New Year Celebration Marketing & Hindu Traditions

उज्जैन स्थित महाकालेश्वर का मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसका खासा महत्व माना जाता है। यहाँ प्रातःकाल 4 बजे होने वाली “भस्मार्ती” (भस्म-आरती) भी प्रसिद्ध है जिसके लिये देश-विदेश से श्रद्धालु पहुँचते हैं। इस भस्मार्ती में रोज शामिल होने वाले 100 लोगों के अलावा बाहर से आने वालों के लिये 100 विशेष पास जारी किये जाते हैं। गत कुछ वर्षों से देखने में आया है कि 31 दिसम्बर की रात (या कहें कि 1 जनवरी को तड़के) की भस्मार्ती के लिये बहुत भीड़ होने लगी है। श्रद्धालुओं(?) का कहना है कि नववर्ष के पहले दिन का प्रारम्भ वे महाकालेश्वर के दर्शन करने के बाद ही करना चाहते हैं। इस वर्ष भीड़ को देखते हुए उज्जैन जिला प्रशासन ने बाहरी 100 लोगों के अलावा भी थोड़े पास वितरित करने की योजना रखी थी, लेकिन भक्तों(?) की भारी भीड़ के चलते 23 दिसम्बर को ही पास समाप्त हो गये और मन्दिर प्रशासन को लोगों को भस्मार्ती के पास के लिये मना करना पड़ा, जो कि गर्भगृह की क्षमता को देखते हुए उचित कदम था। 23 दिसम्बर से लेकर 31 दिसम्बर तक भक्तों(?) और श्रद्धालुओं(?) ने पास के लिये जुगाड़ लगाईं, जोड़-तोड़ किये, प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव डलवाये, और फ़िर भी कुछ वीवीआईपी अपने रुतबे का जलवा दिखाते हुए भस्मार्ती वाली सुबह मन्दिर में “विशेष गेट और विशेष पास” से घुसने में कामयाब रहे… इस तमाम भूमिका की वजह यह प्रश्न हैं कि “बेजा और ठसियलपने की हद तक जाकर पास जुगाड़ कर नववर्ष के पहले दिन सूर्योदय से पहले ही महाकालेश्वर के दर्शन करने की यह जिद आखिर क्यों?”… क्या इसी खास दिन “इतनी नाजायज़ मेहनत”(?) से सबसे पहले भगवान के दर्शन करने से कोई विशेष पुण्यलाभ मिलने वाला है?… और सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या यह भारत का अथवा हिन्दुओं का नववर्ष है भी?… साफ़तौर पर नहीं। यह दिन तो विशुद्ध रूप से ईसाई नववर्ष है, ईस्वी सन् है। हैदराबाद से प्राप्त समाचारों के अनुसार तिरुपति बालाजी के मुख्य पुजारियों श्री एमवी सौंदाराजन और सीएस गोपालकृष्ण ने बाकायदा एक अपील जारी करके धर्मालुओं(?) को आगाह किया कि ईसाई नववर्ष के इस मौके पर मन्दिर में खामख्वाह भीड़ न बढ़ायें, इस दिन किसी भी प्रकार की विशेष आरती आदि नहीं की जायेगी और न ही मन्दिर के पट खुलने-बन्द होने के समय में बदलाव किया जायेगा। दोनो पुजारियों ने स्पष्ट कहा कि हिन्दुओं का नववर्ष 1 जनवरी से नहीं शुरु होता, तेलुगू लोगों का नववर्ष “उगादि” पर तथा केरल का नववर्ष “विसू” के तौर पर मनाया जाता है, इसलिये ख्रिस्ती नववर्ष के दिन प्रार्थना करने से कोई विशेष आध्यात्मिक लाभ नहीं होने वाला है। इतना सब कुछ बताने के बावजूद कई धर्मालु(?) 1 जनवरी को अलसुबह मन्दिर में भीड़ करने पहुँच गये थे।

भारत के विभिन्न भागों में विभिन्न धर्म समूहों के नववर्ष अलग-अलग मनाये जाते हैं, फ़िर भी सामान्य तौर पर अप्रैल माह में पड़ने वाला गुड़ी पड़वा (चैत्र शुक्ल प्रथमा) को हिन्दू नववर्ष माना जाता है, इसी प्रकार मुस्लिमों का हिजरी सन और पारसियों आदि के नववर्ष भी साल में अलग-अलग समय पर आते हैं। फ़िर यह ईस्वी सन् को धूमधड़ाके से मनाने की यह परम्परा भारत (और कुछ हद तक समूचे विश्व) में क्यों बढ़ रही है? यदि विश्लेषण किया जाये तो इसके पीछे बाजार की शक्तियाँ प्रमुख होती हैं, जिन्होंने विभिन्न प्रसार माध्यमों के जरिये समूचे विश्व में यह स्थापित कर दिया है कि 1 जनवरी ही नववर्ष है और इसे “धूमधाम से मनाया” जाना चाहिये। जाहिर है कि जिस तरह से वेलेन्टाईन डे, पेरेण्ट्स डे, मदर्स डे, फ़ादर्स डे आदि “कुकुरमुत्ते” दिनोंदिन अपने पैर पसारते जा रहे हैं, उसके पीछे मानसिकता सिर्फ़ और सिर्फ़ “बाजार” है। तर्क देने वाले कह सकते हैं कि आखिर इसमें क्या खराबी है, यदि इस बहाने लोग उत्सवप्रियता का आनन्द लेते हैं और बाजार में पैसे का चलन बढ़ता है तो इसमें क्या बुराई है? सही बात है, कोई बुराई नहीं है… 1 जनवरी जरूर जोरशोर से मनाओ, लेकिन इसके लिये गुड़ी पड़वा को भूलना जरूरी है क्या? जितना धूमधड़ाका, शोरशराबा, हो-हल्ला, पटाखे आदि 31 दिसम्बर की रात को किया जाता है क्या उसका दस प्रतिशत भी हिन्दू नववर्ष को किया जाता है? जितने उल्लास से और अनाप-शनाप पैसा खर्च करके 31 दिसम्बर मनाया जाता है, क्या “उगादि” भी वैसा मनाया जाता है? हिन्दू नववर्ष कब से शुरु होता है इसकी जानकारी का सर्वे किया जाये तो चौंकाने वाले आँकड़े निकल सकते हैं। क्या प्रकारान्तर से यह “एक दिन का धर्मान्तरण” नहीं है? सवाल ये नहीं है कि 1 जनवरी की “मार्केटिंग” सही तरीके से की गई है इसलिये यह अधिक लोकप्रिय है, बल्कि सवाल यह है कि क्या मार्केटिंग कम्पनियाँ अपना माल नहीं बेचेंगी तो हम अपना पारम्परिक धार्मिक नववर्ष भी भूल जायेंगे? दारू पीने और मुर्गे खाने को मिलता है इसलिये 31 दिसम्बर याद रखा जायेगा और चूँकि रात-बेरात लड़कियों के साथ घूमने का मौका नहीं मिलेगा इसलिये गुड़ी पड़वा को भूल जायेंगे? 200 साल की अंग्रेजी मानसिक गुलामी ने धीरे-धीरे भारत की जनता को सांस्कृतिक रूप से खोखला कर दिया है।

2009 साल पहले हुई एक घटना के आधार पर आज समूचा विश्व नववर्ष मनाता है, पश्चिम की अंधी नकल करने में माहिर हम भारतवासी भी देखादेखी ईस्वी नववर्ष मनाने लगे हैं। ऐसे-ऐसे गाँव-कस्बों में भी ढाबों-होटलों आदि में जश्न मनाये जाने लगे हैं जहाँ न तो बिजली ठीक से मिलती है, न ही ढंग की सड़क उपलब्ध है, लेकिन फ़िर भी अंधी दौड़ में सब मिलकर बहे जा रहे हैं, क्या 2009 वर्ष पहले इस दुनिया में कुछ था ही नहीं? या 2009 वर्ष पहले दुनिया में न पंचांग थे, न ही काल गणना की जाती थी? जिस प्रकार धर्म परिवर्तन करने के बाद व्यक्ति उस धर्म के त्यौहारों, परम्पराओं को अपनाने लगता है, उसी प्रकार “बाजार” की शक्तियाँ भारत में “एक दिन का धर्मान्तरण” करने में सफ़ल होती हैं। बच्चे-बूढ़े-जवान सभी देर रात तक एक दूसरे को “हैप्पी न्यू ईयर” कहते पाये जाते हैं, ये और बात है कि इनमें से 20% भी गुड़ी पड़वा को “नूतन वर्ष की शुभकामनायें” कहते हुए नहीं दिखाई देते। क्या सिर्फ़ 200 साल की अंग्रेजी गुलामी और 60 साल की आज़ादी(??) में हमारा इतना सांस्कृतिक क्षरण हो गया? कि हम “अपने” ही त्यौहार भूलने लगे हैं। और यदि वाकई में पश्चिम की नकल करना है तो उनकी समय की पाबन्दी की करो, अधिकार के साथ-साथ नागरिक कर्तव्यों के निर्वहन की नकल करो, उनके छोटे-छोटे कानूनों के पालन की नकल करो, उनके सफ़ाईपसन्द व्यवहार की नकल करो, उनके कतार में खड़े रहने की नकल करो… लेकिन भारत के अकर्मण्य और पलायनवादी लोग आसान काम की नकल करते हैं, कठिन काम की नहीं, और आसान काम है पश्चिम की देखादेखी फ़लाने-डे, ढिमाके-डे और न्यू ईयर की फ़ूहड़ डांस पार्टियों की नकल।

अन्तिम पंच लाईन - हिन्दुओं में ही सर्वाधिक धर्मान्तरण क्यों होता है इसका जवाब अगले दो सवालों में है – 1) कितने मुस्लिम हैं जो इस “अंग्रेजी नववर्ष के उपलक्ष्य में” मस्जिदों में विशेष नमाज अदा करने जाते हैं? 2) भारत में कितने चर्च हैं जहाँ गुड़ी पड़वा या उगादि के दिन विशेष घंटियाँ बजाई जाती हैं? ज़रा सोचिये कि हम कहाँ जा रहे हैं… आप कितने ही दरियादिल, कितने ही “सेकुलर”(?), कितने ही “सर्वधर्मसमभाववादी” क्यों न हों, “यदि आप मौसी को माँ कहना चाहते हैं तो शौक से कहें, लेकिन ‘माँ’ को न भूलें…”


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Mumbai Terror Attacks India-America and Pakistan

मुम्बई हमले को एक माह होने को आया, गत एक साल में 60 से ज्यादा बम विस्फ़ोट हो चुके, संसद पर हमले को आठ साल हो गये, कारगिल हुए दस साल बीत गये, भारत नाम की कथित “महाशक्ति” लगता है कि आज भी वहीं की वहीं है। मुझे आज तक पता नहीं कि भारत को महाशक्ति (या क्षेत्रीय महाशक्ति) का नाम किसने, कब और क्यों दिया था। महाशक्ति की परिभाषा क्या होती है, इसे लेकर भी शायद विभिन्न मत होंगे, इसीलिये किसी विद्वान(?) ने भारत को महाशक्ति कहा होगा।

चीन ने अमेरिका के जासूसी विमान को अपनी सीमा का उल्लंघन करने पर उसे रोक रखा और तब तक रोक कर रखा जब तक कि अमेरिका ने नाक रगड़ते हुए माफ़ी नहीं माँग ली। रूस, चेचन अलगाववादियों पर लगातार हमले जारी रखे हुए हैं, हाल ही में जॉर्जिया के इलाके में अपने समर्थकों के समर्थन और नई सीमाओं को गढ़ने के लिये रूस ने जॉर्जिया पर भीषण हमले किये। 9/11 के बाद अमेरिका ने न ही संयुक्त राष्ट्र से औपचारिक सहमति ली, न ही किसी का समर्थन लिया, वर्षों पहले जापान ने भी यही किया था। ब्रिटेन हजारों मील दूर अपने फ़ॉकलैण्ड द्वीप को बचाने के लिये अर्जेण्टीना से भी भिड़ गया था और उसे घुटने पर बैठाकर ही युद्ध का खत्मा किया… महाशक्तियाँ ऐसी होती हैं… अलग ही मिट्टी की बनी हुई, अपने देश का स्वाभिमान बनाये रखने के लिये किसी भी हद तक जाने वाली… इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में 1971 के आधे-अधूरे ही सही भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद गत 39 वर्षों में भारत ने अब तक क्या किया है… किस आधार पर इसे कोई महाशक्ति कह सकता है? क्या सिर्फ़ इसलिये कि यह देश सबसे अधिक संख्या में “सॉफ़्टवेयर मजदूर” पैदा करता है (पहले गन्ना कटाई के लिये यहाँ से मजदूर मलेशिया, मालदीव, फ़िजी, तंजानिया, केन्या जाते थे, अब सॉफ़्टवेयर मजदूर अमेरिका जाते हैं), या महाशक्ति सिर्फ़ इसलिये कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा अपना माल खपाने के लिये यहाँ करोड़ों की संख्या में मध्यमवर्गीय मूर्ख मौजूद हैं, या इसलिये कि भारत हथियारों, विमानों का सबसे बड़ा ग्राहक है? कोई मुझे समझाये कि आखिर महाशक्ति हम किस क्षेत्र में हैं? क्या सिर्फ़ बढ़ती आर्थिक हैसियत से किसी देश को महाशक्ति कहा जा सकता है? भारत को अमेरिका बराबर की आर्थिक महाशक्ति बनने में अभी कम से कम 30 साल तो लग ही जायेंगे, फ़िलहाल हम “डॉलर” की चकाचौंध के आगे नतमस्तक हैं, फ़िर इस तथाकथित “क्षेत्रीय महाशक्ति” की सुनता या मानता कौन है? नेपाल? बांग्लादेश? श्रीलंका? म्यांमार… कोई भी तो नहीं।



मुम्बई हमलों के बाद मनमोहन सिंह जी ने देश को सम्बोधित किया था। एक परम्परा है, किसी भी बड़े हादसे के बाद प्रधानमंत्री देश को सम्बोधित करते हैं सो उन्होंने भी रस्म-अदायगी कर दी। इतने बड़े हमले के बाद राष्ट्र को सम्बोधन करते समय अमूमन कुछ “ठोस बातें या विचार” रखे जाते हैं, लेकिन सीधे-सादे प्रधानमंत्री उस वक्त भी सीधे-सादे बने रहे और माफ़ी माँगते नज़र आये। अपने सम्बोधन में उन्होंने मुख्यतः तीन बातें कही थीं, उन्होंने आतंकवादियों को धमकी की भाषा भी बड़े मक्खन लगाने वाले अन्दाज़ में दी। उन्होंने कहा कि 1) “हम आतंकवादी गुटों और उनके आकाओं को मिलने वाली आर्थिक मदद को रोकेंगे”, 2) देश में घुसने वाले हरेक संदिग्ध व्यक्ति को रोकने के उपाय किये जायेंगे, 3) हम आतंक फ़ैलाने वालों, उनकी मदद करने वालों और उन्हें पनाह देने वालों का पीछा करेंगे और उन्हें इस कृत्य की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी… सुनने में यह बातें कितनी अच्छी लगती हैं ना!!! 9/11 के बाद लगभग इसी से मिलती-जुलती बातें जॉर्ज बुश ने अपने राष्ट्र के नाम सम्बोधन में कही थीं, और दुनिया ने देखा कि कम से कम आखिरी दो मुद्दों पर उन्होंने गम्भीरता से काम किया है और कुछ अर्थों में सफ़ल भी हुए… यह होती है महाशक्ति की पहचान। इसके विपरीत भारत में क्या हो रहा है, बातें, बातें, बातें, समीक्षायें, मीटिंग्स, लोकसभा और राज्यसभा में बहसें, नतीजा……फ़िलहाल जीरो।

संदिग्ध गुटों को आर्थिक मदद मिलने के मुद्दे पर बस इतना ही कहा जा सकता है कि ISI और SIMI या अल-कायदा किसी बैंक या वित्तीय संस्थान के भरोसे अपना संगठन नहीं चलाते हैं, उनकी अपनी खुद की अलग अर्थव्यवस्था है, अफ़ीम, तस्करी, नकली नोटों, ड्रग्स और अवैध हथियारों की खरीद-फ़रोख्त से बनाई हुई। यकीन न आता हो तो उत्तर भारत की बैंकों की शाखाओं से निकलते 500 के नकली नोटों की बढ़ती घटनाओं पर गौर कीजिये, एक छोटे शहर के छोटे व्यापारी से 500 और 1000 के नोटों का लेन-देन कीजिये, पता चल जायेगा कि अर्थव्यवस्था से विश्वास डिगाने में महाशक्ति कामयाब हुई या ISI? और आतंकवादी देश में वैध रास्तों से तो घुसते नहीं हैं, उनके लिये मुम्बई-कोंकण के समुद्र तटों से लेकर, नेपाल, बांग्लादेश तक की सीमायें खुली हुई हैं, उन्हें कैसे रोकेंगे?

“हम आतंकवादियों का पीछा करेंगे और उन्हें सबक सिखाया जायेगा…” अब तो सभी जान गए हैं कि यह सिवाय “खोखली” धमकी के अलावा कुछ और नहीं है। विश्व देख रहा है कि भारत की सरकार अफ़ज़ल को किस तरह गोद में बैठाये हुए है और बात कर रहे हैं “पीछा करने की”… जिस प्रकार किसी हत्या के मुजरिम को कहा जाये कि आप हत्यारे को ढूँढने में पुलिस की मदद कीजिये उस प्रकार हमारे प्रधानमंत्री ने हमले के बाद ISI के मुखिया को भारत बुलावा भेजा था, क्या है यह सब? दुर्भाग्य यह है कि विपक्ष भी मजबूती से अपनी बात रखने में सक्षम नहीं है, उसके कंधे पर भी संसद पर हमला और कंधार के भूत सवार हैं। NDA ने ही संसद पर हमले के बाद सेनाओं को खामख्वाह छह महीने तक पाकिस्तान की सीमाओं पर तैनात रखा था, जिसका नतीजा सिर्फ़ इतना हुआ कि उस कवायद में भारत के करोड़ों रुपये खर्च हो गये।

अब पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिये पूरा देश उतावला है, तो हमारे नेता और पार्टियाँ सिर्फ़ शब्दों की जुगाली करने में लगे हुए हैं। श्री वैद्यनाथन जी ने पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिये कुछ उपाय सुझाये थे – जैसे कि

1) पाकिस्तान से निर्यात होने वाले मुख्य जिंसों जैसे बासमती चावल और कालीन आदि को भारत से निर्यात करने के लिये शून्य निर्यात कर लगाया जाये या भारी सबसिडी दी जाये ताकि पाकिस्तान का निर्यात बुरी तरह मार खाये।

2) जो प्रमुख देश (ब्राजील, जर्मनी और चीन) पाकिस्तान को हथियार सप्लाई करते हैं, उन्हें स्पष्ट शब्दों में बताया जाना चाहिये कि पाकिस्तान को शस्त्र देने से हमारे आपसी सम्बन्ध दाँव पर लग सकते हैं और इन देशों की कम्पनियों को भारत में निवेश सम्बन्धी “धमकियाँ” देनी चाहिये, ताकि वे अपनी-अपनी सरकारों को समझा सकें कि पाकिस्तान से सम्बन्ध रखना ठीक नहीं है, भारत से सम्बन्ध रखने में फ़ायदा है।

3) जिस प्रकार चीन में पेप्सी-कोक के आगमन के साथ ही वहाँ हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों की खबरें दबा दी गई, उसी प्रकार भारत को अपने विशाल “बाजार” को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहिये।

4) पाकिस्तानी कलाकारों, क्रिकेट खिलाड़ियों को भारत प्रवेश से वंचित करना होगा ताकि दाऊद द्वारा जो पैसा फ़िल्मों और क्रिकेट में लगाया जा रहा है, उसमें उसे नुकसान उठाना पड़े।

5) भारत की कोई भी सॉफ़्टवेयर कम्पनी पाकिस्तान से जुड़ी किसी भी कम्पनी को अपनी सेवायें न दे, यदि हम सॉफ़्टवेयर में महाशक्ति हैं तो इस ताकत का देशहित में कुछ तो उपयोग होना चाहिये।

वैद्यनाथन जी ने और भी कई उपाय सुझाये हैं, लेकिन एक पर भी भारत सरकार ने शायद अभी तक विचार नहीं किया है। जो लोग युद्ध विरोधी हैं उन्हें भी यह उपाय मंजूर होना चाहिये, क्योंकि आखिर पेट पर लात पड़ने से शायद उसे अकल आ जाये। लगभग यही उपाय कश्मीर समस्या के हल के लिये भी सुझाये गये थे। भारत द्वारा कश्मीर और पाकिस्तान को जोर-शोर से प्रचार करके यह जताना चाहिये कि “हम हैं, हमारी मदद है, हमारे से सम्बन्ध बेहतर हैं तो उनकी रोटी चलेगी…वरना”, लेकिन यह इतनी सी बात भी खुलकर कहने में हमारे सेकुलर गद्दारों को पसीना आ रहा है।



और सबसे बड़ी दिक्कत अरुंधती रॉय, अब्दुल रहमान अन्तुले, लालू-पासवान जैसे सेकुलर हैं, जिनके बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता कि वे किस तरफ़ हैं? पाकिस्तान से भिड़ने से पहले इन जैसे सेकुलर लोगों से पार पाना अधिक जरूरी है। असल में भारत के “सिस्टम” में किसी की जवाबदेही किसी भी स्तर पर नहीं है, जब तक यह नहीं बदला जायेगा तब तक कोई ठोस बदलाव नहीं होने वाला। प्रधानमंत्री से जवाब माँगने से पहले खुद सोचिये कि क्या आपने मनमोहन सिंह को चुना था? नहीं, उन्हें तो मैडम ने चुना था आप पर शासन करने के लिये, फ़िर वे किसे जवाबदेह होंगे? सारा देश इस समय गुस्से, अपमान और क्षोभ से भरा हुआ है, और उधर संसद में हमारे बयानवीर रोजाना नये-नये बयान दिये जा रहे हैं, संयुक्त राष्ट्र से गुहार लगाई जा रही है, जबकि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान जाकर उसे आतंकवाद से लड़ने के नाम पर 6 मिलियन पाऊण्ड की मदद दे दी। इधर जनता त्रस्त है कि अब कहने का वक्त गुजर चुका, कुछ करके दिखाईये जनाब… उधर पाकिस्तान में एक चुटकुला आम हो चला है कि “जब पचास-पचास कोस दूर गाँव में बच्चा रात को रोता है तो माँ कहती है कि बेटा सो जा, सो जा नहीं तो प्रणब मुखर्जी का एक और बयान आ जायेगा…” और बच्चा इस बात पर हँसने लगता है। कुल मिलाकर स्थिति यह बन रही है कि एक पिलपिली सी “महाशक्ति”, बच्चों की तरह अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, संयुक्त राष्ट्र से शिकायत कर रही है कि “ऊँ, ऊँ, ऊँ… देखो, देखो अंकल वो पड़ोस का बच्चा मुझे फ़िर से मारकर भाग गया… अब मैं क्या करूँ, अंकल मैं आपको सबूत दे चुका हूँ कि वही पड़ोसी मुझे रोजाना मारता रहता है…” अंकल को क्या पड़ी है कि वे उस शैतान बच्चे को डाँटें (दिखावे के लिये एकाध बार डाँट भी देते हैं), लेकिन अन्ततः उस शैतान बच्चे से निपटना तो रोजाना पिटने वाले बच्चे को ही है, कि “कम से कम एक बार” उसके घर में घुसकर जमकर धुनाई करे, फ़िर अंकल भी साथ दे देंगे…

फ़िलहाल आशा की एक किरण आगामी लोकसभा चुनाव हैं, जिसमें कांग्रेस को अपना चेहरा बचाने के लिये कोई न कोई कठोर कदम उठाने ही पड़ेंगे, क्योंकि वोटों के लिये कांग्रेस “कुछ भी” कर सकती है, और दोनो हाथों में लड्डू रखने की उसकी गन्दी आदत के कारण कोई कदम उठाने से पहले ही अन्तुले, दिग्विजय सिंह को भी “दूसरी तरफ़” तैनात कर दिया है… हो सकता है कि कांग्रेस एक मिनी युद्ध के लिये सही “टाईमिंग” का इंतजार कर रही हो, क्योंकि यदि युद्ध हुआ तो लोकसभा के आम चुनाव टल जायेंगे, तब तक कश्मीर में चुनाव निपट चुके होंगे और यदि उसके बाद अफ़ज़ल को फ़ाँसी दे दी जाये और पाकिस्तान पर हमला कर दिया जाये तो कांग्रेस के दोनो हाथों में लड्डू और दिल्ली की सत्ता होगी… जैसी कि भारत की परम्परा रही है कि हरेक बड़े निर्णय के पीछे राजनीति होती है, वैसा ही कुछ युद्ध के बारे में होने की सम्भावना है और “पीएम इन वेटिंग” सदा वेटिंग में ही रह जायें। रही आम जनता, तो उसे बिके हुए मीडिया के तमाशे से आसानी से बरगलाया जा सकता है…

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NDTV, India-Pakistan Relation, Cricket

भारत के खेल मंत्री श्री गिल ने बयान दिया है कि भारत की क्रिकेट टीम को पाकिस्तान का दौरा नहीं करना चाहिये। असल में गिल साहब अभी पूरी तरह “अफ़सर” से “नेता” नहीं बन पाये हैं और उनमें “सेकुलरिज़्म” का कीड़ा भी पूरी तरह घुस नहीं पाया है, सो उन्होंने आम जनता की भावना को शब्दों में मीडिया के सामने उतार दिया।

अब भारत में लाखों व्यक्ति और काफ़ी संस्थान जान चुके हैं कि पाकिस्तान में दाऊद इब्राहीम का नेटवर्क जबरदस्त मजबूत है। पाकिस्तान में होने वाली किसी भी “बड़ी आर्थिक गतिविधि” में उसका “हिस्सा” निश्चित रूप से होता है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड लगभग कंगाली की हालत में पहुँच चुका है। भारत की क्रिकेट टीम के दौरे का सपना देखकर वे अपने बुरे दिन उबारना चाहते हैं, लेकिन आतंकवाद की जो फ़सल उन्होंने इतने सालों में उगाई है, उस “गाजरघास” के कुछ बीज मुम्बई हमलों में शामिल थे, अब भारत की आम जनता पाकिस्तान से सम्बन्ध पूरी तरह खत्म करने के मूड में हैं, लेकिन “कांग्रेसी नेता”, “सेकुलरिज़्म से पीड़ित लोग”, और “नॉस्टैल्जिया में जीने वाले तथा कुछ गाँधीवादी लोग” अभी भी पाकिस्तान से दोस्ती का राग अलाप रहे हैं। असल में भारत में तीन तरह के लोग अब भी “पाकिस्तान-प्रेम” से बुरी तरह ग्रसित हैं, पहले वे लोग जो विभाजन के समय यहाँ रह गये (जाना तो चाहते थे), उन्हें अभी भी लाहौर की हवेलियाँ, बाजार, मुजरे वगैरह याद आते रहते हैं, दूसरे हैं फ़िल्म कलाकारों और नचैयों की एक जमात, जिसे दाऊद भाई अपने इशारों और पैसों पर यहाँ-वहाँ-जहाँ-तहाँ नचवाते रहते हैं, तीसरे हैं “मोमबत्ती छाप सेकुलर गैंग”, जो हजार बार गलत साबित होने के बावजूद भी पाकिस्तान को जबरन अपना “छोटा भाई” मानने पर उतारू है (NDTV इस तीसरे टाइप की कैटेगरी में आता है)।






जैसे ही गिल साहब का यह बयान आया फ़ौरन से भी पहले NDTV ने अपनी खबरों में उसे हाइलाईट करना शुरु कर दिया, चैनल पर उपस्थित एंकरों ने खुद अपनी तरफ़ से ही बयानबाजी शुरु कर दी कि “खेल मंत्री को दौरा रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है…” “भारत-पाकिस्तान के आपसी सम्बन्ध सामान्य बनाने के लिये यह दौरा बहुत जरूरी है…”, “यह दौरा सिर्फ़ सुरक्षा कारणों से रद्द किया जा सकता है…”, “इससे क्रिकेट का बहुत नुकसान होगा…”, “खेल में राजनीति नहीं होना चाहिये…”, आदि-आदि-आदि-आदि, यानी कि “फ़ोकटिया शब्दों की लफ़्फ़ाज़ी” चालू हो गई, जिसमें NDTV पहले से ही माहिर है, और “कमाई” करने के मामले में भी, जाहिर है कि तत्काल SMS भी मंगवाये जाने लगे कि “भारत को पाकिस्तान का दौरा करना चाहिये या नहीं…” हमें SMS करें और हमारी जेब भरें…




सेकुलर और NDTV जैसे लोग शायद यह भूल जाते हैं कि खेल या अन्य किसी भी प्रकार के खेल सम्बन्ध “शरीफ़ों” और “सभ्य नागरिकों” से ही रखे जाते हैं, जो देश अपने जन्म से ही घृणा फ़ैलाने में लगा हुआ हो, जहाँ पाठ्यक्रम में ही बाकायदा “जेहाद” की शिक्षा दी जाती है, जहाँ के नौनिहाल “भारत (बल्कि विश्व) में इस्लाम का परचम फ़हराने के उद्देश्य से ही बड़े होते हैं, उस देश से सम्बन्ध रखने की क्या तुक है? और “खेल में राजनीति नहीं होना चाहिये…” का तर्क तो इतना बोदा और थोथा है कि ये सेकुलर लोग इस बात का भी जवाब नहीं दे सकते कि रंगभेद के जमाने में दक्षिण अफ़्रीका ने भारत क्या बिगाड़ा था, जो हमने उससे सम्बन्ध तोड़ रखे थे? या कि इसराइल ने भारत के कौन से हिस्से पर कब्जा कर लिया था कि यासर अराफ़ात को गले लगाते-लगाते उससे भी हमने सम्बन्ध तोड़ रखे थे? क्या यह व्यवहार खेल में राजनीति नहीं थी? और सबसे बड़ी बात तो यह कि पाकिस्तान के साथ न खेलने से हमारा क्या नुकसान होने वाला है? कुछ भी नहीं। सारा विश्व इस समय पाकिस्तान के खिलाफ़ है, हमें इस माहौल का फ़ायदा उठाना चाहिये, न कि अपना परम्परागत “गाँधीवादी” तरीका अपनाकर मामले को ढीला छोड़ देना चाहिये। लेकिन इस देश में देश का स्वाभिमान देखने से ज्यादा “पैसे के भूखे” लोग हैं, उन्हें तत्काल “डॉलर” का नुकसान दिखाई दे रहा है। जबकि असल में नुकसान होगा पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का, यानी प्रकारान्तर से दाऊद का भी, फ़िर क्यों भाई लोग क्रिकेट खेलने के पीछे पड़े हैं। यहीं से भारत के कुछ “खास” लोगों पर शक मजबूत होता है। पाकिस्तान से मधुर सम्बन्ध बनाये रखने में बासमती चावल, कश्मीरी शॉल, शक्कर, आलू, पान के करोड़ों में “खेलने-खाने-खिलाने” वाले आयातक और निर्यातकों की एक बहुत बड़ी गैंग के अपने स्वार्थ हैं, और इन्हें देश के स्वाभिमान से कभी भी कोई लेना-देना नहीं रहा।

यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि पाकिस्तान में सेना और आईएसआई का शिकंजा वहाँ के प्रत्येक वित्तीय संस्थान पर कसा हुआ है। पाकिस्तान की डॉ आयशा सिद्दिकी-आगा द्वारा एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में सन् 2000 में प्रस्तुत एक पेपर “पावर, पर्क्स, प्रेस्टीज एण्ड प्रिविलेजेस – मिलिटरी इकॉनामिक एक्टिविटीज इन पाकिस्तान” में उन्होंने बताया है कि पाकिस्तान ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ कि सेना का हरेक संस्थान और हरेक जमात पर पूरा नियन्त्रण है। अध्ययनों से पता चला है कि पाकिस्तान में चार विशालकाय फ़ाउण्डेशन हैं 1) फ़ौजी फ़ाउण्डेशन (FF), 2) आर्मी वेलफ़ेयर ट्रस्ट (AWT), 3) बहारिया फ़ाउण्डेशन (BF), 4) शाहीन फ़ाउण्डेशन (SF), इन विभिन्न ट्रस्टों और फ़ाउण्डेशनों पर पाकिस्तान फ़ौज का पूर्ण कब्जा है, पाकिस्तान की आर्थिक धुरी में ये काफ़ी महत्वपूर्ण माने जाते हैं (सन्दर्भ - आर वैद्यनाथन रेडिफ़. कॉम 10/12/08)। ऐसे में यह मानना मूर्खतापूर्ण ही होगा कि आर्थिक रूप से मजबूत पाकिस्तान हमारा दोस्त बन सकता है, बल्कि वह जितना आर्थिक रूप से सम्पन्न होगा, वहाँ की सेना और दाऊद इब्राहीम ही आर्थिक रूप से मजबूत होते जायेंगे। ऐसे में पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलना यानी उन्हें संजीवनी प्रदान करने जैसा होगा, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि पाकिस्तान की पूर्ण आर्थिक नाकेबन्दी की जानी चाहिये, जैसे एक “भोगवादी” वर्ग भारत में है वैसा ही पाकिस्तान में भी है, उसके आर्थिक हितों पर चोट होना जरूरी है। पाकिस्तान में सेना ने हमेशा ही कुछ कठपुतलियों को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बनाये रखा है और उनसे कोई उम्मीद रखना बेकार ही होगा। खुद जरदारी की यह घोषणा बेहद हास्यास्पद है कि बेनज़ीर की हत्या की जाँच स्कॉटलैण्ड यार्ड से करवाई जायेगी, अर्थात उन्हें अपने देश की पुलिस पर ही भरोसा नहीं है, ऐसे में भारत उस व्यक्ति पर भरोसा क्यों करे जिसका अतीत दागदार है और अपने “बिजनेस”(?) को बढ़ाने के लिये जिस व्यक्ति के दाऊद के साथ रिश्ते सरेआम जाहिर हो चुके हैं? असल में जरदारी और प्रधानमंत्री सिर्फ़ “टाइमपास” कर रहे हैं, और भारत मूर्ख बनता हुआ लग रहा है। जरूरत इस बात की है कि सबसे पहले हम “गुजराल डॉक्ट्रिन” को कूड़े में फ़ेंकें और पाकिस्तान को अपना “छोटा भाई” मानना बन्द करें।

पाकिस्तान के खिलाफ़ अभी हमने युद्ध की मुद्रा बनाना शुरु ही किया है, लेकिन उससे पहले ही NDTV ने “भाईचारे” का राग छेड़ना शुरु कर दिया है, “खेल को राजनीति से दूर रखना चाहिये…” रूपी उपदेश झाड़ने शुरु हो गये हैं। उधर अरुन्धती रॉय ने विदेश में अंग्रेजी अखबारों में भारत और हिन्दुओं के खिलाफ़ जहर उगलना जारी रखा है… ऐसे में शक होता है कि कहीं दाऊद के कुछ “गुर्गे” सफ़ेदपोशों के भेष में हमारे बीच में तो मौजूद नहीं हैं, जो जब-तब पाकिस्तान से दोस्ती का “डोज़” देते रहते हैं? कहीं भारत के कुछ खास लोगों की पाकिस्तान में बैठे खास लोगों से कुछ गुप्त साँठगाँठ तो नहीं, जो हमेशा भारत पाकिस्तान के आगे झुक जाता है?

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How a Muslim Could be a Secular?

जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी कहते हैं कि कुरान के अनुसार विश्व दो भागों में बँटा हुआ है, एक वह जो अल्लाह की तरफ़ हैं और दूसरा वे जो शैतान की तरफ़ हैं। देशो की सीमाओं को देखने का इस्लामिक नज़रिया कहता है कि विश्व में कुल मिलाकर सिर्फ़ दो खेमे हैं, पहला दार-उल-इस्लाम (यानी मुस्लिमों द्वारा शासित) और दार-उल-हर्ब (यानी “नास्तिकों” द्वारा शासित)। उनकी निगाह में नास्तिक का अर्थ है जो अल्लाह को नहीं मानता, क्योंकि विश्व के किसी भी धर्म के भगवानों को वे मान्यता ही नहीं देते हैं।

इस्लाम सिर्फ़ एक धर्म ही नहीं है, असल में इस्लाम एक पूजापद्धति तो है ही, लेकिन उससे भी बढ़कर यह एक समूची “व्यवस्था” के रूप में मौजूद रहता है। इस्लाम की कई शाखायें जैसे धार्मिक, न्यायिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सैनिक होती हैं। इन सभी शाखाओं में सबसे ऊपर, सबसे प्रमुख और सभी के लिये बन्धनकारी होती है धार्मिक शाखा, जिसकी सलाह या निर्देश (बल्कि आदेश) सभी धर्मावलम्बियों को मानना बाध्यकारी होता है। किसी भी देश, प्रदेश या क्षेत्र के “इस्लामीकरण” करने की एक प्रक्रिया है। जब भी किसी देश में मुस्लिम जनसंख्या एक विशेष अनुपात से ज्यादा हो जाती है तब वहाँ इस्लामिक आंदोलन शुरु होते हैं। शुरुआत में उस देश विशेष की राजनैतिक व्यवस्था सहिष्णु और बहु-सांस्कृतिकवादी बनकर मुसलमानों को अपना धर्म मानने, प्रचार करने की इजाजत दे देती है, उसके बाद इस्लाम की “अन्य शाखायें” उस व्यवस्था में अपनी टाँग अड़ाने लगती हैं। इसे समझने के लिये हम कई देशों का उदाहरण देखेंगे, आईये देखते हैं कि यह सारा “खेल” कैसे होता है –

जब तक मुस्लिमों की जनसंख्या किसी देश/प्रदेश/क्षेत्र में लगभग 2% के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय, कानूनपसन्द अल्पसंख्यक बनकर रहते हैं और किसी को विशेष शिकायत का मौका नहीं देते, जैसे -
अमेरिका – मुस्लिम 0.6%
ऑस्ट्रेलिया – मुस्लिम 1.5%
कनाडा – मुस्लिम 1.9%
चीन – मुस्लिम 1.8%
इटली – मुस्लिम 1.5%
नॉर्वे – मुस्लिम 1.8%

जब मुस्लिम जनसंख्या 2% से 5% के बीच तक पहुँच जाती है, तब वे अन्य धर्मावलम्बियों में अपना “धर्मप्रचार” शुरु कर देते हैं, जिनमें अक्सर समाज का निचला तबका और अन्य धर्मों से असंतुष्ट हुए लोग होते हैं, जैसे कि –
डेनमार्क – मुस्लिम 2%
जर्मनी – मुस्लिम 3.7%
ब्रिटेन – मुस्लिम 2.7%
स्पेन – मुस्लिम 4%
थाईलैण्ड – मुस्लिम 4.6%

मुस्लिम जनसंख्या के 5% से ऊपर हो जाने पर वे अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्मावलम्बियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना “प्रभाव” जमाने की कोशिश करने लगते हैं। उदाहरण के लिये वे सरकारों और शॉपिंग मॉल पर “हलाल” का माँस रखने का दबाव बनाने लगते हैं, वे कहते हैं कि “हलाल” का माँस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यतायें प्रभावित होती हैं। इस कदम से कई पश्चिमी देशों में “खाद्य वस्तुओं” के बाजार में मुस्लिमों की तगड़ी पैठ बनी। उन्होंने कई देशों के सुपरमार्केट के मालिकों को दबाव डालकर अपने यहाँ “हलाल” का माँस रखने को बाध्य किया। दुकानदार भी “धंधे” को देखते हुए उनका कहा मान लेता है (अधिक जनसंख्या होने का “फ़ैक्टर” यहाँ से मजबूत होना शुरु हो जाता है), ऐसा जिन देशों में हो चुका वह हैं –
फ़्रांस – मुस्लिम 8%
फ़िलीपीन्स – मुस्लिम 6%
स्वीडन – मुस्लिम 5.5%
स्विटजरलैण्ड – मुस्लिम 5.3%
नीडरलैण्ड – मुस्लिम 5.8%
त्रिनिदाद और टोबैगो – मुस्लिम 6%



इस बिन्दु पर आकर “मुस्लिम” सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि उन्हें उनके “क्षेत्रों” में शरीयत कानून (इस्लामिक कानून) के मुताबिक चलने दिया जाये (क्योंकि उनका अन्तिम लक्ष्य तो यही है कि समूचा विश्व “शरीयत” कानून के हिसाब से चले)। जब मुस्लिम जनसंख्या 10% से अधिक हो जाती है तब वे उस देश/प्रदेश/राज्य/क्षेत्र विशेष में कानून-व्यवस्था के लिये परेशानी पैदा करना शुरु कर देते हैं, शिकायतें करना शुरु कर देते हैं, उनकी “आर्थिक परिस्थिति” का रोना लेकर बैठ जाते हैं, छोटी-छोटी बातों को सहिष्णुता से लेने की बजाय दंगे, तोड़फ़ोड़ आदि पर उतर आते हैं, चाहे वह फ़्रांस के दंगे हों, डेनमार्क का कार्टून विवाद हो, या फ़िर एम्स्टर्डम में कारों का जलाना हो, हरेक विवाद को समझबूझ, बातचीत से खत्म करने की बजाय खामख्वाह और गहरा किया जाता है, जैसे कि –
गुयाना – मुस्लिम 10%
भारत – मुस्लिम 15%
इसराइल – मुस्लिम 16%
केन्या – मुस्लिम 11%
रूस – मुस्लिम 15% (चेचन्या – मुस्लिम आबादी 70%)

जब मुस्लिम जनसंख्या 20% से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न “सैनिक शाखायें” जेहाद के नारे लगाने लगती हैं, असहिष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर शुरु हो जाता है, जैसे-
इथियोपिया – मुस्लिम 32.8%

जनसंख्या के 40% के स्तर से ऊपर पहुँच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याऐं, आतंकवादी कार्रवाईयाँ आदि चलने लगते हैं, जैसे –
बोस्निया – मुस्लिम 40%
चाड – मुस्लिम 54.2%
लेबनान – मुस्लिम 59%

जब मुस्लिम जनसंख्या 60% से ऊपर हो जाती है तब अन्य धर्मावलंबियों का “जातीय सफ़ाया” शुरु किया जाता है (उदाहरण भारत का कश्मीर), जबरिया मुस्लिम बनाना, अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल तोड़ना, जजिया जैसा कोई अन्य कर वसूलना आदि किया जाता है, जैसे –

अल्बानिया – मुस्लिम 70%
मलेशिया – मुस्लिम 62%
कतर – मुस्लिम 78%
सूडान – मुस्लिम 75%

जनसंख्या के 80% से ऊपर हो जाने के बाद तो सत्ता/शासन प्रायोजित जातीय सफ़ाई की जाती है, अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है, सभी प्रकार के हथकण्डे/हथियार अपनाकर जनसंख्या को 100% तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है, जैसे –

बांग्लादेश – मुस्लिम 83%
मिस्त्र – मुस्लिम 90%
गाज़ा पट्टी – मुस्लिम 98%
ईरान – मुस्लिम 98%
ईराक – मुस्लिम 97%
जोर्डन – मुस्लिम 93%
मोरक्को – मुस्लिम 98%
पाकिस्तान – मुस्लिम 97%
सीरिया – मुस्लिम 90%
संयुक्त अरब अमीरात – मुस्लिम 96%

बनती कोशिश पूरी 100% जनसंख्या मुस्लिम बन जाने, यानी कि दार-ए-स्सलाम होने की स्थिति में वहाँ सिर्फ़ मदरसे होते हैं और सिर्फ़ कुरान पढ़ाई जाती है और उसे ही अन्तिम सत्य माना जाता है, जैसे –
अफ़गानिस्तान – मुस्लिम 100%
सऊदी अरब – मुस्लिम 100%
सोमालिया – मुस्लिम 100%
यमन – मुस्लिम 100%



दुर्भाग्य से 100% मुस्लिम जनसंख्या होने के बावजूद भी उन देशों में तथाकथित “शांति” नहीं हो पाती। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि जिन देशों में मुस्लिम जनसंख्या 8 से 10 प्रतिशत हो चुकी होती है, उन देशों में यह तबका अपने खास “मोहल्लो” में रहना शुरु कर देता है, एक “ग्रुप” बनाकर विशेष कालोनियाँ या क्षेत्र बना लिये जाते हैं, उन क्षेत्रों में अघोषित रूप से “शरीयत कानून” लागू कर दिये जाते हैं। उस देश की पुलिस या कानून-व्यवस्था उन क्षेत्रों में काम नहीं कर पाती, यहाँ तक कि देश का न्यायालयीन कानून और सामान्य सरकारी स्कूल भी उन खास इलाकों में नहीं चल पाते (ऐसा भारत के कई जिलों के कई क्षेत्रों में खुलेआम देखा जा सकता है, कई प्रशासनिक अधिकारी भी दबी जुबान से इसे स्वीकार करते हैं, लेकिन “सेकुलर-देशद्रोहियों” के कारण कोई कुछ नहीं बोलता)।

आज की स्थिति में मुस्लिमों की जनसंख्या समूचे विश्व की जनसंख्या का 22-24% है, लेकिन ईसाईयों, हिन्दुओं और यहूदियों के मुकाबले उनकी जन्मदर को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस शताब्दी के अन्त से पहले ही मुस्लिम जनसंख्या विश्व की 50% हो जायेगी (यदि तब तक धरती बची तो)… भारत में कुल मुस्लिम जनसंख्या 15% के आसपास मानी जाती है, जबकि हकीकत यह है कि उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और केरल के कई जिलों में यह आँकड़ा 40 से 50% तक पहुँच चुका है… अब देश में आगे चलकर क्या परिस्थितियाँ बनेंगी यह कोई भी (“सेकुलरों” को छोड़कर) आसानी से सोच-समझ सकता है…
(सभी सन्दर्भ और आँकड़े : डॉ पीटर हैमण्ड की पुस्तक “स्लेवरी, टेररिज़्म एण्ड इस्लाम – द हिस्टोरिकल रूट्स एण्ड कण्टेम्पररी थ्रेट तथा लियोन यूरिस – “द हज”, से साभार)

यदि इस्लाम की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देखें, तो कोई मुस्लिम सही अर्थों में सेकुलर हो ही नहीं सकता, क्योंकि वे “एकेश्वरवादी” हैं, उनके लिये अल्लाह ही सबसे बड़ी और एकमात्र सच्चाई है और पैगम्बर मोहम्मद के सन्देश पत्थर की लकीर। वे दूसरे धर्मों के देवताओं का अस्तित्व ही नहीं मानते, बल्कि दूसरे मूर्तिपूजकों को वे काफ़िर मानते हैं, ऐसे में भला वे सेकुलर कैसे हो सकते हैं। जब कोई हिन्दू, अपने धर्म या देवी-देवताओं पर सवाल उठाता है तो हिन्दू उस पर बहस करेंगे, उस व्यक्ति की आलोचना करेंगे, उसकी बातों को कम से कम एक बार सुनेंगे और उसके बावजूद उस व्यक्ति का कोई बाल भी बाँका नहीं होगा, जबकि मुस्लिम व्यक्ति अपने ही धर्म के खिलाफ़ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता, और सलमान रुश्दी या तसलीमा नसरीन जैसे कुछ लोग यदि समाज में व्याप्त किसी बुराई पर बोलने की कोशिश भी करते हैं तो उनके खिलाफ़ फ़तवे जारी हो जाते हैं, उन्हें जान से मारने की धमकियाँ मिलती हैं, उन्हें अपने ही देश से भागना पड़ता है। हिन्दुओं और मुस्लिमों में यही मुख्य अन्तर है, यानी सहिष्णुता और असहिष्णुता का। हिन्दुओं को दूसरे धर्मों और उनकी पूजा पद्धतियों से कभी कोई आपत्ति नहीं होती, जबकि इस्लाम में दूसरे धर्मों को समान रूप से इज्जत देना तो दूर, उनके लिये कोई जगह छोड़ना भी लगभग गुनाह मान लिया जाता हो, तब ऐसे में भला कैसे कोई मुस्लिम “सेकुलर” हो सकता है? विद्वानों से मैं पूछना चाहता हूँ कि “सेकुलर” की उनकी परिभाषा क्या है? और उस परिभाषा के खाँचे में मुस्लिम धर्मावलम्बी कैसे सेकुलर कहला सकते हैं? इसका दूसरा अर्थ यह भी निकलता है कि कोई व्यक्ति या तो “सेकुलर” हो सकता है या फ़िर “सच्चा मुसलमान”, दोनों एक साथ नहीं हो सकता। और जो आँकड़े तथा विभिन्न देशों की परिस्थियाँ ऊपर दी गई हैं, उससे एक सवाल और भी खड़ा होता है कि आखिर मुस्लिम बहुल देशों में लोकतन्त्र क्यों नहीं पनपता? हालांकि इसका जवाब भी इसी लेख में छुपा हुआ है, लेकिन उस विषय पर बाद में कभी विस्तार से बात करेंगे…

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Attack on Corruption as well as on Pakistan

मुम्बई की घटना के बाद नौसेना प्रमुख ने माना है कि देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा में गम्भीर खामियाँ हैं और इन्हें सुधारने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी माना कि जिस शंकास्पद ट्रॉलर को नौसेना ने जाँच हेतु रोका था उसके पास सारे कागजात एकदम सही पाये गये थे। देखने में यह घटना बेहद मामूली सी लग सकती है, लेकिन असल में यह हमारे समूचे “सिस्टम” के सड़ जाने की ओर इशारा करती है। कुछ वर्षों पहले एक मित्र के साथ मुझे भी एक बार मुम्बई के डॉकयार्ड में जाने का सौभाग्य(?) मिला था (डॉकयार्ड में हमारा काम उस स्थान पर था, जहाँ से आयात-निर्यात के माल का कस्टम क्लियरेंस किया जाता है)। मेरा मित्र एक छोटा सा निर्यातक है जो खाड़ी देशों को गारमेंट का निर्यात करता है और उधर से अपनी ही एक अन्य फ़र्म के लिये खजूर और अन्य छोटी-मोटी वस्तुऐं आयात भी करता है। वहाँ (डॉकयार्ड) का माहौल देखकर मेरे जैसा किसी भी सामान्य आदमी की बुद्धि चकरा सकती है। सैकड़ों की संख्या में पैकिंग किये हुए कार्टन्स, बैग, बोरे, कण्टेनर, पीपे, खोखे आदि चारों ओर बिखरे पड़े हुए थे। कस्टम क्लियर करने वाले अधिकारी और कर्मचारी अपनी ड्यूटी इस प्रकार कर रहे थे, मानो वह सामने वाले व्यक्ति पर अहसान कर रहे हों। चारों तरफ़ एक अलसाया हुआ उदासी भरा माहौल था, जैसा कि अमूमन एक सरकारी विभाग में होता है। जबकि वह विभाग कोई मामूली और आम नगर निगम जैसा विभाग नहीं था, वह सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण एक संवेदनशील विभाग है। मेरा मित्र जो कि इन “सरकारी बाबुओं” की नस-नस से वाकिफ़ हो चुका है, उसी ने बताया कि जितनी जल्दी और जितनी ज्यादा “भेंटपूजा” इन कर्मचारियों की होगी उतनी ही जल्दी उसका “माल” यहाँ से “क्लियर” होगा। मैंने देखा और पाया कि उस डॉकयार्ड में आने वाले लगभग सभी लोग, व्यापारी, कर्मचारी, कुली, लाइसेंसशुदा हम्माल आदि आराम से कहीं भी आ-जा रहे थे, किसी भी “माल” को चेक करने की कोई “परम्परा” शायद वहाँ थी ही नहीं, बस जिस व्यापारी/एजेण्ट/दलाल आदि ने जो कागज दिखाया वही माल मान लिया जाता था, भले ही कागज पर लिखा हो कि कण्टेनर में कपड़ा है और अन्दर अफ़ीम भरी हो, कोई देखने-सुनने वाला नहीं। पूरे स्टाफ़ का हिस्सा ऊपर से नीचे तक बँटा हुआ था (और कहीं ईमानदारी हो या नहीं हो भ्रष्टाचार पूरी ईमानदारी से किया जाता है, चपरासी से लेकर ठेठ अफ़सर और मंत्री तक)। कोई भी सहज बुद्धि वाला व्यक्ति सोच सकता है कि भला आतंकवादियों को इतनी मगजमारी करके समुद्र के रास्ते से हथियार लाने की क्या जरूरत है? जबकि वह जब चाहे एक कण्टेनर भरकर हथियार आराम से भारत भिजवा सकता है। एक अंग्रेजी चैनल ने एक “स्टिंग ऑपरेशन” के तहत हमले के दो दिन बाद ही एक बड़ा सा खाली खोखा (जिसे उन्होंने यह माना कि उसमें RDX भरा है) आराम से स्थानीय लोगों के साथ मिलकर ठीक उसी जगह उतार दिया, जिस जगह पर दाऊद इब्राहीम ने कुछ साल पहले अपने हथियार उतारे थे। इस स्टिंग ऑपरेशन में उस चैनल को कुल 10-15 हजार का खर्च आया। अब खुद ही सोचिये कि जब हमले के दो दिन बाद सुरक्षा की ये हालत है तो आगे क्या होगा? या पहले क्या हुआ होगा।



असल समस्या यह है कि अब भारत के लोग “भोगवादी” प्रवृत्ति के हो चुके हैं। खुली अर्थव्यवस्था और पैसे की चकाचौंध ने आँखों पर जो चर्बी चढ़ाई है उसके कारण “देश”, “राष्ट्र”, “नैतिकता”, “अनुशासन” आदि कुछ नहीं दिखाई देता। और भ्रष्टाचार की यह चर्बी सिर्फ़ सरकारी बाबुओं, अफ़सरों, नेताओं और मंत्रियों की आँखों पर ही नहीं है, अब तो यह बीमारी रिसते-रिसते बहुत नीचे स्तर तक, आम आदमी तक पहुँच चुकी है। आज मुम्बई में हुए हमले के विरोध में मोमबत्तियाँ जलाई जा रही हैं, मानव-श्रृंखला बनाई जा रही है, एकता यात्रा निकाली जा रही है, हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है… क्या वाकई इससे कोई फ़र्क पड़ेगा? मुझे तो नहीं लगता। देश पर हुआ हमला और उसकी प्रतिक्रिया कुछ-कुछ ऐसी है, जैसे कैंसर और लकवे से ग्रस्त एक आदमी की बीवी को छेड़ दिया गया हो और वह मरने-मारने की बातें करने लग पड़ा हो।

ट्रैफ़िक सिग्नल को सरेआम तोड़ते लोग, पकड़े जाने पर पचास-सौ रुपये देकर छूट जाने की मानसिकता लिये हुए लोग आतंकवाद से नहीं लड़ सकते। राशनकार्ड, गैस कनेक्शन, ड्रायविंग लायसेंस जैसे रोजमर्रा के काम करवाने के लिये सरकारी विभागों में नियम तोड़ते-तोड़ते, रिश्वत देते-देते भारत का नागरिक इतना घिस चुका है कि उसमें आतंकवाद से लड़ने की धार ही नहीं बची है, और हाल-फ़िलहाल ये जो कुछ माहौल दिखाई दे रहा है वह मात्र “पेशाब का झाग” भर है, बहुत जल्दी ही नीचे बैठ जायेगा। जिस तरह श्मशान में व्यक्ति “मैं अपनी आँखें दान कर दूँगा…”, “इस दुनिया में क्या रखा है भाई…”, “मोहमाया से दूर रहने में ही भलाई है…” जैसे विचार लेकर खड़ा होता है, और बाहर निकलते ही वापस अपनी दुनिया में रम जाता है, ठीक वैसा ही कुछ हरेक आतंकवादी हमले के बाद भारत में होता आया है। लेकिन जिस देश के लोग भ्रष्टाचार पर नहीं उबलते, किसी मासूम लड़की के बलात्कार और हत्या के बाद भी कोई आंदोलन नहीं करते, बल्कि खुद ही इस जुगाड़ में लगे रहते हैं कि किस तरह से प्रत्येक “सिचुएशन” में मेरा फ़ायदा हो जाये, वह भला आतंकवाद से कैसे लड़ेगा? क्या रक्षा मंत्रालय के किसी अधिकारी को सियाचिन में सैनिकों के जूते खरीदने में भ्रष्टाचार करने के लिये आज तक कोई सजा हुई है? क्या शहीदों को मिलने वाले पेट्रोल पंपों पर कुंडली मारे बैठे नेताओं से आज तक किसी ने जवाबतलब किया है? सेना के ताबूत, राशन, बुलेटप्रूफ़ जैकेटों और यहाँ तक कि सेना के कैंटीन में मिलने वाली सस्ती शराब की अफ़रातफ़री के मामले में आज तक किसी IAS अधिकारी पर कोई मुकदमा चलाया गया है? नहीं ना… फ़िर आप कैसे उम्मीद करते हैं कि रातोंरात देश में कोई क्रान्ति आ जायेगी और देश अचानक अनुशासन की राह पर चल पड़ेगा? आतंकवाद के खिलाफ़ युद्ध लड़ना तो बहुत बाद की बात है, क्या हम लोग रेल्वे स्टेशन या सिनेमा हॉल की टिकट लाइन में ही दस मिनट सीधे खड़े रह सकते हैं? इसलिये जब नौसेना कहती है कि शंकास्पद जहाज के पास कागज पूरे थे तब स्वाभाविक है कि सही और पूरे कागज होना ही है, भारत में लाखों कारें ऐसी हैं जिनके पास “व्यावसायिक LPG से” चलाने के कागज पूरे हैं, लेकिन अमीर लोग उसे चलाते हैं “घरेलू गैस” से, कितनों के ही नौनिहाल अभी 12-14 साल के ही हैं लेकिन सरेआम उन्हें बाइक थमा दी गई है और उनके पास लायसेंस भी है। जब बांग्लादेश से आने के 2 साल के भीतर ही राशनकार्ड बनवाया जा सकता है, नेपाल का एक भगोड़ा हत्यारा कांग्रेस का सांसद बन सकता है, तो “भारत में बने वैध कागज” की क्या और कैसी कीमत है इसके बारे में अलग से क्या बताऊँ। भारत के लोग हमेशा तात्कालिक उपाय के बारे में सोचते हैं, “परमानेंट इलाज” के बारे में नहीं, जैसे कि पहले लाखों कारों का उत्पादन कर लेना, फ़िर बाद में सड़कें बनवाना। युद्ध लड़ना एक तात्कालिक उपाय है, जबकि देशवासियों में नैतिकता, अनुशासन, और ईमानदारी पैदा करना, अन्दरूनी भ्रष्टाचार से लड़ना एक “परमानेंट इलाज” है। मोमबत्ती जलाने वाले और “इनफ़ इज़ इनफ़” का नारा लगाने वालों के नेतृत्व को ध्यान से देखिये, बिजली चोरी करने वाला उद्योगपति, मरीज के साथ जानवर से भी बदतर व्यवहार करने वाला डॉक्टर, बेशर्मी से आगे-आगे दिखने वाला राजनेता, बच्चों के दोपहर भोजन में कमीशन खाने वाला IAS अफ़सर, सभी दिखाई देंगे… आम आदमी तो युद्ध की विभीषिका और खर्च को झेल भी लेगा, लेकिन युद्ध के बाद मोमबत्ती जलाने और रैलियाँ निकालने वाले यही नेता और उद्योगपति उसका खून चूसने में सबसे आगे होंगे… मन में संकल्प लो कि “इन घटिया लोगों से भी निपटेंगे” और युद्ध में कूद पड़ो।



कुछ पाठकों को यह लेख “नकारात्मक” लग सकता है, जबकि मेरा व्यक्तिगत मत है कि पाकिस्तान के साथ युद्ध होना ही चाहिये, भले ही सीधे तौर पर नहीं, लेकिन छापामार शैली में जोरदार कमाण्डो/मिसाइल कार्रवाई तो बहुत ही जरूरी है। जिस तरह से कुछ वर्षों के अन्तराल से झाड़ू लेकर भूत उतारा जाता है वैसे ही हर दस-बारह साल के अन्तराल से पाकिस्तान जैसे देश की धुलाई होती रहनी चाहिये, लेकिन मेरे व्यक्तिगत मत से क्या होता है। अभी तो युद्ध की बात भी ठीक से शुरु नहीं हो पाई है कि देश में समझाइश (यानी विरोध) के स्वर उठने लगे हैं, तमाम बुद्धिजीवी(?) कहने लग पड़े हैं कि “युद्ध कोई इलाज नहीं है…”, “भारत को शांति से काम लेना चाहिये…”, “युद्ध से कुछ हासिल नहीं होगा…”, “शेयर मार्केट 4000 तक पहुँच जायेगा…”, “महंगाई बेतहाशा बढ़ जायेगी…”… आदि-आदि। कहने का तात्पर्य यह है कि अभी तो लड़ाई की मानसिक तैयारी शुरु ही हो रही है कि “भीतरघाती” अपना राग अलापने लगे हैं, ऐसी खण्डित मानसिकता लेकर आतंकवाद से लड़ेंगे??? हम कोई अमेरिका की तरह रोज-रोज युद्ध नहीं लड़ते, युद्ध लड़ना है तो एक स्वर में “हाँ” होनी चाहिये, लेकिन “लड़ाई” हमारे खून में, हमारे संस्कारों में ही नहीं है… और जब देश में आस्तीन के साँप “सेकुलर” और “गाँ……(धी)वादी” लोग मौजूद हैं, “आर या पार” वाला युद्ध तो मुश्किल ही लगता है…

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Hindu Terrorism Congress and Secularism

श्रीनगर में एक मुस्लिम महिला संगठन है जिसका नाम है “दुख्तरान-ए-मिल्लत”, जो मुस्लिम महिलाओं को इस्लामिक परम्पराओं और ड्रेस कोड को सख्ती से लागू करवाने के लिये कुख्यात है चाहे इस “पवित्र कार्य”(?) के लिये हिंसा का ही सहारा क्यों न लेना पड़े। उनका दावा है कि यह मुस्लिम महिलाओं के भले के लिये है, दुख्तरान-ए-मिल्लत की स्वयंभू अध्यक्षा हैं आसिया अन्दराबी, जिसे कई बार देशद्रोही गतिविधियों, जेहादी गुटों द्वारा भारी मात्रा में पैसा प्राप्त करने, और आतंकवादी संगठनों की मदद के लिये कई बार जेल हुई। अमेरिका की खुफ़िया एजेंसियों की एक रिपोर्ट के अनुसार दुख्तरान-ए-मिल्लत 1995 में बीबीसी के दफ़्तर में हुए पार्सल बम विस्फ़ोट के लिये भी दोषी पाई गई है। आसिया अन्दराबी को पोटा के तहत गिरफ़्तार किया जा चुका है और उसे हवाला के जरिये भारी मात्रा में पैसा प्राप्त होता रहा है। मैडम अन्दराबी भारत के खिलाफ़ जब-तब जहर उगलती रहती हैं। इतनी भूमिका बाँधने का असली मकसद सेकुलरों, कांग्रेसियों, नकली हिन्दुओं, नपुंसक हिन्दुओं, तटस्थ हिन्दुओं को सिर्फ़ यह बताना है कि इस “महान महिला” का एक बार भी नार्को टेस्ट नहीं किया गया। कभी भी जीटीवी या NDTV ने इसके बारे में कोई खबर नहीं दी। इसके विपरीत कई महिला संगठनों ने इसका इंटरव्यू लिया और कहा गया कि यह “इस्लामी महिलाओं का क्रांतिकारी रूप”(?) है।

कश्मीर में भारत के झण्डे जलाते और उग्र प्रदर्शन करते युवक भारत के सेकुलरों के लिये “भ्रमित युवा” हैं जिन्हें समझने(?) की जरुरत है, जबकि अमरनाथ भूमि के लिये जम्मू में प्रदर्शन करते युवक “उग्र, हिंसक और भाजपा के गुण्डे” हैं, ये है इनका असली चेहरा… जैसे ही एक साध्वी सिर्फ़ शंका के आधार पर पकड़ाई, मानो सारे चैनलों और अखबारों को काम मिल गया, जाँच एजेंसियाँ और ATS अचानक प्रभावशाली हो गये, तुरन्त नारको टेस्ट का आदेश दिया गया, कोई सबूत न मिला तो “मकोका” लगा दिया गया ताकि आसानी से छुटकारा न हो सके और न्यायालय को गच्चा दिया जा सके, साध्वी को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा, लेकिन महान सेकुलर लोकतन्त्र का एक भी महिला संगठन उसके पक्ष में आवाज उठाने आगे नहीं आया। भले ही कोई साध्वी को निर्दोष बताने के पक्ष में सामने न आता, लेकिन एक “महिला” के सम्मान बचाने, उसे अपने दैनिक धार्मिक कार्य सम्पन्न करवाने, और सतत एक महिला कांस्टेबल साथ रखने जैसी मामूली माँगें तक उठाने की जहमत किसी ने नहीं उठाई। जबकि यही महिला संगठन और गिरिजा व्यास के नेतृत्व में महिला आयोग, देश के किसी भी कोने में किसी अल्पसंख्यक महिला पर हो रहे अत्याचार पर जरा-जरा सी बात पर आसमान सिर पर उठा लेते हैं। नारको टेस्ट के दौरान साध्वी पूरा सहयोग देती हैं, लेकिन फ़िर भी ATS चार-चार बार नारको टेस्ट करवाती है, ये सब क्या है? मजे की बात तो यह है कि यही महिला आयोग राखी सावन्त जैसी “आईटम गर्ल” के पक्ष में तुरन्त आवाज उठाता रहा है, जबकि वह अपनी पब्लिसिटी के लिये वह सारी “हरकतें” कर रही थी।



मानवाधिकार आयोग नाम का “बिजूका” तो चुपचाप बैठा ही है, मार्क्सवादियों के मुँह में भी दही जम गया है, वाचाल अमर सिंह भी अज्ञातवास में चले गये हैं, जबकि यही लोग अफ़जल की फ़ाँसी बचाने के लिये जी-जान एक किये हुए हैं, भले ही सुप्रीम कोर्ट ने उसे दोषी करार दिया है। प्रज्ञा का असली दोष यह है कि वह “भगवा” वस्त्र पहनती है, जो कि कांग्रेस और वामपंथियों को बिलकुल नहीं सुहाता है। सरकार की “सुरक्षा” लिस्ट में वह इसलिये नहीं आती क्योंकि “540 विशिष्ट” (सांसद) लोगों जिनमें से दो तिहाई पर हत्या, बलात्कार, लूट, डकैती, धोखाधड़ी के मामले चल रहे हैं, इनकी “सुरक्षा और सम्मान” बरकरार रखना ज्यादा जरूरी है।

सबसे पहले ATS की RDX वाली “थ्योरी” पिटी, फ़िर हैदराबाद पुलिस ने यह कहकर केस की हवा निकाल दी कि मालेगाँव और हैदराबाद की मक्का मस्जिद विस्फ़ोट में आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है। जिस मोटरसाइकल के आधार पर यह केस खड़ा किया जा रहा है वह प्रज्ञा ने कई साल पहले ही बेच दी थी। आपको याद होगा जब शंकराचार्य को गिरफ़्तार किया गया था तब भी मीडिया और पुलिस ने उन पर रेप, मर्डर, धोखाधड़ी और औरतखोरी के आरोप लगाये थे, कहाँ गये वे आरोप, क्या हुआ उस केस का आज तक किसी को पता नहीं, लेकिन हिन्दू गुरुओं की छवि बिगाड़ने का काम तो सतत जारी है ही… कांची के बाद कंधमाल में भी “हिन्दू आतंकवाद” की कहानियाँ गढ़ी गईं, एक बुजुर्ग स्वामी की हत्या को सिरे से भुलाकर मीडिया सिर्फ़ नन के बलात्कार को ही प्रचारित करता रहा और “बटला हाऊस की गैंग” इससे बहुत खुश हुई होगी। बहुसंख्यकों की भावनाओं का अपमान करने वाले देश और उसके नेताओं का चरित्र इससे उजागर होता है, और वह भी सिर्फ़ अपने चुनावी फ़ायदे के लिये। कुल मिलाकर इनका एक ही काम रह गया है, “भगवा ब्रिगेड” को बदनाम करो, हिन्दुओं को “आतंकवादी” चित्रित करो, चिल्ला-चिल्ला कर भारत की संस्कृति और संस्कारों को पिछड़ा, दकियानूसी और बर्बर बताओ, कारण सिर्फ़ एक ही है कि “हिन्दू” सहिष्णु(?) है, और देखना यही है कि आखिर कब तक यह सहिष्णु बना रहता है।

बांग्लादेश से घुसपैठ जारी है, रामसेतु को तोड़ने के लिये नित नये हलफ़नामे सुप्रीम कोर्ट में दिये जा रहे हैं, बटला हाउस के आरोपियों को एक विश्वविद्यालय खुलेआम मदद दे रहा है, लेकिन जीटीवी और NDTV को एक नया फ़ैशन सूझा है “हिन्दू आतंकवाद”। जयपुर या मुम्बई के विस्फ़ोटों के बाद किसी मौलवी को पकड़ा गया या किसी मुस्लिम धर्मगुरु को हिरासत में लिया गया? किसी चैनल ने “हरा आतंकवाद” नाम से कोई सीरीज चलाई? “उनका” कहना होता है कि “धर्म को आतंकवाद” से नहीं जोड़ना चाहिये, उन्हीं लालुओं और मुलायमों के लिये सिमी निर्दोष है जिसके “मोनो” में ही AK47 राइफ़ल दर्शाई गई है। लेकिन जब प्रज्ञा कहती हैं कि पुलिस उन्हें बुरी तरह पीट रही है और टॉर्चर कर रही है तब किसी के मुँह से बोल नहीं फ़ूटता। जब पप्पू यादव, शहाबुद्दीन और तेलगी जैसे लोगों तक को जेल में “सभी सुविधायें” उपलब्ध हैं, तो क्या प्रज्ञा उनसे भी बुरी है? क्या प्रज्ञा ने आसिया अन्दराबी की तरह मासूम महिलाओं पर एसिड फ़ेंका है? या प्रज्ञा ने देश के कोई राज चुराकर पाकिस्तान को बेचे हैं? ये सब तब हो रहा है जबकि एक “महिला”(?) ही इस देश की सर्वेसर्वा है।



अब देखते हैं कि क्यों हिन्दू “हिजड़े” कहलाते हैं –

1) 3 लाख से अधिक हिन्दू कश्मीर से “धर्म” के नाम पर भगा दिये जाते हैं, लेकिन एक भी हिन्दू उठकर यह नहीं कहता कि बस बहुत हो चुका, मैं सारे “शैतानों” को सबक सिखाने का प्रण लेता हूँ।
2) कश्मीर घाटी में 500 से अधिक मंदिर सरेआम तोड़े जाते हैं, कोई कश्मीरी हिन्दू “हिन्दू आतंकवाद” नहीं दिखाता।
3) डोडा और पुलवामा छोटे-छोटे बच्चों तक को चाकुओं से रेता जाता है, लेकिन एक भी हिन्दू संगठन उनके विरोध में आगे नहीं आता। एक संगठन ने “मानव बम” बनाने की पहल की थी, एक भी हिन्दू युवक आगे नहीं आया।

राममनोहर लोहिया ने कहा था कि भारत के तीन महान स्वप्न हैं – राम, शिव और कृष्ण। मुस्लिम आक्रांताओं ने तो हजारों मन्दिर तोड़े ही, आज की स्थिति में भी राम जन्मभूमि में रामलला अस्थाई टेंट में धूप-पानी में खड़े हैं, जरा गूगल पर जाईये और देखिये किस तरह काशी में विश्वनाथ मन्दिर चारों तरफ़ से मस्जिद से घिर चुका है, पुराने विश्वनाथ मन्दिर के खंभों को बड़ी सफ़ाई खुलेआम यह दर्शाते हुए घेरा गया है कि देखो ऐ हिन्दुओं, यह पहले तुम्हारा मन्दिर था, अब यह मस्जिद बनने जा रही है। कोई हिन्दू संगठन “आतंकवादी” बना? नहीं। जो काम गजनी, गोरी और अब्दाली भी न कर पाये, मुस्लिम वोटों के लिये यह सरकार कर चुकी है। कांग्रेस, सेकुलर और वामपंथी एक खतरनाक खेल खेल रहे हैं, और उन्हें अन्दाजा नहीं है कि वे भारत का क्या नुकसान करने जा रहे हैं। देखना यह है कि आखिर कब हिन्दुओं के सब्र का बाँध टूटता है, लेकिन एक बात तो तय है कि “सुनामी” चेतावनी देकर नहीं आती, वह अचानक किसी एक “झटके” से आती है और सब कुछ बहा ले जाती है…

(सन्दर्भ – मा. तरुण विजय का इंडिया टाइम्स पर अंग्रेजी में छपा यह लेख)


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Kerala and Malwa becoming Nursery of Terrorism in India

हाल ही में जम्मू कश्मीर में दो आतंकवादी मुठभेड़ में मारे गये। सुरक्षा बलों द्वारा उनकी तलाशी लेने पर उनकी जेबों से केरल के मतदाता परिचय पत्र पाये गये। जो आतंकवादी मारे गये उनके नाम हैं मुहम्मद फ़याज़ (थय्यिल जिला कन्नूर) और अब्दुल रहीम (चेट्टिपदी, जिला मलप्पुरम)। यह आम जनता के लिये चौंकाने वाली खबर हो सकती है, कि केरल के युवक कश्मीर में आतंकवादी बनकर क्या कर रहे थे? और क्या केरल भी अब जेहाद की नर्सरी बनता जा रहा है? लेकिन सच यही है कि पहले भी इस प्रकार की खबरें आती रही हैं कि केरल के अन्दरूनी इलाकों में आतंकवादी अपने पैर पसार चुके हैं। केरल की नेशनल डेवलेपमेण्ट फ़्रण्ट (NDF) जो कि केरल का एक मुस्लिम संगठन है बड़ी तेजी से “नई भरती” कर रहा है, और इस संगठन के “सिमी” और “इंडियन मुजाहिदीन” से गहरे सम्पर्क रहे हैं। यह वही NDF है जिस पर ISI के साथ रिश्ते होने के आरोप सतत लगते रहते हैं और पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार यह संगठन केरल के “मराड नरसंहार” में भी शामिल रहा। इस प्रकार की खबरें भी हैं कि इंडियन मुजाहिदीन के मुख्य लीडर सुबैन कुरैशी ने केरल का सघन दौरा किया था। इस मामले में सबसे अधिक शर्मनाक पहलू यह है कि केरल में कांग्रेस हो या वामपंथी दोनों पार्टियाँ मुसलमानों को रिझाने के नाम पर NDF की लल्लोचप्पो करती फ़िरती हैं। सत्ताधारी वामपंथी नेता तो ISS के नेता अब्दुल नासिर मदनी के साथ कई जगहों पर एक ही मंच पर भाषण देते देखे गये और कांग्रेस हमेशा से NDF के नेताओं की संदिग्ध गतिविधियों पर परदा डालती रही है।



केरल को हमेशा ही धर्मनिरपेक्ष संस्कृति के ताने-बाने वाला राज्य माना जाता रहा है, लेकिन पिछले एक दशक में स्थितियाँ बहुत तेजी से बदली हैं। केरल का तटीय मलाबार इलाका जो पहले प्राकृतिक सौन्दर्य के लिये जाना जाता था, अब स्मगलिंग के जरिये हथियार और ड्रग सप्लाई का केन्द्र बनता जा रहा है। पर्यटन की आड़ लेकर इस क्षेत्र में कई संदिग्ध गतिविधियाँ जारी हैं। आईबी की एक आंतरिक रिपोर्ट के अनुसार जब 1993 में मौलवी अबुल हसन चेक्कानूर का अपहरण और हत्या हुई, उस वक्त यह माहौल बनाया गया कि सुरक्षा बल और जाँच एजेंसियाँ जानबूझकर इस हत्या की गुत्थी नहीं सुलझा रहे हैं। दुष्प्रचार के जरिये “सिमी” और “इस्लामिक सेवक संघ” प्रदेश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को चोट पहुँचाने की कोशिशें तेज करते रहे और धीरे-धीरे वे इसमें कामयाब भी होने लगे। केरल में बढ़ता शिक्षा स्तर और फ़िर भी बेरोजगारी ने इन परिस्थितियों को पनपने का भरपूर मौका दिया। खाड़ी में काम करने जाने वाले अन्य मुसलमानों की बेहतर होती आर्थिक स्थिति और उन्हीं के बीच में पाकिस्तानी तत्व आग भड़काने में लगे रहे और हताश मुस्लिम युवा धीरे-धीरे इन तत्वों की ओर खिंचा चला गया। सिमी ने अपना पुनर्घनत्वीकरण शुरु कर दिया, और यदि आईबी की मानें तो अलुवा के पास बिनानीपुरम, एर्नाकुलम जिला, मलप्पुरम और कोजीकोड जिलों में सिमी बेहद मजबूत स्थिति में है। केरल में आतंकवादी उपस्थिति की सबसे पहली झलक कोयम्बटूर बम धमाकों के दौरान पता चल गई थी, जब जाँच के दौरान तमिलनाडु स्थित अल-उम्मा के अब्दुल नासिर मदनी (इस्लामिक सेवक संघ का संस्थापक) के साथ जीवंत सम्पर्क पाये गये थे। आईएसआई के लिये केरल एक पसन्दीदा जगह बन चुका है। गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है कि अब आईएसआई इस बात को समझ चुका है कि कश्मीर में और भारत के अन्य राज्यों में स्थानीय युवाओं को भरती करना अधिक फ़ायदेमन्द है और इसीलिये “इंडियन मुजाहिदीन” नाम भी दिया गया है, ताकि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हल्ला मचे तो कहा जा सके कि यह तो भारत के अन्दरूनी गुटों का ही काम है हमारा इससे कोई लेना-देना नहीं है। केरल पर अधिकाधिक शक इससे भी हुआ है कि इंडियन मुजाहिदीन के खासमखास अब्दुल पेदिकल शिबली और याह्या कामाकुट्टी जो इन्दौर से हाल में गिरफ़्तार हुए, केरल से ही हैं और ये लोग सिमी के सदस्यों को “तकनीकी” प्रशिक्षण देते थे। एक और व्यक्ति अब्दुल जलील भी गिरफ़्तार किया गया है जो केरल के कन्नूर का रहने वाला है और उससे बरामद डायरियों से उसके कश्मीरी आतंकवादियों से सम्बन्ध स्थापित होते हैं। लेकिन कश्मीर में केरल के युवाओं का मारा जाना एक बेहद गम्भीर मसला है और असम विस्फ़ोटों के बाद यह दर्शाता है कि भारत की सुरक्षा इतनी तार-तार हो चुकी है कि देश के किसी भी कोने से आतंकवादी अपना काम कर सकते हैं।



इसी प्रकार देश का मध्य क्षेत्र है मध्यप्रदेश और जिसका पश्चिमी इलाका है मालवा, जिसमें रतलाम, मन्दसौर, इन्दौर, उज्जैन और देवास आदि इलाके आते हैं। यह क्षेत्र भी पिछले एक दशक के दौरान सिमी का मजबूत गढ़ बन चुका है। उद्योग-धंधों के न पनपने और इन्दौर के “मिनी मुम्बई” बनने की चाहत ने अपराधियों, भू-माफ़ियाओं और नेताओं का एक ऐसा गठजोड़ तैयार कर दिया है जो सिर्फ़ अपने फ़ायदे की सोचता है, इस इलाके (मालवा) की खास बात है कि इन्दौर को छोड़कर बाकी का समूचा इलाका बेहद शांत है, लोग धर्मप्रिय हैं, खामखा किसी के पचड़े में नहीं पड़ते। लेकिन इस इलाके में बदलाव आना शुरु हुआ बाबरी मस्जिद ध्वंस और उसके बाद हुए दंगों के बाद से। कई लोगों को सोहराबुद्दीन की याद होगी, हाल ही में कई सेकुलरों और मानवाधिकारवादियों ने इसके गुजरात पुलिस द्वारा किये गये एनकाउंटर पर काफ़ी शोरगुल मचाया था। सोहराबुद्दीन भी मालवा के इलाके की ही पैदाइश है, उन्हेल नामक कस्बे में इसके खेत के कुंए से एके-56 रायफ़लें बरामद की गई थीं, और कई बम विस्फ़ोटों में भी यह शामिल रहा ऐसा पुलिस और एजेंसियों का कहना है (लेकिन “सेकुलर” लोग इसे संत मानते हैं जैसे कि अफ़ज़ल गुरु को)। ताजा मामला इन्दौर से ही सिमी के प्रमुख व्यक्ति सफ़दर नागौरी और उसके साथियों की गिरफ़्तारी का रहा। उल्लेखनीय है कि सफ़दर नागौरी भी हमारे उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय का पीएच. डी. का छात्र रहा और उसने कश्मीर विषय पर केन्द्रित थीसिस “बर्फ़ की आग कैसे बुझेगी” जमा की है, जिसमें कुछ राष्ट्रविरोधी टिप्पणियाँ पाई गईं, और इस विषय पर इंडिया टुडे में काफ़ी कुछ प्रकाशित हो चुका है। सफ़दर नागौरी सिमी का सबसे प्रमुख व्यक्ति है, और कई राज्यों में इस संगठन को फ़ैलाने में इसका बड़ा हाथ रहा है, इसके साथ ही शिबली भी इसी के साथ पकड़ा गया था (जैसा कि पहले बताया)। हाल ही में उज्जैन पुलिस ने गुजरात एटीएस के साथ एक संयुक्त ऑपरेशन में उज्जैन में कापड़िया उर्फ़ मूसा को पकड़ा जो कि अहमदाबाद धमाकों का प्रमुख आरोपी है और अब तक फ़रार था। सिमी के अन्य पदाधिकारियों का आना-जाना इन जिलों में लगा रहता है, यहाँ वे आसानी से छिप जाते हैं उन्हें “स्थानीय समर्थन” भी हासिल हो जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि केरल और मालवा के शांत इलाकों को आतंकवादी अपनी शरणस्थली बना चुके हैं और जब वे यहाँ आराम फ़रमाने या फ़रारी काटने आते हैं तो साथ-साथ यहाँ के असंतुष्ट युवकों को बरगलाकर अपने साथ मिलाने में भी कामयाब हो जाते हैं।

देश इस समय सबसे गम्भीर खतरे की चपेट में है, और इस खतरे को और ज्यादा बढ़ा रहे हैं कांग्रेस और कथित “सेकुलर” लोग जो तीन श्रेणियों में हैं, पहला जिन्हें यह आसन्न खतरा उनकी “जिद” के कारण दिखाई नहीं दे रहा… दूसरा यदि दिखाई दे भी रहा है तो वे उसे खतरा मानना नहीं चाहते… और तीसरा या तो वे लोग भी जाने-अनजाने इस खतरे का हिस्सा बन चुके हैं। जब इन तत्वों से मुकाबले के लिये हिन्दूवादी संगठन आगे आते हैं (साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का भी उज्जैन से गहरा सम्बन्ध रहा है) तो जिस प्रकार कन्नूर और मलप्पुरम में संघ कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई, या कंधमाल में एक वयोवृद्ध स्वामीजी की हत्या हुई या फ़िर कश्मीर से जिस प्रकार हिन्दुओं का जातीय सफ़ाया किया गया, ऐसा कुछ होता है, जिसका दोष भी षडयंत्रपूर्वक ये सेकुलर उन्हीं के माथे पर ढोल देते हैं। इसीलिये विभिन्न फ़ोरमों पर यह लगातार दोहराया जाता है कि इस देश का सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस और “सो-कॉल्ड” सेकुलर लोग कर रहे हैं। कहा गया है न कि सोते हुए को जगाना आसान है लेकिन जो सोने का नाटक कर रहा हो उसे आप कैसे जगायेंगे? जब हमारे बीच में ही “जयचन्द” मौजूद हैं तो दूसरों को दोष क्या देना, पहले तो इनसे निपटना होगा।


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Mugalistan and Red Corridor – Threat to Indian Security-3

(भाग-2 से जारी) “मुगलिस्तान” के लक्ष्य में सबसे पहले पश्चिम बंगाल और असम का नाम आयेगा। ऐसे कई इलाके “पहचाने” गये हैं जिन्हें “मिनी पाकिस्तान” कहा जाने लगा है, असम में पाकिस्तानी झंडे लहराने की यह घटना कोई अचानक जोश-जोश में नहीं हो गई है, इसके पीछे गहरी रणनीति काम कर रही है, मुगलिस्तान का सपना देखने वालों को इस पर प्रतिक्रिया देखना थी, और असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने यह कहकर कि “ये कोई पाकिस्तानी झंडे नहीं थे…” इनका काम और भी आसान बना दिया है। भारत के उत्तर-पूर्वी इलाके को मुख्य भूमि से जोड़ने वाली छोटी सी भूमि जिसे “चिकन नेक” या “सिलीगुड़ी कॉरीडोर” कहा जाता है, इनके मुख्य निशाने पर है और इस ऑपरेशन का नाम “ऑपरेशन पिनकोड” रखा गया है, जिसके मुताबिक बांग्लादेश की सीमा के भीतर स्थित 950 मस्जिदों और 439 मदरसों से लगभग 3000 जेहादियों को इस विशेष इलाके में प्रविष्ट करवाने की योजना है। उल्लेखनीय है कि यह “चिकन नेक” या सिलिगुड़ी कॉरीडोर 22 से 40 किमी चौड़ा और 200 किमी लम्बा भूमि का टुकड़ा है जो कि समूचे उत्तर-पूर्व को भारत से जोड़ता है, यदि इस टुकड़े पर नेपाल, बांग्लादेश या कहीं और से कब्जा कर लिया जाये तो भारतीय सेना को उत्तर-पूर्व के राज्यों में मदद पहुँचाने के लिये सिर्फ़ वायु मार्ग ही बचेगा और वह भी इसी जगह से ऊपर से गुजरेगा। इतनी महत्वपूर्ण सामरिक जगह से लगी हुई सीमा और प्रदेशों में कांग्रेस इस प्रकार की घिनौनी “वोट बैंक” राजनीति खेल रही है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि जहाँ हिन्दू बहुसंख्यक होता है वहाँ धार्मिक स्वतन्त्रता, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और लोकतन्त्र होता है, लेकिन जहाँ भी मुस्लिम बहुसंख्यक होता है वहाँ इनमें से कुछ भी नहीं पाया जाता, और आजादी के बाद पश्चिम बंगाल, असम, मणिपुर, नागालैण्ड और त्रिपुरा के कुल मिलाकर 20 से अधिक जिले अब मुस्लिम या ईसाई बहुसंख्यक बन चुके हैं, लेकिन “सेकुलर” नाम के प्राणी को यह सब दिखाई नहीं देता।



(चित्र से स्पष्ट है कि सामरिक महत्व के "चिकन नेक" पर कितना बड़ा खतरा मंडरा रहा है)

अपने लेख “डेमोग्राफ़ी सर्वे ऑन ईस्टर्न बॉर्डर” में भावना विज अरोरा कहती हैं, “
जिस समय भारत का विभाजन हुआ उसी वक्त मुस्लिम नेता पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान को पाकर पूरी तरह खुश नहीं थे, उस वक्त से ही “अविभाजित आसाम” उनकी निगाहों में खटकता था और वे पूरा उत्तर-पूर्व पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे। मानुल-हक-चौधरी, जो कि जिन्ना के निजी सचिव थे (और बाद में असम में मंत्री भी बने) ने 1947 में जिन्ना को पत्र लिखकर कहा था कि “कायदे-आजम आप मुझे सिर्फ़ 30 साल दीजिये मैं आपको आसाम तश्तरी में सजाकर दूँगा…” उसी समय से “पूरे उत्तर-पूर्व में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ाओ” अभियान चलाया जा रहा है, जो कि अब विस्फ़ोटक स्थिति में पहुँच चुका है, जबकि देश के साथ-साथ असम में भी अधिकतर समय कांग्रेस का शासन रहा है। इसीलिये जब अनुभवी लोग कहते हैं कि कांग्रेस से ज्यादा खतरनाक, वोट-लालची और देशद्रोही पार्टी इस दुनिया में कहीं नहीं है तब उत्तर-पूर्व और कश्मीर को देखकर इस बात पर विश्वास होने लगता है। आज की तारीख में असम के 24 में 6 जिले मुस्लिम बहुसंख्यक हो चुके हैं, 6 जिलों में मुस्लिम जनसंख्या लगभग 40 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है, अभी 126 विधानसभा सीटों में से 54 पर मुस्लिम वोट ही निर्णायक हैं, कुल 28 से अधिक मुस्लिम विधायक हैं, और चार मंत्री हैं। स्वाभाविक सी बात है कि मुस्लिम समुदाय (स्थानीय और बांग्लादेश से आये हुए मिलाकर) राज्य में नीति-नियंता बन चुके हैं। इन घुसपैठियों ने असम के स्थानीय आदिवासियों को उनके घरों से खदेड़ना शुरु कर दिया है और असम में आये दिन आदिवासी-मुस्लिम झड़पें होने लगी हैं। असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का पूरा संरक्षण इन लोगों को प्राप्त है, और यह “भस्मासुर” एक दिन इन्हीं के पीछे पड़ेगा, तब इन्हें अकल आयेगी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।



(चित्र से स्पष्ट है कि प्रत्येक दशक में मुस्लिम जनसंख्या ने जन्मदर में हिन्दुओं को पछाड़ा है)

लगभग यही हालात नागालैण्ड में हैं, जहाँ दीमापुर जिले में बांग्लादेशी घुसपैठियों की तादाद बहुत बढ़ चुकी है। रिक्शा चलाने वाले, खेतिहर मजदूर, ऑटो-चालक अब बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुख्य काम बन चुके हैं, इन्होंने नगा खेत मालिकों पर भी अपना रौब गाँठना शुरु कर दिया है। आये दिन चोरी, लूट, तस्करी, नशीली दवाईयों का कारोबार जैसे अपराधों में बांग्लादेशी मुस्लमान लिप्त पाये जाते हैं, लेकिन राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती। राजधानी कोहिमा, मोकोकचुंग, वोखा, जुन्हेबोटो, फ़ेक, मोन और त्सुएनसांग इलाकों में भी ये पसरते जा रहे हैं।

एक बार नागालैण्ड के मुख्यमंत्री एस सी जमीर ने कहा था कि “बांग्लादेशी मुसलमान हमारे राज्य में मच्छरों की तरह फ़ैलते जा रहे हैं…”, कुछ साल पहले नगा छात्रों ने इनके खिलाफ़ मुहिम चलाई थी, लेकिन “अज्ञात” कारणों से इन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी। खतरनाक बात तो यह भी है कि नगा विद्रोहियों और उल्फ़ा-बोडो संगठनों के कई कैम्प बांग्लादेश के इलाके में चल रहे हैं और जब भी बांग्लादेशी मुसलमानों पर कोई कड़ी कार्रवाई करने की बात की जाती है तब बांग्लादेश की ओर से धमकी दी जाती है कि यदि भारत में रह रहे (आ-जा रहे) बांग्लादेशियों पर कोई कार्रवाई हुई तो हम इनके कैम्प बन्द करवा देंगे। दीमापुर के स्थानीय अखबारों के छपी खबर के अनुसार किसी भी मुस्लिम त्यौहार के दिन कोहिमा और दीमापुर के लगभग 75% बाजार बन्द रहते हैं, इससे जाहिर है कि व्यापार और अर्थव्यवस्था पर भी इनका कब्जा होता जा रहा है।

विस्तारित और बड़ी योजना –
मुगलिस्तान की इस संकल्पना को साकार करने के लिये एक साथ कई मोर्चों पर काम किया जा रहा है, देश के एक कोने से दूसरे कोने तक गहरी मुस्लिम जनसंख्या का जाल बिछाया जा रहा है। केरल राज्य में मुस्लिम जनसंख्या लगभग 25% तक पहुँच चुकी है, आये दिन वहाँ संघ कार्यकर्ताओं पर हमले होते रहते हैं। कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों (दोनों ही इन मुस्लिम वोटों के सौदागर हैं), ने अब्दुल मदनी जैसे व्यक्ति को छुड़वाने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। मलप्पुरम जिला काफ़ी पहले मुस्लिम बहुल हो चुका है और इस जिले में लगभग हरेक संस्थान में शुक्रवार को छुट्टी मनाई जाती है (रविवार को नहीं) और सरकारें चुपचाप देखती रहती हैं। पड़ोसी दो जिले कोजीकोड और कन्नूर में भी हिन्दुओं की हत्याओं का दौर चलता रहता है, लेकिन दोनों ही पार्टियाँ इसे लेकर कोई कार्रवाई नहीं करतीं (ठीक वैसे ही जैसा कि कश्मीर में किया गया था)।

मुगलिस्तान की इस योजना में फ़िलहाल नक्सलवादियों और चर्च की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है। जब नक्सलवादी और चर्च मिलकर आंध्रप्रदेश से नेपाल तक एक विशाल “लाल गलियारा” बना लेंगे उस वक्त तक भारत नामक सत्ता बहुत कमजोर हो चुकी होगी, जाहिर है कि इस खेल में हिन्दुओं को ही सबसे अधिक भुगतना पड़ेगा, फ़िर कब्जे के लिये अन्तिम निर्णायक लड़ाई इस्लामी कट्टरपंथियों, मिशनरी-ईसाई और वाम-समर्थित नक्सलवादी गुटों में होगी, तब तक पहले ये लोग एक साथ मिलकर भारत और हिन्दुओ को कमजोर करते रहेंगे, आये दिन बम विस्फ़ोट होते रहेंगे, हिन्दुओं, हिन्दू नेताओं, मन्दिरों पर हमले जारी रहेंगे, आदिवासियों और गरीबों में धर्म-परिवर्तन करवाना, जंगलों में नक्सलवादी राज्य स्थापित करना, मुस्लिम आबादी को पूर्व-नियोजित तरीके से बढ़ाते जाना इस योजना के प्रमुख घटक हैं। दुःख की बात यह है कि हम कश्मीर जैसे हालिया इतिहास तक को भूल चुके हैं, जहाँ यह नीति कामयाब रही है और लाखों हिन्दू अपने ही देश में शरणार्थी बने हुए हैं और अमरनाथ की एक छोटी सी जमीन के लिये भारत सरकार को नाक रगड़नी पड़ती है। लेकिन इस मुगलिस्तान के योजनाकारों को भारत में बैठे “सेकुलरों”, “बुद्धिजीवियों”, “कांग्रेस”, NDTV-CNNIBN जैसे चैनलों पर पूरा भरोसा है और ये इनका साथ वफ़ादारी से दे भी रहे हैं… बाकी का काम हिन्दू खुद ही दलित-ब्राह्मण-तमिल-मराठी जैसे विवादों में विभाजित होकर कर रहे हैं, जो यदि अब भी जल्दी से जल्दी नहीं जागे तो अगली पीढ़ी में ही खत्म होने की कगार पर पहुँच जायेंगे…


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Mugalistan and Red Corridor – Threat to Indian Security-2

(भाग-1 से जारी…) कश्मीर में नागरिकों (यानी 99% मुसलमानों को) को धारा 370 के अन्तर्गत विशेषाधिकार प्राप्त हैं, इस राज्य से आयकर का न्यूनतम संग्रहण होता है। केन्द्र से प्राप्त कुल राशि का 90% सहायता और 10% का लोन माना जाता है, फ़िर भी यहाँ के लोग “भारत सरकार” को गालियाँ देते हैं और तिरंगा जलाते रहते हैं। बौद्ध बहुल इलाकों (जैसे लेह) के युवाओं को कश्मीर की सिविल सेवा से महरूम रखा जाता है। बौद्ध संगठनो ने कई बार केन्द्र को ज्ञापन देकर उनके प्रति अपनाये जा रहे भेदभाव को लेकर शिकायत की, लेकिन जैसा कि कांग्रेस की “वोट-बैंक” नीति है उसके अनुसार कोई सुनवाई नहीं होती। हालात यहाँ तक बिगड़ चुके हैं कि बौद्धों को मृत्यु के पश्चात मुस्लिम बहुल इलाके कारगिल में दफ़नाने की जगह मिलना मुश्किल हो जाता है।

अपनी आँखों के सामने भारत का नक्शा लाईये, आईये देखते हैं कि कैसे और किन-किन जिलों और इलाकों में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है, उत्तर से चलें तो कश्मीर में लगभग 98% आबादी मुस्लिम हो चुकी है, पुंछ, डोडा, बनिहाल, किश्तवार और भद्रवाह जैसे इलाके पूर्ण मुस्लिम हो चुके हैं। लद्दाख इलाके में कारगिल में मुस्लिम 70-30 के अनुपात में बहुसंख्यक हो चुके हैं। थोड़ा नीचे खिसकें तो हरियाणा-राजस्थान के मेवात इलाके में मुस्लिम आबादी 2005 में 66% हो चुकी थी। मेवात इलाके में गौ-हत्या तो एक मामूली बात बन चुकी है, लेकिन हिन्दुओं का सामाजिक बहिष्कार और उनके साथ दुर्व्यवहार भी अब आम हो चला है। हरियाणा की कांग्रेस सरकार ने चुपचाप गुड़गाँव इलाके को काट कर एक नया जिला मेवात भी बना दिया। इस इलाके में मुस्लिम परिवारों में औसत जन्म दर प्रति परिवार 12 है, और मोहम्मद ईशाक जैसे भी लोग हैं जिनके 23 बच्चे हैं और उसे इस पर गर्व(?) है। थोड़ा आगे जायें तो पुरानी दिल्ली और मलेरकोटला (पंजाब) भी धीरे-धीरे मुस्लिम बहुल बनते जा रहे हैं, इसी पट्टी में नीचे उतरते जायें तो उत्तरप्रदेश के आगरा, अलीगढ़, आजमगढ़, मेरठ, बिजनौर, मुज़फ़्फ़रनगर, कानपुर, वाराणसी, बरेली, सहारनपुर, और मुरादाबाद में भी मुस्लिम आबादी न सिर्फ़ तेजी से बढ़ रही है बल्कि गणेश विसर्जन, दुर्गा पूजा आदि उत्सवों पर जुलूसों पर होने वाले पथराव और हमलों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।

अगला दरवाजा है हमारे मीडिया दुलारे लालू का प्रदेश बिहार… जहाँ मुस्लिम आबादी 17% तक पहुँच चुकी है। भारत-नेपाल की सीमा के किनारे-किनारे लगभग 1900 मदरसे खोले जा चुके हैं। सशस्त्र सीमा पुलिस के महानिदेशक तिलक काक बताते हैं कि न सिर्फ़ बिहार में बल्कि साथ लगी नेपाल की सीमा के भीतर भी मदरसों की संख्या में अचानक बढ़ोतरी आई है, यदि इन मदरसों की संख्या की तुलना मुस्लिम जनसंख्या से की जाये तो ऐसा लगेगा कि मानो न सिर्फ़ पूरी मुस्लिम बिरादरी बल्कि हिन्दू बच्चे भी इन मदरसों में पढ़ने जाने लगे हैं। काक के अनुसार यह बेहद खतरनाक संकेत है और कोई भी सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति कह सकता है कि मदरसों की यह संख्या गैर-आनुपातिक और अचरज में डालने वाली है। लेकिन कांग्रेस-लालू और “सेकुलरों” के कान पर जूँ भी नहीं रेंगने वाली।




सीमा प्रबन्धन की टास्क फ़ोर्स के अनुसार अक्टूबर 2000 से भारत-नेपाल सीमा पर मदरसों और मस्जिदों की बाढ़ आ गई है और ये दिन-दूनी-रात-चौगुनी तरक्की कर रहे हैं। भारत की तरफ़ वाली सीमा में दस वर्ग किलोमीटर के दायरे में 343 मस्जिदें, 300 मदरसे बने हैं जबकि नेपाल की तरफ़ 282 मस्जिदें और 181 मदरसों का निर्माण हुआ है। ये मदरसे और मस्जिदें सऊदी अरब, ईरान, कुवैत, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भारी मात्रा में धन प्राप्त करती हैं। इनके मुख्य प्राप्ति स्रोत इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक (जेद्दाह) और हबीब बैंक (कराची) हैं, इनका साथ देने के लिये नेपाल की हिमालयन बैंक ने अपनी शाखायें विराटनगर और कृष्णानगर में भी खोल दी हैं। यह तो सर्वविदित है कि नेपाल के रास्ते ही भारत में सर्वाधिक नकली नोट खपाये जाते हैं, यहाँ दाऊद की पूरी गैंग इस काम में शामिल है जिसे ISI का पूरा कवर मिलता रहता है।

पश्चिम बंगाल और असम में स्थिति और भी खराब हो चुकी है। 2001 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या 28% तथा आसाम में 31% तक हो चुकी है। अरुण शौरी जी ने इंडियन एक्सप्रेस के अपने कालम में लिखा है कि – 1951 में भारत में मुस्लिम जनसंख्या 10% थी, 1971 में 10.8%, 1981 में 11.3% और 1991 में लगभग 12.1%। जबकि 1991 की ही जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में मुस्लिम जनसंख्या 56%, नदिया में 48%, मुर्शिदाबाद में 52%, मालदा में 54% और इस्लामपुर में 60% हो चुकी थी। बांग्लादेश से लगी सीमा के लगभग 50% गाँव पूरी तरह से मुस्लिम बहुल हो चुके हैं। असम में भी सीमावर्ती जिले पूरी तरह से हरे रंग में रंगे जा चुके हैं, ऐसे में किसी बाहरी आक्रमण के वक्त हमारे सुरक्षा बल बुरी तरह से दो पाटों के बीच फ़ँस सकते हैं, और न तो तब न ही अभी हमारे परमाणु शक्ति होने का कोई फ़र्क पड़ेगा। जब आक्रमणकारियों को “लोकल सपोर्ट” मिलना शुरु हो जायेगा, तब सारी की सारी परमाणु शक्ति धरी रह जायेगी।



आँकड़े बताते हैं कि 24 परगना और दिनाजपुर से लेकर बिहार के किशनगंज तक का इलाका पूरी तरह से मुस्लिम बहुल हो चुका है। 1991 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल की कुल 7 करोड़ जनसंख्या में से लगभग 2.8 करोड़ मुस्लिम थे जिसमें से भी 1.2 करोड़ तो सिर्फ़ सीमावर्ती जिलों में रहते हैं। बंगाल और बिहार का यह गंगा-हुगली के किनारे का महत्वपूर्ण इलाका लगभग पूरी तरह से मुस्लिम देश की तरह लगने लगा है। ऐसे में देश की सुरक्षा कितनी खतरे में है यह आसानी से समझा जा सकता है। कुल मिलाकर उभरने वाली तस्वीर बेहद चिंताजनक है, 24 परगना से शुरु करके, नदिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, दिनाजपुर, रायगंज, इस्लामपुर, किशनगंज (बिहार), सिलिगुड़ी, दार्जीलिंग, न्यू-जलपाईगुड़ी, कूच बिहार और आसाम में प्रवेश करते ही धुबरी, ग्वालपाड़ा, बोंगाईगाँव, कोकराझार और बारपेटा… एक बेहद सघन मुस्लिम बहुल इलाका पैर पसार चुका है।

“द पायनियर” में प्रकाशित संध्या जैन के लेख “इंडियाज़ कैंसर वार्ड” के मुताबिक, अरुणाचल के पूर्व IGP आर के ओहरी पहले ही इस सम्बन्ध में चेतावनी जारी कर चुके हैं कि पश्चिम एशिया से लेकर बांग्लादेश तक एक “इस्लामी महाराज्य” बनाने की एक व्यापक योजना गुपचुप चलाई जा रही है (“मुस्लिम बंगभूमि”(?) की माँग एक बार उठाई जा चुकी है)। बांग्लादेश के मानवाधिकार कार्यकर्ता सलाम आज़ाद कहते हैं कि “तालिबान की वापसी” के लिये बांग्लादेश सबसे मुफ़ीद जगह है। बांग्लादेश में हिन्दुओं और उनकी महिलाओं के साथ बदसलूकी और ज्यादतियाँ बढ़ती ही जा रही हैं और वहाँ की सरकार को भी इसका मूक समर्थन हासिल है। (बांग्लादेश दुनिया का एकमात्र देश होगा जो उसकी आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले भारत के खिलाफ़ ही सोचता है, आखिर यह कौन सी भावना है और किस प्रकार की मानसिकता है?) नॉर्थ-ईस्ट स्टूडेण्ट ऑर्गेनाइजेशन के चेयरमैन समुज्जल भट्टाचार्य बताते हैं कि असम के लगभग 49 आदिवासी इलाके बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण अल्पमत में आ गये हैं और घुसपैठियों की यह छाया अरुणाचल, नागालैण्ड, मणिपुर और मेघालय तक फ़ैलती जा रही है। वैसे भी भारत “एक विशाल धर्मशाला” है जहाँ कोई भी, कभी भी, कहीं से भी अपनी मर्जी से आ-जा सकता है, यह गाँधीवादियों का भी देश है और करुणा की जीती-जागती मिसाल भी है जहाँ घुसपैठियों को राशन कार्ड और मतदाता परिचय पत्र भी दिये जाते हैं, कांग्रेस का एक सांसद तो भारत का नागरिक ही नहीं है, और 8000 से अधिक पाकिस्तानी नागरिक वीसा अवधि समाप्त होने के बाद भारत में कहीं “गुम” हो चुके हैं, है ना हमारा भारत एक सहनशील, “धर्मनिरपेक्ष” महान देश???। जब आडवाणी गृहमंत्री थे तब इस समस्या के हल के लिये उन्होंने एक विशेष योजना बनाई थी जो कि यूपीए सरकार के आते ही ठण्डे बस्ते में डाल दी गई।

2001 की जनगणना के अनुसार लगभग 1.6 करोड़ बांग्लादेशी इस समय भारत में अवैध निवास कर रहे हैं। एक सर्वे के अनुसार लगभग 3 लाख बांग्लादेशी प्रति दो माह में भारत मे प्रवेश कर जाते हैं। अगस्त 2000 की सीमा संगठन की रिपोर्ट के अनुसार 13 लाख से अधिक बांग्लादेशी इस समय अकेले दिल्ली में मौजूद हैं। ये “भिखारी” लोग भारत की अर्थव्यवस्था के लिये बोझा तो हैं हीं, देश की सुरक्षा के लिये भी बहुत बड़ा खतरा हैं, लेकिन वोटों के लालच में अंधे हो चुके कांग्रेस और वामपंथियों को यह बात समझायेगा कौन? भारत-बांग्लादेश की 2216 किमी सीमा पर तार लगाने का काम बेहद धीमी रफ़्तार से चल रहा है और मार्च 2007 तक सिर्फ़ 1167 किमी पर ही बाड़ लगाई जा सकी है, पैसों की कमी का रोना रोया जा रहा है, जबकि देश के निकम्मे सरकारी कर्मचारियों और सांसदों के वेतन पर अनाप-शनाप खर्च जारी है। पश्चिम बंगाल की 53 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक की स्थिति में आ चुके हैं, अब ऐसे में भला कौन सी राजनैतिक पार्टी उनसे “पंगा” लेगी? रही बात हिन्दुओं की तो वे कभी एक होकर वोट नहीं दे सकते, क्योंकि उन्हीं के बीच में “सेकुलर” नाम के जयचन्द मौजूद रहते हैं। पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से 45 मुस्लिम हैं, जबकि 5 मंत्री हैं, इसी प्रकार 42 लोकसभा सीटों में से 5 पर मुस्लिम सांसद हैं, ऐसे में सरकार की नीतियों पर इनका प्रभाव तो होना ही है। यूपीए सरकार को समर्थन देने के एवज में वामपंथियों ने वोट बैंक बनाने के लिये इस क्षेत्र का जमकर उपयोग किया।

(भाग-3 में जारी रहेगा…)

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Mugalistan and Red Corridor – Threat to Indian Security

गत दिनों असम में हुए उपद्रव और दंगों के दौरान भीड़ द्वारा सरेआम पाकिस्तानी झंडे लहराने की घटनायें हुईं। एक पाकिस्तानी झंडा तो 2-3 दिनों तक एक लैम्प पोस्ट पर लहराता दिखाई दिया था, जिसकी तस्वीरें नेट पर प्रसारित भी हुई थीं। असम के कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने हमेशा की तरह कांग्रेसी (यानी नकली सेकुलर) तरीके से देश को बताने की कोशिश की, कि यह कोई खास बात नहीं है। उसी के बाद असम में भीषण बम-विस्फ़ोट हुए और कई लोग मारे गये। बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण असम, त्रिपुरा और मेघालय के कई इलाकों में स्थिति गम्भीर से भी ज्यादा खतरनाक हो चुकी है, असम अब कश्मीर की राह पर चल पड़ा है, लेकिन जब भी इस प्रकार के कोई आँकड़े पेश करके सिद्ध करने की कोशिश की जाती है तत्काल मामले को या तो “संघी एजेण्डा” कहकर या फ़िर हल्के-फ़ुल्के तौर पर लेकर दबाने की कोशिश तेज हो जाती है, और अब कुछ मूर्ख तो “हिन्दू आतंकवादी” नाम की अवधारणा भी लेकर आ गये हैं। ओसामा बिन लादेन के एक वीडियो में कश्मीर के साथ असम का भी विशेष उल्लेख है (देखें यह समाचार), लेकिन भारत की सरकार, असम की कांग्रेस सरकार और पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार खतरनाक नींद और मुगालते में खोई हुई है इसके प्रमाण लगातार हमें मिलते रहते हैं। विगत 5 साल से “मुगलिस्तान” नाम की नई देशद्रोही अवधारणा मूर्तरूप लेती जा रही है, फ़िर भी सभी राजनैतिक पार्टियाँ गहरी निद्रा में तल्लीन हैं। इस “मुगलिस्तान” की अवधारणा पाकिस्तान की ISI और बांग्लादेश की इस्लामी सरकार ने मिलकर तैयार की है। इस विस्तृत अवधारणा को ओसामा बिन लादेन का फ़िलहाल नैतिक समर्थन हासिल है, तथा दाऊद इब्राहिम जो कि पाकिस्तान के आकाओं की दया पर वहाँ डेरा डाले हुए है उसका आर्थिक और शारीरिक समर्थन मिला हुआ है। विभिन्न वेबसाईटों पर अलग-अलग लेखकों ने इस कथित “मुगलिस्तान” के बारे लिखा हुआ है। जिसमें से (मुख्य वेबसाईट यह है) यह आँकड़े किसी “धर्म-विशेष” के खिलाफ़ नहीं हैं, बल्कि देश पर मंडरा रहे खतरे को सबके सामने रखने की एक कोशिश भर है। “नकली कांग्रेसी सेकुलरों” को तो इन आँकड़ों से कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला, लेकिन जो भी देशप्रेमी और हिन्दू हित की बात करने वाले लोग हैं उन्हें समय रहते जाग जाना होगा, वरना…।
यह एक ऐतिहासिक तथ्य और सत्य है कि जिस भी क्षेत्र, इलाके या देश विशेष में मुस्लिमों की आबादी बहुसंख्यक हुई है या पहले से रही है, वहाँ अन्य धर्मों को पनपने का कोई मौका नहीं होता। इसका सबसे बड़ा सबूत तो यही है कि भारत में गरीबों की सेवा के नाम पर ढिंढोरा पीटने वाली मिशनरी संस्थायें किसी इस्लामी देश में तो बहुत दूर की बात है, भारत में ही उन इलाकों में “सेवा”(???) करने नहीं जातीं, जिन जिलों या मोहल्ले में मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मुस्लिम पिछड़े, गरीब और अशिक्षित नहीं हैं? और उन्हें मिशनरी सेवा की जरूरत नहीं है?… बिलकुल है, और सेवा करना भी चाहिये, मुस्लिम बस्तियों में विभिन्न शिक्षा प्रकल्प चलाने चाहिये, लेकिन इससे मिशनरी का “असली” मकसद हल नहीं होता, फ़िर भला वे मुस्लिम बहुल इलाकों में सेवा क्यों करने लगीं। हिन्दू-दलित आदिवासियों को बरगलाना आसान होता है, क्योंकि जहाँ हिन्दू बहुसंख्यक होता है वहाँ धार्मिक स्वतंत्रता होती है, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता होती है, लोकतन्त्र होता है… लेकिन जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक होता है वहाँ…………… तो इस बात को अलग से साबित करने की आवश्यकता नहीं है कि, धीरे-धीरे जनसंख्या बढ़ाकर और बांग्लादेश के रास्ते घुसपैठ बढ़ाकर भारत के उत्तर-पूर्वी हिस्से में मुस्लिम बहुल जिले बढ़ते जा रहे हैं तब देश के सामने क्या चुनौतियाँ हैं।



गत कुछ सालों से एक नाम हवा में तैर रहा है “मुगलिस्तान” यानी मुसलमानों के लिये एक अलग “गृहदेश”। जैसा कि पहले कहा इस (Concept) अवधारणा को अमलीजामा पहनाने का बीड़ा उठाया है पाकिस्तान की ISI ने। इस अवधारणा के अनुसार भारत के उत्तर-पूर्वी हिस्से, पश्चिम बंगाल (जहाँ पहले ही कई जगह मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक हो चुकी है) को पाकिस्तान से मिलाना, ताकि पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक एक “मुगलिस्तान” बनाया जा सके। इस काम में ISI वामपंथियों, माओवादियों और नक्सलवादियों के बीच प्रसारित “लाल गलियारा” की मदद भी लेने वाली है। जैसा कि सभी जानते हैं कि आंध्रप्रदेश के उत्तरी इलाके, मध्यप्रदेश के दक्षिण-पूर्वी कुछ जिले, समूचा छत्तीसगढ़, आधा उड़ीसा, लगभग आधा झारखण्ड तथा दक्षिणी बिहार के बहुत सारे जिलों में माओवादियों और नक्सलवादियों ने अपना अघोषित साम्राज्य स्थापित कर लिया है और इस गलियारे को नेपाल तक ले जाने की योजना है, जिसे “लाल गलियारा” नाम दिया गया है। नेपाल में तो माओवादी लोकतन्त्र के सहारे (बन्दूक के जोर पर ही सही) सत्ता पाने में कामयाब हो चुके हैं, छत्तीसगढ़, झारखण्ड और उड़ीसा के कई दूरदराज के जिलों में “भारत सरकार” नाम की चीज़ नहीं बची है, ऐसे में सोचा जा सकता है कि ISI और नक्सलवादी-माओवादी का गठबन्धन देश के लिये कितना खतरनाक साबित होगा।

इस समूचे मास्टर-प्लान (जिसे भारत का “दूसरा विभाजन” नाम दिया गया है) को बांग्लादेश की जहाँगीरनगर विश्वविद्यालय में पाकिस्तान की ISI और बांग्लादेश की Director General of Forces Intelligence (DGFI) द्वारा मिलकर तैयार किया गया है। इस योजना के “विचार” को पाकिस्तान के तानाशाह जनरल जिया-उल-हक के समय से “ऑपरेशन टोपाक” के तहत सतत पैसा दिया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि जिया-उल-हक का भारत को तोड़ने का सपना अधूरा ही रह गया, लेकिन पाकिस्तान के शासकों ने अभी भी अपने प्रयास कम नहीं किये हैं, पहले “खालिस्तान” को समर्थन, फ़िर कश्मीर में लगातार घुसपैठ और अब बांग्लादेश के साथ मिलकर “मुगलिस्तान” की योजना, यानी कि साठ साल बाद भी “कुत्ते की दुम टेढ़ी की टेढ़ी”।



दाऊद इब्राहीम, लश्कर-ए-तोयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन मिलकर इस योजना को गुपचुप अंजाम देने में जुटे हुए हैं, भारत में उन्होंने “सिमी” और “इंडियन मुजाहिदीन” जैसे बड़े मजबूत नेटवर्क वाले संगठन तैयार कर लिये हैं। लश्कर-ए-तोयबा के साहित्य और वेबसाईटों पर भारत विरोधी दुष्प्रचार लगातार चलता रहता है। लश्कर और जैश दोनों ही संगठनों का एकमात्र उद्देश्य भारत को तोड़ना और कश्मीर को आजाद(?) करना है। नई रणनीति यह है कि इंडियन मुजाहिदीन कर बम विस्फ़ोट की जिम्मेदारी ले, ताकि पाकिस्तान पर लगने वाले “आतंकवादी देश” के आरोपों से बचा जा सके और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को बताया जा सके कि तमाम विस्फ़ोट भारत के अन्दरूनी संगठन ही करवा रहे हैं।

पाकिस्तान की आजादी के बाद वहाँ के घरू हालात सुधारने की बजाय उग्रवादी गुटों को भारत को तोड़ने की ललक ज्यादा है। वे यह नहीं देखते कि पाकिस्तान में भयंकर गरीबी है, देश दीवालिया होने की कगार पर पहुँच चुका है… बल्कि वे लोगों को “जेहाद” के नाम पर चन्दा देने को उकसाते हैं और पाक सरकार भी भारी मात्रा में पैसा देकर उनकी सहायता करती रहती है। हालांकि अमेरिका ने लश्कर और जैश पर प्रतिबन्ध लगा दिया है, लेकिन उस प्रतिबन्ध को लागू तो पाकिस्तान की सरकार को ही करवाना है, ऐसे में इस प्रतिबन्ध का कोई मतलब नहीं है। इस प्रस्तावित मुगलिस्तान की प्लानिंग के अनुसार भारत भर में लगभग 100 जिले चिन्हित किये गये हैं, जहाँ कि पहले से ही मुस्लिम आबादी 30% से लेकर 60% है और ये जिले भारत के विभिन्न हिस्सों में फ़ैले हुए हैं, इसमें जम्मू-कश्मीर के जिले शामिल नहीं हैं, क्योंकि वहाँ पहले ही कश्मीरी पंडितों को सामूहिक हत्याओं के जरिये भगाया जा चुका है और उनकी सम्पत्तियों पर कब्जा जमाया चुका है। अब ISI की प्राथमिकता है पश्चिम बंगाल और असम पर जहाँ का राजनैतिक वातावरण (वामपंथी और कांग्रेस) उनके अनुकूल है। इन प्रदेशों के जिलों में भारी संख्या में घुसपैठ करवाकर यहाँ का जनसंख्या सन्तुलन काफ़ी हद तक बिगाड़ा जा चुका है और अगले कदम के तौर पर यहाँ बात-बेबात दंगे, मारकाट और तोड़फ़ोड़ आयोजित किये जायेंगे ताकि वहाँ रहने वाले अल्पसंख्यक हिन्दू खुद को असुरक्षित महसूस करके वहाँ से पलायन कर जायें या फ़िर उन्हें मार दिया जाये (जैसा कि कश्मीर में किया गया)। केरल के मलप्पुरम, आंध्रप्रदेश के हैदराबाद दक्षिण जैसे इलाके भी इनके खास निशाने पर हैं।

(भाग-2 में जारी रहेगा…) (सभी सन्दर्भ www.bengalgenocide.com से साभार)

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