Gujrat, Narmada, Pollution

मध्यप्रदेश के तीन विश्वविद्यालयों की एक संयुक्त शोध टीम ने अपने पिछले दो वर्षों के शोध में पाया है कि मध्यप्रदेश में बहने वाली नर्मदा नदी देश की सबसे साफ़ (या कहें कि सबसे कम प्रदूषित) नदी है। ज्यादा विस्तार में न जाते हुए मोटे तौर पर बताना चाहूँगा कि, जल में प्रदूषण नापने की सबसे प्रमुख इकाई है बीओडी (BOD – Biological Oxygen Demand), जिसके कम या ज्यादा होने के स्तर द्वारा यह पता लगता है कि पानी किस हाल तक पहुँच चुका है, जितना कम बीओडी होगा जल उतना ही कम प्रदूषित होगा, और ठीक इसके विपरीत जितना अधिक बीओडी होगा, बैक्टीरिया, मछलियों, केकडों, कछुओं एवं अन्य जलजीवों का जीवन समाप्त होता जायेगा (जो कि नदी या किसी भी जलस्रोत को साफ़ रखने में महत्वपूर्ण होते हैं)और नदी प्रदूषित होगी।

इन विश्वविद्यालयों द्वारा जारी ताजा आँकडों के अनुसार नर्मदा जब तक मध्यप्रदेश में बहती है उसका बीओडी स्तर 2 से 5 मिलीग्राम प्रतिलीटर रहता है (जबकि बीओडी का मानक सुरक्षित स्तर केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड द्वारा 3 mg/l तय किया गया है)। अब नजर डालें देश की बाकी प्रमुख नदियों के बीओडी स्तर पर – गंगा (कानपुर में) 16 mg/l, यमुना (दिल्ली में) 35 mg/l, ताप्ती (अजनाल महाराष्ट्र में) 36 mg/l, खान (इन्दौर में) 60 mg/l, सतलज (लुधियाना में) 64 mg/l, अंत में सबसे महत्वपूर्ण और चिंताजनक आँकड़े, साबरमती (अहमदाबाद में) 380 mg/l, अमलवाड़ी (अंकलेश्वर में) 946 mg/l.... अब सोचिये जरा... कहाँ नर्मदा का बीओडी 5 mg/l और कहाँ साबरमती का 380 mg/l. क्या साबरमती में कोई जलचर जीवित रह सकता है, और अमलवाड़ी नदी की बात करना तो बेकार ही है, क्योंकि जब हम उज्जैनवासी इन्दौर से आने वाली “खान” नदी (?) को ही नाला कहते हैं, तो फ़िर गुजरात की इन नदियों की क्या हालत होगी।

शोध करने वाले वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि नर्मदा के तुलनात्मक रूप से साफ़ रह पाने के दो मुख्य कारण हैं, पहला मध्यप्रदेश में अभी भी नर्मदा किनारे वनक्षेत्र काफ़ी मात्रा में है, और दूसरा कि नर्मदा के किनारे बड़ी संख्या में उद्योग नहीं लगे हैं, जिनका अपशिष्ट नदी में मिलता है। इसी प्रकार मध्यप्रदेश में नर्मदा के किनारे जबलपुर को छोड़कर कोई बड़ा शहर नहीं है, जो गंदगी, कचरे और मल-मूत्र से नदी को गंदा करे, लेकिन जैसे ही यह नदी गुजरात में प्रवेश करती है, अंधाधुंध स्थापित किये गये उद्योगों द्वारा छोड़े गये केमिकल, सीवेज और विभिन्न “ट्रीटमेंट युक्त” पानी नदी में छोड़ने के कारण भरूच पहुँचते-पहुँचते यह नदी भयानक रूप से प्रदूषित हो जाती है। महानगर बनने की होड़ में लगे अहमदाबाद और औद्योगिक नगर अंकलेश्वर के आँकड़े भी बेहद चिंताजनक हैं। जिस तीव्र गति से गुजरात का औद्योगिकीकरण किया गया है, उस गति से प्रदूषण नियंत्रण के उपाय नहीं किये गये हैं। राज्यों और केन्द्र के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मात्रा खानापूर्ति और भ्रष्टाचार के अड्डे बन गये हैं, और उद्योगपति कभी भी अपनी मर्जी से “ट्रीटमेंट प्लांट” नहीं लगाता है। लगाते भी हैं तो कागजी, और मौका मिलते ही फ़ैक्ट्री का गंदा पानी नदी में छोड़ने से बाज नहीं आते। सवाल यह है कि सरदार सरोवर और नर्मदा पर गाहे-बगाहे बाँहें चढ़ाने वाले गुजरात के भूजल प्रदूषण का क्या होगा? कई जल आधारित प्रजातियाँ समाप्ति की ओर अग्रसर हैं, कोई चिंता कर रहा है? गुजरात की नदियों का भविष्य क्या है?

मध्यप्रदेश में भी बेतवा नदी के किनारे लगे हुए “अल्कोहल प्लांट” और शराब के कारखाने आये दिन लाल-लाल पानी नदी में छोड़ते रहते हैं, और अखबारों में खबर छपती रहती है कि “प्रदूषण फ़ैल रहा है”, “मछलियाँ मर रही हैं”, “ग्रामीणों के यहाँ कुँए का पानी लाल हुआ” आदि-आदि, लेकिन “चांदी के जूते” के चलते होता-जाता कुछ नहीं। यदि छोटे स्तर पर देखें तो, इन्दौर से उज्जैन आने वाली खान नदी इन्दौर शहर के सीवेज और बीच के छोटे-बड़े कारखानों की गन्दगी को समेटे हुए उज्जैन में क्षिप्रा में आकर “त्रिवेणी” नामक धार्मिक (?) स्थान पर मिलती है, जहाँ सोमवती/शनीचरी अमावस्या, विभिन्न त्योहारों और मेलों के दौरान ग्रामीण/शहरी जनता “पुण्य” कमाने के लिये स्नान करती है। इसी को यदि बड़े स्तर पर देखा जाये तो यमुना को सबसे ज्यादा गन्दा करने वाले दिल्ली और आगरा से चलकर यह इलाहाबाद में “त्रिवेणी” पर गंगा को पवित्र (?) करती है। अब मुझे यह नहीं समझ रहा कि मध्यप्रदेश में उद्योगों की कमी के कारण स्वच्छ नर्मदा पर खुश होऊँ, या बेरोजगारी और विकास की दौड़ में पीछे रह जाने पर मध्यप्रदेश की दुर्दशा पर आँसू बहाऊँ?

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India, Cricket, Invention

आज 20-20 ओवर के विश्व-कप का यह नया रूप लोगों को लुभा रहा है, यह आकर्षक है, तेज गति वाला है, जोशीला है, युवाओं के लिये है, और निश्चित ही आने वाला समय इसी तरह के क्रिकेट का है। क्रिकेट को यदि विश्वव्यापी बनाना है तो इस “फ़ॉर्मेट” को ही आगे बढ़ाना होगा और इसी में कुछ नये-नये प्रयोग करने होंगे। इस जोरदार हंगामे और नवीन आविष्कार ने पुनः यह प्रश्न खड़ा किया है कि भारत नाम के देश, जहाँ क्रिकेट को लगभग एक धर्म समझा जाता है, खिलाड़ियों को पल में देवता और पल में शैतान निरूपित किया जाता है, क्रिकेट का उन्माद है, पागलपन है, अथाह पैसा है, करोड़ों टीवी दर्शक हैं, गरज कि काफ़ी कुछ है, लेकिन इस “भारत” ने क्रिकेट के खेल में क्या नया योगदान दिया है? क्या भारतीय क्रिकेट के कर्ताधर्ताओं ने यहाँ के महान क्रिकेट खिलाड़ियों ने आज तक इस खेल में कोई नया आविष्कार करके बताया है? कोई नवीन विचार लाकर दुनिया को चौंकाया है? या हम लोग सिर्फ़ “पिछलग्गू” हैं?

अब तो यह बात सभी जान गये हैं कि भारत के खिलाड़ी “भारत” के लिये नहीं खेलते हैं, भारतीय(?) खिलाड़ी एक निजी सोसायटी के कर्मचारी हैं, जो कि तमिलनाडु सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत पंजीकृत सोसायटी है। बीसीसीआई, जो अपने-आपको “क्रिकेट का खुदा” समझती है, असल में एक “लिमिटेड कम्पनी” है, जो कि ब्रिटिश वर्जिन द्वीप मे पंजीकृत एक संस्था जिसे आईसीसी कहा जाता है से सम्बद्ध है, और जिसे भारत सरकार ने देश में क्रिकेट मैच आयोजित करने की अनुमति दे रखी है, मतलब साफ़ है कि विश्व कप में शर्मनाक रूप से हार रही या पाकिस्तान को “मरने-मारने वाले खेल”(?) में हराने वाले खिलाड़ी सिर्फ़ भारत के “कहे जा सकते हैं” (हैं या नहीं यह आप तय करें), हकीकत में इनका देश के क्रिकेट ढाँचे से कोई लेना-देना नहीं होता है। ये खिलाड़ी इस “लिमिटेड कम्पनी” से पैसा पाते हैं और उसके लिये खेलते हैं। जैसे ही “आईसीएल” की घोषणा हुई और जब “प्रतिस्पर्धा” का खतरा मंडराने लगा, बीसीसीआई की कुम्भकर्णी नींद खुली और ताबड़तोड़ कई जवाबी घोषणायें की गईं और एक और पैसा कमाने की जुगाड़ “आईपीएल” के गठन और आयोजन की तैयारी होने लगी है। हालांकि यह विषयांतर हो गया है, जबकि मेरा असल मुद्दा है कि क्रिकेट खेल को इन महानुभावों ने अब तक क्या “नया” दिया है?

जिस जमाने में टेस्ट मैच लगभग निर्जीव हो चले थे, इंग्लैंड में साठ-साठ ओवरों वाले एक-दिवसीय मैच का प्रयोग किया गया, प्रयोग सफ़ल रहा, आगे चलकर वह पचास-पचास ओवरों का हुआ, उसके शुरुआती तीन विश्व कप इंग्लैंड में आयोजित हुए। ऑस्ट्रेलियन मीडिया मुगल कैरी पैकर ने क्रिकेट में रंगीन कपड़े, सफ़ेद गेंदें, काली साईट स्क्रीन, विज्ञापन, टीवी कवरेज आदि का आविष्कार किया। यहाँ तक कि इसी खेल में हमारे पड़ोसी श्रीलंका ने जयसूर्या-कालूवितरणा की सात-आठ नम्बर पर खेलने वाले खिलाड़ियों से ओपनिंग करवा कर सबको चौंका दिया और एक नई परम्परा का चलन प्रारम्भ किया, जिसमें पहले पन्द्रह ओवरों में एक सौ बीस रन तक बनने लगे। उससे पहले न्यूजीलैंड के मार्टिन क्रोव ने एक स्पिनर दीपक पटेल से मैच का पहला ओवर फ़िंकवा कर एक विशेष बात पैदा करने की कोशिश की और कुछ हद तक सफ़ल भी रहे। ऑस्ट्रेलिया ने सबसे पहले दो विभिन्न टीमों (एक दिवसीय और टेस्ट की अलग-अलग) का प्रयोग किया, जिसे आज लगभग सभी टीमें अपना चुकी हैं। और पहले की बात करें, तो वेस्टइंडीज के कप्तान क्लाईव लॉयड ने अपनी अपमानजनक हार का बदला लेने के लिये स्पिन को पूरी तरह से दरकिनार करके पाँच तेज गेंदबाजों की फ़ौज खड़ी की, जिसने ऑस्ट्रेलिया को भी हिलाकर रख दिया था और लगभग एक दशक तक तेज गेंदबाजों ने विश्व क्रिकेट पर राज किया...और पीछे जायें तो इंग्लैंड के कप्तान डगलस जार्डिन ने डॉन ब्रेडमैन को रोकने के लिये लारवुड-ट्रूमैन से “बॉडीलाइन” गेंदबाजी करवाई थी, जिसकी आलोचना भी हुई, लेकिन था तो वह एक “नवोन्मेषी” विचार ही। कुछ “अलग”, “हटकर” करने की इस परम्परा में पाकिस्तान ने भी वकार-वसीम की मदद से “रिवर्स स्विंग” ईजाद किया, पहले सभी ने इसकी आलोचना की, लेकिन आज सभी सीम गेंदबाज एक तरफ़ से गेंद पर थूक लगा-लगाकर उसे असमान भारी बनाकर रिवर्स स्विंग का फ़ायदा उठाते हैं, इसे पाकिस्तान की देन कहा जा सकता है।

यदि खेल में वैज्ञानिकता, तकनीक और उपकरणों की बात की जाये तो यहाँ भी भारत का योगदान लगभग शून्य ही नजर आता है। “हॉक-आई” तकनीक जिसमें गेंद की सारी “मूवमेंट” का बारीकी से अध्ययन किया जा सकता है का आविष्कार “सीमेंस” के वैज्ञानिकों ने इंग्लैंड में किया, “स्पिन विजन”, “स्निकोमीटर”, “सुपर स्लो-मोशन” सारी तकनीकें पश्चिमी देशों से आईं, वूल्मर की लैपटॉप तकनीक हो या जोंटी रोड्स की अद्भुत फ़ील्डिंग तकनीक, हर मामले में भारतीयों को उनकी नकल करने पर ही निर्भर रहना पड़ता है। ऐसा क्यों? क्या भारत में पैसा नहीं है, या वैज्ञानिक नहीं हैं या सॉफ़्टवेयर इंजीनियर नहीं हैं? या बोर्ड के पास धन की कमी है? सब कुछ है, बस कमी है इच्छाशक्ति की और कुछ नया कर दिखाने में अलाली की।

ऑस्ट्रेलिया में घरेलू क्रिकेट की योजना बनाने, उसे प्रायोजक दिलवाने के लिये बाकायदा खिलाड़ियों की एक समिति है, जबकि यहाँ रणजी टीमों को ही प्रायोजक नहीं मिल पाते हैं। एक बार तो मुम्बई टीम को नाश्ते में अंडे सिर्फ़ इसलिये मिल सके थे, कि तेंडुलकर उस टीम में खेल रहे थे, वरना पहले तो सिर्फ़ चाय-बिस्किट पर ही रणजी मैच निपटा दिये जाते थे। आईसीएल के आने के बाद स्थिति बदली है और खिलाड़ियों का भत्ता बढ़ाया गया है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर नतीजा वही ढाक के तीन पात। भारत में स्टेडियम में जाकर मैच देखना एक त्रासदी से कम नहीं होता। जगह-जगह सुरक्षा जाँच के नाम पर बदतमीजी, स्टेडियम में पीने के पानी, टॉयलेट की असुविधायें, धूप की परेशानी, अस्सी प्रतिशत स्टेडियमों में बड़ी स्क्रीन ना होना आदि कई समस्यायें हैं। जबकि बोर्ड के पास इतना धन है कि वह सारे स्टेडियमों में मुलायम कृत्रिम घास बिछवा सकता है, लेकिन बोर्ड सुविधायें देता है पेवेलियन में बैठे नेताओं, अफ़सरों, उनके मुफ़्तखोर (पास-जुगाड़ू) चमचों और लगुए-भगुओं को जिन्हें अधिकतर समय खेल से कोई लेना-देना नहीं होता, बस “झाँकी” जमाने से वास्ता होता है। जबकि आम जनता जो वाकई क्रिकेटप्रेमी है, वह कष्ट भोगते हुए मैच देखती है। जिस खेल और जनता के बल पर बोर्ड आज अरबों में खेल रहा है, उस बोर्ड के अदना से अधिकारी भी पाँच सितारा होटल में ही ठहरते हैं, दो कौड़ी के राजनेता, जो क्षेत्रीय क्रिकेट बोर्डों में कब्जा जमाये बैठे रहते हैं, भी टीम मैनेजर बनकर घूमने-फ़िरने की फ़िराक में रहते हैं, लेकिन खेल को कुछ नया देने के नाम पर शून्य।

हाँ... एक बात है, क्रिकेट को भारत और पाकिस्तान (जो कम से कम इस मामले में उसका छोटा भाई शोभा देता है) ने दिया है, अकूत धन-सम्पदा, माफ़िया, सट्टेबाजी, मैच फ़िक्सिंग, राजनेता-अधिकारी का अनैतिक गठजोड़, चरण चूमते क्षेत्रीय बोर्ड के “सी” ग्रेड के खिलाड़ी, और कुल नतीजे के रूप में बॉब वूल्मर की हत्या। यह योगदान है भारत-पाक क्रिकेट बोर्ड का। इस सबमें दोषी वह सट्टेबाज और मूर्ख जनता भी है, जो “हीरो” को पूजती है, फ़िर उसी हीरो को टीवी पर आने के लिये कभी घटिया सा यज्ञ करवाती है, कभी उसी को जुतियाने के लिये कैमरा बुलवाकर तस्वीर पर चप्पलों की माला पहनाती है।

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Pepsi, Shahrukh, John, Uncle

हाल ही में पेप्सी का नया विज्ञापन जारी हुआ है जिसमें जॉन अब्राहम और शाहरुख को एक बच्चे द्वारा “अंकल” कहे जाने पर चुहलबाजी करते दिखाया गया है, लेकिन इस विज्ञापन के मूल में सन्देश यही है कि दोनों ही व्यक्ति (जॉन थोड़े युवा, लेकिन अधेड़ावस्था की उम्र पर खड़े शाहरुख भी) उस बालक द्वारा “अंकल” कहे जाने पर आहत होते हैं या एक-दूसरे की हँसी उड़ाते हैं। सहज ही प्रश्न उठता है कि क्या “अंकल” सुना जाना इतना बुरा लगता है? खासकर यदि “सही” उम्र के व्यक्ति द्वारा “सही” व्यक्ति को बोला गया हो। मतलब जैसा कि उस विज्ञापन से परिलक्षित होता है, वह बालक शायद दसवीं-बारहवीं का लगता है (अर्थात सोलह-सत्रह वर्ष का), ऐसे में यदि वह शाहरुख (जो कि चालीस पार हो चुके हैं) को अंकल कहता है तो उन्हें बुरा क्यों लगना चाहिये? यह दृष्टांत एक विशाल “बाजार” (चिरयुवा दिखाई देने के लिये बने उत्पादों का) के खेल का अहम हिस्सा है, जिसमें सतत हमारे दिमाग में ठसाया जाता है, “सफ़ेद बाल बहुत बुरे हैं”, “थोड़ी सी भी तोंद निकलना खतरे का संकेत है”, “लड़कियों वाली क्रीम नहीं बल्कि जवान दिखने के लिये मर्दों वाली क्रीम वापरना चाहिये” और तो और “सिगरेट पीने से बहादुरी और जवानी आती है” आदि-आदि-आदि। जबकि देखा जाये तो आजकल के किशोरों और युवाओं में “अंकल” बोलना एक फ़ैशन बन चुका है। फ़ैशन का मतलब होता है कि “ऐसी कोई बात जिसकी आपको कोई समझ नहीं है लेकिन सिर्फ़ भेड़चाल के लिये या किसी हीरो-हीरोइन की नकल करनी है, उसे फ़ैशन कहते हैं” जो कि युवाओं की स्वाभाविक हरकत होती है, लेकिन आश्चर्य तो तब होता है कि “अनुभव” और “अध्ययन” के कारण कनपटी पर पके बालों को भी अधेड़ लोग छुपाने के लिये विभिन्न उपाय करते पाये जाते हैं।

यदि अपने से आधी उम्र का कोई बालक-बालिका अंकल कहे तो उसमें बुरा मानने वाली क्या बात है (औरतों को उनके स्त्रीत्व की एक विशेष भावना के चलने “आंटी” सुनना बुरा लग सकता है, बल्कि लगता भी है)। लेकिन तथाकथित “फ़ैशन” की नकल के चलते कई बार “कमर पर चर्बी का टायर चढ़ाये” नवयौवनायें भी अपने से सिर्फ़ दो-पाँच साल बड़े व्यक्ति को अंकल कहती फ़िरती हैं, और स्थिति तब अधिक हास्यास्पद हो जाती है, जबकि आमतौर पर दिखने-चलने-फ़िरने में वह व्यक्ति उससे अधिक जवान दिखाई देता है। एक चीज होती है “कॉमन सेंस” (सामान्य बोध), जो कि आजकल “अनकॉमन” हो गया है, (यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है - जब एक “स्लीवलेस” पहनी हुई “युवती” जिसकी बाँहें, दो लटकी हुई बड़ी लौकियों की तरह दिखाई दे रही थीं, वह मुझे अंकल संबोधित कर रही थी, और तब मजबूरन मुझे, उन्हें “हाँ, बोलो बेटी...” कहना पड़ा था)।

सवाल फ़िर यही खड़ा होता है कि क्यों लोग उम्र को सही सन्दर्भों में नहीं लेते? (खुद की भी और दूसरों की भी), क्यों वे आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते कि अब नौजवानी का दामन छूटने को है और अधेड़ावस्था की आहट आ गई है? क्यों आजकल “सफ़ेद बालों” को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? अक्षय खन्ना, सलमान खान, संजय दत्त या शाहरुख को “अंकल” सुनना क्यों बुरा लगता है? क्यों अमिताभ ने आज तक सार्वजनिक तौर पर अपनी “विग” नहीं उतारी, जबकि रजनीकान्त आमतौर पर सभाओं में बिना मेक-अप के, सफ़ेद बालों, गंजे सिर और सादी सी लुंगी में दिखाई दे जाते हैं (और फ़िर भी वे अपनी नाती की उम्र के साथ हीरो के रूप में अमिताभ से अधिक सुपरहिट हो जाते हैं), ऐसी हिम्मत अन्य कथित “स्टार”(?) क्यों नहीं दिखा पाते? आपका क्या कहना है?

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संयुक्त राष्ट्र में पेश की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि “आतंकवाद से लड़ने के लिये भारत की तैयारी और प्रतिबद्धता काफ़ी कम है और उसे कानूनों में सुधार और सीमाओं पर चौकसी बढ़ाने की आवश्यकता है।“ जिस किसी अधिकारी या संस्था ने यह रिपोर्ट बनाई है और “मासूम” से संयुक्त राष्ट्र ने उसे जस का तस पेश भी कर दिया है, वे भोले हैं, या नादान हैं, या मूर्ख हैं यह तय कर पाना मुश्किल हो गया है। क्या ये लोग नहीं जानते हैं कि –

(१) भारत में देशप्रेम या देश के नाम पर कुछ नहीं किया जाता, यहाँ एक महान (?) लोकतन्त्र है इसलिये यहाँ सब कुछ “वोट” के लिये किया जाता है।

(२) इस देश में राष्ट्रभक्ति १५ अगस्त या २६ जनवरी पर “बासी कढ़ी में उबाल” जैसी आती है, या फ़िर एक मेक-अप की हुई नकली देशभक्ति, “ताज” पर वोट देने के दौरान आती है।

(३) यहाँ “देश की सीमायें” नाम की कोई चीज वजूद में नहीं है, भारत एक “विशाल धर्मशाला” है, बांग्लादेशी, पाकिस्तानी, नेपाली, तिब्बती कोई भी यहाँ कभी भी आ-जा सकता है कितने भी समय रह सकता है।

(४) राष्ट्रीय चरित्र की बात करने वाले को क्या मालूम कि भ्रष्ट कांग्रेस का एक सांसद इस देश का नागरिक ही नहीं है, फ़िर भी संसद में है, फ़र्जी वामपंथियों को बंगाल या असम में घुसपैठ नहीं दिखाई देती, नकली भाजपा वाले रामसेतु के आंदोलन कर रहे हैं, जबकि मध्यप्रदेश में सड़कें ही नहीं हैं। ५२५ सांसदों में से आधे से ज्यादा पर गम्भीर आपराधिक मामले हैं, और संसद में “अपना भत्ता बढ़वाने” के अलावा वे किसी बात पर सहमत नहीं होते हैं।

(५) यहाँ “अफ़जल” को फ़ाँसी से बचाने वाले भी मौजूद हैं, और चालीस-चालीस साल तक मुकदमा चलने के बावजूद फ़ैसला न देने वाली अदालतें मौजूद हैं। अनाथ बच्चों, विकलांगों और वृद्धों को मिलने वाली आर्थिक योजनाओं में भी करोड़ों का भ्रष्टाचार करने वाले सरकारी कर्मचारी हैं, धर्म की अफ़ीम पिलाकर “पाप-पुण्य” की कथायें सुनाने वाले बाबा मौजूद हैं, ज्योतिष-वास्तु-फ़ेंगशुई “बेचने” वाले कलाकार मौजूद हैं।

(६) और अन्त में “सौ बात की एक बात” – पड़ोसी के यहाँ खून होते देखकर अपना दरवाजा बन्द कर लेने वाली जनता, नेताओं की करतूतों को खामोशी से सहने वाली जनता, वोट देकर “सो” जाने वाली जनता, “एसएमएस” करने में भिड़ी हुई जनता, सेंसेक्स को टकटकी लगाये देखने वाली जनता, एकाध लालची अफ़सर को न मार कर खुद मर जाने वाले किसान, “स्टिंग” और टीआरपी के खेल में लगा हुआ मीडिया, सब-सब तो मौजूद हैं।

अब बताईये भला कैसे भारत आतंकवाद से लड़ेगा? पहले हम हर बात में पैसा तो खा लें, फ़िर सोचेंगे देश-वेश के बारे में....
Corrupt Hindi Language & Education

“लफ़ड़ा”, “हटेले”, “खाली-पीली”, “बोम मत मार”, “निकल पड़ी”..... क्या कहा, इन शब्दों का मतलब क्या है? मत पूछिये, क्योंकि यह एक नई भाषा है, जिसका विस्तार (?) तेजी से हो रहा है, स्रोत है मायानगरी मुम्बई की हिन्दी फ़िल्में। दृश्य मीडिया की भाषा की एक बानगी – “श्रीलंकन गवर्नमेंट ने इस बात से डिनाय किया है कि उसने जफ़ना अपने ट्रूप्स को डिप्लॉय करने का प्लान बनाया है”, हाल ही में हिन्दी के सबसे ज्यादा प्रसार संख्या वाले “भास्कर” में छपा एक विज्ञापन- “कृतिकार भास्कर क्रिएटिव अवार्ड्स में एंट्री भेजने की लास्ट डेट है 31 अगस्त“... ऐसी भाषा का स्रोत हैं नये-नवेले भर्ती हुए तथाकथित चॉकलेटी पत्रकार जो कैमरा और माईक हाथ में आते ही अपने-आप को सभी विषयों का ज्ञाता और जमीन से दो-चार इंच ऊपर समझने लगते हैं। जिन्हें न तो भाषा से कोई मतलब है, ना हिन्दी से कोई वास्ता है, ना इस बात से कि इस प्रकार की भाषा का संप्रेषण करके वे किसके दिलो-दिमाग तक पहुँचना चाहते हैं।

किसी भी भाषा का विस्तार, उसका लगातार समृद्ध होना एवं उस भाषा के शब्दकोष का विराटतर होते जाना एक सतत प्रक्रिया है, जो वर्षों, सदियों तक चलती है। इसमें हिन्दी या अंग्रेजी भी कोई अपवाद नहीं है, परन्तु उपरोक्त उदाहरण हमारे सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा करते हैं कि आने वाले दस-बीस वर्षों मे आम बोलचाल की भाषा क्या होगी? उसका स्वरूप कैसा होगा? क्या इस “हिंग्लिश” को ही हम धीरे-धीरे मान्यता प्रदान कर देंगे (यह हमारी मातृभाषा कहलायेगी?), न सिर्फ़ हिंग्लिश बल्कि मुम्बईया टपोरी भाषा भी तेजी से फ़ैल रही है और प्रचलित भाषा को भ्रष्ट किये दे रही है।

आमतौर पर इस बात पर बहस चलती रहती है कि समाज में जो घटित होता उसका असर फ़िल्मों पर होता है या फ़िल्मों मे जो दिखाया जाता है उसका असर समाज पर होता है, लेकिन जिस तेजी से जनता “पेटी” और “खोके” का मतलब समझने लगी है वह निश्चित तौर पर फ़िल्मों का ही असर है। इस बहस में न पड़ते हुए यदि हम गहराई से भाषा के भ्रष्टाचार पर ही विचार करें तो हम पायेंगे कि बोली को सबसे अधिक प्रभावित किया है फ़िल्मों और टीवी ने, और अब यह तथाकथित भाषा केबल और डिश के जरिये गाँवों तक भी पहुँचने लगी है। हालांकि आज भी गाँव का कोई युवक जब महानगर जाता है तो उसके आसपास के युवक जिस तरह की अजीब-अजीब भाषा और शब्द बोलते हैं तो उसे लगता है कि वह फ़िनलैंड या वियतनाम पहुँच गया है। महानगरीय नवयुवकों द्वारा बोले जाने वाले कुछ शब्दों का उदाहरण- “सत्संग में चलें” का मतलब होता है दारू पार्टी, झकास मतलब बहुत बढिया, बैटरी मतलब चश्मेवाला, खंभा मतलब बीयर की पूरी बोतल... ऐसे अनेकों शब्द सुनकर आप कभी समझ नहीं सकते कि असल में क्या कहा जा रहा है।

जनमानस पर समाचार-पत्र, फ़िल्में और टीवी गहरा असर डालते हैं। यह प्रभाव सिर्फ़ पहनावे, आचार-विचार तक ही सीमित नहीं होता, भाषा पर भी होता है। इसमें सर्वाधिक नुकसान हो रहा है उर्दू का, नुकसान तो हिन्दी का भी हो ही रहा है लेकिन अब आम बोलचाल में उर्दू शब्दों का स्थान अंग्रेजी ने ले लिया है। जैसे फ़िल्मी गीत भी धीरे-धीरे “शबनम”, “नूर” “हुस्न” से हटकर “खल्लास”, “कम्बख्त” और “कमीना” पर आ गये हैं उसी तरह संवाद भी “मुलाहिजा”, “अदब”, “तशरीफ़” से हटकर “कायको”, “चल बे”, “फ़ोकट में” पर उतर आये हैं। रही-सही कसर कम्प्यूटर के बढ़ते प्रचलन और ई-मेल ने पूरी कर दी है, जिसमें फ़िलहाल अंग्रेजी की ही बहुतायत है। भाई लोगों ने यहाँ पर भी “how are you” को “h r U” तथा “Respected Sir” को “R/sir” बना डाला है। पता नहीं इससे समय की बचत होती है या “गलत आदत” मजबूत होती है। हिन्दी में भी “ङ्” का प्रयोग लगभग समाप्त हो चला है, “ञ” तथा “ण” का प्रयोग भी खात्मे की ओर है, अब हमें “मयङ्क” या “रञ्ज”, “झण्डा” या “मन्दिर” कम ही देखने को मिलते हैं ये सभी सीधे-सीधे बिन्दु सिर पर लेकर “मयंक, रंज, झंडा और मंदिर” बन गये हैं। हमे बताया गया है कि प्रकाशन की सुविधा के कारण यह समाचार पत्रों आदि ने भी इन बीच के अक्षरों को बिन्दु में बदल दिया है, लेकिन इससे तो ये अक्षर सिर्फ़ पुस्तकों में ही रह जायेंगे। यही बात अंकों के साथ भी हो रही है, अंतरराष्ट्रीय और बाजार की ताकतों के आगे झुकते हुए “१,२,३,४,५,६,७,८,९” को “1,2,3,4,5,6,7,8,9” में बदल दिया गया है। माना कि भाषा को लचीला होना चाहिये, लेकिन लचीला होने और भ्रष्ट होने में फ़र्क होना चाहिये। ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोष ने भी “पराठा”, “अचार” और “लस्सी” आदि को शामिल कर लिया है, तो हमने भी “स्टेशन”, “पेन”, “ट्रेन” आदि को सरलता से अपना लिया है, लेकिन “हटेले” को आप कैसे परिभाषित करेंगे?

अब बात करते हैं समस्या की जड़ की और उसके निवारण की। अकेले मीडिया के दुष्प्रभाव को दोषी ठहराना एकतरफ़ा होगा, अन्य दो मुख्य कारण जो तत्काल नजर आते हैं वे प्राथमिक शिक्षा से जुड़े हुए हैं। हम सभी जानते हैं कि हमारे देश में प्राथमिक स्कूलों की क्या दशा है। पहला कारण है, हिन्दी को गंभीरता से न लेना और दूसरा कारण है हिन्दी शिक्षक और शिक्षण को भी गंभीरता से न लेना। आजकल टीवी, कम्प्यूटर, वीडियो गेम के जमाने में युवा वर्ग में पठन-पाठन की रुचि में कमी आई है (सात सौ रुपये की हैरी पॉटर वह पढ लेगा, लेकिन चालीस रुपये की प्रेमचन्द की कहानियाँ पढने का समय उसके पास नहीं होगा)। हिन्दी पढने का मकसद सिर्फ़ पास होना या रट कर अच्छे अंक लाना भर होता है, उसका ज्ञान अर्जित करने या साहित्य सेवन करने से कोई लेना-देना नहीं होता। इस कारण युवाओं में हिन्दी के प्रति जो “अपनत्व” की भावना पैदा होनी चाहिये वह नहीं होती। भावनाओं को व्यक्त करते समय हिन्दी और अंग्रेजी दोनो पर समान अधिकार की चाहत में वे “न घर के रहते हैं न घाट के” और इस प्रकार “हिंग्लिश” का जन्म होता है। प्राथमिक स्कूलों में (जब बच्चे की नींव पड़ रही होती है) हिन्दी के शिक्षकों द्वारा भाषा को गंभीरता से नहीं लिया जाता। “हिन्दी तो कोई भी पढ़ा सकता है” वाली मानसिकता आज भी प्राचार्यों पर हावी है, ऐसे में जबकि आमतौर पर विज्ञान अथवा गणित विषय को उनके विशेषज्ञ ही पढ़ाते हैं, लेकिन हिन्दी की कक्षा में कोई भी आकर पढ़ाने लगता है। और यदि वह तथाकथित रूप से “हिन्दी” का ही शिक्षक है तब भी वह बच्चों की कॉपी जाँचते समय मात्राओं, बिन्दु, अनुस्वारों, अल्पविराम आदि पर बिलकुल ध्यान नहीं देता। बच्चे तो बच्चे हैं, वे उसी गलत-सलत लिखे शब्द या वाक्य को सही मानकर उसकी पुनरावृत्ति करते चलते हैं, धीरे-धीरे अशुद्ध लेखन उसकी आदत बन जाती है, जिसे बड़े होने के बाद सुधारना लगभग नामुमकिन होता है (कई बड़े अफ़सरों और डिग्रीधारियों को मैंने “दुध”, “लोकी”, “कुर्सि” जैसी भयानक गलतियाँ करते देखा है), यह स्थिति बदलनी चाहिये। प्रायवेट स्कूलों मे “लायब्रेरी फ़ीस” के नाम पर जो भारी-भरकम वसूली की जाती है, उसमें से कम से कम बीस प्रतिशत खर्च हिन्दी के महान साहित्यकारों की कृतियों, उपन्यासों, कहानियों के संकलन में होना चाहिये, ताकि बच्चे उन्हें एक बार तो पढ़ें और जानें कि हिन्दी साहित्य कितना समृद्ध है, वरना वे तो यही समझते रहेंगे कि शेक्सपीयर और कीट्स ही महान लेखक हैं, कालिदास, प्रेमचन्द, महादेवी वर्मा आदि तो “बस यूँ ही” हैं। बच्चों की “भाषा” की समझ विकसित होना आवश्यक है, जाहिर है कि इसके लिये शुरुआत घर से होनी चाहिये, फ़िर दायित्व है हिन्दी के शिक्षक का, वरना उस निजी चैनल के कर्मचारी को दोष देने से क्या होगा, जो प्रेमचन्द की कहानियों पर धारावाहिक बनाने के लिये “बायोडाटा और फ़ोटो लेकर प्रेमचन्द को भेजो” जैसी शर्त रख देता है। सवाल यही है खुद हमने, पिछली बार हिन्दी में पत्र कब लिखा था? या अपने बच्चे की गलत हिन्दी या अंग्रेजी पर उसे कितनी बार टोका है?

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Hindi Computing Hindi Diwas

जब मैंने पिछली पोस्ट (हिन्दी दिवस भाग-१ : हिन्दी के लिये आईटी उद्योग ने क्या योगदान किया?) लिखी, उसमें मैंने हिन्दी के कतिपय निस्वार्थ सेवकों का मात्र उल्लेख किया था। अब इस भाग में मैं उनके कामों पर कुछ रोशनी डालूँगा। हालांकि यह जानकारी ब्लॉग जगत में रमने वाले को आमतौर पर है, लेकिन ब्लॉग जगत के बाहर भी कई मित्र, शुभचिंतक हैं जिन्हें यह जानकारी उपयोगी, रोचक और ज्ञानवर्द्घक लगेगी। उन्हें यह पता चलेगा कि कैसे संगणक पर हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के बारे में बिखरे तौर पर ही सही लेकिन समाजसेवियों ने काम शुरु किया, उसे आगे बढाया, प्रचारित किया, मुफ़्त में लोगों को बाँटा, नेटवर्क तैयार किया, उसे मजबूत किया और धीरे-धीरे हिन्दी को कम्प्यूटर पर आज यह मुकाम दिलाने में सफ़ल हुए।

यदि बहुत पहले से शुरु किया जाये, अर्थात कम्प्यूटर पर हिन्दी को स्थापित करने की शुरुआत के तौर पर, तो सबसे पहले कुछ नाम तत्काल दिमाग में आते हैं जैसे बाराहा के श्री वासु और सुवि इन्फ़ॉर्मेशन सिस्टम (जो बाद में वेबदुनिया बन गया) के विनय छजलानी, जो लगभग सन 1992-93 से हिन्दी के विकास के लिये तत्पर हो गये थे (पहला वेबदुनिया हिन्दी पैड मैने सन 1996 में उपयोग कर लिया था, जब विन्डोज95 आया-आया ही था)। कालान्तर में “सुवि” के काम को माइक्रोसॉफ़्ट ने प्रशंसित किया और इसके साथ सहयोग करने की इच्छा जताई। हिन्दी के कई ऑनलाईन या इंटरनेट समाचार पत्रों हेतु सबसे पहले “सुवि” ने कई फ़ॉन्ट उपलब्ध करवाये। अगला नाम है iTrans के जनक अविनाश चोपड़े जी का, जिन्हें फ़ोनेटिक औजारों का पितामह कहा जा सकता है। इसके अलावा सराय.नैट से जुड़े काफी लोगों ने भी काम किया है जैसे राघवन जी तथा सुरेखा जी ने एक जावास्क्रिप्ट आधारित IME बनाया था, उस पर आधारित बहुत से औजार बाद में बने। आज जितने भी फोनेटिक औजार चल रहे हैं, वे सब iTrans स्कीम पर आधारित हैं। मैथिली गुप्त जी ने “कृतिदेव” नामक अब तक का सबसे लोकप्रिय फ़ॉन्ट बनाया, जिसे माइक्रोसॉफ़्ट ने अपने तमाम विन्डोज में “बाय-डिफ़ॉल्ट” डाल रखा है। इसके अलावा मैथिली जी ने हिन्दी पैड और कई औजार भी बना-बना कर मुफ़्त में बाँटे। यूनिकोड आने के बावजूद आज भी टायपिंग, वर्ड प्रोसेसिंग और डीटीपी के लिये सबसे लोकप्रिय फ़ॉन्ट कृतिदेव ही है। यूनिकोड के आने से पहले इंटरनैट पर हिन्दी साइटें आम तौर पर दो फॉन्टों में होती थीं - कृतिदेव तथा शुषा। शुषा को भारतभाषा.कॉम नामक किसी ग्रुप ने बनाया तथा मुफ्त में जारी किया। ये शायद पहला ऐसा फॉन्ट था जो फोनेटिक से मिलता-जुलता था। अभिव्यक्ति पत्रिका पहले इसी फॉन्ट में होती थी। एक और नाम है आलोक कुमार , जिन्होंने इंटरनैट पर यूनिकोड हिन्दी के बारे में शायद सबसे पहले खास फिक्र करनी शुरु की, देवनागरी.नैट साइट बनाई, जिस पर हिन्दी UTF-8 का समर्थन आदि बारे सहायता दी। आज भले ही वो खास न लगे, पर पुराने टाइम में इस साइट ने बहुतों की मदद की। इसके अतिरिक्त लिप्यांतरण टूल गिरगिट भी आलोक जी ने बनाया। शून्य नामक टेक्नीकल साइट शुरु करने में भी इनका हाथ था। आलोक जी शायद सबसे पुराने तकनीकी अनुवादकों में से हैं, उन्होंने बहुत से ऑनलाइन तंत्रों का हिन्दी अनुवाद किया। ब्लॉग जगत के “स्टार” रवि रतलामी जी, लिनक्स के हिन्दीकरण में इनका अहम योगदान रहा है, कई तकनीकी और तन्त्रज्ञान सम्बन्धी अनुवाद भी इन्होंने किये हैं।

हिन्दी के एक और सेवक हैं हरिराम जी, सीडैक तथा अन्य राजकीय विभागों के साथ कई प्रोजैक्टों मे शामिल रहे हैं। इसके अतिरिक्त ये हिन्दी कम्प्यूटिंग के कोर स्तर की जानकारी रखते हैं तथा इसको कोर स्तर पर यानि की जड़ से ही सरल बनाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। चिठ्ठाजगत में एक और जाना-पहचाना नाम है देबाशीष जी का, शायद ये सबसे पुराने हिन्दी चिट्ठाकारों में से एक हैं। इन्होंने हिन्दी का पहला लोकप्रिय एग्रीगेटर ‘चिट्ठाविश्व’ बनाया। इंडीब्लॉगीज की शुरुआत करके भारतीय भाषी चिट्ठों को नई पहचान दी। बांग्ला के भी ये आधारस्तंभ ब्लॉगर हैं, और भी बहुत से हिन्दी संबंधी नए प्रयोग इन्होंने किए ज्यादातर साइटों आदि के रुप में। जब ये हिन्दी चिट्ठाकारी से जुडे़ तो इन्हें लगा कि हिन्दी संबंधी सहायता लिखित रुप में सही तरीके से उपलब्ध नहीं है, तो इन्होंने अपने चिट्ठे पर लिखना शुरु किया। जीतेन्द्र चौधरी (“नारद” के कर्ताधर्ता), मिर्ची सेठ आदि अक्षरग्राम के लोगों की मदद और रुचि से “सर्वज्ञ” चालू हुआ। आज सर्वज्ञ काफी बेहतर स्थिति में है, इन लोगों ने जब से सर्वज्ञ पर नवीनतम जानकारी सहित सभी जरुरी लेख डाले, तो हिन्दी प्रयोक्ताओं की सँख्या में जबरदस्त उछाल आया।

शुरुआत में हिन्दी चिट्ठाकारों का मुख्य काम हिन्दी का प्रचार तथा विभिन्न फ्रंटएंड के औजार बनाने में रहा, क्योंकि लगभग सभी चिठ्ठाकार तकनीकी लोग ही थे। एक और सज्जन हैं रमण कौल, इन्होंने छाहरी के औजार को संशोधित कर विभिन्न ऑनलाइन कीबोर्ड बनाए, रमण कौल जी का एक मुख्य प्रयास रहा इनस्क्रिप्ट तथा रेमिंगटन के लिए ऑनलाइन कीबोर्ड उपलब्ध कराना। फोनेटिक के तो बहुत से ऑनलाइन कीबोर्ड पहले से थे पर इन दोनों के नहीं थे। रमण जी ने इनको उपलब्ध करवा को लोगों को बहुत आसानी कर दी। ईस्वामी जी ने “हग” टूल बनाया जो पुराने समय में जब कि कीबोर्ड ड्राइवर इंजन (बरहा आदि) ज्यादा प्रचलित नहीं थे तब काफी काम आता था। ईस्वामी के हग को कोड से भी बहुत लोगों ने प्रेरणा ली। “परिचर्चा” पर “हग” लगा है, एक दो फायरफॉक्स एक्सटेंशनों में है, हिमांशु सिंह की हिन्दी-तूलिका सेवा में है। हग आधारित एक वर्डप्रैस प्लगइन बन चुका है। जिसे वर्डप्रैस ब्लॉग पर टिप्पणी के लिए लगा सकते हैं। हिमांशु सिंह ने इण्डिक आईएमई को हैक करके नया टूल बनाया जो कि विंडोज 2000 तथा एक्स पी में इण्डिक लैंग्वेज सपोर्ट स्वतः इंस्टाल कर देता है साथ ही इण्डिक आईएमई भी इंस्टाल करता है, इससे एक कम जानकारी वाला (मेरे जैसा) कम्प्यूटर उपयोगकर्ता भी आसानी से संगणक में हिन्दी इन्स्टाल कर लेता है, साथ ही उन्होंने हिन्दी-तूलिका नामक ऑनलाइन औजार भी हग के कोड के आधार पर बनाया है। रजनीश मंगला जी ने भी फॉन्टों संबंधी कई काम के टूल बनाए हैं। “अक्षरग्राम” ने एक विशाल नैटवर्क तैयार किया, इसने भले ही खुद कोई विशेष हिन्दी कंप्यूटिंग में अंदरुनी काम नहीं किया लेकिन जन-जन तक हिन्दी को पहुँचाने में अक्षरग्राम का महती योगदान रहा। मितुल पटेल जी हिन्दी विकिपीडिया के संपादक हैं, इन्होंने हिन्दी विकीपीडिया पर जानकारी बढ़ाने में काफी योगदान दिया। एक साहब हैं अनुनाद सिंह जी, इन्होंने इंटरनैट पर हिन्दी संबंधी विभिन्न जगहों पर मौजूद ढेरों लिंक्स को संग्रहित किया। फ़ोनेटिक का एक और औजार है "गमभन" जो मराठी ब्लॉग लिखने वालों में अधिक प्रचलित है, उसके जनक हैं ओंकार जोशी, विनय जैन जी गूगल की कुछ सेवाओं सहित कई तंत्रों के हिन्दी अनुवाद से जुड़े रहे हैं।

सबसे अन्त में नाम लूँगा श्रीश शर्मा जी (ई-पंडित) का, कम्प्यूटर की तकनीकी, ब्लॉगिंग सम्बन्धी अथवा अन्य कोई भी जानकारी हो, सरलतम भाषा में समझाने वाले शिक्षक हैं ये। सभी की मदद के लिये सदैव तत्पर और विनम्र श्रीश जी ने हिन्दी कंप्यूटिंग के प्रति लोगों की मानसिकता को समझा तथा उसी हिसाब से पर्याप्त मात्रा में आम बोलचाल वाली हिन्दी में जानकारी उपलब्ध करवाई, अपने चिट्ठे पर तथा सर्वज्ञ पर। अक्षरग्राम के विभिन्न प्रोजैक्टों में इनका सक्रिय सहयोग रहता है। श्रीश जी का मकसद है कि हिन्दी कंप्यूटिंग संबंधी जानकारी से “सर्वज्ञ” को लबालब भर देना ताकि वो इंटरनैट पर हिन्दी उपयोगकर्ताओं के मार्गदर्शन हेतु “एकल खिड़की प्रणाली” बन जाए। यह विस्तृत लेख भी उनसे हुई लम्बी चर्चा के फ़लस्वरूप ही आकार ले पाया है।

इसके अलावा भारत सरकार के अंतर्गत राजभाषा विभाग, सीडैक तथा ildc जैसे विभागों द्वारा यूनिकोड में देवनागरी के मानकीकरण तथा इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड के विकास आदि महत्वपूर्ण कार्य किए गए हैं। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिन्हें हम नहीं जानते, उनमें सीडैक के बहुत से प्रोग्रामर आदि सहित विभिन्न स्वतंत्र प्रोग्रामर भी हैं, यह भी हो सकता है कि कई लोगों के नाम इसमें छूट गये हों, लेकिन ऐसा सिर्फ़ मेरे अज्ञान की वजह से हुआ होगा। तात्पर्य यह कि ऐसे कई नामी, बेनामी, सेवक हैं जिन्होंने हिन्दी कम्प्यूटिंग और यूनिकोड की नींव रखी, परदे के पीछे रहकर काम किया। आज जो हिन्दी के पाँच-छः सौ ब्लॉगर, की-बोर्ड पर ताल ठोंक रहे हैं यह सब इन्हीं लोगों की अथक मेहनत का नतीजा है। यह कारवाँ आगे, आगे और आगे ही बढ़ता चले, इसमें सैकड़ों, हजारों, लाखों लोग दिन-ब-दिन जुड़ते जायें, तो बिना किसी के आगे हाथ फ़ैलाये हिन्दी विश्व की रानी बन कर रहेगी। आमीन...

(अगले भाग “हिन्दी दिवस भाग-३” में हिन्दी भाषा में बढते भ्रष्टाचार, उसके कारणों और निवारण के बारे मे.... जारी...)

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Wedding Ring Finger

शायद वर्षों से यह परम्परा चली आ रही है कि सगाई या शादी की अंगूठी हमेशा “अनामिका” उंगली में ही पहनी जाती है। हालांकि इस परम्परा के बारे में अधिक जानकारी का अभाव है, लेकिन अब चूँकि परम्परा है तो लोग लगातार निभाये जाते हैं। हाल ही में एक ई-मेल में यह रोचक जानकारी मिली, जिसमें अनूठे “लॉजिक” के जरिये यह सिद्ध किया गया है कि अंगूठी उसी उंगली में क्यों पहनना चाहिये, आप भी मुलाहिजा फ़रमाईये –

सर्वप्रथम माना कि सबसे मजबूत होते हैं अंगूठे अर्थात उन्हें हम माता-पिता की संज्ञा दें –
फ़िर अगली उंगली “तर्जनी” को माना जाये हमारे भाई-बहन –
फ़िर आती है बीच की उंगली “मध्यमा” ये हैं हम स्वयं (परिवार का केन्द्रबिन्दु) –
उसके बाद रिंग फ़िंगर “अनामिका” जिसे हम मान लेते हैं, पत्नी –
सबसे अन्त में “कनिष्ठा” उंगली को हम मानते हैं, हमारे बच्चे –

अब चित्र में दिखाये अनुसार अपनी दोनों हथेलियाँ पूरी फ़ैलाकर उनके पोर आपस में मिला लीजिये और बीच की दोनो उंगलियाँ “मध्यमा” (ऊपर माना गया है कि जो आप स्वयं हैं) को अपनी तरफ़ मोड़ लीजिये, हथेलियों को जोड़े रखिये –



अब दोनो अंगूठों (जिन्हें हमने माता पिता माना है) को अलग-अलग कीजिये, क्योंकि अनचाहे ही सही माता-पिता जीवन भर हमारे साथ नहीं रह सकते। फ़िर अंगूठों को साथ मिला लीजिये।
अब दोनों तर्जनी (जिन्हें हमारे भाई-बहन, रिश्तेदार माना है) को अलग-अलग करके देखिये, क्योंकि भाई-बहन और रिश्तेदार भी उम्र भर साथ नहीं रहने वाले, उनके भी अपने परिवार हैं। फ़िर वापस तर्जनी अपनी पूर्व स्थिति में ले आईये।
अब सबसे छोटी कनिष्ठा (हमारे बच्चे) को भी अलग कर देखिये, वे भी जीवन भर हमारे साथ नहीं रहने वाले हैं, बड़े होकर कहीं दूर निकल जायेंगे। पुनः दोनो उंगलियों को वापस पूर्वस्थान पर रख लें।
अब सबसे अन्त में “अनामिका” को अलग-अलग करने की कोशिश कीजिये, नहीं होंगी, क्योंकि पति-पत्नी को आजीवन साथ रहना होता है, तमाम खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ, इसीलिये “अनामिका” में शादी की अंगूठी पहनाई जाती है। एक बार यह करके देखिये....
Teacher’s Day Siddhanath Verma

“एक पैर से उचक-उचक कर चलना मजबूरी, दो हाथ नहीं, सिर्फ़ एक पैर विकसित है”

मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में शाजापुर नामक जिले में एक जिजीविषा की साक्षात मिसाल हैं श्री सिद्धनाथ वर्मा जी। शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया जायेगा। सिद्धनाथ जी स्थानीय शासकीय नवीन कन्या माध्यमिक विद्यालय में सहायक शिक्षक हैं। वर्मा जी सम्भवतः देश के ऐसे पहले शिक्षक हैं जो पैर से बोर्ड पर लिखकर पढाते हैं, क्योंकि जन्म से ही उनके दोनो हाथ नहीं है और दाहिना पैर अविकसित है। इस महान व्यक्ति ने पैर से ही लिखकर बी.कॉम, एम.कॉम., बी.एड., एलएलबी की परीक्षायें प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। दोनो बाहें ना होने के कारण वे बैसाखी का उपयोग भी नहीं कर सकते। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी गई-गुजरी रही कि ट्रायसिकल खरीदने के पैसे ही नहीं थे। अतः एक ही पैर से उचक-उचक कर अपने गाँव “करजू” से छः किमी दूर बड़ोदिया परीक्षा देने जाते थे, बाद में जब इनकी नौकरी लगी तब कहीं जाकर ट्रायसिकल खरीद पाये।

वे बताते हैं कि कुदरत के इस क्रूर मजाक को उन्होंने एक चुनौती के रूप में लिया, एक पैर से उचककर चलना सीखा, हाथों का काम पैर से लिये, लिखना सीखा, प्राथमिक स्तर तक की पढाई गाँव में, माध्यमिक स्तर की मो.बड़ोदिया में और महाविद्यालयीन स्तर की पढ़ाई शाजापुर में सम्पन्न की। वर्मा जी ने कई वर्षों तक इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों के सेल्समैन के रूप में काम किया, क्योंकि नौकरी के लिये इन्हें काफ़ी भटकना पड़ा (किसी नेता के भतीजे नहीं हैं, और ना ही रिश्वत देने के लिये हराम के रुपये थे)। सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्रालय द्वारा उन्हें 1998 में पुरस्कृत किया जा चुका है। कई स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा भी उन्हें अलंकृत किया गया है (उस समय ये सभी एनजीओ और तमाम “क्लब” पता नहीं कहाँ थे, जब वे ट्रायसिकल के लिये संघर्षरत थे)। और अब राष्ट्रपति द्वारा आगामी शिक्षक दिवस पर इन्हें सम्मानित किया जायेगा। आइये सलाम करें जीवट के धनी इस महान व्यक्ति को, जिसे मीडिया का कवरेज शायद कभी नहीं मिलेगा, क्योंकि हमारा मीडिया सुबह से इस खबर की खोज (?) में जुट जाता है कि “कहाँ, किस शिक्षक या शिक्षिका ने बच्चों के साथ यौन कुंठा व्यक्त की”, या “कहाँ, किस शिक्षक का मुँह उन लाड़लों द्वारा काला किया गया, जो कनपटी पर मोबाईल और पिछवाड़े के नीचे “बाइक” लिये घूमते रहते हैं, और दो-दो हाथ और पैर होने के बावजूद एक डिग्री भी ईमानदारी से नहीं पा सकते”।

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“बाराहा” के वासु, “अक्षरमाला” के श्रीनिवास अन्नम, “कैफ़े-हिन्दी” के मैथिली गुप्त, लिनक्स हिन्दीकरण के महारथी रवि रतलामी, “गमभन” के ओंकार जोशी, प्रभासाक्षी के बालेन्दु शुक्ल, “वेबदुनिया” के विनय छजलानी, हिन्दी ब्लॉगिंग और हिन्दी कम्प्यूटिंग को आसान बनाने वाली हस्तियाँ अविनाश चोपड़े, रमण कौल, आलोक कुमार, हरिराम जी, देबाशीष, ई-स्वामी, हिमांशु सिंह, श्रीश शर्मा....और इन जैसे कई लोग हैं... ये लोग कौन हैं? क्या करते हैं? कितने लोगों ने इनका नाम सुना है?....मैं कहता हूँ, ये लोग “हिन्दी” भाषा को कम्प्यूटर पर स्थापित करने के महायज्ञ में दिन-रात प्राणपण से आहुति देने में जुटे हुए “साधक” हैं, मौन साधक।

अब एक और “हिन्दी दिवस” आने वाला है, सरकारी गोष्ठियाँ, सेमिनार, शोधपत्र आदि की बरसात होने ही वाली है, हिन्दी की महिमा का बखान किया जायेगा, फ़ाईव स्टार होटलों में सभायें की जायेंगी, हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करने की सनातन कसमें खाई जायेंगी, फ़िर अगली १४ सितम्बर तक सभी चादर ओढ़कर सो जायेंगे। अगले ही दिन से भारत की तरक्की, आईटी ज्ञान, दस फ़ीसदी की विकास दर, सॉफ़्टवेयर निर्यात करने के डॉलरों की गिनती, छलांग मारता हुआ सेंसेक्स, यह सब प्रपंच चालू हो जायेगा। सरकार यह कहते नहीं अघाती कि भारत ने आईटी में सबको पीछे छोड़ दिया है, हमारी सॉफ़्टवेयर कम्पनियाँ और इंजीनियर दुनिया भर में अपना परचम लहरा रहे हैं। इन्फ़ोसिस, टीसीएस, विप्रो और सत्यम की कुल आमदनी कई अफ़्रीकी देशों के कुल बजट से भी अधिक होगी। इस सारी चकाचौंध में एक सवाल रह-रहकर उठता है कि इन “महान” भारतीय आईटी कम्पनियों ने भारतीय भाषाओं के उत्थान के लिये अब तक क्या योगदान दिया है? डॉलरों मे कमाने वाली और अपने कर्मचारियों को लाखों के पैकेज देकर समाज में एक असंतुलन पैदा करने वाली इन कम्पनियों ने सरकार से जमीनें लीं, पानी-बिजली में सबसिडी ली, टैक्स में छूट ली, हार्डवेयर आयात करने के लिये ड्यूटी कम करवाई, यहाँ तक कि जब रुपया मजबूत होने लगा और घाटा (?) बढने लगा तो वहाँ भी वित्तमंत्री ने दखल देकर उनका नुकसान होने से उन्हें बचाया। तात्पर्य यही कि इतनी “महान” कम्पनियों ने क्या आज तक भारत के आम लोगों के लिये एक भी मुफ़्त वितरित करने वाला हिन्दी सॉफ़्टवेयर बनाया है? या किसी अन्य भारतीय भाषा को बढ़ावा देने के लिये कुछ किया है? याद तो नहीं पड़ता.... जबकि ऊपर जिन व्यक्तियों का उल्लेख किया गया है, उनमें से शायद ही कोई करोड़पति या अरबपति हो, किसी एकाध-दो नें कुछेक हजार डॉलर कमा भी लिये होंगे तो वह इन्फ़ोसिस आदि के सामने नगण्य ही है। जबकि ये सभी और इन जैसे कई लोग आम आदमी को कम्प्यूटर पर हिन्दी से परिचित करवाने के लिये संघर्षरत हैं, एक अथक साधना में लगे हुए हैं, कईयों ने तो अपनी जेब से रुपये खर्चा करके हिन्दी सॉफ़्टवेयर बनाये, और उन्हें मुफ़्त में लोगों को बाँटा, क्यों? क्योंकि व्यक्ति या संस्था के ज्ञान का उपयोग समाज को होना चाहिये, यह एक प्रकार की समाजसेवा ही है। क्या ये लोग डॉलर नहीं कमा सकते थे? क्या ये सभी लोग अमेरिका जाकर ऐशो-आराम की जिन्दगी नहीं बिता सकते थे? सरासर कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, इनमें से कई ने भारत में ही रहकर हिन्दी की असली सेवा की, कुछ लोगों ने विदेश में रहकर भी हिन्दी की लौ को दिल से बुझने नहीं दिया, बिना किसी स्वार्थ के। आज धीरे-धीरे हिन्दी और यूनिकोड का संसार बड़ा होता जा रहा है उसके पीछे इन लोगों की मेहनत छुपी हुई है।

बाराहा और वेबदुनिया पिछले आठ-दस वर्षों से हिन्दी पर काम कर रहे हैं, मैथिली गुप्त जी के बनाये हुए “कृतिदेव” फ़ॉट का उपयोग तो शायद भारत में हिन्दी टाइप करने वाला प्रत्येक व्यक्ति करता है, बालेन्दु शुक्ल और रवि रतलामी को माइक्रोसॉफ़्ट का विशेष पुरस्कार/प्रशस्ति मिल चुकी है (बाकी सभी हस्तियों पर अगले लेख “हिन्दी दिवस-भाग २” में चर्चा करूँगा ही), लेकिन फ़िर वही सवाल, क्या आम भारतवासी को हिन्दी में काम करने, उसे बढ़ावा देने, दैनंदिन जीवन में उपयोग करने लायक एक आसान सा सॉफ़्टवेयर किसी भारतीय कम्पनी ने बनाया? भारतीयों को हमेशा प्रत्येक बात के लिये माइक्रोसॉफ़्ट या गूगल का मुँह क्यों ताकना पड़ता है? ये विदेशी कम्पनियाँ भारतीय भाषाओं को जब अपने सॉफ़्टवेयरों में लायेंगी, जब सभी कम्प्यूटरों में ये आ जायेंगी, ज्यादा से ज्यादा लोग इनका उपयोग करने लगेंगे तब हिन्दी और अन्य भाषायें फ़ैलेंगी, इसमें नया क्या होगा? ये तो हमेशा से होता आया है, और इन कम्पनियों को भी मालूम है कि अब अंग्रेजी जानने वाले तबके (अर्थात भारत की जनसंख्या का लगभग बीस प्रतिशत) में कम्प्यूटरों की खपत का “सेचुरेशन” बिन्दु लगभग करीब आ चुका है, अब बारी है नये-नवेले पैदा हुए मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग की, जो कि हिन्दी कम्प्यूटरों को हाथोंहाथ लेगा (सुना है कि “विस्टा” में हिन्दी “इन-बिल्ट” ही कर दिया गया है), सब ठीक है, बढिया है, लेकिन इस सबमें करोड़ों डॉलर का मुनाफ़ा कमाने वाली भारतीय कम्पनियों का क्या योगदान है? और यदि “बैक-ऑफ़िस” (इसका हिन्दी अनुवाद तो “पिछवाड़े” में काम करने वाला/वाली होता है) में इन्होंने बैंक, एयरलाइंस या किसी अन्य सॉफ़्टवेयर के लिये हिन्दी में योगदान दिया भी हो, तो वह उनके प्रिय “डॉलर” के लिये है, ना कि किसी भाषा-प्रेम के कारण। इन्फ़ोसिस में लगभग पन्द्रह प्रतिशत कर्मचारी “बेंच-स्ट्रेन्थ” के नाम पर फ़ालतू बिठाकर रखे जाते हैं, ऐसे सॉफ़्टवेयर इंजीनियर रोज सुबह कार्यालय आते हैं, कोक-पेप्सी पीते हैं, गेम खेलते हैं, किसी नये प्रोजेक्ट के इन्तजार में बेकार बैठे-बैठे इनकी क्षमतायें कुन्द हो जाती हैं, शाम को ये घर चले जाते हैं, वह भी एक मोटी तनख्वाह लेकर। क्या इन कर्मचारियों से, जो कि फ़िलहाल “फ़ालतू” ही हैं, भारतीय भाषाओं पर सॉफ़्टवेयर तैयार करने को नहीं कहा जा सकता? उन्हें भी एक नया अनुभव मिलेगा, और जब भी कोई नया प्रोजेक्ट मिले उन्हें वहाँ काम पर लगाया जा सकता है, तब तक नये “फ़ालतू” भर्ती हो ही जायेंगे, उन्हें ये काम सौंपा जाये।

हर काम “कमाई” के लिये नहीं किया जाता, समाज के लिये भी कुछ किया जाना चाहिये। वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम ने विकलांगों के लिये वरदान साबित हुए “जयपुर फ़ुट” में कुछ संशोधन करके उसमें टाइटेनियम धातु का मिश्रण किया जिससे उनका वजन कम हो गया, और विकलांगों को एक नई ऊर्जा मिली, उन्होंने यह काम “पेटेंट” के लालच में या “डॉलर” कमाने के लिये नहीं किया (शायद इसीलिये वह “कलाम साहब” हैं)। माना कि इन कम्पनियों ने भी स्कूल खोले हैं, गरीबों को मुफ़्त शिक्षा का अवसर दिया है, कई सरकारी स्कूलों में नये/पुराने कम्प्यूटर मुफ़्त में दिये हैं, स्कॉलरशिप दी हैं, लेकिन क्या इतना पर्याप्त है?

क्या एक आम भारतवासी को यह गर्व नहीं होना चाहिये कि वह जिस सॉफ़्टवेयर पर “निजभाषा” में काम करता है, वह उसी के देश की सबसे बड़ी कम्पनी ने बनाया है, और भारत में रहने वाले लोग बिल गेट्स पर निर्भर नहीं हैं? कब तक हम लोग चोरी के, पायरेटेड, आधे-अधूरे से और वह भी माइक्रोसॉफ़्ट के, सॉफ़्टवेयरों पर काम करते रहेंगे? लेकिन क्या मेरे जैसे अदना से व्यक्ति की यह आवाज “वहाँ” तक पहुँच पाएगी? क्या ये बड़े लोग, विदेशों में कम्पनियाँ अधिग्रहण करते-करते, कुछ करोड़ डॉलर हिन्दी के लिये भी छोड़ देंगे?

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हम हैं मालवा के "खवैय्ये"

Written by बुधवार, 29 अगस्त 2007 11:44
Pohe-Jalebi, Dal Bafla and Rabdi of Malwa Region

पश्चिमी मध्यप्रदेश का एक बड़ा भूभाग है जिसे कहते हैं “मालवा” जिसमें मुख्यतः इन्दौर, उज्जैन, देवास, रतलाम और मन्दसौर जिले आते हैं। “पग-पग रोटी, डग-डग नीर” यह कहावत पहले मालवा के लिये कही जाती थी (कही तो अब भी जाती हैं, लेकिन अब डग-डग नीर यहाँ मौजूद नहीं है)। लेकिन मौजूद है यहाँ की “खवैय्येगिरी” की परम्परा। दूध, सोयाबीन और हरी सब्जियों की बहुतायत वाला यह इलाका विभिन्न बेहतरीन व्यंजनों के लिये जाना जाता है। सुबह होती है नाश्ते हेतु पोहे-जलेबी से। कई लोगों को, जिन्होंने यह “कॉम्बिनेशन” नहीं खाया है वह आश्चर्य करेंगे, लेकिन भाप पर पके हुए (जी हाँ, भट्टी पर तपेले में गर्म पानी रखकर उसपर पोहे की कढाई रखी जाती है, और बिना तेल के सीधे हल्दी-मसाला-खड़े धने-अनारदाना- सेंव-प्याज मिलाकर दूर से ही लोगों की लार टपकाने हेतु सजाकर रख दिया जाता है) गरमागरम पोहे का स्वाद वही जान सकता है, जिसने खाया हो। साथ में होती हैं गरम और कड़क जलेबियाँ। एक कौर पोहे का जिसमें एक छोटा सा टुकड़ा जलेबी का, म्म्म्म्म्म मजा आ जाता है, कई बार गप्पें मारते हुए, या “जलेबी बच गई है इसलिये” एक की जगह पोहे की दो प्लेट हो जाती हैं। इतना भारी नाश्ता करने के बाद भोजन दो-तीन बजे के बाद ही होता है। भोजन के लिये हाजिर होते हैं “दाल-बाफ़ले”। दाल-बाफ़ले मालवा का शाही भोजन माना जाता है, जब कोई विशेष आयोजन (मुंडन, सूरज-पूजा, जन्मदिन पार्टी आदि) होता है तब मेजबान दाल-बाफ़ले का कार्यक्रम रखते हैं। संक्षेप में, “बाफ़ला” कहते हैं आटे के एक बड़े, घी में पके हुए गोले को, जिसे दाल में चूरा-चूरा करके खाया जाता है।

बाफ़ला बनाने के लिये रोटी के आटे से थोड़ा मोटा (दरदरा) आटा गूँथा जाता है, फ़िर उसमें नमक, हल्दी आदि मिलाकर उसके गोले बना लिये जाते हैं (आकार में टेनिस गेंद से थोड़े बड़े)। इन आटे के गोलों को कंडे के ढेर में दबा कर उन कंडों को सुलगा दिया जाता है, कंडों की धीमी-धीमी आँच से ये गोले भीतर तक पूरी तरह पक जाते हैं। फ़िर इन्हें बाहर निकालकर उस पर लगी राख आदि को कपड़े से साफ़ करके, शुद्ध घी से भरी हुई एक बड़ी परात में उन्हें हल्का सा “चीरा” लगाकर डुबाया जाता है, इससे गरम-गरम बाफ़ले अन्दर तक घी से पूरी तरह नहा जाते हैं। दाल तो जैसी आपकी मर्जी हो बना दी जाती है (आमतौर पर खट्टी-मीठी), लेकिन इन दोनो के साथ रवे-मावे के लड्डू भी होते हैं, जिसमें सूखा मेवा और मिश्री डाली जाती है, हरी मिर्ची की तीखी चटनी और गोभी या आलू की सब्जी, अब हुई पूरी “डिश” तैयार। पूरी थाली (एक बाफ़ला, दाल, एक लड्डू, चटनी और थोडी सी सब्जी) परोसने के बाद यदि कोई एक और पूरा बाफ़ला लेता है, तो मानना पड़ेगा कि उसकी खुराक बेहतरीन है। लेकिन इसकी नौबत कम ही आती है। इस शानदार और शाही भोजन के बाद शाम चार बजे से पाँच बजे तक एक नींद जरूरी हो जाती है। यह भोजन “एलीट” वर्ग के लिये नहीं है, और उन लोगों के लिये भी नहीं जो आजकल “घी” के नाम से ही चकरा जाते हैं। यह खाना खालिस देसी लोगों के लिये है (ना तो छुरी काँटे से खाया जा सकता है ना चम्मच से, सिर्फ़ भगवान के दिये हाथों से ही), पाचक भी तभी है जब आलथी-पालथी मार कर, पंगत में बैठकर, हाथ पर लगे शुद्ध घी को स्वाद लेकर खाया जाये।

इस असाधारण खाने के बाद शाम को भोजन करने की तो कोई गुंजाइश ही नहीं बनती है, इसलिये आठ-नौ बजे पैदल घूमने निकल जाईये, लम्बी-लम्बी गप्पें हाँकते जाईये, कोई बन्दिश नहीं है, उज्जैन में हों तो महाकाल का दर्शन करते हुए, इन्दौर में हों तो होलकरों के राजवाड़े आदि को देखते हुए, वापस मुख्य बाजार में आइये, जहाँ जवान होती हुई रात के दस बजे के लगभग “लच्छेदार रबड़ी” आपका इन्तजार कर रही है। ऐसी रबड़ी और कहीं नहीं खाई होगी आपने। “रबड़ी”, दूध से बना हुआ ही एक प्रकार है। एक बड़े कढ़ाव में शाम से ही दूध उबलने के लिये छोड़ दिया जाता है, आते-जाते एक हलवाई उस दूध पर एक के बाद एक आती जा रही मलाई की परतों को एक बारीक लोहे की सलाई से कढ़ाव के चारों तरफ़ इकठ्ठा करता जाता है, इससे धीरे-धीरे दूध अटते-अटते कम होता जाता है और तब तक कढ़ाव के चारों तरफ़ किनारों पर मलाई की एक मोटी परत जम चुकी होती है। बस, अन्त में थोड़े से बचे हुए दूध में (जो कि लगभग गुलाबी रंग का हो जाता है) में इस मलाई को काट-काट कर डाल दिया जाता है और उसमें थोड़ी सी शक्कर मिला दी जाती है, हो गई तैयार “रबड़ी”, बस बगल में ओटले पर बैठ जाइये (ना, ना पैंट की चिंता ना करें, ओटले पर बैठकर ही रबड़ी खाने का असली मजा आयेगा), दोने में सौ ग्राम रबड़ी मंगवाईये और (थोड़े ज्यादा हिम्मत वाले हों, तो) उंगली से धीरे-धीरे चाटकर खायें, ऐसा मजा ना मिला होगा, ना दोबारा कहीं मिलेगा। मालवा में आकर यदि आपने दाल-बाफ़ले और रबड़ी नहीं खाई तो यह ठीक वैसा ही होगा जैसे कोई आगरा जाकर ताजमहल ना देखे।

इन सब व्यंजनों के अलावा उज्जैन की एक खासियत और है, वह है भगवान शिव का प्रसाद यानी बूटी, या विजया, सीधी-सीधी भाषा में कहूँ तो “भाँग” (कृपया नाक-भौंह ना सिकोड़ें, क्योंकि जिसने यह “प्रसाद” चखा ही ना हो उसे कोई हक नहीं है इसकी बुराई करने का)। दिनचर्या के दो खास समय जिनका उल्लेख उपर करना रह गया वे हैं नाश्ते के बाद सुबह नौ बजे और दाल-बाफ़ले खाने के बाद शाम को, जी हाँ यही समय है “विजया” लेने का, और आपको कुछ भी नहीं करना है, मुख्य बाजार में कई भाँग-घोटे की दुकानें मिल जायेंगी, सिर्फ़ और सिर्फ़ दो रुपये की गोली घुटवा लीजिये, भोले बाबा का नाम लीजिये और गटक जाइये, बस आधे घंटे के भीतर ही आप “स्वर्गवासी” होंगे... बिलकुल... भाई जब आपको अपने आसपास मेनका, रंभा, उर्वशी नजर आने लगें तो आप “स्वर्गवासी” ही हुए ना! और सिर्फ़ दो रुपये इसलिये कहा कि एक तो सस्ता, सुन्दर और “टिकाऊ” सौदा, और साथ ही यह मात्रा इतनी होती है कि ना तो नाली में गिरने का खतरा होता है, ना ही बीबी को पता चलने का, यानी मौज ही मौज। एक बात और, कि शिवबूटी का सेवन करने पर आपकी भूख खुल जाएगी, तब या तो हँसते-हँसते आप आधा बाफ़ला ज्यादा खा जायेंगे, या फ़िर सौ ग्राम रबड़ी का एक दोना और पेट में खिसका देंगे.... राम कसम हम मालवा वाले तो खाने में ही लुट गये हैं... तो आप किस बात का इन्तजार कर रहे हैं हुजूर... चले आईये म्हारे मालवा मां...

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