(१) प्रोफ़ेसर पी.एन.ओक की मूल मराठी पुस्तक (जो कि इन्दिरा गाँधी द्वारा प्रतिबन्धित कर दी गई थी) की PDF फ़ाईल यहाँ क्लिक करके प्राप्त की जा सकती है (साईज 25 MB है) ।
(२) प्रोफ़ेसर पीएन ओक के सवालों का हिन्दी अनुवाद यहाँ पर उपलब्ध है ।
(३) लाल किले और ताजमहल सम्बन्धी तस्वीरों वाले प्रमाण स्टीफ़न नैप की साईट पर (यहाँ क्लिक करें) उपलब्ध हैं ।
ताजमहल पर जो देश भर में नौटंकी चल रही है वह एक अलग विषय है । ताजमहल सच में ताजमहल है या "तेजोमहालय" नामक एक शिव मन्दिर, इस बात पर भी काफ़ी बहस हो चुकी है । इस मुद्दे को लेकर सरकार, वामपंथियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों (?) से कुछ प्रश्न हैं -
(अ) ताजमहल के पुरातात्विक निर्माणों का C-14 (कार्बन-१४) टेस्ट करने में क्या आपत्ति है ? क्यों नहीं केन्द्र सरकार या ASI किसी विशेषज्ञ लेबोरेटरी (देशी और विदेशी दोनों) से ताज के कुछ हिस्सों का कार्बन-१४ टेस्ट करवाती ?
(ब) ताजमहल में जो कमरे वर्षों से बन्द हैं, उन्हें किसी निष्पक्ष संस्था के साये में खोलकर देखने में क्या आपत्ति है ? कुछ कमरों को तो दीवार में चुनवा दिया गया है, उन्हें खोलने में क्या आपत्ति है ?
पीएन ओक एवं एक निष्पक्ष व्यक्ति स्टीफ़न नैप के शोधों को मात्र बकवास कहकर खारिज नहीं किया जा सकता । ताजमहल की कुछ मंजिलें सन १९६० तक खुली थीं लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद उसे बन्द कर दिया गया, उसे पुनः खोलने के लिये हमारे धर्मनिरपेक्ष बन्धु क्यों प्रयत्न नहीं करते ? दरअसल इन लोगों के मन में यह आशंका है कि कहीं उन बन्द कमरों से कोई हिन्दू मूर्तियाँ निकल आईं या कोई शिलालेख निकल आया जो यह साबित करता हो कि ताजमहल का निर्माण उसके बताये हुए वर्ष से कहीं पहले हुआ था, तो सरकार के लिये एक नया सिरदर्द पैदा हो जायेगा और संघ परिवार को बैठे-बिठाये एक मुद्दा मिल जायेगा, लेकिन सिर्फ़ इस आशंका के चलते इतिहास के एक महत्वपूर्ण पन्ने को जनता से दूर नहीं रखा जा सकता । जब डायनासोर के अंडे की उम्र पता की जा सकती है तो फ़िर ताज क्या चीज है ? और हमारे महान इतिहासकारों के पास उस जमाने के कई कागजात और दस्तावेज मौजूद हैं, फ़िर जरा सा शोध करके ताजमहल को बनवाने के लिये शाहजहाँ के दरबार का हुक्मनामा, उसकी रसीदें इत्यादि, सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत करें, इससे दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा और "तेजोमहालय" के समर्थकों का मुँह हमेशा के लिये बन्द हो जायेगा । ऊपर उल्लेखित मात्र दोनों कृत्यों से ही असलियत का पता चल सकता है फ़िर केन्द्र सरकार ये दोनो काम क्यों नहीं करवाती ?

ताजमहल पर जारी मूर्खता

Written by बुधवार, 13 जून 2007 16:31
ताजमहल को लेकर हमारे देश में एक मुहिम चलाई जा रही है, एसएमएस भेजो, ईमेल करो, रैली निकालो, तस्वीरें छपवाओ, अपीलें जारी करो, और भी ना जाने क्या-क्या । जिससे कि ताज को सात आश्चर्यों में शामिल करवाया जा सके । अव्वल तो यह शायद ही हो, और मान लो चलो ताज सात आश्चर्यों में आ भी गया, तो उससे क्या होगा ? समर्थक कहते हैं - इससे पर्यटन बढेगा, ताज के संरक्षण के लिये विदेशी मदद मिलेगी, देश का गौरव बढेगा... आदि-आदि...
एक बात समझ में नहीं आती कि यदि ताज "सेवन वंडर्स" में नहीं आ पाया तो पर्यटन कैसे घटेगा, जबकि सरकारी संस्थायें गला फ़ाड़-फ़ाड़कर हमें बता रही हैं कि भारत में पर्यटन पच्चीस प्रतिशत की दर से बढ रहा है, फ़िर ताजमहल उसमें कितना बदलाव ला पायेगा ? क्या विदेशी पर्यटन पचास प्रतिशत तक पहुँच जायेगा ? या विदेशी लोग ताज देखने आना बन्द कर देंगे ? अरे, जब खजुराहो जैसी घटियातम सुविधाओं के बावजूद वे वहाँ जाते हैं तो ताजमहल तो वे देखेंगे ही चाहे वह "अजूबों" में शामिल हो या ना हो । दूसरी बात, ताज के संरक्षण के लिये विदेशी मदद की । जो लाखों मूर्ख रोजाना करोडों एसएमएस भेज रहे हैं, यदि उनसे सिर्फ़ एक रुपया प्रति व्यक्ति लिया जाये (SMS के तीन रुपये लगते हैं) तो भी करोडों रुपया एकत्रित होता है जो ताज के संरक्षण के लिये काम में लिया जा सकता है, और विदेशी मदद मिल भी गई तो क्या कर लेंगे ? विदेशी मदद तो झुग्गी-झोंपडी हटाने के लिये हर साल लाखों डालर मिलती है, झाबुआ के आदिवासियों की दशा सुधारने के लिये भी कई बार विदेशी मदद मिली, उसका क्या होता है पता नहीं है क्या ? हम तो इतने बेशर्म हैं कि अपनी आस्था की केन्द्र गंगा को साफ़ करने / रखने के लिये भी विदेशी मदद ले लेते हैं, और उसी में अपना कूडा़ डालते रहते हैं । एक तरफ़ ताज को स्थान दिलाने के नाम पर कई कम्पनियाँ और ग्रुप नोट छाप रहे हैं, दूसरी तरफ़ राष्ट्रपति चुनाव के लिये सौदेबाजी के तहत माया के खिलाफ़ ताज कॉरीडोर मामले में मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं दी गई, ये है हमारे देश का चरित्र....। और फ़िर ताजमहल को उक्त स्थान दिलाकर उसके साथ क्या करने वाले हो... वहाँ जाकर प्लास्टिक की बोतलें फ़ेंकेगे, जगह-जगह मूतेंगे, दीवारों पर खोद-खोद कर दिल का आकार और "आई लव यू" लिखेंगे, चारों ओर झुग्गियाँ बनाकर जमीनों पर कब्जा करेंगे, यमुना को नाला तो पहले ही बना दिया है, अब कीचड़ भरा डबका बनाओगे... क्या-क्या करोगे ? खोखला देशप्रेम अपने पास ही रहने दो भाईयों, नौजवानों की "अंगूठा-टेक" पीढी़ (एसएमएस के लिये अंगूठा ही लगता है ना !) पैसे का मोल क्या जाने, कईयों को तो आसानी से मिला है, कईयों के बाप अपना-अपना पेट काटकर नौनिहालों के हाथ में मोबाईल सजाये हुए हैं... कल ये लोग कहेंगे कि सूरज पूरब से निकलता है या नहीं SMS भेजो, तुम्हारा बाप तुम्हारा ही है या नहीं, कम से कम सौ SMS भेजो...

फ़िल्मों की शाश्वत घटनायें...

Written by शनिवार, 09 जून 2007 13:12
भारत में हर साल औसतन (सभी भाषाओं को मिलाकर) लगभग एक हजार फ़िल्में बनती हैं, जो कि विश्व में सर्वाधिक हैं । जाहिर है कि फ़िल्में हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन गई हैं और जैसा कि मैंने "फ़िल्मी मौत : क्या सीन है" में कहा था कि हम हिन्दी फ़िल्मों से प्यार करते हैं । वे अच्छी हो सकती हैं, बुरी हो सकती हैं, लेकिन आम जन के जीवन और समाज पर उनके सकारात्मक या नकारात्मक प्रभावों को खारिज नहीं किया जा सकता है । हिन्दी फ़िल्मों के जन्म से लेकर आज तक या कहें कि आलमआरा से लेकर धूम-२ तक हिन्दी फ़िल्मों ने काफ़ी उतार-चढाव देखे हैं और तकनीकी बदलाव लाये हैं, लेकिन यहाँ हम हिन्दी फ़िल्मों के कुछ ऐसे दृश्यों का जिक्र करने जा रहे हैं, जो सालों से लाखों फ़िल्मों के बन जाने के बाद भी नहीं बदले हैं । ना.. ना.. मैं उन "टिपिकल" फ़ार्मूलों के बारे में नहीं कह रहा हूँ, कि दो भाई कुंभ के मेले में बिछडेंगे और अन्त में ताबीज या गोदना देखकर आपस में भै...या!! कहते हुए लिपट जायेंगे, या कि कलफ़ लगे कडक कपडे पहने और तिलक लगाये डाकू का हृदय परिवर्तन हो जायेगा (पुलिस के आने से पहले), या कि गरीब हीरो और अमीर हीरोईन की प्रेम-कहानी जिसमें लडकी का बाप सिगार पीते हुए हीरो के सामने चेकबुक रख देता है और मूर्ख (जी हाँ) हीरो उसे ठुकरा देता है, ना ही इस पर बात होगी कि मरियल सा हीरो दस-बीस गुंडों को कैसे धूल चटाता है, कैसे वह कार या मोटर-साईकल की रेस लगाकर हीरोईन को बचाता है, भले ही हीरो के बाप ने कभी साईकल भी नहीं चलाई हो.. ये सब बातें तो "कॉमन" हैं...। हम बात करने जा रहे हैं कुछ विशिष्ट दृश्यों की या कहें घटनाक्रमों की । इन दृश्यों और संवादों को हिन्दी फ़िल्मों में इतनी बार दोहराया जा चुका है कि मेरे बेटे को भी याद हो चला है कि यदि धर्मेन्द्र है तो वह कम से कम एक बार "कु...त्ते ~!!" जरूर बोलेगा । "माँ..." और "भगवान के लिये मुझे छोड़ दो.." (हालांकि इस संवाद पर एक फ़िल्म में शक्ति कपूर ने बडे़ मजेदार अन्दाज में कहा था - भगवान के लिये तुम्हें छोड दूँगा तो मैं क्या लूँगा...परसाद !!), ढीली-ढाली पैंट वाले पुलिसिये के मुँह से "यू आर अंडर अरेस्ट.." भी जब-तब हमें सुनाई दे ही जाता है...।
यदि हीरो गरीब है तो भी उसका घर बहुत बडा़ होगा और उसकी माँ जबरन खाली डब्बे उलट-पुलट करते हुए आँसू बहाती रहेगी (ये नहीं कि बडा घर बेचकर छोटा ले लें)। लीला चिटणीस और सुलोचना की आँखें तो सिलाई मशीन पर काम करते-करते ही खराब हुई होंगी, और निरुपा राय की ग्लिसरीन लगा-लगा कर । मुस्टण्डे हीरो का सारा घर-खर्चा सिलाई मशीन से निकलता है और वो नालायक बगीचे में हीरोईन से पींगें बढा रहा होता है । कोई-कोई हीरो जब भी टेनिस या बैडमिंटन का मुकाबला या कप जीतकर आता है तो माँ उसके लिये गाजर का हलवा या खीर जरूर बनाती है, कभी-कभार आलू का पराँठा भी चल जाता है, सारे हीरो की पसन्द का मेनू यही है । बेरोजगार और निकम्मा होते हुए भी हीरोईन के साथ बगीचे की घास पर ऐसे मस्तायेगा जैसे बगीचा उसके बाप का ही हो । इसी प्रकार पुलिस के फ़िल्म के अन्त में ही पहुँचने की महान परम्परा रही है, जब विलेन पिट-पिट कर अधमरा हो जायेगा, तब इफ़्तेखार साहब कहेंगे "कानून को अपने हाथ में मत लो विजय..." (और विजय भी तड़ से मान जायेगा, जैसे कानून कोई काँच का बरतन हो)। विलेन को पिटते देखना भी अपने-आप में एक दावत की तरह ही होता है, विलेन की एक भी गोली हीरो को छू जाये मजाल है ? उसके अड्डे पर तमाम जलती-बुझती लाईटें देखकर लगता है कहीं वह इलेक्ट्रीशियन तो नहीं ! आलमारी में से तहखाने का दरवाजा तो विलेन के अड्डे का जरूरी अंग है, और हमारे लगभग सारे विलेन पैकिंग और ढुलाई के काम को साइड-बिजनेस के रूप में करते होंगे, तभी तो आज तक मुझे यह नहीं पता चला कि हर विलेन के अड्डे पर खाली ड्रम और खाली खोके क्यों रखे रहते हैं.. अन्तिम संघर्ष में जाने कितने सब्जी भरे ठेलों को उलटाया जाता है और थर्माकोल की दीवारों को नष्ट किया जाता है (इसी कारण सब्जियाँ और थर्माकोल महंगा भी हो गया है)। सबसे पवित्र सीन जो राजकपूर साहब के पहले भी था, बाद में भी है और सदा रहेगा, वह है हीरोईन के नहाने का सीन । हीरोईनों को नहाने का इतना शौक होता है कि वे जलसंकट की रत्तीभर परवाह नहीं करतीं । "जिस देश में गंगा बहती है" से लेकर "मोहरा" तक हीरोईनों ने मात्र नहाने में इतना पानी बर्बाद किया है कि भाखडा़-नंगल और हीराकुंड को भी शर्म आ जाये। हिन्दी फ़िल्मों के डाकू अभी भी घोडों पर ही हैं, जबकि चम्बल के असली डाकुओं ने खुली अर्थव्यवस्था को अपनाते हुए हीरो होंडा और स्कोडा ले ली है । फ़िल्मी माँओं-बहनों ने तो हाथ से थाली गिराने में मास्टरी हासिल कर ली है, बुरी खबर सुनते वक्त अधिकतर उनके हाथ में थाली होती ही है... न...~~हीं...!! कहते हुए झन्न से थाली हाथ से छोडी.. (अरी मूढ़ धीरे से रख भी तो सकती थी), अब तक न जाने कितनी थालियों में अनगिनत टोंचे पड़ गये होंगे ।
वैसे आजकल फ़िल्मों में वक्त के साथ काफ़ी बदलाव आ गये हैं, हीरो की माँ अब बूढी़ नहीं होती, बल्कि रीमा लागू जैसी ग्लैमरस और सेक्सी होती है, गोदरेज के रहते उसके बाल सफ़ेद होने का तो अब सवाल ही नहीं । धारावाहिकों में भी हीरो जब माँ कहता है तभी पता चलता है कि ये उसकी माँ है, माशूका नहीं...। हीरो भी आजकल कम्प्यूटर पर काम करने लगा है (कम से कम ऐसा अभिनय तो वह करता ही है), हीरोईनों का नहाना भी इधर आजकल कुछ कम हो चला है (जलसंकटग्रस्त लोगों के लिये खुश होने का मौका), क्योंकि उन्हें अब कपडे़ उतारने के लिये नहाने का बहाना करने की जरूरत नहीं रही । डाकू और गुण्डे भी हमारे आसपास के लोगों जैसे ही दिखने लगे हैं (सत्या, वास्तव आदि) । कहने का तात्पर्य यह कि बदलाव तो आ रहा है, लेकिन धीरे-धीरे, तब तक हमें यदा-कदा इन दृश्यों को झेलने को तैयार रहना चाहिये...

फ़िल्मी मौत : क्या सीन है !

Written by रविवार, 03 जून 2007 11:02
हिन्दी फ़िल्मों से हम प्यार करते हैं वे कैसी भी हों, हम देखते हैं, तारीफ़ करते हैं, आलोचना करते हैं लेकिन देखना नहीं छोडते, इसी को तो प्यार कहते हैं । हमारी हिन्दी फ़िल्मों में मौत को जितना "ग्लैमराईज" किया गया है उतना शायद और कहीं नहीं किया गया होगा । यदि हीरो को कैन्सर है, तो फ़िर क्या कहने, वह तो ऐसे मरेगा कि सबकी मरने की इच्छा होने लगे और यदि उसे गोली लगी है (वैसे ऐसा कम ही होता है, क्योंकि हीरो कम से कम चार-छः गोलियाँ तो पिपरमेंट की गोली की तरह झेल जाता है, वो हाथ पर गोली रोक लेता है, पीठ या पैर में गोली लगने पर और तेज दौडने लगता है), खैर... यदि गोली खाकर मरना है तो वह अपनी माँ, महबूबा, दोस्त, जोकरनुमा कॉमेडियन, सदैव लेटलतीफ़ पुलिस आदि सबको एकत्रित करने के बाद ही मरता है । जितनी देर तक वो हिचकियाँ खा-खाकर अपने डॉयलॉग बोलता है और बाकी लोग मूर्खों की तरह उसका मुँह देखते रहते हैं, उतनी देर में तो उसे गौहाटी से मुम्बई के लीलावती तक पहुँचाया जा सकता है । हीरो गोली खाकर, कैन्सर से, कभी-कभार एक्सीडेंट में मरता तो है, लेकिन फ़िर उसकी जगह जुडवाँ-तिडवाँ भाई ले लेता है, यानी कैसे भी हो "फ़ुटेज" मैं ही खाऊँगा ! साला..कोई हीरो आज तक सीढी से गिरकर या प्लेग से नहीं मरा ।

चलो किसी तरह हीरो मरा या उसका कोई लगुआ-भगुआ मरा (हवा में फ़डफ़डाता दीपक अब बुझा कि तब बुझा..बच्चा भी समझने लगा है कि दीपक बुझा है मतलब बुढ्ढा चटकने वाला है...) फ़िर बारी आती है "चिता" की और अंतिम संस्कार की । उज्जैन में रहते हुए इतने बरस हो गये, लोग-बाग दूर-दूर से यहाँ अंतिम संस्कार करवाने आते हैं, आज तक सैकडों चितायें देखी हैं, लेकिन फ़िल्मों जैसी चिता... ना.. ना.. कभी नहीं देखी, क्या "सेक्सी" चिता होती है । बिलकुल एक जैसी लकडियाँ, एक जैसी जमी हुई, खासी संख्या में और एकदम गोल-गोल, "वाह" करने और तड़ से जा लेटने का मन करता है... फ़िर हीरो एक बढिया सी मशाल से चिता जलाता है, और माँ-बहन-भाई-दोस्त या किसी और की कसम जरूर खाता है, और इतनी जोर से चीखकर कसम खाता है कि लगता है कहीं मुर्दा चिता से उठकर न भाग खडा हो...।

यदि चिता हीरोईन की है, और वो भी सुहागन, फ़िर तो क्या कहने । चिता पर लेटी हीरोईन ऐसी लगती है मानो "स्टीम बाथ" लेने को लेटी हो और वह भी फ़ुल मेक-अप के साथ । हीरो उससे कितना भी लिपट-लिपट कर चिल्लाये, मजाल है कि विग का एक बाल भी इधर-उधर हो जाये, या "आई-ब्रो" बिगड़ जाये, चिता पूरी जलने तक मेक-अप वैसा का वैसा । शवयात्रा के बाद बारी आती है उठावने या शोकसभा की । हीरो-हीरोईन से लेकर दो सौ रुपये रोज वाले एक्स्ट्रा के कपडे भी एकदम झकाझक सफ़ेद..ऐसा लगता है कि ड्रेस-कोड बन गया हो कि यदि कोई रंगीन कपडे पहनकर आया तो उसे शवयात्रा में घुसने नहीं दिया जायेगा । तो साथियों आइये कसम खायें कि जब भी हमारी चिता जले ऐसी फ़िल्मी स्टाईल में जले, कि लोग देख-देखकर जलें । जोर से बोलो...हिन्दी फ़िल्मों का जयकारा...

भुतहा संयोग या कुछ और ?

Written by गुरुवार, 31 मई 2007 15:51


अब्राहम लिंकन कॉंग्रेस के लिये 1846 में चुने गये,
जॉन एफ़ केनेडी कॉंग्रेस के लिये 1946 में चुने गये..

अब्राहम लिंकन 1860 में राष्ट्रपति चुने गये,
जॉन एफ़ केनेडी 1960 में राष्ट्रपति चुने गये..

दोनों नागरिक कानूनों के जोरदार पैरोकार रहे,
दोनों की पत्नियों ने अपनी-अपनी संतान खोई, जब वे व्हाईट हाऊस में थीं...

दोनों को शुक्रवार को गोली मारी गई,
दोनों के सिर में गोली मारी गई..

आगे और जबरदस्त भुतहा संयोग....

लिंकन की सेक्रेटरी का नाम था केनेडी
केनेडी की सेक्रेटरी का नाम था लिंकन..

दोनों की हत्या दक्षिणपंथियों ने की,
दोनों के उत्तराधिकारी दक्षिणपंथी जॉनसन नामधारी थे..

एण्ड्र्यू जॉनसन, जो लिंकन के उत्तराधिकारी बने, का जन्म हुआ 1808 में,
लिंडन जॉनसन, जो केनेडी के उत्तराधिकारी बने, का जन्म हुआ 1908 में..

लिंकन के हत्यारे जॉन विल्क्स बूथ का जन्म हुआ 1839 में,
केनेडी के हत्यारे ली हार्वे ओसवाल्ड का जन्म हुआ 1939 में..

दोनों के हत्यारों को तीन नामों से जाना जाता था,
दोनों के हत्यारों के नाम की स्पेलिंग में 15 अक्षर आते हैं..

अब जरा कुर्सी थाम लीजिये....

लिंकन की हत्या जिस थियेटर में हुई उसका नाम था "फ़ोर्ड"
केनेडी की हत्या जिस कार में हुई उसका नाम था "फ़ोर्ड"..

लिंकन की हत्या थियेटर में हुई और हत्यारा भागकर गोदाम में छुपा,
केनेडी की हत्या गोदाम से हुई और हत्यारा भागकर थियेटर में छुपा..

बूथ और ओसवाल्ड दोनों हत्यारों की कोर्ट में सुनवाई से पहले ही हत्या हो गई.

हत्या से एक सप्ताह पहले लिंकन की सभा जिस जगह थी उसका नाम था "मुनरो मेरीलैण्ड"
हत्या से एक सप्ताह पहले केनेडी की मुलाकात हुई उसका नाम था "मर्लिन मुनरो"

अब इन संयोगों के बारे में क्या कहा जा सकता है ? किसी इतिहासकार से पूछें या किसी बंगाली जादूगर से...

(स्रोत : ई-मेल मित्रमंडली)
किसी ने सच ही कहा है कि जिस देश को बरबाद करना हो सबसे पहले उसकी संस्कृति पर हमला करो और वहाँ की युवा पीढी को गुमराह करो । जो समाज इनकी रक्षा नहीं कर सकता उसका पतन और सर्वनाश निश्चित हो जाता है । हमारे आसपास घटने वाली काफ़ी बातें समाज के गिरते नैतिक स्तर और खोखले होते सांस्कृतिक माहौल की ओर इशारा कर रही हैं, एक खतरे की घंटी बज रही है, लेकिन समाज और नेता लगातार इसकी अनदेखी करते जा रहे हैं । इसके लिये सामाजिक ढाँचे या पारिवारिक ढाँचे का पुनरीक्षण करने की बात अधिकतर समाजशास्त्री उठा रहे हैं, परन्तु मुख्यतः जिम्मेदार है हमारे आसपास का माहौल और लगातार तेज होती जा रही "भूख" । जी हाँ "भूख" सिर्फ़ पेट की नहीं होती, न ही सिर्फ़ तन की होती है, एक और भूख होती है "मन की भूख" । इसी विशिष्ट भूख को "बाजार" जगाता है, उसे हवा देता है, पालता-पोसता है और उकसाता है। यह भूख पैदा करना तो आसान है, लेकिन क्या हमारा समाज, हमारी राजनीति, हमारा अर्थतन्त्र इतना मजबूत और लचीला है, कि इस भूख को शान्त कर सके ।
दृश्य-श्रव्य माध्यमों का प्रभाव कोमल मन पर सर्वाधिक होता है, एक उम्र विशेष के युवक, किशोर, किशोरियाँ इसके प्रभाव में बडी जल्दी आ जाते हैं । जब यह वर्ग देखता है कि किसी सिगरेट पीने से बहादुरी के कारनामे किये जा सकते हैं, या फ़लाँ शराब पीने से तेज दौडकर चोर को पकडा जा सकता है, अथवा कोई कूल्हे मटकाती और अंग-प्रत्यंग का फ़ूहड प्रदर्शन करती हुई ख्यातनाम अभिनेत्री किसी साबुन को खरीदने की अपील (?) करे, तो वयःसन्धि के नाजुक मोड़ पर खडा किशोर मन उसकी ओर तेजी से आकृष्ट होता है । इन्तिहा तो तब हो जाती है, जब ये सारे तथाकथित कारनामे उनके पसन्दीदा हीरो-हीरोईन कर रहे होते हैं, तब वह भी उस वस्तु को पाने को लालायित हो उठता है, उसे पाने की कोशिश करता है, वह सपने और हकीकत में फ़र्क नहीं कर पाता । जब तक उसे इच्छित वस्तु मिलती रहती है, तब तक तो कोई समस्या नहीं है, परन्तु यदि उसे यह नहीं मिलती तो वह युवक कुंठाग्रस्त हो जाता है । फ़िर वह उसे पाने के लिये नाजायज तरीके अपनाता है, या अपराध कर बैठता है । और जिनको ये सुविधायें आसानी से हासिल हो जाती हैं, वे इसके आदी हो जाते हैं, उन्हें नशाखोरी या पैसा उडाने की लत लग जाती है, जिसकी परिणति अन्ततः किसी मासूम की हत्या या फ़िर चोरी-डकैती में शामिल होना होता है । ये युवक तब अपने आपको एक अन्धी गली में पाते हैं, जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझता । आजकल अपने आसपास के युवकों को धडल्ले से पैसा खर्च करते देखा जा सकता है । यदि सिर्फ़ पाऊच / गुट्खे का हिसाब लगाया जाये, तो एक गुटका यदि दो रुपये का मिलता है, और दिन में पन्द्रह-बीस पाऊच खाना तो आम बात है, इस हिसाब से सिर्फ़ गुटके का तीस रुपये रोज का खर्चा है, इसमें दोस्तों को खिलाना, सिगरेट पिलाना, मोबाइल का खर्च, दिन भर यहाँ-वहाँ घूमने के लिये पेट्रोल का खर्चा, अर्थात दिन भर में कम से कम सौ रुपये का खर्च, मासिक तीन हजार रुपये । क्या भारत के युवा अचानक इतने अमीर हो गये हैं ? यह अनाप-शनाप पैसा तो कुछ को ही उपलब्ध है, परन्तु जब उनकी देखादेखी एक मध्यम या निम्नवर्गीय युवा का मन ललचाता है, तो वह रास्ता अपराध की ओर ही मुडता है । यह "बाजार" की मार्केटिंग की ताकत (?) ही है, जो इस "मन की भूख" को पैदा करती है, और यही सबसे खतरनाक बात है ।
अपसंस्कृति की भूख फ़ैलाने में बाजार और उसके मुख्य हथियार (!) टीवी का योगदान (?) इसमें अतुलनीय है । उदारीकरण की आँधी में हमारे नेताओं द्वारा सांस्कृतिक प्रदूषण की ओर से आँखें मूंद लेने के कारण इनकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने वाला कोई न रहा, जिसके कारण ये तथाकथित "मीडिया" और अधिक उच्छृंखल और बदतर होता गया है । एक जानकारी के अनुसार फ़्रेण्डशिप डे के लिये पूरे देश के "बाजार" में लगभग चार सौ करोड़ रुपयों की (ग्रीटिंग, गुलाब के फ़ूल, चॉकलेट और उपहार मिलाकर) खरीदारी हुई । जो चार सौ करोड रुपये (जिनमें से अधिकतर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जेब में गये हैं) अगले वर्ष बढकर सात सौ करोड हो जायेंगे, इसका उन्हें पूरा विश्वास है । लेकिन "प्रेम" और "दोस्ती" के इस भौंडे प्रदर्शन में जिस "धन" की भूमिका है वही सारे पतन की जड है, और इसका सामाजिक असर क्या होगा, इस बारे में कोई सोचने को भी तैयार नहीं है । जिस तरह से भावनाओं का बाजारीकरण किया जा रहा है, युवाओं का मानसिक और आर्थिक शोषण किया जा रहा है, वह गलत है, कई बार यह आर्थिक शोषण, शारीरिक शोषण में बदल जाता है । मजे की बात तो यह है कि कई बार कोई दिवस क्यों मनाया जाता है, इसका पता भी उन्हें नहीं होता, परन्तु जैसा मीडिया बता दे अथवा जैसी "भेडचाल" हो वैसा ही सही, जैसा कि वेलेण्टाइन के मामले मे है कि "जिस दिन को ये युवा प्रेम-दिवस के रूप में मनाते हैं दरअसल वह एक शहीद दिवस है, क्योंकि संयोगवश तीनों वेलेण्टाइनों को तत्कालीन राजाओं ने मरवा दिया था, और वह भी चौदह फ़रवरी को" । अब आपत्ति इस बात पर है कि जब आप जानते ही नहीं कि यह उत्सव किसलिये और क्यों मनाया जा रहा है, ऐसे दिवस का क्या औचित्य है ? मार्केटिंग के पैरोकारों की रटी-रटाई दलील होती है कि "यदि इन दिवसों का बाजारीकरण हो भी गया है तो इसमें क्या बुराई है ? क्या पैसा कमाना गलत बात है ? किसी बहाने से बाजार में तीन-चार सौ करोड रुपया आता है, तो इसमें हाय-तौबा क्यों ? जिसे खरीदना हो वह खरीदे, जिसे ना खरीदना हो ना खरीदे, क्या यह बात आपत्तिजनक है ?" नहीं साहब पैसा कमाना बिलकुल गलत बात नहीं, लेकिन जिस आक्रामक तरीके उस पूरे "पैकेज" की मार्केटिंग की जाती है, उसका उद्देश्य युवाओं से अधिक से अधिक पैसा खींचने की नीयत होती है और वह "मार्केटिंग" उस युवा के मन में भी खर्च करने के भाव जगाती है जिसकी जेब में पैसा नहीं है और ना कभी होगा, यह गलत बात है । पढने-सुनने में भले ही अजीब लगे, परन्तु सच यही है कि आज की तारीख में भारत के पचास-साठ प्रतिशत युवाओं की खुद की कोई कमाई नहीं है, और ऐसे युवाओं की संख्या भी कम ही है जिन्हें नियमित जेबखर्च मिलता हो । बाप वीआरएस और जबरन छँटनी का शिकार है, और बेटे को कोई नौकरी नहीं है, इसलिये दोनों ही बेकार हैं और टीवी उन्हें यह "भूख" परोस रहा है, पैसे की भूख, साधनों की भूख । भूख जो कि एक दावानल का रूप ले रही है । इसी मोड पर आकर "सामाजिक परिवर्तन", "सामाजिक क्रान्ति", "सामाजिक असर" की बात प्रासंगिक हो जाती है, लेकिन लगता है कि देश कानों में तेल डाले सो रहा है । आज हमारे चारों तरफ़ घोटाले, राजनीति, पैसे के लिये मारामारीम हत्याएं, बलात्कार हो रहे हैं, इन सभी के पीछे कारण वही "भूख" है । समाजशास्त्रियों की चिंता वाजिब है कि ऐसे लाखों युवाओं की फ़ौज समाज पर क्या असर डालेगी ? लेकिन "मदर्स डे", "फ़ादर्स डे", "वेलेन्टाईन", "फ़्रेण्डशिप डे", ये सब प्रतीक मात्र नहीं है, बल्कि इनसे आपको कमतरी का एहसास कराया जाता है कि यदि आपने कोई उपहार नहीं दिया तो आपको दोस्ती करना नहीं आता, यदि आपने कार्ड या फ़ूल नहीं खरीदा इसका मतलब है कि आप प्रेम नहीं करते, परिणाम यह होता है कि विवेकानन्द या अपने कोर्स की कोई किताब खरीदने की बजाय व्यक्ति किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी की कोई बेहूदा चॉकलेट खरीद लेता है, क्योंकि उस चॉकलेट से तथाकथित "स्टेटस" (?) जुडा है, और यही "स्टेटस" यानी एक और "भूख" । बाजार को नियन्त्रित करने वालों से यही अपेक्षा है कि उस "भूख" को भडकाने का काम ना करें, जो आज समाज के लिये "भस्मासुर" साबित हो रही है, कल उनके लिये भी खतरा बन सकती है ।
आजकल जमाना मीडिया और विज्ञापन का है, चाहे वह प्रिंट मीडिया हो अथवा इलेक्ट्रानिक मीडिया, चहुँओर विज्ञापनों की धूम है । इन विज्ञापनों ने सभी आय वर्गों के जीवन में अच्छा हो या बुरा, आमूलचूल परिवर्तन जरूर किया है । कई विज्ञापन ऐसे हैं जो बच्चों के अलावा बडों कि जुबान पा भी आ जाते हैं । शोध से यह ज्ञात हुआ है कि विज्ञापनों से बच्चे ही सर्वाधिक प्रभावित होते हैं, उसके बाद टीनएजर्स और फ़िर युवा । व्यवसाय की गलाकाट प्रतियोगिता ने विज्ञापनों का होना आवश्यक कर दिया है, और कम्पनियाँ, गैर-सरकारी संगठन और यहाँ तक कि सरकारें भी बगैर विज्ञापन के नहीं चल सकते । लेकिन इस आपाधापी में तमाम पक्ष एक महत्वपूर्ण बात भूल जाते हैं, वह है विज्ञापनों में नैतिकता का लोप, अश्लीलता, छिछोरेपन और उद्दण्डता का बढता स्तर । एक मामूली सा उदाहरण - दस वर्षीय एक बालक ने अपने साथ क्रिकेट देख रहे माता-पिता से पूछा - पापा कंडोम क्या होता है ? मम्मी-पापा एक दूसरे का मुँह देखने के अलावा क्या कर सकते थे... बच्चे ने यह सवाल क्यों पूछा, क्योंकि मैच के दौरान राहुल द्रविड और वीरेन्द्र सहवाग जनता को हेल्मेट और पैड पहनकर यह सन्देश देते हैं कि "एड्स से बचाव ही सर्वोत्तम उपाय है", सन्देश सही है लेकिन उसका सम्प्रेषण गलत समय और गलत तरीके से होता है, बच्चे को तो यही लगता है कि राहुल द्रविड या सहवाग जरूर किसी क्रिकेट की वस्तु का विज्ञापन कर रहे होंगे, और हेलमेट और पैड पहनने के बाद कंडोम भी पहनना जरूरी है, और वह सहजता से अपना सवाल पूछता है, इसमें गलती किस की है, जाहिर है विज्ञापन बनाने वाले और उसे प्रसारित करने वाले दोनों की । जब कंडोम के विज्ञापन मैच के बीच में आयेंगे, तो यही समझा जायेगा कि यह सभी आयु वर्ग के लोगों के उपयोग की वस्तु है, जैसे कि चॉकलेट, साबुन या कोक । सारा परिवार साथ बैठकर एक सीरियल देख रहा है, अचानक एक "सेनेटरी नैपकिन" का विज्ञापन आता है, जिसमें एक आकर्षक युवती उसके गुणों के बारे में "विस्तार" से बताती है, अब नर्सरी अथवा प्रायमरी में पढने वाले बच्चे को उसके बारे में आप क्या समझायेंगे ? उस बच्चे को तो एक ही नैपकिन मालूम है, जिससे नाक पोंछी जाती है, यदि उसने टीवी वाला नैपकिन लाने की जिद पकड ली तो आप क्या करेंगे ? तात्पर्य यह कि न तो विज्ञापन कंपनियों, न ही टीवी चैनलों और ना ही सरकार को इस बात की समझ है कि जिस विज्ञापन को वे दिखा रहे हैं, उस विज्ञापन का "टारगेट ऑडियन्स" क्या है ? कहीं विज्ञापन फ़ूहड तो नहीं (फ़ूहड और अश्लील तो कोई विज्ञापन होता ही नहीं ऐसा सभी कम्पनियाँ मानती हैं) ? उस विज्ञापन का समाज और दर्शक वर्ग पर क्या और कैसा असर हो रहा है, इस बात की चिन्ता भी किसी को नहीं होती । तथाकथित ऎड-गुरु और मैनेजमेंट के दिग्गज हमें यदाकदा ज्ञान बाँटते रहते हैं कि विज्ञापन तभी अधिक प्रभावी और शक्तिशाली होता है, जब वह सही समय और सही दर्शक या श्रोता तक पहुँचे । जैसे गाँव में मर्सिडीज का विज्ञापन करना बेकार है और एयरपोर्ट पर खाद-बीज का... फ़िर कंडोम, सेनेटरी नैपकिन, महिलाओं-पुरुषों के अन्तर्वस्त्रों के विज्ञापन के लिये क्रिकेट मैच क्यों ? क्या इसलिये कि दर्शक संख्या ज्यादा है, लेकिन इसके दुष्प्रभावों के बारे में क्या ? सरकार अपनी ओर से यदि कोई कदम उठाये तो महेश भट्ट नुमा "अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्षधर" लोगों की आजादी खतरे में पड़ जाती है, या प्रीतीश नन्दी टाईप कोई बुद्धिजीवी पानी पी-पीकर सरकार को कोसने लगता है, फ़िर इसका इलाज कैसे हो ? क्या विज्ञापन एजेंसियों और मीडिया को स्व-अनुशासन नहीं रखना चाहिये ? इसका सर्वमान्य और लोकतांत्रिक हल यही हो सकता है कि मीडिया, विज्ञापन जगत की हस्तियाँ और प्रेस काऊंसिल के लोग साथ बैठें और तय करें कि "एडल्ट" विज्ञापन क्या हैं, और उनके प्रसारण का समय और कार्यक्रम क्या-क्या होने चाहिये, ताकि परिवार के साथ बैठकर टीवी देखने वालों को असुविधा का सामना ना करना पडे़, क्योंकि बच्चों का कोई ठिकाना नहीं, पता नहीं कब, क्या पूछ बैठें ? और हर व्यक्ति महेश भट्ट भी नहीं बन सकता । एक मजेदार उदाहरण याद आ रहा है - एक डिटर्जेण्ट बनाने वाली कम्पनी का विज्ञापन सऊदी अरब में करने का ठेका एक विज्ञापन एजेन्सी को दिया गया, लेकिन दस दिनों में ही वहाँ कम्पनी की सेल में भारी गिरावट दर्ज की गई, कारणों का पता करने पर यह बात सामने आई कि भारत की तरह ही विज्ञापन एजेन्सी ने सऊदी अरब में भी तीन पोस्टरों वाला "ऐड-केम्पेन" किया था, जिसमें पहले पोस्टर में एक चमकती हुई महिला मुस्कराते हुए एक गन्दा शर्ट दिखाती है, दूसरे पोस्टर में वह उसे डिटर्जेण्ट की बालटी में डालते हुए दिखती है, और तीसरे पोस्टर में वह सफ़ेद शर्ट निकालती है...दिक्कत यह थी कि सऊदी अरब में जैसा कि उर्दू पढते हैं (दाँये से बाँई ओर) वैसा जनता ने पढा और मतलब निकाला कि सफ़ेद शर्ट को इसमें डालने पर यह गन्दा हो जाता है..मतलब यह कि विज्ञापन कहाँ, कैसा और किसके बीच किया जा रहा है, इसका ध्यान रखना बहुत जरूरी है...तो उम्मीद करता हूँ कि विज्ञापन जगत के कुछ लोग मेरे इस ब्लोग को पढेंगे और "ऊ...प्पर" तक मेरी बात पहुँचायेंगे, ताकि भौण्डे विज्ञापनों पर अंकुश लग सके । कहीं यह ब्लोग ज्यादा भारी ना हो जाये इसलिये अब कुछ मजेदार (?) विज्ञापन भी देख लें ...


इसमें "कोक" हमसे कह रहा है कि जमीन का सारा पानी तो हमने ले लिया, अब आप लोग कोक पियो और मजे में जियो....


नीम की दातून की जगह "कोलगेट" उपयोग करो तो ऐसे दिखोगे....


"नाईकी" के आदेश को मानते हुए बच्चा वही कर रहा है, जो उसे कहा गया है... यानी "जस्ट डू इट"...

तो भैया.. मजा आया हो तो टिपियायें और दूसरों को भी टिपियाने का मौका दें वरना पैसा वापस...

India Pakistan Atomic War

Written by बुधवार, 09 मई 2007 12:42
भारत-पाकिस्तान परमाणु युद्ध...

अब चूँकि अमेरिका की लाख कोशिशों के बावजूद भारत-पाकिस्तान दोनो के पास परमाणु मिसाईल तकनीक मौजूद है, ऐसे में यदि भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध छिड जाये तो क्या मंज़र होगा इसका अध्ययन किया गया, और चूंकि अध्ययन एक अमेरिकी एजेन्सी ने किया है, इसलिये वह सही ही होगा (ऐसा मानने वाले अमेरिका से भारत में ज्यादा हैं)। उक्त अध्ययन के निष्कर्ष इस प्रकार हैं -

एक बार पाकिस्तानी सेना ने निश्चय किया कि भारत पर परमाणु मिसाइलों से हमला किया जाये, उन्होंने उसे लांच-पैड पर लगा दिया, क्योंकि उन्हें पाक सरकार की इजाजत की आवश्यकता नहीं थी, और मिसाइल दागने के लिये उल्टी गिनती चालू कर दी । भारत की तकनीक इतनी उन्नत है कि मात्र अठारह सेकंड में भारत को पता चल गया कि हम पर परमाणु हमला होने वाला है, लेकिन भरतीय सेना को सरकार की मंजूरी लेना होती है इसलिये भारतीय सेना ने सरकार के सामने परमाणु हमले को विफ़ल करने के लिये स्वयं पहले हमला करने की अनुमति राष्ट्रपति से माँगी । राष्ट्रपति ने सेना की यह सिफ़ारिश मंत्रिमण्डल के सामने रखी । प्रधानमन्त्री ने तत्काल लोकसभा की एक आपात बैठक बुलाई । लोकसभा का वह विशेष सत्र बहिष्कार और नारेबाजी के कारण अनिश्चितकाल के लिये स्थगित कर दिया । राष्ट्रपति ने टीवी पर भाषण देकर तुरन्त निर्णय लेने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस बीच पाकिस्तान की मिसाइल में कुछ तकनीकी खराबी आ गई, और उन्होंने दोबारा उलटी गिनती चालू की । लेकिन इधर भारत मे सरकार अल्पमत में आ गई, क्योंकि उसे समर्थन दे रही एक विशेष पार्टी ने समर्थन वापस ले लिया । राष्ट्रपति ने प्रधानमन्त्री को विश्वास मत हासिल करने के निर्देश दिया । सरकार विश्वास मत में पराजित हो गई और राष्ट्रपति ने अगली व्यवस्था होने तक कामचलाऊ प्रधानमन्त्री को बने रहने को कहा ।

कामचलाऊ प्रधानमन्त्री ने सेना को परमाणु मिसाइल छोडने के आदेश दिये, लेकिन चुनाव आयोग ने कहा कि कामचलाऊ सरकार नीतिगत फ़ैसले नहीं कर सकती, क्योंकि चुनाव आचार संहिता लागू हो गई है, चुनाव आयोग ने एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगाई । हालांकि उच्चतम न्यायालय ने सत्ता और शक्ति के दुरुपयोग को मान लिया लेकिन "इमरजेंसी" को देखते हुए कामचलाऊ प्रधानमन्त्री को मिसाइल के उपयोग के लिये अधिकृत कर दिया । उसी समय पाक मिसाइल सही ढंग से छूट तो गई, लेकिन अपने निशाने से चार सौ किलोमीटर दूर इस्लामबाद में पाकिस्तान की ही एक सरकारी इमारत पर ठीक बारह बजे गिरी, संयोग से कोई जनहानि नहीं हुई, क्योंकि भारत की ही तरह वहाँ भी सरकारी कर्मचारी इमारत से बाहर थे । साथ ही उस मिसाइल पर लगा परमाणु बम भी कहीं पास की झील में जा गिरा था । अब पाकिस्तान ने चीन से उच्च तकनीक आयात करने का फ़ैसला किया । इस दरम्यान, भारत में इस मुद्दे पर विचार करने के लिये एक सर्वदलीय बैठक बुलाई गई और सर्वसम्मति से फ़ैसला हुआ कि भारत को पाकिस्तान पर परमाणु हमला कर देना चाहिये, तब तक सेना को अनुमति माँगे तीन माह का समय बीत चुका था ।

इसी समय अचानक मीडिया में "मानवतावादी", "परमाणु विरोधी" आदि लोगों ने मानव-श्रंखला वगैरह बनाना शुरु कर दिया था, एक विपक्षी पार्टी ने "रास्ता-रोको" का आयोजन कर डाला था, कुछ लोग जो तेंडुलकर का पुतला नहीं जला सके थे, उन्होंने टीवी पर आने के लिये मुशर्रफ़ का पुतला हाथों-हाथ जला लिया और अपने चेहरे टीवी पर देख कर खुश हो लिये । आप्रवासी भारतीयों ने भी वॉशिंगटन और कैलिफ़ोर्निया से ई-मेल का ढेर लगा दिया, उन्हें अपने देश से ज्यादा निवेश की चिंता होने लगी थी । दूसरी तरफ़ पाकिस्तान की मिसाइलें एक के बाद एक फ़ेल होती गईं, कुछ मिसाइलें तेज राजस्थानी हवाओं के कारण अरब सागर में जा गिरीं तो कुछ पाक अधिकृत जंगलों में । आखिर में अमेरिका से तस्करी की हुई एक मिसाईल सही तरीके से चली, लेकिन चूँकि पाकिस्तानियों को उसका सॉफ़्टवेयर समझ में नहीं आया था और वे कोड नहीं बदल पाये थे, इसलिये मिसाइल उसके मूल निशाने अर्थात मास्को की तरफ़ बढ चली । रूसियों ने तत्काल उस मिसाइल को मार गिराया और अपनी ओर से एक मिसाइल इस्लामाबाद पर गिरा दी । बस फ़िर क्या था, अफ़रातफ़री मच गई ।

हजारों मौतों के कारण पाकिस्तान ने विश्व समुदाय से मदद की अपील की, भारत ने भी इस घटना पर गहरा अफ़सोस जाहिर किया और एक हवाई जहाज भरकर बिस्किट भेजने का प्रबन्ध किया, ताकि उनके "भाई" भूखे ना रहें । फ़िर एक बार भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कसम खाई कि वह कभी भी अपनी ओर से परमाणु हमले की पहल नहीं करेगा, और खुशी-खुशी रहने लगा । पाकिस्तान की जनता में तो कभी भी सेना से जवाबतलब करने की हिम्मत नहीं थी, सो वह भी खुशी-खुशी रहने लगी, और इस तरह समूचे "तंत्र" की "जागरूकता" और "सक्रियता" के कारण भारत-पाकिस्तान के बीच का परमाणु युद्ध होते-होते रह गया और मानवता कलंकित होने से बच गई ।

Marathi Actors and Characters in Hindi Films

Written by शुक्रवार, 04 मई 2007 12:00
हिन्दी फ़िल्मों में मराठी चरित्र : कितने वास्तविक ?

हिन्दी फ़िल्में हमारे यहाँ थोक में बनती हैं, और जाहिर है कि फ़िल्म है तो विभिन्न चरित्र और पात्र होंगे ही, और उन चरित्रों के नाम भी होंगे । हिन्दी फ़िल्मों पर हम जैसे फ़िल्म प्रेमियों ने अपने कई-कई घंटे बिताये हैं (हालांकि पिताजी कहते हैं कि मेरी आज की बरबादी के लिये हिन्दी फ़िल्में और क्रिकेट ही जिम्मेदार हैं), लेकिन कहते हैं ना प्यार तो अंधा होता है ना, तो अंधेपन के बावजूद फ़िल्में देखना और क्रिकेट खेलना नहीं छोडा तो नहीं छोडा, खैर...हिन्दी फ़िल्मों में वैसे तो काफ़ी नाम विभिन्न नायकों पर लगभग ट्रेण्ड बन चुके हैं, जैसे अमिताभ बच्चन के लिये "विजय", जीतेन्द्र के लिये "रवि", या महमूद के लिये "महेश" आदि और वे पसन्द भी किये गये, लेकिन जब फ़िल्म निर्माता किसी किरदार के साथ उसका उपनाम भी जोड देता है तब वह निपट अनाडी लगने लगता है, क्योंकि जो भी उपनाम वह हीरो या विलेन के आगे लगाता है, उस समाज या धर्म के लोग उससे अलग सा जुडाव महसूस करने लगते हैं (जाति व्यवस्था पर हजारों ब्लोग लिखे जा सकते हैं लेकिन यह एक सच्चाई है इससे कोई मुँह नहीं मोड सकता).

तो बात हो रही है, फ़िल्मों में चरित्रों के नाम के आगे उपनाम जोडने की, दुर्भाग्य से हमारे हिन्दी फ़िल्म निर्माता-निर्देशक इस मामले में फ़िसड्डी ही साबित हुए हैं । यदि अमिताभ का नाम सिर्फ़ विजय रखा जाये तो कोई आपत्ति नहीं है, और दर्शक एक बार भी नहीं पूछेगा कि इस "विजय" का सरनेम क्या है, लेकिन जब निर्माता "विजय" के आगे श्रीवास्तव, वर्मा या जैन लगा दिया जाता है तो बात कुछ अलग हो जाती है.... फ़िर उस निर्माता का यह दायित्व है कि वह उस उपनाम के साथ जुडी़ संस्कृति का भी प्रदर्शन करे...। ईसाईयों को हमेशा यह शिकायत रही है कि उनके समाज का सही चित्रण सच्चे अर्थों में अब तक फ़िल्मों में नहीं हो पाया है, इक्का-दुक्का "जूली" या "त्रिकाल" जैसी फ़िल्मों को छोड दिया जाये तो फ़िल्मों में अक्सर जूली, लिली, रोजी, डिसूजा, एन्थोनी, जोसेफ़ आदि जैसे बेहद घिसे-पिटे नाम ही दिये जाते हैं और वे भी उन चरित्रों को जो गले में क्रास लटकाये मामूली से गुंडे होते हैं, या फ़िर एकदम दरियादिल चर्च के फ़ादर, बस....।

ठीक इसी प्रकार मराठी (महाराष्ट्र समाज) लोगों के चरित्र चित्रण में भी ये हिन्दी फ़िल्म निर्माता लगभग अन्याय की हद तक चले जाते हैं, जबकि फ़िल्म निर्माण का श्रीगणेश ही दादा साहब फ़ाल्के ने किया था, और इस बात को अलग से लिखने की आवश्यकता नहीं है कि मराठी कलाकारों ने हिन्दी फ़िल्मों को क्या और कितना योगदान दिया है । शोभना समर्थ, लीला चिटणीस से लेकर माधुरी दीक्षित और उर्मिला तक, या फ़िर दादा साहेब फ़ालके से लेकर अमोल पालेकर और नाना तक, सब एक से बढकर एक । लेकिन जब हम हिन्दी फ़िल्मों पर नजर डालते हैं तो पाते हैं कि मराठी पात्रों का चित्रण या तो हवलदार, क्लर्क, या मुम्बई के सडक छाप गुण्डे के रूप में किया जाता है, बहुत अधिक मेहरबानी हुई तो किसी को अफ़सर बता दिया जाता है ।

चूँकि हिन्दी फ़िल्म निर्माताओं का पाला मुम्बई पुलिस से बहुत पडता है, इसलिये हवलदारों का नाम भोंसले, पाटिल या वागले रखे जाते हैं । शिकायत इस बात से नहीं है कि इस प्रकार के चरित्र क्यों दिखाये जाते हैं, बल्कि इस बात से है कि निर्माता उस समाज की छवि के बारे में जरा भी परवाह क्यों नहीं करता । जब निर्माता फ़िल्मों में उपनाम रखता है तो स्वतः ही उनकी बोली, भाषा, हावभाव और संस्कृति उस किरदार से जुड जाते हैं । जैसे कि फ़िल्म "गर्दिश" में अमरीश पुरी का नाम है पुरुषोत्तम साठे, क्या विसंगतिपूर्ण नाम रखा गया... मुम्बई में पला-बढा और वहीं नौकरी करने वाला एक हवलदार पंजाबी स्टाईल में डॉयलाग क्यों बोलता है ? अमरीश पुरी किसी भी कोण से मराठी लगते हैं उस फ़िल्म में ? किसी फ़िल्म में शक्ति कपूर (शायद "इंसाफ़" या "सत्यमेव जयते" में) "इन्स्पेक्टर भिण्डे" बने हैं (भेण्डे नहीं) और पूरी फ़िल्म में जोकर जैसी हरकतें करते हुए "मी आहे इंस्पेक्टर भिण्डे" जैसा कुछ बडबडाते रहते हैं । तेजाब में अनिल कपूर का नाम "देशमुख" रखा गया है, ये तो गनीमत है कि उसके बाप को बैंक में कैशियर बताया गया है, लेकिन पूरी फ़िल्म में कहीं भी अनिल कपूर "देशमुख" जैसे नहीं लगते । इसके उलट हाल ही की एक फ़िल्म "हेराफ़ेरी" में परेश रावल को बाबूराव नाम के चरित्र में पेश किया है, तो वह एक "टिपिकल" मुम्बईया मराठी टोन में बोलता तो है, वही परेश रावल "हंगामा" में बिहारी टोन में बोलते हैं, तो कम से कम प्रियदर्शन ने इस बात का तो ध्यान रखा ही, "कथा" फ़िल्म में सई परांजपे ने उम्दा तरीके से एक मुम्बई की एक मराठी चाल का चित्रण किया था, महेश मांजरेकर चूंकि मुम्बईया पृष्ठभूमि से हैं इसलिये उन्होंने "वास्तव" में थोडा मराठीपन का ठीकठाक चित्रण किया । इसी प्रकार अर्धसत्य फ़िल्म में इंस्पेक्टर वेलणकर और उनकी पत्नी के रोल में स्मिता पाटिल खूब जमते हैं, और बैकग्राऊँड में जो रेडियो बजता है वह मराठी माहौल पैदा करता है । जबकि किसी एक फ़िल्म में आशीष विद्यार्थी "आयेला-जायेला" टाईप की मराठी बोलते पाये जाते हैं ।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि हिन्दी फ़िल्मों में कोई तमिल पात्र आता है तो सबसे पहले तो उसे "मद्रासी" का तमगा लगा दिया जाता है, फ़िर उसे लुंगी पहनाकर "अई..अई...यो... टाईप के डायलाग देकर रोल की इतिश्री कर दी जाती है । दरअसल इसके मूल में है पैसा, अधिकतर निर्माता निर्देशक गैर मराठी हैं, उन्हें न तो मराठी संस्कृति का विशेष ज्ञान होता है (इतने वर्षों तक मुम्बई में रहने के बावजूद), न उससे जुडाव, और जाहिर है कि फ़िल्म बनाने के लिये पैसा लगता है... । महेश मांजरेकर ने एक बार कहा था कि उन्हें मराठी पृष्ठभूमि पर एक जोरदार कहानी पसन्द आई थी, लेकिन फ़ायनेंसर ने कहा "यदि बनाना ही है तो हिन्दी फ़िल्म बनाओ, मराठी नहीं चलेगा", अर्थात पंजाब की मिट्टी, सरसों का साग, खेत, राजपूती आन-बान-शान, गुजराती डांडिया सब चलेगा, लेकिन मराठी की पृष्ठभूमि नहीं चलेगी ! फ़ूलनदेवी की बाईस हत्याओं और बलात्कार की फ़िल्म के लिये निर्माता आसानी से मिल जायेगा, लेकिन वीर सावरकर की फ़िल्म के लिये सुधीर फ़डके साहब को जाने कितने पापड बेलने पडे ।

हिन्दी के अभिनेताओं को क्या दोष देना, मराठी के सुपर स्टार अशोक सराफ़ और लक्ष्मीकांत बेर्डे भी हिन्दी में नौकर, हीरो का दोस्त, या मुनीम जैसे दस मिनट के रोल से संतुष्ट हो जाते हैं, जबकि ये रोल उन जैसे उत्कृष्ट कलाकारों के लायक नहीं हैं । देखते हैं कब कोई चोपडा, खन्ना, कपूर या खान, मराठी माहौल और नामों को सही ढंग से चित्रित करता है... और यह शिकायत हिन्दी फ़िल्म निर्माताओं से सभी को रहेगी, जैसे किसी पारसी का चरित्र निभाते-निभाते दिनेश हिंगू बूढे हो गये, सिन्धी चरित्र "अडी... वडीं साईं" से आगे नहीं बढते, इसलिये सबसे अच्छा तरीका है कि फ़िल्मों में उपनाम रखे ही ना जायें, उससे कहानी और फ़िल्म पर कोई फ़र्क नहीं पडने वाला है...

मराठी लोग आमतौर पर मध्यमवर्गीय, अपने काम से काम रखने वाले, कानून, नैतिकता और अनुशासन का अधिकतम पालन करने वाले होते हैं (जरा अपने दोस्तों, रिश्तेदारों से मराठियों के बारे में अपने अनुभव पूछ कर देखिये, या फ़िर साक्षात किसी साठे, गोडबोले, पटवर्धन, परांजपे, देशपांडे और हाँ... चिपलूनकर से मिलकर देखिये कि हिन्दी फ़िल्मों में मराठी नामों के साथ कैसी "इमेज" दिखाई जाती है, और असल में वे कैसे हैं)...

Tu Chanda Mai Chandni - Reshma aur Shera (Bal Kavi Bairagi)

Written by बुधवार, 02 मई 2007 18:34
तू चंदा.. मैं चाँदनी (Reshma aur Shera) : बालकवि बैरागी

आज जिस गीत के बारे में मैं लिखने जा रहा हूँ, वह गीत लिखा है बालकवि बैरागी जी ने, फ़िल्म है "रेशमा और शेरा" (निर्माता - सुनील दत्त) । ये गीत रेडियो पर कम बजता है, और बजता भी है तो अधूरा (दो अन्तरे ही), इस गीत का तीसरा अंतरा बहुत कम सुनने को मिलता है, जाहिर है कि रेडियो की अपनी मजबूरियाँ हैं, वे इतना लम्बा गीत हमेशा नहीं सुनवा सकते (जैसे कि फ़िल्म "बरसात की रात" की मशहूर कव्वाली "ये इश्क-इश्क है इश्क-इश्क" भी हमें अक्सर अधूरी ही सुनने को मिलती है, जिसके बारे में अगली किसी पोस्ट में लिखूँगा)... बहरहाल... ये गीत राजस्थानी शैली में लिखा हुआ गीत है, गीत क्या है एक बहती हुई कविता ही है, जिसे सरल हृदय बालकवि जी ने अपने शब्दों के जादू से एक अनोखा टच तो दिया ही, लेकिन असली कमाल है संगीतकार जयदेव का । गीत के बीच-बीच में जो "इंटरल्यूड्स" उन्होंने दिये हैं वे चमत्कारिक हैं । जलतरंग और शहनाई का अदभुत उपयोग उन्होंने किया है और किसी कविता को सुरों में बाँधना वैसे भी मुश्किल ही होता है... जयदेव जी हमेशा इस बात के पक्षधर रहे हैं कि पहले गीत के बोल लिखे जायें और फ़िर उसकी धुन बनाई जाये... और बालकवि बैरागी जी के इन शब्दों को धुन में पिरोना वाकई मुश्किल रहा होगा, जबकि साथ में यह जिम्मेदारी भी हो कि फ़िल्म के साथ उसका तारतम्य ना टूटने पाये और उसी पृष्ठभूमि में वह फ़िट भी लगे...गीत शुरू होता है धीमी-धीमी धुन से.... फ़िर जैसे कहीं दूर रेगिस्तान से सुरदेवी लता की आवाज आना शुरू होती है....

तू चन्दा... मैं चाँदनी... चाँदनी...
तू तरुवर मैं शाख रे...
तू बादल मैं बिजुरी... तू बादल मैं बिजुरी...
तू पंछी मैं पाँख रे...
तू चन्दा मैं चाँदनी......

गीत अपनी शुरुआत के इस पहले हिस्से से ही पकड़ बना लेता है, खासकर लताजी जब ऊँचे सुरों से शुरुआत करके "तू चन्दा मैं चाँदनी" के बाद बेहद धीमे सुरों में "तू बादल मैं बिजुरी" गाती हैं और फ़िर पुनः ऊँचे सुर में "तू पंछी मैं पाँख रे" की तान छेडकर हमें हिंडोले का मजा देती हैं...
अगला अंतरा बेहद शांति से शुरु होता है और इसमें लता जी की आवाज हमें एक दूसरी ही दुनिया में ले जाती है... मुझे लगता है कि गीत के हिस्से में जयदेव जी ने जानबूझकर ही वाद्यों का प्रयोग नहीं के बराबर किया... ताकि वहीदा रहमान का सुनील दत्त के प्रति समर्पण भाव खुलकर सामने आ सके और रेगिस्तान की पृष्ठभूमि का सही आभास वे पैदा कर सकें....
ना....सरवर ना... बावडी़
ना... कोई ठंडी छाँव..
ना कोयल ना पपीहरा
ऐसा मेरा गाँव से
कहाँ बुझे तन की तपन, कहाँ बुझे तन की तपन
ओ सैँया सिरमोर, चन्द्र किरन को छोड़कर जाये कहाँ चकोर रे
जाग उठी है साँवरे, मेरी कुआँरी प्यास रे...
अंगारे से लगने लगे, पिया अंगारे से लगने लगे
आज मुझे मधुमास रे, मधुमास रे... आज मुझे मधुमास....


इस अंतरे में बालकवि जी ने रेगिस्तान के गाँवों का वर्णन करके उसे "तन की तपन" से जोड़ दिया है, जो कि अदभुत है...जैसा कि अपने पोस्ट में यूनुस भाई ने कहा था कि इतने कोमल शब्द किसी-किसी गीत में ही मिलते हैं, और एक समर्पित प्रेमिका की अपने प्रेमी के प्रति आसक्ति की अधिकता में शब्दों की अश्लीलता ना आने पाये, यह कमाल किया है बैरागी जी ने... हिन्दी के कुछ उम्दा शब्दों को उन्होंने लिया है ताकि भावना भी व्यक्त हो जाये और अश्लीलता का तो सवाल ही नहीं....इस अंतरे के शुरु में वाद्य नहीं हैं, फ़िर धीरे-धीरे चौथी पंक्ति तक वे आते हैं और पैरा के अन्तिम लाईन आते-आते तेज हो जाते हैं (जब लताजी "आज मुझे मधुमास रे.... खासकर मधुमास शब्द के बीच में जो मुरकियाँ लेती हैं तो कलेजा चीर कर रख देती हैं)....

दूसरा अंतरा भी उसी प्रकार से शुरू होता है, लेकिन इस बार वाद्य भी साथ होते हैं....
तुझे आँचल में रखूँगी ओ साँवरे...
काली अलकों से बाँधूंगी ये पाँव रे...
गलबहियाँ वो डालूँ के छूटे नहीं...
मेरा सपना सजन अब छूटे नहीं...
मेहंदी रची हथेलियाँ, मेहंदी रची हथेलियाँ..
मेरे काजर वारे नैन रे...
पल-पल तुझे पुकारते, पिया पल-पल तुझे पुकारते, हो-हो कर बेचैन रे...
हो-हो कर बेचैन रे...


यहाँ भी "बेचैन रे...." की तान ठीक वैसी ही रखी गई है जैसी "मधुमास" शब्द की रखी गई है....मंतव्य वही है... आपसी दुश्मनी वाले दो कबीलों के दो प्रेमियों के बीच "तन की तपन", "मधुमास", "बेचैन", "गलबहियाँ", "काली अलकों" जैसे रहस्यमयी शब्द वाकई में गहरे असरकारक हैं...
तीसरा अंतरा जो कि कम सुनने को मिलता है....
ओ मेरे सावन सजन, ओ मेरे सिन्दूर..
साजन संग सजनी बनी, मौसम संग मयूर..
चार पहर की चाँदनी, मेरे संग बिता...
अपने हाथों से पिया मुझे लाल चुनर उढा..
केसरिया धरती लगे, अम्बर लालम-लाल रे..
अंग लगाके सायबा... अंग लगा के सायबा...
कर दे मुझे निहाल रे....कर दे मुझे निहाल रे...
तू चन्दा मैं चाँदनी.... तू तरुवर मैं शाख रे...


फ़िल्म की सिचुएशन के हिसाब से प्रेमिका जानती है कि उनका मिलन होना आसान नहीं है "चार पहर की चाँदनी, मेरे संग बिता...." और "केसरिया धरती लगे, लेकिन भविष्य की कल्पना करके अम्बर लालम-लाल" ऐसा उच्च श्रेणी का मेलजोल है सिचुएशन और गीत के बोलों में...तो इस प्रकार एक अनोखे गीत का अंत होता है... जिसमें क्या नहीं है, हिन्दी कविता का झरना, जयदेव का संगीत, लताजी की दैवीय आवाज, रेगिस्तान की पृष्ठभूमि में फ़िल्मांकन, सब मिलाकर एक बेहतरीन गीत....

दो दर्जन से अधिक पुस्तकों के लेखक, सच्चे गाँधीवादी काँग्रेसी, बालकवि बैरागी जी मध्यप्रदेश से विधायक, सांसद, केन्द्रीय मन्त्री रह चुके हैं, लेकिन उनकी सादगी अचंभित कर देने वाली है, आज भी वे सैकडों पत्रों का उत्तर अपने हाथों से देते हैं, और कुछ दिन पहले ही एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि डाक की बढती दरों के कारण उन्हें काफ़ी मुश्किल होती है... जिस जमाने में एक अदना सा महापौर भी पाँच साल में इतना कमा लेता है कि उसे पूरे जीवन भर कुछ नहीं करना पडता, ऐसे में बालकवि जी एक चमकदार लैम्प पोस्ट का काम करते हैं जो रास्ता दिखाता है...खैर....

यूनुस भाई के रेडियोवाणी से प्रेरित होकर मैने सोचा कि फ़िल्मी गीतों की गहराई और हिन्दी फ़िल्मों पर भी कुछ लिखा जाये... जैसे "दिल ढूँढता है" और अब यह गीत, हालांकि मेरे शब्दों में अधिक मुलायमियत नहीं है (शायद इसलिये कि मैने अधिकतर लेखन राजनीति और समाज पर किया है..) लेकिन यदि पाठकों को पसन्द आया तो यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा... आमीन...