क्या किसी देश का इतिहास या उसकी पौराणिक मान्यतायें शर्म का विषय हो सकती हैं ? यदि हजारों वर्षों के इतिहास में कोई शर्म का विषय है भी, तो उसके मायने अलग-अलग समुदायों के लिये अलग-अलग क्यों होना चाहिये ? यह सवाल आजकल कई लोगों के मनोमस्तिष्क को झकझोर रहा है । इतिहास के साथ छेड़छाड़ करना शासकों का प्रिय शगल रहा है, लेकिन जब बुद्धिजीवी वर्ग भी उसी मुहिम में शामिल हो जाये तो फ़िर यह बहस का विषय हो जाता है.

गाय पर निबन्ध (सन २०४०)

Written by मंगलवार, 27 फरवरी 2007 14:53

 

समय तेजी से बदल रहा है । भारतीय संस्कृति व उससे जुडे़ प्रतीक पार्श्व में चले जा रहे हैं । गोवंश धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है... जगह-जगह गौवंश के वध हेतु (Slaughter Houses) बनते जा रहे हैं... ऐसे में आज से तीस-चालीस साल बाद सन २०४०-२०५० में कक्षा दूसरी-तीसरी के बच्चे को "गाय" पर दस वाक्य लिखने को कहा जाये तो वह क्या लिखेगा...


१. गाय एक जानवर होता है, जो गाँव में कहीं-कहीं पाया जाता है ।
२. गाय शहर में नहीं रह सकती, क्योंकि हमारी कालोनी में घास नहीं है ।
३. गाय दूध भी देती है, लेकिन हम दूध "डेरी" से ही लेते हैं ।
४. अमेरिका में लड़के को "गाय" कहते हैं ।
५. मेरी "ग्रैण्डमा" के पास गाँव में गाय थी, हम यहाँ नहीं रख सकते, "लायसेंस" नहीं है ।
६. गाय के गोबर को हम "शिट" कहते हैं ।
७. गाय के दो सींग होते हैं, जो मारने के काम आते हैं ।
८. गाय का चेहरा मेरे दोस्त की "मॉम" से मिलता है ।
९. पुराने जमाने में गाय को माता कहते थे, पता नहीं क्यों ?
१०. "डैड" कहते हैं कि गाय और जंगल बहुत काम के हैं... लेकिन मैने दोनों नहीं देखे ।

शाणे बनो.... लेकिन सही जगह पर...

Written by मंगलवार, 20 फरवरी 2007 14:54

"शाणा", इस शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई, कहाँ से हुई यह तो शोध का विषय हो सकता है, क्योंकि मराठी भाषा में "शहाणा" शब्द बुद्धिमान और चतुर व्यक्ति के लिये उपयोग किया जाता है । लगभग यही भाव हिन्दी में "सयाना" से उधृत होता है और हो सकता है कि यह शब्द भी मराठी भाषा से ही प्रेरित हो । लेकिन इस शब्द का अपभ्रंश होते-होते अब यह "सयाना" से "शाणा" हो गया है । यह शब्द पिछले कुछ समय से ही आम प्रचलन में आया है, लेकिन जब से आया है, चारों तरफ़ छा गया है ।

कागज़ बचाओ, पर्यावरण बचाओ...

Written by गुरुवार, 15 फरवरी 2007 12:41

कागज : एक राष्ट्रीय सम्पत्ति

 

सन २००४ के आम चुनाव भारत के लिये बेहद महत्वपूर्ण साबित हुए हैं, राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि पर्यावरणीय दृष्टिकोण से, क्योंकि विश्व के इन सबसे बडे चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (Electronic Voting Machines) का देशव्यापी उपयोग किया गया, जिसके कारण लाखों टन कागज की बचत हुई । जाहिर है लाखों टन कागज की बचत अर्थात लाखों पेड़ कटने से बच गये, पर्यावरण (Environment) की नजर से यह एक असाधारण उपलब्धि मानी जा सकती है।

गणतंत्र दिवस 2007 और मीडिया

Written by शनिवार, 27 जनवरी 2007 14:34

गणतन्त्र और हमारा मीडिया

कल ही गणतन्त्र दिवस (Republic Day of India) था और मै सोच रहा था कि लोगों, मित्रों को बधाई दूँ या उनसे शोक व्यक्त करूँ.... आज से पचास-साठ वर्ष पूर्व जिस आम आदमी को बाहर धकियाकर विशिष्टजनों के जिस गणतन्त्र का निर्माण किया गया, देखते-देखते कब वह "गनतन्त्र" बन गया आम आदमी जान भी नहीं सका... और जिन मूलभूत अधिकारों की गाथा हमें सुनाई गई थी वे तो शुरू से ही आम आदमी के लिये नही थे, ना कभी मिलने थे, ना आगे भी मिलेंगे... जो थोडी-बहुत आशा एक जमाने में उन्मुक्त और खुले प्रेस (Free Press) से थी अब वह भी धीरे-धीरे क्षीण होती नजर आ रही है..

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