इस लेख के पहले भाग में आपने हिन्दू कालगणना की सटीकता एवं उसके वैज्ञानिक आधार के बारे में पढ़ा है... (उसे पढने के लिए यहाँ क्लिक करें). पेश है इसी लेख का दूसरा भाग, जिसमें और भी विस्तार से तथ्यों सहित पश्चिमी काल-विभाजन को खोखला सिद्ध किया गया है. 

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हाल ही में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, विक्रम संवत् 2086 अर्थात सनातन हिन्दू नववर्ष मनाया गया. जहाँ तक उत्सव मनाने की बात है, उत्सवधर्मी भारतीय दोनों ही अवसरों पर मौज-मस्ती कर लेते हैं.

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सन् 2015 में अमेरिका के यू. एस. फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के यह स्वीकार करने के बाद कि भोजन में कोलेस्ट्रॉल लेने का दिल की बीमारियों में कोई संबंध नहीं है, साबित हो गया कि कोलेस्ट्रॉल युक्त भोजन को ना लेने का कोई कारण नहीं है।

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पश्चिमी सभ्यता को मानने वालों का विश्वास है कि विज्ञान ग्रीस में जन्मा (Greek Claim of Mathematics and Science) और वहीं से दुनिया भर में फैला। ज्ञान विज्ञान के प्रति मनुष्य जाति में सदैव ही तीव्र जिज्ञासा रही है।

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अक्सर आपने कुछ "कथित इतिहासकारों" के मुँह से यह सुना होगा, कि "भारत तो कभी एक राष्ट्र था ही नहीं...", "यह तो टुकड़ों में बंटा हुआ एक भूभाग है, जिसे जबरन राष्ट्रवाद के नाम पर एक रखने का प्रयास किया जाता है...".

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हाल ही में ताजमहल को लेकर खामख्वाह एक विवाद पैदा किया गया कि योगी सरकार ने इसे उत्तरप्रदेश के दर्शनीय स्थलों की सूची से बाहर क्यों कर दिया. वास्तव में प्राचीन भारत की वास्तुकला को लेकर फर्जी इतिहासकारों ने भारतीयों के मनोमस्तिष्क में इतने नकारात्मक भाव भर दिए हैं कि उन्हें विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा बनाई गयी वास्तुकलाओं और लाशों पर बने मज़ार के ऐसे भवनों में अच्छाई दिखाई देती है, जिसके निर्माण के बाद कारीगरों के हाथ काट दिए गए हों.

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मित्रों क्या आप 1500 वर्ष पुराने सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में खड़े बाणस्तम्भ की विलक्षणता के विषय मे जानते हैं? ‘इतिहास’ बडा चमत्कारी विषय है इसको खोजते खोजते हमारा सामना ऐसे स्थिति से होता है की हम आश्चर्य में पड जाते हैं! पहले हम स्वयं से पूछते हैं यह कैसे संभव है?

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अधिकतर लोगों ने कौटिल्य अर्थात चाणक्य के "अर्थशास्त्र" के बारे में केवल सुना ही सुना है, पढ़ा शायद ही किसी ने हो. इस संक्षिप्त लेख में चाणक्य द्वारा लिखे गए सूत्रों, नियमों एवं अनुपालनों को समझाने का प्रयास किया गया है, ताकि दिमाग पर अधिक बोझ भी न पड़े और पूरा कौटिल्य अर्थशास्त्र सरलता से समझ में भी आ जाए.

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भारतीय परम्परा में यदि हम धातुकर्म को खोजना चाहें, तो विष्णु पुराण अनुसार ईश्वर निमित्त मात्रा है और वह सृजन होने वाले पदार्थों में है, जहां सृजन हो रहा है, वहीं ईश्वर है।

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भारत में 200 वर्ष पहले आँखों की सर्जरी होती थी...शीर्षक देखकर आप निश्चित ही चौंके होंगे ना!!! बिलकुल, अक्सर यही होता है जब हम भारत के किसी प्राचीन ज्ञान अथवा इतिहास के किसी विद्वान के बारे में बताते हैं तो सहसा विश्वास ही नहीं होता. क्योंकि भारतीय संस्कृति और इतिहास की तरफ देखने का हमारा दृष्टिकोण ऐसा बना दिया गया है

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