Lord Mcaulay and Britishers in India

Written by बुधवार, 04 अप्रैल 2007 12:57
लॉर्ड मैकाले के भाषण का एक अंश


आईये देखें कि सन 1835 में मैकाले भारत के बारे में क्या सोचते थे...



इसी नीति के तहत अंग्रेजों ने भारतीयों विशेषकर हिन्दुओं के मन में उनकी संस्कृति, उनके आचार-विचार, उनके रहन-सहन आदि के बारे में हीनभावना भरने की शुरुआत की और इसमें वे काफ़ी हद तक सफ़ल भी रहे । भारतीय इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करना, हिन्दुओं के भगवानों, उनके चिन्हों का मखौल उडाना, हिन्दू राजाओं को नाकारा बताना आदि इसी कडी़ का हिस्सा हैं..और अब राम जन्मभूमि पर प्रश्न उठाना, भारत-श्रीलंका के बीच बने राम-सेतु को तोडना, क्रॉस के चिन्ह वाले सिक्कों का प्रचलन शुरु करवाना आदि कई कदम उठाये जा रहे हैं...अंग्रेजों के ही मानस पुत्र "वामपन्थी" भी भारत, भारतीय संस्कृति, हिन्दुत्व के बारे में दुष्प्रचार करने में लगे हुए हैं...लेकिन वे कभी सफ़ल नहीं होंगे..
(यदि चित्र साफ़ और बडा नहीं दिख रहा हो तो कृपया मुझसे सम्पर्क करें, मैं ई-मेल भेज दूँगा)

Reservation in India and SC, ST Jobs

Written by रविवार, 01 अप्रैल 2007 16:07
आरक्षण : चाहिये ही चाहिये

माननीय प्रधानमन्त्री जी,

इतिहास पुरुषों वीपी सिंह और अर्जुन सिंह (दोनो ठाकुर ? क्या वाकई) नेताओं ने जो आरक्षण की महान परम्परा चलाई है मैं उसका पूर्ण समर्थन करता हूँ..इसीलिये मैं माँग करता हूँ कि नौकरियों और पदोन्नति की तरह हमें सभी क्षेत्रों में आरक्षण लागू कर देना चाहिये, मैं अपनी माँगों की सूची इस तरह रखता हूँ ....
सबसे पहले भारतीय क्रिकेट टीम में आरक्षण नीति लागू होना चाहिये । टीम में ओबीसी के लिये चालीस प्रतिशत और मुसलमानों के लिये बीस प्रतिशत आरक्षण होना चाहिये । जब ओबीसी का बल्लेबाज चौका मारे तो उसे छक्का माना जाये, एससी वर्ग का बल्लेबाज जब साठ रन बना ले तो उसे शतक माना जाये । शोएब अख्तर को सखत चेतावनी दी जायेगी कि जब मुसलमान बल्लेबाजी करे तो गेंदबाजी साठ मील प्रतिघंटा से अधिक नहीं होना चाहिये (आखिर हमें पिछडे वर्गों को सुविधायें देकर आगे लाने का प्रयास करना है) । ओलंपिक मे ओबीसी का धावक अस्सी मीटर भी दौड ले तो उसे सौ मीटर माना जाये । भाला फ़ेंक, चक्का फ़ेंक और गोला फ़ेंक में ओबीसी और एससी/एसटी को तीस प्रतिशत की छूट मिलेगी । चूँकि प्रमोशन में भी आरक्षण है इसीलिये टीम का कप्तान भी बदल-बदल कर रोटेशन के आधार पर होना चाहिये । सबसे पहले एससी कप्तान, एसटी कप्तान, मुसलमान कप्तान, ओबीसी कप्तान, सामान्य कप्तान, अगडों में पिछडा कप्तान, पिछडों में अति पिछडा कप्तान, थोडे पिछडों में ज्यादा अगडा कप्तान.. आदि, क्योंकि हमें खिलाडी की प्रतिभा से हमें कोई लेना-देना नहीं है, हाँ, लेकिन यह नियम लोकसभा और राज्यसभाओं पर लागू नहीं होगा, क्योंकि वहाँ तो प्रतिभा पहले ही नदारद है ।

इस वर्ष से फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड में भी आरक्षण लागू हो..जैसे यदि कुल बीस पुरस्कार बाँटे जाने हैं तो उसमें से चौदह पुरस्कार स्वमेव आरक्षित हो जायेंगे, जैसे कि "बेस्ट गायक" का पुरस्कार सामान्य वर्ग वाले को मिले, तो "बेस्ट संगीतकार" का अवार्ड ओबीसी संगीतकार को ही मिलेगा । यदि बेस्ट अभिनेत्री का पुरस्कार मुसलमान को मिला, तो बेस्ट स्क्रीन प्ले का पुरस्कार खुद-ब-खुद एसटी लेखक को मिलना चाहिये । नेताओं को आम जनता में अपनी छवि बनाने के लिये उसी हवाई जहाज से सफ़र करना चाहिये जिसे कोई एससी-एसटी पायलट उडा रहा हो, फ़ोकट में AIIMS में भरती होने पर वे जोर दें कि उनका ऑपरेशन सिर्फ़ और सिर्फ़ एसटी डॉक्टर ही करेगा.. तभी सही मायनों में इन वर्गों की उन्नति हो सकेगी..आओ हम दुनिया को बता दें कि भारत तेजी से आगे बढ रहा है.. मुझे आशा है कि हमारे बुद्धिजीवी प्रधानमन्त्री इन माँगों पर विचार करेंगे और आगे इटली की मेम तक पहुँचायेंगे.. क्योंकि उनके पास विचार करने के अलावा और कोई शक्ति है भी नहीं.. आमीन

Reservation in Education and Job in India

Written by रविवार, 01 अप्रैल 2007 11:59
आरक्षण : आ....क थू 

(१) गत वर्ष मेरे भतीजे को AIEEE में 142 अंक मिले जबकि उसके आरक्षित वर्ग के दोस्त को मात्र 48 अंक, लेकिन 142 अंक वाले को काऊंसिलिंग तक के लिये नहीं बुलाया गया, जबकि 48 अंक वाले को लगभग मनचाहे विषय में BE करने की पात्रता मिल गई...

(२) गत वर्ष के IIT Entrance के आँकडों के अनुसार जितने अंकों पर आरक्षित वर्ग को 10 वीं रैंक मिली है उतने ही अंक यदि सामान्य वर्ग के छात्र के हैं तो उसकी रैंक होगी 3800 वीं...इतना अन्तर सिर्फ़ आरक्षण के कारण है और यदि आरक्षण नहीं होता तो वह नालायक कभी इंजीनियरिंग कॉलेज में घुस भी नहीं पाता...

(३) सुमन गत बीस वर्षों से एक सरकारी ऑफ़िस में एलडीसी के पद पर कार्यरत है, जबकि मात्र पाँच वर्ष पहले नौकरी में लगी उसकी जूनियर चार प्रमोशन पाकर उसकी बॉस बन गई है, सिर्फ़ इसलिये कि वह आरक्षित वर्ग से है (ये और बात है कि उसे अंग्रेजी का एक पत्र ड्राफ़्ट करना नहीं आता)..प्रतिभा और विभागीय कार्य जाये भाड में...

ऐसे हजारों-लाखों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं.. लेकिन क्या किया जा सकता है ? जब २१ वीं सदी में सत्ता ही जन्म के आधार पर प्रतिभा को लतिया रही हो.. तब क्या रास्ता बचता है ? आरक्षण समर्थकों का एक तर्क यह होता है कि आरक्षण से सामाजिक समरसता बढेगी (?).. क्या ऐसे ही बढेगी ? यदि मैं मेरे भतीजे की जगह होता तो अपने दोस्त के प्रति मेरे मन में हमेशा के लिये एक विषमता जन्म ले लेती..कि मैं इससे ज्यादा प्रतिभाशाली हूँ फ़िर भी यह मुझसे आगे निकल गया तो फ़िर मैं क्यों इसके प्रति सदाशयता दिखाऊँ ? सुमन अपना कार्य ईमानदारी से क्यों करे, जबकि उसे मालूम है कि उसकी बॉस में इतनी भी अकल नहीं है कि वह उसके सामने सर उठाकर खडी हो सके, लेकिन वह मन मसोस कर उसके आदेश मानती है... और मसोसे हुए मन और कुचली हुई प्रतिभायें सामाजिक समरसता का निर्माण नहीं किया करतीं... लेकिन यह बात नेताओं और आरक्षण समर्थकों के कानों तक कौन पहुँचाये ? वे तो समाज को खण्ड-खण्ड कर देना चाहते हैं.. और नेताओं की बात छोड भी दें तो आरक्षण का एक्मात्र उद्देश्य लगता है... "बदला"...सवर्ण वर्ग के किसी छात्र के किसी पूर्वज ने कभी दलितों पर अत्याचार किया होगा उसका फ़ल उसे आज भुगतना पड़ रहा है..क्या इससे समरसता बढेगी ? दलितों पर अत्याचार हुए हैं यह एक कडवा सत्य है, लेकिन उसमें आज के प्रतिभाशाली युवा की क्या गलती है ?

लेकिन वह अपने पूर्वजों की गलतियों को ढोने पर मजबूर है, ठीक वैसे ही जैसे कि वह भीषण जनसंख्या के दुष्परिणामों को भुगत रहा है, जाहिर है कि उसमें भी उसकी कोई गलती नहीं है । इस घृणित खेल में सबसे अधिक नुकसान हो रहा है गरीब.. या कहें मध्यमवर्गीय सामान्य वर्ग के छात्रों का...। मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं अपने बेटे को किसी महँगे (आजकल तो सभी महँगे हैं) कॉलेज में पैसे के बल पर एडमिशन दिलवाऊँ.. और प्रतिभा के बल पर तो वह कहीं स्थान पा ही नहीं सकता.. तो मेरे बेटे के लिये क्या रास्ता बचा ? लोगों ने Monster.com का विज्ञापन देखा होगा जिसकी "पंच लाईन" है "Caught in a wrong job" ठीक यही सामान्य वर्ग के गरीब छात्रों के साथ होने वाला है.. जबकि कोई प्रतिभाशाली इंजीनियर कहीं तेल बेच रहा होगा.. या कोई होनहार भविष्य का वैज्ञानिक किसी गाँव में सरपंच की चाकरी करते हुए मास्टरी करता होगा... या IIM की प्रतिभा रखने वाला कोई लडका कहीं मैकेनिकगिरी में लगा होगा... यही हो रहा है.. लेकिन सुनेगा कौन ? सबको तो अपनी-अपनी जाति की पडी है.. सब पिछडे़ होने के लिये मरे जा रहे हैं..और नेता मरे जा रहे हैं अपने वोटों के लिये और निजी क्षेत्र के दरवाजे भी हमारे मुँह पर बन्द करने में..। मेरे पास तीन "M" (Money, Muscle, Manipulation) में से एक भी नहीं है, तो मैं भी अपने बेटे से कहूँगा कि यदि उसके आरक्षित वर्ग के कई दोस्तॊं से ज्यादा अंक पाने के बावजूद उसे किसी अच्छे कॉलेज में दाखिला नहीं मिलता.. तो दाऊद या बबलू गैंग का रुख कर.. कम से कम वहाँ "प्रतिभा" की कद्र तो होगी...

सुप्रीम कोर्ट से जूते खाने के बावजूद जैसा कि हमेशा होता आया है अब हमारे नेता (?) अध्यादेश के जरिये अपनी बात थोपने की कोशिश करेंगे, और सुप्रीम कोर्ट के हाथ बाँध दिये जायेंगे और सवर्णों.. विशेषकर गरीब सवर्णों की प्रतिभा की भ्रूण हत्या करके खुशी मनाई जायेगी । सुप्रीम कोर्ट इससे अधिक क्या कर सकता है... सुप्रीम कोर्ट नहीं होता तो दिल्ली में कभी CNG लागू नहीं होता, सुप्रीम कोर्ट नहीं होता तो दिल्ली के भ्रष्ट शासक और उतने ही बेईमान अतिक्रमणकर्ता बेशर्मी से कब्जा जमाये रहते और सीलिंग कभी नहीं होती.., सुप्रीम कोर्ट ना होता तो मायावती ताजमहल भी बेच खाती... ऐसे अनेकों उदाहरण हैं कि यदि सुप्रीम कोर्ट ना हो तो ये नेता समूचे देश को SEZ (Special Exploitation Zone) बना डालें.. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की भी एक सीमा है.. फ़िर हमारी नजर जाती है राष्ट्रपति पर..बात आती है अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने की तो हमारे यहाँ जैल सिंह को छोडकर कोई भी "मर्द" राष्ट्रपति नहीं हुआ जो सरकार के अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने से मना कर दे, और यदि वह मना कर भी दे तो लोकसभा में बैठे 525 गधे (या शायद 540..क्या फ़र्क पडता है) उसे फ़िर पास करके वापस भेज देंगे और फ़िर राष्ट्रपति को उस पर दस्तखत करना ही होंगे । जबकि कम से कम राष्ट्रपति ऐसा तो कर ही सकता है कि वह विवादित अध्यादेश को अनिश्चितकाल के लिये विचाराधीन रख ले.. विचार करने की सीमा पर लोकसभा की कोई पाबन्दी नहीं है इसलिये राष्ट्रपति को चाहिये कि वे अपने कार्यकाल की समाप्ति तक उक्त अध्यादेश पर "विचार" करते ही रहें... करते ही रहें.. फ़िर उनका कार्यकाल समाप्त होने के पश्चात वह अध्यादेश स्वतः ही समाप्त हो जायेगा और नये राष्ट्रपति के चुने जाने और आने तक बात टल जायेगी, फ़िर से लोकसभा को उसे पास करके विचारार्थ और हस्ताक्षर करने राष्ट्रपति के पास भेजा जायेगा.. फ़िर चाहे तो अगला राष्ट्रपति उस अध्यादेश पर पाँच साल तक बैठ सकता है । जैसे वे इस वक्त वे अफ़जल के केस में उस पर कुंडली मारे बैठे हैं..उसी तरह हम गरीबों के हक के लिये वे क्यों नहीं सरकार के सामने अपनी कमर सीधी करते ?

लेकिन यदि आजादी के साठ वर्षों बाद भी जनसंख्या नियंत्रित नहीं हो पाई, प्राथमिक शाला के अभाव में चालीस प्रतिशत निरक्षर हैं, नेहरू के जमाने से पुष्पित-पल्लवित हुआ भ्रष्टाचार अब लोकाचार बन गया है.. तो इसमें आम आदमी की क्या गलती है ? सजा मिलनी किसे चाहिये और मिल किसे रही है... यही है हमारा आज का "शाईनिंग इंडिया"... यानी सो कॉल्ड "मेरा भारत महान"...
दिनांक 10 मार्च 2010
भारत की टीम पाँच देशों के टूर्नामेण्ट में खेल रही है, अन्य चार देश हैं सूडान, लीबिया, फ़िजी और आईसलैंड । आज भारत की क्रिकेट टीम का बहुत ही महत्वपूर्ण मैच है, उसे सूडान को हर हालत में हराना है, यदि वह आज का मैच जीत जाती है तो उसे 2011 में होने वाले विश्व कप में 35 वीं रैंक मिल जायेगी..मैच की सुबह गुरु ग्रेग और राहुल ने मैच की रणनीति बनाने के लिये टीम मीटिंग बुलाई । बहुत महत्वपूर्ण मैच था इसलिये गम्भीरता से टीम मीटिंग शुरु हुई... कमरे के एक कोने में ग्रेग और राहुल बैठे थे, धोनी एक तरफ़ अपने बालों में कंघी कर रहा था, सहवाग अपने गंजे सिर पर हाथ फ़ेर रहा था... तेंडुलकर अपने नये विज्ञापन का कॉन्ट्रेक्ट पढने में मशगूल था, सौरव सोच रहा था कि मुझे आज मीडिया में क्या बयान देना है... मतलब यह कि बहुत ही महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही थी । गुरु ग्रेग सबसे पहले बोले - बॉयज.. आज हमारा एक खास मैच है, तो आओ हम बैटिंग लाइन-अप और गेंदबाजी के बारे में अपनी रणनीति बना लें... सौरव तुम ओपनिंग करोगे ?
सौरव - यह आप मुझे बता रहे हैं या मुझसे पूछ रहे हैं ? इसका जवाब मुझे पता नहीं है, लेकिन सूडान का एक गेंदबाज लगातार मेरी छाती और कमर को निशाना बना कर गेंदें फ़ेंकता है । अब इस उमर में मैं 50-60 मील प्रति घंटा की गेंदबाजी नहीं झेल सकता हूँ ।
ग्रेग - ठीक है कोई बात नहीं.. तुम हिट विकेट आऊट होकर आ जाना और बाद में मीडिया को कोई बयान दे देना, वैसे हमारी टीम की इमेज इतनी जोरदार है कि कोई भी बॉलर शॉर्टपिच गेंद नहीं फ़ेंकेगा... फ़िर भी..राहुल सौरव के साथ किसे भेजना चाहिये ओपनिंग के लिये ?
राहुल - मुझे लगता है सहवाग सही रहेगा, क्योंकि उसने बीस मैचों के बाद पिछले मैच में चार चौके लगाये थे, इससे लगता है कि वह अपने पुराने फ़ॉर्म में लौट आया है..क्यों सहवाग ?
सहवाग - जी सर
ग्रेग - चलो बढिया.. सचिन आप नम्बर चार पर जायेंगे ? मतलब आपकी जैसी मर्जी...
सचिन - मुझे 11 बजे शॉपिंग करने जाना है तो मैं दस ओवर के बाद ही जाऊँगा..
ग्रेग - ठीक है, सहवाग और सौरव छः ओवर तो निकाल ही लेंगे, फ़िर आप चले जाना..और अपना नैसर्गिक खेल खेलना..चलो धोनी तुम कीपिंग करोगे...
धोनी - मैं इस बार कीपिंग नहीं करूँगा, पिछले मैच में मैने चार घंटे कीपिंग की थी उसके कारण मेरे धूप से मेरे बाल खराब हो गये है और उसमें जूँए पड़ गई हैं.. मैं तो बल्लेबाज के तौर पर खेलूँगा..
ग्रेग - प्लीज एक बार आज के लिये कीपर बन जाओ.. यह हमारा बहुत महत्वपूर्ण मैच है..
धोनी - ठीक सिर्फ़ आज, लेकिन शाम को मुझे मॉडलिंग के लिये रैम्प पर भी उतरना है, इसलिये आगे से ध्यान रखना
इस बीच गुरु ग्रेग ने पिछले रिकॉर्ड के अनुसार देखा कि राहुल सबसे अधिक देर तक क्रीज पर टिका रहता है, तो ग्रेग चैपल ने कहा, राहुल तुम इन्हें बताओ कि कैसे तुम क्रीज पर टिके रहते हो...
राहुल - सच बात तो यह है कि मेरी बीबी बहुत ही बदसूरत है इसलिये मैं कोशिश करता हूँ कि अधिक से अधिक देर तक उससे दूर रह सकूँ और पिच ही वह जगह है जहाँ मैं सुकून से रह सकता हूँ, आपको याद होगा कि पिछले मैच में मैने ९३ गेंदों पर 4 रन बनाये थे और मैं बहुत खुश था... सभी खिलाडियों ने तालियाँ बजाईं..
ग्रेग ने कहा - चलो ठीक है.. गेंदबाजी की शुरुआत जहीर करेगा, क्योंकि वही सबसे कम वाईड फ़ेंकता है.. पिछले मैच में उसने सिर्फ़ 12 वाईड फ़ेंकी थीं । फ़िर गुरु ने कहा कि मैं देख रहा हूँ कि राहुल पर कप्तानी का बोझ कुछ ज्यादा ही पड़ रहा है, इसलिये मैने नया प्रयोग करने की सोची है, जिसके तहत टीम में अब तीन कप्तान होंगे, बैटिंग कप्तान, फ़ील्डिंग कप्तान और बॉलिंग कप्तान.. कैसा आईडिया है.. किसी ने कोई जवाब नहीं दिया..मैने देखा कि मुनाफ़ पटेल पिछले तीन मैचों से नॉट आऊट रहा है, इसलिये उसकी बैटिंग प्रतिभा को देखते हुए उसे मैं उसे बैटिंग कप्तान बनाता हूँ..सौरव लगभग १५० रन आऊट करवाने में शामिल रहा है, लेकिन खुद कभी रन आऊट नहीं हुआ, इसलिये मैं उसे फ़ील्डिंग कप्तान बनाता हूँ.. राहुल ने आपत्ति उठाई - लेकिन सौरव ने पिछले मैच में ही तीन कैच छोडे थे...गुरु ने कहा - लेकिन उसने बिलकुल सही दिशा में डाईव किया था, यही बहुत है । मैने देखा है कि पिछले तीन साल से अनिल कुम्बले लगातार टीम से बाहर रहा है, लेकिन उसने जम्हाई लेने के अलावा अपना मुँह कभी नहीं खोला, मैं उसकी खेल भावना की कद्र करते हुए उसे बॉलिंग कप्तान बनाता हूँ...
अन्त में गुरु ग्रेग ने टीम में जोश भरते हुए कहा - उठो लड़कों तुम्हें सूडान को हराना ही होगा.. बाहर लाखों लोग यज्ञ-हवन कर रहे हैं, बाल बढा रहे हैं, मन्दिरों में मत्था टेक रहे हैं.. चलो उठो..
वैसे मीडिया की जानकारी के लिये बता दूँ कि विश्व कप के बाद भारत के अगले चार अभ्यास मैच इस प्रकार से हैं -
12 अप्रैल - सरस्वती विद्या मन्दिर
15 अप्रैल - विक्रम हाई स्कूल
17 अप्रैल - स्टेन्फ़ोर्ड गर्ल्स कॉलेज
20 अप्रैल - सेंट मेरी कॉन्वेंट स्कूल...
इस सम्बन्ध में राहुल का कहना है कि हमारी पहली प्राथमिकता सरस्वती विद्या मन्दिर को हराने की होगी, क्योंकि मैने सुना है कि उनके पास कुछ युवा और जोशीले खिलाडी है... तो आईये हम भी हू..हा..इंडिया के लिये प्रार्थना करें...
चौंकिये नहीं... नोबेल पुरस्कार क्रिकेट टीम को भी मिल सकता है... अब देखिये ना जब से हमारी क्रिकेट टीम यहाँ से विश्व कप खेलने गई थी... तो वह कोई कप जीतने-वीतने नहीं गई थी...वह तो निकली थी एक महान और पवित्र उद्देश्य..."विश्व बन्धुत्व" का प्रचार करने । जब प्रैक्टिस मैच हुए तो भारत की टीम ने दिखा दिया कि क्रिकेट कैसे खेला जाता है... लेकिन जब असली मैच शुरू हुए तो भारत की टीम पहला मैच बांग्लादेश से हार गई... बांग्लादेश से वैसे भी भारत के बहुत मधुर सम्बन्ध हैं...वहाँ से हमारे यहाँ आना-जाना लगा रहता है... वह तो हमारा छोटा भाई है... इसलिये वहाँ क्रिकेट को बढावा देने के लिये बडे भाई को तो कुर्बानी देनी ही थी, सो दे दी । फ़िर बात आई पाकिस्तान की... अब आप सोचेंगे कि वह तो हमारे ग्रुप में ही नहीं था... लेकिन भई है तो हमारा पडोसी ही ना... जैसे ही वे मैच हारे और बाहर हुए... भारत की टीम का हाजमा भी खराब हो गया... फ़िर एक बार पडोसी धर्म निभाने की बारी थी "बडे़ भाई" की... सो फ़िर निभा दिया... रह गया था तीसरा पडोसी श्रीलंका... उससे भी हमने मैच हार कर उसे भी दिलासा दिया कि तुम अपने-आप को अकेला मत समझना... "बडे़ भाई" सभी का खयाल रखते हैं... सो श्रीलंका से भी मैच हार गये । अब सोचिये एक ऐसे महान देश की महान टीम जो कि विश्व बन्धुत्व की भावना से ही मैच खेलती है, क्या उसे शांति का नोबेल पुरस्कार नहीं मिलना चाहिये ? और यह तो मैने बताई सिर्फ़ एक बात जिससे नोबेल पुरस्कार मिल सकता है, मसलन...अर्थव्यवस्था की दृष्टि से भी इस महान टीम ने काम किया... अब ये लोग मैच जीतते रहते तो सट्टा चलता रहता, देशवासियों का करोडों रुपया बरबाद होने से इन वीरों ने बचाया... लोगबाग रात-बेरात जाग-जाग कर मैच देखते... अलसाये से ऑफ़िस जाते और काम-धाम नहीं करते... हमारी इस महान टीम ने अरबों घण्टों का मानव श्रम बचाया और लोगों को टीवी से दूर करने में सफ़लता हासिल की, इतना महान कार्य आज तक किसी ने किया है ? और रही बात कप की... तो ऐसे कप तो हमारे जयपुर में ही बनते हैं कभी भी जाकर ले आयेंगे... उसके लिये इतनी सारी टीमों से बुराई मोल लेना उचित नहीं है...क्या पता कल को उनमें से आडे़ वक्त पर कोई हमारे काम आ जाये... भाईचारा बनाये रखना चाहिये...
और भी ऐसी कई बातें हैं जो इसमें जोड़ दी जायें तो नोबेल पक्का... नोबेल वालों को घर पर आकर नोबेल देना पडे़गा... विश्व बन्धुत्व, अर्थव्यवस्था को एक बडा योगदान, करोडों मानव श्रम घण्टों की बचत, कोई भी एक टीम एक साथ इतने सारे क्षेत्रों में महान काम नहीं कर सकती... और तो और भारत की टीम से हमारे सदा नाराज रहने वाले वामपंथी भाई भी खुश होंगे, क्योंकि इन खिलाडियों ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से पैसे तो पूरे ले लिये लेकिन जब उनका माल बिकवाने की बारी आई तो घर बैठ गये... इसे कहते हैं "चूना लगाना"....तो भाई लोगों यदि आप भी ऐसा ही समझते हैं कि नोबेल पुरस्कार भारत की क्रिकेट टीम को ही मिलना चाहिये... तो अपने मोबाईल के बॉक्स में जाकर "मू" "र" "ख" टाईप करें और 9-2-11 पर एसएमएस करें... सही जवाबों में से किसी एक विजेता को मिलेगी धोनी के बालों की एक लट, जो उन्होंने वापस आते वक्त हवाई जहाज में कटवाई थी, ताकि कहीं लोग उन्हें पहचान ना लें... तो रणबाँकुरों उठो...मोबाईल उठाओ और शुरू हो जाओ...

Eclipse of Sun and Moon (World Water Day)

Written by बुधवार, 21 मार्च 2007 20:34
सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण और मान्यतायें (जल दिवस पर) 

अभी-अभी गत दिनों चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण दोनों आगे-पीछे ही पडे़ । उज्जैन में चूँकि धर्म का एक विशेष स्थान है और यह धार्मिक नगरी कहलाती है, इसलिये यहाँ के स्थानीय अखबारों और पंडे-पुजारियों से लेकर प्रशासन तक में एक बहस हुई, "शहर को जलप्रदाय किस समय किया जाये ?" भाई लोगों ने तमाम अखबार रंग डाले, हर ऐरे-गैरे का इंटरव्यू भी ले लिया... उसके पीछे का मंतव्य था कि चूँकि लोगों में यह मान्यता है कि ग्रहण के समय पानी नहीं पीना चाहिये ना ही भरना चाहिये, अब ग्रहण सुबह ६.०० बजे से ८.४० तक था, तो क्या पानी का सप्लाय उसके बाद किया जाये, या ६.०० बजे के पहले ही जलप्रदाय कर दिया जाये ? खेद की बात तो यह है कि जिस बात की आज तक कोई वैज्ञानिकता सिद्ध नहीं हुई (हुई हो तो कृपया मुझे लिंक भेजें) कि क्या वाकई ग्रहण के समय पानी में कोई खराबी आ जाती है ? और यदि आ जाती है तो क्या और कैसी खराबी आती है ? क्या इस पर कोई शोध हुआ है ?

मैं अवश्य ही जानना चाहूँगा.... ग्रहण के समय रखे हुए पानी के pH, BOD, COD, bacteria आदि के आँकडे यदि किसी के पास हों तो जरूर भेजें, कुछ प्रश्न सदा ही अनुत्तरित रहे हैं - जैसे :

१. क्या घरों मे रखा हुआ पानी ही ग्रहण के समय अशुद्ध हो जाता है ?
२. क्या सिर्फ़ पीने का पानी ही अशुद्ध होता है, या आम उपयोग वाला भी ?
३. यदि ग्रहण के दौरान पानी अशुद्ध ही हो जाता है तो फ़िर जिस बाँध से पानी आ रहा है, उसका पानी साफ़ क्यों रह पाता है ? और जिस पाईप लाईन से पानी आ रहा है और उसमें जो पानी बचा हुआ है क्या वह अशुद्ध नहीं होता ?
४. दूध वाला, ग्रहण के दौरान ही दूध लेकर आया, फ़िर सभी ने उससे दूध क्यों लिया ? क्या दूधवाले ने उस दिन पानी नहीं मिलाया होगा ?
५. रात को होटलों में जो पानी जमा था, अगले दिन सुबह लाखों लोगों ने वही पानी पिया होगा, उसका क्या ?
६. करोडों कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलें जो ग्रहण के दौरान खुले में रखी होंगी, क्या वे भी अशुद्ध हो गईं ?
आप लोगों को यकीन करना होगा कि.... ग्रहण के बाद जब नल आये तो हजारों लोगों ने घरों में रखा फ़ेंक दिया, और फ़िर बरतन धोकर नया पानी भरा, मतलब लाखों लीटर पानी ग्रहण की भेंट चढ़ गया...

मैं जानता हूँ कि राजस्थान के कई लोगों के दिल पर यह पढकर क्या गुजरी होगी, क्योंकि पानी का मोल सबसे ज्यादा वे ही जानते हैं । मजे की बात तो यह है कि सन २००४ में उज्जैन में भी ऐसा भीषण जल संकट आया था कि लोग अभी भी सोचकर काँप उठते हैं, लेकिन फ़िर भी जल का ऐसा अपव्यय ? लोगों की सोच पर तरस आता है । आज जल दिवस पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि इस प्रकार की परम्पराओं का डटकर विरोध करेंगे । कहने का मतलब है कि हमारे यहाँ परम्पराओं को आँखें मूँदकर पाला जाता है, ना कोई तर्क, ना कोई वैज्ञानिक विश्लेषण... यदि कोई मान्यता वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो जाये तो उसे मानने में और भी मजा आयेगा और यह भी पता चलेगा कि ऐसा क्यों हो रहा है जिससे नई पीढी को हम और अधिक अच्छे से समझा सकेंगे, जैसे कि गर्भवती माता के गर्भ में भ्रूण को आठवें महीने से साफ़-साफ़ सुनाई देने लगता है, यह अभिमन्यु वाले केस में हमें पहले से मालूम था, जिसका वैज्ञानिक विश्लेषण बाद में हुआ, और वह भी हमें बाहर के वैज्ञानिकों ने बताया । जयद्रथ वध के दौरान जब वह रात्रि के भ्रम में बाहर आ गया था और अर्जुन ने उसका वध किया, उस समय की कालगणना के अनुसार उस दिन पूर्ण सूर्यग्रहण था, इसलिये हो सकता है कि उस वक्त कुरुक्षेत्र में अंधेरा छा गया हो....ऐसे और भी कई उदाहरण दिये जा सकते हैं... लेकिन प्रशासन भी जागरूकता बढाने की बजाय, पंडे-पुजारियों-प्रवचनकारों को अनावश्यक रूप से बढावा देने में लगा रहता है । मैने पहले भी यहाँ लिखा था कि बगैर किसी तर्क-वितर्क के हमें कई बातें गले उतार दी जाती हैं, जो कि गलत है, हरेक परम्परा का, मिथक का, किंवदंती का पूर्ण वैज्ञानिक आधार होना चाहिये । लेकिन "धर्म-इंडस्ट्री" (जी हाँ, यह एक विशाल इंडस्ट्री है जिसके द्वारा कईयों के पेट पल रहे हैं, कईयों के पेट कट रहे हैं, कईयों के पेट फ़ूल रहे हैं) के आगे हमारे यहाँ सभी नतमस्तक हैं ।

एक दिन सन २०२८ का

Written by बुधवार, 21 मार्च 2007 16:26
"स्व-आचार संहिता" : (यह लेख नईदुनिया इन्दौर में ३०.०४.२००६ को प्रकाशित हो चुका है) यह लेख / चुटकुला / घटना... एक ई-मेल पर आधारित / अनुवादित है, जिसके लेखक की मुझे जानकारी नहीं है । यदि कोई इसके मूलस्रोत के बारे में जानता हो तो कृपया मुझे सप्रमाण लिंक मेल करें, ताकि उसे इस लेख में जोडा़ जा सके ।
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जैसे-जैसे जीवन की गति तेज होती जा रही है, हमारे आसपास कम्प्यूटर का उपयोग बढने लगा है, ठीक इसी प्रकार प्रत्येक विभाग में कम्प्युटरीकरण द्वारा जानकारियाँ अथवा "डाटा" एकत्रित करने एवं उन जानकारियों को "प्लास्टिक कार्ड" में भरने का काम तेजी से हो रहा है, जिसे "कम्प्यूटराइज्ड रेकॉर्ड" कहा जाने लगा है, ताकि ग्राहकों, उपभोक्ताओं और आम जनता को कम से कम तकलीफ़ हो और समय की बचत हो, लेकिन यह कष्टदायी भी हो सकता है... कैसे आईये देखें....
कल्पना कीजिये कि सन २०२८ में एक ग्राहक किसी पिज्जा केन्द्र में फ़ोन करके पिज्जा मँगवाना चाहता है -
ऑपरेटर : पिज्जा के लिये फ़ोन करने का धन्यवाद, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ?
ग्राहक : क्या मैं पिज्जा का ऑर्डर....!
ऑपरेटर : कृपया पहले अपने बहुउपयोगी "स्मार्ट कार्ड" का नम्बर बतायें ।
ग्राहक : ओह... एक मिनट... नम्बर है ७८९७०९३४५-८९६७-९००८६३४ ।
ऑपरेटर :ओके, आप मि. सिंह हैं, जो कि १७, बडा़ कॉम्पलेक्स, आजाद नगर, उज्जैन से बोल रहे हैं । आपका फ़ोन नम्बर २५८७६९३, ऑफ़िस का २५६९८०० और मोबाईल ९८७६५३४५६० है ?
ग्राहक : ये सारे नम्बर आपको कैसे पता चले ?
ऑपरेटर : सर, हम शहर के मुख्य सर्वर से जुडे हुए हैं ।
ग्राहक : अच्छा, मैं एक चिकन पिज्जा का ऑर्डर देना चाहता हूँ...
ऑपरेटर : यह आपके लिये ठीक नहीं है ।
ग्राहक : कैसे ?
ऑपरेटर : आपके कम्प्यूटराइज्ड मेडिकल डाटा के अनुसार आपको ब्लड प्रेशर की शिकायत है और आपका कोलेस्ट्रोल भी बढा हुआ है ।
ग्राहक : ठीक है, ठीक है, फ़िर आप क्या सुझाव देते हैं ?
ऑपरेटर : आपको सलाद पिज्जा मँगवाना चाहिये, वह आप पसन्द करेंगे ।
ग्राहक : आपको कैसे मालूम ?
ऑपरेटर : अभी पिछले हफ़्ते आपने सेंट्रल लायब्रेरी से "सलाद पिज्जा कैसे बनायें" की किताब ली है ।
ग्राहक : (लगभग हार मानते हुए) ठीक है तीन फ़ैमिली साइज के सलाद पिज्जा भिजवा दीजिये, कितना पेमेंट हुआ ?
ऑपरेटर : हाँ यह ठीक है, आपकी नौ लोगों की फ़ैमिली के लिये । वैसे कुल कीमत होगी 5५0 रुपये ।
ग्राहक : क्या मैं क्रेडिट कार्ड से चुका सकता हूँ ?
ऑपरेटर : नहीं सॉरी सर, सिर्फ़ कैश, क्योंकि आपके क्रेडिट कार्ड की सीमा समाप्त हो चुकी है, और आप पर सत्रह हजार का क्रेडिट है ।
ग्राहक : फ़िर तो मुझे ATM तक जाना होगा और कैश लाना होगा ।
ऑपरेटर : आप वह भी नहीं कर सकते, क्योंकि कैश निकालने की प्रतिदिन की सीमा भी आप आज पार कर चुके हैं ।
ग्राहक : (मन ही मन @&*(&#(*^$(^&^) ठीक है आप पिज्जा तो भिजवाईये, मैं कैश ही पेमेंट करता हूँ, कितना समय लगेगा ।
ऑपरेटर : लगभग पैंतालीस मिनट, यदि आपको जल्दी हो तो आप अपनी लाल वाली बाईक से आ सकते हैं, क्योंकि आपकी कार तो आज रिपेरिंग को गई है ।
ग्राहक : ??????????
ऑपरेटर : और कुछ सर ?
ग्राहक : नहीं... वैसे आप मुझे कोक की तीन बोतलें तो मुफ़्त में देंगे ना, जो विज्ञापन में दिखाते हैं ।
ऑपरेटर : वैसे तो हम देते हैं लेकिन आपके इंश्योरेंस के मेडिकल रेकॉर्ड के मुताबिक आपको गैसेस की भी शिकायत है, इसलिये .....
ग्राहक : (अब तो पूरी तरह भड़क जाता है) अबे तेरी तो %^&&*&^%$
ऑपरेटर : सर अपनी भाषा पर कंट्रोल कीजिये, याद कीजिये अपनी जवानी में एक बार 15 जुलाई 2006 को एक पुलिसवाले को गाली देने के जुर्म में आप पर जुर्माना हो चुका है ।
अब तो ग्राहक बेहोश ही हो जाता है ।
तो मित्रों, यह नतीजा होगा... "सेंट्रली कम्प्यूटराइज्ड पर्सन रिकार्ड सिस्टम" का.....

Youth Power in India, Young Generation in India

Written by रविवार, 18 मार्च 2007 11:17

 
देश बनाने के लिये चाहिये क्रांतिकारी युवा


देश, जितना व्यापक शब्द है, उससे भी अधिक व्यापक है यह सवाल कि देश कौन बनाता है ? नेता, सरकारी कर्मचारी, शिक्षक, मजदूर, वरिष्ठ नागरिक, साधारण नागरिक.... आखिर कौन ? शायद ये सब मिलकर देश बनाते होंगे... लेकिन फ़िर भी एक और प्रश्न है कि इनमें से सर्वाधिक भागीदारी किसकी ? तब तत्काल दिमाग में विचार आता है कि इनमें से कोई नहीं, बल्कि वह समूह जिसका ऊपर जिक्र तक नहीं हुआ... जी हाँ... आप सही समझे.. बात हो रही है युवाओं की... देश बनाने की जिम्मेदारी सर्वाधिक युवाओं पर है और वे बनाते भी हैं, अच्छा या बुरा, यह तो वक्त की बात होती है । इसलिये जहाँ एक तरफ़ भारत के लिये खुशी की बात यह है कि हमारी जनसंख्या का पचास प्रतिशत से अधिक हिस्सा पच्चीस से चालीस वर्ष आयु वर्ग का है.. जिसे हम "युवा" कह सकते हैं, जो वर्ग सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक, मानसिक सभी रूपों में सर्वाधिक सक्रिय रहता है, रहना चाहिये भी... क्योंकि यह तो उम्र का तकाजा है । वहीं दूसरी तरफ़ लगातार हिंसक, अशिष्ट, उच्छृंखल होते जा रहे... चौराहों पर खडे़ होकर फ़ब्तियाँ कसते... केतन पारिख और सलमान का आदर्श (?) मन में पाले तथाकथित युवाओं को देखकर मन वितृष्णा से भर उठता है । किसी भी देश को बनाने में सबसे महत्वपूर्ण इस समूह की आज भारत में जो हालत है वह कतई उत्साहजनक नहीं कही जा सकती और चूँकि संकेत ही उत्साहजनक नहीं हैं तो निष्कर्ष का अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है, लेकिन सभी बुराईयों को युवाओं पर थोप देना उचित नहीं है ।

क्या कभी किसी ने युवाओं के हालात पर गौर करने की ज़हमत उठाई है ? क्या कभी उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश की है ? स्पष्ट तौर पर नहीं... आजकल के युवा ऐसे क्यों हैं ? क्यों यह युवा पीढी़ इतनी बेफ़िक्र और मनमानी करने वाली है । जाहिर है जब हम वर्तमान और भविष्य की बातें करते हैं तो हमें इतिहास की ओर भी देखना होगा । भूतकाल जैसा होगा, वर्तमान उसकी छाया मात्र है और भविष्य तो और भी खराब होगा । सुनने-पढ़ने में ये बातें भले ही निराशाजनक लगें, लेकिन ठंडे दिमाग से हम अपने आप से पूछें कि आज के युवा को पिछली पीढी़ ने 'विरासत' में क्या दिया है, कैसा समाज और संस्कार दिये हैं ? पिछली पीढी़ से यहाँ तात्पर्य है आजादी के बाद देश को बनाने (?) वाली पीढी़ । इन लगभग साठ वर्षों मे हमने क्या देखा है... तरीके से संगठित होता भ्रष्टाचार, अंधाधुंध साम्प्रदायिकता, चलने-फ़िरने में अक्षम लेकिन देश चलाने का दावा करने वाले नेता, घोर जातिवादी नेता और वातावरण, राजनीति का अपराधीकरण या कहें कि अपराधियों का राजनीतिकरण, नसबन्दी के नाम पर समझाने-बुझाने का नाटक और लड़के की चाहत में चार-पाँच-छः बच्चों की फ़ौज... अर्थात जो भी बुरा हो सकता था, वह सब पिछली पीढी कर चुकी । इसका अर्थ यह भी नहीं कि उस पीढी ने सब बुरा ही बुरा किया, लेकिन जब हम पीछे मुडकर देखते हैं तो पाते हैं कि कमियाँ, अच्छाईयों पर सरासर हावी हैं ।

अब ऐसा समाज विरासत में युवाओं को मिला है, तो उसके आदर्श भी वैसे ही होंगे । कल्पना करके भी सिहरन होती है कि यदि राजीव गाँधी कुछ समय के लिये (कुछ समय इसलिये क्योंकि पाँच वर्ष किसी देश की आयु में बहुत कम वक्फ़ा होता है) इस देश के प्रधानमन्त्री नहीं बने होते, तो हम आज भी बैलगाडी़-लालटेन (इसे प्रतीकात्मक रूप में लें) के युग में जी रहे होते । देश के उस एकमात्र युवा प्रधानमन्त्री ने देश की सोच में जिस प्रकार का जोश और उत्साह पैदा किया, उसी का नतीजा है कि आज हम कम्प्यूटर और सूचना तन्त्र के युग में जी रहे हैं (जो वामपंथी आज "सेज" बनाने के लिये लोगों को मार रहे हैं उस वक्त उन्होंने राजीव गाँधी की हँसी उडाई थी और बेरोजगारी-बेरोजगारी का हौवा दिखाकर विरोध किया था) । "दिल्ली से चलने वाला एक रुपया नीचे आते-आते पन्द्रह पैसे रह जाता है" यह वाक्य उसी पिछ्ली पीढी को उलाहना था, जिसकी जिम्मेदारी आजादी के बाद देश को बनाने की थी, और दुर्भाग्य से कहना पड़ता है कि, उसमें वह असफ़ल रही । यह तो सभी जानते हैं कि किसी को उपदेश देने से पहले अपनी तरफ़ स्वमेव उठने वाली चार अंगुलियों को भी देखना चाहिये, युवाओं को सबक और नसीहत देने वालों ने उनके सामने क्या आदर्श पेश किया है ? और जब आदर्श पेश ही नहीं किया तो उन्हें "आज के युवा भटक गये हैं" कहने का भी हक नहीं है । परिवार नियोजन और जनसंख्या को अनियंत्रित करने वाली पीढी़ बेरोजगारों को देखकर चिन्तित हो रही है, पर अब देर हो चुकी । भ्रष्टाचार को एक "सिस्टम" बना देने वाली पीढी युवाओं को ईमानदार रहने की नसीहत देती है । देश ऐसे नहीं बनता... अब तो क्रांतिकारी कदम उठाने का समय आ गया है... रोग इतना बढ चुका है कि कोई बडी "सर्जरी" किये बिना ठीक होने वाला नहीं है । विदेश जाते सॉफ़्टवेयर या आईआईटी इंजीनियरों तथा आईआईएम के मैनेजरों को देखकर आत्ममुग्ध मत होईये... उनमें से अधिकतर तभी वापस आयेंगे जब "वहाँ" उनपर कोई मुसीबत आयेगी, या यहाँ "माल" कमाने की जुगाड़ लग जायेगी ।

हमें ध्यान देना होगा देश में, कस्बे में, गाँव में रहने वाले युवा पर, वही असली देश बनायेंगे, लेकिन हम उन्हें बेरोजगारी भत्ता दे रहे हैं, आश्वासन दे रहे हैं, राजनैतिक रैलियाँ दे रहे हैं, अबू सलेम, सलमान खान और संजय दत्त को हीरो की तरह पेश कर रहे हैं, पान-गुटखे दे रहे हैं, मर्डर-हवस दे रहे हैं, "कैसे भी पैसा बनाओ" की सीख दे रहे हैं, कानून से ऊपर कैसे उठा जाता है, "भाई" कैसे बना जाता है बता रहे हैं....आज के ताजे-ताजे बने युवा को भी "म" से मोटरसायकल, "म" से मोबाईल और "म" से महिला चाहिये होती है, सिर्फ़ "म" से मेहनत के नाम पर वह जी चुराता है...अब बुर्जुआ नेताओं से दिली अपील है कि भगवान के लिये इस देश को बख्श दें, साठ पार होते ही राजनीति से रिटायरमेंट ले लीजिये, उपदेश देना बन्द कीजिये, कोई आदर्श पेश कीजिये... आप तो पूरा मौका मिलने के बावजूद देश को अच्छा नहीं बना सके... अब आगे देश को चलाने का मौका युवाओं को दीजिये... देश तो युवा ही बनाते हैं और बनायेंगे भी... बशर्ते कि सही वातावरण मिले, प्रोत्साहन मिले... और "म" से मटियामेट करने वाले ("म" से एक अप्रकाशनीय, असंसदीय शब्द) नेता ना हों.... आमीन...

Save Water, Save Environment, Green Man in India

Written by शनिवार, 17 मार्च 2007 20:04
हरित मानव का पुनरागमन

लापोडिया (राजस्थान) में विगत वर्ष बहुत ही अल्प बारिश हुई । गाँव में वैसे तो तीन विशाल आकार के तालाब, जिनका नामकरण सौन्दर्यशास्त्र के आधार पर अन्नासागर, देवसागर और फ़ूलसागर... खाली पडे़ हुए थे । परन्तु, लापोडिया, जो सूरज की तीव्रता से झुलसता हुआ एक छोटी सी बस्ती वाला गाँव है और जयपुर से ८० किलोमीटर दूरी पर दक्षिण-पश्चिम मे स्थित है, में ना तो झुलसती हुई धरती को शांत करने के लिये कोई यज्ञ आयोजित किये गये और ना ही पानी के अतिरिक्त टैंकरों की जरूरत महसूस की गई । जो थोडे लोग गाँव छोडकर गये वे भी जयपुर में रोजगार की तलाश में गये थे ।

लेकिन आज अन्य गाँवों से भिन्न लापोडिया के कुँए पानी से लबालब भरे हुए हैं । खेत के किनारे हरी पत्तियों वाली साग-सब्जी, पालक, मैथी, आलू, मूली आदि से पटे हैं । हर परिवार के पास अलग से अतिरिक्त स्थान है, जिसमें उन्होंने पशु आहार के लिये ताजा हरा चारा उगा रखा है । गाँव से प्रतिदिन १६ हजार लीटर दूध का विक्रय होता है । यहाँ पर वृक्ष जैसे - नीम, पीपल, पान, खैर, देशी बबूल आदि की बहार है और पूरा गाँव सैकडों अजनबी पक्षियों की चहचहाहट से रोमांचित हो उठता है, जिसे एक पक्षी प्रेमी ही समझ सकता है । यह सारा दृश्य एक पक्षी अभयारण्य का रूप अख्तियार कर लेता है ।

लापोडिया को कोई दैवीय आशीर्वाद प्राप्त नहीं हो गया है, यह सब चमत्कार है श्री लक्ष्मण सिंह की बाजीगरी का । एक ऐसा ग्रामीण व्यक्ति, जो किसी महाविद्यालय में अध्ययन के लिये नहीं गया, किन्तु उसने दिन-प्रतिदिन के अपने अनुभवों एवं पारम्परिक ज्ञान को गूँथकर जल-संग्रहण की एक अनूठी पद्धति विकसित की । जिसका नाम उसने "चोका" रखा - जो एक छोटे बाँध के स्वरूप में जटिल ग्रिड वाली संरचना है, जिसमें पानी की हर बूँद जो धरा के ऊपर और भीतर मौजूद है, को संग्रहीत किया जाता है । पूर्व में जो पानी ऊपर मौजूद था, वह या तो खपत हो जाता था या सूख जाता था, किन्तु भूमिगत जल जो धरती के अन्दर है, छुपा ही रहता था । इस पानी में गाँव के १०३ कुँए कभी नहीं सूखने देने की क्षमता मौजूद थी । लक्ष्मणसिंह की इस ठेठ देशी सोच नेण दूर तक बसे लोगों का ध्यान आकर्षित किया । दो वर्ष पूर्व सूखे से झुलसते हुए अफ़गानिस्तान का एक प्रथिनिधिमण्डल पूर्वी राजस्थान के इस गाँव में लक्ष्मणसिंह से जल संग्रहण की इस तकनीक को करीब से जानने-समझने के उद्देश्य से आया था । मध्यप्रदेश शासन ने भी एक अध्ययन दल भेजा, राजस्थान सरकार भी लापोडिया के उदाहरण को लेकर एक "हैण्डबुक" निकालने जा रही है । किन्तु इन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अडोस-पडो़स के कई गाँवों जैसे जयपुर जिले के मेत, चापियाँ एवं ईटनखोई तथा टोंक जिले के बालापुरा, सेलसागर और केरिया में "चोका पद्धति" सफ़लतापूर्वक अंगीकार की गई है ।

५१ वर्षीय लक्ष्मणसिंह जो अपना स्वयं का एक एनजीओ "ग्राम विकास नवयुवक मण्डल" चलाते हैं, का कहना है कि अन्या गाँवों में भी इस काम को बखूबी अंजाम दे रहे हैं" । २०० परिवारों की बस्ती वाला यह गाँव पहले कभी ऐसा नहीं था । लापोडिया का शाब्दिक अर्थ है "झक्की लोग" जो एक सन्देहपूर्ण नाम इसके झगडालू प्रवृत्ति वाले लोगों के कारण मिला होगा । लक्ष्मण सिंह जी के पिता एक जमींदार थे, कहते हैं कि वे सब कुछ बदल देना चाहते है, जो लोग इस गाँव के बारे में धारणा बनाये हुए हैं । एक दिन टोंक जिले के समीप स्थित पारले गाँव का भ्रमण करते हुए वे एक "बुण्ड" (कच्ची मिट्टी की दीवारें) के सम्पर्क में आये । सिंह कहते हैं कि इनको देखकर ही उनके मस्तिष्क में "चोका पद्धति" को विकसित करने के बीज अंकुरित हुए । अगले पाँच वर्ष तक वे "बुण्ड" के आसपास के वातावरण का अवलोकन करते रहे और जल संरक्षण की इस तकनीक को विकसित करने में जुट गये ।

इसकी आधारभूत संरचना काफ़ी सरल है, इसमें बारिश का पानी जो धरती द्वारा सोख जाता है वाष्प बनकर उड़ता नहीं है और यदि रोका जाये तो इसका उपयोग जब जरूरत हो तब किया जा सकता है । इस तरह से धरती के भीतर मौजूद पानी की हर बूँद को संरक्षित किया जा सकता है । सिंह इस दिशा एवं विचार पर काम करना शुरू किया, और वे कहते हैं कि "मैं जिला अधिकारियों के पास सहायता के लिये गया, किन्तु वे मुझ पर हँसे और उन्होंने मुझसे कहा कि यह सम्भव नहीं है, और पूछा कि तुम किस महाविद्यालय मे अध्ययन के लिये गये हो ?" वर्ष १९९४ के लगभग सिंह ने एक "चोका मॉडल" विकसित कर लिया था । अब इसका लाभ स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, यह सब आँखों के सामने है । नंगी आँखों से चरागाह सूखे दिखाई पडते हैं, लेकिन यह छोटी घास से भरे पडे हैं, जिसमें पालतू पशु चरते हैं । विगत आठ वर्षों से बारिश नियमित नहीं है किन्तु कुँए भरे हुए हैं । गाँव वालों ने सामूहिक पद्धति और सहमति रखकर ५०% भूमि पर ही खेती-बाडी़ करने का निर्णय ले रखा है । इसी तरह कुँए भी सिंचाई के लिये सुबह के वक्त ही उपयोग में लिये जाते हैं ।
सिंह कहते हैं कि "हमें प्रकृति से वही लेना चाहिये जो वह हमें गर्व से और सहर्ष दे, यदि आप जोर-जबर्दस्ती से कुछ छीनना चाहेंगे तो प्रकृति स्वयं की संपूर्ति और आपकी आपूर्ति नहीं कर सकती" । 

परिणामस्वरूप आज लापोडिया में पक्षी बिना भय के चहचहाते हैं और खेत-खलिहान में हरियाली बिछी हुई है ।

Beggers and Begging in India as Career

Written by गुरुवार, 15 मार्च 2007 19:39



 

भीख और भिखारी : उम्दा व्यवसाय ? 

उक्त समाचार १५.०३.२००७ के "नईदुनिया" में छपा है....जरा सोचिये जब ३६ हजार की सिर्फ़ प्रीमियम है तो बीमा कितने का होगा और उसकी कमाई कितनी होगी ?
संभाजी काले और उनका चार सदस्यों वाला परिवार रोजाना एक हजार रुपये कमाता है, उनके बैंक खाते में कभी भी चालीस हजार रुपये से कम की रकम नहीं रही है । उन्होंने कई कम्पनियों में निवेश भी किया है, उनका एक फ़्लैट मुम्बई के उपनगर विरार में है और सोलापुर में पुश्तैनी जमीन तथा दो मकान हैं । आप सोच रहे होंगे, क्या यह परिवार शेयर ब्रोकर है ? या मध्यम वर्ग का कोई व्यापारी ? जी नहीं, संभाजी काले साहब अपने पूरे परिवार के साथ मुंबई में भीख माँगते हैं । चौंकिये नहीं, यह सच है और ऐसी ही चौंकाने वाली जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं जब "सोशल डेवलपमेंट सेंटर" (एसडीसी) मुम्बई के छात्रों नें डॉ.चन्द्रकान्त पुरी के निर्देशन में एक सामाजिक सर्वे किया । सर्वे के मुताबिक संभाजी काले जैसे कई और भिखारी (?) मुम्बई में मौजूद हैं । चूँकि सर्वे पूरी तरह से निजी था (सरकारी नहीं) इसलिये कुछ भिखारियों ने अपनी सही-सही जानकारी दे दी, लेकिन अधिकतर भिखारियों ने अपनी सम्पत्ति और आय के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताया । फ़िर भी सर्वे करने वालों ने बडी मेहनत से कई चौंकाने वाले आँकडे खोज निकाले हैं । संभाजी काले के अनुसार वे पच्चीस साल पहले मुम्बई आये थे । कई छोटी-मोटी नौकरियाँ की, शादी की, कई सपने देखे, लेकिन पाया कि एक धोखाधडी के चलते वे सड़क पर आ गये हैं । फ़िर उन्होंने तय किया कि वे सपरिवार भीख माँगेंगे । ट्रैफ़िक सिअगनल के नीचे रखे लकडी के बडे खोके की ओर इशारा करते हुए वे कहते हैं "यही मेरा घर है" । काले का बाकी परिवार खार (मुम्बई का एक उपनगर) में रहता है, विरार में नहीं जहाँ उनका फ़्लैट है, क्योंकि खार से अपने "काम" की जगह पर पहुँचना आसान होता है । विरार तक आने जाने में समय भी खराब होता है । काले परिवार का सबसे बडा लडका सोमनाथ सबसे अधिक भीख कमाता है, क्योंकि वह अपनी एक टाँग खो चुका है (एक बार बचपन में भीख माँगते वक्त वह कार के नीचे आ गया था) । काले परिवार में तीन बच्चे और हैं - दो लड़कियाँ और एक लड़का । कुल जमा छः लोग भीख माँगकर आराम से एक हजार रुपये कमा लेते हैं । काले कहते हैं कि बुरे से बुरे दिनों में भी (अर्थात जब मुम्बई महानगरपालिका उन्हें अचानक खदेडने लग जाये, बन्द का ऐलान हो जाये, कर्फ़्यू लग जाये, लगातार दो-तीन दिन छुट्टी आ जाये आदि) वे तीन-चार सौ रुपये तो कमा ही लेते हैं । इस भिखारी परिवार को खार में बहुतेरे लोग जानते हैं और मजेदार बात यह है कि बैंक के कागजात या चिट्ठी-पत्री आदि भी उन तक पहुँच जाती हैं । उनका कहना है कि यह सब उनके अच्छे व्यवहार और पोस्टमैन से "सेटिंग" की वजह से हो पाता है । उक्त सर्वे के अनुसार प्रत्येक भिखारी औसतन प्रतिदिन दो-तीन सौ रुपये तो कमा ही लेता है और उनकी पसन्दीदा जगहें होती हैं ट्रैफ़िक सिग्नल और धार्मिक स्थान । पुरी साहब के अनुसार मात्र पन्द्रह प्रतिशत भिखारी ही असली भिखारी हैं, जिनमें से कुछ वाकई गरीब हैं । जिनमें से कुछ विकलांग हैं, कुछ ऐसे हैं जिन्हें उनके बेटों ने घर से निकाल दिया है, बाकी के पिचासी प्रतिशत भिखारी सिर्फ़ इसी "काम" के लिये अपने गाँव से मुम्बई आये हैं । वे बाकायदा छुट्टी मनाते हैं, अपने गाँव जाते हैं, होटलों में जाते हैं । उस वक्त वे अपनी "जगह" या "सिग्नल" दूसरे भिखारी को लीज पर दे देते हैं और प्रतिशत के हिसाब से उनसे पैसे वसूलते हैं । इच्छित जगह पाने के लिये कभी-कभी इनमें भयंकर खून-खराबा भी होता है और इनके गैंग लीडर (जो कि कोई स्थानीय दादा या किसी विख्यात नेता का गुर्गा होता है) बाकायदा मामले सुलझाते हैं, जाहिर है इसमें अंडरवर्ल्ड की भी भूमिका होती है । अपने-अपने इलाके पर कब्जे को लेकर इनमें गैंगवार भी होते रहते हैं । भिखारियों के अलग-अलग समूह बनाकर उनका वर्गीकरण किया जाता है, बच्चों को पहले चोरी करना, जेब काटना और ट्रेनों में सामान पार करना सिखाया जाता है, फ़िर उनमें से कुछ को भीख माँगने के काम में लिया जाता है । एक बार सरकार ने भिखारियों के पुनर्वास के लिये इन्हें काम दिलवाने की कोशिश की लेकिन कुछ दिनों के बाद वे पुनः भीख माँगने लगे । मुम्बई में लगभग एक लाख भिखारी हैं, इनके काम के घंटे बँधे होते हैं । शाम का समय सबसे अधिक कमाई का होता है । धार्मिक महत्व के दिनों के अनुसार वे अपनी जगहें बदलते रहते हैं । मंगलवार को सिद्धिविनायक मन्दिर के बाहर, बुधवार को संत माईकल चर्च, शुक्रवार को हाजी अली दरगाह और रविवार को महालक्ष्मी मन्दिर में उनका धन्धा चमकदार होता है । यह खबर भी अधिक पुरानी नहीं हुई है कि राजस्थान के पुष्कर में एक भिखारी करोडपति है और बाकायदा मोटरसायकल से भीख माँगने आता है । तिरुपति में एक भिखारी ब्याज पर पैसे देने काम करता है ।

इसलिये भविष्य में किसी भिखारी को झिडकने से पहले सोच लीजिये कि कहीं वह आपसे अधिक पैसे वाला तो नहीं है ? और सबसे बडी बात तो यह कि क्या आप उसे भीख देंगे ?

तो भाईयों सॉफ़्टवेयर इंजीनियर नहीं बन सकें, तो एक चमकदार कैरियर (वो भी टैक्स फ़्री) आपका इंतजार कर रहा है .... smile_teeth