"लिफ़्ट" में फ़िल्माये दो मधुर गीत

Written by गुरुवार, 27 सितम्बर 2007 16:54

Hindi film songs in LIFT

हिन्दी फ़िल्मों ने हमें लाखों मधुर गीत दिये हैं, महान गीतकारों और संगीतकारों ने एक से बढ़कर एक गाने लिखे और निर्माता-निर्देशकों ने उन्हें अपने अनोखे अंदाज में फ़िल्माया भी है। हिन्दी फ़िल्मों में लगभग प्रत्येक अवसर, हरेक जगह और हरेक चरित्र पर गीत फ़िल्माये जा चुके हैं। जंगल, बगीचा, घर, घर की छत, डिस्को, क्लब, मन्दिर, मयखाना, तुलसी का पौधा, टेलीफ़ोन, आटो, बस, रिक्शा, तांगा.... गरज कि ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ फ़िल्म निर्माताओं ने गीत को फ़िल्माने का मौका हाथ से जाने दिया हो। सहज ही मुझे दो मधुर गीत याद आते हैं जो बहुमंजिला इमारत की “लिफ़्ट” में फ़िल्माये गये हैं (“लिफ़्ट” के लिये सरलतम हिन्दी शब्द की खोज में भी हूँ)।

Ridiculous Foolish Statements

स्वतंत्रता के साठ वर्षों का जश्न हमने अभी-अभी ही मनाया। देश के पिछले साठ सालों पर सरसरी नजर डालें तो सबसे ज्यादा खटकने वाली बात हम पाते हैं नेताओं और प्रशासन द्वारा दिये गये मूर्खतापूर्ण, निरर्थक, ऊटपटाँग और उलजलूल वक्तव्य। नेता क्या बोलते हैं, क्यों बोलते हैं, प्रेस विज्ञप्ति क्यों जारी की जाती है, इस बात का न तो उन्हें कोई मतलब होता है, न ही जनता को इससे कुछ मिलता है। हम सभी रोज अखबार पढते हैं, उसमें प्रथम पृष्ठ पर स्थित कुछ “हेडलाइनों” पर नजर पड़ती ही हैं, लेकिन इतने सालों के बाद अब समाचार पर नजर पड़ते ही समझ में आ जाता है कि भीतर क्या लिखा होगा, कुछ वाक्यों की तो आदत सी पड़ गई है । आइये नजर डालें ऐसे ही कुछ बेवकूफ़ी भरे वाक्यों पर – “विकास का फ़ल आम आदमी को मिलना चाहिये”, “गरीबों और अमीरों के बीच की खाई कम होनी चाहिये”, “हमें गरीबी हटाना है”, “विकास की प्रक्रिया में सभी को समाहित करना आवश्यक है”, “आम आदमी का भला होना ही चाहिये”.... इस प्रकार के कुछ अनर्गल से वाक्य देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग गाहे-बगाहे अपने मुखारविन्द से उवाचते रहते हैं, सतत और अनथक रूप से। बस भाषण देना है इसलिये देना है और इन वाक्यों का समावेश किये बगैर भाषण पूरा नहीं होगा, फ़िर उस “खास” (?) व्यक्ति ने बोला है तो अखबारों को छापना ही है, छपा है तो हम जैसों को पढ़ना ही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इन नेताओं को ये रटे-रटाये और निरर्थक वाक्य बोलने में शर्म नहीं आती? स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात लोकतंत्र स्वीकार करने के बाद आम जनता के लिये न्यायपालिका, प्रेस, अफ़सरशाही और विधायिका का गठन हो गया है, तो अब आम आदमी का भला करने से इन्हें कौन रोक रहा है, जनता ने चुनाव में वोट देकर सरकार बनवा दी तो अब विकास की दौड़ में सभी को शामिल करना उनका कर्तव्य है, इसके लिये लाऊडस्पीकर पर जोर-जोर से चिल्लाने की क्या जरूरत है? अब तो पन्द्रह अगस्त का प्रधानमंत्री का भाषण हो या छब्बीस जनवरी का राष्ट्रपति का भाषण, अव्वल तो कोई सुनता ही नहीं, सुनता भी है तो हँसी ही आती है, उसमें भी ऐसे ही वाक्यों की भरमार होती है, “ऐसी ऊँची-ऊँची रख-रख के देते हैं कि कनपटी सुन्न हो जाती है”, अरे भाई करके दिखा ना, कि बस यूँ ही बोलता रहेगा...लेकिन नहीं...साठ साल हो गये बकबक जारी है। साठ साल बाद भी प्रधानमंत्री यह कहें कि हमें गरीबी मिटाना है और आम आदमी का भला होना चाहिये तो बात कुछ समझ नहीं आती। ये तो ऐसे ही हुआ कि अंबानी अपने कर्मचारियों से कहे कि कंपनी की प्रगति होना चाहिये, सबको वेतनवृद्धि मिलनी चाहिये, लेकिन खुद मुकेश अंबानी कुछ ना करे। ये सब होना चाहिये, इसीलिये तो वह मालिक है, तमाम मैनेजर हैं, शेयर होल्डर हैं, मजदूर तो सिर्फ़ वही करेगा जो उसे कहा जायेगा। लेकिन “आम आदमी”... शब्द का उपयोग करके नेता सोचते हैं कि वे अपनी “इमेज” बना रहे हैं, जबकि लोग मन-ही-मन गालियाँ निकाल रहे होते हैं। यही हाल प्रत्येक आतंकवादी हमले के बाद आने वाली वक्तव्यों की बाढ़ का है – “सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है” (हँसी), “रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है” (तेज हँसी), “हम आतंकवाद के सामने नहीं झुकेंगे”, “दोषी को सजा दिला कर रहेंगे” (ठहाके मार कर दोहरा होने लायक), “आम जनता से शांति बनाये रखने की अपील की है”, “मरने वाले को इतना और घायल को उतना मुआवजा दिया जायेगा”... अगड़म-बगड़म-तगड़म... क्या बकवास है यह सब? न उन्हें शर्म आती है, न हमें, न उन्हें गुस्सा आता है, न हमें। जेड श्रेणी की सुरक्षा में बैठा हुआ नेता यह सब बोलता रहता है, अखबारों में छपता है, हम पढ़ते हैं, फ़िर उसी अखबार में बच्चे को हगवा कर उसे नाली में फ़ेंक देते हैं, अगले दिन के अखबार की “हेडिंग” पढ़ने के इंतजार में.....

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Gujrat, Narmada, Pollution

मध्यप्रदेश के तीन विश्वविद्यालयों की एक संयुक्त शोध टीम ने अपने पिछले दो वर्षों के शोध में पाया है कि मध्यप्रदेश में बहने वाली नर्मदा नदी देश की सबसे साफ़ (या कहें कि सबसे कम प्रदूषित) नदी है। ज्यादा विस्तार में न जाते हुए मोटे तौर पर बताना चाहूँगा कि, जल में प्रदूषण नापने की सबसे प्रमुख इकाई है बीओडी (BOD – Biological Oxygen Demand), जिसके कम या ज्यादा होने के स्तर द्वारा यह पता लगता है कि पानी किस हाल तक पहुँच चुका है, जितना कम बीओडी होगा जल उतना ही कम प्रदूषित होगा, और ठीक इसके विपरीत जितना अधिक बीओडी होगा, बैक्टीरिया, मछलियों, केकडों, कछुओं एवं अन्य जलजीवों का जीवन समाप्त होता जायेगा (जो कि नदी या किसी भी जलस्रोत को साफ़ रखने में महत्वपूर्ण होते हैं)और नदी प्रदूषित होगी।

India, Cricket, Invention

आज 20-20 ओवर के विश्व-कप का यह नया रूप लोगों को लुभा रहा है, यह आकर्षक है, तेज गति वाला है, जोशीला है, युवाओं के लिये है, और निश्चित ही आने वाला समय इसी तरह के क्रिकेट का है। क्रिकेट को यदि विश्वव्यापी बनाना है तो इस “फ़ॉर्मेट” को ही आगे बढ़ाना होगा और इसी में कुछ नये-नये प्रयोग करने होंगे। इस जोरदार हंगामे और नवीन आविष्कार ने पुनः यह प्रश्न खड़ा किया है कि भारत नाम के देश, जहाँ क्रिकेट को लगभग एक धर्म समझा जाता है, खिलाड़ियों को पल में देवता और पल में शैतान निरूपित किया जाता है, क्रिकेट का उन्माद है, पागलपन है, अथाह पैसा है, करोड़ों टीवी दर्शक हैं, गरज कि काफ़ी कुछ है, लेकिन इस “भारत” ने क्रिकेट के खेल में क्या नया योगदान दिया है? क्या भारतीय क्रिकेट के कर्ताधर्ताओं ने यहाँ के महान क्रिकेट खिलाड़ियों ने आज तक इस खेल में कोई नया आविष्कार करके बताया है? कोई नवीन विचार लाकर दुनिया को चौंकाया है? या हम लोग सिर्फ़ “पिछलग्गू” हैं?

Pepsi, Shahrukh, John, Uncle

हाल ही में पेप्सी का नया विज्ञापन जारी हुआ है जिसमें जॉन अब्राहम और शाहरुख को एक बच्चे द्वारा “अंकल” कहे जाने पर चुहलबाजी करते दिखाया गया है, लेकिन इस विज्ञापन के मूल में सन्देश यही है कि दोनों ही व्यक्ति (जॉन थोड़े युवा, लेकिन अधेड़ावस्था की उम्र पर खड़े शाहरुख भी) उस बालक द्वारा “अंकल” कहे जाने पर आहत होते हैं या एक-दूसरे की हँसी उड़ाते हैं। सहज ही प्रश्न उठता है कि क्या “अंकल” सुना जाना इतना बुरा लगता है? खासकर यदि “सही” उम्र के व्यक्ति द्वारा “सही” व्यक्ति को बोला गया हो। मतलब जैसा कि उस विज्ञापन से परिलक्षित होता है, वह बालक शायद दसवीं-बारहवीं का लगता है (अर्थात सोलह-सत्रह वर्ष का), ऐसे में यदि वह शाहरुख (जो कि चालीस पार हो चुके हैं) को अंकल कहता है तो उन्हें बुरा क्यों लगना चाहिये? यह दृष्टांत एक विशाल “बाजार” (चिरयुवा दिखाई देने के लिये बने उत्पादों का) के खेल का अहम हिस्सा है, जिसमें सतत हमारे दिमाग में ठसाया जाता है, “सफ़ेद बाल बहुत बुरे हैं”, “थोड़ी सी भी तोंद निकलना खतरे का संकेत है”, “लड़कियों वाली क्रीम नहीं बल्कि जवान दिखने के लिये मर्दों वाली क्रीम वापरना चाहिये” और तो और “सिगरेट पीने से बहादुरी और जवानी आती है” आदि-आदि-आदि। जबकि देखा जाये तो आजकल के किशोरों और युवाओं में “अंकल” बोलना एक फ़ैशन बन चुका है। फ़ैशन का मतलब होता है कि “ऐसी कोई बात जिसकी आपको कोई समझ नहीं है लेकिन सिर्फ़ भेड़चाल के लिये या किसी हीरो-हीरोइन की नकल करनी है, उसे फ़ैशन कहते हैं” जो कि युवाओं की स्वाभाविक हरकत होती है, लेकिन आश्चर्य तो तब होता है कि “अनुभव” और “अध्ययन” के कारण कनपटी पर पके बालों को भी अधेड़ लोग छुपाने के लिये विभिन्न उपाय करते पाये जाते हैं।

यदि अपने से आधी उम्र का कोई बालक-बालिका अंकल कहे तो उसमें बुरा मानने वाली क्या बात है (औरतों को उनके स्त्रीत्व की एक विशेष भावना के चलने “आंटी” सुनना बुरा लग सकता है, बल्कि लगता भी है)। लेकिन तथाकथित “फ़ैशन” की नकल के चलते कई बार “कमर पर चर्बी का टायर चढ़ाये” नवयौवनायें भी अपने से सिर्फ़ दो-पाँच साल बड़े व्यक्ति को अंकल कहती फ़िरती हैं, और स्थिति तब अधिक हास्यास्पद हो जाती है, जबकि आमतौर पर दिखने-चलने-फ़िरने में वह व्यक्ति उससे अधिक जवान दिखाई देता है। एक चीज होती है “कॉमन सेंस” (सामान्य बोध), जो कि आजकल “अनकॉमन” हो गया है, (यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है - जब एक “स्लीवलेस” पहनी हुई “युवती” जिसकी बाँहें, दो लटकी हुई बड़ी लौकियों की तरह दिखाई दे रही थीं, वह मुझे अंकल संबोधित कर रही थी, और तब मजबूरन मुझे, उन्हें “हाँ, बोलो बेटी...” कहना पड़ा था)।

सवाल फ़िर यही खड़ा होता है कि क्यों लोग उम्र को सही सन्दर्भों में नहीं लेते? (खुद की भी और दूसरों की भी), क्यों वे आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते कि अब नौजवानी का दामन छूटने को है और अधेड़ावस्था की आहट आ गई है? क्यों आजकल “सफ़ेद बालों” को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? अक्षय खन्ना, सलमान खान, संजय दत्त या शाहरुख को “अंकल” सुनना क्यों बुरा लगता है? क्यों अमिताभ ने आज तक सार्वजनिक तौर पर अपनी “विग” नहीं उतारी, जबकि रजनीकान्त आमतौर पर सभाओं में बिना मेक-अप के, सफ़ेद बालों, गंजे सिर और सादी सी लुंगी में दिखाई दे जाते हैं (और फ़िर भी वे अपनी नाती की उम्र के साथ हीरो के रूप में अमिताभ से अधिक सुपरहिट हो जाते हैं), ऐसी हिम्मत अन्य कथित “स्टार”(?) क्यों नहीं दिखा पाते? आपका क्या कहना है?

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संयुक्त राष्ट्र में पेश की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि “आतंकवाद से लड़ने के लिये भारत की तैयारी और प्रतिबद्धता काफ़ी कम है और उसे कानूनों में सुधार और सीमाओं पर चौकसी बढ़ाने की आवश्यकता है।“ जिस किसी अधिकारी या संस्था ने यह रिपोर्ट बनाई है और “मासूम” से संयुक्त राष्ट्र ने उसे जस का तस पेश भी कर दिया है, वे भोले हैं, या नादान हैं, या मूर्ख हैं यह तय कर पाना मुश्किल हो गया है। क्या ये लोग नहीं जानते हैं कि –

(१) भारत में देशप्रेम या देश के नाम पर कुछ नहीं किया जाता, यहाँ एक महान (?) लोकतन्त्र है इसलिये यहाँ सब कुछ “वोट” के लिये किया जाता है।

(२) इस देश में राष्ट्रभक्ति १५ अगस्त या २६ जनवरी पर “बासी कढ़ी में उबाल” जैसी आती है, या फ़िर एक मेक-अप की हुई नकली देशभक्ति, “ताज” पर वोट देने के दौरान आती है।

(३) यहाँ “देश की सीमायें” नाम की कोई चीज वजूद में नहीं है, भारत एक “विशाल धर्मशाला” है, बांग्लादेशी, पाकिस्तानी, नेपाली, तिब्बती कोई भी यहाँ कभी भी आ-जा सकता है कितने भी समय रह सकता है।

(४) राष्ट्रीय चरित्र की बात करने वाले को क्या मालूम कि भ्रष्ट कांग्रेस का एक सांसद इस देश का नागरिक ही नहीं है, फ़िर भी संसद में है, फ़र्जी वामपंथियों को बंगाल या असम में घुसपैठ नहीं दिखाई देती, नकली भाजपा वाले रामसेतु के आंदोलन कर रहे हैं, जबकि मध्यप्रदेश में सड़कें ही नहीं हैं। ५२५ सांसदों में से आधे से ज्यादा पर गम्भीर आपराधिक मामले हैं, और संसद में “अपना भत्ता बढ़वाने” के अलावा वे किसी बात पर सहमत नहीं होते हैं।

(५) यहाँ “अफ़जल” को फ़ाँसी से बचाने वाले भी मौजूद हैं, और चालीस-चालीस साल तक मुकदमा चलने के बावजूद फ़ैसला न देने वाली अदालतें मौजूद हैं। अनाथ बच्चों, विकलांगों और वृद्धों को मिलने वाली आर्थिक योजनाओं में भी करोड़ों का भ्रष्टाचार करने वाले सरकारी कर्मचारी हैं, धर्म की अफ़ीम पिलाकर “पाप-पुण्य” की कथायें सुनाने वाले बाबा मौजूद हैं, ज्योतिष-वास्तु-फ़ेंगशुई “बेचने” वाले कलाकार मौजूद हैं।

(६) और अन्त में “सौ बात की एक बात” – पड़ोसी के यहाँ खून होते देखकर अपना दरवाजा बन्द कर लेने वाली जनता, नेताओं की करतूतों को खामोशी से सहने वाली जनता, वोट देकर “सो” जाने वाली जनता, “एसएमएस” करने में भिड़ी हुई जनता, सेंसेक्स को टकटकी लगाये देखने वाली जनता, एकाध लालची अफ़सर को न मार कर खुद मर जाने वाले किसान, “स्टिंग” और टीआरपी के खेल में लगा हुआ मीडिया, सब-सब तो मौजूद हैं।

अब बताईये भला कैसे भारत आतंकवाद से लड़ेगा? पहले हम हर बात में पैसा तो खा लें, फ़िर सोचेंगे देश-वेश के बारे में....

Corrupt Hindi Language & Education

“लफ़ड़ा”, “हटेले”, “खाली-पीली”, “बोम मत मार”, “निकल पड़ी”..... क्या कहा, इन शब्दों का मतलब क्या है? मत पूछिये, क्योंकि यह एक नई भाषा है, जिसका विस्तार (?) तेजी से हो रहा है, स्रोत है मायानगरी मुम्बई की हिन्दी फ़िल्में। दृश्य मीडिया की भाषा की एक बानगी – “श्रीलंकन गवर्नमेंट ने इस बात से डिनाय किया है कि उसने जफ़ना अपने ट्रूप्स को डिप्लॉय करने का प्लान बनाया है”, हाल ही में हिन्दी के सबसे ज्यादा प्रसार संख्या वाले “भास्कर” में छपा एक विज्ञापन- “कृतिकार भास्कर क्रिएटिव अवार्ड्स में एंट्री भेजने की लास्ट डेट है 31 अगस्त“... ऐसी भाषा का स्रोत हैं नये-नवेले भर्ती हुए तथाकथित चॉकलेटी पत्रकार जो कैमरा और माईक हाथ में आते ही अपने-आप को सभी विषयों का ज्ञाता और जमीन से दो-चार इंच ऊपर समझने लगते हैं। जिन्हें न तो भाषा से कोई मतलब है, ना हिन्दी से कोई वास्ता है, ना इस बात से कि इस प्रकार की भाषा का संप्रेषण करके वे किसके दिलो-दिमाग तक पहुँचना चाहते हैं।

Hindi Computing Hindi Diwas

जब मैंने पिछली पोस्ट (हिन्दी दिवस भाग-१ : हिन्दी के लिये आईटी उद्योग ने क्या योगदान किया?) लिखी, उसमें मैंने हिन्दी के कतिपय निस्वार्थ सेवकों का मात्र उल्लेख किया था। अब इस भाग में मैं उनके कामों पर कुछ रोशनी डालूँगा। हालांकि यह जानकारी ब्लॉग जगत में रमने वाले को आमतौर पर है, लेकिन ब्लॉग जगत के बाहर भी कई मित्र, शुभचिंतक हैं जिन्हें यह जानकारी उपयोगी, रोचक और ज्ञानवर्द्घक लगेगी। उन्हें यह पता चलेगा कि कैसे संगणक पर हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के बारे में बिखरे तौर पर ही सही लेकिन समाजसेवियों ने काम शुरु किया, उसे आगे बढाया, प्रचारित किया, मुफ़्त में लोगों को बाँटा, नेटवर्क तैयार किया, उसे मजबूत किया और धीरे-धीरे हिन्दी को कम्प्यूटर पर आज यह मुकाम दिलाने में सफ़ल हुए।

Wedding Ring Finger

शायद वर्षों से यह परम्परा चली आ रही है कि सगाई या शादी की अंगूठी हमेशा “अनामिका” उंगली में ही पहनी जाती है। हालांकि इस परम्परा के बारे में अधिक जानकारी का अभाव है, लेकिन अब चूँकि परम्परा है तो लोग लगातार निभाये जाते हैं। हाल ही में एक ई-मेल में यह रोचक जानकारी मिली, जिसमें अनूठे “लॉजिक” के जरिये यह सिद्ध किया गया है कि अंगूठी उसी उंगली में क्यों पहनना चाहिये, आप भी मुलाहिजा फ़रमाईये –

सर्वप्रथम माना कि सबसे मजबूत होते हैं अंगूठे अर्थात उन्हें हम माता-पिता की संज्ञा दें –
फ़िर अगली उंगली “तर्जनी” को माना जाये हमारे भाई-बहन –
फ़िर आती है बीच की उंगली “मध्यमा” ये हैं हम स्वयं (परिवार का केन्द्रबिन्दु) –
उसके बाद रिंग फ़िंगर “अनामिका” जिसे हम मान लेते हैं, पत्नी –
सबसे अन्त में “कनिष्ठा” उंगली को हम मानते हैं, हमारे बच्चे –

अब चित्र में दिखाये अनुसार अपनी दोनों हथेलियाँ पूरी फ़ैलाकर उनके पोर आपस में मिला लीजिये और बीच की दोनो उंगलियाँ “मध्यमा” (ऊपर माना गया है कि जो आप स्वयं हैं) को अपनी तरफ़ मोड़ लीजिये, हथेलियों को जोड़े रखिये –



अब दोनो अंगूठों (जिन्हें हमने माता पिता माना है) को अलग-अलग कीजिये, क्योंकि अनचाहे ही सही माता-पिता जीवन भर हमारे साथ नहीं रह सकते। फ़िर अंगूठों को साथ मिला लीजिये।
अब दोनों तर्जनी (जिन्हें हमारे भाई-बहन, रिश्तेदार माना है) को अलग-अलग करके देखिये, क्योंकि भाई-बहन और रिश्तेदार भी उम्र भर साथ नहीं रहने वाले, उनके भी अपने परिवार हैं। फ़िर वापस तर्जनी अपनी पूर्व स्थिति में ले आईये।
अब सबसे छोटी कनिष्ठा (हमारे बच्चे) को भी अलग कर देखिये, वे भी जीवन भर हमारे साथ नहीं रहने वाले हैं, बड़े होकर कहीं दूर निकल जायेंगे। पुनः दोनो उंगलियों को वापस पूर्वस्थान पर रख लें।
अब सबसे अन्त में “अनामिका” को अलग-अलग करने की कोशिश कीजिये, नहीं होंगी, क्योंकि पति-पत्नी को आजीवन साथ रहना होता है, तमाम खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ, इसीलिये “अनामिका” में शादी की अंगूठी पहनाई जाती है। एक बार यह करके देखिये....
Teacher’s Day Siddhanath Verma

“एक पैर से उचक-उचक कर चलना मजबूरी, दो हाथ नहीं, सिर्फ़ एक पैर विकसित है”

मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में शाजापुर नामक जिले में एक जिजीविषा की साक्षात मिसाल हैं श्री सिद्धनाथ वर्मा जी। शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया जायेगा। सिद्धनाथ जी स्थानीय शासकीय नवीन कन्या माध्यमिक विद्यालय में सहायक शिक्षक हैं। वर्मा जी सम्भवतः देश के ऐसे पहले शिक्षक हैं जो पैर से बोर्ड पर लिखकर पढाते हैं, क्योंकि जन्म से ही उनके दोनो हाथ नहीं है और दाहिना पैर अविकसित है। इस महान व्यक्ति ने पैर से ही लिखकर बी.कॉम, एम.कॉम., बी.एड., एलएलबी की परीक्षायें प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। दोनो बाहें ना होने के कारण वे बैसाखी का उपयोग भी नहीं कर सकते। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी गई-गुजरी रही कि ट्रायसिकल खरीदने के पैसे ही नहीं थे। अतः एक ही पैर से उचक-उचक कर अपने गाँव “करजू” से छः किमी दूर बड़ोदिया परीक्षा देने जाते थे, बाद में जब इनकी नौकरी लगी तब कहीं जाकर ट्रायसिकल खरीद पाये।

वे बताते हैं कि कुदरत के इस क्रूर मजाक को उन्होंने एक चुनौती के रूप में लिया, एक पैर से उचककर चलना सीखा, हाथों का काम पैर से लिये, लिखना सीखा, प्राथमिक स्तर तक की पढाई गाँव में, माध्यमिक स्तर की मो.बड़ोदिया में और महाविद्यालयीन स्तर की पढ़ाई शाजापुर में सम्पन्न की। वर्मा जी ने कई वर्षों तक इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों के सेल्समैन के रूप में काम किया, क्योंकि नौकरी के लिये इन्हें काफ़ी भटकना पड़ा (किसी नेता के भतीजे नहीं हैं, और ना ही रिश्वत देने के लिये हराम के रुपये थे)। सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्रालय द्वारा उन्हें 1998 में पुरस्कृत किया जा चुका है। कई स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा भी उन्हें अलंकृत किया गया है (उस समय ये सभी एनजीओ और तमाम “क्लब” पता नहीं कहाँ थे, जब वे ट्रायसिकल के लिये संघर्षरत थे)। और अब राष्ट्रपति द्वारा आगामी शिक्षक दिवस पर इन्हें सम्मानित किया जायेगा। आइये सलाम करें जीवट के धनी इस महान व्यक्ति को, जिसे मीडिया का कवरेज शायद कभी नहीं मिलेगा, क्योंकि हमारा मीडिया सुबह से इस खबर की खोज (?) में जुट जाता है कि “कहाँ, किस शिक्षक या शिक्षिका ने बच्चों के साथ यौन कुंठा व्यक्त की”, या “कहाँ, किस शिक्षक का मुँह उन लाड़लों द्वारा काला किया गया, जो कनपटी पर मोबाईल और पिछवाड़े के नीचे “बाइक” लिये घूमते रहते हैं, और दो-दो हाथ और पैर होने के बावजूद एक डिग्री भी ईमानदारी से नहीं पा सकते”।

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