Higher Education in MP & Arjun Singh

प्रसिद्ध उपन्यास “राग दरबारी” में पंडित श्रीलाल शुक्ल लिख गये हैं कि “भारत में शिक्षा व्यवस्था, चौराहे पर पड़ी हुई उस कुतिया के समान है, जिसे हर आता-जाता और ऐरा-गैरा लतियाता रहता है”। भारत में उच्च शिक्षा के क्या हालात हैं यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। विश्वविद्यालयों में जिस प्रकार की अराजकता, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और बन्दरबाँट है, वह लगभग सरेआम जब-तब उजागर होती ही रहती है। लेकिन यह किस्सा है “ओबीसी के मसीहा”, “मध्यप्रदेश के वरिष्ठतम”, प्रशासनिक चुस्ती(?) के लिये पहचाने जाने वाले, मप्र में झुग्गीवासियों को पट्टे देने वाले, शिक्षा जगत में “जनरल प्रमोशन” नाम का नायाब “आइडिया” लाने वाले.... (अब क्या नाम भी बताना पड़ेगा...?) अर्थात कई बार प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गये अर्जुनसिंह के गृहराज्य यानी हमारे मध्यप्रदेश का।

यूँ तो मध्यप्रदेश का नाम उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कोई खास सम्मान के साथ नहीं लिया जाता, लेकिन कुछ संस्थान भोपाल, ग्वालियर और इन्दौर में हैं जो सतत अच्छे क्रियाकलाप और शानदार शैक्षणिक रिकॉर्ड के लिये जाने जाते हैं, वरना अधिकतर नामी-गिरामी शिक्षा संस्थान, आईआईटी और आईआईएम तो अन्य राज्यों में हैं। यहाँ तक कि कोचिंग को एक इंडस्ट्री का रूप देने वाला कोटा भी राजस्थान में है।

बहरहाल बात हो रही है मध्यप्रदेश की, यहाँ की राजधानी भोपाल में एक राष्ट्रीय स्तर का तकनीकी शिक्षा संस्थान है मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (MANIT)। इस संस्थान में देश के श्रेष्ठ छात्रों को प्रवेश AIEEE की परीक्षा देने के बाद ही मिलता है। इस संस्थान के बारे में पिछले दो-तीन वर्षों से कई शिकायतें मिल रही थीं, कुछ मीडिया में आती रहीं, कुछ पर छात्रों के पालकों ने कार्रवाई के लिये लिखा। आखिर दबाव के आगे झुकते हुए माननीय अर्जुन सिंह ने मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा एक जाँच करवाई, दुर्भाग्य से जिसके जाँचकर्ता थे मप्र के ही एक वरिष्ट रिटायर्ड आईए‍एस डॉ.एम.एन.बुच। “दुर्भाग्य” इसलिये कहा, क्योंकि इन ईमानदार अधिकारी ने संस्थान की जाँच के बाद जो रिपोर्ट पेश की उसमें उन्होंने सब कुछ सच-सच उजागर कर दिया, और अब श्री अर्जुन सिंह के समक्ष इस खलबली मचाने वाली रिपोर्ट पर कुछ कार्रवाई करने के अलावा कोई चारा ही नहीं है। जरा एक नजर डालिये रिपोर्ट के कुछ खास बिन्दुओं पर, जिससे आपको पता चलेगा कि “जब बागड़ ही खेत खाने लगे, तो खेत का क्या हाल होता है”, या फ़िर ऐसे कहूँ कि यदि “चोर को ही खजाने की चाबी सौंप दी जाये तो क्या होता है”....

(१) नियुक्तियाँ – इस सम्मानित(?) संस्था में मौजूदा डीन और प्रभारी निदेशक डॉ. आशुतोष शर्मा की पदोन्नति नियमों के विपरीत है, वे प्रोफ़ेसर के रूप में पदोन्नत होने की न्य़ूनतम योग्यता भी नहीं रखते और इसीलिये उनकी नियुक्ति अवैध है। आशुतोष शर्मा के भाई अभय शर्मा को १४ जुलाई २००५ को सिविल इंजीनियरिंग विभाग में असि.प्रोफ़ेसर बनाया गया, बताया गया कि उन्हें “उद्योग” का अनुभव है, जबकि प्रदेश के लोक निर्माण विभाग को उद्योग नहीं माना जा सकता, न ही यह पीएचडी के समकक्ष है। बुच साहब ने लिखा है कि पिछले दो साल में (अर्थात जब से यूपीए सरकार आई और अर्जुन सिंह HRD मंत्री बने) इस संस्थान में हुई नियुक्तियों में 49 फ़ैकल्टी सदस्य आपस में रिश्तेदार हैं। इनकी नियुक्ति के लिये जिम्मेदार निदेशक, फ़ैकल्टी मेम्बर और चेयरमैन पर कार्रवाई होना चाहिये और जिनकी मिलीभगत से यह सब हुआ उन्हें गिरफ़्तार किया जाना चाहिये। अब कम से कम भारत में तो यह सम्भव ही नहीं है कि किसी केन्द्रीय शिक्षा संस्थान में एक पत्ता भी मंत्रीजी की मर्जी के बिना हिल जाये।

(२) ठेके – वर्ष 2006 में संस्थान में कुल साढ़े सात करोड़ के काम हुए जिसमें से साढ़े छः करोड़ के काम एक ही कम्पनी एसएस कंस्ट्रक्शन को दिये गये, जिसकी जाँच(?) जारी है।

असल में “डीम्ड यूनिवर्सिटी” बनाकर इसका कबाड़ा कर दिया गया है। अब यहाँ कोई बाहरी नियंत्रण नहीं है, पढ़ाना, परीक्षा लेना, पास करना, नियुक्तियाँ करना, सब कुछ स्थानीय स्तर पर ही होता है। इन सबका लाभ एक खास “गिरोह” उठा रहा है, जिसके खास राजनैतिक संपर्क हैं। जो भी नया निदेशक नियुक्त होता है, उसके खिलाफ़ खबरें छपवाना, उसे दबाव में लाना और फ़िर अपना सिक्का चलाना इस गिरोह के काम हैं। संस्थान के अंदरूनी हालात बदतर हो चुके हैं। डायरेक्टर कोई भी आदेश निकाले, कोई भी उसे नहीं मानता। संस्थान से सम्बन्धित कानूनी मामलों की लगभग 70 फ़ाईलें गायब हो चुकी हैं। शिक्षा प्रेमियों, प्राध्यापकों, विद्यार्थियों और पालकों ने जब-जब भी कोई शिकायत की वे सीधे कचरे के डिब्बे में जा पहुँची। तीन साल पहले अर्जुनसिंह ने देश के सारे एन‍आईटी निदेशकों को बिना सोचे-समझे बदल दिया (उनका मानना था कि सभी निदेशक मुरलीमनोहर जोशी के करीबी हैं और भाजपा के हैं)। इस क्रम में देश के एक बड़े वैज्ञानिक डीडी भवालकर के स्थान पर एक पूर्व विधायक को संस्थान का अध्यक्ष बना दिया गया, इसी से पता चलता है कि मानव संसाधन मंत्रालय की क्या इच्छा(!) थी। इसी प्रकार डॉ.पी.के.चांदे भी कोई आरएसएस के सदस्य नहीं है, बल्कि मप्र के तकनीकी शिक्षा जगत का एक जाना-माना नाम है, लेकिन उन्हें भी हटा दिया गया। चांदे साहब एक पुस्तक लिखने वाले हैं जिसमें सन 2003 से 2005 के बीच जिस शिक्षा माफ़िया का उन्होंने “अनुभव” किया उसकी जानकारी देंगे। भवालकर कहते हैं कि इतने बड़े तकनीकी संस्थान के रहते मप्र में उच्च शिक्षा का स्तर बहुत आगे जाना चाहिये था, लेकिन यह राजनीति में कुछ ऐसा उलझा कि अपना स्तर ही खो बैठा है।

यह रिपोर्ट गत जून में मंत्रालय में भेजी गई थी, और शायद आज तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, कारण खोजने की जरूरत नहीं है। मैनिट मप्र की नाक है, पूरे देश में ऐसे मात्र 20 संस्थान हैं लेकिन उसमें भोपाल का यह संस्थान शायद अन्तिम क्रम पर है। मप्र वालों को उम्मीद थी कि कम से कम अर्जुन सिंह के रहते इसका नाम त्रिची या वारंगल जैसे नामी तकनीकी शिक्षण संस्थाओं के साथ लिया जायेगा, लेकिन किसी ने सही कहा है कि राजनेता आजीवन राजनेता ही रहता है, चाहे वह किसी भी उम्र का हो।

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हे वामपंथियों और सेकुलरों बधाई हो...

Written by शुक्रवार, 14 दिसम्बर 2007 19:04
Congrats Secularist Communists

१३ दिसम्बर को संसद पर हमले के छः बरस बीत गये। एक “परम्परा” की तरह हमारे प्रधानमंत्री (सचमुच?), लौहपुरुष (?) आडवाणी, एक गृहमंत्री नामक मोम के पुतले और “मम्मी के दुलारे” राहुल गाँधी ने शहीदों को याद करते हुए पुष्प अर्पित किये। उसी सभा के दौरान एक शहीद नानकचन्द की विधवा ने विलाप करते हुए कथित नेताओं को खरी-खरी सुनाते हुए बताया कि छः साल से उसे कोई सरकारी मदद नहीं मिली है। उसे एक पेट्रोल पंप आबंटित हुआ था, लेकिन उसे आज तक जमीन नहीं मिली (शायद सरकार “SEZ” के लिये जमीन हथियाने में व्यस्त होगी), और उस विधवा को शिकायत करने के कारण धकिया कर बाहर कर दिया गया।


(चित्र में नेताओं को आपबीती सुनाते हुए शहीद की विधवा)
दूसरी तरफ़ हमारे मानवाधिकार वाले भी खुश हो रहे होंगे कि चलो छः साल बीत गये आज तक हम अफ़जल को फ़ाँसी से बचाने में कामयाब रहे हैं। वामपंथियों और सेकुलरों का तो क्या कहना, उन्हें तो गुजरात में वोटों की फ़सल लहलहाती दिख रही होगी। क्या कहें ऐसे नेताओं को! जो अपनी ही जान बचाने वालों के परिजनों से ऐसा बर्ताव करते हों, इन नेताओं को तो रीढ़विहीन (Spineless) कहना भी इनका सम्मान ही होगा, इन्हें “हिजड़ा” कहना भी उचित नहीं है क्योंकि हिजड़ों को भी कभी-कभी गुस्सा आता है और वे भी अपना आत्मसम्मान बरकरार रखते ही हैं, लेकिन हमारे नेताओं ने तो अपना आत्मसम्मान पता नहीं किस रिश्वत के तले दबा कर रख दिया है।

सरकार को चिंता है कि हिन्दू देवियों की नग्न तस्वीरें बनाने वाला एमएफ़ हुसैन कैसे भारत लौटे, तसलीमा नसरीन के पेट में दर्द ना हो, दलाई लामा की तबियत ठीक रहे, या फ़िर तेलगी, सलेम, शहाबुद्दीन को कोई तकलीफ़ तो नहीं है, अफ़जल गुरु को चिकन बराबर मिल रहा है या नहीं... आदि-आदि... है ना परोपकारी सरकारें.. लेकिन खुद की जान की बाजी लगा कर इन घृणित लोगों की जान बचाने वालों का कोई खयाल नहीं... इसीलिये मेरा भारत महान है! क्या अभी भी यकीन नहीं हुआ? अच्छा चलो बताओ, कि ऐसा कौन सा देश है जिसके शांतिप्रिय नागरिक अपने ही देश में शरणार्थी हों... जी हाँ सही पहचाना... भारत ही है। कश्मीरी पंडितों को दिल्ली के बदबूदार तम्बुओं में बसाकर सरकारों ने एक पावन काम किया हुआ है और दुनिया को बता दिया है कि देखो हम कितने “सेकुलर” हैं। कांग्रेस की एक सफ़लता तो निश्चित है, कि उसने “सेकुलर” शब्द को लगभग एक गाली बनाकर रख दिया है। अभी भी विश्वास नहीं आया... लीजिये एक और सुनिये... समझौता एक्सप्रेस बम विस्फ़ोट में मारे गये प्रत्येक पाकिस्तानी नागरिक को दस-दस लाख रुपये दिये गये, मालेगाँव बम विस्फ़ोट में मारे गये प्रत्येक मुसलमान को पाँच-पाँच लाख रुपये दिये गये, और हाल ही में अमरावती में दंगों में लगभग 75 करोड़ के नुकसान के लिये 137 हिन्दुओं को दिये गये कुल 20 लाख। ऐसे बनता है महान राष्ट्र।

लेकिन एक बात तो तय है कि जो कौम अपने शहीदों का सम्मान नहीं करती वह मुर्दा कौम तो है ही, जल्द ही नेस्तनाबूद भी हो जाएगी, भले ही वह सॉफ़्टवेयर शक्ति हो या कथित “महान संस्कृति” का पुरातन देश....


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Negative Voting Indian Elections

क्या आप जानते हैं कि हमारे संविधान की एक धारा 49-O में एक प्रावधान है जिसके अनुसार किसी भी चुनाव में मतदाता पोलिंग बूथ पर जाये, अपनी पहचान और मतदाता क्रमांक साबित करे, अपनी उंगली पर स्याही लगवाये, और फ़िर चुनाव अधिकारी से यह कहे कि मैं किसी को वोट नहीं करना चाहता। सवाल उठता है कि हमें ऐसा क्यों करना चाहिये? मान लीजिये कि आपके वार्ड चुनावों में लगभग सारे प्रत्याशी या तो गुंडे-बदमाश हैं (90% तो होते ही हैं), या फ़िर कोई निकम्मा उम्मीदवार पुनः मैदान में है और आप चाहते हैं कि सभी तो नालायक हैं, मैं क्यों वोट दूँ? उस वक्त यह धारा काम आयेगी... मान लीजिये कि आपके वार्ड से कोई प्रत्याशी 123 वोटों से जीतता है, लेकिन यदि उसी वार्ड में 124 वोट “मुझे किसी को वोट नहीं देना” वाली धारा 49-O के निकलते हैं तो न सिर्फ़ उस प्रत्याशी का चुनाव रद्द हो जायेगा, बल्कि जब पुनः चुनाव होंगे उस वक्त पिछले सारे प्रत्याशियों को चुनाव में भाग लेने का मौका नहीं मिलेगा, इस प्रकार अपने-आप सभी उम्मीदवार खारिज हो जायेंगे। यह धारा “Conduct of Election Rules” सन्‌ १९६१ में उल्लिखित है। इस धारा को हमारे नेताओं ने जानबूझकर प्रचारित नहीं किया, लेकिन आश्चर्यजनक यह भी है कि चुनाव आयोग और शेषन जैसे अधिकारियों ने भी जनता को इस बारे में जागरूक करने का प्रयास नहीं किया। पड़ताल करने पर पता चला कि इस धारा के उपयोग और इलेक्ट्रानिक मशीनों में “निगेटिव” (इनमें से कोई नहीं) वाला बटन लगाने सम्बन्धी याचिका उच्चतम न्यायालय में लम्बित है, और उस पर निर्णय आना बाकी है। इस सम्बन्ध में पत्रकार एस.दोराईराज ने अप्रैल २००६ में एक लेख लिखा था|


“किसी भी प्रत्याशी को वोट नहीं” के प्रावधान वाली भारतीय संविधान की धारा 49-O के बारे में जब मैंने गत दिनों मित्रों को ई-मेल किया था, तो अधिकतर की सलाह थी कि इसे मैं ब्लॉग पर डालूँ, फ़िर मैंने इस सम्बन्ध में कुछ जाँच-पड़ताल की तो पाया कि वाकई इस प्रकार की धारा हमारे चुनाव संविधान में उपलब्ध है। गत वर्ष तमिलनाडु विधानसभा के दौरान वहाँ के मुख्य चुनाव अधिकारी नरेश गुप्ता ने स्वीकार किया था कि इस प्रकार के प्रावधान होने की जानकारी एक “एनजीओ” ने माँगी थी, कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में भी “नकारात्मक वोटिंग” नामक एक बटन होना चाहिये। “पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज” नामक संस्था ने यह याचिका उच्चतम न्यायालय में लगाई है। यदि मित्रों को इस याचिका की वर्तमान स्थिति के बारे में पता हो तो उसे अपने-अपने ब्लॉग पर डालें, और नहीं तो कम से कम इस धारा के बारे में जनता को अवगत कराते रहें, कभी-न-कभी तो लोग इस बारे में समझने लगेंगे, और कुछ नहीं तो पार्टियों और उम्मीदवारों में एक भय की लहर तो दौड़ेगी। और भले ही यह जानकारी कुछ लोगों को पहले से ही हो, लेकिन मेरी तरह कई लोग और भी होंगे जिन तक यह जानकारी पहुँचना आवश्यक है, इसलिये इसे ब्लॉग पर डाल रहा हूँ....


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Malaysia Crisis and Indians

वही पुरानी कहानी एक बार फ़िर दोहराई गई, एक “तथाकथित” सेकुलर देश ने, एक दूसरे तथाकथित “महाशक्ति” को दुरदुराये हुए कुत्ते की तरह हड़का दिया। करुणानिधि ने तो अपना “वोट-बैंक” पक्का कर लिया, लेकिन हमारी सेकुलर(?) सरकार की जैसी घिग्घी बँधना थी, ठीक वैसी ही बँधी, क्योंकि मलेशिया भले ही कहने को सेकुलर हो, उसकी रगों में खून तो “वही” दौड़ रहा है, और हम ठहरे “स्वघोषित महाशक्ति”, सो किसी को नाराज भी नहीं कर सकते। और मानो गलती से कभी दहाड़ लगा भी दी, तो सुनेगा कौन हमारी? एक अहसानफ़रामोश पड़ोसी तक तो हमें जब-तब गरियाता-लतियाता रहता है। अपने आदमी देश के कोने-कोने में भेज कर डकैतियाँ डलवा रहा है, हमारे यहाँ की चिल्लर गायब करवा रहा है, ये हैं कि “वार्ता” का ढोंग कर रहे हैं।

खैर, मलेशिया पर वापस लौटते हैं... इस समस्या से उत्पन्न तीन पहलू तुरन्त नजर आते हैं- पहला है, क्यों भारतवंशियों पर ही लगातार समूचे संसार में हमले बढ़ते जा रहे हैं? कारण (मेरी नजर से) – शायद वहाँ के स्थानीय लोग भारतीयों की तरक्की से जलते होंगे, या फ़िर खुद भारत से गये हुए लोग वहाँ के समाज में घुल-मिल नहीं पाते होंगे, जिससे संवादहीनता की स्थिति बनती है। इससे एक सवाल सहज ही उत्पन्न होता है कि किसी दूसरे देश में गये भारतीयों को जब वहाँ की नागरिकता मिल गई हो, तब उन लोगों का भारत की तरफ़ मदद को ताकना क्या उचित है? ब्रिटेन या कनाडा जहाँ कहीं भारतीयों को उस देश की नागरिकता मिल गई, तो फ़िर क्यों वे हर बार भारत-भारत भजते रहते हैं, क्या यह देशद्रोह नहीं है? ठीक वैसे ही जैसे विभाजन के समय पाकिस्तान बनने पर जो मुसलमान भारत में ही रह गये यदि वे पाकिस्तान का झंडा उठाये घूमते हैं तब उन्हें देशद्रोही ही करार दिया जाता है। भले ही उनके कई रिश्तेदार पाकिस्तान में हों, लेकिन जब वे स्वयं भारत के नागरिक हैं तो उन्हें पाकिस्तान की ओर क्यों ताकना चाहिये? क्यों हर बात में पाक का गुणगान करना चाहिये? और मुसलमानों का केस तो इस केस से अलग इसलिये है क्योंकि विभाजन तो एक मानवनिर्मित त्रासदी थी, लेकिन जब कोई भारतीय अपनी स्वेच्छा से देश छोड़कर जाता है और दूसरे देश की नागरिकता ले लेता है, तब उसे वहीं के समाज में घुल-मिल जाना चाहिये, उसी देश का गुणगान करना चाहिये, उसी देश के भले के बारे सोचना चाहिये, इसलिये यदि पीड़ित तमिल मलेशिया के नागरिक हैं, तो उन्हें वहाँ के कानून के हिसाब से चलना चाहिये (मलेशिया कोई भारत थोड़े ही है कि अबू सलेम को लाने में करोड़ों खर्चा कर दिया, अब उसे संभालने में कर रहे हैं, ताकि वह सांसद बनकर और करोड़ों चरता फ़िरे)। और जो भारतीय मलेशिया के नागरिक नहीं बने हैं, उन्हें तो शिकायत करनी ही नहीं चाहिये, सीधे वापस आ जाना चाहिये (वैसे भी वह एक मुस्लिम देश है, वहाँ कोई सुनवाई तो होगी नहीं, जैसे अभी कुछ समय पहले मलयालियों के साथ अरब देशों में हुआ था)। रही बात मार खाने की, पिटने की, तो भैया जब हिन्दुस्तान में ही हिन्दू पिटता रहता है, तो बाहर उसकी क्या औकात है? चाहे फ़िजी हो, चाहे जर्मनी, चाहे अरब हो या फ़्रांस, हिन्दू कुटने के लिये ही पैदा हुआ है (दूसरा गाल सतत आगे जो करता रहा है)।

दूसरा पक्ष है सरकार- चाहे वह कथित हिन्दू समर्थक भाजपा की ही सरकार क्यों ना हो, विदेशों में हमारी सरकारों की एक नहीं चलती, कोई इनकी “चिंताओं” पर कान नहीं देता, और दे भी क्यों? हमने किया क्या है आज तक ईमानदारी से जनसंख्या बढ़ाने, जन्म से लेकर मृत्यु तक भ्रष्टाचार करने और जाति-धर्म के नाम पर लड़ने के अलावा। हाँ एक बात हमने जरूर की है...जमाने भर से हथियार पूरे पैसे एडवांस देकर खरीदे हैं और उन्हें कभी उपयोग नहीं किया। “भारतवंशी-भारतवंशी” नाम की बंसी जरूर हम यदा-कदा बजाते रहते हैं, बेशर्मी से ये भी कभी नहीं सोचते कि ना तो सुनीता विलियम्स, न तो बॉबी जिन्दल, ना स्वराज पॉल, ना ही वीएस नायपॉल कोई भी भारत का नागरिक नहीं है, ना इन्हें भारत से कोई खास लगाव है।

तीसरा पक्ष है, भारतीयों की हीनभावना से ग्रस्त मानसिकता। हमारे दिमाग में यह भर दिया गया है कि हमारा कोई गौरवशाली इतिहास था ही नहीं, शिवाजी, पृथ्वीराज चौहान वगैरह भगौड़े थे, सिर्फ़ अकबर ने या फ़िर डलहौजी साहब ने ही कुछ किया है, वरना हम तो साँपों से ही खेल रहे होते अब तक! आत्मसम्मान नाम की चीज एक खास मानसिकता के लोगों ने षडयन्त्रपूर्वक समाप्त कर दी। जहाँ किसी ने “गर्व” की बात की, तड़ से उसे सांप्रदायिक ठहरा दो।

तो भाईयों और बहनों, चादर तानकर सो जाईये, जैसे रामभरोसे देश चल रहा है वैसे ही आगे भी चलता रहेगा, करना ही है तो पहले अपने देशवासियों की फ़िक्र करो, फ़िर उनके बारे में सोचना जो दूसरे देशों के नागरिक हैं।

प्राप्त सबक :
(१) किसी भी दूसरे देश में खासकर जब वह मुस्लिम बहुल हो, भारतीयों को किसी भी प्रकार की हमदर्दी की अपेक्षा नहीं रखना चाहिये। (लोकतंत्र और निरपेक्ष न्याय प्रणाली मुस्लिम देशों के लिये अभी भी अजूबा हैं)
(२) जिस देश के नागरिक बन चुके हो उसी देश का गुणगान करो (कहावत- जिसकी खाओ, उसकी बजाओ)
(३) यदि विपरीत परिस्थिति हो भी जाये तो “भारत सरकार” नाम की लुंजपुंज संस्था से किसी मदद की उम्मीद मत करो।
(४) इसराइलियों की तरह आत्मसम्मान से जीने की कोशिश करना चाहिये।


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Astrology Consumer Protection Act

जब मैंने ज्योतिष शास्त्र को विज्ञान बताने और ज्योतिषियों को परखने हेतु कुछ प्रयोगों पर पिछले कुछ लेख लिखे थे उस समय टिप्पणियों में तथा व्यक्तिगत ई-मेल में मुझे ज्योतिष समर्थकों के जो जवाब मिले थे उनमें से अधिकतर में ज्योतिष और चिकित्सा विज्ञान (मेडिकल साइंस) की तुलना करने की कोशिश की गई, मुझे लगातार यह बताया गया कि कोई भी विज्ञान पूरा नहीं होता, न ही डॉक्टरों द्वारा दी जाने वाली दवाईयाँ सुरक्षित होती हैं। इस तर्क के आधार पर समर्थकों का कहना था कि डॉक्टर भी गलती करते हैं, वे भी मरीज पर शोध करते रहते हैं, उनमें भी एकमत नहीं होता... आदि-आदि। वैसे तो इन दो बातों की तुलना करना ही सिरे से गलत है, क्योंकि चिकित्सा विज्ञान में लगातार शोध होते रहते हैं, तर्क-वितर्क होते हैं, बड़े-बड़े विद्वान भी गलत साबित होते हैं, वे अपनी गलती सुधार भी करते हैं, किसी मरीज को चार डॉक्टरों का एक पैनल देखेगा तो उनमें आपस में एकमत जल्दी से हो जायेगा, लेकिन ज्योतिष के साथ ऐसा कुछ भी नहीं है। यहाँ तो प्रश्न करते ही सामने वाले को नास्तिक, बेवकूफ़, नालायक, विधर्मी आदि साबित करने की होड़ लग जायेगी।

उसी समय से मेरे दिमाग में एक प्रश्न लगातार घूम रहा है कि “क्या ज्योतिषी भी उपभोक्ता संरक्षण कानून के अन्तर्गत आते हैं?” क्योंकि जब ज्योतिष समर्थक लगातार उसे विज्ञान कहते हैं और मेडिकल साइंस से तुलना करते हैं तब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जिस प्रकार डॉक्टर और अस्पताल उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे में आते हैं, उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है, उनकी डिग्री छीनी जा सकती है, क्या ऐसा ज्योतिषी के साथ किया जा सकता है? इस सम्बन्ध में कानूनी स्थिति की जानकारी चाहूँगा। ज्योतिष नामक “व्यवसाय” करने के लिये किसी को कोई डिग्री नहीं लेनी होती, किसी ज्योतिष महाविद्यालय (?) में पढ़ाई करने की आवश्यकता नहीं होती। अब मैं विद्वानों से जानना चाहता हूँ कि क्या भविष्यकथन गलत साबित होने पर किसी ज्योतिषी पर मुकदमा दायर किया जा सकता है? यदि हाँ, तो अगला प्रश्न उठता है कि कितने ज्योतिषी अपने यजमान को दक्षिणा की “रसीद” देते हैं, जिसके बल पर केस उपभोक्ता अदालत में टिके? दक्षिणा के अलावा ज्योतिषी छाता, जूते, छड़ी, कपड़ा, गाय, जमीन, आदि दान करने को कहते हैं क्या उसकी रसीद देते हैं? और यदि उसका उत्तर है “नहीं” तो फ़िर दूसरा प्रश्न खड़ा होता है कि – जब कोई व्यक्ति परिस्थितियों से परेशान हो जाता है तभी वह ज्योतिषी की शरण में जाता है। ऐसा माना जाता है कि ज्योतिषी उस बेचारे को मानसिक आधार देता है, और उसे समझा देता है कि आपका बुरा वक्त बस जाने ही वाला है, लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान ज्योतिषी उसकी जेब भी काफ़ी हल्की कर देता है। ऐसे में पहले से ही पीड़ित व्यक्ति चुपचाप यह आर्थिक फ़टका भी सहन कर लेता है। लगभग इन्हीं परिस्थितियों में वह डॉक्टर के पास जाता है और यदि उस चिकित्सक से दवा देने में या उपचार में या “डायग्नोस” में गलती हो जाये तो उसे उपभोक्ता कानून के जरिये कोर्ट में घसीटने से बाज नहीं आता। फ़िर ज्योतिषी को भला क्यों छोड़ना चाहिये, क्या वे आसमान से उतरे हुए फ़रिश्ते हैं? या ज्योतिष किसी दैवीय कृपा से प्राप्त हुई कोई विद्या है, जिस पर प्रश्न उठाया ही नहीं जा सकता? सीधी सी बात तो यह है कि जहाँ दो व्यक्तियों या संस्था में पैसे का लेन-देन होता है, स्वतः ही वहाँ “उपभोक्ता” और “सेवा” का नियम लागू हो जाना चाहिये। यदि भविष्यकथन गलत हो जाये तो ज्योतिषी की गलती, लेकिन यदि तुक्के में भविष्यकथन सही बैठ जाये तो ज्योतिष विज्ञान महान है, ऐसी बात ज्योतिषियों ने ही फ़ैलाई है। यदि यजमान पर कोई संकट नहीं आया तो “मैंने फ़लाँ उपाय बताया था, इसलिये विघ्न टल गया” और यदि फ़िर भी संकट आ ही गया तो “मैंने तो पहले ही कहा था, कि तुम्हारे ग्रह खराब चल रहे हैं”....। वर्तमान के तनावग्रस्त और आपाधापी भरे अनिश्चित जीवन में व्यक्ति को मानसिक आधार चाहिये होता है, जिसके जीवन में जितनी अधिक अनिश्चितता होगी वह उतना ही ज्योतिष, वास्तु आदि बातों पर यकीन करेगा, जिसका साक्षात उदाहरण हैं फ़िल्म स्टार (जिनकी किस्मत हर शुक्रवार को बदलती रहती है) और राजनेता जिसे अगले पाँच साल की चिंता पहले दिन से ही खाये जाती है, या फ़िर कोई सट्टेबाज व्यवसायी जो रोज-ब-रोज बड़े-बड़े दाँव लगाता है, ये सारे लोग सुख में भी ज्योतिषियों के चक्कर काटते नजर आते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी समस्या के हल का आसान रास्ता खोजता है, मन्दिर जाना, व्रत करना, ज्योतिषियों को कुंडली दिखाना जैसे सैकडों उपाय वह करता है, लेकिन तर्कबुद्धि, व्यावहारिक उपाय या वैज्ञानिक सोच से वह बचता है। फ़िर बात आती है विश्वास और श्रद्धा पर, लेकिन यही विश्वास और श्रद्धा जब खंडित होती है, और बार-बार होती है, तब भी उस व्यक्ति की आँखें नहीं खुलतीं बल्कि उसका अंधविश्वास बढ़ता ही जाता है, और ज्योतिषियों की चांदी कटती रहती है। जिनके यहाँ पैसे की नदियाँ बह रही हैं, और ज्योतिष, न्युमरोलॉजी, वास्तु आदि जिनके लिये एक चोंचला और दिखावा मात्र है, उन्हें तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता, लेकिन एक सामान्य निम्न-मध्यमवर्गीय व्यक्ति जब ज्योतिषी के हाथों ठगा जाता है, तब क्या किया जा सकता है। इसलिये एक बार अन्त में पुनः मैं अपने प्रश्न दोहराना चाहूँगा और जनता की राय लेना चाहूँगा कि –
(१) क्या ज्योतिषी भी “उपभोक्ता संरक्षण कानून” के अन्तर्गत आते हैं?
(२) यदि हाँ, तो वह उपभोक्ता किस प्रकार से कानूनी मदद ले सकता है? क्या वह धोखाधड़ी का केस लगा सकता है?
(३) और यदि नहीं, तो क्यों नहीं? जब डॉक्टर, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, टेलीफ़ोन, बिजली, अन्य कम्पनियाँ, आदि सभी जो पैसे लेकर सेवा देते हैं इसके दायरे में आते हैं तो ज्योतिषी क्यों नहीं?
नोट : ज्योतिष समर्थक भी मुझ अज्ञानी को ज्ञान बाँटने की कृपा करें...
पुनश्च – बेनामी टिप्पणियों से भी बचें...


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ज्योतिष : अखबार और पत्रिकायें

Written by गुरुवार, 15 नवम्बर 2007 13:15
Astrology, Newspaper, Magazines

यदि ज्योतिष कोई शास्त्र या विज्ञान नहीं है तो विभिन्न पत्र-पत्रिकाएं और अखबार क्यों राशि-भविष्य आदि छापते हैं?

यह प्रश्न कई बार हमसे लोगों ने किया है, उसके जवाब के लिये पहले एक मजेदार कथा सुनें- इंग्लैंड के एक स्कूल में मैडम ने बच्चों से पूछा कि अब तक पृथ्वी पर सबसे महान विभूति कौन सी हुई है, यदि यह सवाल कोई बच्चा बता दे तो मैं उसे दस डालर दूँगी। कई बच्चों ने कई प्रकार के जवाब दिये, जैसे आइंस्टीन, गैलिलीयो, सेंट थॉमस, सेंट पीटर, मदर टेरेसा आदि, लेकिन मैडम ने सभी को नकार दिया। फ़िर एक गुजराती बच्चा बोला- मैडम मेरा जवाब है “ईसा मसीह”। मैडम ने खुश होकर कहा- वेलडन बच्चे एकदम सही जवाब, ये लो दस डालर। मुझे खुशी है कि तुमने एक भारतीय होकर भी राम और कृष्ण का नाम नहीं लिया और जीसस का नाम लिया।
गुजराती बच्चा बोला- मेरा दिमाग भी जवाब में कृष्ण ही कहता है, लेकिन धंधा तो धंधा है।

ठीक इसी प्रकार अखबारों और पत्रिकाओं के लिये भी ज्योतिष सम्बन्धी समाचार, भविष्यवाणियाँ, विज्ञापन, तस्वीरें आदि लगातार छापना उनकी व्यवसायगत मजबूरी है। भारत की जनसंख्या यदि एक अरब बीस करोड़ भी मान लें, तो औसतन बारह राशियों के हिसाब से एक राशि के दस करोड़ लोग तो होंगे। अब रोजाना भविष्यवाणी में कुछ भी ऊटपटाँग लिखा भी जाये तो जाहिर सी बात है कि लाखों व्यक्तियों पर वह कथन सही ही बैठेगा (Law of Probability), किसी का प्रमोशन होता है, किसी की दुर्घटना होती है, किसी का विवाह तय होता है, कोई यात्रा करता है, किसी को धंधे में नफ़ा-नुकसान होता है, इसमें कोई नई या वैज्ञानिक बात नहीं है।

अखबारों या पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाली भविष्यवाणियाँ राशि आधारित होती हैं, जाहिर है कि वे पूरी तरह से अवैज्ञानिक और सिर्फ़ अनुमान भर हैं, क्योंकि उसमें लग्नराशि, ग्रहयोग या कुंडली स्थान बल आदि पर विचार नहीं किया जाता। यहाँ तक कि अग्रगामी और आधुनिक कहे जाने वाले कई अखबार भी ये भविष्यवाणियाँ आदि छापते रहते हैं, क्योंकि ये धंधे का सवाल है, यदि अखबार मालिक तर्कबुद्धि से विचार करने लगें तो उन्हें लाखों रुपये रोजाना का नुकसान हो सकता है। “सिर्फ़ सिद्धांतवाद से काम नहीं चलता, धंधा-पानी और कमाई ज्यादा महत्वपूर्ण है”।

न्यूयॉर्क टाइम्स और अन्य पाश्चात्य अखबार भी इस प्रकार की राशियाँ आदि छापते रहते हैं। सिगरेट के पैकेट पर छपी चेतावनी को नजरअंदाज करके भी करोड़ों लोग लगातार धूम्रपान करते ही रहते हैं, यदि उसी प्रकार सभी ज्योतिषी यदि कुंडलियों पर यह छापने लगें कि “कुंडली के आधार पर भविष्य पर विश्वास करना मूर्खता है”, तब भी उनकी कमाई में कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। लोकसत्ता के सम्पादक श्री माधव गड़करी ने खुद एक बार यह स्वीकार किया था कि अखबार में छपने वाला राशि भविष्य उन्होंने कई बार उलट-पुलट कर वही-वही वाक्य अलग-अलग बार दोहरा कर छाप दिये। लोग उन भविष्यवाणियों को पढ़ते हैं एक आनंद लेने के तौर पर। यदि उसमें व्यक्ति के पक्ष का कुछ लिखा हो तो वह खुश हो जाता है, विपक्ष का कुछ लिखा हो तब भी वह उसे खास महत्व नहीं देता। इसलिये सिर्फ़ अखबारों में या यत्र-तत्र ज्योतिष के बारे में लिखा जाता है यह कहकर ज्योतिष को विज्ञान या महान शास्त्र नहीं कहा जा सकता।

ज्योतिष के एक पक्ष का तो मैं भी समर्थन कर सकता हूँ, वह पक्ष है “इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव”। एक अच्छा ज्योतिषी एक अच्छा मनोवैज्ञानिक होता है, बल्कि होना भी चाहिये। भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है यह कोई नहीं बता सकता चाहे वह कितना ही महान क्यों न हो। लेकिन भागदौड़ भरी जिंदगी और निरन्तर संघर्षों से एक सामान्य आदमी घबरा जाता है, कई बार निराश-हताश हो जाता है (दुःख, परेशानियाँ, कष्ट लगभग 95 प्रतिशत लोगों के जीवन में होते ही हैं) तब उस वक्त वह आसान रास्ते के तौर पर ज्योतिषी के पास जाता है। ज्योतिषी उसे उसके भविष्य के बारे में कुछ (बल्कि अधिकतर) अच्छा बताकर उसे दिलासा देते हैं, “अगले एक वर्ष तक तुम पर शनि-मंगल का साया है”, या फ़िर “आप मेहनत तो बहुत करते हैं लेकिन राहु-केतु आपको सफ़ल होने से रोक रहे हैं” आदि कहकर उसे मनोवैज्ञानिक धैर्य देने की कोशिश करते हैं और उसमें सफ़ल भी होते हैं, क्योंकि आमतौर पर ज्योतिषी से मिलने के बाद व्यक्ति में एक स्थैर्य का भाव आ जाता है “कि अपनी किस्मत ही खराब है इसलिये यह हो रहा है, लेकिन महाराज ने कहा है कि अगले एक-दो साल में स्थिति बदलेगी”, फ़िर वह लगातार संघर्ष करता जाता है, अपनी तरफ़ से कुछ न कुछ उपाय करता ही है, कभी वह सफ़ल हो जाता है तो क्रेडिट ज्योतिषी को देता है, और पुनः असफ़ल हो जाता है तो ज्योतिषी को कभी दोष नहीं देता, अपनी किस्मत को देता है। यह मानव स्वभाव है, कि कष्टों में जहाँ से उसे मानसिक आधार मिले उसे वह अपना मान लेता है। उसके दुःख के सामने उसकी सामान्य तर्कबुद्धि भी काम करना बन्द कर देती है और फ़िर वह छोटी-छोटी बातों के लिये भी ज्योतिषी के चक्कर लगाने लगता है।

इस विस्तृत और विवादित लेखमाला को फ़िलहाल स्थगित करते हुए इतना ही कहना चाहूँगा कि –

(१) मेरा यह दावा कभी नहीं रहा कि मैं ज्योतिष को सम्पूर्ण रूप से जानता हूँ।
(२) एक आम आदमी की सामान्य तर्कबुद्धि में जो शंकायें आती हैं या आ सकती हैं, यह उन्हें उठाने की एक कोशिश भर थी।
(३) कई ज्योतिषी भी मानते हैं कि ज्योतिष कोई सम्पूर्ण शास्त्र नहीं है, लेकिन वे इस पर विवाद, चर्चा, प्रयोग आदि करने से भी बचना चाहते हैं।
(४) शत-प्रतिशत भविष्यवाणी यदि कोई कर दे तो वह ‘ब्रह्मा” ही न हो जाये, लेकिन किसी शास्त्र या विज्ञान या सिद्धान्त को साबित करने के लिये कम से कम अस्सी प्रतिशत सम्भावनायें तो खरी उतरनी ही चाहिये, यही हमारा आग्रह है कि प्रयोगों के जरिये कम से कम अस्सी प्रतिशत सफ़लता हासिल की जाये, फ़िर जो इसे नहीं मानते हैं वे भी इसका लोहा मानेंगे और ज्योतिष समर्थकों के पास एक “डाक्यूमेंट्री प्रूफ़” भी होगा। इसे एक विकसित विज्ञान बनाने के लिये सतत प्रयोग करना ही एकमात्र उपाय है। इसके लिये ज्योतिष विद्वान और वैज्ञानिक साथ में एकत्रित हों, पूर्वाग्रह छोड़कर नवीन प्रयोग करें, और इसे आम जनता तक आसान और तर्कपूर्ण भाषा में पहुँचायें, तब इस पर चढ़ा हुआ रहस्यमयी आवरण भी हटेगा।


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Experiments for Astrology Try yourself

अपने पिछले ब्लॉग में जब मैंने अपनी कुंडली का उदाहरण दिया था उस वक्त सदा की तरह Anonymous (बेनामी) महोदय ने सदाबहार उत्तर दिया था कि आपकी जन्म कुंडली ही गलत होगी तो कोई भी ज्योतिषी कैसे सही भविष्यकथन करेगा। उससे एक सवाल दिमाग में कौंधा कि यदि इसका उलटा प्रश्न ज्योतिषी महोदय से किया जाये कि यदि जन्म समय सही हो और उसी अनुरूप कुंडली बनी हो तो क्या भविष्यकथन सही होगा? क्या उत्तर मिलेगा? उत्तर भी हमें पहले ही मालूम है- “मूलतः जन्म समय को लेकर ज्योतिषियों में विवाद हैं”....

तर्कबुद्धि से देखा जाये तो जिस समय गर्भधारणा होती है उसे ही जन्म समय माना जाना चाहिये, लेकिन वह समय तो कोई भी नहीं बता सकता। बच्चा जब बाहर आकर रोता है या कहें पहला श्वास लेता है उसे ही आमतौर पर जन्म समय माना जाता है। पहले बालक का सिर दिखने, बच्चा पूरी तरह से बाहर आने, नाल कटने आदि अनेक बातों पर जन्म समय निर्धारित की जाती थी। इससे एक बात तो साफ़ है कि “जन्म का अचूक समय बता पाना लगभग असम्भव है”। अचूक जन्मसमय पर ही कुंडली की सार्थकता सिद्ध होती है। उसी अचूक कुंडली पर भविष्यकथन आधारित होता है, मतलब यदि भविष्यकथन सही नहीं निकला तो “आपकी जन्म कुंडली गलत होगी”, यह तर्क तत्काल आगे कर दिया जाता है। अब ज्योतिषी महोदय ही अज्ञानियों को बतायें कि वे किस जन्म समय के आधार पर बनी कुंडली को अचूक जन्म कुंडली मानेंगे?

जब हम किसी से “कितने बजे हैं” पूछते हैं तो वह कभी भी ऐसा नहीं कहता कि 3 बजकर 58 मिनट और 50 सेकंड हुए हैं, सीधे “चार बजे हैं” कहा जाता है। डिजिटल घड़ी में भी 03.59 के बाद अगले मिनट पर 04.00 दर्शाता है, वैसे देखा जाये तो एक ही मिनट बढ़ा, लेकिन तीन की जगह चार का अंक आ गया होता है। ठीक यही कुंडली के समय भी होता है, इस प्रकार के “बॉर्डर” पर आये हुए समय में नर्स या डॉक्टर समय का एक मोटा अन्दाज बताते हैं, क्या उससे एकदम सही कुंडली बनाना सम्भव है? जबकि 5-10 मिनट के अन्तर पर कुंडली के प्रथम स्थान राशि का आँकड़ा बदल सकता है। सामन्यतया ज्योतिषी जो कुंडली देखते हैं उसे “गुटका” कुंडली कहना चाहिये, क्योंकि उसमें पाँच-दस मिनटों का हेर-फ़ेर की सम्भावना होती है। हालांकि ज्योतिषी ऐसा आभास देते हैं मानो उन पाँच मिनटों के अन्तराल से भारी उलटफ़ेर हो जायेगा, क्योंकि यदि ऐसा वे नहीं करेंगे तो “आपकी कुंडली गलत बनी हुई है” वाला तर्क कभी नहीं दे पायेंगे। और यदि उनके बताये अनुसार जन्म समय की कुंडली बनाई जाये तब भी वे यह दावे से नहीं कह सकते कि जातक के भविष्यकथन की अस्सी प्रतिशत बातें भी सही निकलेंगी (बीस प्रतिशत का Standard Error हम मान लेते हैं)। तात्पर्य यह कि जन्म समय की अचूकता पर कुंडली अध्ययन और भविष्य निर्भर नहीं होता।

गत्यात्मक ज्योतिष की संगीता जी ने ज्योतिष की वैज्ञानिकता को जाँचने के लिये एक उदाहरण दिया है, वह तो ठीक है ही, एक दो सुझाव हमारी तरफ़ से भी हैं। वैसे देखा जाये तो डॉ.अब्राहम कोवूर वाले मॉडल में दिये गये प्रयोग भी बेहतरीन हैं, जिससे ज्योतिषियों के भविष्य और फ़लित सम्बन्धी कथनों की जाँच हो सकती है। जिन व्यक्तियों को ज्योतिष पर पूरा विश्वास है और वे ऐसा मानते हैं कि फ़लज्योतिष में कुछ तथ्य हैं उनके लिये एक आसान सी जाँच पद्धति इस प्रकार है-

1. आपके आज तक के जीवन में घटित हुई चुनिंदा प्रमुख (अच्छी और बुरी) घटनायें और उनके निश्चित समय एक कागज पर नोट कर लें (जाहिर है कि ये प्रमुख घटनायें आपके जन्म के समय भविष्य के गर्भ में थीं, लेकिन अब तो आप उन घटनाओं से गुजर चुके)। फ़िर आप उस जन्म कुंडली को किसी जाने-माने ज्योतिषी को दिखायें, जिन पर आपकी पूरी श्रद्धा है। आप ध्यान से देखें कि जन्मकुंडली के अध्ययन से उन घटनाओं के बारे में (जो आपके कागज पर पहले से ही नोट हैं) ज्योतिषी महोदय क्या बताते हैं। उनका काम और आसान करने के लिये थोड़ी देर के बाद कुछेक घटनाओं के स्वरूप के बारे में उन्हें बता दीजिये, फ़िर देखिये कि क्या वे उनके घटित वर्ष या समय सही बता पाते हैं?

2. इसी प्रकार कुछ ज्योतिषी ऊँची हाँकते हैं कि वे मृत्यु का सही समय बता सकते हैं, उनके पास एकाध-दो मृत व्यक्तियों की कुंडली ले जायें और देखें कि वे उनके भविष्य(?) बारे में क्या बताते हैं, फ़िर काम और आसान करने के लिये उन्हें बता दें कुंडली वाले की तो मृत्यु हो चुकी है, सिर्फ़ उसका वर्ष/समय उन्हें बताना है।

3. एक और प्रयोग किया जा सकता है- दो ग्रुप तैयार करें पहले “अ” ग्रुप में 15 कुंडलियाँ लें जिनमें विभिन्न व्यवसाय जैसे डॉक्टर, शिक्षक, किराने वाला, सिपाही, कलाकार, इंजीनियर, वकील, राजनीतिज्ञ आदि की कुंडलियाँ हों और दूसरा ग्रुप जिसमें 30 कुंडलियाँ हों जिनमें से 15 कुंडलियाँ पहले वाले ग्रुप की ही रहें और बाकी की 15 दूसरी Randomly चुनी हुई हों। अपना डाटा तैयार करें और अब ज्योतिषियों से पहले का सम्बन्धित डाटा इकठ्ठा करें, उनकी आपस में तुलना करवायें। यदि दूसरे ग्रुप की कुंडलियाँ और पहले ग्रुप की कुंडलियाँ व्यवसाय के अनुसार या व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार अस्सी प्रतिशत भी मिल जायें तो वाकई यह अद्‌भुत होगा। लेकिन यदि इस सारी कवायद के बावजूद यह न पता चल सके कि कुंडली स्त्री की है या पुरुष की? जीवित की है या मृत की? विवाहित की है या अविवाहित की? इस व्यवसाय वाले की है या उस व्यवसाय वाले की? तात्पर्य यह कि जब इस शास्त्र का वश वर्तमान पर ही न चल रहा हो तो कैसे वह भविष्य की घटनाओं का कथन कर सकते हैं, यह मेरी अतिसामान्य तर्कबुद्धि में नहीं आता।

ये सारे प्रयोग कई-कई ज्योतिषियों के साथ करें ताकि प्रयोगों की सफ़लता या असफ़लता का प्रतिशत बढ़ जाये। पूरी सम्भावना है कि ऐसे प्रयोगों के नाम पर अधिकतर ज्योतिषी भाग खड़े होंगे। इससे क्या सिद्ध होता है यह मैं पाठकों की तर्कबुद्धि पर ही छोड़ता हूँ।
(विशेष नोट – Anonymous [बेनामी] टिप्पणियों पर ध्यान देना तो दूर, उन्हें हटा भी दिया जायेगा)

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Slazing, Cricket, Gentleman Game

विकीपीडिया के अनुसार “स्लेजिंग” का मतलब है “विपक्षी खिलाड़ी को शब्द-बाणों से मानसिक संताप देकर उसका स्वाभाविक खेल बिगाड़ना”... क्रिकेट को भद्रजनों का खेल माना जाता है, माना जाता है इसलिये लिख रहा हूँ कि जब आप यह लेख पूरा पढ़ लेंगे तब इसे भद्रजनों का खेल मानेंगे या नहीं, कहना मुश्किल है। क्रिकेट में “स्लेजिंग” कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस स्लेजिंग या शब्दों के आक्रामक आदान-प्रदान के दौरान कई बार मजेदार स्थितियाँ भी बन जाती हैं, कई बार दाँव उलटा भी पड़ जाता है। मैंने अपने पिछले क्रिकेट लेख में पाठकों से वादा किया था कि क्रिकेट इतिहास की कुछ प्रसिद्ध(?) स्लेजिंग के बारे में लिखूँगा, तो पेश हैं कुछ खट्टी-मीठी, कुछ तीखी स्लेजिंग, जिसमें कई प्रसिद्ध खिलाड़ी शामिल हैं (महिला पाठकों से मैं अग्रिम माफ़ी माँगता हूँ, कोई-कोई वाक्य अश्लील हैं, लेकिन मैं भी मजबूर हूँ, जो महान(?) खिलाड़ियों के उद्‌गार हैं वही पेश कर रहा हूँ), लेकिन एक बात तो तय है कि स्लेजिंग से यह खेल नीरस और ऊबाऊ नहीं रह जाता, बल्कि इसमें एक “तड़का” लग जाता है, भारत दौरे पर ऑस्ट्रेलिया के खिलाडियों के चिढ़ने का असली कारण यही था कि जिस स्लेजिंग के “खेल” में वे सबसे आगे रहते थे, उसी में भारतीय खिलाड़ी उनसे मुकाबला करने लगे।

स्लेजिंग की शुरुआत तो उसी समय हो गई थी, जब क्रिकेट के पितामह कहे जाने वाले इंग्लैंड के W.G.Grace ने एक बार अम्पायर द्वारा जल्दी आऊट दिये जाने पर उससे कहा था, “दर्शक यहाँ मेरी बल्लेबाजी देखने आये हैं, तुम्हारी उँगली नहीं”, समझे....और वे दोबारा बल्लेबाजी करने लगे। लेकिन एक बार जब गेंद से उनकी गिल्ली उड़ गई, तो ग्रेस महोदय सहजता से अम्पायर से बोले, “आज हवा काफ़ी तेज चल रही है, देखा गिल्लियाँ तक गिर गईं”, लेकिन अम्पायर साहब भी कहाँ कम थे, वे बोले, “हाँ वाकई हवा तेज है, और यह पेवेलियन जाते वक्त आपको जल्दी जाने में मदद करेगी”...।

डबल्यू जी ग्रेस को एक बार बहुत मजेदार “स्लेजिंग” झेलनी पड़ी थी, जब एक काऊंटी मैच में चार्ल्स कोर्टराईट नामक गेंदबाज की अपील चार-पाँच बार अम्पायर ने ठुकरा दी थी, और ग्रेस लगातार गेंदबाज को मुस्करा कर चिढ़ाये जा रहे थे, अन्ततः एक गेंद पर ग्रेस के दो स्टम्प उखड़ कर दूर जा गिरे, पेवेलियन जाते वक्त कोर्टराइट ने ताना मारा, “डॉक्टर..चाहो तो तुम अब भी खेल सकते हो, एक स्टम्प बाकी है...” और ग्रेस जल-भुनकर रह गये।

एक गेंद में हीरो से जीरो बनने का वाकया – वेंकटेश प्रसाद Vs आमिर सोहेल
विश्वकप में भारत ने पाकिस्तान को हमेशा हराया है। भारत में हुए विश्वकप के दौरान भारत के पहली पारी में बनाये गये 287/8 के स्कोर का पीछा करते हुए आमिर सोहेल और सईद अनवर ने 15 ओवर में 110 रन बना लिये थे, दोनो बल्लेबाज जहाँ चाहे वहाँ रन ठोक रहे थे, ऐसे में एक ओवर के दौरान वेंकटेश प्रसाद की गेंद पर आमिर सोहेल ने एक जोरदार चौका जड़ा, और प्रसाद को इशारा कर बताया कि तेरी अगली गेंद भी मैं वहीं पहुँचाऊँगा। वेंकटेश प्रसाद आमतौर पर शांत रहने वाले खिलाड़ी हैं। वे चुपचाप अगली गेंद डालने वापस गये, और भाग्य का खेल देखिये कि प्रसाद की अगली गेंद पर सोहेल बहादुरी दिखाने के चक्कर में बोल्ड हो गये, अब बारी प्रसाद की थी और उन्होंने पहली बार आपा खोते हुए चिल्लाकर आमिर को पेवेलियन की ओर जाने का इशारा किया, आमिर सोहेल का मुँह देखने लायक था। उस गेंद के बाद प्रसाद ने हजारों गेंदे फ़ेंकी होंगी, सैकड़ों विकेट लिये होंगे, लेकिन वह गेंद और उनका वह आक्रामक जवाब उन्हें (और हमें भी) आजीवन याद रहेगा। उस मैच में भी इतनी बेहतरीन शुरुआत के बावजूद पाकिस्तान भारत से हार गया था।

स्टीव वॉ और एम्ब्रोज प्रकरण-

यह वाकया दो महान खिलाडियों के बीच का है, त्रिनिदाद के एक टेस्ट मैच के दौरान जब कर्टली एम्ब्रोज अपनी आग उगलती गेंदों से स्टीव वॉ को परेशान किये हुए थे, अचानक स्टीव ने एम्ब्रोज को कहा - " What the f*ck are you looking at? " एम्ब्रोज भौंचक्के रह गये, क्योंकि आज तक उनसे किसी ने ऐसी भाषा में कोई बात नहीं की थी। एम्ब्रोज स्टीव की तरफ़ आक्रामक रूप से बढ़े और कहा, "Don't cuss me, man", लेकिन ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी किसी से हार नहीं मानते, स्टीव ने पलट कर फ़िर जवाब दिया-'Why don't you go and get f*cked.' " अब तो एम्ब्रोज लगभग स्टीव को मारने ही चले थे, वेस्टइंडीज के कप्तान रिची रिचर्डसन उन्हें बड़ी मुश्किल से संभाल पाये थे, वरना स्टीव वॉ एक घूँसा तो निश्चित खाते।

मैक्ग्राथ Vs एडो ब्रांडेस
एक बार जिम्बाब्वे की टीम के आखिरी बल्लेबाज एडो ब्रांडेस, मैक्ग्राथ के सामने खेल रहे थे, मैक्ग्राथ उन्हें आऊट करने की जी-तोड़ कोशिश करते रहे, ब्रांडेस ठहरे गेंदबाज, कभी गेंद चूक जाते, कभी कैच दूर से निकल जाता, कभी बल्ला कहीं लग जाता और गेंद कहीं और निकल जाती। जब आखिरी बल्लेबाज आऊट न हो रहा हो उस वक्त गेंदबाज सबसे ज्यादा निराश और गुस्से में होता है। मैक्ग्राथ चिढ़ कर ब्रांडेस से बोले- साले, तुम इतने मोटे क्यों हो?... हाजिरजवाबी की इन्तहा देखिये कि एक क्षण भी गँवाये बिना ब्रांडेस बोले, “क्योंकि जब-जब भी मैं तुम्हारी बीवी से प्यार करता हूँ, वह मुझे एक चॉकलेट देती है”... यह इतना तगड़ा झटका था कि ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी भी हँस पड़े थे।

विवियन रिचर्ड्स और ग्रेग थॉमस
यह वाकया काउंटी मैच के दौरान हुआ था, जब ग्लेमोर्गन और समरसेट के बीच मैच चल रहा था। ग्लेमोर्गन के तेज गेंदबाज ग्रेग थॉमस, महान रिचर्ड्स को दो-तीन बार “बीट” कर चुके थे, एक बाउंसर भी रिचर्ड्स की नाक के पास से गुजर चुका था, थॉमस ने कहा- “सुनो रिचर्ड्स, यह एक लाल गेंद है जो लगभग पाँच औंस की होती है, यदि तुम्हें पता न हो तो खेलना बन्द कर दो”, “किंग” के नाम से मशहूर रिचर्ड्स ने अगली दो गेंदों पर दो छक्के लगाये और ग्रेग से कहा- “ग्रेग जरा जाकर गेंद ढूँढो और मुझे बताओ कि वह कैसी लगती है”....

सचिन तेंडुलकर Vs अब्दुल कादिर
अमूमन भारतीय खिलाड़ी पहले के जमाने में किसी से उलझते नहीं थे, और तेंडुलकर तो शुरु से शांत खिलाड़ी रहे हैं और बल्ले से ही जवाब देत हैं। सन्‌की बात है, लिटिल मास्टर ने अपना पहला टेस्ट मैच पाकिस्तान में खेलना शुरु किया। उस वक्त उनकी उम्र ड्रायविंग लायसेंस प्राप्त करने लायक भी नहीं थी। पाकिस्तानी दर्शकों ने पोस्टर लगा रखे थे “दूध पीता बच्चा, घर जा के दूध पी”, सचिन ने लेग स्पिनर मुश्ताक अहमद के एक ओवर में दो छक्के लगाये। मुश्ताक के गुरु वरिष्ठ लेग स्पिनर अब्दुल कादिर से नहीं रहा गया, उसने कहा- “बच्चों को क्या मारता है बे, हमें भी मार कर दिखा”.... सचिन चुपचाप रहे, कादिर के अगले ओवर में सचिन सामने थे, बिना डरे उन्होंने 6, 0, 4, 6, 6, 6 का स्कोर उस ओवर में किया और दुनिया के सामने शंखनाद कर दिया कि एक महान खिलाड़ी मैदान में आ चुका है।

मैक्ग्राथ Vs रामनरेश सरवन
मई २००३ में एंटीगुआ टेस्ट के दौरान जब सरवन सभी ऑस्ट्रेलियन गेंदबाजों को धो रहे थे, उस वक्त मैक्ग्राथ का पारा गरम हो गया। वे लगातार सरवन को घूरते रहे, चिढ़ाते रहे, इशारे करते रहे, लेकिन सरवन आऊट नहीं हो रहे थे, मैक्ग्राथ ने एक भद्दी टिप्पणी की- "So what does Brian Lara's d*ck taste like?" सरवन ने भी तड़ से जवाब दिया- "I don't know. Ask your wife. " अब तो मैक्ग्राथ पूरी तरह उखड़ गये (क्योंकि उस समय उनकी पत्नी का कैंसर का इलाज चल रहा था), लगभग घूँसा तानते हुए मैक्ग्राथ ने कहा- "If you ever F*&king mention my wife again, I'll F*cking rip your F*fing throat out." लेकिन इसमें सरवन की कोई गलती नहीं थी, उन्होंने तो सिर्फ़ जवाब दिया था।

मार्क वॉ Vs एडम परोरे
मार्क वॉ जो अक्सर दूसरी स्लिप में खड़े रहते थे, हमेशा वहाँ से कुछ न कुछ बोलते रहते थे, एक बार उन्होंने एडम परोरे से कहा- "Ohh, I remember you from a couple years ago in Australia. You were sh*t then, you're fu*king useless now". परोरे ने जवाब दिया - "Yeah, that's me & when I was there you were going out with that old, ugly sl*t & now I hear you've married her. You dumb c*nt ".

रवि शास्त्री Vs माइकल व्हिटनी
भारत के एक और “कूल माइंडेड” खिलाड़ी रवि शास्त्री ने भी एक बार मजेदार जवाब दिया था। ऑस्ट्रेलिया में एक मैच के दौरान जब रवि शास्त्री एक बार रन लेने के लिये दौड़ने वाले थे, बारहवें खिलाड़ी माइकल व्हिटनी ने गेंद मारने के अन्दाज में कहा- “यदि तुमने एक कदम भी आगे बढ़ाया तो इस गेंद से मैं तुम्हारा सिर तोड़ दूँगा”, शास्त्री ने बगैर पलकें झपकाये जवाब दिया, “जितना तुम बोलने में अच्छे हो यदि उतना ही खेलने में अच्छे होते तो आज बारहवें खिलाड़ी ना होते”...

रॉबिन स्मिथ Vs मर्व ह्यूज
ऑस्ट्रेलिया के मर्व ह्यूज “स्लेजिंग” कला(?) के बड़े दीवाने थे, और लगातार कुछ ना कुछ बोलते ही रहते थे। एक बार लॉर्ड्स टेस्ट के दौरान जब एक-दो बार रॉबिन स्मिथ उनकी गेंद चूके तो ह्यूज बोले- “ए स्मिथ तुम्हें बल्लेबाजी नहीं आती”। अगली दो गेंदों पर दो चौके लगाने के बाद स्मिथ ने कहा-“ए मर्व, हम दोनों की जोड़ी सही रहेगी, मुझे बल्लेबाजी नहीं आती और तुम्हें गेंदबाजी...”

ऐसा नहीं है कि स्लेजिंग सिर्फ़ विपक्षी खिलाडियों में ही होती है, कई बार एक ही टीम के खिलाड़ी भी आपस में भिड़ लेते हैं (पाकिस्तान इस मामले में मशहूर है)। एक बार इंग्लैंड का पाकिस्तान दौरा चल रहा था, फ़्रैंक टायसन बहुत मेहनत से गेंदबाजी कर रहे थे, अचानक एक कैच स्लिप में रमन सुब्बाराव नामक खिलाड़ी की टाँगों के बीच से निकल गया। ओवर समाप्त होने के बाद रमन ने टायसन से माफ़ी माँगते हुए कहा, “सॉरी यार मुझे टाँगों के बीच गैप नहीं रखना था”... टायसन जो कि नस्लभेदी मानसिकता के थे, ने कहा- हरामी, तुम्हें नहीं बल्कि तुम्हारी माँ को टाँगों के बीच गैप नहीं रखना था”....

दो बदमजा वाकये –
ये दो वाकये हालांकि “स्लेजिंग” की श्रेणी में नहीं आते लेकिन यदि यह पूरी तौर से घटित हो जाते तो क्रिकेट इतिहास में काले धब्बों के नाम पर गिने जाते।

पहला वाकया है डेनिस लिली और जावेद मियाँदाद के बीच का- ऑस्ट्रेलिया में एक मैच के दौरान एक रन लेते समय मियाँदाद, लिली से टकरा गये। मियाँदाद के अनुसार लिली ने उन्हें जानबूझकर रन लेने से रोकने की कोशिश की थी। उस टक्कर के बाद अचानक, गुस्सैल लिली, मियाँदाद के पास पहुँचे और उनके पैड पर एक लात जड़ दी। मियाँदाद भी गुस्से से बैट लेकर आगे बढे और लिली के सिर पर प्रहार करने ही वाले थे, लेकिन अम्पायर ने किसी तरह बीच-बचाव किया और दोनों को शांत किया।

दूसरी घटना है गावसकर और लिली के बीच की, मेलबोर्न टेस्ट के दौरान जब गावस्कर 70 रनों पर खेल रहे थे, तब लिली ने एक एलबीडब्लयू की अपील की, गावसकर ने अम्पायर को अपना बल्ला दिखाते हुए कहा कि गेंद उनके बल्ले से लगने के बाद पैड पर लगी है, लेकिन लिली को धैर्य कहाँ, वे तेजी से आगे बढ़े और गावसकर के पैड पर इशारा करके बताया कि गेंद यहाँ लगी और पास आकर धीरे से एक गाली दी, अम्पायर के आऊट देने के बाद गावसकर जब पेवेलियन वापस जाने लगे तब लिली ने एक और गाली दी, बस तब गावसकर दिमाग खराब हो गया, वे चार कदम वापस लौटे और अपने साथी खिलाड़ी चेतन चौहान को साथ लेकर पेवेलियन जाने लगे। सभी हक्के-बक्के हो गये, क्योंकि इस तरह से किसी कप्तान और बल्लेबाज का मैदान छोड़कर जाना हैरानी भरा ही था। तत्काल मैनेजर और वरिष्ठ अधिकारियों ने बात को मैदान में आकर संभाला, वरना जो अर्जुन रणतुंगा और इंजमाम ने किया था, वह गावस्कर पहले ही कर चुके होते। हालांकि बाद में गावस्कर ने अपनी पुस्तक में इस घटना के बारे में लिखा था कि “वह निर्णय मेरे द्वारा लिया आवेश में गया एक बेहद मूर्खतापूर्ण कदम था”....

गावस्कर को ही एक बार रिचर्ड्स ने मजाक में ताना मारा था, हुआ यह था कि गावस्कर ने एक बार यह तय किया कि वह नम्बर चार पर बल्लेबाजी करने आयेंगे... और संयोग यह हुआ कि मैल्कम मार्शल ने पहली दो गेंदों पर ही अंशुमन गायकवाड़ और दिलीप वेंगसरकर को आऊट कर दिया था, गावस्कर जब बल्लेबाजी करने उतरे तो स्कोर था 0/2, रिचर्ड्स ने मजाक में कहा, “सनी तुम चाहे जो कर लो, तुम जब भी बल्लेबाजी के लिये उतरोगे, स्कोर 0 ही रहेगा”.....

स्टीव वॉ Vs पार्थिव पटेल
अपने आखिरी टेस्ट मैच में स्टीव बढिया बल्लेबाजी कर रहे थे, 19 वर्षीय पार्थिव विकेटकीपर थे, स्टीव वॉ स्वीप पर स्वीप किये जा रहे थे, पटेल से नहीं रहा गया, वह बोला- “कम ऑन क्रिकेट में आखिरी बार अपना स्वीप चला कर दिखा दो”... 38 वर्षीय स्टीव ने जवाब दिया, “कम से कम बड़ों के प्रति कुछ तो इज्जत दिखाओ, जब तुम लंगोट में थे तब मैं टेस्ट खेलना शुरु कर चुका था”.... उसके बाद पार्थिव पूरे मैच कुछ नहीं बोले....

1960 में जब इंग्लैंड के क्रिकेट मैदानों में पेवेलियन से आने के लिये एक लकड़ी का छोटा सा दरवाजा लगा होता था, एक नया बल्लेबाज क्रीज पर आने के लिये पेवेलियन से निकला और मैदान में आकर वह पीछे का लकडी का दरवाजा बन्द करने लगा, तब फ़्रेड ट्रूमैन तत्काल बोले, “रहने दो, खुला ही रहने दो बच्चे, तुम्हें जल्दी ही तो वापस आना है”....

1980 में इयान बॉथम का वह बयान बहुत चर्चित हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था, “पाकिस्तान नाम की जगह इतनी घटिया है कि हरेक व्यक्ति को अपनी सास को वहाँ भेजना चाहिये”, जाहिर है पाकिस्तानी इस बयान का बदला लेने के को बेताब थे। जब 1992 के विश्वकप में पाकिस्तान ने इंग्लैंड को हराया, तब आमिर सोहेल ने इयान बोथम से कहा, “क्यों नहीं तुम अपनी सास को पाकिस्तान भेजते, कम से कम वह तुम लोगों से तो अच्छा ही खेलेगी”.....

एक बार इंजमाम ने ब्रेट ली को खिजाते हुए कहा था, “यार स्पिन गेंदें फ़ेंकना बन्द करो”, और ऐसे ही भारत के पिछले पाक दौरे पर शाहिद अफ़रीदी ने पठान के बल्लेबाजी के लिये उतरने पर सीटी बजाते हुए कहा था, “ओय होय, मेरा शहजादा आ गया...”

तो पाठक बन्धुओं, स्लेजिंग तो क्रिकेट में सनातन चली आ रही है, और यह बढ़ती ही जायेगी, जब तक कि एकाध बार फ़ुटबॉल जैसी मारामारी (जिनेदिन झिडान जैसी) न हो जाये। एक बात तो तय है कि गोरे खिलाड़ी नस्लभेदी मानसिकता से ग्रस्त हैं, वे सोचते हैं कि सिर्फ़ हम ही स्लेजिंग कर सकते हैं, क्योंकि हम “श्रेष्ठ” हैं, साथ ही एक और निष्कर्ष निकलता है कि जिस प्रकार एशियाई खिलाड़ी अपनी माँ-बहन की गाली के प्रति संवेदनशील होते हैं, अंग्रेज खिलाड़ी अपनी पत्नी की गाली के प्रति होते हैं.... अस्तु। स्लेजिंग के और भी बहुत से उदाहरण दिये जा सकते हैं, लेकिन ज्यादा लम्बा लेख हो जायेगा तो ठीक नहीं होगा.... और हाँ... भगवान के लिये क्रिकेट को “भद्रजनों का खेल” (Gentlemen Game) कहना बन्द कीजिये। आमीन....

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Astrology Supporters Logic Question

ज्योतिष सम्बन्धी मेरे पिछले लेखों “यह” और “यह” पर जैसी अपेक्षित थी वैसी ही प्रतिक्रिया आई, अर्थात अधिकतर विरोध में या फ़िर तटस्थ रूप में। ज्योतिषियों और ज्योतिष समर्थकों से ऐसी ही कुछ उम्मीद की थी मैने, लेकिन मुझे सबसे अधिक आश्चर्य इस बात का हुआ कि मेरे तर्कों के समर्थन में या उन्हें आगे बढ़ाते हुए कोई टिप्पणी तो दूर एक ई-मेल तक नहीं मिला। मैंने सोचा था कि बहस-मुबाहिसा होगा, कुछ नये विचार जानने को मिलेंगे, लेकिन सब व्यर्थ... इससे मेरी इस धारणा को और बल मिला कि या तो बुद्धिजीवी वर्ग और जनता इस विषय पर कुछ अप्रिय बोलने से बचते है, या फ़िर मन में गहरे बसे संस्कार उसे इस प्राचीन अध्ययन का विरोध करने या उसमें नुक्स निकालने से रोकते हैं। “प्राचीन अध्ययन”, मैने इसलिये कहा क्योंकि यह है ही प्राचीन... लेकिन हरेक प्राचीन विद्या या खोज हमेशा ही सच नहीं मानी जा सकती (यह मैंने नहीं महात्मा बुद्ध ने कहा है).... हमेशा यह नहीं कहा जा सकता कि वेदों, पुराणों और ग्रंथों मे यह लिखा है, इसलिये सतत्‌ यह खरा माना जायेगा, हमें इस पर विश्वास है.... जबकि असल में इसी का नाम अंधविश्वास है।

मजे की बात तो यह है कि मेरे विरोध में Anonymous (बेनामी) टिप्पणियाँ और ई-मेल भी आये, मानो पहचान उजागर हो जाने पर मैं उनका गला पकड़ लूँगा। तो तमाम ज्योतिष समर्थकों से मैं सिर्फ़ यही कहना चाहता हूँ कि भाई लोगों मैं तो पहले ही कह चुका हूँ कि मैं अज्ञानी हूँ, मुझे ज्ञान दो, मुझे समझाओ कि राहु-केतु कहाँ स्थित हैं? मेरे दिमाग में बैठाओ कि दूरस्थ ग्रहों का असर कैसे और किस सीमा तक होता है? कोई reference देकर मुझे बतायें कि फ़लाँ-फ़लाँ पुस्तक में इनके जवाब हैं, तो मैं उसे पढ़ सकूँ, लेकिन सिर्फ़ “तू अज्ञानी है, तू मूर्ख है, तू विधर्मी है, तुझे इस महान विद्या के बारे में कुछ पता नहीं है” आदि कहने से तो काम नहीं चलेगा ना... आईये देखते हैं एक ऐसी ही टिप्पणी को... सज्जन “बेनामी” हैं, और लिखते हैं –

aatmamugdhata ki parakashtha he aapke lekh.mere kuch chote chote aur tuccha prashno ka uttar dijiye taki mujhe aapka mansik star samajh aaye jyotish k vishay me ....
1.aap khud kitna jante he jyotish k bare me?
2.kitne jyotish k granth aapne khud padh liye he ?
3.sanskrit ka kitna gyan he aapko ki aap yeh granth padh paye?
4.aapne jo bhi likha he usme aapke khud k anubhav,ya shodh kiye huye kitne tatthya he ?
....pahle khud ko tatoliye janab aur fir aage ki baatein kijiye .....pahle us star par to aaiye ki aapko kuch samjhaya jaye....fir aapke tathakathit adhunik vaigyanik prashno k uttar aapko jaroor diye jayenge....


इस टिप्पणी से जाहिर है कि ये कोई महान(?) ज्योतिषी ही होंगे, मुझे “आत्ममुग्ध” तो बताते ही हैं, साथ में मुझे “नालायक” भी घोषित करते हैं, मैं राहु-केतु के बारे में पूछता हूँ तो “पहले कुछ बनिये, फ़िर बात करेंगे” वाली पर आ जाते हैं, भाई साहब चलो मान लिया कि मैं तो कीड़ा-मकोड़ा हूँ, एकदम तुच्छ प्राणी, जिसे कोई ज्ञान नहीं, लेकिन ज्ञान लेने ही तो ब्लॉगिंग की दुनिया में आया हूँ (यह सोचकर कि यहाँ एक से बढ़कर एक ज्ञानी-ध्यानी हैं और मुझे कुछ नया मिलेगा), फ़िर आप मुझे संक्षेप में ही सारे प्रश्नों का उत्तर क्यों नहीं देते? क्या ज्योतिष सम्बन्धी सारी पुस्तकें और ग्रन्थ संस्कृत में ही हैं? मेरे तर्क नासमझ ही सही, लेकिन क्या उनके लिये भी ग्रंथ पढ़ना पड़ता है, सामान्य बुद्धि से काम नहीं चलेगा? मेरा मानसिक स्तर तो बहुत घटिया है, लेकिन आप अपना भी तो मानसिक स्तर बताइय़े ना, ताकि यह पता चले कि जो अपना नाम तक जाहिर करने से डर रहा है, कितना विद्वान है?

रही बात मेरे व्यक्तिगत अनुभव की, तो मैंने ज्योतिष के प्रयोग(?) देखने के लिये अपनी कुंडली अब तक 17 ज्योतिषियों को दिखाई है और हर बार मुझे बहुत मजा आया (जॉनी वॉकर की कॉमेडी से भी ज्यादा), कोई बताता है कि तुम्हारा भाग्य ३० वर्ष की उम्र के बाद पलटेगा और बहुत पैसा आयेगा (जबकि ४३ वर्ष की उम्र में अभी भी मेरे पास एक पुरानी बाइक ही है), एक ने बताया था कि तुम शिक्षा में बहुत नाम कमाओगे (जबकि मैं बी.एससी. भी पूरी नहीं कर पाया), एक ने बताया था कि तुम सरकारी नौकरी में जाओगे (मैं बिजनेस करता हूँ), अब इनका मैं क्या करूँ, या तो वे सब के सब नालायक हैं, या फ़िर मेरा तथाकथित मंगल-राहु-शनि आदि इतने भारी-भरकम हैं कि वे इन ज्योतिषियों पर भी भारी पड़ते हैं... इसे विज्ञान का नाम कैसे दिया जा सकता है? विज्ञान में एक जैसे 17 प्रयोगों के परिणाम अलग-अलग नहीं आयेंगे।

अब आते हैं कुछ तथ्यात्मक टिप्पणी पर, “गत्यात्मक ज्योतिष” नामक ज्योतिष की एक नई शाखा के बारे में सुश्री संगीता जी काफ़ी लिखती हैं, और अच्छा लिखती हैं, उन्होंने कहा-
“मैं बस इतना ही कह सकती हूं कि योगा और आयुर्वेदा की तरह ही जब तक ज्योतिष ज्योतिशा के रुप में हमारे देश में वापस नहीं लौटेगा , हम इसके महत्व को स्वीकार कर ही नहीं पाएंगे।“

इसमें उन्होंने योग और आयुर्वेद को ज्योतिष से जोड़ दिया, जबकि योग और आयुर्वेद Result Oriented हैं, दोनों ने यह सिद्ध किया है कि फ़लाँ आसन लगाने से फ़लाँ बीमारी में फ़ायदा होता है या आयुर्वेद के अनुसार कोई दवा-काढ़ा पीने से कोई रोग ठीक होता है, ऐसा कुछ ज्योतिष ने तो सिद्ध नहीं किया है, कि इस कुंडली में यह योग बन रहा है तो यह होकर ही रहेगा। बहुत सारे “किन्तु-परन्तु, कर्म, भाग्य आदि के पुछल्ले जोड़कर” एक संभावना व्यक्त की जाती है, इसलिये इसे योग और आयुर्वेद से जोड़ना उचित नहीं है (ज्योतिष में तो जन्म समय पर ही विवाद है), संगीता जी ने अपने ब्लॉग पर Date of Birth के अनुसार विश्लेषण करके चुनौती दी कि इस दौरान जन्मे लोगों का जीवन अशांत होगा... आदि-आदि,

तो मैं आदरणीय संगीता जी से सिर्फ़ इतना ही कहना चाहता हूँ कि डॉ.अब्राहम कोवूर द्वारा दी गई चुनौतियों में से आज तक एक पर भी काम क्यों नहीं हुआ? ज्योतिष को विज्ञान सिद्ध करने का वह एक सुनहरा अवसर और अध्ययन है। सारे ज्योतिष विरोधियों के मुँह बन्द हो जायेंगे। और रही बात “योगा” और “आयुर्वेदा” की, तो “ज्योतिषा” पर भी पश्चिम में काफ़ी शोध हुए हैं, चर्चायें हुईं, प्रकाशन हुए हैं और उनमें से अधिकतर ने फ़लज्योतिष, मंगल प्रभाव या भविष्यकथन को तथ्यों से दूर ही पाया है (इनके reference मैं आपको आपके blog पर ही दूँगा)। अगली टिप्पणी में आप पायेंगे ज्योतिषियों का सनातन बहाना, जरा गौर फ़रमायें (ये भी मुझे बेनामी ही प्राप्त हुई है)-

“ab koi apni ladki ki patrika thik se kyon nahi padh paya...iske peeche do karan hain - jyotish koi brahmawakya nahi hai...jyotishi bhi manushya hai, ganana mein galtiyan ho sakti hain...dusara, jyotishi jo bhi bhavishya baanchata hai woh khara isliye bhi nahi utarta yeh manushya ke karmon pe nirbhar karta hai....hamara ek bhavishya hai...lekin hum karam bhi karte hain....aur unhi karmon ki wajah se hamara bhavishya badal sakta hai.”

ये साहब फ़रमाते हैं कि ज्योतिष कोई ब्रह्मवाक्य नहीं है, गणना में गलती हो सकती है आदि-आदि... तो साहब यही तो मैं भी कह रहा हूँ कि आप मानिये ना कि ज्योतिष कोई स्थापित विज्ञान या सत्य नहीं है, यह सिर्फ़ सम्भावना व्यक्त करता है भाग्य, कर्म, जन्म आदि का पुछल्ला लगाकर, तो भाई यदि सभी कुछ भाग्य के अनुसार ही होना है तो ज्योतिषी किस मर्ज की दवा हैं?

एक सज्जन ने तर्क दिया कि जब एलोपैथी के भी काफ़ी प्रयोग असफ़ल हो जाते हैं तो वे फ़िर नई दवा ईजाद करते हैं, एलोपैथी भी सम्पूर्ण ज्ञान नहीं है आदि-आदि... मैं भी तो यही कह रहा हूँ कि कोई भी ज्ञान सम्पूर्ण नहीं होता, उसमें सतत्‌ प्रयोग चलते रहना चाहिये, अनुसन्धान होते रहना चाहिये। डॉक्टर कम से कम अपनी असफ़लता को स्वीकार तो करते हैं कि “हाँ, हमसे “डायग्नोस” करने में गलती हुई” या फ़िर “अब इसके आगे हमारे मेडिकल साइंस में कुछ नहीं है, मरीज को घर ले जाओ और दुआ करो”। डॉक्टर और चिकित्सा तो उपभोक्ता कानून के अन्तर्गत भी आते हैं, उन पर जिम्मेदारी आयद होती है, तय की जाती है, सजा होती है, अदालते हैं, मेडिकल फ़ोरम है..... ज्योतिष में यह सब नहीं है, कोई जिम्मेदारी नहीं, गलती हो जाये (जो कि कई बार हो ही जाती है) तो कोई सजा नहीं, कोई उपभोक्ता अदालत में घसीटने वाला नहीं है (सरकार से मैं माँग करता हूँ कि “यजमान” को भी ज्योतिषी की सेवाओं का उपभोक्ता माना जाना चाहिये), गरज यह कि एकदम बगैर किसी जिम्मेदारी का धन्धा है ज्योतिष, भविष्यवाणी सही निकली तो हमारी जय-जय, और गलत निकली तो तुम्हारे कर्म-भाग्य फ़ूटे हुए... यानी मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू... ऐसे काम नहीं चलता है भईया।

अन्त में मेरा सिर्फ़ यही कहना है कि सिर्फ़ विरोध करने के लिये विरोध मत करो, कुछ तर्क रखो, कुछ तथ्य रखो, कुछ “रेफ़रेंस” दो, किसी पुस्तक का अध्याय बताओ..... मैं तो मूढ़मति हूँ, इसलिये मेरे दिमाग में तो ऐसे अटपटे सवाल ही आते हैं, जवाब नहीं मालूम हों तो टिप्पणी मत करो, और मालूम हों तो विस्तार से लिखो, नहीं लिख सकते तो सिर्फ़ बताओ कि यहाँ-यहाँ-यहाँ तुम्हारे सवालों के जवाब हैं, खगोल शास्त्र और ज्योतिष का घालमेल मत करो, सिर्फ़ गरियाने या प्रतिकूल टिप्पणी से मैं डिगने, डरने वाला नहीं हूँ, ऐसे असुविधाजनक सवाल तो मैं पूछता रहूँगा...खुल्लमखुल्ला बगैर नाम छुपाये... और जल्दी ही आने वाले समय में कई लोग मेरे सवाल “धंधेबाजों” के सामने दोहराते हुए मिल जायेंगे...

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Superstitions, Education and Urban Community

मध्यप्रदेश के मालवा निमाड़ अंचल में इन दिनों “हरे काँच की चूड़ियाँ पहनो” नामक अंधविश्वास चल रहा है। एक अफ़वाह के अनुसार यदि महिलायें हाथों में हरे काँच की चूड़ियाँ पहनेंगी तो उनके सुहाग, बच्चे और घर-द्वार सुरक्षित रहेगा। यदि किसी महिला ने यह नहीं पहनीं तो भारी अनिष्ट हो जायेगा। मजे की बात तो यह है कि गाँवों की अनपढ़ महिलाओं के साथ-साथ पढ़ी-लिखी, शहरी और कम्प्यूटर का उपयोग करने वाली मूर्ख महिलायें भी इस अंधविश्वास के चक्कर में पड़ रही हैं। “नारी शक्ति” और अबला-सबला आंदोलन चलाने वाली, सिन्दूर और मंगलसूत्र को गुलामी की निशानी मानने वाली कई महिलायें भी इसकी चपेट में हैं। चूड़ी निर्माता और विक्रेता जमकर माल कूट रहे हैं।

इसी प्रकार कुछ माह पहले इसी अंचल में “जलेबी” नामक अंधविश्वास चला था, जिसके अनुसार ढाई सौ ग्राम जलेबी को पूजा करके नर्मदा में विसर्जित करना था, जिससे कि महिलाओं/लड़कियों के भाईयों के जीवन पर आया संकट टल जाये। हालत यह हो गई थी कि नर्मदा नदी में जलेबी की चाशनी और मैदे की लुगदी के कारण घोर प्रदूषण के चलते प्रशासन को अन्त में यह चेतावनी देना पड़ी कि इस प्रकार की “जलेबी विसर्जन” ना किया जाये अन्यथा कड़ी कार्रवाई की जायेगी। भाई लोगों ने जमी-जमाई दुकानदारी छोड़कर नर्मदा किनारे जलेबी की दुकानें खोल ली थीं, अफ़वाह चलाई, महिलाओं को बेवकूफ़ बनाया, और अच्छा कमाया। नर्मदा नदी प्रदूषित होती है तो होती रहे, उनकी बला से, यूँ भी साल में दो बार गणेश और दुर्गा पूजा की लाखों मूर्तियाँ प्रवाहित करके पानी गन्दा करते ही हैं।

इसी प्रकार उज्जैन या आसपास के नगरों में धर्मप्राण(?) जनता को मूक प्राणियों, गाय-ढोर को चारा खिलाने का शौक होता है, उनका मानना है कि इससे पुण्य(?) मिलता है। अब यहाँ गणित यह खेला जाता है कि आवारा पशु, गाय-बैल आदि सड़क पर छोड़ दिये जाते हैं, फ़िर वही व्यक्ति खुद एक ठेला लेकर घास बेचने बैठ जाता है, घास बेच कर भी कमा लेता है, और अपने आवारा पशु को फ़ोकट में चारा भी खिलवा लेता है, सड़क पर गाय-बैल गोबर करते रहें, लोग टकरा-टकरा कर गिरते रहें, न प्रशासन को कोई मतलब होता है, ना ही धर्मालुओं(?) को, आखिर “धर्म” का मामला जो ठहरा। एक बात तो सिद्ध है, कि शिक्षा प्रसार का अंधविश्वास से कोई लेना-देना नहीं होता। हमारे एक पड़ोसी जो Ph.D. वाले डॉक्टर हैं, मुहूर्त देखकर घर से निकलते हैं, इसी प्रकार एक और MD डॉक्टर हैं जो पंचांग देखकर महत्वपूर्ण ऑपरेशन करते हैं, अब इसे क्या कहा जाये?

इस लगातार जारी मूर्खता का एक और प्रमाण हैं इंटरनेट पर सतत जारी ई-मेल अंधविश्वास अभियान, जिसमें आपसे कहा जाता है कि यह मेल जादू और चमत्कार भरी है, इसे आप बीस लोगों को Forward करेंगे तो आपको खजाना और सुख-समृद्धि प्राप्त होगी, पढ़े-लिखे लोग बगैर सोचे-समझे इसे Forward कर भी देते हैं। मेरे पास जब ऐसी कोई मेल आती है तो सबसे पहले उसे “कचरा पेटी” (Delete) का रास्ता दिखाता हूँ (वह भी Shift दबाकर)| लेकिन सिवाय माथा पीटने के या फ़िर हँसने के और क्या चारा रह जाता है? जब शिक्षित होकर भी लोगबाग इस तरह की हरकतें करते हैं तो गुस्सा भी आता है, शर्म भी आती है, और कभी-कभी लगता है कि क्यों हम खामख्वाह गाँव वालों और अनपढ़ों के पीछे पड़े रहते हैं, पहले शहरों में तो लोग छींकने और बिल्ली के रास्ता काटने जैसे घटियातम अंधविश्वासों से बाहर निकलें। लेकिन इसका कोई इलाज नहीं है।

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