झाबुआ का "कड़कनाथ" मुर्गा

Written by गुरुवार, 02 अगस्त 2007 16:26

"कड़कनाथ मुर्गा"...नाम भले ही अजीब सा हो, लेकिन मध्यप्रदेश के झाबुआ और धार जिले में पाई जाने वाली मुर्गे की यह प्रजाति यहाँ के आदिवासियों और जनजातियों में बहुत लोकप्रिय है । इसका नाम "कड़कनाथ" कैसे पडा़, यह तो शोध का विषय है, लेकिन यह मुर्गा ऊँचा पूरा, काले रंग, काले पंखों और काली टांगों वाला होता है । झाबुआ जिला कोई पर्यटन के लिये विख्यात नहीं है, लेकिन जो भी बाहरी लोग और सरकारी अफ़सर यहाँ आते हैं, उनके लिये "कड़कनाथ" एक आकर्षण जरूर होता है । इसे झाबुआ का "गर्व" और "काला सोना" भी कहा जाता है । जनजातीय लोगों में इस मुर्गे को ज्यादातर "बलि" के लिये पाला जाता है, दीपावली के बाद, त्योहार आदि पर देवी को बलि चढाने के लिये इसका उपयोग किया जाता है । इसकी खासियत यह है कि इसका खून और माँस काले रंग का होता है । लेकिन यह मुर्गा दरअसल अपने स्वाद और औषधीय गुणों के लिये अधिक मशहूर है । खतरे की बात यह है कि इस प्रजाति के मुर्गों की संख्या सन २००१ में अस्सी हजार थी जो अब घटकर सन २००५ में मात्र बीस हजार रह गई है । सरकार भी यह मानती है कि यह प्रजाति खतरे में है और इसे विलुप्त होने से बचाने के उपाय तत्काल किया जाना जरूरी है, ताकि इस बेजोड़ मुर्गे को बचाया जा सके । कड़कनाथ भारत का एकमात्र काले माँस वाला चिकन है । झाबुआ में इसका प्रचलित नाम है "कालामासी" । आदिवासियों, भील, भिलालों में इसके लोकप्रिय होने का मुख्य कारण है इसका स्थानीय परिस्थितियों से घुल-मिल जाना, उसकी "मीट" क्वालिटी और वजन । शोध के अनुसार इसके मीट में सफ़ेद चिकन के मुकाबले "कोलेस्ट्रॊल" का स्तर कम होता है, "अमीनो एसिड" का स्तर ज्यादा होता है । यह कामोत्तेजक होता है और औषधि के रूप में "नर्वस डिसऑर्डर" को ठीक करने में काम आता है । कड़कनाथ के रक्त में कई बीमारियों को ठीक करने के गुण पाये गये हैं, लेकिन आमतौर पर यह पुरुष हारमोन को बढावा देने वाला और उत्तेजक माना जाता है । इस प्रजाति के घटने का एक कारण यह भी है कि आदिवासी लोग इसे व्यावसायिक तौर पर नहीं पालते, बल्कि अपने स्वतः के उपयोग हेतु पाँच से तीस की संख्या के बीच घर के पिछवाडे़ में पाल लेते हैं । सरकारी तौर पर इसके पोल्ट्री फ़ॉर्म तैयार करने के लिये कोई विशेष सुविधा नहीं दी जा रही है, इसलिये इनके संरक्षण की समस्या आ रही है । जरा इसके गुणों पर नजर डालें...प्रोटीन और लौह तत्व की मात्रा - 25.7%, मुर्गे का बीस हफ़्ते की उम्र में वजन - 920 ग्राम, मुर्गे की "सेक्सुअल मेच्युरिटी" - 180 दिन की उम्र में मुर्गी का वार्षिक अंडा उत्पादन - 105 से 110 (मतलब हर तीन दिन में एक अंडा) । इतनी गुणवान नस्ल तेजी से कम होती जा रही है, इसके लिये आदिवासियों और जनजातीय लोगों में जागृति लाने के साथ-साथ सरकार को भी इनके पालन पर ऋण ब्याज दर में छूट आदि योजनायें चलाना चाहिये.. तभी यह उम्दा मुर्गा बच सकेगा ।
नोट : आज से लगभग अठारह वर्ष पूर्व जब कुछ मित्रों के साथ हम लोग अपनी-अपनी स्कूटरों से इन्दौर से मांडव गये थे, तब रास्ते में तेज बारिश के बीच एक ढाबे पर इस मुर्गे का स्वाद लिया था, वह बारिश का सुहावना मौसम और कड़कनाथ आज तक याद है । फ़िर वह मौका दोबारा कभी नहीं आया ।

, , ,

शिल्पा को "गुणवत्ता" पुरस्कार

Written by बुधवार, 01 अगस्त 2007 10:10
शिल्पा शेट्टी को "राष्ट्रीय गुणवत्ता पुरस्कार" मिल गया, चलो अच्छा हुआ वरना हम जैसे अज्ञानियों को पता कैसे चलता कि "गुणवत्ता" क्या होती है और किस चीज से खाई जाती है... लेकिन हमारी सरकार, संस्थायें और कुछ अधिकारियों ने हमें बता दिया कि गुणवत्ता "किस" से खाई जाती है । मैं तो सोच रहा था कि यह गुणवत्ता पुरस्कार रिचर्ड गेरे को मिलेगा कि उन्होंने कैसे शिल्पा को झुकाया, कैसे मोडा़ और फ़िर तडा़तड़ गुणवत्ता भरे चुम्बन गालों पर जडे़ । लेकिन सरकार तो कुछ और ही सोचे बैठी थी, सरकार एक तो कम सोचती है लेकिन जब सोचती है तो उम्दा ही सोचती है, इसलिये उसने शिल्पा को यह पुरस्कार देने का फ़ैसला किया । क्योंकि यदि रिचर्ड को देते तो सिर्फ़ किस के बल पर देना पड़ता, लेकिन अब शिल्पा को दिया है तो वह उसके बिग ब्रदर में बहाये गये आँसुओं, उसके बदले अंग्रेजों से झटकी गई मोटी रकम, फ़िर अधेडा़वस्था में भी विज्ञापन हथिया लेने और ब्रिटेन में एक अदद डॉक्टरेट हासिल करने के संयुक्त प्रयासों (?) के लिये दिया गया है । दरअसल सरकार ने बिग ब्रदर के बाद उसके लिये आईएसआई मार्क देना सोचा था, लेकिन अफ़सरों ने देर कर दी और रिचर्ड छिछोरा सरेआम वस्त्रहरण कर ले गया, फ़िर सरकार ने सोचा कि अब देर करना उचित नहीं है सो तड़ से पुरस्कार की घोषणा कर दी और देश की उभरती हुई कन्याओं को सन्देश दिया कि "किस" करना हो तो ऐसा गुणवत्तापूर्ण करो, अपने एक-एक आँसू की पूरी कीमत वसूलो । पहले सरकार यह पुरस्कार मल्लिका शेरावत को देने वाली थी, लेकिन फ़िर उसे लगा कि यह तो पुरस्कार का अपमान हो जायेगा, क्योंकि मल्लिका तो आईएसओ 14001 से कम के लायक नहीं है । तो भाईयों और (एक को छोड़कर) बहनों, अब कोई बहस नहीं होगी, सरकार ने गुणवत्ता के "मानक" तय कर दिये हैं, यदि कोई इस बात का विरोध करेगा तो उसे "महिला सशक्तीकरण" का विरोधी माना जायेगा ।
, , , ,

"क्रेन बेदी" हार गईं ?

Written by गुरुवार, 26 जुलाई 2007 20:46
एक बार फ़िर से हमारी "व्यवस्था" एक होनहार और काबिल व्यक्ति के गले की फ़ाँस बन गई, टीवी पर किरण बेदी की आँखों में आँसू देखकर किसी भी देशभक्त व्यक्ति का खून खौलना स्वाभाविक है । (जिन लोगों को जानकारी नहीं है उनके लिये - किरण बेदी से दो साल जूनियर व्यक्ति को दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बना दिया गया है, जबकि उस पर गंभीर किस्म के आरोप हैं) हमारी भ्रष्ट व्यवस्था के आगे "क्रेन बेदी" के नाम से मशहूर एक फ़ौलादी महिला को जिस कदर दरकिनार कर दिया गया, उससे एक बार फ़िर स्पष्ट हो गया है कि इटली की महिला का "महिला सशक्तिकरण" का दावा कितना खोखला है । "त्याग", "बलिदान" और "संस्कृति" की दुहाई देने वाली एक औरत दिल्ली में सत्ता की केन्द्र है, एक और औरत उसकी रबर स्टाम्प है, एक गैर-लोकसभाई (गैर-जनाधारी)उसका "बबुआ" बना हुआ है तथा एक और महिला (शीला दीक्षित) की नाक के नीचे ये सारा खेल खेला जा रहा है, इससे बडी़ शर्म की बात इस देश के लिये नहीं हो सकती । शायद किरण बेदी का अपराध यह रहा कि वे सिर्फ़ "ईमानदारी" से काम करने में यकीन रखती हैं, उन्हें अपने अफ़सरों और मातहतों को दारू-पार्टियाँ देकर "खुश" करना नहीं आता । वे पुस्तकें लिखती हैं, कैदियों को सुधारती हैं, अनुशासन बनाती हैं, लेकिन वे यह साफ़-साफ़ भूल जाती हैं कि हमारे "कीचड़ से सने" नेताओं के लिये यह बात मायने नहीं रखती, उन्हें तो चाहिये "जी-हुजूर" करने वाले "नपुंसक और बिना रीढ़ वाले" अधिकारी, जो "खाओ और खाने दो" में यकीन रखते हैं । एक तरफ़ कलाम साहब कल ही 2020 तक देश को महाशक्ति बनाने के लिये सपने देखने की बात फ़रमा कर, सिर्फ़ दो सूटकेस लेकर राष्ट्रपति भवन से निकल गये, वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट को दिल्ली के बंगलों पर काबिज नेताओं और उनके लगुए-भगुओं को निकाल बाहर करने में पसीना आ रहा है, और ये भी मत भूलिये कि "महिला सशक्तिकरण" तो हुआ है, क्योंकि मोनिका बेदी छूट गई ना ! किरण बेदी की नाक भले ही रगड़ दी गई हो । क्या देश है और क्या घटिया व्यवस्था है ?
आईये हम सब मिलकर जोर से कहें - "इस व्यवस्था की तो %&^$*&&%**$% (इन स्टार युक्त चिन्हों के स्थान पर अपने-अपने गुस्से, अपनी-अपनी बेबसी और अपने-अपने संस्कारों के मुताबिक शब्द भर लें) और स्वतंत्रता दिवस नजदीक आ रहा है... झूठा ही सही "मेरा भारत महान" कहने में किसी का क्या जाता है ?

दाऊद भाई..पधारो ना म्हारे देस

Written by शुक्रवार, 20 जुलाई 2007 20:50
दाऊद भाई, आपको ये पत्र लिखते हुए बहुत खुशी हो रही है, चारों तरफ़ खुशी जैसे पसरी हुई है, खुशी का कारण भी है, मोनिका "जी" को भोपाल की एक अदालत ने फ़र्जी पासपोर्ट मामले में बरी कर दिया है, जिसकी खुद मोनिका ने भी सपने में कल्पना नहीं की होगी, लेकिन कल्पना करने से क्या होता है, आप तो जानते ही हैं कि हमारे यहाँ का सिस्टम कैसा "यूजर-फ़्रेंण्डली" हो गया है (जो इस सिस्टम को "यूज़" करता है, ये सिस्टम उसका फ़्रेण्ड बन जाता है), अब आप हों या अबू भाई, कहीं भी बैठे-बैठे सारी जेलों को अपने तरीके से संचालित कर सकते हैं (मैं तो कहता हूँ कि सरकार को आपको जेल सुधार का ठेका दे देना चाहिये)... तो भाई, भूमिका बनाने का तात्पर्य यही है कि हम पलक-पाँवडे़ बिछाये बैठे हैं आपकी राहों में, क्यों खामख्वाह हमारे सीबीआई अधिकारियों को तकलीफ़ देते हो और हमारे गाढे़ पसीने की कमाई जैसी पुर्तगाल से अबू-मोनिका को लाने में बहाई गई, उसे दुबई या कहीं और बहने देना चाहते हो ? भाई सब कुछ तो आपका ही है, हमारे लिये जैसे आप, वैसे पप्पू यादव, वैसे ही शहाबुद्दीन, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता । तो भाई तारीख बताओ और आ जाओ.. मोनिका दीदी पहले ही फ़रमा चुकी हैं कि जेल से ज्यादा सुरक्षित जगह भारत में कोई नहीं है (देखा ! क्या रोशन ख्याल आया है संगत के असर से), एकदम सुरक्षित जेलें हैं यहाँ की, अदालतें भी, कानून भी, वकील भी उनके गुर्गे भी, सब से सब एकदम गऊ, आप जहाँ भी रहना चाहेंगे व्यवस्था करा दी जायेगी, अस्पताल में रहें तो भी कोई बात नहीं हम आप जैसों की सेहत का खयाल रखने वालों में से हैं, सच्ची कहता हूँ भाई खुदा ने चाहा तो एकाध साल में ही मोटे हो जाओगे, जब तक जी करे हमसे सेवा-चाकरी करवाओ, और जब जाने की इच्छा हो बोल देना, हम आपको फ़िर से हवाई जहाज का अपहरण करने की तकलीफ़ नहीं देंगे..वैसे ही छोड़ देंगे.. हाँ, लेकिन आने से पहले "मुझे भारतीय न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है" यह सूत्रवाक्य बोलना मत भूलना... फ़िर देखना कैसे हाथों-हाथ उठाये जाते हो हमारे चिरकुट मीडिया द्वारा, जो आपकी बरसों पुरानी फ़िल्में दिखा-दिखा कर ही टाईम पास कर रहा है, मुम्बई बम ब्लास्ट के चौदह साल बाद फ़ैसले आना शुरु हुए हैं और अभी सुप्रीम कोर्ट बाकी है, तो भाई आपकी बाकी की जिन्दगी तो आराम से कटना तय है यहाँ... फ़िर आपके भाई-बन्धु भी काफ़ी मौजूद हैं यहाँ पहले से ही, जहाँ चार यार मिल जायेंगे रातें गुलजार हो जायेंगी...
आपकी मदद के लिये यहाँ राजनैतिक पार्टियाँ हार-फ़ूल लिये तैयार खडी़ हैं, इधर आपने पावन धरती पर कदम रखा और उधर तड़ से आपकी संसद सदस्यता पक्की... फ़िर मानवाधिकार वाले हैं (जो सूअर के मानवाधिकार भी सुरक्षित रखते हैं)... कई "उद्दीन" जैसे शहाबुद्दीन, तस्लीमुद्दीन और सोहराबुद्दीन (कुछ सरेआम, कुछ छुपे हुए) भी मौजूद हैं जो आपको सर-माथे लेने को उतावले हो उठेंगे.. बस..बस अब मुझसे बयान नहीं किया जाता कि आपको कितनी-कितनी सुविधायें मिलने वाली हैं यहाँ...। मन पुलकित-पुलकित हो रहा है यह सोच-सोचकर ही कि जिस दिन आप इस "महान" देश में पधारेंगे क्या माहौल होगा...यहाँ पासपोर्ट की अदला-बदली आम बात है, कार से कुचलना और बरी होना तो बेहद मामूली बात है, और आप तो माशाअल्लाह.. अब आपकी तारीफ़ क्या करूँ, आपने बडे़ काम किये हैं कोई ऐरे-गैरे जेबकतरे या झुग्गी वाले थोडे़ ही ना हैं आप, अकेले मध्यप्रदेश में बडे़ उद्योगपतियों पर सिर्फ़ बिजली का हजारों करोड़ रुपया बकाया है, मतलब कि आप अकेले नहीं रहेंगे यहाँ... बस अब और मनुहार ना करवाओ... कराची, दुबई, मुम्बई पास-पास ही तो है...आ जाओ... कहीं मुशर्रफ़ का दिमाग सटक गया तो.. नहीं..नहीं.. रिस्क ना लो, आप तो दुनिया की सबसे "सेफ़" जगह पर आ ही जाओ... मैं इन्तजार कर रहा हूँ...

"माँ" पर निबन्ध : माँ से पहचान

Written by मंगलवार, 17 जुलाई 2007 17:45
राहुल.. होमवर्क हो गया क्या ? चलो जल्दी करो.. स्कूल को देर हो रही है । हो गया मम्मी.. देखो स्कूल में मुझे "मेरी माँ" पर निबन्ध लिखकर ले जाना है, मैने लिखा है - "मेरी माँ मुझे जल्दी उठाती है, होमवर्क करवाती है, पढा़ती है, मुझे कहानियाँ सुनाती है, मुझे डॉक्टर के यहाँ ले जाती है..." चलो,चलो ठीक है, जल्दी से नाश्ता कर लो... बस आती ही होगी । माँ ने राहुल को मदद करके उसे स्कूल भेज दिया । लेकिन शाम को जब राहुल स्कूल से वापस आया तो गुमसुम सा था, निराश सा था । स्कूल में मैडम ने कहा कि जो तुम लोग लिखकर लाये हो, वह तो सभी बच्चों ने थोडे-बहुत फ़ेरबदल के साथ लिखा है, तुम लोगों ने निबन्ध में नया क्या लिखा ? माँ तुम्हारे लिये इतना कुछ करती है, इसलिये वह तुम्हें अच्छी लगती है, लेकिन अपनी माँ के बारे में तुम्हें क्या-क्या मालूम है, वह लिखो... तुम्हारी माँ को क्या पसन्द-नापसन्द है, उसके शौक क्या हैं, उसका जन्मदिन, उसकी मेहनत... इन सब के बारे में तुम्हारे पिताजी को, तुम्हारी दीदी और भैया को क्या लगता है, तुम लोग अपनी माँ के लिये क्या करते हो ? इन सब बातों को देखो, परखो और निरीक्षण करके नया निबन्ध लिखकर लाओ, चाहो तो अपने दीदी, भाई या पिताजी से मदद ले सकते हो... तुम लोग अब आठवीं के बच्चे हो, जरा अपना भी दिमाग लगाओ और फ़िर से निबन्ध लिख कर लाओ..
राहुल के निरीक्षण की शुरुआत हो गई.... माँ की पसन्द-नापसन्द... मैं तो सिर्फ़ आलू की सब्जी खाता हूँ, माँ तो सभी सब्जियाँ, चटनियाँ खाती है, हम सभी को ताजा परोसती है, और यदि किसी दिन कम पड़ जाये तो थोडा़ सा ही खाती है.. बचा हुआ खाना बेकार ना जाये इसलिये कई बार खामख्वाह एक रोटी ज्यादा भी खा लेती है । ताजा और गरम खाना हमें परोसती है, और सुबह का या कल का बासी खुद की थाली में लेती है...अरे.. मैने तो कभी माँ से नहीं कहा कि आज मुझे बासी खाना दे दो, ताजी रोटी तुम खा लो.. मैं ही क्यों, दीदी, भैया और पिताजी ने भी माँ से ऐसा नहीं कहा । मुझे टेबल टेनिस खेलना पसन्द है, इसलिये माँ ने मेरे बर्थ-डे पर बैट लाकर दिया । माँ के शौक क्या हैं ? ... हाँ ठीक.. उसे पत्रिकायें पढना और हारमोनियम बजाना अच्छा लगता है, लेकिन बहुत सालों से हमारा हारमोनियम खराब हो गया है, माँ ने तो सभी से कहा था, लेकिन ना तो भैया, न पापा, किसी ने उस हारमोनियम को ठीक नहीं करवाया... थोडा़ सा समय मिलता है तो माँ कुछ पढने बैठ जाती है, लेकिन एकाध पुस्तक खरीदने की बात चलते ही पापा कहते हैं, पत्रिकायें बहुत महंगी हो गई हैं, इतने में तो दीदी की एक किताब आ जायेगी । अब.. रंग.. रंग.. रंग.. माँ को कौन सा रंग पसन्द है ? पता नहीं, क्योंकि माँ खुद के लिये बहुत ही कम साडियाँ खरीदती है, शादी-ब्याह में जो मिल जाती हैं उसी से काम चलाती है, हाँ, लेकिन बिस्तर की चादरें माँ ने हल्के नीले रंग की ली थीं... निबन्ध में नीला लिख लेता हूँ.. । माँ का जन्मदिन.. कब होता है.. मैडम ने कहा है कि कुछ भी माँ से नहीं पूछना है, दीदी ने बताया - ४ जनवरी... इस दिन हम लोग क्या करते हैं... छिः माँ का जन्मदिन तो हमने कभी ठीक से मनाया ही नहीं.. मेरे, दीदी और पापा के बर्थ-डे पर माँ लौकी का हलवा, गुलाब जामुन और पुरणपोली बनाती है । माँ को कौन सी मिठाई पसन्द है ? मालूम नहीं.. क्यों पापा, माँ को मीठे में क्या पसन्द है ? पापा... पापा... "अरे क्या चाहिये, मैं अखबार पढ रहा हूँ, दिखता नहीं क्या ? माँ से पूछो.. मुझे क्या मालूम !
पिछले हफ़्ते दीदी अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक गई थी.. माँ ने सुबह जल्दी उठकर उसके लिये आलू की सब्जी और पूडि़याँ बनाकर दी थीं, पापा ने जो पैसे दिये थे, उसके अलावा अपने पास से पचास रुपये भी दिये... माँ कब पिकनिक पर गई थी ? याद नहीं.. पिछले महीने माँ के महिला मंडल की पिकनिक थी, लेकिन पिताजी ने अपने दोस्तों को खाने पर बुला लिया था और माँ पिकनिक पर नहीं जा पाई । माँ की पढाई के बारे में...मुझे ऐसा याद आ रहा है कि माँ किसी को बता रही थी कि दो मामाओं की पढाई के लिये माँ को कॉलेज बीच में ही छोड़ना पडा़ और उसकी शादी कर दी गई थी । अखबार पढना भी माँ को बहुत पसन्द है, दोपहर में सारे काम निपटाकर माँ अखबार पढती थी, लेकिन दीदी कॉलेज जाने लगी और मैं आठवीं में आ गया तो पिताजी ने हमारी अंग्रेजी सुधारने के लिये हिन्दी अखबार बन्द करके इंग्लिश अखबार लगवा दिया । माँ को टीवी देखना भी अच्छा लगता है, लेकिन रात को पिताजी घर आते ही अंग्रेजी कार्यक्रम और न्यूज लगा देते हैं और मैं दोपहर में कार्टून देखता हूँ, इन सब के बीच माँ को टीवी भी देखने को नहीं मिलता । माँ की सहेलियाँ... एकाध ही हैं महिला मंडल को छोड़कर... मतलब इतने सारे काम करते-करते माँ को सहेलियों के यहाँ जाने का समय ही नहीं मिलता... दीदी अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक, फ़िल्में जाती है, मैं शाम को क्रिकेट खेलने जाता हूँ..पिताजी के दोस्त भी हर रविवार को ताश खेलने आ जाते हैं, माँ उनके लिये चाय-नाश्ता बनाती रहती है । माँ को शाम को घूमने जाना अच्छा लगता है, लेकिन पिताजी तो हमेशा रात को देर से घर आते हैं, मैं खेलने में मगन, दीदी और भैया अपने-अपने दोस्तों में, ऐसे में माँ अकेले ही सब्जी खरीदने के बहाने घूमकर आती है, लेकिन उसे वहाँ से भी जल्दी लौटना पडता है, क्योंकि यदि उसे देर हो जाये तो हम "भूख लगी..भूख लगी" करके उसे परेशान कर देते हैं । माँ कभी-कभी क्यों जरा-जरा सी बात पर चिढ जाती है, अब मुझे समझने लगा है ।
मैडम ने निबन्ध लिखने के लिये दस दिन का समय दिया था, राहुल का निरीक्षण जारी था... माँ के कामकाज, उसकी दिनचर्या और दूसरों के साथ उसकी तुलना करते-करते राहुल की धीरे-धीरे अपनी माँ से "पहचान" हो गई थी.. माँ पर निबन्ध लगभग पूरा हो चला था... और अचानक निबन्ध समाप्त करते-करते उसकी कॉपी पर दो बूँद आँसू टपक पडे़ ।
(एक मराठी रचना का अनुवाद, आंशिक फ़ेरबदल व सम्पादन के साथ)
दादा कोंडके - यह नाम आते ही हमारे सामने छवि उभरती है द्विअर्थी संवादों वाली फ़िल्में बनाने वाले, एक बेहद साधारण से चेहरे मोहरे वाले, नाडा़ लटकती हुई ढीली-ढाली चड्डीनुमा पैंट पहनने वाले, अस्पष्ट सी आवाज में संवाद बोलने वाले एक शख्स की । दादा कोंडके के नाम पर अक्सर हमारे यहाँ का तथाकथित उच्च वर्ग समीक्षक नाक-भौंह सिकोड़ता है, हमेशा दादा को एक दोयम दर्जे का, सिर्फ़ द्विअर्थी और अश्लील संवादों के सहारे अपनी फ़िल्में बनाने वाले के रूप में उनकी व्याख्या की जाती है । यह सुविधाभोगी वर्ग आसानी से भूल जाता है कि मल्टीप्लेक्स के बाहर भी जनता रहती है और उसे भी मनोरंजन चाहिये होता है, उसी वर्ग के लिये फ़िल्में बनाकर दादा का नाम लगातार नौ सिल्वर जुबली फ़िल्में बनाने के लिये "गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स" में शामिल हुआ है (जबकि राजकपूर, यश चोपडा़ और सुभाष घई की भारी-भरकम बजट और अनाप-शनाप प्रचार पाने वाली फ़िल्में कई बार टिकट खिडकी पर दम तोड़ चुकी हैं)।

हिन्दी फ़िल्मों के कलाकार, निर्देशक और यहाँ तक कि फ़िल्म समीक्षक भी एक विशेष प्रकार के घमंड में रहते हैं । उन्हें लगता है कि कुछ चुनिंदा हिन्दी फ़िल्मों में काम करके, करोडों रुपये कमाकर उन्होंने कोई बहुत बडा तीर मार लिया हो या "कला" की बहुत सेवा कर दी हो । जबकि हकीकत यह है कि रजनीकांत की "फ़ैन फ़ॉलोइंग" के आगे अमिताभ बच्चन कहीं नहीं ठहरते, यहाँ तक कि भोजपुरी में भी रवि किशन का जलवा शाहरुख से कहीं ज्यादा है । मराठी भाषा में तो नाटकों की इतनी समृद्ध परम्परा है कि उसके कथ्य, प्रस्तुतीकरण और अभिनय (और सबसे बढकर, एक बडे़ दर्शक वर्ग) के आगे हिन्दी के नाटक कहीं नहीं ठहरते, एक मराठी कलाकार प्रशान्त दामले का नाम रिकॉर्ड बुक्स में इसलिये है कि उन्होंने एक ही दिन में अलग-अलग नाटकों के पाँच शो किये, उन्होंने अब तक तेईस वर्ष में लगभग आठ हजार नाटकों के शो किये, लेकिन फ़िर भी ना जाने क्यों क्षेत्रीय भाषा के कलाकारों को हिन्दी का एक वर्ग जरा हेय दृष्टि से देखता है । दादा कोंडके ने कुछ फ़िल्में हिन्दी में भी बनाईं और वे हिट भी हुईं, लेकिन आरोप लगाने वाले सदा यही राग अलापते रहे कि दादा अश्लील और द्विअर्थी संवाद रखते हैं, इस कारण उनकी फ़िल्में चलती हैं । लेकिन ये आरोप लगाने वाले महेश भट्ट और उनकी टीम को भूल जाते हैं, जो हीरोईन को अर्धनग्न दिखाने के बावजूद फ़िल्म हिट नहीं करवा पाते । खैर.. इस लेख का उद्देश्य है जनता के दिमाग में दादा कोंडके को लेकर बनी छवि को बदलना ।


जन्माष्टमी को मुम्बई के लालबाग इलाके में एक साधारण से परिवार में पैदा हुए दादा कोंडके को बचपन में लोग कृष्णा कहकर बुलाते थे । परिवेश के कारण उनका बचपन गलियों और छोटे-छोटे झगडों में बीता, खुद दादा के शब्दों में - "मेरे बचपन में सभी मुझसे डरते थे, क्योंकि मैं मारपीट करने से नहीं हिचकता था, हमारे मोहल्ले की किसी लड़की को छेडा़ कि समझो उसपर सोडावाटर की बोतलों, ईंटों और पत्थरों से हमला हो जाता था" । बचपन से ही उनमें संगीत की प्रतिभा थी, इसीलिये जब वे एक स्थानीय बैंड पार्टी में शामिल हुए तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ, और इस कारण पहले लोग उन्हें बैंडवाले दादा कहा करते थे । उन्हें नाटकों में पहला मौका दिया वसंत सबनीस ने अपने नाटक "विच्छा माझी पुरी करा" (मेरी इच्छा पूरी करो) । अपने गजब के कॉमेडी सेंस और संवाद अदायगी के कारण दादा कोंडके और वह नाटक बेहद हिट हुआ, उस नाटक के पन्द्रह सौ से अधिक शो में दादा ने काम किया ।

मराठी फ़िल्मों के पितामह तुल्य श्री भालजी पेंढारकर ने दादा को पहली बार "तांबडी माती" (लाल मिट्टी) फ़िल्म मे काम दिया, फ़िर उसके बाद आई फ़िल्म "सोंगाड्या" (बहुरूपिया जोकर) ने उन्हें प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचा दिया, और उसके बाद तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा । एक के बाद एक हिट और सुपरहिट की झडी लगा दी दादा ने । एक समय साठ रुपये महीने पर "अपना बाजार" में पैकिंग करने वाले इस गांवठी व्यक्ति को मराठी जनता ने भरपूर प्यार और पैसा दिया, चाल के एक मामूली से कमरे से मुम्बई के शिवाजी पार्क जैसे पॉश इलाके में एक अपार्टमेंट का मालिक और करोड़पति बनाया, वही शिवाजी पार्क जहाँ सचिन और गावस्कर खेलते-खेलते बच्चे से बडे़ हुए । दादा की पृष्ठभूमि मराठी "तमाशा" और नाटकों की थी इसलिये अपनी फ़िल्मों में भी उन्होंने आम आदमी से जुडे मुद्दों और उसके मनोरंजन का पूरा खयाल रखा । वे हमेशा कहते थे कि "मेरी फ़िल्में मिल मजदूरों, किसानों और सडक के आदमी के लिये हैं, क्योंकि उन्हें भी मनोरंजन का पूरा हक है । मेरी फ़िल्में उच्च वर्ग के लोगों के लिये नहीं हैं, ये तथाकथित उच्च वर्ग के लोग मेरी फ़िल्म यदि अच्छी भी होगी तो एक बार ही देखेंगे, लेकिन एक श्रमिक मेरी फ़िल्म तीन-तीन बार देखेगा और उसे हमेशा मजा आयेगा...(ख्यात अभिनेता और निर्देशक सचिन ने उनके नाटक "विच्छा माझी पुरी करा" अठ्ठाईस बार और "सोंगाड्या" फ़िल्म दस बार देखी) मेरी फ़िल्में "मास" के लिये हैं, "क्लास" के लिये नहीं"। जो व्यक्ति अपनी सीमायें वक्त रहते जान जाता है वही सफ़ल भी हो जाता है, दादा को अपनी शक्लो-सूरत की सीमाओं का ज्ञान था इसलिये कभी भी उन्होंने फ़िल्मों में "शिवाजी" का रोल करने का दुस्साहस नहीं किया, हाँ.. अपने अन्तिम दिनों में वे एक गंभीर फ़िल्म पर काम कर रहे थे, वे शांताराम बापू की "दो आँखे बारह हाथ" से बहुत प्रभावित थे और वैसी ही फ़िल्म बनाना चाहते थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था ।

वे हमेशा जमीन से जुडे़ अभिनेता रहे... दोस्तों को बच्चों की शादी के लिये पैसे की मदद करना, लोगों के आग्रह पर उनके घर जाकर फ़ोटो खिंचवाना, मुफ़्त में उदघाटन करना तो उन्होंने कई बार किया । जब वे सुपर स्टार बन गये थे तब भी वे अपने पुराने बैंड वाले साथियों को नहीं भूले, जब भी समय मिलता वे उनसे मिलने जरूर जाते और उनके साथ ही दरी पर बैठते, जबकि वे लोग कहते ही रहते कि दादा अब आप बडे़ आदमी बन गये हो कम से कम कुर्सी पर तो बैठो...उनके सेक्रेटरी और स्टाफ़ के सदस्य अक्सर उनसे कहते कि दादा आपको फ़िल्म के सेट पर या आऊटडोर में गाँवों में किसी से पान नहीं लेना चाहिये, हो सकता है उसमें जहर मिला हो... लेकिन दादा हमेशा कहते थे कि जिस दिन मैं स्टार जैसा बर्ताव करूँगा तो मैं खुद से ही निगाह नहीं मिला सकूँगा और ये समझूँगा कि क्या मैने अपने बचपन के दिन भुला दिये ? नहीं.. मैं आम आदमी का हूँ और उसी का रहूँगा...।

लगभग बीस वर्षों तक वे मराठी फ़िल्मों के एकछत्र राजा रहे, लेकिन हिन्दी फ़िल्मों में उन्हें उस तरह की सफ़लता नहीं मिली । उन्हें हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री का मिजाज कभी समझ नहीं आया, वे अक्सर मजाक में कहा करते थे कि हिन्दी फ़िल्मों के कलाकार "चरण सिंह" हैं - "वे पल भर में आपके चरण पकड़ते हैं और कुछ दिन बाद ही चरण खींचने भी लगते हैं", "हिन्दी फ़िल्मों की हीरोईने कोई काम-धाम ना होने पर भी हमेशा कहती हैं कि मैं ३६ फ़िल्मों में काम कर रही हूँ.." । अस्सी के मध्य दशक में जब शिवसेना का जनाधार उफ़ान पर था तब बालासाहेब ठाकरे के साथ दादा कोंडके सर्वाधिक भीड़खेंचू नेता थे । दादा की पहली सुपरहिट फ़िल्म "सोंगाड्या" के प्रदर्शन के दौरान जबकि दादा ने कोहिनूर थियेटर अग्रिम राशि देकर बुक कर लिया था, बावजूद इसके थियेटर मालिक देव आनन्द की फ़िल्म "तीन देवियाँ" प्रदर्शित करने पर अड़ गया था, तब बालासाहेब ठाकरे ने अपने "प्रभाव" से दादा कोंडके की फ़िल्म उसी थियेटर में प्रदर्शित करवाई, उस दिन से बाल ठाकरे और दादा अभिन्न मित्र बन गये और मित्रता भी ऐसी कि दादा के पार्थिव शरीर पर बाल ठाकरे ने सिर्फ़ हार नहीं चढाये बल्कि उनके पैरों पर सिर भी रखा । मजे की बात यह है कि बाल ठाकरे और दादा कोंडके दोनो का कैरियर लगभग साथ-साथ ही शुरु हुआ और अपने शीर्ष पर पहुँचा...(ये और बात है कि जिस कार्टूनिस्ट बाल ठाकरे की तारीफ़ आर.के.लक्ष्मण नें सर्वाधिक प्रतिभाशाली और प्रभावशाली के रूप में की थी, वह राजनीति की भूलभुलैया में उस कला को खो बैठा), लेकिन दादा कोंडके ने कभी अपनी राह नहीं खोई और आम आदमी के लिये फ़िल्में बनाना जारी रखा ।

दरअसल उनकी कॉमेडी यात्रा का आरम्भ तब हुआ जब एक ही साल के अन्दर उनके कई नजदीक के नाते-रिश्तेदारों की मृत्यु हो गई, दादा कहते थे - मैं इन मौतों से बुरी तरह से हिल गया था, एक साल तक मैने किसी से बात नहीं की, खाने की इच्छा भी नहीं होती थी, मुझे लगता था कि मैं पागल हो जाऊँगा, लेकिन अचानक पता नहीं क्या हुआ मैने मन में ठाना कि अब अपने दुःख भुलाकर मैं लोगों को हँसाऊँगा..और मैने कॉमेडी शुरु कर दी" । दादा कोंडके ने कई लोगों को मौका दिया, जिनमें से प्रमुख हैं मराठी के एक और सुपरस्टार अशोक सराफ़ और संगीतकार राम-लक्ष्मण । दादा की फ़िल्मों की हीरोइन अधिकतर फ़िल्मों में ऊषा चव्हाण ही रहीं, दादा पर फ़िल्माये अधिकतर गाने महेन्द्र कपूर ने गाये और हीरोईन के ऊषा मंगेशकर ने । महेन्द्र कपूर ने पंजाबी होते हुए भी मराठी में दादा के लिये इतने गाने गाये कि एक बार दादा ने मजाक में उनसे पूछ लिया था कि "महेन्द्र जी कहीं अब आप हिन्दी गाना भूल तो नहीं गये" । १४ मार्च १९९८ को अड़सठ वर्ष की आयु में दादा का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया और मराठी सिनेमा का एक युग समाप्त हुआ...

संक्षेप में कहें तो - दादा कोंडके हों या रजनीकांत (जो आज भी अपने बरसों पुराने ड्रायवर दोस्त से मिलने बंगलोर जाते हैं तो उसी के घर ठहरते हैं) या एनटीआर (दो रुपये किलो चावल वाली सफ़ल योजना उन्हीं की देन थी), ये सभी लोग महान इसलिये बने हैं क्योंकि वे शिखर पर पहुँचने के बावजूद जमीन से जुडे रहे, हमेशा आम आदमी की समस्याओं को लेकर फ़िल्में बनाईं या गरीब तबके के लोगों का शुद्ध मनोरंजन किया । मुझे पूरा विश्वास है कि यदि दादा कोंडके आज विज्ञापन बनाते तो वे ब्रा-पैंटी और कंडोम के विज्ञापन भी इस तरह से बनाते कि जिसे समझना है वह पूरी तरह समझ जाये और जिस उम्र के लायक नहीं है वह बिलकुल भी ना समझ पाये, और तब शायद दादा को द्विअर्थी और अश्लील कहने वाले बगलें झाँकते (अभी वे लोग इसलिये बगलें झाँकते हैं कि टीवी पर दिखाया जा रहा "तमाशा" और तथाकथित "सभ्य विज्ञापन" उन्हें अश्लील नहीं दिखते)। अश्लीलता या सेक्स मानव की आँखों से दिमाग मे होते हुए कमर के नीचे पहुँचता है, यदि दिमाग पर व्यक्ति का नियंत्रण है तो अनावृत्त नारी या अश्लील बातें भी पुरुष को उत्तेजित नहीं कर सकतीं । यह लोगों को तय करना है कि "खुल्लमखुल्ला" अच्छी बात है या "द्विअर्थी" होना... उम्मीद है कि दादा कोंडके की तरफ़ देखने का हिन्दीभाषियों का नजरिया कुछ बदलेगा...

प्रकाश प्रदूषण : एक धीमा जहर ?

Written by मंगलवार, 26 जून 2007 10:33
पाठकगण शीर्षक देखकर चौंकेंगे, लेकिन यह एक हकीकत है कि धीरे-धीरे हम जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण के बाद अब प्रकाश प्रदूषण के भी शिकार हो रहे हैं । प्रकाश प्रदूषण क्या है ? आजकल बडे़ शहरों एवं महानगरों में सडकों, चौराहों एवं मुख्य सरकारी और व्यावसायिक इमारतों पर तेज रोशनी की जाती है, जिसका स्रोत या तो हेलोजन लैम्प, सोडियम वेपर लैम्प अथवा तेज नियोन लाईटें होती हैं । उपग्रह से पृथ्वी के जो चित्र लिये गये हैं उसमें टोकियो और जापान का कुछ हिस्सा, पश्चिमी यूरोप के लन्दन और फ़्रैंकफ़ुर्ट और अमेरिका के शिकागो और न्यूयार्क शहरों की तेज रोशनी के चित्र स्पष्ट तौर पर नजर आते हैं, इससे कल्पना की जा सकती है कि इन महानगरो में रात के समय कितनी तेज रोशनी होती है । रात्रि के समय इस प्रकार के तेज प्रकाश से नागरिक तो खुश होते हैं और उन्हें कोई असुविधा नहीं होती, लेकिन पर्यावरण एवं छोटे-छोटे जीव-जंतुओं पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है । सबसे पहले बात प्रकृतिप्रेमियों की, इन शहरों के लोग आसपास की तेज रोशनी के कारण आकाशगंगा को ही ठीक से नहीं देख पाते । मुम्बई के किसी मुख्य चौराहे पर खडे होकर हम अधिक से अधिक २५० तारे देख सकते हैं, लेकिन शहर के बाहर निकलने पर किसी अन्धेरे स्थान पर खडे होकर हमें नंगी आँखों से २५०० से अधिक नक्षत्र और तारे आसानी से दिख जाते हैं । यह कोई मुख्य समस्या नहीं है, बल्कि असल बात तो यह है कि रात्रिकालीन तेज प्रकाश के कारण अनेक पक्षी, कीट-पतंगे अपना रास्ता भूल जाते हैं और भटक कर रोशनी के स्रोतों से टकराते रहते हैं । एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग दस करोड़ पक्षी ऊँची इमारतों से टकराकर मर जाते हैं । वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर रॉड क्राफ़ोर्ड के अनुसार "पहले आमतौर पर दिखाई दे जाने वाले कई कीट हमारी नजरों से दूर होते जा रहे हैं, कुछ छोटे पतंगे तो शहरों से लगभग लुप्तप्राय होने लगे हैं, क्योंकि रात की तेज रोशनी में वे अपना सफ़र नहीं कर पाते और उनके प्राकृतिक "मिलन" के लिये जो रात का कम समय मिल पाता है, उसमें भी कमी हो गई है । साथ ही तेज प्रकाश के कारण वे बडे पक्षियों के शिकार बन जाते हैं । इसी प्रकार एक जीव विज्ञानी डॉ. मारिआन मूर, जिन्होंने झीलों के सूक्ष्म जीवों (zooplanktons) पर गहन अनुसन्धान किया है, कहते हैं "तालाब या झील के ये सूक्ष्म जीव रात के समय पानी की सतह पर आकर जल शैवालों का भक्षण करते हैं, लेकिन नदी या झीलों के किनारे तेज प्रकाश के कारण वे सतह पर आने से कतराते हैं और उन्हें अधिक समय पानी के नीचे ही गुजारना पड़ता है, इसलिये सतह पर शैवालों (Algae) का बढना जारी रहता है जिसके कारण अन्य दूसरी जलीय वनस्पतियों को पनपने का मौका ही नहीं मिलता । चन्द्रमा के नैसर्गिक प्रकाश में इन विविध प्राणियों को सहवास का जो समय मिलता है वह अब तेज रोशनी के कारण होने वाले दिमागी भ्रम के कारण नहीं मिलता, इस कारण लाखों प्रजातियाँ लुप्त होने की कगार पर आ गई हैं ।

(यह चित्र अमेरिका में रात होते समय का उपग्रह से लिया गया है, जिसमें अमेरिका के चकाचौंध शहर साफ़ दिखाई देते हैं)
हालांकि लोग कहते हैं कि मनुष्य की सुविधा और अपराधों पर नियन्त्रण के लिये रात में तेज प्रकाश आवश्यक है और उसके कारण पर्यावरण को होने वाले नुकसान की परवाह नहीं करना चाहिये, लेकिन इस तेज प्रकाश का मनुष्यों पर भी घातक प्रभाव पड़ रहा हो तब तो हमें सचेत हो ही जाना चाहिये । "नेशनल कैन्सर इंस्टिट्यूट" की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक प्रकाश की अपेक्षा रात्रिकालीन प्रकाश में अधिक देर तक रहने से कैंसर का खतरा बढ जाता है । रिपोर्ट के अध्ययन के अनुसार जो स्त्रियाँ नाईट शिफ़्ट में काम करती हैं, उनमें स्तन कैंसर की मात्रा अधिक पाई गई, इसी प्रकार बोस्टन के एक अस्पताल में किये गये शोध के अनुसार रात्रि पाली में काम करने वाली नर्सों में कैंसर की सम्भावना 36% तक बढ गई थी । दरअसल, तेज प्रकाश के कारण शरीर में मेलाटोनिन के निर्माण में कमी आती है, इस हार्मोन पर शरीर के "चक्र" का दारोमदार होता है, जिससे यह चक्र गडबडा़ जाता है । मेलेटोनिन में Antioxidant गुण होते हैं, इनमें कमी के कारण Astrogen का निर्माण भी बाधित होता है और अन्ततः यही कैंसर का कारण बनता है ।

(इस चित्र में जापान, यूरोप, दुबई, और अमेरिका के बडे शहरों को आसानी से चिन्हित किया जा सकता है)

नैसर्गिक प्रकाश मनुष्य या प्राणी के शरीर के लिये औषधि का काम करता है, लेकिन कृत्रिम प्रकाश का अधिकाधिक उपयोग बीमारियों को बढा़ता जा रहा है । यह एक सामान्य सा स्थापित तथ्य है कि जिन घरों में सूर्य का प्रकाश अधिक देर तक रहता है, वहाँ लोग अधिक स्वस्थ रहते हैं । नॉर्वे, स्वीडन आदि स्कैंडेनेवियाई देशों के नागरिक सूर्य देखने के लिये तरस जाते हैं, वहाँ कई बार चार-छः महीनों तक धूप ही नहीं निकलती । विदेशी पर्यटक यूँ ही नहीं गोवा और कोवलम के बीचों पर नंग-धडंग पडे़ रहते, बल्कि धूप से अधिक देर तक दूर रहने के कारण उनको त्वचा कैंसर का खतरा होता है, इसलिये डॉक्टर उन्हें "धूप-स्नान" की सलाह देते हैं । हम भारतवासी सौभाग्यशाली हैं कि हमें धूप, ठंड और बारिश लगभग समानुपात में मिलती है (ये और बात है कि हम उसकी कद्र नहीं करते) । सामान्यतः एक बडे़ बल्ब की प्रखरता 2900 ल्यूमेन्स होती है, जबकि फ़्लोरोसेंट ट्यूब की 7750, मरकरी लैम्प की 19100, कम प्रेशर के सोडियम लैम्प की 33000, अधिक दबाव वाले सोडियम लैम्प की 45000 और मेटल हेलाईड के प्रकाश की तीव्रता 71000 ल्यूमेन्स होती है । इसके कारण इनके आसपास के वातावरण के तापमान में भारी वृद्धि हो जाती है । स्टेडियमों में लगने वाले बल्बों से अल्ट्रावॉयलेट किरणें एवं अन्य उच्च दाब के प्रकाश से इन्फ़्रारेड किरणें निकलती हैं, और यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इन किरणों का मनुष्य के शरीर पर क्या प्रभाव पडता है । यदि किसी बडे शहर की सभी सार्वजनिक लाईटों को दो सौ वॉट की बजाय सौ वॉट एवं ढाई सौ की बजाय डेढ सौ वॉट में बदल दिया जाये तो कितनी ऊर्जा और बिजली की बचत होगी । इमारतों और सडकों पर उतना ही प्रकाश होना चाहिये जितनी जरूरत है, खामख्वाह आँखें चौंधियाने वाले प्रकाश की कोई आवश्यकता नहीं है और ऐसा अभी सिद्ध नहीं हुआ है कि अंधेरी रातों में अधिक चोरियाँ होती हैं, बल्कि पुलिस के अनुसार सेंधमारी और लूट दिन के वक्त ज्यादा होती है, जब घरों में कोई नहीं होता । इसलिये समय आ गया है कि सभी नगरीय प्रशासनिक संस्थायें इस दिशा में विचार करें, वैसे ही हमारे देश में बिजली की कमी है, फ़िर क्यों उसका इस तरह से अपव्यय किया जाये ? साथ ही स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिये तो यह हितैषी होगा ही, कि हम सब मिलकर कटौती करने की कोशिश करें । बडे़-बडे़ शोरूमों और कम्पनियों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने यहाँ गैरजरूरी लाईटों में कमी करें, साईन बोर्ड रात के दस बजे तक ही चालू रखें । नगरपालिकायें सडक की बत्तियाँ एक खंभा छोडकर एक पर जलायें । यही बात घरों पर भी लागू करने की कोशिश करें और ट्यूबलाईटों को निकालकर CFL का अधिकाधिक प्रयोग शुरु करें, साथ ही यह भी याद करने की कोशिश करें कि पिछली बार आपने "जुगनू" कब देखा था ?
स्व-आचार संहिता : इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री एवं लेखों पर आधारित

पिता : घर का अस्तित्व

Written by रविवार, 24 जून 2007 16:19
"माँ" घर का मंगल होती है तो पिता घर का "अस्तित्व" होता है, परन्तु इस अस्तित्व को क्या कभी हमनें सच में पूरी तरह समझा है ? पिता का अत्यधिक महत्व होने के बावजूद उनके बारे में अधिक बोला / लिखा नहीं जाता, क्यों ? कोई भी अध्यापक माँ के बारे में अधिक समय बोलता रहता है, संत-महात्माओं ने माँ का महत्व अधिक बखान किया है, देवी-देवताओं में भी "माँ" का गुणगान भरा पडा़ है, हमेशा अच्छी बातों को माँ की उपमा दी जाती है, पिता के बारे में कुछ खास नहीं बोला जाता । कुछ लेखकों ने बाप का चित्रण किया भी है तो गुस्सैल, व्यसनी, मार-पीट करने वाला इत्यादि । समाज में एक-दो प्रतिशत बाप वैसे होंगे भी, लेकिन अच्छे पिताओं के बारे में क्यों अधिक नहीं लिखा जाता, क्यों हमेशा पुरुष को भावनाशून्य या पत्थरदिल समझा जाता है ? माँ के पास आँसू हैं तो पिता के पास संयम । माँ तो रो-धो कर तनावमुक्त हो जाती है, लेकिन सांत्वना हमेशा पिता ही देता है, और यह नहीं भूलना चाहिये कि रोने वाले से अधिक तनाव सांत्वना / समझाईश देने वाले को होता है । दमकती ज्योति की तारीफ़ हर कोई करता है, लेकिन माथे पर तेल रखे देर तक गरम रहने वाले दीपक को कोई श्रेय नहीं दिया जाता । रोज का खाना बनाने वाली माँ हमें याद रहती है, लेकिन जीवन भर के खाने की व्यवस्था करने वाला बाप हम भूल जाते हैं । माँ रोती है, बाप नहीं रो सकता, खुद का पिता मर जाये फ़िर भी नहीं रो सकता, क्योंकि छोटे भाईयों को संभालना है, माँ की मृत्यु हो जाये भी वह नहीं रोता क्योंकि बहनों को सहारा देना होता है, पत्नी हमेशा के लिये साथ छोड जाये फ़िर भी नहीं रो सकता, क्योंकि बच्चों को सांत्वना देनी होती है । जीजाबाई ने शिवाजी निर्माण किया ऐसा कहा जाता है, लेकिन उसी समय शहाजी राजा की विकट स्थितियाँ नहीं भूलना चाहिये, देवकी-यशोदा की तारीफ़ करना चाहिये, लेकिन बाढ में सिर पर टोकरा उठाये वासुदेव को नहीं भूलना चाहिये... राम भले ही कौशल्या का पुत्र हो लेकिन उनके वियोग में तड़प कर जान देने वाले दशरथ ही थे । पिता की एडी़ घिसी हुई चप्पल देखकर उनका प्रेम समझ मे आता है, उनकी छेदों वाली बनियान देखकर हमें महसूस होता है कि हमारे हिस्से के भाग्य के छेद उन्होंने ले लिये हैं... लड़की को गाऊन ला देंगे, बेटे को ट्रैक सूट ला देंगे, लेकिन खुद पुरानी पैंट पहनते रहेंगे । बेटा कटिंग पर पचास रुपये खर्च कर डालता है और बेटी ब्यूटी पार्लर में, लेकिन दाढी़ की क्रीम खत्म होने पर एकाध बार नहाने के साबुन से ही दाढी बनाने वाला पिता बहुतों ने देखा होगा... बाप बीमार नहीं पडता, बीमार हो भी जाये तो तुरन्त अस्पताल नहीं जाते, डॉक्टर ने एकाध महीने का आराम बता दिया तो उसके माथे की सिलवटें गहरी हो जाती हैं, क्योंकि लड़की की शादी करनी है, बेटे की शिक्षा अभी अधूरी है... आय ना होने के बावजूद बेटे-बेटी को मेडिकल / इंजीनियरिंग में प्रवेश करवाता है.. कैसे भी "ऎड्जस्ट" करके बेटे को हर महीने पैसे भिजवाता है.. (वही बेटा पैसा आने पर दोस्तों को पार्टी देता है) । पिता घर का अस्तित्व होता है, क्योंकि जिस घर में पिता होता है उस घर पर कोई बुरी नजर नहीं डालता, वह भले ही कुछ ना करता हो या ना करने के काबिल हो, लेकिन "कर्तापुरुष" के पद पर आसीन तो होता ही है और घर की मर्यादा का खयाल रखता है.. किसी भी परीक्षा के परिणाम आने पर माँ हमें प्रिय लगती है, क्योंकि वह तारीफ़ करती है, पुचकारती है, हमारा गुणगान करती है, लेकिन चुपचाप जाकर मिठाई का पैकेट लाने वाला पिता अक्सर बैकग्राऊँड में चला जाता है... पहली-पहली बार माँ बनने पर स्त्री की खूब मिजाजपुर्सी होती है, खातिरदारी की जाती है (स्वाभाविक भी है..आखिर उसने कष्ट उठाये हैं), लेकिन अस्पताल के बरामदे में बेचैनी से घूमने वाला, ब्लड ग्रुप की मैचिंग के लिये अस्वस्थ, दवाईयों के लिये भागदौड करने वाले बेचारे बाप को सभी नजरअंदाज कर देते हैं... ठोकर लगे या हल्का सा जलने पर "ओ..माँ" शब्द ही बाहर निकलता है, लेकिन बिलकुल पास से एक ट्रक गुजर जाये तो "बाप..रे" ही मुँह से निकलता है । जाहिर है कि छोटी मुसीबतों के लिये माँ और बडे़ संकटों के लिये बाप याद आता है...। शादी-ब्याह आदि मंगल प्रसंगों पर सभी जाते हैं लेकिन मय्यत में बाप को ही जाना पड़ता है.. जवान बेटा रात को देर से घर आता है तो बाप ही दरवाजा खोलता है, बेटे की नौकरी के लिये ऐरे-गैरों के आगे गिड़गिडा़ता, घिघियाता, बेटी के विवाह के लिये पत्रिका लिये दर-दर घूमता हुआ, घर की बात बाहर ना आने पाये इसके लिये मानसिक तनाव सहता हुआ.. बाप.. सच में कितना महान होता है ना !
(यह एक मराठी रचना का अनुवाद है)
बारह ज्योतिर्लिंगों में से सबसे बडे़ आकार वाले और महत्वपूर्ण "महाकालेश्वर" मन्दिर का ऑडिट सम्पन्न हुआ । यह ऑडिट सिंहस्थ-२००४ के बाद में मन्दिर को मिले दान और उसके रखरखाव के बारे में था । इसमें ऑडिट दल को कई चौंकाने वाली जानकारियाँ मिलीं, दान के पैसों और आभूषणों में भारी भ्रष्टाचार और हेराफ़ेरी हुई है । ऑडिट दल यह जानकर आश्चर्यचकित हो गया कि मन्दिर को भेंट में मिले आभूषणों का वजन नहीं किया जाता, ऐसे में ऑडिट कैसे किया जाये ? ऑडिट टीम ने पहले ही दिन एक बडा़ घपला पकड़ लिया जिसमें एक रसीद कट्टे में 7000 रुपये को 700.00 रुपये कर दिया गया था, इसके लिये एक जीरो को दशमलव बना दिया गया और आगे एक जीरो लगा दिया गया, ऐसा शून्य वाली कई रसीदों में पाया गया, कभी 51 को 5/- बना दिया गया, कभी 101 को 10/- बना दिया है, कुछ रसीदों की कार्बन कॉपी को रबर से ही मिटा दिया गया है, ऐसे में यह भी नहीं पता कि उस रसीद में कितना दान मिला था । ऑडिट दल को पहले ही दिन लगभग 65000 रुपये की हेराफ़ेरी के बारे में पता चल गया जो कि मन्दिर कर्मचारियों ने हजम कर ली है । इसी प्रकार सोने के पाँच आभूषणों की रसीद है, लेकिन स्टॉक रजिस्टर में उसकी आमद दर्ज नहीं है, सात चाँदी के छत्र मिलाकर कुल २० आभूषण रसीद पर तो हैं, लेकिन स्टॉक में नहीं हैं । दान लेने वाले कर्मचारियों ने समझदारी (?) दिखाते हुए किसी भी आभूषण की रसीद पर उसका वजन अंकित नहीं किया है, ऐसे में अन्दाजा लगाना भी मुश्किल है कि वह आभूषण १०० ग्राम का था या १० ग्राम का ? ऑडिट दल को सन्देह है कि वजन नहीं लिखने के पीछे कारण यह है कि बाद में दूसरे हल्के कम वजन के आभूषणों को उसकी जगह रखा जा सके, बिछिया, नाग, छत्र, चाँदी के पाट और न जाने क्या-क्या, किसी भी रसीद पर वजन अंकित नहीं है । ऐसे ही हमारे दानवीर लोग भी हैं, दान देने वाले ने कहीं सिर्फ़ अपना नाम और कहीं सिर्फ़ जगह का नाम लिखवाया है, जैसे रुपये १०,००० रामलाल की ओर से अथवा सोने के कुंडल जोधपुर वालों की ओर से आदि... अब ऑडिट वाले यदि पता भी करना चाहें कि वाकई दानदाता ने कितनी रकम दी थी, तो वे कैसे पता करें, यानी कि पूरा का पूरा माल खल्लास । कई कर्मचारियों का तबादला हो गया, कई रिटायर हो गये, किस रसीद पर किसके हस्ताक्षर हैं, कौन-कौन से कर्मचारी उस वक्त मन्दिर काऊंटर पर तैनात थे, किसी को कुछ भी पता नहीं... प्रथम दृष्टया यह एक बडे घोटाले की ओर संकेत करता है । मजे की बात यह है कि एक "साम्प्रदायिक" (?) सरकार ने पहली बार प्रदेश के १२५ मन्दिरों का ऑडिट करवाने का निर्णय लिया और इसके लिये बाकायदा गजट नोटिफ़िकेशन जारी किया गया और महाकालेश्वर के दरबार से ही इसकी शुरुआत की, अब आगे-आगे देखिये होता है क्या ? जाँच दल अब तक कलेक्टर को इस सम्बन्ध में १६ पत्र लिख चुका है और मन्दिर प्रशासक ने जो समिति बनाई है, उसमें अकाऊंट विभाग के कर्मचारी भी हैं, जबकि ऑडिट वालों ने इन्ही कर्मचारियों को सन्देह के दायरे में रखा है, बात साफ़ है कि "भारत की महान परम्परा" (!) के अनुसार सिर्फ़ लीपापोती कर दी जायेगी, होना-जाना कुछ नहीं है । जैसा कि तिरुपति मन्दिर के लड्डू घोटाले के समय हुआ था, जिन भाईयों को जानकारी नहीं है उन्हें बता दूँ कि कुछ वर्षॊं पूर्व प्रसिद्ध तिरुपति मन्दिर में भी एक महाकाय घोटाला पकड़ में आया था । हुआ यूँ था कि तिरुपति में प्रसाद के रूप में एक किलो का विशाल लड्डू भक्तों को बेचा जाता है, ताकि वे अपने घर ले जा सकें और दूसरों में बाँट सकें, यह लड्डू सूखे मेवों, काजू, किशमिश आदि से बनता है और महंगा होता है (लागत में) और वह भक्तों को "नो प्रॉफ़िट नो लॉस" पर बेचा जाता है । अब भारतीयों का उम्दा भ्रष्टाचारी दिमाग देखिये - एक किलो के लड्डू को पापियों ने ९०० ग्राम या ९५० ग्राम का कर दिया और उस ५०-१०० ग्राम में से काजू, बदाम, पिस्ते बेच खाये, और यह वर्षों से चल रहा था, अब सोचिये कितने करोडों के वारे-न्यारे कर लिये गये होंगे वह भी धर्म और आस्था के नाम पर । कोई भक्त इतना नीच नहीं सोच सकता कि चलो लड्डू को तुलवाकर देख लें.. इसका फ़ायदा दुराचारियों ने उठाया और लाखों-करोडों रुपये सिर्फ़ लड्डू के वजन में थोडा़ सा फ़र्क करके खा लिये । देखा आपने उर्वर दिमाग ! यहाँ भ्रष्टाचार रग-रग में इतना समा चुका है कि करने वाले को शर्म आना तो दूर वह रिश्वत को अपना हक समझने लगा है । लोगबाग मन्दिर के चन्दे के पैसे खा सकते हैं, श्मशान घाट की लकडि़यों में कमीशन खा सकते हैं, विकलांग बच्चों की बैसाखियों और ट्रायसिकल में रिश्वत खा सकते हैं, मध्यान्ह भोजन योजना में गरीब बच्चों का दलिया और तेल खा जाते हैं, सरकारी अस्पतालों में रोगी कल्याण समितियों से गरीबों को मिलने वाली मुफ़्त दवा बेच खाते हैं.. गरज कि जिसे जहाँ मौका मिल रहा है सिर्फ़ खा रहा है...सरकार का तो डर पहले से ही नहीं था और अब भगवान का डर भी खत्म हो गया है, क्योंकि उसके दलाल चारों तरफ़ फ़ैले हुए हैं जो पापियों से कहते हैं "इतना दान कर दो.. तो इतने पाप धुल जायेंगे", "यदि एक बार भंडारा करवा दिया तो तुम्हें पुण्य मिलेगा", "नवरात्रि में विशाल कन्या भोज करवा दो, भ्रूण हत्या का पाप कम लगेगा"...मेरे मत में मन्दिरों में बढती दानदाताओं की भीड़ का अस्सी प्रतिशत हिस्सा उन लोगों का है जो भ्रष्ट, अनैतिक और गलत रास्तों से पैसा कमाते हैं और फ़िर अपनी अन्तरात्मा पर पडे बोझ को कम करने के लिये भगवान को भी रिश्वत देते हैं... किसी पण्डे/पुजारी/महाराज आदि नें कभी यह नहीं कहा कि "बच्चा तूने बहुत पाप किये हैं, जा कुछ दिन जेल में रहकर आ..." वह दलाल यही कहेगा कि भगत तू सोने का मुकुट तिरुपति को दान कर और मेरी दक्षिणा दे दे बस, तेरा काम (!) हो जायेगा...। इस दृष्टि से यदि देखा जाये तो महाकालेश्वर मन्दिर में हुई धाँधली के निहितार्थ हैं "चोरों को पड़ गये मोर"... एक ने माल कमाया, उससे भगवान को खुश (?) करने के लिये थोडा़ सा माल उधर सरकाया, उस माल को दूसरा चोर ले गया (यानी "मनी सर्कुलेशन", जो "बाजार" को मजबूत बनाता है)... यदि देश भर के मन्दिरों को दान देने वाले महापुरुषों और उन मठों, मन्दिरों और आश्रमों की वास्तविक आय और उसके स्रोत का पता लगाने की कोशिश की जाये, तो ऐसी सडाँध उठेगी कि...

सोनिया की नई कठपुतली

Written by शुक्रवार, 15 जून 2007 10:26
आखिरकार इस महान देश को राष्ट्रपति पद का / की उम्मीदवार मिल ही गया, महीनों की खींचतान और घटिया राजनीति के बाद अन्ततः सोनिया गाँधी ने वामपंथियों को धता बताते हुए प्रतिभा पाटिल नामक एक और कठपुतली को उच्च पद पर आसीन करने का रास्ता साफ़ कर लिया है, दूसरी कठपुतली कौन है यह तो सभी जानते हैं । इस तरह सोनिया के दोनो हाथों मे लड्डू हो गये हैं, एक जेब में प्रधानमन्त्री और दूसरी में राष्ट्रपति । इन्दिरा गाँधी ने भी जैल सिंह को इसीलिये राष्ट्रपति बनवाया था क्योंकि वे सार्वजनिक तौर पर कह चुके थे कि "मुझे मैडम की चप्पलें उठाने में भी कोई शर्म नहीं है"...। कलाम साहब तो उसी दिन से सबको खटकने लगे थे, जब उन्होंने "लाभ के पद" वाले मुद्दे पर सरकार को "डंडा" कर दिया था, हालांकि उन्होंने भी अफ़जल की फ़ाँसी रोककर अपनी गोटियाँ चलने की कोशिश की थी, लेकिन उनका गैर राजनैतिक होना आडे़ आ गया । प्रतिभा पाटिल का नाम अचानक नहीं आया लगता, क्योंकि हमारे यहाँ सत्ता प्रतिष्ठान हमेशा ऐसा राष्ट्रपति पसन्द करता है जो "यस मैन" हो, इसलिये प्रणब मुखर्जी की सम्भावना तो वैसे ही कम हो गई थी (फ़िर महारानी को यह भी याद था कि उनके पति को प्रधानमन्त्री बनाने का विरोध प्रणब बाबू ने किया था), अर्जुनसिंह तो अति-राजनीति का शिकार हो गये लगते हैं और काँग्रेस को अभी आरक्षण की फ़सल काटना बाकी है, इसलिये शायद उनका नाम आगे नहीं बढाया गया (यदि अर्जुनसिंह खडे होते तो शेखावत की जीत पक्की हो जाती, क्योंकि अर्जुनसिंह के कांग्रेस में ही इतने दुश्मन हैं कि वे पार्टी लाईन से हटकर शेखावत को वोट देते), शिवराज पाटिल को वामपंथियों ने समर्थन नहीं दिया, क्योंकि वे मोदी को "वाजिब डंडा" करने में असफ़ल रहे । कर्ण सिंह "सॉफ़्ट हिन्दुत्ववादी" (?) माने जाते हैं इसलिये कट गये, सिर्फ़ रहस्य है कि सुशील कुमार शिन्दे का नाम क्यों कटा, जबकि वे तो दलित भी हैं और मायावती से सोनिया पींगें बढा़ चुकी हैं । शायद महारानी को प्रतिभा पाटिल का नाम इसलिये आगे बढाना पडा़ ताकि "राजस्थान की बहू" होने के नाते शेखावत के वोट काटे जा सकें (हकीकत तो यही है कि यूपीए भैरोंसिंह शेखावत के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए आतंकित है), खैर जो भी हो अब देखना यही है कि महिला आरक्षण के नाम पर नौटंकी करने वाले सारे दल क्या-क्या खेल खेलते हैं, कुछ अनहोनी नहीं हुई तो पहली महिला राष्ट्रपति (या पत्नी ?) बनना तय है ।