पीने के योग्य नहीं है क्योंकि सारे उज्जैन का कचरा और मल-मूत्र इसमें आकर गिरता है. पेयजल के एकमात्र स्रोत अर्थात गंभीर बाँध की मूल क्षमता 2250 McFT है. 1992 में इसके निर्माण के समय यह कहा गया था कि, अब अगले तीस-चालीस साल तक उज्जैन शहर को पानी के लिए नहीं तरसना पड़ेगा. इंजीनियरों द्वारा ये भी कहा गया था कि इस बाँध को एक बार पूरा भर देने के बाद, यदि दो साल तक लगातार बारिश नहीं भी हो, तब भी कोई तकलीफ नहीं आएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. वर्ष 2004 में जलसंकट और वर्ष 2007 में यह प्राचीन नगरी अपने जीवनकाल का सबसे भयानक सूखा झेल चुकी है. उस वर्ष जून से सितम्बर तक औसत से 40% कम वर्षा हुई थी. तो फिर ऐसा क्या हुआ, कि मामूली सा जलसंकट नहीं, बल्कि सात-सात दिनों में एक बार जलप्रदाय के कारण शहर से पलायन की नौबत तक आ गई? कारण वही है, कुप्रबंधन, राजनीति और दूरगामी योजनाओं का अभाव.


(चित्र :- उज्जैन नगर को पेयजल आपूर्ति करने वाला गंभीर बाँध 
जो शहर से लगभग १८ किमी दूर है) 

जल संरक्षण के साथ-साथ जिस जल संचय एवं जल बचत के बारे में मैंने कहा, अब उसे सभी बड़े शहरों एवं नगरों में लागू करना बेहद जरूरी हो गया है. उज्जैन में 2007 के भीषण जलसंकट के समय प्रशासन का पहला कुप्रबंधन यह था कि जब उन्हें यह पता था कि माह सितम्बर तक औसत से बहुत कम बारिश हुई है, तो उन्हें “लिखित नियमों” के अनुसार बाँध के गेट खुले रखने की क्या जरूरत थी? पूछने पर प्रशासनिक अधिकारियों ने कहा कि यह शासकीय नियम है कि वर्षाकाल में माह जुलाई से पन्द्रह सितम्बर तक बाँध के गेट खुले रखना जरूरी है, लेकिन यह एक सामान्य समझ है कि इस नियम को तभी लागू किया जाना चाहिए, जब लगातार बारिश हो रही हो. ऊपर से बारिश नहीं हुई और इधर बाँध से पानी बहता रहा. दूसरी गलती यह रही कि नवंबर से जनवरी के दौरान गेहूँ की फसल के लिए इसी बाँध से आसपास के किसानों ने पानी की जमकर चोरी की और प्रशासन तथा राजनीति मूकदर्शक बने देखते रहे, क्योंकि किसान एक बड़ा वोट बैंक है. हालाँकि दिखावे के लिए बाँधों के आसपास स्थित गाँवों में समृद्ध किसानों की चंद मोटरें और पम्प जब्त किए जाते हैं, लेकिन यह बात सभी जानते हैं कि जल संसाधन विभाग के कर्मचारी इसमें कितनी रिश्वतखोरी करते हैं और आराम से पानी चोरी होने देते हैं. यह तो हुई राजनीती और कुप्रबंधन की बात, अब आते हैं दूरगामी योजनाओं के अभाव के बारे में.

इस वर्ष भी उज्जैन और आसपास बारिश कम हुई है. गंभीर बाँध जिसकी क्षमता 2250 McFT है वह इस बार सिर्फ 1700 McFT ही भर पाया है (वह भी इंदौर के यशवंत सागर तालाब की मेहरबानी से). अब जबकि यह स्पष्ट हो चुका है, कि आगे और बारिश होने वाली नहीं है तथा समूचे उज्जैन शहर को इतना ही उपलब्ध पानी जुलाई 2015 के पहले सप्ताह तक चलाना है तो फिर अक्टूबर के माह में रोजाना जलप्रदाय की क्या जरूरत है? जी हाँ!!!, उज्जैन में पिछले वर्ष भी पूरे साल भर रोजाना एक घंटा नल दिए गए, फिर जब इस वर्ष बारिश में देरी हुई तो हाय-तौबा मचाई गई. इस साल भी बारिश कम हुई है, तब भी एक दिन छोड़कर जलप्रदाय के निर्णय में पहले देर की गई और अब त्यौहारों का बहाना बनाकर रोजाना जलप्रदाय किया जा रहा है. सार्वजनिक नल कनेक्शन की दुर्दशा के बारे में तो सभी जानते हैं. अतः रोजाना जो जलप्रदाय किया जा रहा है, वह खराब या टूटी हुई टोंटियों से नालियों में बेकार बहता जा रहा है, अथवा इस जलप्रदाय का फायदा सिर्फ उन मुफ्तखोरों को मिल रहा है, जो पानी बिल तक नहीं चुकाते. ऐसे में उज्जैन की जनता को आगामी मई-जून 2015 के भविष्य की कल्पना भी डरा देती है. मेरा प्रस्ताव यह है कि पूरे देश में जहाँ भी किसी शहर की जलप्रदाय व्यवस्था सिर्फ एक स्रोत पर निर्भर हो, वहाँ साल भर एक दिन छोड़कर नलों में पानी दिया जाए. वैसे भी ठण्ड के दिनों में अर्थात नवंबर से फरवरी तक पानी की खपत कम ही रहती है. इसलिए इस दौरान जल संचय या जल बचत का यह फार्मूला जनता को मई-जून-जुलाई में राहत देगा, बशर्ते इसमें राजनीति आड़े ना आए.

दूरगामी योजनाओं के अभाव की दूसरी मिसाल है बाँधों में जमा होने वाली गाद, जिसे अंगरेजी में हम “सिल्ट” कहते हैं, की सफाई नहीं होना. प्रकृति का नियम है कि नदी में बारिश के दिनों में बहकर आने वाला पानी अपने साथ रेत, मिट्टी के बारीक-बारीक कण लेकर आता है, जो धीरे-धीरे बाँध की तलहटी में बैठते, जमा होते जाते हैं और जल्दी ही एक मोटी परत का रूप धारण कर लेते हैं. मैंने उज्जैन के जिस गंभीर बाँध का यहाँ उदाहरण दिया है, उसकी क्षमता 2250 McFT बताई जाती है. उज्जैन नगर को पानी पिलाने में रोजाना का खर्च होता है लगभग 6-7 McFT. यदि मामूली हिसाब भी लगाया जाए, तो पता चलता है कि यदि शहर को रोजाना भी पानी दिया जाए तो वर्ष में लगभग 320-350 दिनों तक जलप्रदाय किया जा सकता है (माह सितम्बर में बाँध भरने के दिन से गिनती लगाई जाए तो). लेकिन पिछले दस वर्ष में ऐसा कभी नहीं हुआ कि जुलाई माह आते-आते बाँध के खाली होने की नौबत ना आ जाती हो. ऐसा क्यों होता है?? ज़ाहिर है कि, जिस बाँध की क्षमता 2250 MCFT बताई जा रही है, उसकी क्षमता उतनी है ही नहीं... यह क्षमता इसलिए कम हुई है, क्योंकि बाँध की तलहटी के एक बड़े हिस्से में खासी गाद जमा हो चुकी है, जिसकी सफाई वर्षों से आज तक नहीं हुई. यदि एक मोटा अनुमान भी लगाया जाए तो पता चलता है कि पिछले बीस वर्ष में गंभीर बाँध में गाद की एक खासी मोटी परत जमा हो गई है, जिसके कारण बाँध की वास्तविक क्षमता बेहद घट चुकी है, लेकिन अधिकारी और प्रशासन उसी पुराने स्केल पर मीटर की गहराई नाप रहा है जो बरसों पहले दीवार पर पेंट की गई है. कहने का तात्पर्य यह है कि जिस बाँध की क्षमता 2250 बताई जा रही है वह शायद 1500 या उससे भी कम रह गई हो, अन्यथा सितम्बर से लेकर जुलाई तक सिर्फ 270 दिनों में ही, हर साल बाँध का पानी खत्म क्यों हो जाता है? अतः मेरा दूसरा सुझाव यह है कि देश के सभी बाँधों में जमा गाद की गर्मियों में नियमित सफाई की जाए. गर्मियों के दिनों में जब बाँधों का पानी लगभग खत्म हो चुका होता है, उसी समय आठ दिनों के सामाजिक श्रमदान एवं प्रशासनिक सहयोग तथा आधुनिक उपकरणों के जरिये बाँधों को गहरा किया जाना चाहिए. यह पता लगाया जाना चाहिए कि बाँध की वास्तविक क्षमता क्या है?


(प्रस्तुत चित्र 2007 के जलसंकट के समय का है, साफ़ देखा जा सकता है कि बाँध की तलहटी में कितनी गाद जम चुकी है, जिसके कारण इसकी भराव क्षमता कम हुई है). 

तीसरी एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है, कि बढ़ते शहरीकरण के कारण बाँध के पानी के उपयोग की प्राथमिकताओं में कलह होने लगा है. यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बाँध का पानी सिंचाई के लिए है या पेयजल के लिए, अर्थात शहरी और ग्रामीण हितों का टकराव न होने पाए. अक्सर देखा गया है कि समृद्ध किसान नवंबर से फरवरी के दौरान अपनी फसलों के लिए बाँधों से पानी चोरी करते हैं. इसे रोका जाना चाहिए. इस पर रोक लगाने के लिए सिर्फ प्रशासनिक अमला काफी नहीं है, राजनैतिक इच्छाशक्ति भी जरूरी है, क्योंकि जैसा मैंने पहले कहा किसान एक बड़ा वोट बैंक है.

अंत में संक्षेप में सिर्फ तीन बिंदुओं में कहा जाए तो – १) शहरों में रोजाना जलप्रदाय की कतई आवश्यकता नहीं है, एक दिन छोड़कर जलप्रदाय किया जाना चाहिए... २) गर्मियों के दिनों में बाँधों की तलछट में जमा हुई गाद की नियमित सफाई होनी चाहिए, ताकि बाँध गहरा हो सके और उसकी क्षमता बढे... और ३) बाँध से पानी की चोरी रोकना जरूरी है, यह सुनिश्चित हो कि पानी का उपयोग पेयजल हेतु ही हो, ना कि सिंचाई के लिए.... यदि सभी शहरों में इन तीनों बिंदुओं पर थोड़ा भी ध्यान दिया जाएगा, तो मुझे विश्वास है कि “जल-संचय” एवं “जल-बचत” के माध्यम से भी हम काफी कुछ जल संरक्षण का लक्ष्य हासिल कर सकेंगे. मैं इस मीडिया चौपाल के माध्यम से अपने समस्त पत्रकार मित्रों एवं मीडिया समूहों से आव्हान करना चाहता हूँ कि सभी बड़े नगरों में इन तीन बिंदुओं पर अवश्य विचार किया जाए. इसमें मीडिया का दबाव कारगर होता है, और स्वाभाविक है कि जब हम कहते हैं कि “जल ही जीवन है”, तो अपने जीवन हेतु हमें सम्मिलित प्रयास करने ही होंगे... भूजल संरक्षण के साथ ही जो जल भण्डार हमें वर्षाकाल में उपलब्ध होते हैं उस पानी की बचत और समुचित प्रबंधकीय संचय करना भी जरूरी है.

-        
---____ :-  सुरेश चिपलूणकर, उज्जैन 

Fate of Sanskrit and Sanskrit University

Written by बुधवार, 24 सितम्बर 2014 12:05
देवभाषा  संस्कृत  के पतन का कारण और नौकरशाही का रवैया...


संस्कृत को देवभाषा कहा जाता है. और इसे यह दर्जा यूँ ही किसी के कहने भर से नहीं मिल गया है, बल्कि भारतीय संस्कृति, आध्यात्म, वास्तुकला से लेकर तमाम धार्मिक आख्यान संस्कृत में रचे-लिखे और गत कई शताब्दियों से पढ़े गए हैं, मनन किए गए हैं. आज़ादी के समय से ही संस्कृत को पीछे धकेलकर अंग्रेजी को बढ़ाने की साज़िश “प्रगतिशीलता” और “सेकुलरिज़्म” के नाम पर होती आई है. कुतर्कियों का तर्क है कि यह भाषा ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देती है तथा यह सिर्फ आर्यों की भाषा है. ये बात और है कि संस्कृत भाषा में उपलब्ध ज्ञान को चीन से आए हुए विद्वानों ने भी पहचाना और जर्मनी के मैक्समुलर ने भी. इसीलिए तत्कालीन नालन्दा और तक्षशिला के विराट पुस्तकालयों से संस्कृत भाषा के कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ चीनी यात्री घोड़ों पर लादकर चीन ले गए और उनका मंदारिन भाषा में अनुवाद किया. अधिक दूर जाने जरूरत नहीं है, 1940 तक जर्मनी सहित कई यूरोपीय देशों के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में एक संस्कृत विभाग अवश्य होता था, आज भी कई विश्वविद्यालयों में है. कथित प्रगतिशीलों के कुतर्क को भोथरा करने के लिए एक तथ्य ही पर्याप्त है कि जब भारत के संविधान की रचना हो रही थे, उस समय सिर्फ दो लोगों ने संस्कृत को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता देने का प्रस्ताव रखा था, और वे थे डॉ भीमराव अम्बेडकर तथा ताजुद्दीन अहमद, हालाँकि बाद में इस प्रस्ताव को नेहरू जी ने “अज्ञात कारणों” से खारिज करवा दिया था.

संक्षेप में की गई इस प्रस्तावना का अर्थ सिर्फ इतना है कि जिस भाषा का लोहा समूचा विश्व आज भी मानता है, उसी देवभाषा संस्कृत को बर्बाद करने और उसकी शिक्षा को उच्च स्थान दिलाने के लिए हमारी सरकारें कितनी गंभीर हैं यह इसी बात से स्पष्ट है कि भारत देश में संस्कृत भाषा के उत्थान एवं शिक्षण हेतु स्थापित केन्द्रीय अभिकरण एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार से सीधे सम्बद्ध, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान (वेबसाईट–www.sanskrit.nic.in) की स्थिति आज अत्यन्त दयनीय एवं करुणापूर्ण है.


हिन्दी की एक लोकोक्ति "आगे नाथ न पीछे पगहा" यहाँ पूर्णतः चरितार्थ हो रही है | विश्व के सबसे बडे संस्कृत विश्वविद्यालय के रूप में प्रतिष्ठित, इस विश्वविद्यालय में न ही कोई स्थायी कुलपति है, और न ही समग्र रूप से स्थायी प्राध्यापक हैं|  इसके बावजूद इस संस्थान के छात्र छात्रायें बडी ही विनम्रता, सरलता, धीरता, के साथ कोई आपत्ति उठाये बिना यहाँ अध्ययन कर रहे हैं| क्या भारत में संस्कृत भाषा का एक भी योग्य विद्वान नहीं है,  जिसे इस राष्ट्रीय स्तर के संस्कृत संस्थान का कुलपति बनाया जा सके? जब संस्कृत की ऐसी प्रमुख संस्था का ये हाल है, तो सोचिये संस्कृत की अन्य छोटी छोटी संस्थाओं की क्या हालत होगी?



इस सन्दर्भ में मुझे एक बात यह समझ नहीं आती, कि संस्कृत के बडे बडे प्रकाण्ड पण्डित इस विषय में मौन क्यों हैं ? क्या राष्ट्रपति पुरस्कार, बादरायण पुरस्कार, कालिदास पुरस्कार, व्यास पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, इत्यादि पुरस्कारों को प्राप्त करने के बाद इन प्रकाण्ड पण्डितों का संस्कृत के प्रति कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता? ये विद्वान अपनी आवाज़ बुलंद क्यों नहीं करते? 



प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा हिन्दी को बढ़ावा देने तथा भारतीय संस्कृति के प्रति उनके रुझान को देखते हुए आशा बंधी थी, कि शायद इस मामले में कुछ विशिष्ट प्रगति हो, लेकिन वर्तमान सरकार भी आडम्बर में व्यस्त है| संस्कृत भाषा के विकास का दिखावा करने के लिए वह लाखों रुपयों के भव्य आयोजन कर सकती है, संस्कृत सप्ताह तो मना सकती है, नालन्दा और तक्षशिला को पुनर्जीवित करने के नाम पर करोड़ों रूपए अनुदान तत्काल दिया जा सकता है, परन्तु  संस्कृत के अध्यापकों को देने के लिए इस सरकार के पास रुपयों का नितान्त अभाव है? 
ऐसा कैसे? क्या नौकरशाही अभी भी इतनी मजबूत है कि वह अपनी मनमर्जी चला सके?

राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के अलावा अन्य संस्कृत विश्वविद्यालयों की भी लगभग यही स्थिति है. इस सूची में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय आदि. संस्कृत के अधिकांश संस्थानों में ऐसे-ऐसे लोग काबिज हैं, जिनका संस्कृत से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है. जिस समय श्री राधावल्लभ त्रिपाठी यहाँ कुलपति थे तब यह संस्थान नई ऊँचाई को छू रहा था, किन्तु अब धीरे-धीरे दुरावस्था की तरफ बढ़ रहा है. संस्कृत जगत के सभी दिग्गज मूक होकर संस्कृत के पतन का तमाशा देख रहे है। नाम न छापने की शर्त पर एक “तदर्थ” शिक्षक कहते हैं, “राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में विगत सात वर्षो से अपनी सेवाएँ देने के बाद भी यदि हमे अपने भविष्य को लेकर चिंतित होना पड़ेगा तो में यही कहूँगा कि संस्कृत पढने और संस्कृत संस्थानों में पढ़ाने का कोई लाभ नहीं है... अपील करता हूँ सभी संस्कृत के विद्यार्थियों से की वे संस्कृत पढना छोड कर कोई और विषय पढ़ें..” ऐसे तमाम शिक्षकों का कोई रखवाला नही है। कई शिक्षक दस-दस साल से संस्थान में कार्यरत हैं और सेवा दे रहे हैं, परन्तु 3 महीने का तदर्थ टेम्पररी कॉन्ट्रेक्ट देकर व मनमाने इंटरव्यू ले लेकर नियुक्तियाँ होती है. सत्र प्रारंभ होने के दो-दो माह तक शिक्षक की नियुक्तियां नहीं,  कर्मचारियों का भविष्य अधर में है। इसके अलावा एक नया “तुगलकी फरमान” जारी किया है की केवल सेवानिवृत्त रिटायर्ड लोगों की नियुक्ति ही की जाए, क्योंकि शायद सेवानिवृत्त शिक्षक अपनी पुनर्नियुक्ति को “बोनस” ही मानता है और प्रबंधन अथवा प्रशासन के खिलाफ कोई शिकायत नहीं करता. लेकिन उन युवा शिक्षकों अथवा अधेड़ आयु के कर्मचारियों का क्या, जिनके सामने अभी पूरा जीवन पड़ा है?

एक और मजेदार बात... सारी दुनिया कंप्यूटर युग में है. कई शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि संस्कृत भाषा कंप्यूटर प्रोग्रामिंग तथा एप्लीकेशंस के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. लेकिन यहाँ आलम यह है कि संस्कृत विषयों के साथ हमेशा से ही पढाये जा रहे कंप्यूटर विषय जिसकी आधुनिक तकनीकी युग में सभी छात्रों के लिए नितांत आवश्यकता है, संस्कृत संरक्षण व सह-शैक्षणिक गतिविधियों में कंप्यूटर शिक्षकों तथा कर्मचारियों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है,  NAAC तथा UGC की निरीक्षण समिति ने भी जहाँ आधुनिक विषयों में कंप्यूटर को सर्वाधिक महत्वपूर्ण बताया था वहीं विद्वान रजिस्ट्रार महोदय द्वारा कंप्यूटर विषय को पूर्णतः समाप्त करके संस्कृत क्षेत्र को नुकसान पहुंचाने का अदभुत षडयंत्र किया है।

एक विडंबना देखिये कि जहाँ एक तरफ हम संस्कृत को बचाने और बढ़ाने के लिए झगड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान के दिल्ली स्थित सांस्कृतिक केन्द्र के बाहर ईरान की तरफ से संस्कृत में बैनर लगाया जाता है... 


मानव संसाधन विकास मन्त्रालय, भारत सरकार के अधीन राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान (मानित विश्वविद्यालय) जिसकी कुलाध्यक्ष (प्रेसिडेंट) मानव संसाधन विकास मंत्री माननीय श्रीमती स्मृति जुबिन ईरानी हैं विश्व में संस्कृत शिक्षण का सर्वाधिक बड़ा विश्वविद्यालय है | भारत में इसके 10 परिसर हैं तथा अनेकों आदर्श संस्कृत महाविद्यालय इस विश्वविद्यालय के अंतर्गत चलते हैं| वर्तमान में यह सरकार की अनदेखी व दुर्नीतियों के कारण अनेकों परेशानियों से जूझ रहा है.

इस विश्वविद्यालय की चंद प्रमुख समस्याएँ संक्षेप में निम्नलिखित हैं -

1. विश्व के सबसे बड़े संस्कृत विश्वविद्यालय के रूप में प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जो कि NAAC एवं UGC से ‘A’ श्रेणी प्राप्त है में समग्र रूप से स्थाई प्राध्यापकों की भारी कमी है, और तो और लगभग एक वर्ष से स्थाई कुलपति की नियुक्ति भी नहीं हुई है|

2. कुलपति की अनुपस्थिति में संस्थान के फैसले रजिस्ट्रार के द्वारा लिए जा रहे हैं जबकि वर्तमान रजिस्ट्रार (कुलसचिव) का संस्कृत जगत से दूर दूर तक कभी कोई सम्बन्ध नहीं रहा है, यह इसी तरह है की कोई पराया आदमी आकर किसी के घर के फैसले करने लगे|

3. संस्कृत के संरक्षण एवं प्रचार हेतु पहले से ही चल रहे कई प्रोजेक्ट तथा अनुसन्धान कार्य बिना किसी कारण के अचानक ही बंद करा दिए गये हैं जिससे संस्कृत संरक्षण कार्यों की क्षति हुई है व इनसे जुड़े कितने ही कर्मचारियों की नौकरियां ख़त्म हो गयी हैं |

4. प्रबल व प्रामाणिक साक्षात्कारों में एक से अधिक बार उत्तीर्ण हो कर एवं यू.जी.सी. की सम्पूर्ण योग्यताओं के साथ आठ से बारह वर्षों से संस्थान को अपनी उत्कृष्ट सेवाएँ दे रहे विभिन्न विषयों के संविदागत व अतिथि अध्यापकों की इस बार मात्र तीन महीने की ही नियुक्ति दी गई जो पूर्व में 11 महीने की दी जाती थी| इसके साथ ही विगत कई वर्षों से ये शिक्षक अपने-अपने विषयों का अध्यापन एवं स्वकार्यों, उत्तरदायित्वों का समुचित ढंग से निर्वहन कर रहे हैं । जिसकी पुष्टि प्रत्येक परिसर के उत्कृष्ट परीक्षा परिणामों से की जा सकती है।

5. 8 से 12 वर्षों का अनुभव रखने वाले इन अध्यापको का सत्र के मध्य में पुनः साक्षात्कार लिया जाएगा जिससे उनका भविष्य इतने वर्षों की उत्कृष्ट सेवा देने के बाद भी आशंकित है व घोर मानसिक तनाव झेल रहे हैं|

6. सत्र प्रारंभ होने के 2-2 महीनो बाद तक शिक्षकों की नियुक्ति न होने के कारण पढ़ाई का नुकसान झेल चुके छात्रों को फिर से पढ़ाई का नुकसान झेलना पड़ेगा क्योंकि शिक्षकों का 3 महीनों का अनुबंध सत्र के बीच ही ख़त्म हो जाएगा|

7. रजिस्ट्रार (कुलसचिव) का यह आदेश अत्यंत हास्यास्पद और गंभीर था की संविदागत शिक्षक पदों पर सेवानिवृत्त लोगों की ही नियुक्ति की जाए, ज़ाहिर है कि यह बेरोजगारी को बढ़ावा देने वाला कदम है|

8. अनुबंध पर लगे शिक्षको में वेतन को लेकर भी भारी विसंगतियाँ हैं| समान योग्यता, कार्य एवं समय होते हुए भी व पूर्व में जो सभी कर्मचारी समान वेतन पा रहे थे अब उनमें से कुछ को बहुत कम व कुछ को अधिक वेतन दिया जा रहा है| जहाँ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी हर क्षेत्र में तकनीकी शिक्षा के प्रबल हिमायती हैं वहीँ यहाँ तकनीकी कर्मचारियों के साथ पूर्णतः सौतेला व्यवहार किया जा रहा है|

देश के लाखों संस्कृत प्रेमियों तथा इस क्षेत्र से जुड़े विद्वानों की यह उम्मीद बेमानी नहीं है कि अब स्वयं माननीय मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी इस तरफ विशेष ध्यान देंगी, ताकि संस्कृत भाषा के साथ जैसा बर्ताव और जैसी उसकी अवस्था की जा रही है, उस पर न सिर्फ रोक लगे, बल्कि संस्कृत शिक्षण का प्राचीन वैभव पुनः स्थापित किया जा सके.

नोट :- सबसे अंत में सबसे विशेष –
इस विश्वविद्यालय के कुलसचिव के बारे में खास बात

डॉ. बिनोद कुमार सिंह कुलसचिव राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान नई दिल्ली - ये साहब 1992 से 1998 तक बंगलौर में सरकारी सेवा में रहे... इसी बीच 1995 में इन्होंने भोपाल के रवीन्द्र महाविद्यालय से नियमित छात्र के रूप में एलएलबी की परीक्षा पास की, तथा 1995 में ही राजस्थान के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय से पीएच.डी. (सामाजिक विज्ञान) की उपाधि प्राप्त की. स्थायी कुलपति के अभाव में संस्कृत से जुड़े मामलों पर सारे अधिकार गैर-संस्कृत वाले सज्जन के पास... आखिर क्यों? दूसरी बात यह कि ऐसा पता चला है कि सिंह साहब की डिग्रीयों के फर्जी होने का मामला भी अदालत में लम्बित है... बताया जाता है कि विश्वविद्यालय का लगभग समूचा स्टाफ इनकी कार्यशैली से नाराज चल रहा है. बहरहाल, यदि “व्यक्तिवाद” को थोड़ी देर दरकिनार भी कर दें, तब भी संस्कृत भाषा के साथ जैसा सौतेला व्यवहार फिलहाल चल रहा है, उसमें तत्काल प्रभाव से सुधार की आवश्यकता है...

Islamization and Conversion in Karnataka Police Station

Written by मंगलवार, 23 सितम्बर 2014 12:52
पुलिस थाने के अंदर खुलेआम इस्लाम का प्रचार...


शुरू में एक सच्ची घटना जान लीजिए, ताकि आप आसानी से समाझ सकें कि “सेकुलरिज़्म” किस तरह से इस देश को तोड़ने और देशद्रोहियो की मदद कर रहा है. कुछ दिनों पहले की ही घटना है उत्तरप्रदेश के वाराणसी शहर से भगाकर लाई गई एक लड़की के बारे में उसके माता-पिता को जानकारी मिली कि वह कर्नाटक के मंगलोर शहर में है. यह जानकारी भी उन्हें तब मिली, जब उसे भगाकर लाने वाले अली मोहम्मद नामक आदमी ने उनसे फिरौती माँगना शुरू किया. लड़की के परिवार ने उसका पता लगाया और कर्नाटक के पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट लिखवाई. कर्नाटक पुलिस ने लड़की को बरामद किया और थाने में लाकर सभी के सामने उसे पुनः हिन्दू धर्म में शामिल करवाया. लेकिन जैसा कि हमेशा से होता आया है, तथाकथित सेकुलर मीडिया ने अपनी घृणित हताशा और मंदबुद्धि के चलते इस बात पर हंगामा खड़ा कर दिया कि पुलिस के संरक्षण में “सेकुलरिज़्म खतरे में है” (ठीक उसी प्रकार जैसे मस्जिदों से अक्सर नारा दिया जाता है, इस्लाम खतरे में है). इस सेकुलर मीडिया ने अपना दबाव इतना अधिक बढ़ाया कि सरकार को इस मामले में चार पुलिसकर्मियों को निलंबित करना पड़ा. ये तो सिर्फ एक घटना है, ऐसी कई घटनाएँ हो चुकी हैं, जहाँ पुलिस का मनोबल तोड़ने की सोची-समझी चालें चली जा रही हैं.

अब एक नया मामला सामने आया है, जिसमें पुलिस के जवानों का ही इस्लामीकरण शुरू किया जा रहा है. कर्नाटक में नवनिर्वाचित कांग्रेस सरकार की नाक के नीचे, धर्म परिवर्तन की कोशिशें खुलेआम शुरू हो चुकी हैं. ऐसी ही एक असंवैधानिक घटना को कर्नाटक के एक स्थानीय अखबार ने “लाईव” कैमरों पर पकड़ा. इस्लामिक गतिविधियों का बड़ा केन्द्र बन चुके कर्णाटक के मैंगलोर शहर में एक संगठित जेहादी गिरोह ने समाज, व्यवस्था और विशेषकर पुलिस सिस्टम को प्रदूषित करने का अभियान चलाया हुआ है, ताकि खाड़ी से मिलने वाले पैसों के जरिये भारत में भी उनकी देशद्रोही गतिविधियाँ चलती रहें.


प्रस्तुत चित्र उसी मीडिया वेबसाइट से लिए गए हैं. चित्र में दिखाई दे रहा शख्स है मोहम्मद ईशाक, जो स्वयं को हिन्दू धर्म से इस्लाम में धर्म परिवर्तित कहता है और अपना पूर्व नाम गिरीश बताता है. ये व्यक्ति अपनी मीठी-मीठी बातों से न सिर्फ सामाजिक संगठनों में बल्कि कुछ हिन्दू संगठनों में भी अपनी घुसपैठ बना चुका है. हिंदुओं के भोलेपन और उदारता का फायदा उठाते हुए, इसे जहाँ भी मौका मिलता है, ये कुरान बाँटने लगता है और धर्म प्रचार शुरू कर देता है. इशाक मोहम्मद “स्ट्रीट-दावाह” नामक संस्था की मैंगलोर शाखा का प्रमुख है. स्ट्रीट-दावाह नामक संस्था, सड़क पर आते-जाते राहगीरों को कुरआन बाँटने का कार्य करती है तथा सड़कों पर ही रहने वाले गरीबों और बच्चों को इस्लाम का “ज्ञान” देती है. पिछले कुछ माह में मोहम्मद ईशाक ने कर्नाटक के सैकड़ों थानों में दिनदहाड़े जाकर सभी के सामने इस्लाम का प्रचार किया, थाने में ऑन-ड्यूटी पुलिस अधिकारियों को कुरान और हदीस बाँटी. लेकिन हमारे तथाकथित सेकुलर मीडिया ने इस पर चूं भी नहीं की. अक्सर श्रीराम सेना और बजरंग दल को गरियाने वाले, रोटी और टोपी जैसे फालतू मुद्दों पर दिन-रात छाती पीटने वालों तथा संघ को कोसने वाले मीडिया में बैठे कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों को इसमें कोई आपत्ति नज़र नहीं आई.

तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केरल के कई थानों में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी धर्म-परिवर्तित हो चुके हैं. हिन्दू जनजागृति समिति ने सबूतों के साथ ऐसे पुलिसकर्मियों की शिकायत की तो उन्हीं के कार्यकर्ताओं को फर्जी धाराओं में फंसाकर अंदर कर दिया गया. “कथित मुख्यधारा” का मीडिया लगातार ऐसे मुद्दों को छिपा जाता है, सोशल मीडिया पर गाहे-बगाहे ऐसे मुद्दों बाकायदा तस्वीरों सहित दिखाए जाते हैं. कर्नाटक सरकार को पुलिस थानों में ऐसे खुलेआम जारी धर्म प्रचार और कुरआन बाँटने की जाँच करनी चाहिए, तथा जो पुलिसकर्मी इसमें सहयोगी हैं उन्हें बर्खास्त किया जाना चाहिए.


सन्दर्भ :- http://www.covertwires.com/index.php/articles/the-islamization-of-karnataka-police-and-silence-of-vigilant-media#sthash.KLzrWb8l.12p8Wqc6.dpuf

Laxman Rao : Writing of Common Man

Written by सोमवार, 04 अगस्त 2014 19:21

फुटपाथ से राष्ट्रपति भवन तक...


पतंजलि हरिद्वार में स्वामी रामदेव जी द्वारा आयोजित सोशल मीडिया शिविर में भाग लेने के पश्चात २८ जुलाई को उज्जैन वापसी के समय मुझे निजामुद्दीन स्टेशन से ट्रेन पकड़नी थी. मैं हरिद्वार से शाम सात बजे ही दिल्ली पहुँच चुका था, जबकि ट्रेन का समय रात सवा नौ बजे का था. इस बीच पत्रकार भाई आशीष कुमार अंशु से फोन पर बातचीत करके चार-छह राष्ट्रवादी मित्रों का तात्कालिक मिलन समारोह आयोजित कर लिया गया था. आशीष भाई अपने दफ्तर नेहरू प्लेस से मुझे बाईक पर बैठाकर भाई रविशंकर के दफ्तर ले चले... हमारी राजनैतिक चर्चा के साथ हल्की-हल्की बारिश की फुहारें जारी थीं.

आईटीओ के पास हिन्दी भवन आते ही आशीष ने मुझसे पूछा कि आप साहित्यकार लक्ष्मण राव से मिलना चाहेंगे?? कम से कम समय में मैं अधिकाधिक लोगों से मिलजुलकर समय का सदुपयोग करना चाहता था.. मैंने तुरंत हामी भर दी. चूँकि आशीष भाई ने “साहित्यकार” लक्ष्मण राव कहा था, और मुझसे मिलवाने की इच्छा ज़ाहिर की थी सो मुझे भी उत्सुकता थी कि ये सज्जन कौन हैं? थोड़ी देर बाद आशीष ने एक चाय की गुमटी पर बाईक रोकी और कहा, आईये चाय पीते हैं. हरिद्वार से थका हुआ आया था, बारिश में भीग भी रहे थे, चाय की तलब भड़क रही थी, इसलिए वह आग्रह अमृत समान लगा. गुमटी के सामने बाईक पार्क करके हम दोनों वहाँ पहुँचे, जहाँ एक अधेड़ आयु वर्ग का आदमी फुटपाथ पर एक छोटी सी छतरी के नीचे गर्मागर्म चाय-पकौड़े बना रहा था. मैंने सोचा कि शायद आशीष भाई ने जिन साहित्यकार लक्ष्मण राव को मुझसे मिलवाने हेतु कहा है, और वे आसपास की किसी बहुमंजिला इमारत से उतरकर हमसे मिलने यहीं इसी गुमटी पर आएँगे. मैं चारों तरफ निगाहें दौड़ाता रहा कि अब लक्ष्मण राव आएँगे फिर आशीष उनका और मेरा परिचय करवाएँगे.

उधर गुमटी पर चाय तैयार हो चुकी थी और हल्की-फुल्की भीड़ के बीच हमारा नंबर आने ही वाला था. जब मैं और आशीष चाय लेने पहुँचे, तो अनायास मेरा ध्यान पास खड़ी एक साईकल पर गया. साईकिल के कैरियर पर बारिश से बचाने की जुगत में प्लास्टिक की पन्नी लगी हुई ढेरों पुस्तकें दिखाई दीं. चाय की गुमटी के पास किताबों से लदी हुई लावारिस साईकिल, बड़ा ही विरोधाभासी चित्र प्रस्तुत कर रही थी. मेरी नज़रों में प्रश्नचिन्ह देखकर आखिरकार आशीष से रहा नहीं गया. बोला, भाई जी अब आपकी बेचैनी और सस्पेंस दूर कर ही देता हूँ... जिन साहित्यकार लक्ष्मण राव जी से मैं आपको मिलवाने लाया हूँ, वे आपके सामने ही बैठे हैं. मैं भौंचक्का था... और खुलासा करते हुए आशीष ने कहा, चाय की गुमटी पर जो सज्जन चाय बना रहे हैं, वही हैं श्री लक्ष्मण राव... ज़ाहिर है कि मैं हैरान था, सोचा नहीं था ऐसा धक्का लगा था. दो मिनट बाद इस झटके से उबरकर मैंने लक्ष्मण राव जी से हाथ मिलाया, उनके साथ तस्वीर खिंचवाई और गौरवान्वित महसूस किया...


जी हाँ, आईटीओ के पास हिन्दी भवन के नीचे पिछले कई वर्षों से चाय-पान की गुमटी लगाने वाले सज्जन का नाम है लक्ष्मण राव. महाराष्ट्र के अमरावती से रोजी-रोटी की तलाश में भटकते-भटकते सूत मिल में मजदूरी, भोपाल में पाँच रूपए रोज पर बेलदारी, कभी ढाबे पर बर्तन माँजते हुए १९७५ में दिल्ली आ गए और इसी फुटपाथ पर जम गए. इतने संघर्षों के बावजूद पढ़ाई-लिखाई के प्रति उनका जूनून कम नहीं हुआ. मराठी में माध्यमिक तक शिक्षा हो ही चुकी थी. गाँव के पुस्तकालय में हिन्दी की अच्छी-अच्छी पुस्तकें पढ़ने को मिलती थीं. दिल्ली आने के बाद चाय-सिगरेट बेचकर आजीविका और परिवार पालने के बाद बचे हुए पैसों से दरियागंज जाकर शेक्सपीयर, गुरुदेव रविन्द्रनाथ, मुंशी प्रेमचंद, गुलशन नंदा आदि की पुस्तकें खरीद लाते और पढ़ते. साथ-साथ रात को अपने विचार लिखते भी जाते. लक्ष्मण राव का पहला उपन्यास “नईदुनिया की नई कहानी” १९७९ में प्रकाशित हुआ, उस समय वे चर्चा का विषय बन गए. लोगों को भरोसा नहीं होता था कि एक चायवाला और उपन्यासकार?? लेकिन जल्दी ही टाईम्स ऑफ इण्डिया के रविवारीय संस्करण में उनका संक्षिप्त परिचय छपा, इसके बाद तो धूम मच गई. १९८४ में इनकी मुलाक़ात श्रीमती इंदिरा गाँधी से हुई तथा २००९ में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भी राष्ट्रपति भवन में बुलाकर लक्ष्मण राव जी की भूरि-भूरि प्रशंसा की. लक्ष्मण राव जी को कई सम्मान, पुरस्कार एवं प्रशंसा-पत्र प्राप्त हो चुके हैं. अभी तक दर्जनों लेख तथा २३ उपन्यास-पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.



कोई भी व्यक्ति जब चाहे तब उनसे इसी चाय की गुमटी पर सुबह सात से रात्रि नौ बजे तक बड़े आराम से भेंट कर सकता है... लक्ष्मण राव जैसे व्यक्तियों को देखकर लगता है कि “समय की कमी” नामक कोई चीज़ नहीं होती, एवं लगन तथा रूचि बरकरार हो, तो व्यक्ति अपने शौक पूरे करने के लिए समय निकाल ही लेता है. न तो गरीबी उसे रोक सकती है, और ना ही संघर्ष और मुश्किलें उसकी राह में बाधा बन सकते हैं... 

Modi Budget - First Step towards Brand India

Written by बुधवार, 30 जुलाई 2014 18:28

मोदी सरकार का बजट : “ब्राण्ड इण्डिया” की तरफ पहला कदम


जब घर में नई बहू आती है, तो परिवार के प्रत्येक सदस्य की उससे अति-अपेक्षाएँ होती हैं, जो कि स्वाभाविक भी है. सास सोचती है कि बहू रोज उसके पैर दबाएगी, ससुर सोचते हैं कि सुबह-सुबह वह उन्हें चाय लाकर देगी, ननद सोचती है कि वह भाभी की सारी साड़ियों की स्वयंभू हकदार हो गई है... नरेंद्र मोदी सरकार नामक “नई बहू” को लेकर भी देश के विभिन्न तबकों की अपेक्षाएँ यही थीं. ऐसा इसलिए, क्योंकि नई बहू के आने से पहले ही ससुराल में यह माहौल बना दिया गया था कि बस!! बहू के घर में पहला कदम रखते ही अब अच्छे दिन आने वाले हैं. वास्तविकता में ऐसा नहीं होता. जिस प्रकार नई बहू को ससुराल की तमाम व्यवस्थाएँ समझने में समय लगता है, सभी पुराने जमे-जमाए सदस्यों के व्यवहार और मूड को भाँपने में समय लगता है, घाघ-कुटिल-शातिर किस्म के रिश्तेदारों की आंतरिक राजनीति समझने में वक्त लगता है, ठीक वैसा ही वक्त इस समय नरेंद्र मोदी सरकार के पास है.

सत्ता सूत्र संभालने के दो माह बाद मोदी सरकार ने अपना पहला बजट पेश किया. जैसा कि हम जानते हैं प्रत्येक वर्ष भारत के बजट निर्माण की प्रक्रिया सितम्बर-अक्टूबर से ही शुरू हो जाती है. चूँकि इस वर्ष लोकसभा चुनाव होने थे, इसलिए पूर्ण बजट पेश नहीं किया जा सका, सिर्फ लेखानुदान से काम चलाया गया. परन्तु सितम्बर २०१३ से मार्च २०१४ तक बजट की जो प्रक्रिया चली, जो सुझाव आए, यूपीए-२ सरकार (जिसे पता था कि अब वह सत्ता में वापस नहीं आ रही) के वित्तमंत्री चिदंबरम द्वारा रखे गए प्रस्तावों से मिलकर एक “खुरदुरा सा” बजट खाका तैयार था. नरेंद्र मोदी सरकार के पास सिर्फ दो माह का समय था, कि वे इस बजट को देश की वर्तमान अर्थव्यवस्था की चुनौतियों और संसाधनों तथा धन की कमी की सीमाओं को देखते हुए इस बजट को “चमकीला और चिकना” बनाएँ... और यह काम मोदी-जेटली की जोड़ी ने बखूबी किया.


हालाँकि बजट पेश करने से पहले ही पिछले दो माह में मोदी सरकार ने कई महत्त्वपूर्ण निर्णय और ठोस कदम उठा लिए थे, जिनका ज़िक्र मैं आगे करूँगा, लेकिन बजट पेश होने और उसके प्रावधानों को देखने के बाद समूचे विपक्ष का चेहरा उतरा हुआ था. उन्हें सूझ ही नहीं रहा था कि आखिर विरोध किस बात पर, कहाँ और कैसे करें. जबकि उद्योग जगत, मझोले व्यापारी, सेना सहित लगभग सभी तबकों ने बजट की भूरि-भूरि प्रशंसा की, आलोचनाओं के कतिपय स्वर भी उठे, लेकिन इतने बड़े देश में यह तो स्वाभाविक है. इस प्रकार नरेंद्र मोदी ने अगले पाँच साल में देश को एक मजबूत “ब्राण्ड इण्डिया” बनाने की तरफ सफलतापूर्वक पहला कदम बढ़ा दिया. आईये देखें कि बजट से पहले और बजट के भीतर नरेंद्र मोदी सरकार ने कौन-कौन से जरूरी और त्वरित कदम उठा लिए हैं. ये सभी निर्णय आने वाले कुछ ही वर्षों में भारत के लिए एक “गेम चेंजर” साबित होने वाले हैं.

     नरेंद्र मोदी सरकार ने सबसे पहले अपना ध्यान सेनाओं की तरफ केंद्रित किया है. रक्षा मंत्रालय ने भारत-चीन की विवादित सीमाओं पर तत्काल प्रभाव से सड़कों के निर्माण हेतु मंजूरी दे दी है. इसी प्रकार कर्नाटक में कारवाड नौसेना बेस को अत्याधुनिक बनाने के लिए २०० करोड़ रूपए की तात्कालिक राशि उपलब्ध करवा दी है, ताकि नौसेना का यह बेस मुम्बई बंदरगाह पर आ रहे बोझ को थोड़ा कम कर सके. अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में एक नए उन्नत किस्म के राडार और दूरबीन की मंजूरी दे दी गई है. जहाँ से चीन, बांग्लादेश और इंडोनेशिया तक नज़र रखी जा सकती है. यह निर्णय बजट से पहले के हैं, जिनमें संसद की मंजूरी जरूरी नहीं, लेकिन बजट प्रावधान रखते ही नरेंद्र मोदी ने सेना की वर्षों से लंबित “एक रैंक एक पेंशन” की माँग को पूरा कर दिया. उल्लेखनीय है कि यह मुद्दा भाजपा के घोषणापत्र और जनरल वीके सिंह की इच्छाओं के अनुरूप है.

     मोदी सरकार हिन्दुत्व और विकास के मुद्दों पर सत्ता में आई है. जैसा कि ऊपर लिखा है, वर्तमान बजट की प्रक्रिया पिछली सरकार के दौर में ही आरम्भ हो चुकी थी और मोदी सरकार के पास सिर्फ दो माह का ही समय था, इसलिए देखा जाए तो देश के आर्थिक व सामाजिक विकास हेतु उनका पूरा खाका अगले बजट में और भी स्पष्ट होगा. परन्तु फिर भी दो महीने में ही नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से ताबड़तोड़ निर्णय लिए हैं वह उनकी निर्णय क्षमता और सोच को पूर्णतः प्रदर्शित करता है, उदाहरण के तौर पर नर्मदा बाँध की ऊँचाई 121 मीटर से बढ़ाकर 138 मीटर करने का निर्णय. यह मामला पिछले कई वर्ष से यूपीए सरकार की “अनिर्णय” नीति के कारण लटका हुआ था. मेधा पाटकर के नेतृत्व में चल रहे NGOs का दबाव तो था ही, साथ ही यूपीए सरकार के कारिंदे सोच रहे थे कि कहीं इस मुद्दे का फायदा नरेंद्र मोदी विधानसभा चुनावों में ना ले लें. मोदी सरकार ने आते ही गुजरात और मध्यप्रदेश हेतु पानी, सिंचाई और बिजली की समस्या को देखते हुए इसे तत्काल मंजूरी दे दी और उधर बाँध पर काम भी शुरू हो गया. अब जब तक सम्बन्धित पक्ष सुप्रीम कोर्ट, ट्रिब्यूनल वगैरह जाएँगे नर्मदा बाँध पर काफी तेजी से काम पूरा हो चुका होगा. मोदी सरकार का पूरा ध्यान बिजली, सिंचाई, सड़कों और स्वास्थ्य पर है... विकास के यही तो पैमाने होते हैं. जबकि यूपीए सरकार देश के विशाल मध्यमवर्ग को समझ ही नहीं पाई और “मनरेगा” के भ्रष्टाचार एवं आधार कार्ड जैसे अनुत्पादक कार्यों में अरबों रूपए लुटाती रही.


     यूपीए सरकार के कार्यकाल में ही CAG और FICCI की एक आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट आई थी, जिसमें बताया गया था कि NDA के पाँच साल में राष्ट्रीय राजमार्गों पर जितना काम हुआ, यूपीए के दो कार्यकालों में उससे आधी सड़कें भी नहीं बनीं थी. NDA, अन्य राज्यों की भाजपा सरकारों तथा गुजरात के अनुभवों को देखते हुए नरेंद्र मोदी ने अर्थव्यवस्था के मुख्य इंजन अर्थात सड़कों पर अधिक बल देने की कोशिश की है. इसीलिए बजट में राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए 37800 करोड़ रूपए रखे गए हैं, जो अगले चार वर्ष में और बढ़ेंगे. ज़ाहिर है कि पाँच साल में नरेंद्र मोदी देश में चौड़ी सड़कों का जाल और बिजली का उत्पादन बढ़ाने की फिराक में हैं. राजमार्गों की इस भारी-भरकम राशि के अलावा उन्होंने इन राजमार्गों के किनारे वाले गाँवों के बेरोजगार युवाओं हेतु दो सौ करोड़ अलग से रखे हैं, जो इन राजमार्गों पर पेड़-पौधे लगाने हेतु दिए जाएँगे और इन दो सौ करोड़ रूपए को मनरेगा से जोड़ दिया जाएगा, ताकि कोई उत्पादक कार्य शुरू हो. एक लाख किमी के राजमार्गों को हरा-भरा करने की इस प्रक्रिया में लगभग तीस लाख युवाओं को संक्षिप्त ही सही, लेकिन रोजगार मिलेगा. मनरेगा को “उत्पादकता” एवं “कार्य लक्ष्य” से जोड़ना बहुत जरूरी हो गया था, अन्यथा पिछले पाँच साल से यह अरबों-खरबों की राशि सिर गढ्ढे खोदने और पुनः उन्हें भरने में ही खर्च हो रहे थे. सरकार का यह कदम इसलिए बेहतरीन कहा जा सकता है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, पुल, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र निर्माण, वृक्षारोपण आदि कामों में मनरेगा के धन, ऊर्जा और मानव श्रम का उपयोग किया जाएगा, न कि सरपंचों और छुटभैये नेताओं का घर भरने में.

     तम्बाकू, सिगरेट, शराब पर टैक्स बढ़ाना या व्यक्तिगत आयकर की छूट बढ़ाना जैसे कदम तो प्रत्येक सरकार अपने बजट में देती ही है. बजट का असली उद्देश्य होता है जनता को, उद्योगों को एवं विदेशों को क्या सन्देश दिया जा रहा है. इस दिशा में जेटली-मोदी की जोड़ी ने बहुत ही दूरदर्शितापूर्ण बजट पेश किया है. राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए भारी धनराशि के साथ ही उत्तर-पूर्व में रेलवे विकास हेतु अभी प्रारंभिक तौर पर 1000 करोड़ रूपए रखे गए हैं, इसी प्रकार ऊर्जा के मामले में पूरे देश को गैस के संजाल से कवर करने हेतु 15,000 किमी गैस पाईपलाइन बिछाने की “पब्लिक-प्रायवेट पार्टनरशिप” योजना का पायलट प्रोजेक्ट आरम्भ कर दिया गया है. इसके अलावा तमिलनाडु और राजस्थान के तेज़ हवा वाले इलाकों में पवन एवं सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए पाँच सौ करोड़ रूपए रखे हैं. अपने शुरुआती वर्ष में नरेंद्र मोदी का पूरा ध्यान सिर्फ ढांचागत (इंफ्रास्ट्रक्चर) सुधार एवं विकास में लगने वाला है, क्योंकि इस दिशा में यूपीए-२ सरकार ने बहुत अधिक अनदेखी की है. चूँकि मोदी वाराणसी से चुन कर आए हैं तो उन्होंने इलाहाबाद से हल्दिया तक गंगा में बड़ी नौकाएं या छोटे जहाज चलाने की महत्त्वाकांक्षी “जल मार्ग विकास परियोजना” के सर्वेक्षण एवं आरंभिक क्रियान्वयन हेतु 4200 करोड़ रुपए आवंटित किये हैं.

अब मुड़ते हैं शिक्षा के क्षेत्र में, नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने बजट में शिक्षा क्षेत्र में बजट की मात्रा जो 3% से बढ़ाकर 6% की जाने की माँग थी, वह तो पूरी नहीं की, परन्तु कई आधारभूत और ठोस योजनाओं को हरी झंडी दिखा दी है. विभिन्न राज्यों में पाँच नए आईआईटी और पाँच नए आईआईएम, मध्यप्रदेश में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नाम पर एक सर्वसुविधायुक्त उद्यमिता  विकास केंद्र, चार नए “एम्स” (आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल, विदर्भ और पूर्वांचल क्षेत्र) हेतु ५०० करोड़ और छह नवनिर्मित “एम्स” को पूर्ण कार्यकारी बनाने हेतु धन दिया जा रहा है. आंध्रप्रदेश और राजस्थान में नए कृषि विश्वविद्यालय, हरियाणा और तेलंगाना में नई होर्टिकल्चर विश्वविद्यालयों की स्थापना हेतु 200 करोड़ मंजूर हुए हैं. इसी प्रकार मिट्टी के परीक्षण हेतु समूचे देश की राजधानियों में मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाओं को उन्नत बनाने के लिए 156 करोड़ रूपए दिए जा रहे हैं. देश को स्वस्थ रखने के लिए डॉ हर्षवर्धन के साथ मिलकर नरेंद्र मोदी ने बजट से परे यह निर्णय लिया है कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप एवं ह्रदय रोग से सम्बन्धित अति-आवश्यक 156 दवाएं पूरे देश में सरकारी अस्पतालों से मुफ्त में दी जाएँगी. हालाँकि यह निर्णय लेने आसान नहीं था, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर की कई फार्मास्युटिकल कम्पनियाँ इसे लागू नहीं करने का दबाव बना रही थीं, क्योंकि ऐसा करने पर कई बड़ी कंपनियों के मुनाफे में भारी कमी आने वाली है, परन्तु मोदी सरकार ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए गरीबी रेखा से नीचे वालों के लिए सरकारी अस्पतालों में एक्सरे, एमआरआई तथा सीटी स्कैन को मुफ्त बना दिया.

शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, इंफ्रास्ट्रक्चर, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जेटली-मोदी ने जो ध्यान दिया है और आरंभिक योजनाएँ बनाई हैं, वे तो खैर अपनी जगह पर उत्तम हैं ही साथ ही मोदी द्वारा देश के भविष्य की चिंताओं और उनके दृष्टिकोण को प्रदर्शित करती ही हैं, परन्तु देश के इतिहास में पहली बार नरेंद्र मोदी ने जाना-समझा है कि यदि की देश आर्थिक व्यवस्था मजबूत करना तथा बेरोजगारी हटाते हुए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन से मुकाबला करना है तो देश के कुटीर एवं छोटे उद्योगों को मजबूत करना होगा. बजट भाषण के पैराग्राफ 102 में नरेंद्र मोदी के इस आईडिया को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन जब यह आईडिया अपना पूर्ण आकार ग्रहण करेगा, तब भारत में उद्यमिता एवं विनिर्माण का जो दौर चलेगा, वह निश्चित रूप से चीन को चिंता में डालने वाला बनेगा. लघु एवं कुटीर उद्योगों की इस विराट अर्थव्यवस्था पर जरा एक संक्षिप्त निगाह तो डालिए – आधिकारिक आंकड़े के अनुसार देश में लगभग ऐसी साढ़े पाँच करोड़ यूनिट्स कार्यरत हैं, कृषि क्षेत्र को छोड़कर. इन सभी का राजस्व जोड़ा जाए तो यह लगभग 6.28 लाख करोड़ बैठता है, जो कि अर्थव्यवस्था का लगभग 70% है और ग्रामीण क्षेत्रों में पन्द्रह से अठारह करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करती हैं. इन छोटी यूनिट्स में से दो-तिहाई सेवा और मेनुफैक्चरिंग क्षेत्र में हैं, और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत इन इकाईयों में अधिकांशतः अजा-अजजा-ओबीसी वर्ग ही मालिक हैं.

मोदी सरकार की इस नवीनतम तथा क्रान्तिकारी योजना में कहा गया है कि – “लघु विनिर्माण संस्थाएँ और कम्पनियाँ देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. आज की तारीख में छोटे असंगठित उद्योग देश के अधिकाँश औद्योगिक उत्पादन तथा रोजगार का जिम्मा संभाले हुए हैं, लेकिन सदैव सभी सरकारों द्वारा उपेक्षित ही रहे. इनमें से अधिकाँश उद्योग चार-छः-दस-बीस व्यक्तियों को रोजगार तथा देश को राजस्व मुहैया करवा रहे हैं और मजे की बात यह है कि जिसे अंग्रेजी में SME (Small and Micro Enterprises) कहा जाता है, इनमें से अधिकाँश यूनिट अजा-अजजा- एवं पिछड़ा वर्ग द्वारा संचालित हैं. एशिया-पैसिफिक इक्विटी रिसर्च द्वारा प्रकाशित जर्नल के अनुसार भारत में बड़े उद्योगों एवं कारपोरेट हाउस ने देश की अर्थव्यवस्था में जो योगदान दिया है वह इसके आकार को देखते हुए सिर्फ “पूँछ” बराबर है. रिसर्च के अनुसार विशाल उद्योगों एवं आईटी क्षेत्र की दिग्गज सेवा कंपनियों ने देश की सिर्फ 15% अर्थव्यवस्था को ही अपना योगदान दिया है. रोजगार एवं राजस्व में बाकी का 85% देश की लघु और कुटीर उद्योगों ने ही दिया है, इसके बावजूद लगभग सभी सरकारों ने टैक्स में भारी छूट, रियायती जमीनें और कर्ज माफी अक्सर बड़े उद्योगों को ही दिया. यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि विराट उद्योगों द्वारा देश की तमाम बैंकों को खरबों रूपए का चूना लगाया जा चुका है. बैंक वाले जिसे अपनी भाषा में NPA (Non Performing Asset) कहते हैं, उसका महत्त्वपूर्ण डूबत खाता बड़े उद्योगों के हिस्से में ही है. कई बड़े कारपोरेट हाउस कर्ज डुबाने और न चुकाने के लिए बदनाम हो चुके हैं. जबकि छोटे एवं कुटीर उद्योगों के साथ ऐसा नहीं है. देखा गया है कि लघु उद्योग का मालिक बड़े उद्योगों के मुकाबले, बैंक अथवा अन्य वित्तीय संस्थाओं का कर्ज उतार ही देता है. बीमा कागज़ जमानत रखकर अथवा जमीन-जायदाद गिरवी रखकर छोटे उद्योगों को दिया गया ऋण सामान्यतः वापस आ जाता है. संक्षेप में कहा जाए तो अर्थव्यवस्था की “रीढ़ की हड्डी” लघु और कुटीर उद्योग ही हैं. जैसा कि ऊपर बताया, देश की अर्थव्यवस्था, राजस्व और रोजगार में 70% हिस्सा रखने वाला यह क्षेत्र हमेशा से असंगठित और उपेक्षित ही रहा है.  अब चीन से सबक लेकर “एक सधे हुए गुजराती व्यापारी” की तरह नरेंद्र मोदी ने इस क्षेत्र की संभावनाओं पर ध्यान देने का फैसला किया है. चीन ने अपने विनिर्माण क्षेत्र को इसी तरह बढ़ाया और मजबूत किया. नरेंद्र मोदी की योजना ऐसी ही लघु-कुटीर एवं ग्रामीण इकाईयों को सस्ते ऋण, जमीन एवं शासकीय परेशानियों व लाईसेंस से मुक्ति दिलाने की है, यदि अगले पाँच वर्ष में मोदी के इस विचार ने जड़ें पकड़ लीं, तो देखते ही देखते हम विनिर्माण क्षेत्र में चीन को टक्कर देने लगेंगे. इस बजट में यह प्रस्ताव रखा गया है कि ऐसे ग्रामीण-लघु-कुटीर उद्योगों का सर्वेक्षण करके उन्हें सभी सुविधाएँ प्रदान की जाएँगी. इसीलिए अनुसूचित जाति-जनजाति की शिक्षा एवं विकास के लिए इस बजट में 50,548 करोड़ रूपए का जबरदस्त प्रावधान किया गया है. कहने का तात्पर्य यह है कि नरेंद्र मोदी की टीम के पास अगले दस साल का पूरा रोड मैप तैयार है. “ब्रांड इण्डिया” बनने की तरफ मोदी सरकार का यह तो पहला ही कदम है, अगले दो वर्ष के बजट पेश होने के बाद इस देश की दशा और दिशा में आमूलचूल परिवर्तन आना निश्चित है.

जहाँ एक तरफ नरेंद्र मोदी का पूरा ध्यान सिर्फ विकास के मुद्दों पर है, वहीं दूसरी ओर जिस जमीनी कैडर और सोशल मीडिया के जिन रणबांकुरों की मदद से भाजपा को सत्ता मिली है, वे हिंदुत्व के मुद्दों को ठन्डे बस्ते में डालने की वजह से अन्दर ही अन्दर बेचैन और निराश हो रहे हैं. नरेंद्र मोदी की जिस हिन्दुत्ववादी छवि से मोहित होकर तथा यूपीए-२ तथा वामपंथियों एवं सेकुलरों के जिस विध्वंसकारी नीतियों एवं अकर्मण्यता से निराश होकर कई तटस्थ युवा मोदी से चमत्कार की आशाएं लगाए बैठे थे, वे भी दबे स्वरों में इस सरकार पर उंगलियाँ उठाने लगे हैं. इस कैडर को उम्मीद थी कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने पर तुरंत ही धारा ३७०, सामान नागरिक संहिता, गौवध पर प्रतिबन्ध, गौमांस निर्यात पर पूर्ण प्रतिबन्ध, राम जन्मभूमि मामले में त्वरित प्रगति जैसे “मूल हिंदूवादी” मुद्दों पर प्रगति या निर्णयों की शुरुआत होगी. परन्तु पिछले दो माह में नरेंद्र मोदी ने इन मुद्दों पर एकदम चुप्पी साध रखी है, साथ ही भाजपा और संघ ने भी उनका पूरा साथ दिया है. हालांकि यह स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती, परन्तु फिर भी जानकारों का मानना है कि पहले नरेंद्र मोदी दिल्ली सिंहासन के जटिल प्रशासनिक ढाँचे को अच्छे से समझना चाहते हैं और अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं. संभवतः यह स्थिति अगले दो वर्ष तक बरकरार रहे, उसके बाद शायद नरेंद्र मोदी गुजरात की तरह अपने पत्ते खोलें और अपना शिकंजा कसने की शुरुआत करें.

कांग्रेस और अन्य सभी कथित सेकुलर पार्टियाँ अभी भी हार के सदमे से बाहर नहीं आ पाई हैं, और उन्हें अभी भी यह विश्वास नहीं हो रहा कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन चुके हैं. इसीलिए खिसियाहट में वे भाजपा सरकार के प्रत्येक निर्णय, प्रत्येक नियुक्ति, प्रत्येक बयान पर पहले दिन से ही लगातार अंध-विरोध किए जा रहे हैं. जिस तेजी और सफाई से नरेंद्र मोदी अपनी गोटियाँ चल रहे हैं, वह हैरान करने वाला है. सरकार बनने के पहले ही दिन से इस “गैंग”” ने स्मृति ईरानी मामले को लेकर अपनी छाती कूटना शुरू किया था, तभी से लगने लगा था कि मोदी के अगले पांच साल इतने आसान नहीं रहेंगे. ये बात और है कि नरेंद्र मोदी चुपचाप अपना काम करते रहे. जैसे कि, ICHR में सुदर्शन राव की नियुक्ति का मामला हो, चाहे दिल्ली विवि के मामले में UGC की बांह मरोड़ना हो, मोदी सरकार ने “कुंठित विपक्ष” की परवाह किए बिना, अपना मनचाहा काम किया. सुप्रीम कोर्ट में गोपाल सुब्रह्मण्यम की नियुक्ति को भी सफलतापूर्वक वीटो किया गया, इसी प्रकार पांच-छह राज्यों के “कुर्सी-प्रेमी” कांग्रेसी राज्यपालों को ना-नुकुर के बावजूद सफाई से निपटाया गया. हताश विपक्ष ने नृपेन्द्र मिश्र की नियुक्ति पर भी बवाल खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन यहाँ भी मोदी ने राज्यसभा में सपा-बसपा-एनसीपी को साथ लेकर उनके मंसूबे कामयाब नहीं होने दिए. ज़ाहिर है कि जिस तरह यूपीए-२ कार्यकाल में मुलायम-मायावती की नकेल सोनिया के हाथ में थी, उसी प्रकार शायद अब मोदी के हाथ में है. विश्लेषक मानते हैं कि आगामी कुछ माह में कई प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. यदि इन राज्यों में भाजपा को आशातीत सफलता मिल जाती है और उसके विधायकों की संख्या पर्याप्त रूप से इतनी बढ़ जाए कि अगले वर्ष के अंत तक भाजपा का राज्यसभा में भी बहुमत पूर्ण हो जाए, संभवतः उसके बाद ही नरेंद्र मोदी अपने हिंदुत्व के मुद्दों पर आएँगे.

हाल-फिलहाल सरकार नई है, मोदी को अभी यह भांपने में समय लगेगा कि प्रशासन में कौन उनका मित्र है और कौन शत्रु है. इसीलिए नरेंद्र मोदी जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहते. अभी इस सरकार को सिर्फ दो-तीन माह हुए हैं, फिर भी “माहौल” को भांपने हेतु समान नागरिक संहिता पर एक अशासकीय प्रस्ताव एक भाजपा सांसद की तरफ से संसद में पेश किया जा चुका है. लेकिन जिस तरह से मोदी सरकार ने मदरसों को आधुनिक बनाने के लिए सौ करोड़ रूपए का प्रावधान किया, जिस तरह से यूपी में लगातार भाजपा के जमीनी नेताओं की हत्याओं पर चुप्पी साधे रखी, अमरनाथ में लंगरों पर हमले के मामले में कश्मीर सरकार से कोई जवाब-तलब तक नहीं किया, गौमांस निर्यात रोकने हेतु एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया, इन सभी से हिंदूवादी लॉबी और कार्यकर्ता नाराज चल रहे हैं. चूंकि अभी मोदी नए-नए हैं, इसलिए यह कैडर उन्हें कुछ समय देना चाहता है, परन्तु मन ही मन आशंकित भी है कि, कहीं मोदी सरकार भी पूर्ववर्ती सरकारों की तरह “फर्जी सेकुलरिज्म”” के जाल में न फँस जाए. जबकि नरेंद्र मोदी का पूरा ध्यान देश की अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक पकड़ बनाने पर है.

उधर प्रशासनिक “सर्जरी” की शुरुआत कर दी गई है. ““लुटेरे जीजा”” के होश ठिकाने लगाने वाले अशोक खेमका तथा चर्चित अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को प्रधानमंत्री कार्यालय में लाया जा रहा है. मंत्रालयों के सचिवों को सीधे प्रधानमंत्री से मिल सकने की सुविधा प्रदान कर दी गई है. मंत्रियों को अपने निजी स्टाफ में अपना कोई भी रिश्तेदार रखने की अनुमति नहीं है. बहुत से कार्यक्षम तथा ईमानदार आईएएस अधिकारी अपने-अपने राज्यों को छोड़कर केंद्र में प्रतिनियुक्ति हेतु लगातार आवेदन दे रहे हैं. उन्हें पता है कि नरेंद्र मोदी ही ऐसे नेता हैं जो उनका सम्मान बनाए रखते हुए भी अधिकारियों से उचित काम लेना जानते हैं. निश्चित है कि देश का भविष्य उज्जवल है, बस ये जरूर है कि अति-उत्साही और अति-महत्त्वाकांक्षी कार्यकर्ताओं को थोडा सब्र रखना होगा, नरेंद्र मोदी को थोडा समय देना होगा. क्योंकि पिछले दस वर्ष से जमा हुआ “कूड़ा-करकट” साफ़ करने में थोडा वक्त तो लगेगा ही... अगले दो-तीन वर्ष में जब मोदी अपनी पकड़ मजबूत कर लेंगे, राज्यसभा में बहुमत हासिल हो जाएगा, उस समय कश्मीर, धारा ३७०, राम मंदिर, समान नागरिक संहिता, गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध जैसे कई कदम निश्चित ही उठाए जाएँगे.

मोदी की कार्यशैली का एक संक्षिप्त उदाहरण - सरकार ने त्वरित निर्णय लेते हुए यह निश्चित किया है कि देश-विदेश में आयोजित होने वाली किसी भी विज्ञान गोष्ठी अथवा तकनीकी सेमीनार इत्यादि के दौरान सरकारी प्रतिनिधिमंडल में सिर्फ स्थापित वैज्ञानिक एवं तकनीकी लोग ही जाएंगे, कोई नेता या अफसर नहीं. इस निर्णय पर लगभग नए अंदाज में अमल करते हुए स्वयं नरेंद्र मोदी, ब्राजील में संपन्न BRICS सम्मेलन में अपने साथ सिर्फ विदेश विभाग के अधिकारियों तथा दूरदर्शन एवं PTI के संवाददाताओं को ही ले गए. किसी भी निजी चैनल अथवा अखबार के पत्रकार को सरकारी धन पर सैरसपाटे की इजाजत नहीं दी गई. सन्देश साफ़ है – “मुफ्तखोरी” नहीं चलेगी, काम करके दिखाना होगा. “ब्राण्ड इण्डिया” की तरफ पहला कदम सफलतापूर्वक बढ़ाया जा चुका है... अब युवाओं को अपनी उद्यमिता दिखानी होगी.

-         सुरेश चिपलूनकर, उज्जैन


Narendra Modi Magic :Mandal, Mandir and Marketing Combination

Written by रविवार, 25 मई 2014 12:06
मोदी का मैजिक – भगवा क्रान्ति, जो सिर चढ़कर बोले...

सत्तर के दशक में भारतीय फिल्मों के दर्शक राजेश खन्ना के आँखें मटकाने वाले रोमांस, देव आनंद के झटके खाते संवादों से लगभग ऊब चले थे. उसी दौरान भारत में इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में जो काँग्रेस सरकार चल रही थी, उसके कारनामों से भी आम जनता बेहद परेशान, त्रस्त, बदहाल और हताश हो चुकी थी. ठीक उसी समय रुपहले परदे पर अमिताभ बच्चन नामक एंग्री-यंगमैन का प्रादुर्भाव हुआ जो युवा वर्ग के गुस्से, निराशा और आक्रोश का प्रतीक बना. थाने में रखी कुर्सी को अपनी बपौती समझने वाले शेर खान के सामने ही गरजकर उस कुर्सी को लात मारकर गिराने वाले इस महानायक का भारत की जनता ने जैसा स्वागत किया, वह आज तक न सिर्फ अभूतपूर्व है, बल्कि आज भी जारी है. जी हाँ, आप बिलकुल सही समझे... सभी पाठकों के समक्ष अमिताभ बच्चन का यह उदाहरण रखने का तात्पर्य लोकसभा चुनाव 2014 के हालात और नरेंद्र मोदी की जीत से तुलना करना ही है.


विगत दस वर्ष में यूपीए-१ एवं यूपीए-२ के कार्यकाल में देश का बेरोजगार युवा, व्यापारी वर्ग, ईमानदार नौकरशाह, मजदूर तथा किसान जिस तीव्रता से निराशा और उदासीनता के गर्त में जा रहे थे, उसकी मिसाल विगत शताब्दी के राजनैतिक इतिहास में मिलना मुश्किल है. लूट, भ्रष्टाचार, कुशासन, मंत्रियों की अनुशासनहीनता, काँग्रेस की मनमानी इत्यादि बातों ने इस देश के भीतर गुस्से की एक अनाम, अबूझ लहर पैदा कर दी थी. फिर इस परिदृश्य पर आगमन हुआ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्रभाई दामोदरदास मोदी का... और इस व्यक्ति ने अपने ओजस्वी भाषणों, अपनी योजनाओं, अपने सपनों, अपने नारों, अपनी मुद्राओं से जनमानस में जो लहर पैदा की, उसकी तुलना अमिताभ बच्चन के प्रति निराश-हताश युवाओं दीवानगी से की जा सकती है. काँग्रेस से बुरी तरह क्रोधित और निराश भारत की जनता ने नरेंद्र मोदी में उसी अमिताभ बच्चन की छवि देखी और नरेंद्र मोदी ने भी इस गुस्से को भाँपने में कतई गलती नहीं की.

भारत के इतिहास में इस आम चुनाव से पहले कोई चुनाव ऐसा नहीं था, जिसके परिणामों को लेकर जनमानस में इतनी अधिक उत्सुकता रही हो. क्योंकि इन चुनावों में जहाँ एक तरफ काँग्रेसी कुशासन एवं यूपीए घटक दलों की महालूट के खिलाफ खड़ा युवा एवं मध्यमवर्ग था... वहीं दूसरी तरफ पिछले दस वर्ष में मनरेगा, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा का अधिकार जैसे कानूनों द्वारा अल्प लाभान्वित लेकिन अधिकाँशतः बरगलाया हुआ निम्न वर्ग था. परिणामों वाले दिन अर्थात 16 मई की सुबह से ही वातावरण में सनसनी थी. चौराहों-गाँवों-शॉपिंग मॉल्स-चाय की दुकानों पर चहुँओर सिर्फ इसी बात की उत्सुकता थी कि भाजपा को कितनी सीटें मिलती हैं? काँग्रेस की विदाई का विश्वास तो सभी को था, परन्तु साथ ही मन में एक आशंका भी थी कि कहीं देश पुनः 1996-1998 वाली “खिचड़ी” और “भानुमती के कुनबे” जैसी तीसरा मोर्चा सरकारों के युग में न जा धँसे. कहीं नरेंद्र मोदी को 272 से कम सीटें मिलीं तो क्या वे खुले हाथ से काम कर सकेंगे या जयललिता-माया और ममता वाजपेयी सरकार की तरह ही नरेंद्र मोदी को ब्लैकमेल करने में कामयाब हो जाएँगी? तमाम आशंकाएँ, कुशंकाएँ, भय निर्मूल सिद्ध हुए और NDA को 334 सीटें मिलीं जिसमें भाजपा को अकेले ही 284 सीटें मिल गईं.


16 मई 2014 की सुबह नौ बजे के आसपास टीवी स्क्रीन पर जो पहला चुनाव परिणाम झलका, वह था कि पश्चिमी उप्र की बागपत सीट से चौधरी अजित सिंह को मुम्बई के पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह ने पराजित कर दिया है. जाट बहुल बेल्ट में, एक पूर्व प्रधानमंत्री के बेटे और केन्द्रीय मंत्री अजित सिंह अपने-आप में एक बड़ी हस्ती हैं. नौकरी छोड़कर राजनीति में कदम रख रहे मुम्बई पुलिस कमिश्नर, जिन्हें चुनावी छक्के-पंजे मालूम नहीं, पहली बार चुनाव लड़ रहे हों, अजित सिंह की परम्परागत सीट पर चुनौती दे रहे हों... इसके बावजूद वे जीत जाएँ, यह टीवी देख रहे राजनैतिक पंडितों और विश्लेषकों के लिए बेहद चौंकाने वाला था. उसी समय लग गया था, कि यूपी में कुछ ऐतिहासिक होने जा रहा है.

और वैसा ही हुआ... दोपहर के तीन बजते-बजते यूपी के चुनाव परिणामों ने दिल्ली में काँग्रेस और गाँधी परिवार को झकझोरना आरम्भ कर दिया. भाजपा की बम्पर 71 सीटें, जबकि मुलायम सिंह सिर्फ अपने परिवार की पाँच सीटें तथा सोनिया-राहुल अपनी-अपनी सीटें बचाने में ही कामयाब रहे. सबसे अधिक भूकम्पकारी परिणाम रहा बहुजन समाज पार्टी का. जाति से बुरी तरह ग्रस्त यूपी में मायावती की बसपा अपना खाता भी न खोल सके, यह बात पचाने में बहुत लोगों को काफी समय लगा. इसी प्रकार जैसे-जैसे यूपी के परिणाम आते गए यह स्पष्ट होता गया, कि इस बार यूपी में एक भी मुस्लिम प्रतिनिधि चुनकर नहीं आने वाला. हालांकि भाजपा के कट्टर से कट्टर समर्थक ने भी यूपी में 71 सीटों का अनुमान या आकलन नहीं किया था. लेकिन यह जादू हुआ और “नमो” के इस जादू की झलक पूर्वांचल तथा बिहार की उन सीटों पर भी दिखाई दी, जो बनारस के आसपास थीं.



आखिर यूपी-बिहार में ऐसी कौन सी लहर चली कि 120 सीटों में से NDA को 100 से अधिक सीटें मिल गईं. बड़े-बड़े दिग्गज धूल चाटते नज़र आए. न ही जाति चली और ना ही “सेकुलर धर्म” चला, न कोई चालबाजी चली और ना ही EVM मशीनों की हेराफेरी या बूथ लूटना काम आया. यह “नमो” लहर थी या “नमो” सुनामी थी? गहराई से विश्लेषण करने पर दिखाई देता है कि जहाँ एक तरफ मुज़फ्फरनगर के दंगों में सपा की विफलता, मीडिया तथा काँग्रेस द्वारा जानबूझकर हिन्दू-मुस्लिम के बीच खाई पैदा करने की कोशिश, भाजपा के विधायकों पर मुक़दमे तथा बसपा और सपा के विधायकों को वरदहस्त प्रदान करने से पश्चिमी उप्र में जमकर ध्रुवीकरण हुआ. संगठन में जान फूंकने में माहिर तथा कुशल रणनीतिकार अमित शाह की उपस्थिति ने इसमें घी डाला, तथा बनारस सीट से नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी ने यूपी में जमकर ध्रुवीकरण कर दिया. रही-सही कसर बोटी काटने वाले इमरान मसूद, बेनीप्रसाद वर्मा, नरेश अग्रवाल, राशिद अल्वी जैसे कई नेताओं ने खुलेआम नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपशब्द कहे, जिस तरह उनकी खिल्ली उड़ाई... उससे महँगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त हो चुकी जनता और भी नाराज हो गई. जनता ने देखा-सोचा और समझा कि आखिर अकेले नरेंद्र मोदी के खिलाफ पिछले बारह साल से केन्द्र सरकार तथा अन्य सभी पार्टियों के नेता किस कारण आलोचना से भरे हुए हैं. “कसाई”, “रावण”, “मौत का सौदागर”, “भस्मासुर” जैसी निम्न श्रेणी की उपमाओं के साथ-साथ “मोदी को गुजरात से बाहर जानता कौन है?”, “भारत की जनता कभी साम्प्रदायिक व्यक्ति को स्वीकार नहीं करेगी”, “अडानी-अंबानी का आदमी है”, “अगर ये आदमी किसी तरह 200 सीटें ले भी आया, तो सुषमा-राजनाथ इसे कभी प्रधानमंत्री बनने नहीं देंगे”, “दूसरे दलों का समर्थन कहाँ से लाएगा?” जैसी ऊलजलूल बयानबाजियां तो जारी थी हीं, लेकिन इससे भी पहले नरेंद्र मोदी के पीछे लगातार कभी CBI , कभी इशरत जहाँ, कभी सोहराबुद्दीन मुठभेड़, कभी बाबू बजरंगी- माया कोडनानी, अशोक भट्ट, डीडी वंजारा, बाबूभाई बोखीरिया, महिला जासूसी कांड जैसे अनगिनत झूठे मामले लगातार चलाए गए… मीडिया तो शुरू से काँग्रेस के शिकंजे में था ही. इनके अलावा ढेर सारे NGOs की गैंग, जिनमें तीस्ता जावेद सीतलवाड़, शबनम हाशमी सहित तहलका के आशीष खेतान और तरुण तेजपाल जैसे लोग शामिल थे.. सबके सब दिन-रात चौबीस घंटे नरेंद्र मोदी के पीछे पड़े रहे, जनता चुपचाप सब देख रही थी. लेकिन नरेंद्र मोदी जिस मिट्टी के बने हैं और जैसी राजनीति वे करते आए हैं, उनका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं पाया, और यही काँग्रेस की ईर्ष्या और जलन की सबसे बड़ी वजह भी रही.

दूसरी तरफ यूपी-बिहार की अपनी तमाम जनसभाओं में नरेंद्र मोदी ने अक्सर विकास को लेकर बातें कीं. बिजली कितने घंटे आती है? गाँव में सड़क कब से नहीं बनी है? ग्रामीण युवा रोजगार तलाशने के लिए मुम्बई, पंजाब और गुजरात क्यों जाते हैं? जैसी कई बातों से नरेंद्र मोदी ने जातिवाद से ग्रस्त इस राज्य की ग्रामीण और शहरी जनता के साथ तादात्म्य स्थापित कर लिया. इसी कारण मोदी की तूफानी सभाओं के बाद सपा-बसपा-काँग्रेस-जदयू के प्रत्याशियों को अपने इलाके में इस बात की सफाई देना मुश्किल हो रहा था, कि आखिर पिछले बीस-पच्चीस साल के शासन और उससे पहले काँग्रेस के शासन के बावजूद गन्ना उत्पादक, चूड़ी कारीगर, पीतल कारीगर, बनारस के जुलाहे सभी आर्थिक रूप से विपन्न और परेशान क्यों हैं? बचा-खुचा काम दिल्ली-गुजरात-मप्र से गए भाजपा कार्यकर्ताओं ने पूरा कर दिया, गाँव-गाँव घूम-घूमकर उन्होंने लोगों के मन में यह सवाल गहरे रोप दिया कि जब गुजरात में चौबीस घंटे बिजली आती है तो यूपी-बिहार में क्यों नहीं आती? आखिर इस राज्य में क्या कमी है? धीरे-धीरे लगातार दो-तीन माह के सघन प्रचार अभियान, तगड़ी मार्केटिंग और अमित शाह, संघ-विहिप कार्यकर्ताओं तथा सोशल मीडिया के हवाई हमलों के कारण यूपी-बिहार की जनता को समझ में आ गया कि देश को एक मजबूर और कमज़ोर नहीं बल्कि मजबूत और निर्णायक प्रधानमंत्री चाहिए. हालांकि ऐसा भी नहीं कि नरेंद्र मोदी ने काँग्रेस और विपक्षी दलों की चालबाजी का समुचित जवाब नहीं दिया हो. “शठे शाठ्यं समाचरेत” की नीति अपनाते हुए मोदी ने भी फैजाबाद की आमसभा में मंच के पीछे प्रस्तावित राम मंदिर का फोटो लगाकर उन्होंने कईयों की नींद हराम की. जबकि “अमेठी-रायबरेली” में बैठकर मीडियाई हवाई हमले करने वाली प्रियंका गाँधी ने जैसे ही “नीच राजनीति” शब्द का उच्चारण किया, नरेंद्र मोदी ने तत्काल इस शब्द को पकड़ लिया और “नीच” शब्द को लेकर जैसे शाब्दिक हमले किए, खुद को “नीच जाति” का प्रोजेक्ट करते हुए चुनाव के अंतिम दौर में यूपी में सहानुभूति बटोरी वह काँग्रेसी शैली में मुंहतोड़ जवाब देने का अदभुत उदाहरण था. असम और पश्चिम बंगाल में अवैध बांग्लादेशियों का मुद्दा जोरशोर से उठाकर उन्होंने तरुण गोगोई और ममता बनर्जी को ख़ासा परेशान किया. इस मुहिम का फायदा भी उन्हें मिला और असम में भाजपा को ऐतिहासिक जीत मिली. जबकि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी समझ गईं कि अगले विधानसभा चुनावों में वाम दलों की बजाय भाजपा भी उसकी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बनने जा रही है, और इसीलिए ममता ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ लगातार अपने मुँह का मोर्चा खोले रखा. हालांकि इसके बावजूद वे आसनसोल से बाबुल सुप्रियो को जीतने से रोक न सकीं.


तमिलनाडु, सीमान्ध्र, तेलंगाना, उड़ीसा, अरुणाचल एवं कश्मीर-लद्दाख जैसे नए-नए क्षेत्रों में भाजपा को पैर पसारने में नरेंद्र मोदी के तूफानी दौरों ने काफी मदद की. मात्र दस माह में लाईव और 3-D की मिलाकर 3800 से अधिक रैलियाँ करते हुए नरेंद्र मोदी ने समूचे भारत को मथ डाला. असाधारण ऊर्जा और परिश्रम का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने नौजवानों को मात दी और एक तरह से अकेले ही भाजपा का पूरा चुनावी अभियान कारपोरेट स्टाईल में चलाया. नतीजा भाजपा का अब तक का सर्वोच्च बिंदु, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक प्रचारक पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ दिल्ली के तख़्त पर काबिज हुआ. पहले स्वयंसेवक अटल जी थे, लेकिन उन्हें ममता-माया-जयललिता-नायडू ने इतना ब्लैकमेल किया, इतना दबाया कि उनके घुटने खराब हो गए थे. परन्तु इस बार इनकी दाल नहीं गलने पाई. नरेंद्र मोदी जिस “कार्यशैली” के लिए जाने-माने जाते हैं, वह आखिरकार उन्हें दिल्ली में भी जनता ने सौंप दी है.

यूपी-बिहार के बाद भाजपा को सबसे बड़ी सफलता हाथ लगी महाराष्ट्र में. यहाँ भी नरेंद्र मोदी की रणनीति काम आई, उन्होंने चुनाव से पहले ही भाँप लिया था कि दलित वोटों का नुक्सान कम से कम करने के लिए आरपीआई के रामदास आठवले से गठबंधन फायदे का सौदा रहेगा. इसी प्रकार राज ठाकरे से ‘दो हाथ की दूरी’ बनाए रखना भी लाभकारी ही सिद्ध हुआ, क्योंकि यूपी-बिहार में राज ठाकरे के खिलाफ गुस्से की एक लहर मौजूद है. इसके अलावा महाराष्ट्र की जनता कांग्रेस-राकांपा के पंद्रह साल के कुशासन, बांधों में मूतने की बात करने वाले उनके घमंडी मंत्रियों से बेहद परेशान थी. नतीजा, कांग्रेस सिर्फ चार सांसदों पर सिमट गई, जो कि आपातकाल के बाद हुए चुनावों से भी कम है. यह नरेंद्र मोदी की सुनामी नहीं तो और क्या है, कि जिस राज्य में शकर लॉबी की सहकारी संस्थाओं और शकर मिलों के जरिये कांग्रेस ने वोटों का महीन जाल बुन रखा है उसी राज्य में ऐसी दुर्गति कि जनता ने कांग्रेस की अर्थी उठाने के लिए सिर्फ चार सांसद भेजे? और वो भी तब जबकि विधानसभा के चुनाव सर पर आन खड़े हैं. नरेंद्र मोदी ने विदर्भ-मराठवाड़ा और मुम्बई क्षेत्र में स्थानीय समस्याओं को सही तरीके से भुनाया.

गुजरात की २६ में से २६ सीटें मिलना अधिक आश्चर्यजनक नहीं था, लेकिन राजस्थान की २५ में से २५ सीटें जरूर कई विश्लेषकों को हैरान कर गईं. जाट-ठाकुर-मीणा जैसे जातिगत समीकरणों तथा जसवंत सिंह जैसे कद्दावर नेता द्वारा सार्वजनिक रूप से ख़म ठोकने के कारण खुद भाजपा के नेता भी बीस सीटों का ही अनुमान लगा रहे थे. जबकि उधर मध्यप्रदेश में सिर्फ सिंधिया और कमलनाथ ही अपनी इज्जत बचाने में कामयाब हो सके.

तमाम चुनाव विश्लेषकों ने इस आम चुनाव से पहले सोशल मीडिया की ताकत को बहुत अंडर-एस्टीमेट किया था. अधिकाँश विश्लेषकों का मानना था कि सोशल मीडिया सिर्फ शहरी और पढ़े=लिखे मतदाताओं को आंशिक रूप से प्रभावित कर सकता है. उनका आकलन था कि सोशल मीडिया, लोकसभा की अधिक से अधिक सौ सीटों पर कुछ असर डाल सकता है. जबकि नरेंद्र मोदी ने आज से तीन वर्ष पहले ही समझ लिया था कि मुख्यधारा के मीडिया द्वारा फैलाए जा रहे दुष्प्रचार एवं संघ-द्वेष से निपटने में सोशल मीडिया बेहद कारगर सिद्ध हो सकता है. जिस समय कई पार्टियों के नेता ठीक से जागे भी नहीं थे, उसी समय अर्थात आज से दो वर्ष पहले ही नरेंद्र मोदी ने अपनी सोशल मीडिया टीम को चुस्त-दुरुस्त कर लिया था. कई बैठकें हो चुकी थीं, रणनीति और प्लान ले-आऊट तैयार किया जा चूका था. ऐसी ही एक बैठक में नरेंद्र मोदी ने इस लेखक को भी आमंत्रित किया था. जहाँ IIT और IIM से पास-आऊट युवाओं की टीम के साथ, ठेठ ग्रामीण इलाकों में मोबाईल के सहारे कार्य करने वाले कम पढ़े-लिखे कार्यकर्ता भी मौजूद थे. नरेंद्र मोदी ने प्रत्येक कार्यकर्ता के विचार ध्यान से सुने. जिस बैठक में मैं मौजूद था, वह तीन घंटे चली थी. उस पूरी बैठक के दौरान नरेंद्र मोदी जी ने प्रत्येक बिंदु पर विचार किया, विस्तार से चर्चा की और अन्य सभी प्रमुख कार्य सचिवों पर छोड़ दिए. जिस समय अन्य मुख्यमंत्री गरीबों-मजदूरों को बेवकूफ बनाकर अथवा झूठे वादे या मुफ्त के लैपटॉप-मंगलसूत्र बाँटने की राजनीति पर मंथन कर रहे थे, उससे काफी पहले ही नरेंद्र मोदी ने ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्स एप्प, हैंग-आऊट, स्काईप को न सिर्फ आत्मसात कर लिया था, बल्कि ई-कार्यकर्ताओं की एक ऐसी सेवाभावी सशक्त फ़ौज खड़ी कर चुके थे जो नरेंद्र मोदी के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी, बल्कि तमाम बुद्धिजीवियों को ताबड़तोड़ और त्वरित गति से तथ्यों के साथ जवाब देने में सक्षम भी थी. ऐसे ही हजारों सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं ने दिन-रात मेहनत करके नरेंद्र मोदी की काफी मदद की. हालांकि सोशल मीडिया ने वास्तविक रूप से कांग्रेस को कितनी सीटों का नुक्सान पहुँचाया, यह पता लगाना अथवा इसका अध्ययन करना लगभग असंभव ही है, परन्तु जानकार इस बात पर सहमत हैं कि इस माध्यम का उपयोग सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी ने ही प्रभावशाली रूप से किया. कहने का तात्पर्य यह है कि चाहे 3D  हो या फेसबुक.. आधुनिक तकनीक के सही इस्तेमाल और युवाओं से सटीक तादात्म्य स्थापित करने तथा समय से पहले ही उचित कदम उठाने और विरोधियों की चालें भांपने में माहिर नरेंद्र मोदी की जीत सिर्फ वक्त की बात थी. मजे की बात ऐसी कि यह पूरी मुहीम अकेले नरेंद्र मोदी के दिमाग की देन थी, आरएसएस तो अभी भी अपनी परम्परागत जमीनी तकनीक और “मैन-टू-मैन मार्किंग” पर ही निर्भर था.

विगत दस वर्ष में भारत की राजनीति एवं समाज पर 3M अर्थात ““मार्क्स-मुल्ला-मिशनरी”” का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था. नक्सलियों के लगातार बढ़ते जा रहे लाल गलियारे हों, सिमी और इन्डियन मुजाहिदीन के स्लीपर सेल हों अथवा स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या सहित ईसाई धर्मांतरण के बढ़ते मामले हों... इन तीनों “M” ने भारत को काफी नुक्सान पहुँचाया है इसमें कोई शक नहीं है. 3M के इस घातक विदेशी कॉम्बिनेशन का मुकाबला संघ-भाजपा ने अपनी स्टाईल के 3M से किया, अर्थात “”मंदिर-मंडल-मार्केटिंग”. संक्षेप में कहा जाए तो इसका अर्थ है पहला M = मंदिर अर्थात संघ के परम्परागत कैडर और भाजपा के स्थायी वोटरों को हिंदुत्व और राम मंदिर के नाम पर गोलबंद किया... फिर उसमें मिलाया दूसरा M= मंडल, अर्थात नरेंद्र मोदी की पिछड़ी जाति को प्रोजेक्ट किया और अंतिम दो दौर में तो सीधे “नीच जाति का हूँ” कहकर मायावती-मुलायम के वोट बैंक पर चोट कर दी... और सबसे महत्त्वपूर्ण रहा तीसरा M= मार्केटिंग. नरेंद्र मोदी को “हिंदुत्व-मंडल और विकास के मार्केट मॉडल” की पन्नी में लपेटकर ऐसा शानदार तरीके से पेश किया गया, कि लुटी-पिटी जनता ने थोक में भाजपा को वोट दिए. “जनता माफ नहीं करेगी”, “अबकी बार”, “अच्छे दिन आने वाले हैं”, “चाय पर चर्चा” जैसे सामान्य व्यक्ति के दिल को छूने वाले स्लोगन एवं जनसंपर्क अभियानों के जरिये नरेंद्र मोदी की छवि को “लार्जर देन लाईफ” बनाया गया. बहरहाल, यह सब करना जरूरी था, वर्ना विदेशी 3M (मार्क्स-मुल्ला-मिशनरी) का घातक मिश्रण अगले पाँच वर्ष में भारत के हिंदुओं को अँधेरे की गर्त में धकेलने का पूरा प्लान बना चुका था.

कुल मिलाकर कहा जाए तो लोकसभा का यह चुनाव जहाँ एक तरफ काँग्रेसी कुशासन, भ्रष्टाचार, निकम्मेपन और घमण्ड के खिलाफ जनमत था, परन्तु ये भी सच है कि नरेंद्र मोदी की यह विजय भाजपा-संघ के कार्यकर्ताओं, अमित शाह की योजनाओं एवं संगठन, “भारतीय” कारपोरेट जगत द्वारा उपलब्ध करवाए गए संसाधनों, नारों-भाषणों-आक्रामक मुद्राओं के बिना संभव नहीं थी. यह संघ-मोदी की शिल्पकारी में बुनी गई एक “खामोश क्रान्ति” थी, जिसमें 18 से 30 वर्ष के करोड़ों मतदाताओं ने अपना योगदान दिया. जिस पुरोधा को देश की जनता ने अपना बहुमत दिया, वह बिना रुके, बिना थके शपथ लेने से पहले ही काम पर लग गया. देश ने पहली बार एक चुने हुए प्रधानमंत्री को गंगा आरती करते देखा, वर्ना अभी तक तो मजारों पर चादर चढाते हुए ही देखा था. देश ने पहली बार किसी नेता को लोकतंत्र के मंदिर अर्थात संसद की सीढ़ियों पर मत्था टेकते भी देखा. नरेंद्र मोदी ने 19 मई को ही गृह सचिव से मुलाक़ात कर ली, तथा 21 मई को कैबिनेट सचिव के माध्यम से सभी प्रमुख मंत्रालयों के सचिवों को निर्देश प्राप्त हो गए हैं कि “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी” पहले सप्ताह में ही उनके द्वारा पिछले पाँच वर्ष में किए गए कार्यों, उनके सुझाव, कमियों एवं योजनाओं के बारे में पावर पाईंट प्रेजेंटेशन देखेंगे. सुस्त पड़ी नौकरशाही में मोदी के इस कदम के कारण जोश भी है और घबराहट भी. देखना यही है कि उनके द्वारा जनता से माँगे गए 60 महीने में वे उम्मीदों के इस “महाबोझ” पर कितना खरे उतर पाते हैं? यूपीए-१ और २ की सरकारों ने बहुत कचरा फैलाया है, कई समस्याओं को जन्म दिया और कुछ पुरानी समस्याओं को उलझाया-पकाया है. इसे समझने में ही नरेंद्र मोदी का शुरुआती समय काफी सारा निकल ही जाएगा. अलबत्ता उनके समक्ष उपस्थित प्रमुख चुनौतियाँ महँगाई, भ्रष्टाचार पर नकेल, बेरोजगारी, आंतरिक सुरक्षा और षडयंत्रकारियों इत्यादि से निपटना है.

1967 में तमिलनाडु में बुरी तरह हारने के बाद काँग्रेस आज तक वहाँ कभी उबर नहीं सकी है, बल्कि आज तो उसे वहाँ चुनाव लड़ने के लिए सहयोगी खोजने पड़ते हैं. उड़ीसा में नवीन पटनायक भी काँग्रेस का लगभग समूल नाश कर चुके हैं. यूपी-बिहार में पिछले बीस वर्ष में काँग्रेस लगभग नदारद ही रहती है. पश्चिम बंगाल में वामपंथियों की खाली की गई जगह पर ममता ने कब्ज़ा किया है वहाँ भी काँग्रेस कहीं नहीं है. तेलंगाना-सीमान्ध्र में काँग्रेस को दोनों हाथों में लड्डू रखने की चाहत भारी पड़ी है, फिलहाल अगले पाँच वर्ष तो काँग्रेस वहाँ भी साफ ही है. भाजपा शासित राज्यों जैसे गुजरात-मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में काँग्रेस का संगठन चरमरा चुका है और ये तीनों राज्य भी लगभग “काँग्रेस-मुक्त” हो चुके हैं. अर्थात नरेंद्र मोदी द्वारा आव्हान किए गए “काँग्रेस-मुक्त” भारत की दिशा में भारत की लगभग 250 सीटों ने तो मजबूती से कदम बढ़ा दिया है. अब यदि नरेंद्र मोदी अगले पाँच वर्ष में केन्द्र की सत्ता के दौरान कोई चमत्कार कर जाते हैं, कोई उल्लेखनीय कार्य कर दिखाते हैं, तो उन्हें अगला मौका भी मिल सकता है और यदि ऐसा हुआ तो निश्चित जानिये 2024 आते-आते काँग्रेस के बुरे दिन और डरावनी रातें शुरू हो जाएँगी.

सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतने दबावों, इतनी अपेक्षाओं, भयानक उम्मीदों, आसमान छूती आशाओं के बीच नरेंद्र मोदी भारत की तकदीर बदलने के लिए क्या-कितना और कैसा कर पाते हैं यह ऐसा यक्ष-प्रश्न है जिसके जवाब का करोड़ों लोग दम साधे इंतज़ार कर रहे हैं...


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