Rahul Gandhi Orissa Visit Security Threat
“राजकुमार” आजकल भारत खोज अभियान पर निकले हुए हैं, उन्हें असली भारत खोजना है (शायद उन्होंने अपने परनाना की पुस्तक नहीं पढ़ी होगी)। चुनावी वर्ष में इस भारत को खोजने की शुरुआत उन्होंने उड़ीसा के कालाहांडी से की है। अब दिल्ली में बैठकर उन्हें कालाहांडी के बारे में कैसे पता चलता, न तो उनके पास संचार की कोई व्यवस्था है, न ही कांग्रेस के कार्यकर्ता, न ही पुस्तकें, न ही पत्रकार… सो राहुल बाबा ने उड़ीसा सरकार के लाखों रुपये खर्च करवाने की ठान ही ली। जैसा “स्टंट” उन्होंने बुंदेलखंड में एक दलित के यहाँ खाना खाकर और रात बिताकर किया था, कुछ-कुछ वैसा ही “स्टंट” उन्होंने उड़ीसा की यात्रा के दौरान भी करने की कोशिश की, ये और बात है कि उनके इस स्टंट की देश को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती थी। राहुल गाँधी की इस कलरफ़ुल यात्रा का अन्त एकदम रंगहीन रहा, न तो उन्होंने इन जिलों के बारे में कोई ठोस योजना पेश की, न ही उनके श्रीमुख से कोई खास उदगार फ़ूटे, हाँ लेकिन अपनी खास हरकतों से उन्होंने सुरक्षा अधिकारियों और केन्द्रीय सुरक्षा एजेंसियों की नींद जरूर उड़ा दी थी (और ऐसा उन्होंने पहली बार नहीं किया है)।

उड़ीसा की यात्रा के दौरान राहुल ने स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा अधिकारियों को खासा परेशान रखा। राहुल गाँधी एक बार देर रात को अज्ञात स्थान पर भी गये और उन्होंने स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना तक नहीं दी। अपनी बहरामपुर यात्रा के दौरान राहुल कंकिया नाम के गाँव गये, जो कि गोपालपुर कस्बे से 30 किमी दूर है। उनके साथ एक मिशनरी एनजीओ अधिकारी और सिर्फ़ दो सुरक्षा गार्ड थे। वह उस एनजीओ के दफ़्तर में लगभग रात 10 बजे गये और कुछ घंटे उन्होंने वहाँ बिताये। उसके बाद वे पास ही के एक रहवासी स्कूल में भी गये और वहाँ उन्होंने कुछ चॉकलेट बाँटे। वह एनजीओ एक प्रसिद्ध ईसाई मिशनरी का हिस्सा है और वह सक्रिय रूप से उड़ीसा के दक्षिणी जिलों में खुलकर धर्मान्तरण में लगा हुआ है। राहुल गाँधी ने उस एनजीओ को जितना वक्त दिया उतना वक्त तो उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को भी नहीं दिया। राहुल गाँधी अलसुबह अपने कैम्प में लौटे, जब उनके कार्यकर्ता उन्हें खोजने निकल पड़े थे।

गायब होने का कुछ ऐसा ही स्टंट उन्होंने कोरापुट जिले के दौरे में भी किया, जहाँ उनका स्वागत एक धार्मिक संस्था (जाहिर है कि ईसाई) ने बड़े जोरशोर से किया। यहाँ भी वे सिर्फ़ चार सुरक्षाकर्मियों को साथ लेकर उस संस्था में गये, और स्थानीय प्रशासन को खबर तक नहीं की। राहुल गाँधी ने स्थानीय पुलिस का पायलट वाहन लेने से भी इंकार कर दिया और यहाँ तक कि उन्होंने कोरापुट के एसपी को भी अपने पीछे आने से मना कर दिया, जबकि वे जानते थे कि यह एक खतरनाक नक्सली इलाका है। बेहरामपुर की घटना के बारे में गंजम जिले के एसपी ने स्वीकार किया कि राहुल अपने तय कार्यक्रम से हटकर किसी अज्ञात स्थान पर गये थे, लेकिन इसके बारे में विस्तार से कुछ नहीं बताया।

इस घटना का उल्लेख विधानसभा में बीजद के विधायक कल्पतरु दास ने 11 मार्च को विशेष नोटिस के जरिये उठाया, उन्होंने आरोप लगाया राहुल गाँधी की यह आधी रात की यात्रा पहले से तय थी, एक रिटायर्ड आईपीएस पंकज कुमार गुप्ता, जो कि राजीव गाँधी फ़ाउंडेशन का काम भी देखते हैं, वह राहुल को कहीं ले गये थे और जानबूझकर स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना नहीं दी गई। उनका यह भी कहना है कि राहुल गाँधी अपनी माँ के कहने पर ही उस खास मिशनरी में गुप्त रूप से गये और धर्मांतरण के काम की जानकारी ली। चलो मान भी लिया जाये कि ये बाद वाला आरोप सिर्फ़ राजनैतिक आरोप है, लेकिन यह सच्चाई तो फ़िर भी अपनी जगह है कि घने जंगलों वाले इस इलाके में नक्सली बेहद सक्रिय हैं। नक्सलियों का आंतरिक नेटवर्क भी काफ़ी मजबूत है, यदि राहुल गाँधी की इस कथित गुप्त यात्रा की खबर उन्हें लग जाती और वे कोई अनर्थ कर बैठते, या तो बारूदी सुरंग बिछाते या अपहरण कर लेते, तो क्या होता? क्या तब राज्य की बीजद-भाजपा सरकार के माथे पर ठीकरा नहीं फ़ोड़ा जाता? कि उन्होंने राजकुमार की सुरक्षा ठीक से नहीं की। क्या 39 वर्ष की आयु में भी वे इतने अनजान हैं कि यदि उनकी हत्या हो जाती है तो इसके देश की जनता पर क्या तात्कालिक परिणाम हो सकते हैं? वह इतनी गैरजिम्मेदाराना हरकत कैसे कर सकते हैं, जिससे खुद उनको तो खतरा हो ही सकता है, लेकिन अन्य कई लोगों की नौकरी भी खतरे में पड़ सकती है।

राहुल गाँधी का कहना है कि वे इन आदिवासी क्षेत्रों की जमीनी हकीकत जानने के लिये उत्सुक हैं और वे इन क्षेत्रों का दौरा करके कुछ वनवासियों के जीवन को नजदीक से देखकर “प्रैक्टिकल नॉलेज” ग्रहण करना चाहते हैं। कितनी हास्यास्पद बात है ना !! कोरापुट-बोलांगीर-कालाहांडी के बारे में मैं राहुल गाँधी से ज्यादा जानता हूँ, जबकि मैं कभी उड़ीसा नहीं गया। राहुल बाबा शायद नही जानते कि आजादी के बाद उड़ीसा में कांग्रेस ने चालीस साल तक राज किया ? वे नहीं जानते कि ये तीन जिले राज्य के कुल भूभाग का 20 प्रतिशत हैं ? वे यह भी नहीं जानते कि घने जंगलों, प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर, बेशकीमती खनिजों से भरपूर इन तीन जिलों में राज्य के कुल 24 प्रतिशत गरीब रहते हैं? वे नहीं जानते कि विश्व मीडिया में भुखमरी का उदाहरण देने की शुरुआत कालाहांडी से ही होती है? आखिर राजकुमार क्या जानना चाहते हैं? चार साल के अपने कार्यकाल में संसद में सिर्फ़ दो बार मुँह खोलने वाले राहुल बाबा चमचों से बचने के लिये क्या करने वाले हैं? सिर्फ़ संसद में मम्मी के पीछे बैठने से कुछ नहीं होगा। वे अपना दृष्टिकोण और विचार भी तो मीडिया को स्पष्ट करें। जिस तरह से उनकी मम्मी मीडिया को एक “पैरपोंछ” समझती हैं, कहीं वे भी तो उसी मानसिकता से ग्रस्त नहीं हैं?

यदि धर्मान्तरण के आरोपों को एक तरफ़ रख भी दिया जाये, तो भी राहुल गाँधी का इस प्रकार सुरक्षा व्यवस्था को धोखा देकर गायब हो जाना, मनचाहे “स्टंट” दिखाना, गुपचुप मुलाकातें करना, क्या दर्शाता है? हीरोगिरी, अपरिपक्वता, गैरजिम्मेदाराना हरकत, लापरवाही या सामंती मानसिकता? आप बतायें…


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सन्दर्भ : देबाशीष त्रिपाठी, ऑर्गेनाइजर (भुवनेश्वर)
Mid Day Meal Scheme ISKCON Ujjain
केन्द्र और राज्य सरकारों की मिलीजुली महती योजना है मध्यान्ह भोजन योजना। जैसा कि सभी जानते हैं कि इस योजना के तहत सरकारी प्राथमिक शालाओं में बच्चों को मध्यान्ह भोजन दिया जाता है, ताकि गरीब बच्चे पढ़ाई की ओर आकर्षित हों और उनके मजदूर / मेहनतकश/ ठेले-रेहड़ी वाले/ अन्य छोटे धंधों आदि में लगे माँ-बाप उनके दोपहर के भोजन की चिंता से मुक्त हो सकें। इस योजना के गुणदोषों पर अलग से चर्चा की जा सकती है क्योंकि इस योजना में कई तरह का भ्रष्टाचार और अनियमिततायें हैं, जैसी कि भारत की हर योजना में हैं। फ़िलहाल बात दूसरी है…

जाहिर है कि उज्जैन में भी यह योजना चल रही है। यहाँ इस सम्पूर्ण जिले का मध्यान्ह भोजन का ठेका “इस्कॉन” को दिया गया है। “इस्कॉन” यानी अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ को जिले के सभी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन (रोटी-सब्जी-दाल) बनाने और पहुँचाने का काम दिया गया है। इसके अनुसार इस्कॉन सुबह अपनी गाड़ियों से शासकीय स्कूलों में खाना पहुँचाता है, जिसे बच्चे खाते हैं। चूँकि काम काफ़ी बड़ा है इसलिये इस हेतु जर्मनी से उन्होंने रोटी बनाने की विशेष मशीन बुलवाई है, जो एक घंटे में 10,000 रोटियाँ बना सकती है। (फ़िलहाल इस मशीन से 170 स्कूलों हेतु 28,000 बच्चों का भोजन बनाया जा रहा है) (देखें चित्र)

जबसे इस मध्यान्ह भोजन योजना को इस्कॉन को सौंपा गया है, तभी से स्थानीय नेताओं, सरपंचों और स्कूलों के पालक-शिक्षक संघ के कई चमचेनुमा नेताओं की भौंहें तनी हुई हैं, उन्हें यह बिलकुल पसन्द नहीं आया है कि इस काम में उन्हें “कुछ भी नहीं” मिल रहा। इस काम को खुले ठेके के जरिये दिया गया था जिसमें जाहिर है कि “इस्कॉन” का भाव सबसे कम था (दो रुपये साठ पैसे प्रति बच्चा)। हालांकि इस्कॉन वाले इतने सक्षम हैं और उनके पास इतना विदेशी चन्दा आता है कि ये काम वे मुफ़्त में भी कर सकते थे (इस्कॉन की चालबाजियों और अनियमितताओं पर एक लेख बाद में दूँगा)। अब यदि मान लिया जाये कि दो रुपये साठ पैसे प्रति बच्चे के भाव पर इस्कॉन जिले भर के शासकीय स्कूलों में रोटी-सब्जी “नो प्रॉफ़िट-नो लॉस” के स्तर पर भी देता है (हालांकि इस महंगाई के जमाने में यह बात मानने लायक नहीं है), तो विचार कीजिये कि बाकी के जिलों और तहसीलों में चलने वाली इस मध्यान्ह भोजन योजना में ठेकेदार (जो कि प्रति बच्चा चार-पाँच रुपये के भाव से ठेका लेता है) कितना कमाता होगा? कमाता तो होगा ही, तभी वह यह काम करने में “इंटरेस्टेड” है, और उसे यह कमाई तब करनी है, जबकि इस ठेके को लेने के लिये उसे जिला पंचायत, सरपंच, स्कूलों के प्रधानाध्यापक, पालक-शिक्षक संघ के अध्यक्ष और यदि बड़े स्तर का ठेका हुआ तो जिला शिक्षा अधिकारी तक को पैसा खिलाना पड़ता है। जाहिर सी बात है कि इस्कॉन को यह ठेका मिलने से कईयों के “पेट पर लात” पड़ गई है (हालांकि सबसे निरीह प्राणी यानी पढ़ाने वाले शिक्षक इससे बहुत खुश हैं, क्योंकि उनकी मगजमारी खत्म हो गई है), और इसीलिये इस योजना में शुरु से ही “टाँग अड़ाने” वाले कई तत्व पनपे हैं। मामले को ठीक से समझने के लिये लेख का यह विस्तार जरूरी था।

“टाँग अड़ाना”, “टाँग खींचना” आदि भारत के राष्ट्रीय “गुण” हैं। उज्जैन की इस मध्यान्ह भोजन योजना में सबसे पहले आरोप लगाया गया कि इस्कॉन इस योजना को चलाने में सक्षम नहीं है, फ़िर जब इस्कॉन ने इस काम के लिये एक स्थान तय किया और वहाँ शेड लगाकर काम शुरु किया तो जमीन के स्वामित्व और शासन द्वारा सही/गलत भूमि दिये जाने को लेकर बवाल मचा दिया गया। जैसे-तैसे इससे निपट कर इस्कॉन ने काम शुरु किया, 10000 रोटियाँ प्रति घंटे बनाने की मशीन मंगवाई तो “भाई लोगों” ने रोटी की गुणवत्ता पर तमाम सवाल उठाये। बयानबाजियाँ हुई, अखबार रंगे गये, कहा गया कि रोटियाँ मोटी हैं, अधपकी हैं, बच्चे इसे खा नहीं सकते, बीमार पड़ जायेंगे आदि-आदि। अन्ततः कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी को खुद वहाँ जाकर रोटियों की गुणवत्ता की जाँच करनी पड़ी, न कुछ गड़बड़ी निकलना थी, न ही निकली (इस्कॉन वालों की सेटिंग भी काफ़ी तगड़ी है, और काफ़ी ऊपर तक है, ये छुटभैये नेता कहाँ लगते उसके आगे)। लेकिन ताजा आरोप (वैसे तो आरोप काफ़ी पुराना है) ज्यादा गंभीर रूप लिये हुए है, क्योंकि इसमें “धर्म” का घालमेल भी कर दिया गया है।

असल में शुरु से ही शासकीय मदद प्राप्त मदरसों ने मध्यान्ह भोजन योजना से भोजन लेने से मना कर दिया था। “उनके दिमाग में किसी ने यह भर दिया था” कि इस्कॉन में बनने वाले रोटी-सब्जी में गंगाजल और गोमूत्र मिलाया जाता है और फ़िर उस भोजन को भगवान को भोग लगाकर सभी दूर भिजवाया जाता है। काजियों और मुल्लाओं द्वारा विरोध करने के लिये “गोमूत्र” और “भगवान को भोग” नाम के दो शब्द ही काफ़ी थे, उन्होंने “धर्म भ्रष्ट होने” का आरोप लगाते हुए मध्यान्ह भोजन का बहिष्कार कर रखा था। इससे मदरसों में पढ़ने वाले गरीब बच्चे उस स्वादिष्ट भोजन से महरूम हो गये थे। कहा गया कि मन्दिर में पका हुआ और गंगाजल मिलाया हुआ भोजन अपवित्र होता है, इसलिये मदरसों में मुसलमानों को यह भोजन नहीं दिया जा सकता (जानता हूँ कि कई पाठक मन ही मन गालियाँ निकाल रहे होंगे)। कलेक्टर और इस्कॉन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने मदरसों में जाकर स्थिति स्पष्ट करने की असफ़ल कोशिश भी की, लेकिन वे नहीं माने। इस तथाकथित अपवित्र भोजन की शिकायत सीधे मानव संसाधन मंत्रालय को कर दी गई। तुरत-फ़ुरत अर्जुनसिंह साहब ने एक विशेष अधिकारी “श्री हलीम खान” को उज्जैन भेजा ताकि वे इस्कॉन में बनते हुए भोजन को खुद बनते हुए देखें, उसे चखें और शहर काजी तथा मदरसों के संचालकों को “शुद्ध उर्दू में” समझायें कि यह भोजन “ऐसा-वैसा” नहीं है, न ही इसमें गंगाजल मिला हुआ है, न ही गोमूत्र, रही बात भगवान को भोग लगाने की तो उससे धर्म भ्रष्ट नहीं होता और सिर्फ़ इस कारण से बेचारे गरीब मुसलमान बच्चों को इससे दूर न रखा जाये। काजी साहब ने कहा है कि वे एक विशेषाधिकार समिति के सामने यह मामला रखेंगे (जबकि भोजन निरीक्षण के दौरान वे खुद भी मौजूद थे) और फ़िर सोचकर बतायेंगे कि यह भोजन मदरसे में लिया जाये कि नहीं। वैसे इस योजना की सफ़लता और भोजन के स्वाद को देखते हुए पास के देवास जिले ने भी इस्कॉन से आग्रह किया है कि अगले वर्ष से उस जिले को भी इसमें शामिल किया जाये।

वैसे तो सारा मामला खुद ही अपनी दास्तान बयाँ करता है, इस पर मुझे अलग से कोई कड़ी टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन फ़िर भी यदि मध्यान्ह भोजन योजना में हो रहे भ्रष्टाचार और इसके विरोध हेतु धर्म का सहारा लेने पर यदि आपको कुछ कहना हो तो कहें…


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American Sub Prime Crisis Indian Economy

जी, मैं कोई मजाक नहीं कर रहा। हालांकि मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ, लेकिन “अमेरिकी रिसेशन” (बाजारों की मंदी) नाम का भूत जब सारी दुनिया को डराता हुआ घूम रहा है, उसके पीछे यही चार्वाक नीति काम कर रही है। अमेरिकी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं ने ज्यादा कमाई और ब्याज के लालच में ऐसे-ऐसे लोगों को भी ॠण बाँट दिये जिनकी औकात उतनी थी नहीं, यही है अमेरिकी सब-प्राइम संकट, सरल भाषा में। मंदी छाई हुई है अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर, लेकिन घिग्घी बंधी हुई है हमारी और हमारे शेयर बाजारों की। ऐसा क्यों होता है?

“बचत करना पाप है, खर्च करना गुण है…” एक महान अर्थशास्त्री का यह बयान अमेरिका पर कितना सटीक बैठता है, आइये देखते हैं। आमतौर पर मान्यता है कि जापानी व्यक्ति बेहद कंजूस होता है और बचत में अधिक विश्वास करता है। जापानी अधिक खर्च नहीं करते, जापान की वार्षिक बचत लगभग सौ अरब है, फ़िर भी जापानी अर्थव्यवस्था कमजोर मानी जाती है। दूसरी ओर अमेरिकी खर्चते ज्यादा हैं, बचाते कम हैं, यहाँ तक कि अमेरिका निर्यात से अधिक आयात करता है, उसका व्यापार घाटा चार सौ अरब को पार कर चुका है। फ़िर भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत मानी जाती है और सारी दुनिया उसकी सेहत के लिये फ़िक्रमन्द रहती है।

अब सवाल उठता है कि अमेरिकी लोग खर्च करने के लिये इतना पैसा लाते कहाँ से हैं? असल में वे उधार लेते हैं, जापान से, चीन से, भारत से और भी वहाँ से जहाँ के लोग बचत करते हैं। बाकी सारे देश बचत करते हैं, ताकि अमेरिका उसे खर्च कर सके, क्योंकि लगभग सारे देश अपनी बचत डॉलर या सोने में करते हैं। अकेले भारत ने ही अपनी विदेशी मुद्रा को लगभग 50 अरब डालर की अमेरिकी प्रतिभूतियों में सुरक्षित रखा हुआ है, चीन का आँकड़ा 160 अरब डॉलर का है। अमेरिका ने पूरे विश्व से पाँच खरब डॉलर लिये हुए हैं, इसलिये जैसे-जैसे बाकी का विश्व बचत करता जाता है, अमेरिकी उतनी ही उन्मुक्तता से खर्च करते जाते हैं। चीन ने जितना अमेरिका में निवेश किया हुआ है उसका आधा भी अमेरिका ने चीन में नहीं किया, यही बात भारत के साथ भी है, हमने अमेरिका में लगभग 50 अरब डॉलर निवेश किया है, जबकि अमेरिका ने भारत में 20 अरब डॉलर।

फ़िर सारी दुनिया अमेरिका के पीछे क्यों भाग रही है? इसका रहस्य है अमेरिकियों की खर्च करने की प्रवृत्ति। वे लोग अपने क्रेडिट कार्डों से भी बेतहाशा खर्च करते हैं, जो कि उनकी भविष्य की आमदनी है, इसीलिये अमेरिका निर्यात कम करता है, आयात अधिक करता है, नतीजा – सारा विश्व अपने विकास के लिये अमेरिका के खर्चों पर निर्भर होता है। यह ठीक इस प्रकार है कि जैसे कोई दुकानदार किसी ग्राहक को उधार देता रहता है ताकि वह उसका ग्राहक बना रहे, क्योंकि यदि ग्राहक खरीदना बन्द कर देगा तो दुकानदार का धंधा कैसे चलेगा? इस प्रकार यह चक्र चलता रहता है और उधारी बढ़ती जाती है, इसमें ग्राहक तो उपभोग करके मजे लूटता रहता है, लेकिन दुकानदार उसके लिये मेहनत करता जाता है।

अमेरिकियों के लिये सबसे बड़ा दुकानदार है जापान। जब तक जापानी खर्च करना प्रारम्भ नहीं करते वे विकास नहीं कर सकते। जापान सरकार ने बचतों पर भी टैक्स लगाना शुरु कर दिया है, लेकिन फ़िर भी वहाँ सिर्फ़ पोस्ट ऑफ़िसों की बचत लगभग एक खरब डॉलर है, यानी भारत की अर्थव्यवस्था का तीन गुना।

सभी प्रमुख अर्थशास्त्री यह मानते हैं कि जब तक किसी देश के लोग खर्च करना प्रारम्भ नहीं करते, देश तरक्की नहीं कर सकता, और सिर्फ़ खर्च नहीं करना है, बल्कि उधार ले-लेकर खर्च करना है। अमेरिका में बसे भारतीय अर्थशास्त्री डॉ जगदीश भगवती ने एक बार मनमोहन सिंह से कहा था कि भारतीय लोग खामख्वाह बचत करते हैं, भारत के लोगों को विदेशी कारों, मोबाइल, परफ़्यूम, कॉस्मेटिक्स पर खर्च करने की प्रवृत्ति बढ़ानी होगी, इससे भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ेगी। सरकार ने इस दिशा में काम करते हुए पिछले एक दशक में जमा पूँजी पर ब्याज दरों को क्रमशः कम किया है, और वह दिन दूर नहीं जब आपकी जमापूँजी सुरक्षित रखने के लिये बैंके उलटे आपसे पैसा लेने लगेंगी। सरकार चाहती है कि हर भारतीय खर्चा करता रहे, अपना पैसा शेयर मार्केट में लगाकर सटोरिया बन जाये। ईपीएफ़ के पैसों को भी बाजार में झोंकने की पूरी तैयारी है।

अब आप सोच रहे होंगे कि दुकानदार-ग्राहक वाली थ्योरी कैसे काम करेगी, क्योंकि जब कर्जा लिया है तो कुछ तो लौटाना ही होगा, यह तो हो नहीं सकता कि दुकानदार देता ही रहे। होता यह है कि जब अमेरिका को किसी देश का कर्ज उतारना होता है तो वह उसे हथियार बेचता है, बम बेचता है, F-16 हवाई जहाज बेचता है, दो बेवकूफ़ देशों को आपस में लड़वाकर पहले तो दोनों को हथियार बेचता है, फ़िर एक पर कब्जा करके उसका तेल अंटी करता है, ताकि अमेरिकियों की कारें लगातार चलती रहें… अंकल सैम की खुशहाली का यही राज है “जमकर खर्च करो…”। बचत करने के लिये और आपस में लड़कर उनका हथियारों का धंधा जारी रखने के लिये दुनिया में कई मूर्ख मौजूद हैं…


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Bank Loan Waiver VDIS Chidambaram

हमारे महान वित्तमंत्री, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री और इकोनोमिक्स के विशेषज्ञ माने जाने वाले बाकी के दोनों वीर मोंटेकसिंह अहलूवालिया और मनमोहन सिंह ने किसानों के लिये 60 हजार करोड़ रुपये के कर्जों को माफ़ करने की घोषणा की है। राजकुमार राहुल गाँधी तो एक कदम आगे बढ़कर कहते हैं कि ये कर्जमाफ़ी नाकाफ़ी है, और ज्यादा कर्ज माफ़ किये जाना थे (उसकी जेब से क्या जाता है?)। ये घोषणा चुनावी वर्ष में ही क्यों की है, यह सवाल करना बेकार है, लेकिन एकमुश्त कुछ भी बाँट देने की नेताओं की इस आदत ने ईमानदार लोगों के दिलोदिमाग पर गहरा असर किया है।

जनार्दन पुजारी का नाम बहुत लोगों को याद होगा। जिन्हें नहीं मालूम उनके लिये बता दूँ कि अस्सी के दशक में इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में ये महाशय वित्त राज्यमंत्री थे। इन्हीं महाशय को यह कालजयी काम (लोन बाँटने और उसे खा जाने) का सूत्रधार माना जा सकता है। हमारे यहाँ बड़े-बड़े हिस्ट्रीशीटर को जेलमंत्री और अंगूठाटेक को शिक्षामंत्री बनाये जाने का रिवाज है। पुजारी महाशय ने बैंकों पर दबाव डलवाकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में “लोन मेले” लगवाये थे। इन लोन मेलों की खासियत यह थी कि इनमें से 90% के लोन बैंकों को वापस नहीं मिले। लगभग ऐसी ही योजना है, पीएमआरवाय (PMRY), इसमें भी सरकार ने जमकर लोन बाँटे, उस लोन पर सबसिडी दी, और लोग-बाग करीब-करीब वह पूरा पैसा खा गये। कई बार तो मजाक-मजाक में लोग कहते भी हैं कि यदि पैसों की जरूरत हो तो PMRY से लोन ले लो। (कांग्रेस से घृणा करने के कई कारणों में से एक कारण यह भी है कि आजादी के बाद से इसने कभी सुशासन लाने की कोशिश नहीं की, हमेशा भ्रष्टाचारियों और बेईमानों को संरक्षण दिया)

इन्हीं की राह पर आगे चले चिदम्बरम साहब। नहीं, नहीं, मैं अभी 2007-08 की बात नहीं कर रहा। थोड़ा पीछे जायें सन 1997 में। चिदम्बरम जी एक बड़ी अनोखी(?) योजना लेकर आये थे, जिसे उन्होंने VDIS स्कीम का नाम दिया था, Voluntary Disclosure Income Scheme। इस नायाब योजना के तहत उन्होंने कालाबाजारियों, काला पैसा जमा करने वालों, आयकर चुराने वालों (मतलब बड़े-बड़े डाकुओं) को यह छूट प्रदान की थी कि वे अपनी काली कमाई जाहिर कर दें और उसका तीस प्रतिशत टैक्स के रूप में जमा कर दें तो बाकी की सम्पत्ति को सरकार “सफ़ेद” कमाई मान लेगी। लोगों ने इसका भरपूर फ़ायदा उठाते हुए लगभग 35000 करोड़ रुपये की काली सम्पत्ति जाहिर की और सरकार को 10000 करोड़ से अधिक की आय हो गई, है न मजेदार स्कीम !!! आंध्रप्रदेश के कांग्रेस नेता-पुत्र ने उस वक्त अपनी सम्पत्ति 700 करोड़ जाहिर की थी, यानी 250 करोड़ का टैक्स देकर बाकी की सारी धन-दौलत (जो उसने या उसके बाप ने भ्रष्टाचार, अनैतिकता और साँठगाँठ से ही कमाई थी) पूरी तरह सफ़ेद हो गई, उसका वह जो चाहे उपयोग करे।

कहने का मतलब यह कि हमारी नपुंसक सरकारों ने हमेशा जब-तब यह माना हुआ है कि “भई हमसे तो कुछ नहीं होगा, न तो हम काला पैसा जमा करने वालों के खिलाफ़ कुछ कर पायेंगे, न कभी भी हम बड़े-बड़े सफ़ेदपोश डाकुओं के खिलाफ़ कमर सीधी करके खड़े हो पायेंगे, हमारा काम है सत्ता पाना, भ्रष्टाचार करना और फ़िर चुनाव लड़कर ॠण / आयकर / लोन माफ़ करना…”। कानून का शासन क्या होता है, कांग्रेस कभी जान नहीं पाई न ही कभी उसके इसके लिये गंभीर प्रयास किये। हमेशा नेहरू-नेहरू, गाँधी-गाँधी का ढोल पीटने वाले ये गंदे लोग 1952 के सबसे पहले जीप घोटाले से ही भ्रष्टाचार में सराबोर हैं। इन्हीं की राह पकड़ी भाजपा ने (इसीलिये मैं इसे कांग्रेस की “बी” टीम कहता हूँ)।

मध्यप्रदेश सरकार में सबसे पहले अर्जुनसिंह ने झुग्गी-झोंपड़ियों को पट्टे प्रदान किये थे, यानी जो व्यक्ति जिस जमीन पर फ़िलहाल रहता है, वह उसकी हो गई, यानी सरकार ने मान लिया था, कि हममें तो अतिक्रमण हटाने की हिम्मत नहीं है, इसलिये जो गंद यहाँ-वहाँ बिखरी पड़ी है और भू-माफ़िया (जो हमें चन्दे देता है) चाहे तो सारी जमीन हड़प कर ले। इस महान(?) नीति का फ़ायदा यह हुआ कि रातोंरात लोगों ने हजारों की संख्या में झुग्गियाँ तान दीं, जिसे भू-माफ़िया का संरक्षण हासिल रहा, और बाद में उन्हें वहाँ से भगाकर कालोनियाँ काट दी गईं… अगला नम्बर था भाजपा के सुन्दरलाल पटवा का, सत्ता पाने के लिये उन्होंने सहकारी बैंकों से लिये गये किसानों के दस हजार तक के ॠण माफ़ कर दिये, आज दस साल बाद भी सहकारी बैंक उस झटके से नहीं उबर पाये हैं और यह नवीनतम जोर का झटका भी सबसे ज्यादा सहकारी बैंकों को ही झेलना पड़ेगा। गाँवों में किसान बैंक अधिकारियों से अभी से कहने लगे हैं कि “कैसी वसूली, काहे का पैसा, दिल्ली सरकार ने सब माफ़ कर दिया, वापस भाग जाओ…”। सिर धुन रहा है बेचारा वह किसान जिसने लोकलाज के चलते अपना कर्जा चुका दिया।

सभी जानते हैं कि इस प्रकार की कर्जमाफ़ी या आयकर / कालेधन में छूट का फ़ायदा सिर्फ़ और सिर्फ़ चोरों को ही मिलता है, ईमानदारी से कर्ज चुकाने वाला या आयकर चुकाने वाला इसमें ठगा हुआ महसूस करता है, वह भी सोचने पर मजबूर हो जाता है कि अब मैं भी क्यों कर्ज चुकाऊँ? क्यों न मैं भी बिजली चोरी करूँ, आखिर अन्त में सरकार को यह सब माफ़ करना ही है। सबसे ज्यादा गुस्सा उस नौकरीपेशा व्यक्ति को आता है, उसका टैक्स तो तनख्वाह में से ही काट लिया जाता है।

इसलिये देश-विदेशों में बसे भाईयों और बहनों… भारत में तमाम सरकारों का संदेश स्पष्ट है, कि “हम नालायक, निकम्मे और नपुंसक हैं, कर चोरी करने वालों के खिलाफ़ हम कुछ नहीं कर पायेंगे तो माफ़ कर देंगे, बिजली चोरी हमसे नहीं रुकेगी तो बिल माफ़ कर देंगे, अतिक्रमण हमसे नहीं रुकेगा तो “सीलिंग एक्ट” के बारे में सर्वोच्च न्यायालय में हम बेशर्म बन जायेंगे, एक लाख से ज्यादा किसानों की आत्महत्या के बाद चुनाव जीतने के लिये कर्जमाफ़ी देंगे, आतंकवाद या नक्सलवाद को रोकना हमारे बस का नहीं है इसलिये हम तो x, y, z सुरक्षा ले लेंगे, तुम मरते फ़िरो सड़कों पर… गरज यह कि हमसे कानून-व्यवस्था के अनुसार कोई काम नहीं होगा… जो भी टैक्स आप चुकाते हैं या जो निवेश आप करते हैं अन्त-पन्त वह किसी न किसी हरामखोर की जेब में ही जायेगा… और यदि आप कर्ज लेकर उसे चुकाते भी हैं तो आप परले दर्जे के महामूर्ख हैं…


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Communist Party Double Standards Inflation

वित्तमंत्री चिदम्बरम, प्रमुख योजनाकार अहलूवालिया और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की त्रिमूर्ति एक बेहतरीन अर्थशास्त्रियों की टीम मानी जाती है (सिर्फ़ मानी जाती है, असल में है नहीं)। बजट के पहले सोयाबीन तेल का भाव 60 रुपये किलो था जो बजट के बाद एकदम तीन दिनों में 75 रुपये हो गया… चावल के भाव आसमान छू रहे हैं लेकिन निर्यात जारी है… दालों के भाव को सट्टेबाजों ने कब्जे में कर रखा है, लेकिन उसे कमोडिटी एक्सचेंज से बाहर नहीं किया जा रहा। देश की आम जनता को सोनिया गाँधी के विज्ञापन के जरिये यह समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि “हमने पिछले पाँच साल से मिट्टी के तेल के भाव नहीं बढ़ाये”, मानो गरीब सिर्फ़ केरोसीन से ही रोटी खाता हो और केरोसीन ही पीता हो।

तमाम अखबार चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि कमोडिटी एक्सचेंजों से खुलेआम सट्टेबाजी जारी है, निर्यात ऑर्डरों में भारी घपले करके, बैकडेट आदि में नकली बिलिंग करके खाद्यान्न निर्यातक, करोड़ों को अरबों में बदल रहे हैं और चिदम्बरम साहब हमे 9 प्रतिशत की विकास दर दिखा रहे हैं। पहले तो बैंकों में ब्याज दर कम कर-कर के जनता को शेयर बाजार और म्युचुअल फ़ण्डों में पैसा लगाने की लत लगा दी, अब बाजार नीचे जा रहा है, विदेशी निवेशक कमा कर चले गये तो त्रिमूर्ति को कुछ सूझ नहीं रहा… समूचा देश सट्टेबाजों के हवाले कर दिया गया है, और माननीय वित्तमंत्री कहते हैं कि “महंगाई को काबू करना हमारे बस में नहीं है, यह एक अंतर्राष्ट्रीय घटना है…”। कांग्रेस एक और प्रवक्ता आँकड़े देते हुए कहते हैं कि “कमाई में विकास होता है तो महंगाई तो बढ़ती ही है”, क्या खूब!!! जरा वे यह बतायें कि कमाई किसकी और कितनी बढ़ी है? और महंगाई किस रफ़्तार से बढ़ी है? लेकिन असल में AC कमरों से बाहर नहीं निकलने वाले सरकारी सचिवों और नेताओं को (1) या तो जमीनी हकीकत मालूम ही नहीं है, (2) या वे जानबूझ कर अंजान बने हुए हैं, (3) या फ़िर इस सट्टेबाजी में इनके भी हाथ-पाँव-मुँह सब चकाचक लालमलाल हो रहे हैं… और आने वाले चुनावों के खर्च का बन्दोबस्त किया जा रहा है।

सबसे आपत्तिजनक रवैया तो लाल झंडे वालों का है, वे मूर्खों की तरह परमाणु-परमाणु रटे जा रहे हैं, नंदीग्राम में नरसंहार करवाये जा रहे हैं, लगातार कुत्ते की तरह सिर्फ़ भौंक रहे हैं, लेकिन समन्वय समिति की बैठक में जाते ही सोनिया उन्हें पता नहीं क्या घुट्टी पिलाती हैं, वे दुम दबाकर वापस आ जाते हैं, अगली धमकी के लिये। पाँच साल तक बगैर किसी जिम्मेदारी और जवाबदारी के सत्ता की मलाई चाटने वाले इन लोगों को दाल-चावल-तेल के भाव नहीं दिखते? परमाणु समझौता बड़ा या महंगाई इसकी उन्हें समझ नहीं है। सिर्फ़ तीन राज्यों में सिमटे हुए ये परजीवी (Parasites) सरकार को एक साल और चलाने के मूड में दिखते हैं क्योंकि इन्हें भी मालूम है कि लोकसभा में 62 सीटें, अब इन्हें जीवन में कभी नहीं मिलेंगी। भगवाधारी भी न जाने किस दुनिया में हैं, उन्हें रामसेतु से ही फ़ुर्सत नहीं है। वे अब भी राम-राम की रट लगाये हुए हैं, वे सोच रहे हैं कि राम इस बार चुनावों में उनकी नैया पार लगा देंगे, लेकिन ऐसा होगा नहीं। बार-बार मोदी की रट लगाये जाते हैं, लेकिन मोदी जैसे काम अपने अन्य राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ आदि में नहीं करवा पाते, जहाँ कुछ ही माह में चुनाव होने वाले हैं। जिस तरह से हमारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया “अमिताभ को ठंड लगी”, “ऐश्वर्या राय ने छत पर कबूतरों को दाने डाले”, जैसी “ब्रेकिंग न्यूज” दे-देकर आम जनता से पूरी तरह कट गया है, वैसे ही हैं ये राजनैतिक दल…जिस तरह एनडीए के पाँच साल में सबसे ज्यादा गिरी थी भाजपा, उसी तरह यूपीए के पाँच साला कार्यकाल में सबसे ज्यादा साख गिरी है लाल झंडे वालों की, और कांग्रेस तो पहले से गिरी हुई है ही…


अब सीन देखिये… चिदम्बरम ने किसान ॠण माफ़ करने की सीमा जून तय की है (किसान खुश), छठा वेतन आयोग मार्च-अप्रैल में अपनी रिपोर्ट सौंप देगा (कर्मचारी खुश), मम्मी के दुलारे राजकुमार भारत यात्रा पर निकल पड़े हैं और उड़ीसा के कालाहांडी से उन्होंने शुरुआत कर दी है (राहुल की प्राणप्रतिष्ठा), परमाणु समझौते पर हौले-हौले कदम आगे बढ़ ही रहे हैं (अमेरिका भी खुश), अखबारों में किसान और कर्मचारी समर्थक होने के विज्ञापन आने लगे हैं, यानी कि चुनाव के वक्त से पहले होने के पूरे आसार बन रहे हैं, लेकिन विपक्षी दल नींद में गाफ़िल हैं। वक्त आते ही “महारानी”, लाल झंडे वालों की पीठ में छुरा घोंप कर (कांग्रेस की परम्परानुसार) चुनाव का बिगुल फ़ूंक देंगी और ये लाल-भगवा-हरे झंडे वाले देखते ही रह जायेंगे। रही बात आम जनता की, चाहे वह किसी को पूर्ण बहुमत दे या खंडित जनादेश, साँप-नाग-कोबरा-अजगर में से किसी एक को चुनने के लिये वह शापित है…


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Rich People Uncivilized Unsocial Selfish

पहला दृश्य देखिये – पंजाब के खन्ना गाँव के अनपढ़ ग्रामीणों ने कैसा व्यवहार किया। लुधियाना से 50 किमी दूर रात के 3 बजे, खून जमा देने वाली ठंड के बीच एक रेल दुर्घटना हुई। गाँव के सारे लोग एक घंटे के भीतर इकठ्ठा हो चुके थे, गुरुद्वारे के लाउडस्पीकर से सबको जगा-जगाकर दुर्घटनास्थल भेजा जा रहा था, जिसके पास ट्रैक्टर थे उन्होंने अपने ट्रैक्टर रेल्वे लाइन के आसपास हेडलाइट जलाकर चालू हालत में छोड़ दिये ताकि वहाँ रोशनी हो सके। रेल के डिब्बों से लाशों से निकालने का काम शुरु कर दिया गया। गाँव की औरतों ने लालटेन जलाकर और खेत से फ़ूस में आग लगाकर ठंड से काँप रहे घायलों को थोड़ी गर्मी देने की कोशिश की।

जल्दी ही सैकड़ों की संख्या में आरएसएस के कार्यकर्ता वहाँ पहुँच गये, किसी भी सरकारी मदद के बिना उन्होंने गुरुद्वारे में ही एक “टेम्परेरी” अस्पताल खोल दिया और रक्तदान शुरु कर दिया। गाँव वालों ने एक समिति बनाई जिसने अगले एक सप्ताह तक घायलों और मृतकों के रिश्तेदारों और बाहर से आने वाले लगभग 30000 लोगों के लिये भोजन की व्यवस्था की। जिन्दा या मुर्दा किसी की जेब से एक रुपया भी चोरी नहीं हुआ, समिति के अध्यक्ष ने मृतकों की ज्वेलरी और लाखों रुपये कलेक्टर को सौंपे, जब मृतकों के रिश्तेदार भी उन छिन्न-भिन्न लाशों के पास जाने से घबरा रहे थे, तब आरएसएस के युवकों ने उनका सम्मान के साथ अन्तिम संस्कार किया।

अब दूसरा दृश्य देखिये - वह 26 जनवरी 2001 की शाम थी, गुजरात में आये महाविनाशकारी भूकम्प की खबरें तब तक पूरे देश में फ़ैल चुकी थीं। लाशों के मिलने का सिलसिला जारी था और धीरे-धीरे भूकम्प की भयावहता सभी के दिमाग पर हावी होने लगी थी। लेकिन दिल्ली, जो कि देश की राजधानी है, उसके एक केन्द्रीय इलाके में चारों तरफ़ रोशनी थी, धूमधड़ाका था, मौज मस्ती चल रही थी। जब समूचा देश शोक और पीड़ा में डूबा हुआ था, वहाँ एक विशाल पार्टी चल रही थी। उस पार्टी में भारत के जाने-माने रईस, समाज के बड़े-बड़े ठेकेदार तो थे ही, वर्तमान और भूतपूर्व फ़िल्म स्टार, दागी क्रिकेटर, उद्योगपति, गुलशन कुमार की हत्या के आरोपी, नौकरशाह, बैंक अफ़सर, पत्रकार और यहाँ तक कि बुद्धिजीवी माने जाने वाले बड़े शिक्षाविद भी थे। एक बड़े कम्युनिस्ट नेता भी उस पार्टी की शोभा बढ़ा रहे थे। पार्टी का मुख्य आकर्षण था एक भव्य स्टेज जहाँ एक मुख्यमंत्री बेकाबू होकर खुद गाने-बजाने लग पड़े थे, और उनके जवान बेटे को उन्हें यह कह कर शांत करना पड़ा कि गुजरात में आज ही एक राष्ट्रीय आपदा आई है और इस तरह आपका प्रदर्शन शोभा नहीं देता।

आप सोच रहे होंगे कि आखिर यह पार्टी थी किस उपलक्ष्य में? यह पार्टी एक 45 साल के बच्चे के जन्मदिन के उपलक्ष्य में थी। यह पैंतालीस साला बच्चा और कोई नहीं बल्कि एक ख्यात व्यवसायी, उद्योगपति, फ़िल्मी (खासकर हीरोईनों) और क्रिकेट हस्तियों से विशेष मेलजोल रखने वाला, और एक ऐसी पार्टी का मुख्य कर्ता-धर्ता था, जो अपने नाम के आगे “समाजवादी” लगाती है… (क्या अब नाम भी बताना पड़ेगा)। उस पार्टी में शामिल होने के लिये मुम्बई से कुछ लोग चार्टर विमान करके आये थे। यह पार्टी सिर्फ़ 26 जनवरी की रात को ही खत्म नहीं हुई, बल्कि यह 27 जनवरी को भी जारी रही, जबकि यह सभी को पता चल चुका था कि भुज-अंजार में लगभग 15000 लोग मारे गये हैं और तीन लाख से अधिक बेघर हुए हैं। 27 जनवरी की पार्टी उन लोगों के लिये थी, जो 26 जनवरी को उसमें शामिल होने से चूक गये थे। 27 जनवरी तक हालांकि तमाम राजनीतिक लोग इस पार्टी से शर्मा-शर्मी में दूर हो गये थे सिर्फ़ इसलिये कि कहीं वे मीडिया की नजर में न आ जायें, लेकिन दिल्ली और मुम्बई के कुछ प्रसिद्ध अमीर, समाज के प्रमुख स्तम्भ माने जाने वाले लोग इतने बेशर्म और ढीठ थे कि उन्होंने पार्टी स्थगित करना भी उचित नहीं समझा।

और ऐसा करने वाले अकेले दिल्ली के अमीर ही नहीं थे, मुम्बई में भी 26 जनवरी की रात को ही एक फ़ैशन शो आयोजित हुआ (जिसमें जाहिर है कि “एलीट” वर्ग ही आता है)। भविष्य की मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स चुनने के लिये यह शो आयोजित किया गया था। हमेशा की तरह विशिष्ट लोगों ने “माँस” की वह प्रदर्शनी सूट-बूट पहनकर देखी, मीडिया ने भी सुबह गुजरात में लाशों और टूटे घरों की तथा शाम को अधनंगी लड़कियों की तस्वीरें खींची और अपना कर्तव्य निभाया।

लेकिन हमारे-आपके और देश के दुर्भाग्य से दिल्ली के एक छोटे से सांध्य दैनिक के अलावा किसी राष्ट्रीय अखबार ने पंजाब के गाँववालों की इस समाजसेवा के लिये (आरएसएस की तो छोड़िये ही) तारीफ़ में कुछ नहीं छापा। कल्पना कीजिये कि यदि कोई एकाध-दो गुण्डे दो-चार यात्रियों के पैसे या चेन वगैरह लूट लेते तो “आज तक” जैसे नकली चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज क्या होती? “दुर्घटनाग्रस्त यात्रियों से लूटपाट…”, बड़े अखबारों में सम्पादकीय लिखे जाते कि कैसे यह पुलिस की असफ़लता है और कैसे गाँव वालों ने लूटपाट की।

समाज के एक तथाकथित “एलीट” वर्ग ने गाँव वालों को हमेशा “गँवई”, “अनसिविलाइज्ड” कहा और प्रचारित किया है। जबकि हकीकत यह है कि जैसे-जैसे अमीरी बढ़ती जाती है, “मैं”, “मेरा परिवार”, “मेरा पैसा”, “मेरी सुविधायें” वाली मानसिकता बढ़ती जाती है। जब समाज को कुछ योगदान देने की बात आती है तो अमीर सोचता है कि मेरा काम सिर्फ़ “पैसा” देना भर है, और पैसा भी कौन सा? जो उसने शोषण, अनैतिकता, भ्रष्टाचार, साँठगाँठ करके कमाया हुआ है। त्याग, बलिदान, समाजसेवा की बारी आयेगी तो ग्रामीण खुद-ब-खुद आगे आता है…

याद कीजिये कंधार का हवाई अपहरण कांड, कैसे अमीर लोग टीवी कैमरों के सामने अपना “छातीकूट” अभियान लगातार जारी रखे रहे, इक्का-दुक्का को छोड़कर एक भी अमीर यह कहने के लिये आगे नहीं आया, कि “सरकार एक भी आतंकवादी को न छोड़े चाहे मेरे परिजन मारे ही क्यों न जायें…” लेकिन यही अमीर वर्ग सबसे पहले करों में छूट की माँग करता है, सरकार को चूना लगाने के नये-नये तरीके ढूँढता है, बिजली चोरी करता है और बाकी सारे धतकरम भी करता है, यहाँ तक कि हवाई दुर्घटना में मरने पर दस लाख का हर्जाना और बस दुर्घटना में मरने पर एक लाख भी नहीं (यानी मौत में भी भेदभाव), ढिठाई तो इतनी कि सरेआम फ़ुटपाथ पर लोगों को कुचलने के बावजूद मुम्बई में सलमान और दिल्ली में संजीव नन्दा साफ़ बच निकलते हैं, लेकिन आलोचना की जाती है ग्रामीण वर्ग की… क्या खूब दोगलापन है।

कोई यह नहीं चाहता कि अमीरों को नुकसान पहुँचाया जाये, लेकिन कम से कम उन्हें दूसरों की तकलीफ़ों और दुःखों की समझ होनी चाहिये। कोई यह नहीं कह रहा कि वे आगे आकर अन्जान लोगों की लाशों को दफ़नायें/जलायें (वे कर भी नहीं सकते) लेकिन कम से कम जो लोग ये काम कर रहे हैं उनकी तारीफ़ तो कर सकते हैं। कोई उनसे यह नहीं कह रहा कि गुजरात या लुधियाना जाकर मृतकों/घायलों की मदद करो, लेकिन कम से कम बेशर्मी भरी पार्टियाँ तो आयोजित न करें।

माना कि जीवन चलने का नाम है और दुर्घटनाओं से देश रुक नहीं जाता, लेकिन सार्वजनिक रूप से इस प्रकार का भौंडा प्रदर्शन निहायत ही घटिया और शर्मनाक होता है। गाँवों में आज भी कोई बड़ी दुर्घटना होने पर शादी-ब्याह तक रोक दिये जाते हैं, लेकिन अमीरो को कम से कम यह खयाल तो करना ही चाहिये कि पड़ोस में लाश पड़ी हो तो दीवाली नहीं मनाया करते। ऐसे में रह-रह कर सवाल उठता है कि क्या अमीरी के साथ बेशर्मी, ढिठाई, असामाजिकता और स्वार्थीपन भी बढ़ता जाता है?

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Indian Heroines Wedding Married Men

आज ही खबर आई है कि रानी मुखर्जी और आदित्य चोपड़ा का विवाह होने वाला है। हालांकि इस खबर पर कोई आश्चर्य करने वाली कोई बात नहीं है, क्योंकि इसमें कोई अजूबा नहीं है, और यह उनका व्यक्तिगत मामला है। पहले भी भारतीय हीरोईनें “समय आने पर” अपना घर बसाती रही हैं। लेकिन इस बनने वाली जोड़ी में एक बात है, जो कि चर्चा और जिक्र के काबिल है, वह है आदित्य चोपड़ा का शादीशुदा होना। वे अपनी पत्नी से तलाक लेने जा रहे हैं और रानी मुखर्जी से शादी करेंगे।

शादीशुदा, तलाकशुदा, दुहाजू या बल्कि तिहाजू पुरुष से शादी करने का हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में रिवाज रहा है। ज्यादा पीछे न जायें तो हेमामालिनी ने धर्मेन्द्र से उनकी पत्नी जीवित रहते और तलाक न देने के बावजूद रोमांस किया और शादी भी की। हेमामालिनी का मामला ज्यादा अलग इसलिये भी है कि उस वक्त धर्मेन्द्र दो बच्चों के पिता भी थे। रेखा और अमिताभ के किस्से तो सभी को मालूम ही हैं, अमिताभ भी उस वक्त शादीशुदा थे और दो बच्चों के बाप थे, लेकिन फ़िर भी रेखा उन पर मर मिटी थीं और लगभग हाथ-पाँव धोकर उनके पीछे पड़ी थीं। यदि “कुली” फ़िल्म की दुर्घटना न हुई होती, जया भादुड़ी ने अमिताभ की सेवा करके उन्हें मौत के मुँह से खीच न लिया होता तो शायद अमिताभ भी रेखा के पति बन सकते थे। सारिका ने भी कमल हासन से उनके शादीशुदा रहते विवाह किया, उसके बाद सुना है कि उनमें भी तलाक हो गया है और कमल हासन को तीसरी औरत मिल गई है (शायद हीरोइन ही है)। हालांकि दक्षिण में दूसरी शादी का रिवाज सा है, और इसे “विशेष” निगाह से देखा भी नहीं जाता, लेकिन उत्तर भारत में इसे गत दशक तक “खुसुर-पुसुर” निगाहों से देखा जाता था। बीते दस वर्षों में, जबसे समाज में “खुलापन” बढ़ा है, यह संख्या तेजी से बढ़ी है, और चूँकि ये हीरोईने लड़कियों की “आइकॉन” होती हैं, इसलिये फ़िल्मों से बाहर के समाज में भी यह रिवाज पसरता जा रहा है।

हाल के वर्षों में यह ट्रेण्ड कुछ ज्यादा ही चल पड़ा है, पिछली पीढ़ी की हीरोइनों से शुरु करें तो सबसे पहले श्रीदेवी ने शादीशुदा और बच्चेदार बोनी कपूर से शादी की, फ़िर करिश्मा कपूर, रवीना टंडन, ॠचा शर्मा, मान्यता (आमिर खान की दूसरी बीवी हीरोइन नहीं हैं, लेकिन आमिर खुद दुहाजू ही हैं, फ़िरोज खान ने भी बुढ़ौती में एक जवान लड़की से शादी की थी) आदि भी उनकी ही राह चलीं। ताजा मामला आदित्य और रानी मुखर्जी का है, लेकिन उससे पहले करीना और सैफ़ का जिक्र करना भी आवश्यक है, खबरें हैं कि उनमें जोरों का रोमांस चल रहा है, लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्री के “अफ़वाह रिवाज” पर तब तक भरोसा नहीं किया जा सकता जब तक कि वाकई में शादी न हो जाये, फ़िर भी यदि करीना-सैफ़ की शादी हुई तो यह शाहिद कपूर के साथ अन्याय तो होगा ही, सैफ़ जैसे अधेड़ और “तिहाजू” से करीना कैसे फ़ँस गई, यह भी शोध का विषय होगा।

बहरहाल, लेख का उद्देश्य इन हीरोइनों की आलोचना करना नहीं है, क्योंकि शादी उनका व्यक्तिगत मामला है, लेकिन प्रश्न उठते हैं कि आखिर इन शादीशुदा मर्दों में ऐसा क्या आकर्षण होता है कि हीरोईनें अपने हम-उम्र लड़कों का साथ छोड़कर इनके साथ शादी रचा लेती हैं?

1) क्या यह दैहिक आकर्षण है? (यदि ऐसा है तो मर्दों की दाद देनी होगी)
2) इसमें रुपये-पैसे का रोल और एक सुरक्षित भविष्य की कामना दबी होती है? (लेकिन वे खुद भी काफ़ी पैसे वाली होती हैं)
3) क्या वाकई ये हीरोइनें अपने-आपको इतनी असुरक्षित समझती हैं कि वे दूसरी औरत का घर उजाड़ने में कोई कोताही नहीं बरततीं? (उन्हें यह डर भी नहीं होता कि कल कोई और लड़की उसे बेदखल कर देगी?)
4) क्या वे “अनुभव” को प्राथमिकता देती हैं? (लेकिन यदि पुरुष को जीवन का अनुभव होता तो पहला तलाक ही क्यों होता?)
5) क्या आधुनिक समझे जाने वाली उस सोसायटी में भी मर्दों का राज ही चलता है? (चोखेर बालियाँ ध्यान दें…)
6) क्या यह कोई मनोवैज्ञानिक समस्या है?

आखिर क्या बात है… ?

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Mumbai Dibbawalas, Tirupur, Namakkal, IIM

कुछ समय पहले एक प्रतिष्ठित आईआईएम के निदेशक बड़े गर्व से टीवी पर बता रहे थे कि उनके यहाँ से 60 छात्रों का चयन बड़ी-बड़ी कम्पनियों में हो गया है (जाहिर है कि मल्टीनेशनल में ही)…एक छात्र को तो वार्षिक साठ लाख का पैकेज मिला है और दूसरे को अस्सी लाख वार्षिक का…। लेकिन यहाँ सवाल उठता है कि इतना वेतन लेने वाले ये मैनेजर आखिर करेंगे क्या? मल्टीनेशनल कम्पनियों के लिये शोषण के नये-नये रास्ते खोजने का ही… जो कम्पनी इन्हें पाँच लाख रुपये महीना वेतन दे रही है, जाहिर है कि वह इनके “दिमाग”(?) के उपयोग से पचास लाख रुपये महीना कमाने की जुगाड़ में होगी, अर्थात ये साठ मेधावी छात्र आज्ञाकारी नौकर मात्र हैं, जो मालिक के लिये कुत्ते की तरह दिन-रात जुटे रहेंगे।

इन साठ छात्रों का चयन भारत के बेहतरीन मैनेजमेंट इन्स्टीट्यूट में तब हुआ जब वे लाखों के बीच से चुने गये, इनके प्रशिक्षण और रहन-सहन पर इस गरीब देश का करोड़ों रुपया लगा। लेकिन क्या सिर्फ़ इन्हें बहुराष्ट्रीय (या अम्बानी, टाटा, बिरला) कम्पनियों के काम से सन्तुष्ट हो जाना चाहिये? क्या ये मेधावी लोग कभी मालिक नहीं बनेंगे? क्या इनके दिमाग का उपयोग भारत के फ़ायदे के लिये नहीं होगा? इनमें से कितने होंगे जो कुछ सैकड़ों लोगों को ही रोजी-रोटी देने में कामयाब होंगे? यदि भारत के बेहतरीन दिमाग दूसरों की नौकरी करेंगे, तो नौकरी के अवसर कौन उत्पन्न करेगा? दुर्भाग्य की बात यह है कि मैनेजमेंट संस्थानों से निकलने वाले अधिकतर युवा “रिस्क” लेने से घबराते हैं, वे उद्यमशील (Entrepreneur) बनने की कोशिश नहीं करते।

अब तस्वीर का दूसरा पक्ष देखिये। रिलायंस, अम्बानी, टाटा, बिरला, मित्तल का नाम तो सभी जानते हैं, लेकिन कितने लोग तिरुपुर या नमक्कल के बारे में जानते हैं? तिरुपुर, तमिलनाडु के सुदूर में स्थित एक कस्बा है, जहाँ लगभग 4000 छोटे-बड़े सिलाई केन्द्र और अंडरवियर/बनियान बनाने के कुटीर उद्योग हैं। उनमें से लगभग 1000 इकाईयाँ इनका निर्यात भी करती हैं। पिछले साल अकेले तिरुपुर का निर्यात 6000 करोड़ रुपये का था, जो कि सन 1985 में सिर्फ़ 85 करोड़ था। इन छोटी-छोटी इकाईयों और कारखानों की एक एसोसियेशन भी है तिरुपुर एक्सपोर्टर एसोसियेशन। लेकिन सबसे खास बात तो यह है कि दस में से नौ कामगार खुद अपनी इकाई के मालिक हैं, वे लोग पहले कभी किसी सिलाई केन्द्र में काम करते थे, धीरे-धीरे खुद के पैरों पर खड़ा होना सीखा, बैंक से लोन लिये और अपनी खुद की इकाई शुरु की। तिरुपुर कस्बा अपने आप में एक पाठशाला है कि कैसे लोगों को उद्यमशील बनाया जाता है, कैसे उनमें प्रेरणा जगाई जाती है, कैसे उन्हें काम सिखाया जाता है। इनमें से अधिकतर लोग कभी किसी यूनिवर्सिटी या मैनेजमेंट संस्थान में नहीं गये, इनके पास कोई औपचारिक डिग्री नहीं है, लेकिन ये खुद अपना काम तो कर ही रहे हैं दो-चार लोगों को काम दे भी रहे हैं जो आगे चलकर खुद मालिक बन जायेंगे।

जाहिर सी बात है कि अधिकतर कामगार/मालिक अंग्रेजी नहीं जानते, लेकिन फ़िर भी वैश्विक चुनौतियों का वे बखूबी सामना कर रहे हैं, रेट्स के मामले में भी और ग्राहक की पसन्द के मामले में भी। पश्चिमी देशों के मौसम और डिजाइन के अनुकूल अंडर-गारमेण्ट्स ये लोग बेहद प्रतिस्पर्धी कीमतों पर निर्यात करते हैं। इन्हीं में से एक पल्लानिस्वामी साफ़ कहते हैं कि “जब वे बारहवीं कक्षा में फ़ेल हो गये तब वे इस बिजनेस की ओर मुड़े…”। आज की तारीख में वे एक बड़े कारखाने के मालिक हैं, उनका 20 करोड़ का निर्यात होता है और 1200 लोगों को उन्होंने रोजगार दिया हुआ है। वे मानते हैं कि यदि वे पढ़ाई करते रहते तो आज यहाँ तक नहीं पहुँच सकते थे। और ऐसे लोगों की तिरुपुर में भरमार है, जिनसे लक्स, लिरिल, रूपा आदि जैसे ब्राण्ड कपड़े खरीदते हैं, अपनी सील और पैकिंग लगाते हैं और भारी मुनाफ़े के साथ हमे-आपको बेचते हैं, लेकिन सवाल उठता है कि आईआईएम और उनके छात्रों ने देश में ऐसे कितने तिरुपुर बनाये हैं?

मुम्बई के डिब्बेवालों की तारीफ़ में प्रिंस चार्ल्स पहले ही बहुत कुछ कह चुके हैं, उनकी कार्यप्रणाली, उनकी कार्यक्षमता, उनकी समयबद्धता वाकई अद्भुत है। मजे की बात तो यह है कि उनमें से कई तो नितांत अनपढ़ हैं, लेकिन मुम्बई के सुदूर उपनगरों से ठेठ नरीमन पाइंट के कारपोरेट दफ़्तरों तक और वापस डिब्बों को उनके घर तक पहुँचाने में उनका कोई जवाब नहीं है। अब कई मैनेजमेंट संस्थान इन पर शोध कर रहे हैं, लालू भी इनके मुरीद बन चुके हैं, लेकिन इनका जीवन आज भी वैसा ही है। इनकी संस्था ने हजारों को रोजगार दिलवाया हुआ है, खाना बनाने वालों, छोटे किराना दुकानदारों, गरीब बच्चों, जिन्हें कोई बड़ा उद्योगपति अपने दफ़्तर में घुसने भी नहीं देता। आईआईएम के ही एक छात्र ने चेन्नई में अपना खुद का केटरिंग व्यवसाय शुरु किया, शुरु में सिर्फ़ वह इडली बनाकर सप्लाई करते थे, आज उनके पास कर्मचारियों की फ़ौज है और वे टिफ़िन व्यवसाय में जम चुके हैं, लेकिन उनकी प्रेरणा स्रोत थीं उनकी माँ, जिन्होंने बेहद गरीबी के बावजूद अपने मेधावी बेटे को आईआईएम में पढ़ने भेजा, लेकिन सवाल यही है कि ऐसा कदम कितने लोग उठाते हैं?

एक और उदाहरण है नमक्कल का। जाहिर है कि इसका नाम भी कईयों ने नहीं सुना होगा। नमक्कल के 3000 परिवारों के पास 18000 ट्र्क हैं। भारत के 70% टैंकर व्यवसाय का हिस्सा नमक्कल का होता है। चकरा गये ना !! तिरुपुर की ही तरह यहाँ भी अधिक पढ़े-लिखे लोग नहीं हैं, ना ही यहाँ विश्वविद्यालय हैं, न ही मैनेजमेंट संस्थान। लगभग सभी टैंकर मालिक कभी न कभी क्लीनर थे, किसी को अंग्रेजी नहीं आती, लेकिन ट्रक के मामले में वे उस्ताद हैं, पहले क्लीनर, फ़िर हेल्पर, फ़िर ड्रायवर और फ़िर एक टैंकर के मालिक, यही सभी की पायदाने हैं, और अब नमक्कल ट्रकों की बॉडी-बिल्डिंग (ढांचा तैयार करने) का एक बड़ा केन्द्र बनता जा रहा है। एक समय यह इलाका सूखे से लगातार जूझता रहता था, लेकिन यहाँ के मेहनती लोगों ने पलायन करने की बजाय यह रास्ता अपनाया।

पहले उन्होंने हाइवे पर आती-जाती गाड़ियों पर कपड़ा मारने, तेल-हवा भरने का काम किया, फ़िर सीखते-सीखते वे खुद मालिक बन गये। आज हरेक ट्रक पर कम से कम तीन लोगों को रोजगार मिलता है। एक-दो को देखकर दस-बीस लोगों को प्रेरणा मिलती है और वह भी काम पर लग जाता है, ठीक तिरुपुर की तरह। यह एक प्रकार का सामुदायिक विकास है, सहकारिता के साथ, इसमें प्रतिस्पर्धा और आपसी जलन की भावना तो है, लेकिन वह उतनी तीव्र नहीं क्योंकि हरेक के पास छोटा ही सही रोजगार तो है। और यह सब खड़ा किया है समाज के अन्दरूनी हालातों के साथ लोगों की लड़ने की जिद ने, न कि किसी आईआईएम ने। यही नहीं, ऐसे उदाहरण हमें समूचे भारत में देखने को मिल जाते हैं, चाहे वह कोयम्बटूर का वस्त्रोद्योग हो, सिवाकासी का पटाखा उद्योग, लुधियाना का कपड़ा, पटियाला का साइकिल उद्योग हो (यहाँ पर मैंने “अमूल” का उदाहरण नहीं दिया, वह भी सिर्फ़ और सिर्फ़ कुरियन साहब की मेहनत और सफ़ल ग्रामीण सहकारिता का नतीजा है)।

मोटी तनख्वाहें लेकर संतुष्ट हो जाने और फ़िर जीवन भर किसी अंग्रेज की गुलामी करने वालों से तो ये लोग काफ़ी बेहतर लगते हैं, कम से कम उनमें स्वाभिमान तो है। लेकिन जब मीडिया भी अनिल-मुकेश-मित्तल आदि के गुणगान करता रहता है, वे लोग भी पेट्रोल से लेकर जूते और सब्जी तक बेचने को उतर आते हैं, “सेज” के नाम पर जमीने हथियाते हैं, तो युवाओं के सामने क्या आदर्श पेश होता है? आखिर इतनी पूंजी का ये लोग क्या करेंगे? एक ही जगह इतनी ज्यादा पूंजी का एकत्रीकरण क्यों? क्या नीता अम्बानी को जन्मदिन पर 300 करोड़ का हवाई जहाज गिफ़्ट में देना कोई उपलब्धि है? लेकिन हो यह रहा है कि कॉलेज, संस्थान से निकले युवक की आँखों पर इन्हीं लोगों के नामों का पट्टा चढ़ा होता है, वह कुछ नया सोच ही नहीं पाता, नया करने की हिम्मत जुटा ही नहीं पाता, उसकी उद्यमशीलता पहले ही खत्म हो चुकी होती है। इसमें अपनी तरफ़ से टेका लगाते हैं, मैनेजमेंट संस्थान और उनके पढ़े-लिखे आधुनिक नौकर। जबकि इन लोगों को तिरुपुर, नमक्कल जाकर सीखना चाहिये कि स्वाभिमानी जीवन, लाखों की तनख्वाह से बढ़कर होता है…। जो प्रतिभाशाली, दिमागदार युवा दूसरे के लिये काम कर सकते हैं, क्या वे दो-चार का समूह बनाकर खुद की इंडस्ट्री नहीं खोल सकते? जरूर कर सकते हैं, जरूरत है सिर्फ़ मानसिकता बदलने की…

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Nathuram Godse - Mahatma Gandhi - Asthi Kalash

Written by बुधवार, 20 फरवरी 2008 20:34

नाथूराम गोड़से का अस्थि-कलश विसर्जन अभी बाकी है…


गत 30 जनवरी को महात्मा गाँधी के अन्तिम ज्ञात (?) अस्थि कलश का विसर्जन किया गया। यह “अंतिम ज्ञात” शब्द कई लोगों को आश्चर्यजनक लगेगा, क्योंकि मानद राष्ट्रपिता के कितने अस्थि-कलश थे या हैं, यह अभी तक सरकार को नहीं पता। कहा जाता है कि एक और अस्थि-कलश बाकी है, जो कनाडा में पाया जाता है। बहरहाल, अस्थि-कलश का विसर्जन बड़े ही समारोहपूर्वक कर दिया गया, लेकिन इस सारे तामझाम के दौरान एक बात और याद आई कि पूना में नाथूराम गोड़से का अस्थि-कलश अभी भी रखा हुआ है, उनकी अन्तिम इच्छा पूरी होने के इन्तजार में।

फ़ाँसी दिये जाने से कुछ ही मिनट पहले नाथूराम गोड़से ने अपने भाई दत्तात्रय को हिदायत देते हुए कहा था, कि “मेरी अस्थियाँ पवित्र सिन्धु नदी में ही उस दिन प्रवाहित करना जब सिन्धु नदी एक स्वतन्त्र नदी के रूप में भारत के झंडे तले बहने लगे, भले ही इसमें कितने भी वर्ष लग जायें, कितनी ही पीढ़ियाँ जन्म लें, लेकिन तब तक मेरी अस्थियाँ विसर्जित न करना…”। नाथूराम गोड़से और नारायण आपटे के अन्तिम संस्कार के बाद उनकी राख उनके परिवार वालों को नहीं सौंपी गई थी। जेल अधिकारियों ने अस्थियों और राख से भरा मटका रेल्वे पुल के उपर से घग्गर नदी में फ़ेंक दिया था। दोपहर बाद में उन्हीं जेल कर्मचारियों में से किसी ने बाजार में जाकर यह बात एक दुकानदार को बताई, उस दुकानदार ने तत्काल यह खबर एक स्थानीय हिन्दू महासभा कार्यकर्ता इन्द्रसेन शर्मा तक पहुँचाई। इन्द्रसेन उस वक्त “द ट्रिब्यून” के कर्मचारी भी थे। शर्मा ने तत्काल दो महासभाईयों को साथ लिया और दुकानदार द्वारा बताई जगह पर पहुँचे। उन दिनों नदी में उस जगह सिर्फ़ छ्ह इंच गहरा ही पानी था, उन्होंने वह मटका वहाँ से सुरक्षित निकालकर स्थानीय कॉलेज के एक प्रोफ़ेसर ओमप्रकाश कोहल को सौंप दिया, जिन्होंने आगे उसे डॉ एलवी परांजपे को नाशिक ले जाकर सुपुर्द किया। उसके पश्चात वह अस्थि-कलश 1965 में नाथूराम गोड़से के छोटे भाई गोपाल गोड़से तक पहुँचा दिया गया, जब वे जेल से रिहा हुए। फ़िलहाल यह कलश पूना में उनके निवास पर उनकी अन्तिम इच्छा के मुताबिक सुरक्षित रखा हुआ है।

15 नवम्बर 1950 से आज तक प्रत्येक 15 नवम्बर को गोड़से का “शहीद दिवस” मनाया जाता है। सबसे पहले गोड़से और आपटे की तस्वीरों को अखंड भारत की तस्वीर के साथ रखकर फ़ूलमाला पहनाई जाती है। उसके पश्चात जितने वर्ष उनकी मृत्यु को हुए हैं उतने दीपक जलाये जाते हैं और आरती होती है। अन्त में उपस्थित सभी लोग यह सौगन्ध खाते हैं कि वे गोड़से के “अखंड हिन्दुस्तान” के सपने के लिये काम करते रहेंगे। गोपाल गोड़से अक्सर कहा करते थे कि यहूदियों को अपना राष्ट्र पाने के लिये 1600 वर्ष लगे, हर वर्ष वे कसम खाते थे कि “अगले वर्ष यरुशलम हमारा होगा…”

हालांकि यह एक छोटा सा कार्यक्रम होता है, और उपस्थितों की संख्या भी कम ही होती है, लेकिन गत कुछ वर्षों से गोड़से की विचारधारा के समर्थन में भारत में लोगों की संख्या बढ़ी है, जैसे-जैसे लोग नाथूराम और गाँधी के बारे में विस्तार से जानते हैं, उनमें गोड़से धीरे-धीरे एक “आइकॉन” बन रहे हैं। वीर सावरकर जो कि गोड़से और आपटे के राजनैतिक गुरु थे, के भतीजे विक्रम सावरकर कहते हैं, कि उस समय भी हम हिन्दू महासभा के आदर्शों को मानते थे, और “हमारा यह स्पष्ट मानना है कि गाँधी का वध किया जाना आवश्यक था…”, समाज का एक हिस्सा भी अब मानने लगा है कि नाथूराम का वह कृत्य एक हद तक सही था। हमारे साथ लोगों की सहानुभूति है, लेकिन अब भी लोग खुलकर सामने आने से डरते हैं…।

डर की वजह भी स्वाभाविक है, गाँधी की हत्या के बाद कांग्रेस के लोगों ने पूना में ब्राह्मणों पर भारी अत्याचार किये थे, कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने संगठित होकर लूट और दंगों को अंजाम दिया था, उस वक्त पूना पहली बार एक सप्ताह तक कर्फ़्यू के साये में रहा। बाद में कई लोगों को आरएसएस और हिन्दू महासभा का सदस्य होने के शक में जेलों में ठूंस दिया गया था (कांग्रेस की यह “महान” परम्परा इंदिरा हत्या के बाद दिल्ली में सिखों के साथ किये गये व्यवहार में भी दिखाई देती है)। गोपाल गोड़से की पत्नी श्रीमती सिन्धु गोड़से कहती हैं, “वे दिन बहुत बुरे और मुश्किल भरे थे, हमारा मकान लूट लिया गया, हमें अपमानित किया गया और कांग्रेसियों ने सभी ब्राह्मणों के साथ बहुत बुरा सलूक किया… शायद यही उनका गांधीवाद हो…”। सिन्धु जी से बाद में कई लोगों ने अपना नाम बदल लेने का आग्रह किया, लेकिन उन्होंने दृढ़ता से इन्कार कर दिया। “मैं गोड़से परिवार में ब्याही गई थी, अब मृत्यु पर्यन्त यही मेरा उपनाम होगा, मैं आज भी गर्व से कहती हूँ कि मैं नाथूराम की भाभी हूँ…”।

चम्पूताई आपटे की उम्र सिर्फ़ 14 वर्ष थी, जब उनका विवाह एक स्मार्ट और आकर्षक युवक “नाना” आपटे से हुआ था, 31 वर्ष की उम्र में वे विधवा हो गईं, और एक वर्ष पश्चात ही उनका एकमात्र पुत्र भी चल बसा। आज वे अपने पुश्तैनी मकान में रहती हैं, पति की याद के तौर पर उनके पास आपटे का एक फ़ोटो है और मंगलसूत्र जो वे सतत पहने रहती हैं, क्योंकि नाना आपटे ने जाते वक्त कहा था कि “कभी विधवा की तरह मत रहना…”, वह राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानतीं, उन्हें सिर्फ़ इतना ही मालूम है गाँधी की हत्या में शरीक होने के कारण उनके पति को मुम्बई में हिरासत में लिया गया था। वे कहती हैं कि “किस बात का गुस्सा या निराशा? मैं अपना जीवन गर्व से जी रही हूँ, मेरे पति ने देश के लिये बलिदान दिया था।

12 जनवरी 1948 को जैसे ही अखबारों के टेलीप्रिंटरों पर यह समाचार आने लगा कि पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने के लिये सरकार पर दबाव बनाने हेतु गाँधी अनशन पर बैठने वाले हैं, उसी वक्त गोड़से और आपटे ने यह तय कर लिया था कि अब गाँधी का वध करना ही है… इसके पहले नोआखाली में हिन्दुओं के नरसंहार के कारण वे पहले से ही क्षुब्ध और आक्रोशित थे। ये दोनों, दिगम्बर बड़गे (जिसे पिस्तौल चलाना आता था), मदनलाल पाहवा (जो पंजाब का एक शरणार्थी था) और विष्णु करकरे (जो अहमदनगर में एक होटल व्यवसायी था), के सम्पर्क में आये।

पहले इन्होंने गांधी वध के लिये 20 जनवरी का दिन तय किया था, गोड़से ने अपनी इंश्योरेंस पॉलिसी में बदलाव किये, एक बार बिरला हाऊस जाकर उन्होंने माहौल का जायजा लिया, पिस्तौल को एक जंगल में चलाकर देख लिया, लेकिन उनके दुर्भाग्य से उस दिन बम तो बराबर फ़ूटा, लेकिन पिस्तौल न चल सकी। मदनलाल पाहवा पकड़े गये (और यदि दिल्ली पुलिस और मुम्बई पुलिस में बराबर तालमेल और खुफ़िया सूचनाओं का लेनदेन होता तो उसी दिन इनके षडयन्त्र का भंडाफ़ोड़ हो गया होता)। बाकी लोग भागकर वापस मुम्बई आ गये, लेकिन जब तय कर ही लिया था कि यह काम होना ही है, तो तत्काल दूसरी ईटालियन मेड 9 एमएम बेरेटा पिस्तौल की व्यवस्था 27 जनवरी को ग्वालियर से की गई। दिल्ली वापस आने के बाद वे लोग रेल्वे के रिटायरिंग रूम में रुके। शाम को आपटे और करकरे ने चांदनी चौक में फ़िल्म देखी और अपना फ़ोटो खिंचवाया, बिरला मन्दिर के पीछे स्थित रिज पर उन्होंने एक बार फ़िर पिस्तौल को चलाकर देखा, वह बेहतरीन काम कर रही थी।

गाँधी वध के पश्चात उस समय समूची भीड़ में एक ही स्थिर दिमाग वाला व्यक्ति था, नाथूराम गोड़से। गिरफ़्तार होने के पश्चात गोड़से ने डॉक्टर से उसे एक सामान्य व्यवहार वाला और शांत दिमाग होने का सर्टिफ़िकेट माँगा, जो उसे मिला भी। बाद में जब अदालत में गोड़से की पूरी गवाही सुनी जा रही थी, पुरुषों के बाजू फ़ड़क रहे थे, और स्त्रियों की आँखों में आँसू थे।

बहरहाल, पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करने और टुकड़े-टुकड़े करके भारत में मिलाने हेतु कई समूह चुपचाप काम कर रहे हैं, उनका मानना है कि इसके लिये साम-दाम-दण्ड-भेद हरेक नीति अपनानी चाहिये। जिस तरह सिर्फ़ साठ वर्षों में एक रणनीति के तहत कांग्रेस, जिसका पूरे देश में कभी एक समय राज्य था, आज सिमट कर कुछ ही राज्यों में रह गई है, उसी प्रकार पाकिस्तान भी एक न एक दिन टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जायेगा और उसे अन्ततः भारत में मिलना होगा, और तब गोड़से का अस्थि विसर्जन किया जायेगा।
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डिस्क्लेमर : यह लेख सिर्फ़ जानकारी के लिये है, फ़ोकटिया बुद्धिजीवी बहस में उलझने का मेरा कोई इरादा नहीं है और मेरे पास समय भी नहीं है। डिस्क्लेमर देना इसलिये जरूरी था कि बाल की खाल निकालने में माहिर कथित बुद्धिजीवी इस लेख का गलत मतलब निकाले बिना नहीं रहेंगे।

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Sonia Gandhi Only Wins Never Loses

आखिरकार लम्बी उहापोह के बाद पेट्रोल-डीजल के भाव बढ़ाये गये। सुनते-सुनते कान पक गये थे कि अब भाव बढ़ेंगे, फ़िर कहा जाता कि नहीं बढ़ेंगे, फ़िर मंत्रिमंडल विचार कर रहा है, फ़िर कैबिनेट की समिति के सामने मामला रखा गया आदि-आदि। इस सारे खेल-तमाशे में कांग्रेस के चारण-भाट-चमचों-भांडों ने इसमें भी अपनी महारानी के गुणगान करने और उनकी छवि चमकाने में कसर बाकी नहीं रखी। जब पेट्रोल के भाव बढ़े तो “बबुआ” प्रधानमंत्री को आगे कर दिया जाता है वामपंथियों का गुस्सा झेलने के लिये, लेकिन जब भाव नहीं बढ़ाये जाते तो वह सोनिया की गरीब समर्थक (?) नीतियों के कारण, यदि पेट्रोल के भाव अब तक नहीं बढ़े थे तो सिर्फ़ इसलिये कि सोनिया ने इसकी इजाजत नहीं दी थी, इसे कहते हैं छवि चमकाने की चमचागिरी। ये तो उनका हम पर अहसान भी है कि पहले वे पेट्रोल का भाव चार रुपये बढ़ातीं और फ़िर जनभावना(?) की कद्र करते हुए एक रुपया कम कर देतीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, अब वामपंथी तोपों के आगे मनमोहन सिंह को खड़ा कर दिया गया है।

महारानी कभी पत्रकार वार्ता नहीं आयोजित करतीं, सिर्फ़ अपने महल (10 जनपथ) से एक बयान जारी करती हैं, जिसे पत्रकारों पर अहसान माना जाना चाहिये। महारानी जी कभी किसी पत्रकार को व्यक्तिगत इंटरव्यू भी नहीं देतीं, यदि देती भी हैं तो ऐसे, जैसे “टुकड़ा” डाला जाता है, लेकिन मजे की बात तो यह है कि फ़िर भी वे मीडिया की प्रिय बनी हुई हैं, ऐसा क्यों? यह एक रहस्य है। जरा याद कीजिये हाल ही में सम्पन्न गुजरात चुनावों को… किसी भी चुनाव में दो मुख्य पार्टियाँ होती हैं और गुजरात में कांग्रेस-भाजपा का मुकाबला नहीं था, असली और सीधा मुकाबला था मोदी और सोनिया का। सोनिया गाँधी ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया, उनके लाड़ले ने कथित “रोड शो” किये, साम्प्रदायिकता का कार्ड खेला, लेकिन सब कुछ बेकार। गुजरात में कांग्रेस ने जमकर जूते खा लिये।

यहाँ तक तो चलो ठीक है कोई हारे, कोई जीते, लेकिन अब आगे देखिये, हमारे बिके हुए और धर्मनिरपेक्ष(?) मीडिया ने जीत का विश्लेषण इस बात से करना शुरु किया कि गुजरात चुनावों में मोदी जीते, कि केशुभाई हारे, राजनाथ सिंह का कद छोटा हुआ कि मोदी का कद बड़ा हुआ, आडवाणी जीते या वाजपेयी आदि-आदि बकवास, यानी महारानी सीधे “पिक्चर” से ही गायब। जब भी कोई टीम हारती है तो कप्तान आगे आकर जिम्मेदारी लेता है और प्रेस का सामना करता है, लेकिन गुजरात चुनाव के नतीजों के बाद सात रेसकोर्स पर सन्नाटा छा गया था, राहुल बाबा अपने दोस्तों के साथ अदृश्य हो गये थे, कांग्रेस कार्यालय पर कौवे उड़ रहे थे, सोनिया-राहुल कोई भी उस दिन कांग्रेस कार्यालय नहीं गया, पत्रकारों को यहाँ-वहाँ भगाया जा रहा था।

एक-दो दिन के बाद कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी को एक “बलि का बकरा” मिला, वह थे गुजरात प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हरिप्रसाद सोलंकी!! बेचारे सोलंकी ने मिमियाते हुए प्रेस से कहा कि वे गुजरात की हार की जिम्मेदारी लेते हैं, साथ ही एक ज्ञान की बात भी उन्होंने बताई कि चूँकि गुजरात में भाजपा की सीटें पिछले चुनाव से कम हुई हैं इसलिये यह जीत भाजपा की नही, मोदी की है। जबकि सोनिया गाँधी ने जिन 13 विधानसभा क्षेत्रों में विशाल(?) आमसभायें की थीं उनमें से 8में कांग्रेस हार गई, लेकिन भला कोई फ़ड़तूस सा पत्रकार भी महारानी से इस सम्बन्ध में सवाल-जवाब कर सकता है? नहीं। अब यदि एक मिनट के लिये मान लें कि कांग्रेस गुजरात में जीत जाती तो क्या होता, अरे साहब मत पूछिये, सोनिया की वो जयजयकार होती कि आसमान छोटा पड़ जाता, उस हो-हल्ले में हरिप्रसाद सोलंकी नाम के जीव को सोनिया के पास तो क्या मंच पर भी जगह नहीं मिलती। धर्मनिरपेक्षता (?) की जीत का ऐसा डंका बजाया जाता कि आपकी कनपटी सुन्न हो जाती।

सोनिया हरेक योजना के मुख्य पृष्ठ पर होती हैं, हरेक कार्यक्रम वही शुरु करती हैं, चीन, जर्मनी के शासनाध्यक्षों से वही मिलती हैं, लेकिन भाजपा मनमोहन को “बबुआ प्रधानमंत्री” कहे तो उन्हें बुरा लगता है… तो एक बात आप सब लोग कान खोलकर, आँखे फ़ाड़कर स्वीकार कर लीजिये, कि इस देश में जो भी अच्छा काम हो रहा है, चाहे वह ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना हो या सूचना का अधिकार सभी सोनिया की मेहरबानी से मिल रहा है, और जो महंगाई और आतंकवाद बढ़ रहा है उसके जिम्मेदार मनमोहन सिंह और शिवराज पाटिल (नाम सुना हुआ सा लगता है ना) नाम के गृहमन्त्री हैं, जाहिर है कि महारानी को सिर्फ़ जीतने की आदत है, हारने की नहीं… चारण-भाट-भांड-चमचे-ढोल-मंजीरे जिन्दाबाद !!!


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