Rise of Narendra Modi Phenomena... (Part - 3)

Written by बुधवार, 31 अक्टूबर 2012 11:33

 नरेन्द्र मोदी "प्रवृत्ति" का उदभव एवं विकास… (भाग-3)


जैसा कि हमने पिछले भागों में देखा, “सेकुलरिज़्म” और “मुस्लिम वोट बैंक प्रेम” के नाम पर शाहबानो, रूबिया सईद और मस्त गुल जैसे तीन बड़े-बड़े घाव 1984 से 1996 के बीच विभिन्न सरकारों ने भारत की जनता (विशेषकर हिन्दुओं) के दिल पर दिए

(पिछला भाग पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें… http://blog.sureshchiplunkar.com/2012/10/rise-of-narendra-modi-phenomenon-part-2.html

नरसिंहराव की सरकार ने (कभी भाजपा के समर्थन से, तो कभी झारखण्ड के सांसदों को खरीदकर) जैसे-तैसे अपना कार्यकाल पूरा किया, लेकिन आर्थिक सुधारों को देश की जनता नहीं पचा पाई, जिस वजह से नरसिंहराव बेहद अलोकप्रिय हो गए थे। साथ ही इस बीच अर्जुन सिंह, एनडी तिवारी और शरद पवार द्वारा अपने-अपने कारणों से विभिन्न क्षेत्रीय पार्टियाँ बनाने से कांग्रेस और कमजोर हो गई थी। मुस्लिम और दलित वोटों के सहारे सत्ता की चाभी की सुगंध मिलने और किसी को भी पूर्ण बहुमत न मिलता देखकर गठबंधन सरकारों के इस दौर में एक तीसरे मोर्चे का जन्म हुआ, जिसमें मुलायम सिंह, चन्द्रबाबू नायडू, जनता दल और वामपंथी शामिल थे।

1996 के आम चुनावों में जनता ने कांग्रेस को पूरी तरह ठुकरा दिया था, लेकिन पूर्ण बहुमत किसी को भी नहीं दिया था, भाजपा 161 सीटें लेकर पहले नम्बर पर रही, जबकि कांग्रेस को 140 और नेशनल फ़्रण्ट को 79 सीटें मिलीं। जनता दल, वामपंथ और कांग्रेस के भारी “सेकुलर” विरोध के बीच ब्रिटेन की वेस्टमिंस्टर पद्धति का पालन करते हुए राष्ट्रपति शर्मा ने वाजपेयी जी को सरकार बनाने का न्यौता दिया और उनसे 2 सप्ताह में संसद में अपना बहुमत साबित करने को कहा। परन्तु “सेकुलरिज़्म” के नाम पर जिस “गिरोह” की बात मैंने पहले कही, वह 1996 से ही शुरु हुई। 13 दिनों तक सतत प्रयासों, चर्चाओं के बावजूद वाजपेयी अन्य पार्टियों को यह समझाने में विफ़ल रहे कि जनता ने कांग्रेस के खिलाफ़ जनमत दिया है, इसलिए हमें (यानी भाजपा और नेशनल फ़्रण्ट को) आपस में मिलजुलकर काम करना चाहिए, ताकि कांग्रेस की सत्ता में वापसी न हो सके।

भाजपा और अटल जी “भलमनसाहत” के इस मुगालते में रहे कि जब भाजपा ने 1989 में वीपी सिंह को समर्थन दिया है, और देशहित में नरसिंहराव की सरकार को भी गिरने नहीं दिया, तो संभवतः कांग्रेस विरोध के नाम पर अन्य क्षेत्रीय पार्टियाँ अटल सरकार बनवाने पर राजी हो जाएं, फ़िर साथ में अटलबिहारी वाजपेयी की स्वच्छ छवि भी थी। परन्तु मुस्लिम वोटरों के भय तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से की जाने वाले “घृणा” ने इस देश पर एक बार पुनः अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस का ही शासन थोप दिया। अर्थात 13 दिन के बाद वाजपेयी जी ने संसद में स्वीकार किया कि वे अपने समर्थन में 200 से अधिक सांसद नहीं जुटा पाए हैं इसलिए बगैर वोटिंग के ही उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। इस तरह “सेकुलरिज़्म” के नाम पर एक गिरोह बनाकर तथा जनता द्वारा कांग्रेस को नकारने के बावजूद देश की पहली भाजपा सरकार की भ्रूण-हत्या मिलजुलकर की गई। इस “सेक्यूलर गिरोहबाजी” ने हिन्दू वोटरों के मन में एक और कड़वाहट भर दी। उसने अपने-आपको छला हुआ महसूस किया, और अंततः देवेगौड़ा के रूप में कांग्रेस का अप्रत्यक्ष शासन और टूटी-फ़ूटी, लंगड़ी सरकार देश के पल्ले पड़ी, जिसे कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया हुआ था।

ऐसा नहीं कि कांग्रेस के बाहरी समर्थन का अर्थ नेशनल फ़्रण्ट वाले नहीं जानते थे, परन्तु सत्ता के मोह तथा “मुस्लिम वोटों के लालच में भाजपा के कटु विरोध” ने उन्हें इस बात पर मजबूर कर दिया कि वे बाहर से समर्थन दे रही कांग्रेस की चिरौरी और दया पर निर्भर रहें। उन्हें कांग्रेस के हाथों जलील होना मंजूर था, लेकिन भाजपा का साथ देकर गैर-कांग्रेसी सरकार बनाना मंजूर नहीं था। इस कथित नेशनल फ़्रण्ट का पाखण्ड तो पहले दिन से ही इसलिए उजागर हो गया था, क्योंकि इसमें शामिल अधिकांश दल अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस के खिलाफ़ ही चुनाव लड़कर व जीतकर आए थे, चाहे वे मुलायम हों, लालू हों, नायडू हों या करुणानिधि हों… इनमें से (मुलायम को छोड़कर) किसी की भी भाजपा से कहीं भी सीधी टक्कर या दुश्मनी नहीं थी। लेकिन फ़िर भी प्रत्येक दल की निगाह इस देश के 16% मुसलमान वोटरों पर थी, जिसके लिए वे भाजपा को खलनायक के रूप में पेश करने में कोई कोताही नहीं बरतना चाहते थे।

देवेगौड़ा के नेतृत्व में चल रही इस “भानुमति के सेकुलर कुनबेनुमा” सरकार के आपसी अन्तर्विरोध ही इतने अधिक थे कि कांग्रेस को यह सरकार गिराने के लिए कोई खास मशक्कत नहीं करनी पड़ी और सिर्फ़ 18 माह में देवेगौड़ा की विदाई तय हो गई। कांग्रेस ने देवेगौड़ा पर उनसे “महत्वपूर्ण मामलों में सलाह न लेने” और “कांग्रेस को दरकिनार करने” का आरोप लगाते हुए, देवेगौड़ा को बाहर का दरवाजा दिखा दिया। चूंकि सेकुलरिज़्म के नाम पर बनी इस नकारात्मक यूनाइटेड फ़्रण्ट में “आत्मसम्मान” नाम की कोई चीज़ तो थी नहीं, इसलिए उन्होंने देवेगौड़ा के अपमान को कतई महत्व न देते हुए, आईके गुजराल नामक एक और गैर-जनाधारी नेता को प्रधानमंत्री बनाकर सरकार को कुछ और समय के लिए घसीट लिया। इस बीच भाजपा ने अपना जनाधार मजबूत बनाए रखा, तथा विभिन्न राज्यों में गाहे-बगाहे उसकी सरकारें बनती रहीं। एक नौकरशाह आईके गुजराल की सरकार भी कांग्रेस की दया पर ही थी, सो कांग्रेस उनकी सरकार के नीचे से आसन खींचने के लिए सही समय का इंतज़ार कर रही थी।


वास्तव में इन क्षेत्रीय दलों को भाजपा की बढ़ती शक्ति का भय सता रहा था। वे देख रहे थे कि किस तरह 1984 में 2 सीटों पर सिमट चुकी पार्टी सिर्फ़ 12-13 साल में ही 160 तक पहुँच गई थी, इसलिए उन्हें अपने मान-सम्मान से ज्यादा, भाजपा को किसी भी तरह सत्ता में आने से रोकना और मुसलमानों को खुश करना जरूरी लगा। विडम्बना यह थी कि लगभग इसी नेशनल फ़्रण्ट की वीपी सिंह सरकार को भाजपा ने कांग्रेस विरोध के नाम पर अपना समर्थन दिया था, ताकि कांग्रेस सत्ता से बाहर रहे… लेकिन जब 1996 में भाजपा की 160 सीटें आ गईं तब इन्हीं क्षेत्रीय दलों ने (जो आए दिन गैर-कांग्रेसवाद का नारा बुलन्द करते थे) अपना “गिरोह” बनाकर भाजपा को “अछूत” की श्रेणी में डाल दिया और उसी कांग्रेस के साथ हो लिए, जिसके खिलाफ़ जनमत साफ़ दिखाई दे रहा था…। ऐसे में जिन हिन्दुओं ने भाजपा की सरकार बनने की चाहत में अपना वोट दिया था, उसने इस “सेकुलर गिरोहबाजी” को देखकर अपने मन में एक कड़वी गाँठ बाँध ली…

आईके गुजराल सरकार को न तो लम्बे समय तक चलना था और न ही वह चली। चूंकि कांग्रेस का इतिहास रहा है कि वह गठबंधन सरकारों को अधिक समय तक बाहर से टिकाए नहीं रख सकती, इसलिए गुजराल को गिराने का बहाना ढूँढा जा रहा था। हालांकि गुजराल एक नौकरशाह होने के नाते कांग्रेस से मधुर सम्बन्ध बनाए रखे थे, लेकिन उनकी सरकार में मौजूद अन्य दल उन्हें गाहे-बगाहे ब्लैकमेल करते रहते थे। ऐसा ही एक मौका आया जब चारा घोटाले में सीबीआई ने लालू के खिलाफ़ मुकदमा चलाने की अनुमति माँगते हुए बिहार के राज्यपाल किदवई के सामने आवेदन दे दिया। गुजराल ने इस प्रस्ताव को हरी झण्डी दे दी, बस फ़िर क्या था लालू की कुर्सी छिन गई और वह बुरी तरह बिफ़र गए…। लालू ने जनता दल को तोड़कर अपना राष्ट्रीय जनता दल बना लिया, लेकिन फ़िर भी वे सत्ता से चिपके ही रहे और गुजराल सरकार को समर्थन देते रहे (ज़ाहिर है कि “सेकुलरिज़्म” के नाम पर…)। परन्तु लालू का दबाव सरकार पर बना रहा और गुजराल साहब को सीबीआई के निदेशक जोगिन्दर सिंह का तबादला करना ही पड़ा। इस सारी “सेकुलर नौटंकी” को हिन्दू वोटर लगातार ध्यान से देख रहा था। 
      11 माह बाद आखिर वह मौका भी आया जब कांग्रेस को लगा कि यह सरकार गिरा देना चाहिए। एक आयोग द्वारा DMK के मंत्रियों को, राजीव गाँधी की हत्या में दोषी LTTE से सम्बन्ध रखने की टिप्पणी की थी। बस इसको लेकर कांग्रेस ने बवाल खड़ा कर दिया, सरकार में से “राजीव गाँधी के हत्यारों से सम्बन्ध रखने वाले” DMK को हटाने की माँग को लेकर कांग्रेस ने गुजराल सरकार गिरा दी। बेशर्मी की इंतेहा यह है कि इसी “लिट्टे समर्थक” DMK के साथ यूपीए-1 और यूपीए-2 सरकार चलाने तथा ए राजा के साथ मिल-बाँटकर 2G लूट खाने में कांग्रेस को जरा भी हिचक महसूस नहीं हुई, परन्तु जैसा कि हमेशा से होता आया है, बुद्धिजीवियों द्वारा “नैतिकता” और “राजनैतिक शुचिता” के सम्बन्ध में सारे के सारे उपदेश और नसीहतें हमेशा सिर्फ़ भाजपा को ही दी जाती रही हैं, जबकि कांग्रेस-DMK का साथ “सेकुलरिज़्म” नामक थोथी अवधारणा पर टिका रहा… किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया। 
      बहरहाल, देवेगौड़ा और उसके बाद गुजराल सरकार भी गिरी और कांग्रेस की सत्ता लालसा में देश को 1998 में पुनः आम चुनाव में झोंका गया। 1998 तक भाजपा का “कोर हिन्दू वोटर” न सिर्फ़ उसके साथ बना रहा, बल्कि उसमें निरन्तर धीमी प्रगति ही होती रही। 1998 के चुनावों में भी हिन्दू वोटरों ने पुनः अपनी ताकत दिखाई और भाजपा को 182 सीटों पर ले गए, जबकि कांग्रेस सिर्फ़ 144 सीटों पर सिमट गई। चूंकि कांग्रेस की गद्दारी और सत्ता-पिपासा क्षेत्रीय दल देख चुके थे और 182 सीटें जीतने के बाद उनके सामने कोई और विकल्प था भी नहीं… इसलिए अंततः “सेकुलरिज़्म” की परिभाषा में सुविधाजनक फ़ेरबदल करते हुए “NDA” का जन्म हुआ। (क्षेत्रीय दलों को आडवाणी के नाम पर सबसे अधिक आपत्ति थी, वे वाजपेयी के नाम पर सहमत होने को तैयार हुए… शायद यही रवैया आडवाणी की राजनीति को बदलने वाला, अर्थात जिन्ना की मजार पर जाने जैसे कदम उठाने का कारण बना…)  हालांकि “कोर हिन्दू वोटर” ने अपना वोट आडवाणी की रथयात्रा और उनकी साफ़ छवि एवं कट्टर हिन्दुत्व को देखते हुए उन्हीं के नाम पर दिया था, लेकिन ऐन मौके पर क्षेत्रीय दलों की मदद से अटलबिहारी वाजपेयी ने पुनः देश की कमान संभाली, जिससे हिन्दू वोटर एक बार फ़िर ठगा गया…। इन क्षेत्रीय दलों को जो भी प्रमुख पार्टी सत्ता के नज़दीक दिखती है उसे वे सेक्यूलर ही मान लेते हैं, ऐसा ही हुआ, और 13 महीने तक अटल जी की सरकार निर्बाध चली।
13 महीने के बाद देश, भाजपा और हिन्दू वोटरों ने एक बार फ़िर से क्षेत्रीय दलों के स्थानीय हितों और देश की प्रमुख समस्याओं के प्रति उदासीनता के साथ-साथ “सेकुलरिज़्म” का घृणित स्वरूप देखा। हुआ यह कि, केन्द्र की वाजपेयी सरकार को समर्थन दे रहीं जयललिता को किसी भी सूरत में तमिलनाडु की सत्ता चाहिए थी, वह लगातार वाजपेयी पर तमिलनाडु की DMK सरकार को बर्खास्त करने का दबाव बनाती रहीं, लेकिन देश के संघीय ढाँचे का सम्मान करते हुए तथा धारा 356 के उपयोग के खिलाफ़ होने की वजह से वाजपेयी ने जयललिता को समझाने की बहुत कोशिश की, कि DMK सरकार को बर्खास्त करना उचित नहीं होगा, लेकिन जयललिता को देश से ज्यादा तमिलनाडु की राजनीति की चिंता थी, सो वे अड़ी रहीं…। अंततः 13 माह पश्चात जयललिता के सब्र का बाँध टूट गया और उन्होंने अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा पर वाजपेयी सरकार की बलि लेने का फ़ैसला कर ही लिया… 


वाजपेयी सरकार ने प्रमोद महाजन की “हिकमत” और चालबाजी तथा क्षेत्रीय दलों की सत्ता-लोलुपता के सहारे संसद में बहुमत जुटाने का कांग्रेसी खेल खेलने का फ़ैसला किया, लेकिन सारी कोशिशों के बावजूद “सिर्फ़ 1 वोट” से सरकार गिर गई। संसद में वोटिंग के दौरान सभी दलों की साँसे संसद के अन्दर ऊपर-नीचे हो रही थीं, जबकि संसद के बाहर पूरा देश साँस रोककर देख रहा था कि वाजपेयी सरकार बचती है या नहीं। क्योंकि भले ही हिन्दू वोटर आडवाणी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते थे, लेकिन “हालात से समझौता” करने के बाद उनकी भावनाएं वाजपेयी सरकार से भी जुड़ चुकी थीं। वास्तव में विश्वास प्रस्ताव के खिलाफ़ दो वोट विवादास्पद थे, जहाँ वाजपेयी सरकार अपनी चालबाजी नहीं दिखा सकी। पहला वोट वह था, जिस वोट से सरकार गिरी, वह भी एक “सेकुलर” वोट ही था, जिसे नेशनल कांफ़्रेंस के सैफ़ुद्दीन सोज़ ने सरकार के खिलाफ़ डाला था। इस पहले सेकुलर वोट की कहानी भी बड़ी “मजेदार”(?) है… हुआ यूँ कि नेशनल कांफ़्रेंस ने विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में वोट देने का फ़ैसला किया था, जिसकी वजह से वाजपेयी सरकार उस तरफ़ से निश्चिंत थी। लेकिन अन्तिम समय पर सैफ़ुद्दीन सोज़ के भीतर का “सेकुलर राक्षस” जाग उठा और पिछले 13 महीने से जो वाजपेयी सरकार “साम्प्रदायिक” नहीं थी, वह उन्हें अचानक “साम्प्रदायिक” नज़र आने लगी। सैफ़ुद्दीन सोज़ ने वीपी सिंह को लन्दन में फ़ोन लगाया, जहाँ वह “डायलिसिस” की सुविधा ग्रहण कर रहे थे। जी हाँ, वही “राजा हरिश्चन्द्र छाप” वीपी सिंह, जिन्हें भाजपा से समर्थन लेकर दो साल तक अपनी सरकार चलाने में जरा भी शर्म या झिझक महसूस नहीं हुई थी, उन्होंने सैफ़ुद्दीन सोज़ को “कूटनीतिक सलाह” दे मारी, कि अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर वोटिंग करो… और अंतरात्मा की आवाज़ तो ज़ाहिर है कि “सेकुलरिज़्म का राक्षस” जाग उठने के बाद भाजपा के खिलाफ़ हो ही गई थी… तो सैफ़ुद्दीन सोज़ ने अपनी पार्टी लाइन तोड़ते हुए वाजपेयी सरकार के खिलाफ़ वोट दे दिया, जिससे सरकार गिरी। 
दूसरा सेकुलर वोट था, उड़ीसा के तत्कालीन मुख्यमंत्री गिरधर गमांग का, “मुख्यमंत्री” और लोकसभा में??? जी हाँ, जब एक-एक वोट के लिए मारामारी मची हो तब व्हील चेयर पर बैठे हुए सांसदों तक को उठाकर संसद में लाया गया था, ऐसे में भला कांग्रेस कैसे पीछे रहती? एक तकनीकी बिन्दु को मुद्दा बनाया गया कि, “चूंकि गिरधर गमांग भले ही उड़ीसा के मुख्यमंत्री हों, लेकिन उन्होंने इस बीच संसद की सदस्यता से इस्तीफ़ा नहीं दिया है, इसलिए तकनीकी रूप से वह लोकसभा के सदस्य हैं, और इसलिए वह यहाँ वोट दे सकते हैं…”, जबकि नैतिकता यह कहती थी कि गमांग पहले मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देकर ही वोट डाल सकते थे, लेकिन “नैतिकता” और कांग्रेस का हमेशा ही छत्तीस का आँकड़ा रहा है, इसलिए इस कानूनी नुक्ते का सहारा लेकर गिरधर गमांग ने भी सरकार के खिलाफ़ वोट डाला। ऐसी विकट परिस्थिति में लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका हमेशा बहुत महत्वपूर्ण होती है, उस समय लोकसभा अध्यक्ष थे तेलुगू देसम के श्री जीएमसी बालयोगी, जो कि संसद की चालबाजियों, कानूनी दाँवपेंचों से दूर एक आदर्शवादी युवा सांसद थे। इसलिए उन्होंने न तो सैफ़ुद्दीन सोज़ को पार्टी व्हिप का उल्लंघन करके वोट डालने पर उनका वोट खारिज किया, और न ही गिरधर गमांग का वोट इस कमजोर तकनीकी बिन्दु के आधार पर खारिज किया… बालयोगी ने दोनों ही सांसदों के वोटों को मान्यता प्रदान कर दी, इसलिए कहा जा सकता है कि जयललिता द्वारा समर्थन वापस लेने के बावजूद, 13 माह तक चली इस वाजपेयी सरकार के “सिर्फ़ एक वोट” से गिर जाने के पीछे सैफ़ुद्दीन सोज़ (यानी वीपी सिंह की सलाह) और गिरधर गमांग (मुख्यमंत्री भी, सांसद भी) का हाथ रहा…
इस तरह एक बार फ़िर से हिन्दू वोटरों की यह इच्छा कि इस देश में कोई गैर-कांग्रेसी सरकार अपना एक कार्यकाल पूरा करे, “सेकुलरिज़्म” के नाम पर धरी की धरी रह गई। संसद में विश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान हिन्दू वोटरों ने “सेकुलरिज़्म” के नाम पर क्षेत्रीय दलों द्वारा की जा रही “नौटंकी” और “दोगलेपन” को साफ़-साफ़ देखा (ध्यान दीजिए, कि यह सारी घटनाएं नरेन्द्र मोदी के प्रादुर्भाव से पहले की हैं… यानी तब भी संघ-भाजपा-भगवा के प्रति इनके मन में घृणा भरी हुई थी)। हिन्दू वोटरों ने महसूस किया कि कभी अपनी सुविधानुसार, कभी सत्ता के गणित के अनुसार तो कभी पूरी बेशर्मी से जब मन चाहे तब भाजपा को वे कभी साम्प्रदायिक तो कभी सेकुलर मानते रहते थे। अपनी परिभाषा बदलते रहते थे… “सेकुलरिज़्म” के इस विद्रूप प्रदर्शन को हमने बाद के वर्षों में भी देखा, जब नेशनल कांफ़्रेंस, तृणमूल कांग्रेस, जनता दल जैसे कई “मेँढक” कभी भाजपा के साथ तो कभी कांग्रेस के साथ सत्ता का मजा चखते रहे। जब वे भाजपा के साथ होते तब वे कांग्रेस की निगाह में “साम्प्रदायिक” होते थे, लेकिन जैसे ही वे कांग्रेस के साथ होते थे, तो अचानक “सेकुलर” बन जाते थे। यह घटियापन सिर्फ़ पार्टियों तक ही सीमित नहीं रहा, व्यक्तियों तक चला गया, और हमने देखा कि किस तरह संजय निरुपम कांग्रेस में आते ही “सेकुलर” बन गए, और छगन भुजबल NCP में आते ही “सेकुलरिज़्म” के पुरोधा बन गए…। हिन्दू वोटर अपने मन में यह सारी कड़वाहट पीता जा रहा था, और अन्दर ही अन्दर सेकुलरिज़्म के इस दोगले रवैये के खिलाफ़ कट्टर बनता जा रहा था…      
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अगले भाग में हम 1999 के चुनाव से आगे बात करेंगे… 

अगला भाग पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें... (http://blog.sureshchiplunkar.com/2012/11/narendra-modi-increasing-phenomenon.html

Rise of Narendra Modi Phenomenon... (Part-2)

Written by गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012 21:01

नरेन्द्र मोदी “प्रवृत्ति” का उदभव एवं विकास… (भाग-2)

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मित्रों… पिछले भाग में हमने देखा कि किस तरह से – राजीव गाँधी सरकार शाहबानो मामले में इस्लामी कट्टरपंथियों के सामने झुकी और उसने सुप्रीम कोर्ट को ताक पर रखा… फ़िर वीपी सिंह की मण्डलवादी राजनीति और मुफ़्ती सईद द्वारा आतंकवादियों को छोड़ने की “परम्परा” शुरु करने जैसे शर्मनाक वाकये सामने आए… फ़िर “सांसदों को खरीदने” की नीति, लेकिन “देश के संसाधन बेचने” की नीति को आगे बढ़ाने वाले नरसिंहराव आए… इस तरह हम 1996 के चुनावों तक पहुँच चुके हैं…। (यहाँ पढ़ें… http://blog.sureshchiplunkar.com/2012/10/rise-of-narendra-modi-phenomenon-part-1.html) अब आगे…
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1996 के चुनावों पर बात करने से पहले नरसिंहराव सरकार के कार्यकाल की एक घटना का उल्लेख करना जरूरी है। यह घटना घटी थी कश्मीर की प्रसिद्ध चरार-ए-शरीफ़ दरगाह में 1994 के अंत में मस्त गुल नाम के आतंकवादी ने अपने कई साथियों के साथ कश्मीर की प्रसिद्ध चरार-ए-शरीफ़ दरगाह पर कब्जा जमा लिया था। हालांकि कश्मीर में हमारे सुरक्षा बलों को इसकी भनक लग चुकी थी, लेकिन कड़ाके की सर्दी और बर्फ़बारी तथा कश्मीर में उसे हासिल स्थानीय मदद के कारण मस्त गुल उस दरगाह में घुसने में कामयाब हो गया था। बस… इसके बाद भारत सरकार और आतंकवादियों के बीच चूहे-बिल्ली का थकाने वाला खेल शुरु हुआ। हमारी सेना आसानी से हमला करके दरगाह में घुसे बैठे चूहों को मार गिराती, परन्तु हमारे देश के राजनैतिक नेतृत्व और मीडिया ने हमेशा ही पुलिस और सैन्य बलों का मनोबल गिराने का काम किया है। जो “राष्ट्रीय शर्म”, 1990 में रूबिया सईद के अपहरण के बदले पाँच खूँखार आतंकवादियों को छोड़ने पर हमने झेली थी,  ठीक वैसा ही इस घटना में भी हुआ…


लगभग दो महीने तक हमारे सुरक्षा बलों ने दरगाह पर घेरा डाले रखा, आतंकवादियों को खाना-पानी के तरसा दिया, ताकि वे दरगाह छोड़कर बाहर आएं, लेकिन नरसिंहराव सरकार उन आतंकवादियों के सामने गिड़गिड़ाती भर रही, इन आतंकवादियों को बिरयानी, चिकन और पुलाव की दावतें दी गईं। समूचे विश्व के सामने हमारी खिल्ली उड़ती रही, भारत का “पिलपिला” थोबड़ा लगातार दूसरी बार विश्व के सामने आ चुका था…। आज 17 साल बाद भी यह स्पष्ट नहीं है कि इस घटना में आतंकवादी थक गए थे, या सरकार ने उनके साथ कोई गुप्त समझौता किया था, परन्तु जाते-जाते मस्त गुल और उसके साथियों ने लकड़ी से निर्मित शानदार वास्तुकला के नमूने “चरार-ए-शरीफ़” को आग के हवाले कर दिया। सेना मुँह देखती रह गई और सरकार व कश्मीर के स्थानीय “शांतिदूतों” की मदद से मस्त गुल पाकिस्तान भागने में सफ़ल रहा, जहाँ उसका स्वागत “इस्लाम के एक हीरो” के रूप में हुआ। रॉ और आईबी के अधिकारियों की चुप्पी की वजह से अभी तक ये भी रहस्य ही है कि मस्त गुल को पाकिस्तान की सीमा तक छोड़ने कौन गया था?

उस वक्त भी हमारा मीडिया, सैन्य बलों और पुलिस की नकारात्मक छवि पेश करने में माहिर था, और आज भी वैसा ही है। मीडिया ने दरगाह के जलने का सारा दोष भारतीय सैन्य बलों पर मढ़ दिया, और कहा कि यह सब सेना के हमले की वजह से हुआ है, जबकि मीडिया को चरार-ए-शरीफ़ दरगाह से 10 किमी दूर ही रोक दिया गया था। मीडिया का यही “घटिया” और “देशद्रोही” रुख हमने मुम्बई हमले के वक्त भी देखा था, जब सुरक्षा बलों का साथ देने की बजाय इनका सारा जोर यह दिखाने में था कि कमाण्डो कहाँ से उतरेंगे, कहाँ से ताज होटल में घुसेंगे?

नरेन्द्र मोदी “प्रवृत्ति” के उभार की श्रृंखला में इस घटना का उल्लेख करना इसलिए आवश्यक था, ताकि भारत की सरकारों की “दब्बू”, “डरपोक” और “पिलपिली” मानसिकता साफ़-साफ़ उजागर हो सके, जिसकी वजह से भारतीय युवाओं के मन में आक्रोश पनपता और पल्ल्वित होता जा रहा था। और जब यही दब्बूपन, अनिर्णय और डरपोक नीति वाजपेयी सरकार के दौरान IC-814 विमान अपहरण काण्ड में भी सामने आई, तो भाजपा के समर्थकों का विश्वास और भी कमजोर हो गया… (इस काण्ड पर चर्चा अगले किसी भाग में होगी)। परन्तु मुम्बई रैली में राज ठाकरे को मंच पर जाकर गुलाब का फ़ूल देने वाले सिपाही की जो विद्रोही मानसिकता है, उस मानसिकता को समझने में भारतीय नेताओं ने हमेशा ही भूल की है…

 1991 के चुनावों तक देश की हालत आर्थिक मोर्चे पर बहुत पतली हो चुकी थी, सोना भी गिरवी रखना पड़ा था… इस पृष्ठभूमि में चलते चुनावों के बीच ही राजीव गाँधी की हत्या भी हो गई, जिसका फ़ायदा कांग्रेस को मिला और उसकी सीटें 197 से बढ़कर 244 हो गईं। परन्तु भाजपा की सीटें भी 85 से बढ़कर 120 हो गईं… (आम धारणा है कि यदि राजीव गाँधी की हत्या न हुई होती, तो 1991 में ही भाजपा की ताकत 150 सीटों से ऊपर निकल गई होती), जबकि जनता दल 59 सीटें लेकर लगभग साफ़ हो गया। राम मन्दिर आंदोलन और वाजपेयी-आडवाणी की स्वच्छ छवि के चलते, भाजपा की ताकत बढ़ती रही और हिन्दुत्व के मुद्दे पर देश आंदोलित होने लगा था। परन्तु उस समय देश की आर्थिक हालत को देखते हुए और 273 के आँकड़े के लिए कोई भी समीकरण नहीं बन पाने की मजबूरी के चलते, कोई भी पार्टी सरकार गिराना नहीं चाहती थी। इसलिए पीवी नरसिंहराव ने पूरे पाँच साल तक एक “अल्पमत सरकार” चलाई और मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी के दिशानिर्देशों के तहत विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के सहारे, भारत को “आर्थिक सुधारों”(?) के मार्ग पर धकेल दिया। अतः कहा जा सकता है कि देशहित को ध्यान में रखते हुए सभी पार्टियों ने अपने विवादित मुद्दों को अधिक हवा न देने का फ़ैसला कर लिया था, इसलिए 1991 से 1996 के दौरान मण्डल-मन्दिर दोनों ही आंदोलनों की आँच, अंदर ही अंदर सुलगती रही, लेकिन थोड़ी धीमी पड़ी।

हालांकि इन पाँच सालों में देश ने कांग्रेसी पतन की नई “नीचाईयाँ” भी देखीं। चूंकि नरसिंहराव सिर्फ़ विद्वान और चतुर नेता थे, करिश्माई नहीं… इसलिए अर्जुन सिंह, एनडी तिवारी, और माखनलाल फ़ोतेदार जैसे घाघ नेताओं ने उन्हें कभी चैन से रहने नहीं दिया। सरकार शुरु से अन्त तक अल्पमत में थी, इसलिए झारखण्ड के “सांसदों को खरीदकर बहुमत जुटाने” की नई परम्परा को भी कांग्रेस ने जन्म दिया। 1995 में एक कांग्रेसी नेता सुशील ने अपनी पत्नी की हत्या कर, उसके टुकड़े-टुकड़े करते हुए उसे तंदूर में जला दिया, यह घटना भी चर्चित रही… कुल मिलाकर देश में एक हताशा, क्रोध और निराशा का माहौल घर करने लगा था।

इसके बाद आया 1996 का आम चुनाव… यहीं से देश में सेकुलर गिरोहबाजी आधारित “राजनैतिक अछूतवाद” ने जन्म लिया, जिस कारण हिन्दुओं के मन का आक्रोश और गहराता गया… 



इस प्रकार, 1) शाहबानो केस, 2) महबूबा मुफ़्ती केस और 3) चरार-ए-शरीफ़ (मस्त गुल) केस, इन तीन प्रमुख मामलों ने हिन्दू युवाओं के मन पर (1996 तक) तीन बड़े आघात कर दिए थे…। इन ज़ख्मों पर नमक मलने के तौर पर, कश्मीर से लाखों हिन्दू पलायन करके दिल्ली में शरणार्थी कैम्पों में समा चुके थे…। अर्थात नरेन्द्र मोदी “प्रवृत्ति” के उभरने की जड़ मजबूती से जम चुकी थी…

(अगले भाग में 1996 के चुनावों से आगे का सफ़र जारी रहेगा…) 

(भाग-3 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें… http://blog.sureshchiplunkar.com/2012/10/rise-of-narendra-modi-phenomena-part-3.html

Mamata Banerjee, Muslim Appeasement in West Bengal

Written by रविवार, 21 अक्टूबर 2012 20:31

"ममता बानो" का सेकुलरिज़्म (एक माइक्रो पोस्ट) 





- वे इस्लामिक इतिहास में एमए हैं…

- उन्होंने गौमाँस खाने के अधिकार पर संसद में "ऐतिहासिक" बयान दिया है…

- वे "हिजाब" और "परदा" की घोर समर्थक हैं…

- उनकी सरकार ने 4 लाख "अल्पसंख्यक छात्रवृत्तियों" को बढ़ाकर 22 लाख कर दिया है…

- उन्होंने मदरसा शिक्षा बोर्ड का बजट 450 करोड़ से बढ़ाकर 1000 करोड़ कर दिया है…

- इमामों की तनख्वाह 2500 और मुअज़्ज़िनों का मानदेय 1000 रुपए वे पहले ही कर चुकी हैं…

- इनकी नई-नवेली योजना, "सिर्फ़ मुस्लिम" लड़कियों को साईकिल प्रदान करने की है, जिस पर अमल शुरु भी हो गया है…

- वे जल्दी ही 56 इस्लामिक मार्केटिंग हब का निर्माण करने वाली हैं, जहाँ सिर्फ़ 56000 मुस्लिमों को रोज़गार दिया जाएगा…

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ऐसे महान "सुपर-सेकुलर" कृत्य करने वाली, One and Only बेगम मुमताज़ बानो आरज़ू हैं… जिन्हें हम संयोग से "ममता बनर्जी" के नाम से भी जानते हैं…

Rise of Narendra Modi Phenomenon... (Part 1)

Written by गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012 12:37

नरेन्द्र मोदी "प्रवृत्ति" का उदभव एवं विकास… - (भाग-1)

 
एक संयुक्त परिवार है, जिसमें अक्सर पिता द्वारा बड़े भाई को यह कहकर दबाया जाता रहा कि, "तुम बड़े हो, तुम सहिष्णु हो, तुम्हें अपने छोटे भाई को समझना चाहिए और उसकी गलतियों को नज़रअंदाज़ करना चाहिए…"। जबकि उस परिवार के मुखिया ने कभी भी उस उत्पाती और अड़ियल किस्म के छोटे बेटे पर लगाम कसने की कोशिश नहीं की…।

इस बीच छोटे बेटे को भड़काने वाले और उसके भड़कने पर फ़ायदा उठाने वाले बाहरी तत्त्व भी इसमें लगातार घी डालते रहे… और वह इसका नाजायज़ फ़ायदा भी उठाने लगा तथा गाहे-बगाहे घर के मुखिया को ही धमकाने लगा। यह सब देखकर बड़े बेटे के बच्चे मन ही मन दुखी और क्रोधित थे, साथ ही घर की व्यवस्था भंग होने पर, पिता द्वारा लगातार मौन साधे जाने से आहत भी थे। परन्तु बड़े बेटे के संस्कार और परिवार को एक रखने की नीयत के चलते उसने (एक-दो बार को छोड़कर) कभी भी अपना संतुलन नहीं खोया…।

उधर छोटे बेटे की पत्नी उसे समझाने की कोशिश करती थी, लेकिन उसकी एक न चलती, क्योंकि भड़काने वाले पड़ोसी और खुद वह छोटा बेटा अपनी पत्नी की समझदारी भरी बातें सुनने को तैयार ही नहीं थे… और हमेशा पत्नी को दबा-धमकाकर चुप कर दिया करते।

मित्रों… मैंने यहाँ नरेन्द्र मोदी "प्रवृत्ति" शब्द का उपयोग किया है, क्योंकि अब नरेन्द्र मोदी सिर्फ़ एक "व्यक्ति" नहीं रहे, बल्कि प्रवृत्ति बन चुके हैं, प्रवृत्ति का अर्थ है कि यदि नरेन्द्र मोदी नहीं होते, तो कोई और होता… मोदी तो निमित्त मात्र हैं। अब आगे…
यह तो प्रतीकात्मक कहानी है… अब आगे…
अमूमन 1984 (अर्थात इन्दिरा गाँधी की हत्या) तक भारत एक समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष मॉडल पर चलता रहा। 1984 में इन्दिरा की हत्या के बाद हुए दंगों में देश ने पहली बार "सत्ता समर्थित" साम्प्रदायिकता का नंगा नाच देखा। इसके बाद देश ने बड़ी उम्मीदों के साथ एक युवा राजीव गाँधी को तीन-चौथाई बहुमत देकर संसद में पूरी ताकत से भेजा। भाजपा सिर्फ़ 2 सीटों पर सिमटकर रह गई जबकि कई अन्य पार्टियाँ लगभग साफ़ हो गईं। हिन्दू-सिखों में जो दरार आई थी, जल्दी ही भर गई… 


इसके बाद आया सुप्रीम कोर्ट का वह बहुचर्चित फ़ैसला, जिसे हम "शाहबानो केस" के नाम से जानते हैं। देश का आम नागरिक इस मुद्दे को लेकर कोई विशेष उत्साहित नहीं था, लेकिन जब राजीव गाँधी ने तीन-चौथाई बहुमत होते हुए भी मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेके और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को संसद के जरिए उलट दिया…। धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं के मन पर यही वह पहला आघात था, जिसने उसके इस विश्वास को हिला दिया कि "राज्य सत्ता" और "कानून का शासन" देश में सर्वोपरि होता है… क्योंकि उसने देखा कि किस तरह से मुस्लिमों की तरफ़ से उठने वाली धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी "आरिफ़ मोहम्मद खान" जैसी आवाज़ों को अनसुना कर दिया गया…।

इस बिन्दु को हम नरेन्द्र मोदी प्रवृत्ति का उदभव मान सकते हैं…


हमने अब तक कांग्रेस के "साम्प्रदायिक इतिहास" और दोनो हाथों में लड्डू रखने की संकुचित प्रवृति के कारण देश के धार्मिक ताने-बाने और संविधान-कानून का मखौल उड़ते देखा… आईए अब 1989 से आगे शुरु करें…

1989 के लोकसभा चुनाव वीपी सिंह द्वारा खुद को “शहीद” और “राजा हरिश्चन्द्र” के रूप में प्रोजेक्ट करने को लेकर हुए। इसमें वीपी सिंह के जनता दल ने भाजपा और वामपंथियों दोनों की “अदभुत बैसाखी” के साथ सरकार बनाई, लेकिन जनता दल का कुनबा शुरु से ही बिखराव, व्यक्तित्त्वों के टकराव और महत्त्वाकांक्षा का शिकार रहा। इस चुनाव में विश्व हिन्दू परिषद का सहयोग करते हुए भाजपा ने अपनी सीटें, 2 की संख्या से सीधे 85 तक पहुँचा दीं। चन्द्रशेखर की महत्त्वाकांक्षा के चलते जनता दल में फ़ूट पड़ी और घाघ कांग्रेस ने अपना खेल खेलते हुए बाहरी समर्थन से चन्द्रशेखर को प्रधानमंत्री भी बनवाया और सिर्फ़ कुछ महीने के बाद गिरा भी दिया… इस तरह देश को 1991 में जल्दी ही चुनावों का सामना करना पड़ा।

वीपी सिंह सरकार के सामने भी इस्लामी आतंक का स्वरूप आया, जब जेकेएलएफ़ ने कश्मीर में रूबिया सईद का अपहरण किया और देश के गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने वीपी सिंह के साथ मिलकर आतंकवादियों के सामने घुटने टेकते हुए अपनी बेटी को छुड़ाने के लिए पाँच आतंकवादियों को छोड़ दिया। हालांकि फ़ारुक अब्दुल्ला ने इसका विरोध किया था, लेकिन उन्हें बर्खास्त करने की धमकी देकर सईद ने अपनी बेटी को छुड़वाने के लिए आतंकवादियों को छोड़कर भारत के इतिहास में “पलायनवाद” की नई प्रवृत्ति शुरु की…। हालांकि अभी भी यह रहस्य ही है कि रूबिया सईद का वास्तव में अपहरण ही हुआ था, या वह सहमति से आतंकवादियों के साथ चली गई थी, ताकि सरकार को झुकाकर कश्मीरी आतंक को मदद की जा सके। यही वह दौर था, जब कश्मीर से पण्डितों को मार-मारकर भगाया जाने लगा, पण्डितों को धमकियाँ, उन पर अत्याचार और हिन्दू महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ी थीं…। धीरे-धीरे कश्मीरी हिन्दू घाटी से पलायन करने लगे थे। आतंकवादियों के प्रति नर्मी बरतने और पण्डितों के प्रति क्रूरता और उनके पक्ष में किसी भी राजनैतिक दल के ने आने से शेष भारत के हिन्दुओं के मन में आक्रोश, गुस्सा और निराशा की आग बढ़ती गई, जिसमें राम मन्दिर आंदोलन ने घी डाला…
 
(भाग-2) में आगे भी जारी रहेगा…

भाग-2 पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें… http://blog.sureshchiplunkar.com/2012/10/rise-of-narendra-modi-phenomenon-part-2.html

"Dalit Christians" feeling like "stabbed in back"

Written by मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012 13:44

"दलित ईसाईयों" के साथ भेदभाव… 


नमस्कार मित्रों…

जैसा कि वादा था… नवरात्र के पहले दिन से ब्लॉगिंग में वापसी कर रहा हूँ…

1) जो पोस्ट पहले फ़ेसबुक पर आ चुकी होंगी, आगे से उन पोस्ट की पहली लाइन "फ़ेसबुक वॉल से…" शुरु होगी, जबकि किसी अन्य पोस्ट में ऐसा नहीं होगा…
2) इसी प्रकार ऐसी कोई पोस्ट जो मैंने नहीं लिखी होगी, बल्कि किसी मित्र द्वारा मेरे ब्लॉग पर पब्लिश की जाएगी, उसमें सबसे अन्त में उनका नाम भी ससम्मान, साभार सहित होगा…

अतः आज पेश है फ़ेसबुक की गई एक पोस्ट का कॉपी-पेस्ट संस्करण…
(यह उन मित्रों के लिए है, जो फ़ेसबुक की मेरी अपडेट्स नियमित नहीं ले पाते, या फ़ेसबुक पर हैं ही नहीं…)
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रामेश्वरम से 70 किमी दूर तिरुवदनी कस्बे में "दलित ईसाईयों"(?) के एक समूह ने वहाँ के चर्च की "सिल्वर जुबली" महोत्सव से 6 दलित पादरियों को बाहर किए जाने के खिलाफ़ हिंसात्मक प्रदर्शन किया है।

चर्च के प्रमुख पादरी ने आरोप लगाया है कि जब जुबली महोत्सव के दौरान 200 ईसाईयों और ननों का जुलूस निकल रहा था, तब "दलित ईसाईयों"(?) की भीड़ ने पहले प्रदर्शन किया और फ़िर हिंसा की। वे लोग इस बात का विरोध कर रहे थे कि जुबली महोत्सव के दौरान इन दलित पादरियों को पूजा में हिस्सा नहीं लेने दिया गया…

"दलित ईसाईयों"(?) के समर्थन में रामेश्वर में भी काले झण्डे लहराए गए और कई संगठनों ने आरोप लगाया है कि अक्सर ऐसा होता है कि चर्च में प्रमुख पूजा अवसरों पर धर्म परिवर्तित दलितों को पर्याप्त सम्मान नहीं दिया जाता…

फ़िलहाल यह उत्सव स्थगित कर दिया गया है, और "ईसाईयों" और "दलित ईसाईयों"(?) के बीच समझौता वार्ता जारी है, जबकि माहौल में तनाव व्याप्त है…

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मित्रों… "दलित ईसाईयों" शब्द पर मैंने (?) मार्क लगाया है, इसका मतलब आप और मैं तो जानते हैं… लेकिन "सेकुलरों" और "हिन्दू विरोधी बुद्धिजीवियों" के दिमाग की बत्ती जलाने के लिए यह जरूरी था…

क्या मेरा कोई "सेकुलर" मित्र यह बता सकता है, कि "दलित ईसाई" की सटीक परिभाषा क्या होगी? क्योंकि मेरा Confusion यह है कि या तो वह "दलित" होगा (सो उसे आरक्षण मिले), या फ़िर वह "ईसाई" होगा (धार्मिक आधार पर आरक्षण कैसे मिले?)… दोनों हाथों में लड्डू कोई कैसे रख सकता है भाई?

2G Scam, P Chidambaram and Maran Brothers

Written by मंगलवार, 14 फरवरी 2012 12:30

पिक्चर अभी बाकी है चिदम्बरम साहब…

2G घोटाला (2G Scam) मामले में सीबीआई की अदालत ने हमारे माननीय गृहमंत्री चिदम्बरम साहब को “क्लीन चिट”(?) दे दी। डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी (अर्थात वन मैन आर्मी) द्वारा लड़ी जा रही इस कानूनी लड़ाई में जैसे ही कोर्ट ने कहा कि “चिदम्बरम को इस मामले में आपराधिक षडयंत्र का दोषी नहीं माना जा सकता…”, मानो मीडिया और कांग्रेस को मनमाँगी मुराद मिल गई और इन दोनों के “नापाक गठजोड़” ने दीपावली मनाना शुरु कर दिया। “सुपरस्टार बयानवीर” अर्थात कपिल सिब्बल ने डॉ स्वामी को भगवान से अपील करने तक की सलाह दे डाली और मीडिया के “दिमागी पैदलों” ने “चिदम्बरम को राहत…” की बड़ी-बड़ी हेडिंग के साथ ही यह घोषणा तक कर डाली कि अब भविष्य में चिदम्बरम (P Chidambaram) को इस मामले में घसीटना बेतुका होगा… अर्थात सीबीआई की एक अदालत के निर्णय को, इन सभी स्वयंभू महान पत्रकारों ने “सुप्रीम कोर्ट” का अन्तिम निर्णय मान लिया, जिस पर अब बहस की कोई गुंजाइश नहीं हो…।

इस सारे झमेले और फ़र्जी हो-हल्ले के बीच यह खबर चुपचाप दब गई (या दबा दी गई) कि तमिलनाडु के (कु)ख्यात मारन बन्धुओं (Dayanidhi and Kalanidh Maran) और मैक्सिस कम्पनी के बीच जो अवैध लेन-देन हुआ और जिसमें मारन बन्धुओं ने करोड़ों (सॉरी, अरबों) रुपए बनाए, उस मामले में उन्हें साफ़-साफ़ दोषी पाया गया है…। सीबीआई की FIR में कहा गया है कि मारन बन्धुओं को एयरसेल-मैक्सिस सौदे में अनधिकृत रूप से 550 करोड़ रुपये का लाभ पहुँचाया गया। जब मारन बाहर हुए तो ए राजा उस मलाईदार कुर्सी पर काबिज हुए और उन्होंने भी जमकर माल कूटा जिसमें “चालाकी दिखाने की असफ़ल कोशिश” के तहत स्वान टेलीकॉम ने DMK के घरू चैनल “कलाईनर टीवी” को 200 करोड़ रुपए दिए। हालांकि चालाकी काम न आई और करुणानिधि की लाड़ली बिटिया कनिमोझि को तिहाड़ की सैर करनी ही पड़ी…। उल्लेखनीय है कि यह सारे “पवित्र कार्य” उसी समय सम्पन्न हुए जब 2G  केस की निगरानी सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाथों में ली, और डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी हाथ-पाँव-मुँह धोकर चिदम्बरम, गृह मंत्रालय और संचार मंत्रालय के पीछे पड़े और उन्हें मजबूर किया कि वे डॉ स्वामी को मूल फ़ाइलों की कॉपी प्रदान करें…।


प्रस्तावना के तौर पर इतनी “कहानी”(?) सुनाना इसलिए जरूरी था, क्योंकि चिदम्बरम साहब स्वयं और उनकी पत्नीश्री भी इतने काबिल वकील और चतुर-सुजान हैं कि इन्होंने बड़ी सफ़ाई से इस मामले में अभी तक अपनी खाल बचा रखी है और “फ़िलहाल” (जी हाँ फ़िलहाल) एक भी “प्रत्यक्ष सबूत” सामने नहीं आने दिया है…।

परन्तु प्रत्यक्ष सबूत ही तो सब कुछ नहीं होते, शक गहरा करने वाली घटनाएं, तथ्य और कड़ियाँ जिस बात की ओर इशारा करती हैं, हमें उन्हें भी देखना चाहिए। डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी की टीम तो पहले से ही “तिलस्म-ए-चिदम्बरम” के पिटारे का दरवाजा खोलने हेतु जोर-आजमाइश कर ही रही है, परन्तु तमिलनाडु के राजनैतिक एवं सामाजिक हलकों से छन-छन कर आने वाली खबरें तथा सीबीआई व अन्य जाँच एजेंसियों से “लीक” होने वाले सूत्रों द्वारा बहुत सी बातें निकलकर आ रही हैं जो कि चिदम्बरम को बेचैन करने के लिए काफ़ी हैं।

जिन्होंने माननीय जज ओपी सैनी के पूरे निर्णय को पढ़ा है उन्हें पता होगा कि उसमें उन्होंने लिखा है, “In the end, Mr. P. Chidambaram was party to only two decisions,  that is, keeping the spectrum prices at 2001 level and dilution of equity by the two companies. These two acts are not per se criminal. In the absence of any other incriminating act on his part, it cannot be said that he was prima facie party to the criminal conspiracy. There is no evidence on record that he was acting in pursuit to the criminal conspiracy, while being party to the two decisions regarding non-revision of the spectrum pricing and dilution of equity by the two companies.”

निर्णय की इन पंक्तियों पर गौर कीजिये (1.There is no evidence on record… और 2. it cannot be said that he was prima facie party to the criminal conspiracy) अर्थात फ़िलहाल इस लोअर कोर्ट के जज “मजबूर” दिखाई दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि डॉ स्वामी द्वारा कोई ठोस सबूत उनके समक्ष नहीं रखा गया। परन्तु कानूनी जानकार बताते हैं कि इस निर्णय को उच्च न्यायालयों में उलटे जाने की पूरी सम्भावना है। रही बात सबूतों की, तो वह भी जल्द ही सामने आएंगे ही, फ़िर भी कुछ घटनाएं और तथ्य जो कि “उड़ती चिड़िया” बता जाती हैं, वह इस प्रकार हैं…


26 दिसम्बर 2005 को एयरसेल कम्पनी का अधिग्रहण ग्लोबल कम्यूनिकेशन ने कर लिया था। ग्लोबल कम्पनी पूरी तरह से मैक्सिस कम्यूनिकेशंस तथा डेक्कन डिजिटल नेटवर्क का संयुक्त उपक्रम है, जिसके मूल मालिक “सिन्द्या सिक्यूरिटीज़ एण्ड ग्लोबल कम्यूनिकेशन हैं। उल्लेखनीय है कि एयरसेल कम्पनी की शुरुआत की थी शिवशंकरन ने, जिन्होंने संयुक्त उपक्रम में मैक्सिस मलेशिया और सिन्द्या सिक्यूरिटीज़ के साथ मिलकर इसे स्थापित किया था। सिन्द्या सिक्यूरिटीज़ एण्ड ग्लोबल कम्यूनिकेशन में प्रमुख शेयर धारक हैं चेन्नई के अपोलो अस्पताल समूह के रेड्डी परिवारजन, और इसमें मैक्सिस के 74% शेयर थे।

अपोलो अस्पताल के प्रमुख प्रमोटर प्रताप रेड्डी ने अपने लिखित बयान में सीबीआई के सामने स्वीकार किया है कि सिन्द्या सिक्यूरिटीज़ को द्वारकानाथ रेड्डी एवं सुनीता रेड्डी ने प्रमुखता से प्रमोट किया तथा “इन्वेस्टमेण्ट के तौर पर” एयरसेल कम्पनी में पैसा लगाया। सुनीता रेड्डी अपोलो अस्पताल समूह के प्रताप रेड्डी की पुत्री हैं, और उन्हें “अचानक यह ज्ञान प्राप्त हो गया”, कि अब उन्हें अस्पताल का धंधा छोड़कर टेलीकॉम के धंधे में उतर जाना चाहिए।

यहाँ तक के घटनाक्रम से तो ऐसा लगता है कि सब कुछ “कुख्यात केडी” (अर्थात कलानिधि, दयानिधि) की ही कारस्तानी है… लेकिन कुछ और खोदने पर नया चित्र सामने आता है। चेन्नई के व्यापारिक हलकों में चर्चा है कि एयरसेल में अपोलो अस्पताल समूह की रुचि की असली वजह हैं चिदम्बरम साहब की बहू श्रीनिधि चिदम्बरम, जिनका विवाह कार्तिक चिदम्बरम से हुआ है। पेंच यह है कि श्रीनिधि की नियुक्ति अपोलो अस्पताल में प्रमुख फ़िजिशियन के रूप में दर्शाई जाती है। जबकि हुआ यह है कि अपोलो अस्पताल समूह ने अपने शेयर बहूरानी श्रीनीति के नाम किए (अर्थात अप्रत्यक्ष रूप से चिदम्बरम के ही नाम किए), बदले में चिदम्बरम साहब ने एयरसेल और रेड्डी परिवार के बीच सौदा फ़ाइनल करवाने में प्रमुख भूमिका अदा की। बाद में शक्तिशाली मारन बन्धुओं द्वारा मैक्सिस के शिवशंकरन की बाँह मरोड़कर करोड़ों रुपये डकारे गये।

सीबीआई के अपुष्ट सूत्रों के अनुसार जिस समय मारन बन्धुओं के घर छापे की कार्रवाई चल रही थी उस समय सीबीआई के कुछ अधिकारी चेन्नई के हाई-फ़ाई इलाके नुगाम्बक्कम में सुनीता रेड्डी के घर डेरा डाले हुए थे, ताकि इस बात से आश्वस्त हुआ जा सके कि समूचे घटनाक्रम में बहूरानी श्रीनिधि का नाम कहीं भी न झलकने पाए। उधर मारन बन्धु पहले ही चिदम्बरम साहब को धमकी दे चुके थे कि यदि इस मामले में उनके अकेले का नाम फ़ँसाया गया तो चिदम्बरम साहब को भी नुकसान पहुँच सकता है। इसीलिए अब सीबीआई को इस झमेले में फ़ूंक-फ़ूंक कर कदम रखना पड़ रहा है।


अब हम आते हैं चिदम्बरम साहब और अपोलो अस्पताल समूह के मधुर सम्बन्धों पर… अपोलो अस्पताल समूह ने तमिलनाडु के एक छोटे और सुस्त से शहर कराईकुडी में 110 बिस्तरों वाला आधुनिक अस्पताल खोला, कुराईकुडि चिदम्बरम साहब का गृह-ग्राम है। “संयोग” देखिए, कि इस कस्बे में अपोलो के इस भव्य अस्पताल की घोषणा तभी हुई, जब 2009 में चिदम्बरम साहब की बहूरानी को अपोलो अस्पताल के शेयर आवंटित हुए…। कुराइकुडि के इस अस्पताल का उदघाटन 27 दिसम्बर 2011 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किया था, एक मामूली कस्बे में एक अस्पताल का उदघाटन करने के लिए प्रधानमंत्री स्तर के व्यक्ति के पास टाइम ही टाइम है, जबकि ए राजा द्वारा हेराफ़ेरी की गई फ़ाइलों को ठीक से देखने का वक्त नहीं है… क्या गजब संयोग है?

तत्कालीन नियमों के मुताबिक टेलीकॉम सेक्टर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 74% से अधिक की अनुमति नहीं थी, परन्तु मारन बन्धुओं तथा बहूरानी की खातिर चिदम्बरम साहब ने इस बात से आँखें मूंदे रखीं, कि मार्च 2006 में मैक्सिस ने मलेशिया स्टॉक एक्सचेंज में लिखित रूप से कहा है कि एयरसेल में उसका मालिकाना हक 99.3% है।

बहरहाल, चिदम्बरम साहब की मुश्किलों में बढ़ोतरी इस बात से भी होने वाली है कि डॉ स्वामी की टीम के लोग इस बात पर रिसर्च कर रहे हैं कि चिदम्बरम साहब के वित्तमंत्री रहते उनके “शेयर मार्केट उस्ताद” सुपुत्र कार्तिक ने कौन-कौन से सौदे किए थे तथा चिदम्बरम साहब ने “नीतियों में परिवर्तन एवं अचानक की गई घोषणाओं” से कार्तिक को कितना लाभ पहुँचाया। इस दिशा में भी “खोजबीन” जारी है कि चिदम्बरम साहब जिस “वासन आई केयर अस्पताल श्रृंखला” के नज़दीकी हैं, उसमें कार्तिक की इतनी रुचि क्यों है? उल्लेखनीय है कि वासन आई केयर के 25वें और 100वें अस्पताल का उदघाटन चिदम्बरम ने ही किया था। वासन आई केयर ने 2008 में चेन्नई में पहला अस्पताल खोला था, और मात्र तीन साल में उसके 15 अस्पताल सिर्फ़ चेन्नई में खुल गये हैं… ऐसी “भीषण” तरक्की का राज़ क्या है, यह जानने की उत्सुकता अन्य अस्पतालों के मालिकों में भी है…।

कहने का तात्पर्य यह है कि चिदम्बरम साहब को सीबीआई जज श्री सैनी ने “तात्कालिक” राहत पहुँचाई है, जबकि पिक्चर अभी बाकी है… उम्मीद है कि प्रणब मुखर्जी साहब भी अपने दफ़्तर की मेज़ के नीचे छिपाए गये खुफ़िया माइक प्रकरण को भूले नहीं होंगे और चिदम्बरम साहब की मुश्किलें बढ़ाने का “उचित मौका” ढूंढ रहे होंगे… परन्तु 2G का घोटाला एक विशाल “बरगद” के समान है, खोदने वाले को पता नहीं कहाँ-कहाँ, कौन-कौन सी जड़ें मिल जाएं।
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नोट :- आप सोच रहे होंगे कि इस लेख में, “ऐसा कहा जाता है…”, “माना जाता है…”, “अपुष्ट सूत्रों के अनुसार” जैसे शब्दों का उपयोग अधिक क्यों हुआ है? ऐसा इसलिए है क्योंकि जैसा कि मैंने ऊपर कहा श्री एवं श्रीमती चिदम्बरम साहब इतने “चतुर-सुजान” हैं कि अपने सत्कर्मों का उन्होंने ‘फ़िलहाल’ कोई सबूत छोड़ा नहीं है, परन्तु “मिले जो कड़ी-कड़ी, एक जंजीर बने…” की तर्ज पर उपरिलिखित घटनाओं को जोड़ना और उसमें से “उपयोगी जूस” निकालने का काम, या तो जाँच एजेंसियाँ कर सकती हैं या डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी…। मेरा काम तो मामूली डाकिए की तरह आप लोगों तक सूचनाएं पहुँचाना भर है

2G Spectrum, Subrahmanian Swamy, Chidambaram and A Raja

Written by शुक्रवार, 03 फरवरी 2012 21:12

इति दूरसंचार कथा… (गोभी का खेत और किसान का कपूत)

जब से सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फ़ैसला आया है, तभी से आपने विभिन्न चैनलों पर “हीरो” के चेहरे से अधिक “विलेन” के चेहरे, बयानों, सफ़ाईयों और प्रेस कॉन्फ़्रेंसों को लगातार सुना होगा। जिस “हीरो” के अनथक प्रयासों के कारण आज सैकड़ों CEOs और नेताओं की नींद उड़ी हुई है, उसके पीछे माइक लेकर दौड़ने की बजाय, मीडिया की “मुन्नियाँ”, और चैनलों की “चमेलियाँ”, अभी भी विलेन को अधिकाधिक फ़ुटेज और कवरेज देने में जुटी हुई हैं। असली हीरो यदि चार लाईनें बोलता है तो उसमें से दो लाइनें सफ़ाई से उड़ा दी जाती हैं, जबकि विलेन बड़े इत्मीनान और बेशर्मी से अपना पक्ष रख रहा है…

बहरहाल, पाठकों ने पिछले 2 दिनों में, “हमने तो NDA द्वारा स्थापित ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की नीति का ही अनुसरण किया है, इसमें हमारी कोई गलती नहीं है…” इस वाक्य का उच्चारण कई बार सुना होगा। जिन मित्रों को इस मामले की पूरी जानकारी नहीं है उनके लिए बात को आसान बनाने हेतु संक्षेप में एक कहानी सुनाता हूँ… 


2001 में एक किसान अपने खेत में ढेर सारी गोभी उगाता था, लेकिन उस समय उस गोभी को खरीदकर बाज़ार में बेचने वाले व्यापारी बहुत कम थे और गोभी खाने वाले ग्राहक भी बहुत कम संख्या में थे। किसान ने सोचा कि गोभी तो बेचना ही है, फ़िलहाल “पहले आओ, पहले पाओ” के आधार पर जो व्यापारी मिले उसे औने-पौने भावों में गोभी बेच देते हैं… यह सिलसिला 2-3 साल चला। किसान की मौत के बाद उसका एक नालायक बेटा खेत पर काबिज हो गया। 2008 आते-आते उसके खेत की गोभियों की माँग व्यापारियों के बीच जबरदस्त रूप से बढ़ गई थी, साथ ही उन गोभियों को खाने वालों की संख्या भी लगभग दस गुना हो गई। ज़ाहिर है कि जब गोभियों की माँग और कीमत इतनी बढ़ चुकी थी, तो उस नालायक कपूत को उसके अधिक भाव लेने चाहिए थे, लेकिन असल में किसान का वह बेटा “अपने घर-परिवार” का खयाल रखने की बजाय, एक “पराई औरत के करीबियों” को फ़ायदा पहुँचाने के लिए, गोभियाँ सस्ते भाव पर लुटाता रहा। सस्ते भाव में मिली गोभियों को महंगे भाव में बेचकर व्यापारियों, करीबियों और पराई औरत ने बहुत माल कमाया और उसका बड़ा हिस्सा इस नालायक को भी मिला…। लेकिन उस कपूत को कौन समझाए कि जिस समय किसान “पहले आओ पहले पाओ” के आधार पर गोभी बेचता था वह समय अलग था, उस समय गोभी इतनी नहीं बिकती थी, परन्तु यदि कपूत को अपने घर-परिवार को खुशहाल बनाने की इतनी ही चिंता और इच्छा होती तो वह उन गोभियों को ऊँचे से ऊँचे भाव में नीलाम कर सकता था… ज्यादा पैसा परिवार में ला सकता था…।

बहरहाल ये तो हुई कहानी की बात… माननीय “कुटिल” (सॉरी कपिल) सिब्बल साहब ने कहा है कि “सारा दोष ए राजा का है…हमारी सरकार का कोई कसूर नही…”। इस दावे से क्या हमें कुछ बातें मान लेना चाहिए? जैसे –

1) ए राजा ने अकेले ही पूरा घोटाला अंजाम दिया…? पूरा पैसा अकेले ही खा लिया? कांग्रेस के “अति-प्रतिभाशाली” मंत्रियों को भनक भी नहीं लगने दी?

2) चिदम्बरम साहब अफ़ीम के नशे में फ़ाइलों पर हस्ताक्षर करते थे…?

3) प्रधानमंत्री कार्यालय नाम की चिड़िया, पता नहीं क्या और कहाँ काम करती थी…?

4) जो सोनिया गाँधी एक अदने से राज्यमंत्री तक की नियुक्ति तक में सीधा दखल और रुचि रखती हैं, वह इतनी भोली हैं कि इतने बड़े दूरसंचार स्पेक्ट्रम सौदे के बारे में, न कुछ जानती हैं, न समझती हैं, न बोलती हैं, न सुनती हैं?


वाह… वाह… वाह… सिब्बल साहब, क्या आपने जनता को (“एक असंसदीय शब्द”) समझ रखा है? और मान लो कि समझ भी रखा हो, फ़िर भी जान लीजिये कि जब जनता “अपनी वाली औकात” पर आती है तो बड़ी मुश्किल खड़ी कर देती है… साहब!!!
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जिन पाठकों ने 2G Scam से सम्बन्धित मेरी पोस्टें नहीं पढ़ी हों, उनके लिए दोबारा लिंक पेश कर रहा हूँ, जिसमें आपको डॉ स्वामी द्वारा कोर्ट में पेश किए गये कुछ दस्तावेजों की झलक मिलेगी… जिनकी वजह से चिदम्बरम साहब का ब्लडप्रेशर बढ़ा हुआ है…




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नोट :- मित्रों, सोचा था कि अब कम से कम दो-चार महीने तक तो कुछ नहीं लिखूंगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक निर्णय तथा उस पर सिब्बल साहब की “भावभंगिमा”, “अकड़-फ़ूं भाषा” और “हेकड़ी” को देखते हुए रहा नहीं गया…

Cardinal George Alencherry, Indian Constitution and Vatican

Written by गुरुवार, 19 जनवरी 2012 17:33

अलेंचेरी की कार्डिनल के रूप में नियुक्ति और कुछ तकनीकी सवाल… (एक माइक्रो पोस्ट)

केरल के मूल निवासी 66 वर्षीय आर्चबिशप जॉर्ज एलेंचेरी को गत सप्ताह पोप ने कार्डिनल की पदवी प्रदान की। वेटिकन में की गई घोषणा के अनुसार सोलहवें पोप बेनेडिक्ट ने 22 नए कार्डिनलों की नियुक्ति की है। रोम (इटली) में 18 फ़रवरी को होने वाले एक कार्यक्रम में एलेंचेरी को कार्डिनल के रूप में आधिकारिक शपथ दिलाई जाएगी।

जॉर्ज एलेंचेरी, कार्डिनल नियुक्त होने वाले ग्यारहवें भारतीय हैं। वर्तमान में भारत में पहले से ही दो और कार्डिनल कार्यरत हैं, जिनका नाम है रांची के आर्चबिशप टेलीस्पोर टोप्पो एवं मुम्बई के आर्चबिशप ओसवाल्ड ग्रेसियस। हालांकि भारत के ईसाईयों के लिये यह एक गौरव का क्षण हो सकता है, परन्तु इस नियुक्ति (और इससे पहले भी) ने कुछ तकनीकी सवाल भी खड़े कर दिये हैं।


जैसा कि सभी जानते हैं, “वेटिकन” अपने आप में एक स्वतन्त्र राष्ट्र है, जिसके राष्ट्र प्रमुख पोप होते हैं। इस दृष्टि से पोप सिर्फ़ एक धर्मगुरु नहीं हैं, बल्कि उनका दर्जा एक राष्ट्र प्रमुख के बराबर है, जैसे अमेरिका या भारत के राष्ट्रपति। अब सवाल उठता है कि पोप का चुनाव कौन करता है? जवाब है दुनिया भर में फ़ैले हुए कार्डिनल्स…। अर्थात पोप को चुनने की प्रक्रिया में कार्डिनल जॉर्ज एलेंचेरी भी अपना वोट डालेंगे। यह कैसे सम्भव है? एक तकनीकी सवाल उभरता है कि कि, क्या भारत का कोई मूल नागरिक किसी अन्य देश के राष्ट्र प्रमुख के चुनाव में वोटिंग कर सकता है? इसके पहले भी भारत के कार्डिनलों ने पोप के चुनाव में वोट डाले हैं परन्तु इस सम्बन्ध में कानून के जानकार क्या कहते हैं यह जानना दिलचस्प होगा कि भारत के संविधान के अनुसार यह कैसे हो सकता है? यदि पोप “सिर्फ़ धर्मगुरु” होते तो शायद माना भी जा सकता था, लेकिन पोप एक सार्वभौम देश के राष्ट्रपति हैं, उनकी अपनी मुद्रा और सेना भी है…

क्या सलमान रुशदी भारत में वोटिंग के अधिकारी हैं? क्या चीन का कोई नागरिक भारत के चुनावों में वोट डाल सकता है? यदि नहीं, तो फ़िर कार्डिनल एलेंचेरी किस हैसियत से वेटिकन में जाकर वोटिंग करेंगे?
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नोट :- जिस प्रकार किसी सेल्समैन को 100% टारगेट प्राप्त करने पर ईनाम मिलता है, उसी प्रकार आर्चबिशप एलेंचेरी को कार्डिनल पद का ईनाम इसलिए मिला है, क्योंकि उन्होंने पिछले दो दशकों में कन्याकुमारी एवं नागरकोविल इलाके में धर्म परिवर्तन में भारी बढ़ोतरी की है। ज्ञात रहे कि एलेंचेरी महोदय वही “सज्जन” हैं जिन्होंने कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानन्द स्मारक नहीं बनने देने के लिए जी-तोड़ प्रयास(?) किये थे, इसी प्रकार रामसेतु को तोड़कर “सेतुसमुद्रम” योजना को सिरे चढ़ाने के लिए करुणानिधि के साथ मिलकर एलेंचेरी महोदय ने बहुत “मेहनत”(?) की। हालांकि डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी के प्रयासों तथा हिन्दू संगठनों के कड़े विरोध के कारण वह दोनों ही “दुष्कृत्य” में सफ़ल नहीं हो सके।

http://in.christiantoday.com/articles/archbishop-george-alencherry-elevated-to-cardinal/6941.htm

Fake Indian Currency Notes and Finance Ministry of India

Written by मंगलवार, 10 जनवरी 2012 18:57


नकली नोटों पर सिर्फ़ चिंता जताई, वित्तमंत्री जी…? कुछ ठोस काम भी करके दिखाईये ना!!!

हाल ही में देवास (मप्र) में बैंक नोट प्रेस की नवीन इकाई के उदघाटन के अवसर पर वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि "हमें नकली नोटों की समस्या से सख्ती से निपटना जरूरी है…"। सुनने में यह बड़ा अच्छा लगता है, कि देश के वित्तमंत्री बहुत चिंतित हैं, लेकिन जमीनी हकीकत क्या है आईये इस बारे में भी थोड़ा जान लें…

अक्टूबर 2010 में ही केन्द्र सरकार के सामने यह तथ्य स्पष्ट हो चुका था कि भारतीय करंसी छापने के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला हजारों मीट्रिक टन कागज़ दोषपूर्ण पाया गया था। उस समय कहा गया था कि सरकार इस नुकसान का “आकलन” कर रही है, कि नोट छपाई के इन कागजों हेतु बनाए गये सुरक्षा मानकों में चूक क्यों हुई, कहाँ हुई? नकली नोटों की छपाई में भी उच्च स्तर पर कोई न कोई घोटाला अवश्य चल रहा है, इस बात की उस समय पुष्टि हो गई थी, जब ब्रिटिश कम्पनी De La Rue ने स्वीकार कर लिया कि भारत के 100, 500 और 1000 के नोट छापने के कागज़ उसकी लेबोरेटरी में सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरे। रिजर्व बैंक को लिखे अपने पत्र में ब्रिटिश कम्पनी ने माना कि “आंतरिक जाँच” में पाया गया कि भारत को दोषपूर्ण कागज़ सप्लाय हुआ है। उल्लेखनीय है कि यह कम्पनी 2005 से ही भारत की बैंक नोट प्रेसों को कागज सप्लाय कर रही है।


जब कम्पनी ने मान लिया कि 31 सुरक्षा मानकों में से 4 बिन्दुओं में सुरक्षा चूक हुई है, इसकी पुष्टि होशंगाबाद की लेबोरेटरी में भी हो गई, लेकिन तब तक 1370 मीट्रिक टन कागज “रद्दी के रूप में” भारत की विभिन्न नोट प्रेस में पहुँच चुका था, इसके अलावा 735 मीट्रिक टन नोट पेपर विभिन्न गोदामों एवं ट्रांसपोर्टेशन में पड़ा रहा, जबकि लगभग 500 मीट्रिक टन कागज De La Rue कम्पनी में ही रखा रह गया। इसके बाद वित्त मंत्रालय के अफ़सरों की नींद खुली और उन्होंने भविष्य के सौदे हेतु डे ला रू कम्पनी को ब्लैक लिस्टेड कर दिया। नकली नोटों की भरमार और इस कागज के गलत हाथों में पड़ने के खतरे की गम्भीरता को समझते हुए वित्त मंत्रालय ने एक “करंसी निदेशालय” का गठन कर दिया।

वित्त मंत्रालय के इस निदेशालय ने एक Inter-Departmental नोट में स्वीकार किया कि De La Rue कम्पनी के दोषयुक्त एवं घटिया कागज के कारण अर्थव्यवस्था पर गम्भीर सुरक्षा खतरा खड़ा हो गया है, क्योंकि 19 जुलाई 2010 से पहले इस कम्पनी द्वार सप्लाई किए गये कागजों की पूर्ण जाँच की जानी चाहिए। वित्त मंत्रालय ने पूरे विस्तार से गृह मंत्रालय को लिखा कि इस सम्बन्ध में क्या-क्या किया जाना चाहिए और जो खराब नोट पेपर आ गया है उसका क्या किया जाए तथा इस सम्बन्ध में डे-ला-रु कम्पनी से कानूनी रूप से मुआवज़ा कैसे हासिल किया जाए, परन्तु वह फ़ाइल गृह मंत्रालय में धूल खाती रही।


मजे की बात तो यह कि जब इस मुद्दे पर वित्त मंत्रालय ने कानून मंत्रालय से सलाह ली तो 5 जुलाई 2011 को उन्हें यह जानकर झटका लगा कि डे-ला-रू कम्पनी और भारतीय मुद्रा प्राधिकरण के बीच जो समझौता(?) हुआ है, उसमें ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं है कि यदि नोट के कागज़ सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरे तो सौदा रद्द कर दिया जाएगा। एटॉर्नी जनरल एजी वाहनवती ने इंडियन एक्सप्रेस को दिये गये एक इंटरव्यू में कहा कि, “मुझे आश्चर्य है कि जैसे ही नोट पेपर के दोषपूर्ण होने की जानकारी हुई, इसके बाद भी डे-ला-रू कम्पनी से और कागज मंगवाए ही क्यों गये?

यानी इसका अर्थ यह हुआ कि जो 1370 मीट्रिक टन नोट छापने का कागज भारत में रद्दी की तरह पड़ा है वह डूबत खाते में चला गया, न ही उस ब्रिटिश कम्पनी को कोई सजा होगी और न ही उससे कोई मुआवजा वसूला जाएगा। इस कागज का आयात करने में लाखों डालर की जो विदेशी मुद्रा चुकाई गई, वह हमारे-आपके आयकर के पैसों से…। भारत में तो मामला वित्त, गृह और कानून मंत्रालय में उलझा और लटका ही रहा, उधर कम से कम डे-ला-रू कम्पनी ने अपनी गलती को स्वीकारते हुए कम्पनी के चीफ़ एक्जीक्यूटिव ऑफ़िसर, करंसी डिवीजन के निदेशक एवं डायरेक्टर सेल्स से इस्तीफ़ा ले लिया है, तथा इन कागजों के निर्माण में लगे कर्मचारियों पर भी जाँच बैठा दी है।

सभी जानते हैं कि नकली नोट भारत के बाजारों में खपाने में पाकिस्तान का हाथ है, लेकिन फ़िर भी हम पाकिस्तान को “मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन” का दर्जा देकर उससे व्यापार बढ़ाने में लगे हुए हैं। सुरक्षा एजेंसियों ने वाघा बॉर्डर, समझौता एक्सप्रेस और थार एक्सप्रेस के जरिये नकली नोटों के कई बण्डल पकड़े हैं, इसके अलावा नेपाल-भारत सीमा पर गोरखपुर, रक्सौल के रास्ते तथा बांग्लादेश-असम की सीमा से नकली नोट बड़े आराम से भारतीय अर्थव्यवस्था में खपाए जा रहे हैं। स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि अब तो उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के कुछ बैंकों की “चेस्ट” (तिजोरी) में भी नकली नोट पाए गये हैं, जिसमें बैंककर्मियों की मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता…

फ़िलहाल हम सिर्फ़ पिछले 10-12 दिनों में ही पकड़ाए नकली नोटों की घटनाओं को देख लें तो समझ में आ जाएगा कि स्थिति कितनी गम्भीर है…

Jan 9 2012

झारखण्ड में एक स्कूल शिक्षक (बब्लू शेख) के यहाँ से पुलिस ने 9600 रुपये के नकली नोट बरामद किये। यह शिक्षक देवतल्ला का रहने वाला है, लेकिन पुलिस जाँच में पता चला है कि यह बांग्लादेश का निवासी है और झारखण्ड में संविदा शिक्षक बनकर काम करता था, फ़िलहाल बबलू शेख फ़रार है।
http://www.indianexpress.com/news/Rs-9-600-in-fake-notes-seized-from-J-khand-teacher-s-house/897515/

Jan 7th 2012


NIA की जाँच शाखा ने 7 जनवरी 2012 को एक गैंग का पर्दाफ़ाश करके 11 लोगों को गिरफ़्तार किया। इसके सरगना मोरगन हुसैन (पश्चिम बंगाल “मालदा” का निवासी) से 27,000 रुपये के नकली नोट बरामद हुए। पुलिस “धुलाई” में हुसैन ने स्वीकार किया कि उसे यह नोट बांग्लादेश की सीमा से मिलते थे जिन्हें वह पश्चिम बंग के सीमावर्ती गाँवों में खपा देता था।
http://www.hindustantimes.com/India-news/Hyderabad/NIA-busts-major-counterfeit-currency-racket-with-Pak-links/Article1-792860.aspx


Jan 2 2012

गुजरात के पंचमहाल जिले में पुलिस के SOG विशेष बल ने, एक शख्स मोहम्मद रफ़ीकुल इस्लाम को गिरफ़्तार करके उससे डेढ़ लाख रुपये की नकली भारतीय मुद्रा बरामद की। ये भी पश्चिम बंग के मालदा का ही रहने वाला है, एवं इसे गोधरा के एक शख्स से ये नोट मिलते थे, जो कि अभी फ़रार है।
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2012-01-02/vadodara/30581292_1_currency-notes-fake-currency-state-anti-terrorist-squad


Dec 29 2011


सीमा सुरक्षा बल ने शिलांग (मेघालय) में भारत-बांग्लादेश सीमा स्थित पुरखासिया गाँव से मोहम्मद शमीम अहमद को भारतीय नकली नोटों की एक बड़ी खेप के साथ पकड़ा है, शमीम, बांग्लादेश के शेरपुर का निवासी है।
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2011-12-29/guwahati/30569256_1_fake-indian-currency-currency-notes-bsf-troops


Dec 29 2011


आणन्द की स्पेशल ब्रांच ने सूरत में छापा मारकर नेपाल निवासी निखिल कुमार मास्टर को गिरफ़्तार किया और उससे एक लाख रुपये से अधिक के नकली नोट बरामद किये। पूछताछ जारी है…
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2011-12-29/vadodara/30568259_1_currency-notes-fake-currency-racket

अब आप सोचिये कि जब पिछले 10-12 दिनों में ही देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी मात्रा में नकली नोट बरामद हो रहे हैं, तो “अहसानफ़रामोश” बांग्लादेशियों ने पिछले 8-10 साल में भारतीय अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान पहुँचाया होगा। ज़ाहिर है कि इन “भिखमंगे” बांग्लादेशियों के पास ये नकली नोट कहाँ से आते हैं, सभी जानते हैं, लेकिन करते कुछ भी नहीं…

सबसे पहला सवाल तो यही उठता है कि क्या 64 साल बाद भी हम इतने गये-गुज़रे हैं कि नोट का मजबूत सुरक्षा प्रणाली वाला कागज हम भारत में पर्याप्त मात्रा में निर्माण नहीं कर सकते? क्यों हमें बाहर के देशों से इतनी महत्वपूर्ण वस्तु का आयात करना पड़ता है? तेलगी के स्टाम्प पेपर घोटाले में भी यह बात सामने आई थी कि सबसे बड़ा “खेल” प्रिण्टिंग प्रेस” के स्तर पर ही खेला जाता था, ऐसे में डे-ला-रू कम्पनी के ऐसे “डिफ़ेक्टिव” कागज पाकिस्तान के हाथ भी तो लग सकते हैं, जो उनसे नकली नोटों की छपाई करके भारत में ठेल दे? घटनाओं को देखने पर लगता है कि ऐसा ही हुआ है। क्योंकि हाल ही में पकड़ाए गये नकली नोट इतनी सफ़ाई से बनाए गये हैं, कि बैंककर्मी और CID वाले भी धोखा खा जाते हैं…। जब नकली नोटों की पहचान बैंककर्मी और विशेषज्ञ ही आसानी से नहीं कर पा रहे हैं तो आम आदमी की क्या औकात, जो कभी-कभार ही 500 या 1000 का नोट हाथ में पकड़ता है?

दो सवाल और भी हैं… 
1) मिसाइल और उपग्रह तकनीक और स्वदेशी निर्माण होने का दावा करने वाला भारत नोटों के कागज़ आखिर बाहर से क्यों मँगवाता है, यह समझ से परे है…।

2) नकली नोटों के सरगनाओं के पकड़े जाने पर उन्हें "आर्थिक आतंकवादी" मानकर सीधे मौत की सजा का प्रावधान क्यों नहीं किया जाता?

खैर… रही बात विभिन्न सरकारों और मंत्रियों की, तो वे “नकली नोटों की समस्या पर चिंता जताने…”, “कड़ी कार्रवाई करेंगे, जैसी बन्दर घुड़की देने…”, का अपना सनातन काम कर ही रहे हैं…।

Vote Bank Politics, Supreme Court of India and Masjid Reconstructed

Written by शुक्रवार, 06 जनवरी 2012 17:54
वोट बैंक राजनीति के सामने, सुप्रीम कोर्ट के आदेश की क्या औकात…?

31 जुलाई 2009 को सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के पश्चात जस्टिस दलबीर भण्डारी एवं जस्टिस मुकुन्दकम शर्मा ने अपने आदेश में कोलकाता के नज़दीक डायमण्ड हार्बर की एक अदालत के परिसर में स्थित एक मस्जिद को हटाने के आदेश दिये थे। सुप्रीम कोर्ट में आए कागज़ातों के अनुसार यह मस्जिद अवैध पाई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को लगभग 2 वर्ष बीत चुके, और एक निश्चित समय सीमा में  मस्जिद को हटाने के निर्देश दिये गये थे। आज की तारीख में डायमण्ड हार्बर स्थित उसी क्रिमिनल कोर्ट के परिसर में उसी स्थान पर पुनः एक मस्जिद का निर्माण किया जा रहा है…। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियाँ उड़ाते हुए डायमण्ड हार्बर के SDO ने इसके निर्माण की अनुमति दे दी है। इस मामले में दक्षिण 24 परगना जिले के मन्दिर बाजार स्थित राइच मोहल्ले के एक मुस्लिम नेता का हाथ बताया जा रहा है। 

सूत्रों के अनुसार राइच मोहल्ले के इन मुस्लिम नेताओं का क्षेत्र के SDO पर इतना दबाव है कि वे अपनी मनमर्जी के टेण्डर पास करवाकर सिर्फ़ मुस्लिम व्यवसाईयों को ही टेण्डर लेने देते हैं (बिहार के रेत खनन माफ़िया की तरह एक गैंग बनाकर)। राइच मोहल्ला के कुछ मुस्लिमों ने डायमण्ड हार्बर स्थित हाजी बिल्डिंग पारा के तीर्थ कुटीर में चलाये जा रहे “गोपालजी ट्रस्ट” की भूमि पर भी अतिक्रमण कर लिया है, लेकिन SDO के ऑफ़िस में इस हिन्दू संगठन की कोई सुनवाई नहीं हो रही…। राजनैतिक दबाव इसलिए काम नहीं कर सकता, क्योंकि वामपंथी एवं तृणमूल कांग्रेस, दोनों ही मुस्लिम वोटरों को नाराज़ करना नहीं चाहते


पश्चिम बंगाल स्थित संस्था “हिन्दू सम्हति” के कार्यकर्ताओं ने मस्जिद तोड़े जाने तथा उसके पुनः निर्मित किये जाने के वीडियो फ़ुटेज एकत्रित किए हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा ढहाई गई अवैध मस्जिद के स्थान पर ही दूसरी मस्जिद के निर्माण की गतिविधियाँ साफ़ देखी जा सकती हैं। स्थानीय अपुष्ट सूत्रों के अनुसार इस कार्य की अनुमति प्राप्त करने के लिए 10 लाख रुपये की रिश्वत, उच्चाधिकारियों को दी गई है…

(डायमण्ड हार्बर से हिन्दू सम्हति के श्री राज खन्ना की रिपोर्ट पर आधारित…
http://southbengalherald.blogspot.com/2011/12/illegal-mosque-construction-within.html 

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चलते-चलते एक निगाह इस खबर पर भी…:-
पश्चिम बंग से ही सटे हुए बांग्लादेश के सिलहट में एक स्कूल के वार्षिकोत्सव के दौरान हिन्दू बच्चों एवं उनके पालकों को जानबूझकर “गौमांस” परोसा गया। भोजन का बहिष्कार करने एवं विरोध प्रदर्शन के बाद स्कूल प्रबन्धन ने मामला रफ़ा-दफ़ा कर दिया…। उल्लेखनीय है कि इस “अग्रगामी गर्ल्स स्कूल” की स्थापना, ख्यात समाजसेविका देवी चौधरानी ने की थी, परन्तु बांग्लादेश हो या पाकिस्तान, अल्पसंख्यक हिन्दुओं को नीचा दिखाने तथा उनका धार्मिक अपमान करने का कोई मौका गँवाया नहीं जाता…