आप क्या सोचते हैं ?

Written by शनिवार, 21 अप्रैल 2007 10:41

आजादी के ६० वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भारत के बारे में विभिन्न आयु समूहों की सोच अलग-अलग हो गई है । आप क्या सोचते हैं, यह इस बात पर निर्भर हो गया है कि आप कौन हैं, आप क्या हैं, आपकी जाति क्या है, धर्म क्या है, शिक्षा क्या है, अमीर हैं या गरीब हैं आदि खाँचों में हमारी सोच बँटी हुई है । कहा जाता है कि देश, काल और परिस्थिति के अनुसार मनुष्य की सोच और उसका व्यवहार बदलता रहता है, परन्तु भारत के बारे में यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि यहाँ बहुसंख्यक अवाम की कोई सोच (जिसे हम "विचार" कहते हैं) विकसित हुई ही नहीं ।

एक तरफ़ तो हम देखते हैं कि इसराईल जैसे देश में जब रेडियो पर भी राष्ट्रीय गीत की धुन बजती है तो लोगबाग अपनी कारें रोक कर बाहर निकलकर खडे हो जाते हैं और दूसरी तरफ़ हमारे देश के एक महान (?) नेता राष्ट्रगीत के समय आराम से सोफ़े पर पसरे रहते हैं(देखें चित्र), यह सब क्या है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें आजादी इसलिये मिल गई कि ब्रिटिश भी विश्वयुद्ध के बाद यहाँ से उकता चुके थे और जाने-अनजाने गाँधी के सत्याग्रह और अहिंसा ने उन्हें ही आजादी प्राप्त करने वाले का "आइकॉन" बना दिया था ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें आजादी रक्तहीन (बाकी कई राष्ट्रों की तुलना में कम रक्त बहाकर) आन्दोलन से मिल गई ? आज देशभक्ति, ईमानदारी, वफ़ादारी, संवेदनापूर्ण हृदय जैसी बातें किताबी लगती हैं, विश्वास ही नहीं होता कि हमारा देश सिर्फ़ ६० वर्ष पहले आजाद हुआ था । आज की परिस्थिति को देखकर आश्चर्य होता है कि हमें आजादी मिल कैसे गई ? उस वक्त लोगों में देशभक्ति, ईमानदारी और नैतिकता की कैसी भावना थी, जो उन्होंने अंग्रेजों से संघर्ष किया और हमें स्वतंत्रता दिलाई, यह प्रश्न मन में इसलिये उठता है, क्योंकि जैसा कि पहले कहा गया "मात्र" (किसी राष्ट्र के जीवन में ६० वर्ष कोई बडा़ वक्फ़ा नहीं है) ६० वर्षों में हम पतन की पराकाष्ठा पर पहुँच गये ? ऐसा क्यों हुआ ? या जो हो रहा है, वैसा क्यों हो रहा है ? भाषा-धर्म को लेकर हो रहे दंगे, रग-रग में फ़ैल चुका भ्रष्टाचार और बेईमानी, तेजी से बढते अपराध और अब राजनीति और अपराध का खतरनाक घालमेल, शिक्षा का गिरता स्तर, पारम्परिक डिग्रियों का मात्र एक कागज रह जाना, शिक्षा के प्रसार के ढोल पीटने के बावजूद सार्वजनिक और नागरिक जीवन में लोगों में बढती अराजकता और उद्दण्डता, गन्दे कुकुरमुत्ते की तरह फ़ैलती और हमें मुँह चिढाती "काँटा लगा" और राखी-शिल्पा टाईप की संस्कृति, कन्या पूजने और स्त्री को माता मानने का ढोंग करने वालों के हाथों भ्रूण हत्या, बिका हुआ और लगभग भद्दी नौटंकी की हद तक जा चुका इलेक्ट्रानिक मीडिया....क्या-क्या और कितना गिनवाया जाये, इसका कोई अन्त नहीं है । आखिर यह विस्फ़ोटक स्थिति आई कैसे ? यह कोई रातोंरात होने वाली बातें तो नहीं हैं ? जाहिर है कि हमसे प्रारम्भ से ही भीषण गलतियाँ हो गई हैं । उसका परिमार्जन कैसे किया जा सकता है ? दरअसल आजादी के बाद आम जनता, जिसमें अशिक्षितों का प्रतिशत काफ़ी ज्यादा था, ने देश को संवारने का जिम्मा राजनीति और नेताओं पर छोड दिया, और नेताओं ने भी आम जनता को सबसे आवश्यक बात "शिक्षा", "स्वास्थ्य" और "बुनियादी ढाँचे का विकास" इन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया । इन्हीं तीन मूलभूत बातों के अभाव में जनसंख्या वृद्धि, पर्यावरण विनाश और सामाजिक ताने-बाने में ओजोन परत से भी बडे छेद, जैसी विराट समयाओं को जन्म दिया । जिस प्रकार की विविधताओं वाला हमारा देश है, उसमें सर्वमान्य और एकछत्र नेता मिलना दुर्लभ है । इसीलिये आजादी के बाद से ही हम "मेरा देश" की भावना विकसित नहीं कर पाये और मेरा घर, मेरा परिवार, मेरे बच्चे तक ही सीमित होकर रह गये । ऐसा नहीं कि हमने कुछ किया ही नहीं, बेशक भारत ने जबरदस्त तरक्की की है, विज्ञान, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य, कम्प्यूटर, शिक्षा, सेना, अर्थात लगभग सभी क्षेत्रों में । परन्तु... फ़िर वही बात कि इस विकास में महती योगदान व्यक्तोयों का रहा, न कि नेताओं या राजनीति का । विभिन्न लोगों ने अपने व्यक्तिगत प्रयास और अथक मेहनत करके भारत का और अपना नाम रोशन किया है, जाहिर है बेहतर अवसर मिलने पर ही, और विडम्बना यह है कि इस विशाल मानव समुद्र का हम बेहतर उपयोग नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि स्थिति यह हो गई है कि जिसके पास पैसा है वही सारी सुविधायें छीनता जा रहा है, और गरीब आदमी दिनोंदिन गर्त में जा रहा है । एक साजिश के तहत इस देश में मात्र दस प्रतिशत लोगों का राज सदा चला आ रहा है, पच्चीस प्रतिशत लोग उनके आदेशों का पालन करते हैं, और बाकी बचे पैंसठ प्रतिशत (जिनके लिये नीतियाँ बनाई जाती हैं) वे तो सदा दो जून की रोटी के संघर्ष में इतने घिस-पिट चुके हैं कि कोई विरोध करने के लिये अब उनके हाथ उठते तक नहीं । देश को जगाना है, या उसे दुनिया में एक शक्ति के रूप में बनाना है, तो सबसे पहले उन पैंसठ प्रतिशत लोगों की हालत सुधारनी होगी, और यह काम कोई व्यक्ति या संस्था नहीं कर सकती, यह काम तो सामूहिक जिम्मेदारी का है । विदेशों में भारतीयों की सफ़लता ने इस बात को रेखांकित किया है कि बेहतर सामाजिक, आर्थिक, नागरिक और राजनैतिक वातावरण मिलने पर हम भारतीय कुछ भी कर सकते हैं, और इस वातावरण के निर्माण के लिये अब एक "सम्पूर्ण क्रांति" की आवश्यकता है.... एक ऐसा सैलाब जो सारी गन्दगी को बहा ले जाये... आप क्या सोचते हैं ?

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